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  • एक गिलास दूध से घर पर बनाएं हलवाई जैसी मिल्क रोल बर्फी, सावन व्रत के लिए रहेगी बेहतरीन मिठाई

    एक गिलास दूध से घर पर बनाएं हलवाई जैसी मिल्क रोल बर्फी, सावन व्रत के लिए रहेगी बेहतरीन मिठाई

    नई दिल्ली । सावन का महीना आते ही घरों में व्रत और पूजा के लिए विशेष व्यंजनों की तैयारी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में यदि कम सामग्री और कम समय में स्वादिष्ट मिठाई तैयार करनी हो, तो मिल्क रोल बर्फी एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। इस मिठाई की खास बात यह है कि इसे केवल एक गिलास दूध और कुछ सामान्य रसोई सामग्री से आसानी से बनाया जा सकता है। इसका स्वाद हलवाई की मिठाइयों जैसा होता है और इसे पहले से बनाकर कई दिनों तक सुरक्षित भी रखा जा सकता है।

    मिल्क रोल बर्फी बनाने के लिए सबसे पहले एक भारी तले की कड़ाही में एक गिलास फुल क्रीम दूध डालकर धीमी आंच पर गर्म करें। इसमें दो छोटे चम्मच देसी घी मिलाएं और दूध को लगातार चलाते हुए पकाएं। जब दूध में हल्का उबाल आने लगे, तब इसमें स्वादानुसार चीनी डालें और मिश्रण को अच्छी तरह घुलने दें। लगातार चलाते रहने से दूध तले में नहीं लगेगा और स्वाद भी बेहतर रहेगा।

    इसके बाद मिश्रण में आधा छोटा चम्मच इलायची पाउडर मिलाएं, जिससे बर्फी में खुशबू और स्वाद दोनों बढ़ जाएंगे। यदि चाहें तो इसमें केसर या गुलाब जल की कुछ बूंदें भी मिला सकते हैं। अब दूध को तब तक पकाएं जब तक वह थोड़ा गाढ़ा न हो जाए। इसके बाद इसमें लगभग डेढ़ सौ ग्राम नारियल का बुरादा डालकर अच्छी तरह मिलाएं। मिश्रण को लगातार चलाते हुए तब तक पकाएं, जब तक वह कड़ाही छोड़ने न लगे और आटे जैसी लोई का रूप न ले ले।

    यदि मिल्क रोल को हल्का पिस्ता फ्लेवर देना चाहते हैं, तो इसमें थोड़ा पिस्ता एसेंस, पिसा हुआ पिस्ता या एक-दो बूंद प्राकृतिक फूड कलर मिला सकते हैं। हालांकि यह पूरी तरह वैकल्पिक है और इसके बिना भी मिठाई का स्वाद शानदार रहता है। मिश्रण तैयार होने के बाद गैस बंद कर दें और इसे कुछ मिनट ठंडा होने दें।

    अब एक साफ बटर पेपर, प्लास्टिक शीट या घी लगी ट्रे तैयार करें। मिश्रण को उस पर फैलाकर बेलनाकार रोल का आकार दें या चाहें तो ट्रे में जमाकर पारंपरिक बर्फी की तरह सेट करें। ऊपर से कटे हुए बादाम, पिस्ता या अन्य सूखे मेवे हल्के हाथ से दबाकर लगा दें। इसके बाद इसे लगभग आधे घंटे के लिए फ्रिज में रख दें ताकि मिठाई अच्छी तरह जम जाए।

    जब रोल पूरी तरह सेट हो जाए तो इसे मनचाहे आकार में काट लें। तैयार मिल्क रोल बर्फी का स्वाद बेहद मुलायम, हल्का और समृद्ध होता है। यह बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को पसंद आती है और व्रत, पूजा, त्योहार या मेहमानों के स्वागत के लिए भी उपयुक्त रहती है। यदि इसे एयरटाइट डिब्बे में रखकर फ्रिज में रखा जाए, तो यह लगभग एक सप्ताह तक ताजा बनी रह सकती है। इसलिए सावन के सोमवार, पूजा-पाठ या अन्य धार्मिक अवसरों के लिए इसे पहले से तैयार करके आसानी से उपयोग किया जा सकता है।

  • केचप से लेकर ब्रेकफास्ट सीरियल तक इन पैक्ड फूड्स में छिपी होती है भरपूर चीनी जानिए कैसे बचें

    केचप से लेकर ब्रेकफास्ट सीरियल तक इन पैक्ड फूड्स में छिपी होती है भरपूर चीनी जानिए कैसे बचें


    नई दिल्ली। जब भी चीनी की बात होती है तो ज्यादातर लोगों के दिमाग में मिठाई केक चॉकलेट आइसक्रीम या सॉफ्ट ड्रिंक का ख्याल आता है। लेकिन सच यह है कि आजकल बाजार में मिलने वाले कई पैक्ड और प्रोसेस्ड फूड्स ऐसे हैं जिनका स्वाद मीठा नहीं होता फिर भी उनमें बड़ी मात्रा में ऐडेड शुगर मौजूद रहती है। यही छिपी हुई चीनी धीरे धीरे शरीर पर असर डालती है और लंबे समय में मोटापा डायबिटीज हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ा सकती है। इसलिए केवल मीठी चीजों से दूरी बनाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि रोजाना इस्तेमाल होने वाले पैक्ड फूड्स को भी समझदारी से चुनना जरूरी है।

    विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक और ऐडेड शुगर में अंतर समझना बेहद जरूरी है। फलों दूध और दही जैसी प्राकृतिक चीजों में मौजूद शुगर के साथ फाइबर विटामिन और मिनरल भी मिलते हैं जो शरीर के लिए लाभदायक होते हैं। दूसरी ओर पैक्ड और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों में स्वाद बढ़ाने बनावट सुधारने और लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए अलग से मिलाई गई चीनी को ऐडेड शुगर कहा जाता है। यही अतिरिक्त चीनी स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक चिंता का कारण बनती है।

    अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि नमकीन चीजों में चीनी नहीं होती लेकिन यह धारणा पूरी तरह गलत है। केचप बारबेक्यू सॉस पास्ता सॉस सलाद ड्रेसिंग और कई रेडी टू ईट उत्पादों में स्वाद संतुलित करने के लिए अच्छी मात्रा में चीनी मिलाई जाती है। इसके अलावा फ्लेवर्ड योगर्ट प्रोटीन बार इंस्टेंट ओटमील ग्रेनोला ब्रेकफास्ट सीरियल और कई तरह के नट बटर में भी अतिरिक्त शुगर मौजूद हो सकती है। इसलिए किसी भी पैक्ड फूड को खरीदने से पहले उसका न्यूट्रिशन लेबल पढ़ना एक अच्छी आदत होनी चाहिए।

    न्यूट्रिशन लेबल पर टोटल शुगर और ऐडेड शुगर दोनों की जानकारी दी जाती है। यदि किसी उत्पाद में टोटल शुगर अधिक है और उसमें ऐडेड शुगर की मात्रा भी ज्यादा लिखी है तो इसका मतलब है कि उसमें अलग से काफी चीनी मिलाई गई है। साथ ही इंग्रीडिएंट्स की सूची भी ध्यान से पढ़नी चाहिए। यदि शुरुआत में ही चीनी या उससे जुड़े नाम लिखे हों तो समझना चाहिए कि उस उत्पाद में चीनी की मात्रा अधिक है।

    ध्यान देने वाली बात यह भी है कि कंपनियां हमेशा शुगर शब्द का उपयोग नहीं करतीं। कई बार केन शुगर कॉर्न सिरप हाई फ्रक्टोज कॉर्न सिरप राइस सिरप मोलासेस कैरेमल हनी अगावे ग्लूकोज फ्रक्टोज सुक्रोज डेक्सट्रोज और माल्टोज जैसे नामों से भी चीनी को लिखा जाता है। ऐसे शब्द देखकर उपभोक्ता आसानी से भ्रमित हो सकते हैं इसलिए लेबल को समझना बेहद जरूरी है।

    आजकल बाजार में शुगर फ्री और जीरो शुगर उत्पाद भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनमें सुक्रालोज एस्पार्टेम सैकरीन या स्टीविया जैसे स्वीटनर का उपयोग किया जाता है। हालांकि केवल शुगर फ्री लिखा होना किसी उत्पाद को पूरी तरह हेल्दी नहीं बनाता क्योंकि इनमें कई बार दूसरी प्रोसेस्ड सामग्री भी अधिक मात्रा में मौजूद होती है। इसलिए ऐसे उत्पादों का भी सीमित मात्रा में सेवन करना ही बेहतर माना जाता है।

    स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए सबसे अच्छा तरीका यही है कि पैक्ड और प्रोसेस्ड फूड्स की जगह ताजे फल सब्जियां साबुत अनाज और घर का बना भोजन अधिक खाया जाए। प्यास बुझाने के लिए सादा पानी बिना चीनी वाली चाय या कॉफी बेहतर विकल्प हैं। यदि कभी पैक्ड फूड खरीदना ही पड़े तो उसका लेबल जरूर पढ़ें और कम ऐडेड शुगर वाले विकल्प चुनें। छोटी सी सावधानी भविष्य में कई गंभीर बीमारियों से बचाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है।

  • IVF को लेकर मन में हैं सवाल? जानें कब पड़ती है जरूरत, कितनी है सफलता और क्या हैं सच-झूठ

    IVF को लेकर मन में हैं सवाल? जानें कब पड़ती है जरूरत, कितनी है सफलता और क्या हैं सच-झूठ


    नई दिल्ली। बदलती जीवनशैली, बढ़ता तनाव, देर से शादी, पीसीओएस, एंडोमेट्रियोसिस, मोटापा और पुरुषों में शुक्राणुओं की गुणवत्ता में गिरावट जैसी समस्याओं के कारण इनफर्टिलिटी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी IVF लाखों दंपतियों के लिए माता-पिता बनने का एक भरोसेमंद विकल्प बनकर सामने आया है। हालांकि IVF जितना लोकप्रिय हुआ है, उससे जुड़े भ्रम और मिथक भी उतनी ही तेजी से फैले हैं। कई लोग मानते हैं कि IVF से पैदा होने वाले बच्चे कमजोर होते हैं या यह प्रक्रिया हर बार सफल हो जाती है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन धारणाओं का वैज्ञानिक आधार नहीं है।

    IVF एक आधुनिक प्रजनन तकनीक है जिसमें महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु को प्रयोगशाला में निषेचित कर भ्रूण तैयार किया जाता है। इसके बाद स्वस्थ भ्रूण को महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है, जहां आगे की गर्भावस्था सामान्य तरीके से ही विकसित होती है।

    सबसे बड़ा मिथक यह है कि IVF कराने के बाद गर्भधारण तय होता है। जबकि वास्तविकता यह है कि इसकी सफलता कई कारकों पर निर्भर करती है। महिला की उम्र, अंडाणु और शुक्राणु की गुणवत्ता, भ्रूण की स्थिति, गर्भाशय का स्वास्थ्य और अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियां सफलता की संभावना तय करती हैं। कई मामलों में पहली कोशिश सफल नहीं होती और दूसरी या तीसरी बार सफलता मिलती है।

    एक और आम धारणा यह है कि IVF से पैदा होने वाले बच्चे शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर होते हैं। विशेषज्ञ इस दावे को पूरी तरह गलत बताते हैं। उनका कहना है कि IVF में केवल निषेचन की प्रक्रिया प्रयोगशाला में होती है। इसके बाद भ्रूण का विकास गर्भाशय में बिल्कुल उसी तरह होता है, जैसा प्राकृतिक गर्भधारण में होता है। वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि अधिकांश IVF से जन्मे बच्चे पूरी तरह स्वस्थ होते हैं और उनका शारीरिक तथा मानसिक विकास सामान्य बच्चों की तरह ही होता है। बच्चे का स्वास्थ्य माता-पिता की आनुवंशिक स्थिति, गर्भावस्था के दौरान मां के पोषण, जीवनशैली, संक्रमण और प्रसव की परिस्थितियों पर अधिक निर्भर करता है।

    कई लोगों को लगता है कि IVF से हमेशा जुड़वां या तीन बच्चे पैदा होते हैं। पहले सफलता की संभावना बढ़ाने के लिए एक से अधिक भ्रूण गर्भाशय में स्थापित किए जाते थे, इसलिए मल्टीपल प्रेग्नेंसी की संभावना अधिक रहती थी। लेकिन आधुनिक तकनीकों में डॉक्टर अधिकतर मामलों में केवल एक स्वस्थ भ्रूण ही प्रत्यारोपित करते हैं। इससे जुड़वां गर्भावस्था की संभावना कम होती है और मां तथा बच्चे दोनों के लिए जोखिम भी घट जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि IVF उन दंपतियों के लिए एक प्रभावी विकल्प है जिन्हें लंबे समय तक प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण नहीं हो पा रहा हो। हालांकि इस प्रक्रिया को अपनाने से पहले किसी अनुभवी फर्टिलिटी विशेषज्ञ से पूरी जांच और सलाह लेना जरूरी है। सही समय पर उपचार, स्वस्थ जीवनशैली और सकारात्मक मानसिक स्थिति IVF की सफलता की संभावना को बेहतर बना सकती है।

    आज की आधुनिक चिकित्सा ने लाखों परिवारों की जिंदगी में खुशियां लौटाई हैं। इसलिए IVF को लेकर फैली अफवाहों और मिथकों पर भरोसा करने के बजाय सही और वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर निर्णय लेना ही सबसे समझदारी भरा कदम है।

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  • महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स को कहें अलविदा किचन की इन प्राकृतिक चीजों से पाएं दमकती और बेदाग त्वचा

    महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स को कहें अलविदा किचन की इन प्राकृतिक चीजों से पाएं दमकती और बेदाग त्वचा


    नई दिल्ली। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई स्वस्थ और चमकदार त्वचा चाहता है। बाजार में मिलने वाले महंगे स्किन केयर प्रोडक्ट्स तुरंत निखार का दावा तो करते हैं लेकिन इनमें मौजूद कई तरह के रसायन लंबे समय में त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। ऐसे में आपकी अपनी रसोई यानी किचन कई ऐसे प्राकृतिक खजानों से भरी हुई है जो बिना अधिक खर्च किए त्वचा को पोषण देने के साथ उसे मुलायम चमकदार और स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। यदि इन घरेलू चीजों को सही तरीके और नियमितता के साथ इस्तेमाल किया जाए तो स्किन केयर रूटीन पूरी तरह प्राकृतिक और प्रभावी बन सकता है।

    सुबह चेहरे की सफाई से दिन की शुरुआत करें। इसके लिए कच्चे दूध या गुलाब जल का उपयोग किया जा सकता है। कच्चा दूध त्वचा से धूल और अतिरिक्त तेल हटाने में मदद करता है जबकि गुलाब जल त्वचा को ताजगी और ठंडक देता है। इसके बाद सप्ताह में दो से तीन बार बेसन और हल्दी का उबटन लगाना फायदेमंद माना जाता है। बेसन त्वचा की गहराई से सफाई करता है जबकि हल्दी में मौजूद प्राकृतिक गुण त्वचा को संक्रमण से बचाने और रंगत निखारने में मदद करते हैं।

    शहद भी किचन में मौजूद सबसे बेहतरीन प्राकृतिक मॉइस्चराइजर माना जाता है। यदि त्वचा रूखी रहती है तो चेहरे पर कुछ मिनट तक शुद्ध शहद लगाकर छोड़ दें और फिर सादे पानी से धो लें। इससे त्वचा में नमी बनी रहती है और चेहरा मुलायम महसूस होता है। वहीं दही में मौजूद लैक्टिक एसिड त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाकर उसे चमकदार बनाने में मदद करता है। दही में थोड़ा सा शहद मिलाकर फेस पैक तैयार किया जा सकता है जिसे सप्ताह में एक या दो बार लगाने से त्वचा को प्राकृतिक चमक मिलती है।

    खीरा और टमाटर भी स्किन केयर रूटीन का अहम हिस्सा बन सकते हैं। खीरे का रस त्वचा को ठंडक देने के साथ सूजन कम करने में मदद करता है जबकि टमाटर में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और विटामिन सी त्वचा की रंगत सुधारने में सहायक माने जाते हैं। धूप में अधिक समय बिताने वालों के लिए खीरे का रस चेहरे पर लगाना काफी लाभदायक हो सकता है।

    एलोवेरा जेल भी लगभग हर घर में आसानी से उपलब्ध होता है। ताजा एलोवेरा जेल त्वचा को हाइड्रेट रखने के साथ छोटे दाग धब्बों को हल्का करने में मदद कर सकता है। रात में सोने से पहले एलोवेरा जेल की हल्की परत लगाने से त्वचा को ठंडक मिलती है और सुबह चेहरा अधिक ताजा दिखाई देता है। इसके अलावा नारियल तेल का सीमित मात्रा में उपयोग त्वचा को पोषण देने और रूखेपन को कम करने में सहायक हो सकता है।

    हालांकि केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने के लिए भरपूर पानी पीना संतुलित भोजन करना पर्याप्त नींद लेना और धूप में निकलते समय सनस्क्रीन का उपयोग करना भी जरूरी है। साथ ही किसी भी घरेलू सामग्री को पूरे चेहरे पर लगाने से पहले त्वचा के एक छोटे हिस्से पर परीक्षण जरूर करें ताकि एलर्जी या जलन की संभावना से बचा जा सके।

    प्राकृतिक स्किन केयर का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह कम खर्चीला होने के साथ त्वचा को धीरे धीरे अंदर से स्वस्थ बनाता है। यदि नियमित रूप से सही खानपान और घरेलू देखभाल को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाए तो बिना महंगे कॉस्मेटिक उत्पादों के भी त्वचा लंबे समय तक चमकदार स्वस्थ और आकर्षक बनी रह सकती है।

  • त्वचा को लंबे समय तक रखना है स्वस्थ और चमकदार तो अपनाएं ये आसान स्किन केयर टिप्स रोजाना मिलेगी नेचुरल ग्लो

    त्वचा को लंबे समय तक रखना है स्वस्थ और चमकदार तो अपनाएं ये आसान स्किन केयर टिप्स रोजाना मिलेगी नेचुरल ग्लो


    नई दिल्ली । स्वस्थ और चमकदार त्वचा हर किसी की चाहत होती है लेकिन इसके लिए केवल महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता। सही जीवनशैली संतुलित खानपान और नियमित स्किन केयर रूटीन अपनाकर भी त्वचा को लंबे समय तक सुंदर और स्वस्थ बनाए रखा जा सकता है। बदलते मौसम धूल प्रदूषण तेज धूप और तनाव का सबसे ज्यादा असर हमारी त्वचा पर पड़ता है इसलिए रोजाना कुछ आसान आदतों को अपनाना बेहद जरूरी है।

    त्वचा की देखभाल की शुरुआत सफाई से होती है। दिन में कम से कम दो बार चेहरे को अपनी त्वचा के अनुसार हल्के फेसवॉश से साफ करें ताकि धूल तेल और गंदगी हट सके। चेहरा बार बार साबुन से धोने से बचें क्योंकि इससे त्वचा का प्राकृतिक तेल कम हो सकता है और रूखापन बढ़ सकता है।

    चेहरे की सफाई के बाद मॉइस्चराइजर लगाना कभी न भूलें। चाहे आपकी त्वचा ऑयली हो या ड्राई हर प्रकार की त्वचा को नमी की जरूरत होती है। सही मॉइस्चराइजर त्वचा को मुलायम बनाए रखने के साथ उसकी प्राकृतिक चमक भी बनाए रखता है।

    धूप से बचाव भी स्किन केयर का सबसे अहम हिस्सा है। घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन जरूर लगाएं। तेज धूप की अल्ट्रावायलेट किरणें त्वचा को समय से पहले बूढ़ा बना सकती हैं और टैनिंग पिगमेंटेशन जैसी समस्याओं का कारण बन सकती हैं। हर दो से तीन घंटे में जरूरत के अनुसार सनस्क्रीन दोबारा लगाना भी फायदेमंद माना जाता है।

    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहर से नहीं बल्कि अंदर से भी आती है। इसलिए दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बेहद जरूरी है। पर्याप्त पानी शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में मदद करता है और त्वचा को हाइड्रेट रखता है जिससे चेहरा ताजा और चमकदार दिखाई देता है।

    संतुलित आहार भी स्वस्थ त्वचा की सबसे बड़ी जरूरत है। भोजन में मौसमी फल हरी सब्जियां सूखे मेवे दही और प्रोटीन से भरपूर चीजें शामिल करें। विटामिन सी विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर आहार त्वचा की कोशिकाओं को मजबूत बनाते हैं और प्राकृतिक चमक बनाए रखते हैं। जंक फूड अत्यधिक मीठे और तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन कम करना बेहतर रहता है।

    रोजाना पर्याप्त नींद लेना भी त्वचा के लिए बेहद जरूरी है। जब शरीर आराम करता है तब त्वचा खुद को रिपेयर करती है। लगातार कम नींद लेने से डार्क सर्कल चेहरे की थकान और समय से पहले झुर्रियां दिखाई देने लगती हैं। इसलिए हर दिन सात से आठ घंटे की अच्छी नींद लेने का प्रयास करें।

    तनाव भी त्वचा की समस्याओं का बड़ा कारण बन सकता है। अधिक तनाव से मुंहासे दाग धब्बे और त्वचा की चमक कम हो सकती है। योग ध्यान और नियमित व्यायाम तनाव कम करने के साथ शरीर और त्वचा दोनों को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं।

    सप्ताह में एक या दो बार हल्का एक्सफोलिएशन करना भी लाभदायक होता है। इससे त्वचा की मृत कोशिकाएं हटती हैं और नई कोशिकाओं को बढ़ने का अवसर मिलता है। हालांकि जरूरत से ज्यादा स्क्रब करने से त्वचा को नुकसान भी हो सकता है इसलिए संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

    यदि त्वचा पर लगातार एलर्जी खुजली दाग धब्बे या अन्य गंभीर समस्याएं बनी रहें तो घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर होता है। सही समय पर उचित उपचार से बड़ी समस्याओं से बचा जा सकता है।

    अगर इन आसान और नियमित आदतों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाए तो त्वचा लंबे समय तक स्वस्थ साफ और प्राकृतिक रूप से चमकदार बनी रह सकती है। सुंदर त्वचा का सबसे बड़ा रहस्य नियमित देखभाल स्वस्थ खानपान और सकारात्मक जीवनशैली में ही छिपा है।

  • मानसून में बढ़ा जानलेवा खतरा मच्छर के काटने से हो सकती है दिमाग में सूजन जानिए जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण और बचाव

    मानसून में बढ़ा जानलेवा खतरा मच्छर के काटने से हो सकती है दिमाग में सूजन जानिए जापानी इंसेफेलाइटिस के लक्षण और बचाव


    नई दिल्ली । मानसून का मौसम जहां ठंडक और राहत लेकर आता है वहीं अपने साथ कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। आमतौर पर लोग मच्छरों से होने वाली बीमारियों में डेंगू और मलेरिया को सबसे बड़ा खतरा मानते हैं लेकिन एक ऐसी बीमारी भी है जो इन दोनों से कहीं ज्यादा गंभीर साबित हो सकती है। इस बीमारी का नाम जापानी इंसेफेलाइटिस है। यह एक वायरल संक्रमण है जो सीधे दिमाग को प्रभावित करता है और गंभीर मामलों में मरीज की जान तक ले सकता है। कई बार इस बीमारी से बच जाने वाले लोगों को भी जीवनभर न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

    जापानी इंसेफेलाइटिस जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस के कारण होता है। यह वायरस फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है जिसमें डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस भी शामिल हैं। संक्रमण मुख्य रूप से क्यूलेक्स प्रजाति के संक्रमित मच्छरों के काटने से फैलता है। ये मच्छर बारिश के मौसम में धान के खेतों तालाबों दलदली क्षेत्रों और लंबे समय तक जमा पानी वाली जगहों पर तेजी से पनपते हैं। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत क्यूलेक्स मच्छर शाम से लेकर सुबह तक सबसे अधिक सक्रिय रहते हैं इसलिए रात के समय विशेष सावधानी जरूरी होती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार जब संक्रमित मच्छर किसी व्यक्ति को काटता है तो वायरस सबसे पहले रक्त में प्रवेश करता है। इसके बाद यह ब्लड ब्रेन बैरियर को पार करके मस्तिष्क तक पहुंच सकता है। दिमाग में संक्रमण फैलने के बाद सूजन की स्थिति बनती है जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है। यही कारण है कि यह बीमारी बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि इसका असर सीधे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर पड़ता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में हर वर्ष लगभग 68000 लोग जापानी इंसेफेलाइटिस से संक्रमित होते हैं। दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र इसके सबसे बड़े प्रभावित इलाके हैं। भारत में भी हर वर्ष इसके मामले सामने आते हैं। बच्चों में इसका खतरा सबसे अधिक माना जाता है। विशेष रूप से 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग धान के खेतों में काम करने वाले किसान और ऐसे यात्री जिन्होंने टीकाकरण नहीं कराया है उनके संक्रमित होने की संभावना अधिक रहती है।

    इस बीमारी की शुरुआत सामान्य वायरल संक्रमण जैसी दिखाई देती है। शुरुआती लक्षणों में तेज बुखार सिरदर्द उल्टी कमजोरी और अत्यधिक थकान शामिल हो सकते हैं। लेकिन यदि वायरस दिमाग तक पहुंच जाए तो स्थिति तेजी से गंभीर हो सकती है। मरीज में तेज बुखार के साथ भ्रम की स्थिति बेहोशी दौरे पड़ना गर्दन में अकड़न चलने में कठिनाई और चेतना खोने जैसे लक्षण विकसित हो सकते हैं। ऐसे संकेत दिखाई देने पर तुरंत अस्पताल पहुंचना बेहद जरूरी होता है क्योंकि इलाज में देरी जानलेवा साबित हो सकती है।

    डॉक्टरों का कहना है कि केवल सीटी स्कैन से हर बार इस बीमारी की पुष्टि नहीं हो पाती। आवश्यकता पड़ने पर एमआरआई रक्त जांच और सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड की जांच के जरिए संक्रमण की पुष्टि की जाती है। फिलहाल इस बीमारी का कोई विशेष एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है। उपचार के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखना संक्रमण से होने वाली जटिलताओं को नियंत्रित करना और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों की कार्यप्रणाली बनाए रखना ही मुख्य उद्देश्य होता है।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बीमारी से बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय है। मच्छरों से बचने के लिए पूरी बांह के कपड़े पहनें रात में मच्छरदानी का उपयोग करें घर और आसपास पानी जमा न होने दें तथा जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। जिन क्षेत्रों में जापानी इंसेफेलाइटिस का खतरा अधिक है वहां स्वास्थ्य विभाग द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले टीकाकरण का लाभ अवश्य लेना चाहिए। थोड़ी सी सावधानी इस गंभीर बीमारी से सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच बन सकती है।

  • डेंगू मच्छर से बचाव के लिए बरसात में रखें विशेष सावधानी जानिए कैसे करें खुद और परिवार की सुरक्षा

    डेंगू मच्छर से बचाव के लिए बरसात में रखें विशेष सावधानी जानिए कैसे करें खुद और परिवार की सुरक्षा


    नई दिल्ली । बारिश का मौसम जहां गर्मी से राहत लेकर आता है वहीं कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। इनमें डेंगू सबसे गंभीर बीमारियों में से एक माना जाता है। हर साल मानसून के दौरान डेंगू के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिलती है। इसका सबसे बड़ा कारण घरों और आसपास जमा होने वाला साफ पानी है जहां एडीज मच्छर आसानी से पनपता है। यही मच्छर डेंगू वायरस फैलाने का काम करता है। ऐसे में थोड़ी सी सतर्कता और सही आदतें अपनाकर इस बीमारी से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखा जा सकता है।

    डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर दिन के समय अधिक सक्रिय रहता है। यह सुबह और शाम के समय सबसे ज्यादा काटता है। इसलिए केवल रात में ही नहीं बल्कि दिन में भी मच्छरों से बचाव करना जरूरी है। पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें और बच्चों को भी फुल स्लीव्स के कपड़े पहनाएं ताकि मच्छरों के काटने का खतरा कम हो सके।

    घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। कूलर गमले टायर बाल्टी पानी की टंकी और पुराने बर्तनों में जमा पानी को नियमित रूप से खाली करें या बदलें। यदि पानी लंबे समय तक जमा रहेगा तो मच्छर तेजी से अंडे देंगे और उनकी संख्या बढ़ जाएगी। घर की छत बालकनी और आंगन की नियमित सफाई भी बेहद जरूरी है।

    मच्छरों से बचाव के लिए मच्छरदानी का उपयोग करें। साथ ही मच्छर भगाने वाली क्रीम स्प्रे या इलेक्ट्रिक वेपराइजर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है। खिड़कियों और दरवाजों पर जाली लगवाना भी एक प्रभावी उपाय माना जाता है जिससे मच्छर घर के अंदर प्रवेश नहीं कर पाते।

    यदि किसी व्यक्ति को तेज बुखार सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द शरीर और जोड़ों में तेज दर्द कमजोरी या त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई दें तो इसे सामान्य वायरल बुखार समझकर नजरअंदाज न करें। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और आवश्यक जांच कराएं। शुरुआती पहचान और समय पर इलाज से डेंगू के गंभीर खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    डेंगू होने पर पर्याप्त मात्रा में पानी नारियल पानी नींबू पानी और अन्य तरल पदार्थ लेते रहना चाहिए ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दर्द निवारक दवा लेने से बचें क्योंकि कुछ दवाएं रक्तस्राव का खतरा बढ़ा सकती हैं। केवल चिकित्सकीय सलाह के अनुसार ही दवा का सेवन करें।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डेंगू से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका मच्छरों को पनपने से रोकना है। यदि हर व्यक्ति अपने घर और आसपास सफाई बनाए रखे तथा पानी जमा न होने दे तो डेंगू के मामलों में बड़ी कमी लाई जा सकती है। बरसात के मौसम में थोड़ी सी जागरूकता और नियमित सावधानी न केवल आपको बल्कि पूरे समाज को इस खतरनाक बीमारी से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • ऑफिस ड्रेस कोड के साथ चुनें सही जूते, जानिए फॉर्मल शूज़ और स्नीकर्स में कौन है बेहतर विकल्प

    ऑफिस ड्रेस कोड के साथ चुनें सही जूते, जानिए फॉर्मल शूज़ और स्नीकर्स में कौन है बेहतर विकल्प

    नई दिल्ली। बदलते कॉर्पोरेट माहौल के साथ ऑफिस संस्कृति में भी तेजी से बदलाव आया है। पहले जहां अधिकांश संस्थानों में सख्त फॉर्मल ड्रेस कोड लागू होता था, वहीं अब कई कंपनियां बिजनेस कैजुअल और स्मार्ट कैजुअल पहनावे को बढ़ावा दे रही हैं। ऐसे में कर्मचारियों के सामने यह सवाल अक्सर रहता है कि ऑफिस के लिए फॉर्मल शूज़ पहनना बेहतर रहेगा या स्नीकर्स। विशेषज्ञों का मानना है कि सही फुटवियर का चुनाव केवल आपके व्यक्तित्व को निखारता ही नहीं, बल्कि पूरे दिन की कार्यक्षमता और आराम पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है।

    यदि आपका कार्यक्षेत्र बैंकिंग, सरकारी कार्यालय, वित्तीय संस्थान, कानूनी सेवाओं या पारंपरिक कॉर्पोरेट सेक्टर से जुड़ा है, जहां प्रोफेशनल ड्रेस कोड का पालन अनिवार्य होता है, तो फॉर्मल शूज़ सबसे उपयुक्त विकल्प माने जाते हैं। क्लाइंट मीटिंग, इंटरव्यू, बिजनेस प्रेजेंटेशन या किसी आधिकारिक कार्यक्रम में फॉर्मल शूज़ आपकी पेशेवर छवि को मजबूत बनाते हैं और आत्मविश्वास भी बढ़ाते हैं। साफ-सुथरे और अच्छी गुणवत्ता वाले फॉर्मल शूज़ आज भी प्रोफेशनल लुक का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं।

    दूसरी ओर, यदि आप सूचना प्रौद्योगिकी, स्टार्टअप, मीडिया, डिजिटल मार्केटिंग, डिजाइन या किसी रचनात्मक क्षेत्र में कार्यरत हैं, तो स्नीकर्स भी एक बेहतर विकल्प हो सकते हैं। कई आधुनिक कंपनियां कर्मचारियों को आरामदायक और स्मार्ट कैजुअल फुटवियर पहनने की अनुमति देती हैं। साधारण और सादे डिजाइन वाले स्नीकर्स स्टाइलिश दिखने के साथ-साथ लंबे समय तक आराम भी प्रदान करते हैं। ऐसे जूते उन लोगों के लिए अधिक उपयोगी साबित होते हैं जिन्हें दिनभर ऑफिस परिसर में अधिक चलना-फिरना पड़ता है।

    आराम के लिहाज से स्नीकर्स को अक्सर बेहतर माना जाता है क्योंकि इनमें बेहतर कुशनिंग, हल्का वजन और पैरों को पर्याप्त सपोर्ट मिलता है। लंबे समय तक खड़े रहने या लगातार चलने वाले कर्मचारियों के लिए यह थकान कम करने में मददगार हो सकते हैं। हालांकि अब बाजार में ऐसे आधुनिक फॉर्मल शूज़ भी उपलब्ध हैं जिनमें मेमोरी फोम, कुशन सोल और सॉफ्ट इनसोल जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे पारंपरिक फॉर्मल शूज़ भी पहले की तुलना में अधिक आरामदायक हो गए हैं।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि जूते खरीदते समय केवल ब्रांड या डिजाइन पर ध्यान न दें। सही आकार, मजबूत सोल, अच्छी ग्रिप, टिकाऊ सामग्री और आरामदायक फिटिंग को प्राथमिकता देना अधिक जरूरी है। गलत आकार के जूते पैरों में दर्द, छाले और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इसलिए फुटवियर का चयन हमेशा अपनी जरूरत, कार्यस्थल के वातावरण और दैनिक गतिविधियों को ध्यान में रखकर करना चाहिए।

    यदि संभव हो तो अलमारी में फॉर्मल शूज़ और स्नीकर्स दोनों रखना सबसे व्यावहारिक विकल्प माना जाता है। महत्वपूर्ण बैठकों, आधिकारिक कार्यक्रमों और औपचारिक अवसरों पर फॉर्मल शूज़ पहने जा सकते हैं, जबकि सामान्य कार्यदिवस, कैजुअल ऑफिस माहौल या अधिक गतिविधि वाले दिनों में स्नीकर्स बेहतर साबित हो सकते हैं। सही अवसर के अनुसार फुटवियर का चुनाव न केवल आपकी पेशेवर छवि को मजबूत करता है, बल्कि पूरे दिन आराम और आत्मविश्वास भी बनाए रखता है।

  • त्वचा को बनाना है साफ चमकदार और स्वस्थ तो अपनाएं बेसन का घरेलू नुस्खा मिलेंगे कई जबरदस्त फायदे

    त्वचा को बनाना है साफ चमकदार और स्वस्थ तो अपनाएं बेसन का घरेलू नुस्खा मिलेंगे कई जबरदस्त फायदे


    नई दिल्ली । प्राकृतिक सुंदरता पाने के लिए आज भी घरेलू नुस्खों पर लोगों का भरोसा कायम है। इन्हीं पारंपरिक उपायों में बेसन का नाम सबसे पहले लिया जाता है। रसोई में आसानी से मिलने वाला बेसन केवल स्वादिष्ट व्यंजन बनाने के लिए ही नहीं बल्कि त्वचा की देखभाल के लिए भी बेहद उपयोगी माना जाता है। वर्षों से भारतीय घरों में बेसन का इस्तेमाल चेहरे की सफाई रंगत निखारने और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने के लिए किया जाता रहा है। इसमें मौजूद प्राकृतिक गुण त्वचा की गहराई से सफाई करने के साथ उसे मुलायम और चमकदार बनाने में मदद करते हैं।

    बेसन प्राकृतिक क्लींजर की तरह काम करता है। दिनभर धूल मिट्टी प्रदूषण और अतिरिक्त तेल त्वचा पर जमा हो जाता है जिससे चेहरे की चमक कम होने लगती है। ऐसे में बेसन से चेहरा साफ करने पर त्वचा के रोमछिद्रों में जमी गंदगी निकल जाती है और चेहरा ताजा तथा साफ दिखाई देने लगता है। नियमित रूप से इसका उपयोग करने पर त्वचा अधिक स्वस्थ और तरोताजा महसूस होती है।

    तैलीय त्वचा वाले लोगों के लिए भी बेसन बेहद लाभकारी माना जाता है। यह त्वचा पर मौजूद अतिरिक्त तेल को नियंत्रित करने में मदद करता है जिससे मुंहासों और ब्लैकहेड्स की समस्या कम हो सकती है। यदि बेसन में गुलाब जल या दही मिलाकर फेस पैक तैयार किया जाए तो त्वचा को ठंडक मिलने के साथ प्राकृतिक नमी भी बनी रहती है। वहीं सूखी त्वचा वाले लोग इसमें दूध या मलाई मिलाकर इसका उपयोग कर सकते हैं जिससे त्वचा को पोषण मिलता है और रूखापन कम होता है।

    त्वचा की रंगत निखारने में भी बेसन की अहम भूमिका मानी जाती है। हल्दी और बेसन का मिश्रण लंबे समय से पारंपरिक उबटन के रूप में उपयोग किया जाता रहा है। यह त्वचा की मृत कोशिकाओं को हटाने में मदद करता है और नई चमक लेकर आता है। शादी विवाह और विशेष अवसरों पर भी बेसन का उबटन लगाने की परंपरा इसी कारण आज भी प्रचलित है।

    यदि चेहरे पर हल्की टैनिंग हो गई है तो बेसन में दही और नींबू का रस मिलाकर तैयार किया गया पैक उपयोगी माना जाता है। यह त्वचा को ताजगी देने के साथ उसकी रंगत को भी बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। हालांकि संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को किसी भी घरेलू नुस्खे का इस्तेमाल करने से पहले त्वचा विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहता है।

    बेसन त्वचा की हल्की एक्सफोलिएशन भी करता है। जब इसे हल्के हाथों से चेहरे पर लगाया जाता है तो यह मृत त्वचा को हटाकर त्वचा को मुलायम बनाने में मदद करता है। इससे चेहरा साफ और अधिक चमकदार दिखाई देता है। नियमित देखभाल के साथ संतुलित खानपान पर्याप्त पानी और अच्छी नींद भी स्वस्थ त्वचा के लिए उतने ही जरूरी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि प्राकृतिक उपाय तभी असर दिखाते हैं जब उनका उपयोग सही तरीके और नियमितता के साथ किया जाए। बेसन त्वचा की सामान्य देखभाल में सहायक हो सकता है लेकिन यदि त्वचा पर लगातार एलर्जी जलन गंभीर मुंहासे या किसी प्रकार की समस्या हो तो स्वयं उपचार करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

    प्राकृतिक गुणों से भरपूर बेसन आज भी त्वचा की देखभाल का एक भरोसेमंद घरेलू उपाय माना जाता है। यदि इसे अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार सही सामग्री के साथ इस्तेमाल किया जाए तो यह चेहरे की सफाई चमक और कोमलता बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है।

  • 40 घंटे तक थमी रही दिल की धड़कन, आधुनिक इलाज और डॉक्टरों की कोशिशों ने मरीज को दी नई जिंदगी

    40 घंटे तक थमी रही दिल की धड़कन, आधुनिक इलाज और डॉक्टरों की कोशिशों ने मरीज को दी नई जिंदगी

    नई दिल्ली । पूर्वी चीन में सामने आया एक दुर्लभ चिकित्सा मामला आधुनिक मेडिकल साइंस की क्षमताओं और समय पर मिले उपचार के महत्व को रेखांकित करता है। लगभग 40 वर्षीय एक व्यक्ति, जिसे सीने में जकड़न और सांस लेने में कठिनाई की शिकायत थी, अस्पताल पहुंचने के कुछ ही समय बाद अचानक गंभीर स्थिति में चला गया। इलाज के दौरान उसका दिल और सांस दोनों एक साथ बंद हो गए। सामान्य परिस्थितियों में ऐसी स्थिति को अत्यंत गंभीर माना जाता है और लंबे समय तक हृदय की धड़कन बंद रहने पर बचने की संभावना बहुत कम रह जाती है। इसके बावजूद चिकित्सकों ने लगातार प्रयास जारी रखे और अंततः मरीज को सुरक्षित जीवन वापस दिलाने में सफलता हासिल की।

    अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने प्रारंभिक जांच के साथ ही मरीज का उपचार शुरू किया, लेकिन कुछ ही देर में उसकी हालत तेजी से बिगड़ गई। चिकित्सकों ने कार्डियक अरेस्ट के बाद हृदय को दोबारा सक्रिय करने के लिए आवश्यक सभी मानक प्रक्रियाएं अपनाईं। कई बार इलेक्ट्रिक शॉक देने सहित अन्य आपातकालीन उपाय किए गए, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिला। इसके बाद विशेषज्ञों ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्नत लाइफ सपोर्ट तकनीकों का सहारा लेने का निर्णय लिया।

    मरीज को ऐसी मशीन से जोड़ा गया जिसने अस्थायी रूप से उसके दिल और फेफड़ों का कार्य संभाल लिया। यह प्रणाली शरीर से रक्त निकालकर उसमें ऑक्सीजन मिलाती है और फिर उसे वापस शरीर में पहुंचाती है, जिससे आवश्यक अंगों तक रक्त और ऑक्सीजन की आपूर्ति बनी रहती है। इसके साथ एक अन्य सहायक उपकरण का उपयोग भी किया गया, जिससे हृदय पर दबाव कम रखने और रक्त संचार को स्थिर बनाए रखने में सहायता मिली। इन आधुनिक तकनीकों के कारण मरीज के शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को लगातार ऑक्सीजन मिलती रही।

    करीब 40 घंटे तक मरीज का शरीर पूरी तरह इन लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। इस दौरान डॉक्टरों की टीम लगातार उसकी स्थिति पर नजर रखती रही और आवश्यक चिकित्सकीय बदलाव करती रही। लंबे समय तक हृदय की सामान्य धड़कन वापस न आने के बावजूद इलाज जारी रखा गया। आखिरकार लगभग दो दिन बाद मरीज के हृदय ने स्वयं दोबारा काम करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसकी धड़कन सामान्य होने लगी और शरीर ने उपचार के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया।

    आगे की जांच में चिकित्सकों ने पाया कि मरीज गंभीर मायोकार्डाइटिस यानी हृदय की मांसपेशियों में सूजन से पीड़ित था। यह बीमारी कई मामलों में तेजी से हृदय की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है और समय पर उपचार न मिलने पर जानलेवा साबित हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह के मामलों में शीघ्र पहचान, लगातार निगरानी और उन्नत चिकित्सा सुविधाएं मरीज की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

    लगातार इलाज और निगरानी के बाद मरीज की स्थिति में सुधार होता गया। लगभग तीन सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद उसे स्वस्थ अवस्था में छुट्टी दे दी गई। चिकित्सकों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञों की त्वरित निर्णय क्षमता और समय पर मिले उपचार ने इस चुनौतीपूर्ण मामले को सफल परिणाम तक पहुंचाया। यह घटना बताती है कि गंभीर कार्डियक अरेस्ट जैसी स्थिति में भी उचित चिकित्सा सुविधाएं, आधुनिक उपकरण और निरंतर चिकित्सकीय प्रयास कई बार असंभव लगने वाली परिस्थितियों को भी सकारात्मक परिणाम में बदल सकते हैं। ऐसी घटनाएं स्वास्थ्य सेवाओं में तकनीकी प्रगति और आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था के महत्व को भी स्पष्ट रूप से सामने लाती हैं।