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  • त्योहारी सीजन में बढ़ी मावे की मांग, खरीदारी से पहले रंग, खुशबू और बनावट देखकर ऐसे करें गुणवत्ता की शुरुआती पहचान

    त्योहारी सीजन में बढ़ी मावे की मांग, खरीदारी से पहले रंग, खुशबू और बनावट देखकर ऐसे करें गुणवत्ता की शुरुआती पहचान

    नई दिल्ली ।त्योहारों का मौसम शुरू होते ही मिठाइयों और उनसे जुड़े खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने लगती है। इस दौरान मावे का इस्तेमाल बड़ी मात्रा में किया जाता है, क्योंकि कई पारंपरिक मिठाइयों में यह प्रमुख सामग्री होती है। मांग बढ़ने के साथ बाजार में घटिया या मिलावटी मावे की बिक्री की आशंका भी बढ़ सकती है। ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए मावा खरीदते समय सावधानी बरतना जरूरी हो जाता है।

    मावा खरीदते समय सबसे पहले उसके रंग और बनावट पर ध्यान दिया जा सकता है। सामान्य तौर पर अच्छी गुणवत्ता वाला मावा हल्के क्रीम या सफेद रंग का दिखाई देता है और उसकी बनावट अपेक्षाकृत नरम होती है। यदि मावा जरूरत से ज्यादा चमकदार, असामान्य रूप से सफेद या बहुत अलग रंग का नजर आए तो सावधानी बरतनी चाहिए।

    मावे को हल्के हाथ से दबाकर उसकी बनावट का शुरुआती अंदाजा भी लगाया जा सकता है। यदि वह बहुत ज्यादा रबड़ जैसा, असामान्य रूप से सख्त या बनावट में अलग महसूस हो तो उसे खरीदने से पहले अतिरिक्त सावधानी जरूरी है। हालांकि केवल रंग और बनावट देखकर मावे को पूरी तरह असली या नकली घोषित नहीं किया जा सकता।

    मावे की खुशबू भी शुरुआती जांच में मदद कर सकती है। सामान्य मावे में दूध जैसी हल्की और प्राकृतिक गंध होती है। यदि उसमें तेज रासायनिक, साबुन जैसी या दूसरी असामान्य गंध महसूस हो तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है। हालांकि खुशबू भी गुणवत्ता की अंतिम पुष्टि का आधार नहीं है।

    यदि किसी विश्वसनीय दुकान पर मावा चखने की अनुमति हो तो बहुत थोड़ी मात्रा से स्वाद का अंदाजा लगाया जा सकता है। सामान्य मावे में दूध जैसा स्वाद और हल्की प्राकृतिक मिठास रहती है। कड़वा, साबुन जैसा या किसी अन्य तरह का असामान्य स्वाद मिलने पर उसे नहीं खरीदना चाहिए। बहुत अधिक मीठा स्वाद भी सावधानी का संकेत हो सकता है।

    मावे में स्टार्च जैसी मिलावट की शुरुआती जांच के लिए आयोडीन आधारित घरेलू परीक्षण का इस्तेमाल किया जाता है। थोड़े से मावे को पानी के साथ गर्म करने के बाद ठंडा किया जा सकता है और फिर आयोडीन की कुछ बूंदें डाली जाती हैं। मिश्रण का रंग नीला या नीला-काला होने पर उसमें स्टार्च मौजूद होने की संभावना हो सकती है। यह केवल प्रारंभिक संकेत है, इसे मिलावट का पक्का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

    मावा खरीदते समय उसकी कीमत पर भी ध्यान देना जरूरी है। यदि कोई उत्पाद बाजार की सामान्य कीमत की तुलना में असामान्य रूप से सस्ता मिल रहा है तो उसकी गुणवत्ता को लेकर सतर्क रहना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि मावा भरोसेमंद दुकान या डेयरी से ही खरीदा जाए।

    पैक्ड मावा खरीदते समय पैकेट की पैकिंग, तारीख और उत्पाद से जुड़ी जरूरी जानकारी अवश्य देखनी चाहिए। पैकेट फटा हुआ हो या उत्पाद की स्थिति संदिग्ध लगे तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है। किसी भी तरह का संदेह होने पर मावे का सेवन न करना ही सुरक्षित विकल्प है।

    त्योहारों के दौरान मिठाइयों और मावे की बढ़ती मांग के बीच उपभोक्ताओं की सावधानी सबसे महत्वपूर्ण है। घरेलू तरीकों से केवल शुरुआती संकेत मिल सकते हैं, जबकि किसी खाद्य पदार्थ की वास्तविक मिलावट की पुष्टि के लिए प्रयोगशाला जांच अधिक विश्वसनीय मानी जाती है। इसलिए खरीदारी में गुणवत्ता, स्रोत और पैकेजिंग को प्राथमिकता देना जरूरी है।

  • अरंडी का तेल बालों और त्वचा की देखभाल में कैसे मदद करता है, जानिए इसके संभावित फायदे और जरूरी सावधानियां

    अरंडी का तेल बालों और त्वचा की देखभाल में कैसे मदद करता है, जानिए इसके संभावित फायदे और जरूरी सावधानियां

    नई दिल्ली ।अरंडी का तेल लंबे समय से घरेलू और पारंपरिक देखभाल में इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह अरंडी के बीजों से निकाला जाता है और सामान्य तौर पर गाढ़ा तथा हल्के पीले रंग का होता है। इसमें मौजूद फैटी एसिड और अन्य घटक इसे त्वचा और बालों की देखभाल के लिए उपयोग किए जाने वाले तेलों में शामिल करते हैं। हालांकि, प्राकृतिक उत्पाद होने का मतलब यह नहीं है कि यह हर व्यक्ति की त्वचा या बालों के लिए समान रूप से उपयुक्त होगा।

    बालों की देखभाल में अरंडी के तेल का इस्तेमाल खासतौर पर सूखे और बेजान बालों के लिए किया जाता है। इसकी गाढ़ी बनावट बालों और स्कैल्प पर नमी बनाए रखने में मदद कर सकती है। इससे बालों को मुलायम महसूस कराने और उनमें चमक लाने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, इसे बालों की तेज ग्रोथ कराने वाले निश्चित उपचार के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    अरंडी का तेल सीधे लगाने पर कुछ लोगों को काफी गाढ़ा लग सकता है। इसलिए इसे नारियल या बादाम जैसे हल्के तेल के साथ मिलाकर इस्तेमाल करना सुविधाजनक रहता है। तेल को बालों और स्कैल्प पर हल्के हाथों से लगाया जा सकता है। मसाज करते समय बहुत अधिक दबाव डालने से बचना चाहिए। इस्तेमाल की मात्रा बालों की लंबाई और जरूरत के अनुसार रखी जा सकती है।

    त्वचा की देखभाल में भी अरंडी के तेल का उपयोग किया जाता है। इसमें मौजूद रिसिनोलिक एसिड त्वचा को नमी प्रदान करने में मदद कर सकता है। खासतौर पर शरीर के ऐसे हिस्सों पर इसे लगाया जाता है जहां रूखापन अधिक महसूस होता है। हाथ, पैर और अन्य सूखे हिस्सों पर थोड़ी मात्रा में तेल लगाने से त्वचा को मुलायम बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

    सर्दियों या कम नमी वाले मौसम में त्वचा का रूखापन बढ़ सकता है। ऐसे समय में कुछ लोग अरंडी के तेल को मॉइस्चराइजिंग देखभाल के हिस्से के रूप में इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, तैलीय या संवेदनशील त्वचा वाले लोगों को इसे चेहरे पर लगाने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग तरह से प्रतिक्रिया कर सकती है।

    फटी एड़ियों की घरेलू देखभाल में भी अरंडी का तेल इस्तेमाल किया जाता है। रात में पैरों को साफ करके एड़ियों पर थोड़ी मात्रा में तेल लगाया जा सकता है। इसके बाद मोजे पहनने से तेल त्वचा के संपर्क में अधिक समय तक रह सकता है। इससे सूखी त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन गहरी दरार, रक्तस्राव या संक्रमण होने पर केवल घरेलू उपायों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।

    अरंडी का तेल इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना एक जरूरी सावधानी है। त्वचा के छोटे हिस्से पर थोड़ी मात्रा लगाकर प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। लालिमा, खुजली, जलन या सूजन जैसी परेशानी होने पर इसका इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए। आंखों और शरीर के संवेदनशील हिस्सों के संपर्क से भी इसे बचाना जरूरी है।

    अरंडी के तेल को त्वचा या बालों की देखभाल में सीमित और उचित तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके संभावित लाभ मुख्य रूप से नमी बनाए रखने और त्वचा तथा बालों को मुलायम महसूस कराने से जुड़े हैं। किसी गंभीर त्वचा समस्या, संक्रमण या लगातार बालों से जुड़ी परेशानी में घरेलू तेलों को उपचार का विकल्प मानने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना अधिक उचित रहता है।

  • भोजन के बाद लगातार थकान और असामान्य भूख को न करें नजरअंदाज, डायबिटीज से जुड़े संकेत पहचानना जरूरी

    भोजन के बाद लगातार थकान और असामान्य भूख को न करें नजरअंदाज, डायबिटीज से जुड़े संकेत पहचानना जरूरी

    नई दिल्ली ।खाना खाने के बाद शरीर में कुछ बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। भोजन पचने के साथ शरीर को ऊर्जा मिलती है और कुछ लोगों को थोड़ी देर के लिए सुस्ती या नींद भी महसूस हो सकती है। हालांकि, यदि भोजन के बाद बार बार अत्यधिक प्यास, पेशाब, कमजोरी, थकान या असामान्य भूख जैसी समस्याएं महसूस होती हैं, तो इन्हें केवल सामान्य प्रतिक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कुछ मामलों में ऐसे संकेत ब्लड शुगर के असंतुलन से जुड़े हो सकते हैं।

    डायबिटीज ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर पर्याप्त इंसुलिन नहीं बना पाता या उपलब्ध इंसुलिन का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाता। इंसुलिन की भूमिका शरीर में ग्लूकोज के इस्तेमाल और रक्त में उसके स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण होती है। जब यह प्रक्रिया प्रभावित होती है तो ब्लड शुगर बढ़ सकता है और लंबे समय तक इसका स्तर ज्यादा रहने पर शरीर के विभिन्न अंगों पर असर पड़ सकता है।

    खाने के बाद हल्की नींद या सुस्ती कई कारणों से हो सकती है। बहुत अधिक या भारी भोजन करने, पर्याप्त नींद नहीं लेने या शरीर में पानी की कमी जैसी वजहें भी इसके पीछे हो सकती हैं। लेकिन यदि लगभग हर भोजन के बाद अत्यधिक सुस्ती, कमजोरी या थकान महसूस होती है और इसके साथ अन्य लक्षण भी दिखाई देते हैं, तो ब्लड शुगर की जांच पर विचार करना उचित हो सकता है।

    अत्यधिक प्यास भी ऐसा संकेत है जिस पर ध्यान देना चाहिए। डायबिटीज में रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ने पर शरीर अतिरिक्त ग्लूकोज को बाहर निकालने की कोशिश करता है। इससे पेशाब की मात्रा या आवृत्ति बढ़ सकती है और शरीर में पानी की कमी होने के कारण प्यास अधिक लग सकती है। यदि बार बार पेशाब आने और ज्यादा प्यास लगने की समस्या साथ दिखाई दे रही है, तो इसकी वजह जानने के लिए चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    कुछ लोगों को भोजन करने के बाद दोबारा भूख लगने या कमजोरी महसूस होने की शिकायत भी हो सकती है। हालांकि इसके पीछे कई अलग कारण हो सकते हैं और केवल इन लक्षणों के आधार पर डायबिटीज का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लगातार बने रहने वाले लक्षणों को अन्य स्वास्थ्य संकेतों के साथ देखकर ही स्थिति का आकलन किया जाता है।

    डायबिटीज से जुड़े सामान्य संकेतों में अत्यधिक प्यास, बार बार पेशाब आना, ज्यादा भूख लगना, लगातार थकान, धुंधला दिखाई देना और घावों का देर से भरना शामिल हो सकते हैं। जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति में सभी लक्षण एक साथ दिखाई दें। कई बार शुरुआती अवस्था में संकेत बेहद हल्के होते हैं और व्यक्ति उन्हें सामान्य परेशानी समझकर छोड़ देता है।

    खाने के बाद ब्लड शुगर का कुछ समय के लिए बढ़ना शरीर की सामान्य प्रतिक्रिया है, क्योंकि भोजन से मिलने वाले कार्बोहाइड्रेट पचकर ग्लूकोज में बदलते हैं। समस्या तब हो सकती है जब शुगर का स्तर जरूरत से ज्यादा बढ़े या लंबे समय तक सामान्य स्तर पर वापस न आए। ऐसी स्थिति का पता केवल शरीर में महसूस होने वाले लक्षणों से नहीं, बल्कि उचित रक्त जांच और चिकित्सकीय मूल्यांकन से लगाया जाता है।

    यदि भोजन के बाद अत्यधिक प्यास, बार बार पेशाब, लगातार थकान, कमजोरी या असामान्य भूख कई दिनों या हफ्तों तक बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेकर ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। समय पर जांच से स्थिति की पहचान और आवश्यक प्रबंधन शुरू करने में मदद मिल सकती है। खासतौर पर लगातार दोहराए जाने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय उनकी वजह समझना स्वास्थ्य के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।

  • डेंगू के बढ़ते खतरे के बीच बरतें सावधानी, तेज बुखार के साथ पेट दर्द, रक्तस्राव या सांस फूलने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें

    डेंगू के बढ़ते खतरे के बीच बरतें सावधानी, तेज बुखार के साथ पेट दर्द, रक्तस्राव या सांस फूलने पर तुरंत डॉक्टर से मिलें

    नई दिल्ली । बारिश के मौसम में मच्छरों से होने वाली बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। जुलाई से अक्तूबर के बीच डेंगू और मलेरिया जैसे संक्रमण के मामले बढ़ने की आशंका रहती है। डेंगू की शुरुआत कई बार सामान्य वायरल बुखार जैसी ही दिखाई देती है, इसलिए मरीज और परिवार के लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं। तेज बुखार, सिरदर्द, शरीर में दर्द, कमजोरी, जी मिचलाना और उल्टी जैसी शिकायतें डेंगू में देखी जा सकती हैं। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर डेंगू की पुष्टि नहीं की जा सकती और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय जांच कराना जरूरी होता है।

    डेंगू संक्रमित एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। बारिश के बाद घरों और आसपास जमा साफ पानी मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकता है। ऐसे में पानी जमा होने वाली जगहों की नियमित सफाई और मच्छरों से बचाव के उपाय बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं। दिन के समय भी मच्छरों से बचने के लिए शरीर को ढककर रखना और आवश्यकता के अनुसार मच्छररोधी उपाय अपनाना उपयोगी हो सकता है।

    डेंगू के मरीज में कमजोरी और शरीर में दर्द होना आम लक्षण हो सकते हैं, लेकिन अगर कमजोरी अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए और मरीज को उठने-बैठने में परेशानी होने लगे तो इसे सामान्य मानकर घर पर इंतजार नहीं करना चाहिए। अत्यधिक सुस्ती, बेचैनी या तेजी से बिगड़ती तबीयत भी चिकित्सकीय मदद लेने का संकेत हो सकती है।

    तेज बुखार के साथ पेट में गंभीर दर्द या पेट दबाने पर अधिक दर्द होना भी चिंता का कारण है। डेंगू के गंभीर मामलों में शरीर में तरल संतुलन और रक्तसंचार से जुड़ी जटिलताएं हो सकती हैं। इसलिए लगातार पेट दर्द या असामान्य बेचैनी होने पर डॉक्टर से तत्काल संपर्क करना जरूरी है।

    सांस सामान्य से बहुत तेज चलना या सांस लेने में परेशानी होना भी गंभीर संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज को घर पर केवल सामान्य बुखार समझकर इलाज करते रहना उचित नहीं है। चिकित्सकीय जांच के बाद ही स्थिति की गंभीरता और आवश्यक उपचार तय किया जा सकता है।

    नाक या मसूड़ों से खून आना, उल्टी में खून दिखाई देना अथवा मल में रक्त आना भी डेंगू के गंभीर चेतावनी संकेतों में शामिल हो सकते हैं। बुखार के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे तो तत्काल चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। अत्यधिक रक्तस्राव गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।

    डेंगू के इलाज में आमतौर पर लक्षणों को नियंत्रित करने, शरीर में पर्याप्त तरल बनाए रखने और जटिलताओं की निगरानी पर ध्यान दिया जाता है। बुखार या दर्द के लिए दवा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। एस्पिरिन और आइबुप्रोफेन जैसी दवाओं का इस्तेमाल चिकित्सकीय सलाह के बिना नहीं करना चाहिए, क्योंकि कुछ परिस्थितियों में रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है। तेज बुखार होने पर स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर से परामर्श करना अधिक सुरक्षित है।

    बरसात में डेंगू से बचाव के लिए घर और आसपास पानी जमा न होने दें, कूलर, गमले, टंकियों और अन्य पात्रों की नियमित सफाई करें तथा मच्छरों से बचाव के उपाय अपनाएं। बुखार आने पर पर्याप्त आराम और तरल पदार्थ लेना महत्वपूर्ण है, लेकिन गंभीर चेतावनी संकेत दिखाई देने पर घरेलू देखभाल तक सीमित रहना उचित नहीं है। समय पर चिकित्सकीय सलाह और आवश्यक जांच से स्थिति को गंभीर होने से रोकने में मदद मिल सकती है।

  • पेट के दाईं हिस्से में दर्द है तो रहें सावधान गैस नहीं इन गंभीर बीमारियों का भी हो सकता है इशारा

    पेट के दाईं हिस्से में दर्द है तो रहें सावधान गैस नहीं इन गंभीर बीमारियों का भी हो सकता है इशारा


    नई दिल्ली। पेट में दर्द होना आम समस्या है और अक्सर लोग इसे गैस अपच या ज्यादा खाना खाने की वजह मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। खासतौर पर पेट के दाईं तरफ दर्द होने पर कई लोग बिना जांच के गैस की दवा ले लेते हैं लेकिन ऐसा करना हर बार सही नहीं होता। पेट के दाईं हिस्से में होने वाला दर्द कई बार शरीर के महत्वपूर्ण अंगों से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है। इसके पीछे गैस और कब्ज जैसी सामान्य समस्या से लेकर पित्ताशय की पथरी अपेंडिसाइटिस किडनी की पथरी लिवर से जुड़ी बीमारी और आंतों के संक्रमण तक कई कारण हो सकते हैं। इसलिए दर्द को केवल उसकी जगह देखकर नहीं बल्कि उसकी तीव्रता अवधि और साथ दिखाई देने वाले दूसरे लक्षणों के आधार पर समझना जरूरी है।

    पेट के ऊपरी दाएं हिस्से में लिवर और पित्ताशय जैसे महत्वपूर्ण अंग मौजूद होते हैं। अगर इस हिस्से में दर्द खासकर तला भुना या ज्यादा वसायुक्त भोजन खाने के बाद बढ़ता है और पीठ या दाएं कंधे तक महसूस होता है तो यह पित्ताशय में पथरी की ओर संकेत कर सकता है। ऐसे मामलों में मतली और उल्टी भी हो सकती है। वहीं दर्द के साथ बुखार या आंखों और त्वचा का रंग पीला पड़ने लगे तो लिवर या पित्त नलिकाओं से जुड़ी परेशानी की संभावना को गंभीरता से लेना चाहिए।

    पेट के निचले दाएं हिस्से में अचानक बढ़ने वाला दर्द अपेंडिसाइटिस का संकेत भी हो सकता है। कई बार इसकी शुरुआत नाभि के आसपास दर्द से होती है और धीरे धीरे दर्द दाईं निचली तरफ केंद्रित होने लगता है। चलने खांसने या शरीर को हिलाने पर दर्द बढ़ सकता है। इसके साथ भूख कम लगना मतली उल्टी और बुखार जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसे दर्द को गैस समझकर लगातार दवा लेते रहना नुकसानदायक हो सकता है क्योंकि गंभीर अपेंडिसाइटिस में अपेंडिक्स के फटने जैसी जटिलता हो सकती है।

    दाईं तरफ पेट या कमर में होने वाला दर्द किडनी की पथरी या मूत्र मार्ग की समस्या से भी जुड़ा हो सकता है। यदि दर्द पीठ या कमर की तरफ फैल रहा है और पेशाब करते समय जलन पेशाब में खून या बार बार पेशाब आने जैसी समस्या भी है तो चिकित्सकीय जांच जरूरी है। दूसरी ओर गैस कब्ज या आंतों की सामान्य परेशानी में पेट फूलना ऐंठन भारीपन और मल त्याग में बदलाव जैसे लक्षण हो सकते हैं और कई बार मल त्याग के बाद राहत भी मिल जाती है।

    इसलिए पेट के दाईं तरफ होने वाले दर्द को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि दर्द कब शुरू हुआ लगातार है या रुक रुककर हो रहा है और उसके साथ कौन से दूसरे लक्षण मौजूद हैं। तेज या लगातार बढ़ता दर्द बुखार बार बार उल्टी मल में खून पीलापन बेहोशी या पेट में अत्यधिक जकड़न जैसे संकेत दिखाई दें तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार शारीरिक जांच के साथ खून और पेशाब की जांच या अल्ट्रासाउंड जैसी जांच करा सकते हैं। सही समय पर कारण की पहचान होने से गंभीर बीमारी और संभावित जटिलताओं से बचाव किया जा सकता है।

  • रक्षाबंधन 2026 पर राखी खरीदते समय रखें डिजाइन का ध्यान, जानिए भगवान की तस्वीर से काले धागे तक क्या मान्यताएं हैं

    रक्षाबंधन 2026 पर राखी खरीदते समय रखें डिजाइन का ध्यान, जानिए भगवान की तस्वीर से काले धागे तक क्या मान्यताएं हैं

    नई दिल्ली ।रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और सुरक्षा के संकल्प से जुड़ा माना जाता है। इस दिन बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं में राखी को केवल धागा नहीं माना जाता, बल्कि इसके रंग, डिजाइन और उस पर बने प्रतीकों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त को मनाया जाएगा।

    राखी खरीदते समय बाजार में कई तरह के डिजाइन देखने को मिलते हैं। इनमें देवी-देवताओं की तस्वीर वाली राखी, ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखी, सूती या रेशमी धागे की राखी के अलावा बच्चों के लिए कार्टून और आधुनिक डिजाइन भी शामिल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन सभी का महत्व एक जैसा नहीं माना जाता।

    भगवान गणेश, भगवान कृष्ण या भगवान हनुमान की तस्वीर वाली राखी को पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसी राखी भाई के जीवन में ईश्वर की कृपा और सुरक्षा का प्रतीक बन सकती है। हालांकि धार्मिक चित्र वाली राखी को रक्षाबंधन के बाद सम्मानपूर्वक रखने की सलाह दी जाती है और उसे इधर-उधर फेंकने से बचने की परंपरा बताई जाती है।

    ॐ और स्वास्तिक जैसे शुभ चिह्नों वाली राखी को भी धार्मिक दृष्टि से सकारात्मक माना जाता है। इन प्रतीकों का संबंध मंगल, शांति और समृद्धि से जोड़ा जाता है। ऐसी राखी चुनने वाले लोग इसकी पवित्रता और साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं। धार्मिक प्रतीकों वाली वस्तुओं को सम्मान के साथ रखने की परंपरा भी भारतीय संस्कृति में रही है।

    साधारण सूती या रेशमी धागे की राखी को सबसे पारंपरिक विकल्पों में माना जाता है। इसमें किसी विशेष सजावट की जरूरत नहीं होती और यह भाई-बहन के स्नेह तथा रिश्ते की सरलता का प्रतीक मानी जाती है। पारंपरिक रूप से सादे और पवित्र धागे को रक्षाबंधन की भावना से जोड़ा जाता है।

    बच्चों के बीच कार्टून और फैंसी राखियों का चलन काफी बढ़ा है। अलग-अलग पात्रों और आकर्षक आकृतियों वाली ऐसी राखियां बच्चों को पसंद आती हैं। हालांकि धार्मिक दृष्टि से इनका कोई विशेष महत्व नहीं माना जाता। इन्हें मुख्य रूप से पसंद और सुविधा के आधार पर चुना जा सकता है।

    इवल आई यानी नजर से बचाने वाले प्रतीक वाली राखियों को लेकर भी अलग-अलग धारणाएं हैं। आधुनिक मान्यताओं में इसे बुरी नजर से सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन पारंपरिक वैदिक मान्यताओं में इसका कोई अनिवार्य धार्मिक महत्व नहीं है। इसलिए इसे न पूरी तरह शुभ माना जाता है और न ही अशुभ।

    काली राखी को लेकर कुछ धार्मिक मान्यताओं में सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। इसी तरह टूटी, खंडित या बहुत नुकीली डिजाइन वाली राखी से बचने की बात कही जाती है। राखी बांधते समय उसके टूट जाने को भी कुछ परंपराओं में अपशकुन माना जाता है। प्लास्टिक से बनी राखियों को लेकर भी पारंपरिक पसंद कम बताई जाती है।

    हालांकि राखी के शुभ या अशुभ प्रभाव को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। ये बातें मुख्य रूप से धार्मिक विश्वास, ज्योतिषीय मान्यताओं और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित हैं। इसलिए राखी चुनते समय भाई-बहन के रिश्ते की भावना, पसंद और सुविधा को प्राथमिकता देना सबसे महत्वपूर्ण है।

  • पैरों में लगातार क्रैंप और कमजोरी शरीर में पोटैशियम की कमी का संकेत हो सकती है, जानिए लक्षणों से जांच और खानपान का सही तरीका

    पैरों में लगातार क्रैंप और कमजोरी शरीर में पोटैशियम की कमी का संकेत हो सकती है, जानिए लक्षणों से जांच और खानपान का सही तरीका

    नई दिल्ली । मांसपेशियों में बार-बार ऐंठन, पैरों में कमजोरी और बिना ज्यादा मेहनत के थकान महसूस होना आम समस्या लग सकती है, लेकिन कुछ मामलों में इसके पीछे शरीर में पोटैशियम का असंतुलन भी जिम्मेदार हो सकता है। पोटैशियम शरीर के लिए आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट है, जो नसों के सामान्य कामकाज, मांसपेशियों के संकुचन और शरीर में तरल पदार्थों के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि केवल लक्षणों के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति में पोटैशियम की कमी है।

    पोटैशियम का स्तर शरीर में एक निश्चित सीमा के भीतर रहना जरूरी होता है। इसकी मात्रा बहुत कम होने के साथ-साथ बहुत अधिक होना भी स्वास्थ्य के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए किसी भी तरह के सप्लीमेंट का इस्तेमाल बिना चिकित्सकीय सलाह के करना उचित नहीं माना जाता। खासकर ऐसे लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए जिन्हें पहले से कोई बीमारी है या जो नियमित रूप से कुछ दवाएं लेते हैं।

    पोटैशियम की कमी होने पर कुछ लोगों में मांसपेशियों की कमजोरी और ऐंठन दिखाई दे सकती है। पैरों में अचानक तेज क्रैंप पड़ना, सामान्य गतिविधियों के दौरान मांसपेशियों में कमजोरी महसूस होना या शरीर में असामान्य थकान जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। लेकिन इन समस्याओं के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहना, अत्यधिक व्यायाम, शरीर में पानी की कमी या दूसरे इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन भी मांसपेशियों में ऐंठन पैदा कर सकता है।

    लगातार कमजोरी को भी केवल पोटैशियम की कमी से जोड़ना सही नहीं है। पर्याप्त नींद न मिलना, तनाव, खून की कमी, पोषण संबंधी कमियां और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं थकान का कारण बन सकती हैं। इसलिए यदि कमजोरी लगातार बनी हुई है, बढ़ रही है या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगे हैं तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

    गर्मी के मौसम में लंबे समय तक पसीना आने या बहुत अधिक शारीरिक मेहनत करने पर शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन प्रभावित हो सकता है। ऐसे समय में अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, मांसपेशियों में ऐंठन या अस्वस्थ महसूस होने पर इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पर्याप्त तरल पदार्थ और संतुलित भोजन सामान्य परिस्थितियों में शरीर की जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं, लेकिन लगातार समस्या होने पर कारण की जांच जरूरी है।

    पोटैशियम की कमी का पता लगाने के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार रक्त जांच कराने की सलाह दे सकते हैं। जांच के परिणामों के आधार पर आहार में बदलाव या उपचार की जरूरत तय की जाती है। पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थ संतुलित आहार का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन किसी व्यक्ति को कितनी मात्रा की जरूरत है, यह उसकी उम्र, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

    केला पोटैशियम का एक जाना-पहचाना स्रोत है, लेकिन केवल केले को पोटैशियम की कमी का इलाज मानना सही नहीं है। संतुलित भोजन में विभिन्न पोषक तत्वों और खनिजों का पर्याप्त सेवन जरूरी है। यदि जांच में कमी सामने आती है तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार आहार और जरूरत पड़ने पर सप्लीमेंट की व्यवस्था की जा सकती है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मांसपेशियों में ऐंठन या कमजोरी होने पर खुद से पोटैशियम की गोलियां लेना शुरू न करें। शरीर में पोटैशियम का अत्यधिक बढ़ जाना भी गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए बार-बार होने वाले क्रैंप, लगातार कमजोरी या अन्य असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना ही सुरक्षित तरीका है।

  • महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स से पहले आजमाएं गुलाब, त्वचा की देखभाल के लिए जानें गुलाब से जुड़े आसान घरेलू नुस्खे

    महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स से पहले आजमाएं गुलाब, त्वचा की देखभाल के लिए जानें गुलाब से जुड़े आसान घरेलू नुस्खे


    नई दिल्ली ।
    गुलाब केवल अपनी खुशबू और खूबसूरती के लिए ही पसंद नहीं किया जाता बल्कि त्वचा की देखभाल में भी इसका इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। गुलाब जल और गुलाब की पंखुड़ियों से बने पारंपरिक घरेलू उपायों को त्वचा को ताजगी देने और चेहरे को साफ रखने के लिए उपयोग किया जाता है। गुलाब में मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिक और इसकी खुशबू स्किन केयर को सुखद अनुभव बना सकती है। हालांकि हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है इसलिए किसी भी घरेलू उपाय को चेहरे पर इस्तेमाल करने से पहले सावधानी बरतना जरूरी है।

    गुलाब जल को स्किन केयर में शामिल करने का सबसे आसान तरीका है इसे चेहरे की सफाई के बाद हल्के तरीके से लगाना। साफ चेहरे पर कॉटन की मदद से गुलाब जल लगाया जा सकता है और इसे कुछ देर त्वचा पर रहने दिया जा सकता है। इससे चेहरे को ताजगी महसूस हो सकती है। अगर त्वचा बहुत संवेदनशील है तो पहले हाथ या कान के पीछे थोड़ी मात्रा लगाकर पैच टेस्ट करना बेहतर माना जाता है।

    रूखी त्वचा वालों के लिए गुलाब जल के साथ मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल किया जा सकता है। चेहरे को साफ करने के बाद गुलाब जल लगाने और उसके बाद त्वचा के अनुसार मॉइस्चराइजर लगाने से स्किन केयर रूटीन पूरा किया जा सकता है। ध्यान रखें कि गुलाब जल त्वचा को मॉइस्चराइजर का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। खासकर बहुत शुष्क त्वचा में अच्छे मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल जरूरी है।

    गुलाब की पंखुड़ियों से तैयार किया गया पानी भी पारंपरिक रूप से त्वचा के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए साफ गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल करना चाहिए और किसी भी तरह के केमिकल या कीटनाशक से उपचारित फूल को त्वचा पर लगाने से बचना चाहिए। बाजार में मिलने वाले गुलाब जल का इस्तेमाल करते समय उसके लेबल पर मौजूद सामग्री को जरूर पढ़ें और तेज खुशबू या अनावश्यक रसायनों वाले उत्पाद संवेदनशील त्वचा पर लगाने से बचें।

    गुलाब जल को ठंडा करके इस्तेमाल करने की सलाह भी कई लोग देते हैं। ठंडक चेहरे को कुछ समय के लिए फ्रेश महसूस करा सकती है लेकिन यह त्वचा की किसी बीमारी का इलाज नहीं है। आंखों के आसपास गुलाब जल का इस्तेमाल करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और इसे आंखों के अंदर जाने से रोकना चाहिए। अगर जलन खुजली लालिमा या सूजन महसूस हो तो तुरंत इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए।

    स्किन केयर में गुलाब का इस्तेमाल करते समय एक और जरूरी बात यह है कि केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर रहना सही नहीं है। चेहरे को साफ रखने के साथ पर्याप्त पानी पीना संतुलित भोजन लेना नींद पूरी करना और दिन में सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना त्वचा की देखभाल के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। गुलाब जल या गुलाब आधारित उत्पाद आपकी दिनचर्या का हिस्सा हो सकते हैं लेकिन इन्हें चमत्कारी उपचार समझना उचित नहीं है।

    अगर त्वचा पर लगातार मुंहासे दाने अत्यधिक रूखापन लालिमा या किसी तरह की एलर्जी रहती है तो घरेलू उपाय आजमाने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है। सही उत्पाद और अपनी त्वचा के प्रकार के अनुसार बनाया गया स्किन केयर रूटीन ही लंबे समय तक त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है।

  • जिम जॉइन करने से पहले करा लें ये टेस्ट, शरीर में छिपी कमी का चल जाएगा पता

    जिम जॉइन करने से पहले करा लें ये टेस्ट, शरीर में छिपी कमी का चल जाएगा पता


    नई दिल्ली। फिट रहने के लिए नियमित एक्सरसाइज जरूरी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, वयस्कों को सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम स्तर की शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। हालांकि, अगर कोई व्यक्ति लंबे समय से एक्सरसाइज नहीं कर रहा है और अचानक हैवी वर्कआउट शुरू करने की तैयारी में है, तो पहले अपनी सेहत की स्थिति जानना जरूरी है।

    जिम शुरू करने के बाद कुछ लोगों को अत्यधिक थकान, चक्कर, मांसपेशियों में ऐंठन या दिल की धड़कन तेज होने जैसी शिकायत हो सकती है। इन्हें हमेशा सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर लंबे समय से एक्सरसाइज से दूर रहे लोगों, अधिक उम्र वालों या पहले से किसी बीमारी से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह लेकर ही हैवी वर्कआउट शुरू करना चाहिए।

    CBC से पता चल सकती है खून की कमी

    कंप्लीट ब्लड काउंट (CBC) से लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स समेत कई जरूरी मानकों की जानकारी मिलती है। हीमोग्लोबिन कम होने पर कमजोरी, जल्दी थकान, सांस फूलना और चक्कर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर पहले से लगातार कमजोरी, थकान, पीलिया या सांस फूलने की शिकायत है तो जिम शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    लिपिड प्रोफाइल से समझें हार्ट रिस्क

    लिपिड प्रोफाइल में LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल, HDL यानी गुड कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स की जांच होती है। अगर कोई व्यक्ति अचानक भारी वर्कआउट शुरू करने वाला है, तो हृदय संबंधी जोखिमों को समझना महत्वपूर्ण है।

    खासकर अधिक वजन वाले लोगों, धूम्रपान करने वालों या परिवार में हृदय रोग का इतिहास होने पर डॉक्टर इस जांच की सलाह दे सकते हैं। रिपोर्ट में कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स बढ़े हों तो एक्सरसाइज की तीव्रता तय करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।

    सोडियम-पोटैशियम का बैलेंस भी जरूरी

    सोडियम, पोटैशियम और अन्य इलेक्ट्रोलाइट्स मांसपेशियों और नसों के सामान्य कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बार-बार मांसपेशियों में ऐंठन, कमजोरी या बहुत अधिक पसीना आने जैसी स्थिति में डॉक्टर इलेक्ट्रोलाइट्स की जांच कराने की सलाह दे सकते हैं।

    इनका स्तर बहुत कम या ज्यादा होना दोनों ही शरीर के लिए परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए खासकर हैवी वर्कआउट करने वालों को शरीर में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखना चाहिए।

    आयरन, B12 और विटामिन D की भी जांच

    अगर पहले से थकान, कमजोरी, हाथ-पैरों में झनझनाहट या मांसपेशियों-हड्डियों से जुड़ी परेशानी है, तो डॉक्टर की सलाह पर आयरन, विटामिन B12 और विटामिन D की जांच कराई जा सकती है। इन पोषक तत्वों की कमी से थकान और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं और व्यायाम के बाद शरीर की रिकवरी प्रभावित हो सकती है।

    हर व्यक्ति को सारे टेस्ट जरूरी नहीं

    ध्यान रखें कि हर स्वस्थ व्यक्ति के लिए जिम शुरू करने से पहले इन सभी ब्लड टेस्ट की जरूरत हो, ऐसा जरूरी नहीं है। जांच की जरूरत उम्र, मेडिकल हिस्ट्री, लक्षण, फिटनेस लेवल और डॉक्टर की सलाह के आधार पर तय होती है। अगर लंबे समय से एक्सरसाइज नहीं की है या कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो वर्कआउट शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना सबसे सुरक्षित तरीका है।

  • बुखार आते ही घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सांस फूलना हो तो रहें अलर्ट; स्वाइन फ्लू से बचाव और टेस्ट की पूरी जानकारी

    बुखार आते ही घबराने की जरूरत नहीं, लेकिन सांस फूलना हो तो रहें अलर्ट; स्वाइन फ्लू से बचाव और टेस्ट की पूरी जानकारी


    नई दिल्ली । मध्य प्रदेश के इंदौर में 60 वर्षीय महिला की स्वाइन फ्लू से मौत के बाद देश के कई हिस्सों में इस बीमारी को लेकर चिंता बढ़ गई है। दिल्ली में इस साल स्वाइन फ्लू के मामले पिछले साल की तुलना में करीब छह गुना बढ़ने की बात सामने आई है। वहीं बेंगलुरु के एक स्कूल में 500 से ज्यादा विद्यार्थी और 21 स्टाफ सदस्य बीमार पड़ने की खबर ने भी स्वास्थ्य व्यवस्था को सतर्क कर दिया है। मेरठ में भी मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हरियाणा चंडीगढ़ और उत्तर प्रदेश समेत कई जगहों पर स्वास्थ्य विभागों ने लोगों के लिए एडवाइजरी जारी की है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब हर बुखार को स्वाइन फ्लू मानकर H1N1 टेस्ट कराना चाहिए। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका जवाब नहीं है। हर बुखार में तुरंत स्वाइन फ्लू टेस्ट कराने की जरूरत नहीं होती। टेस्ट का फैसला मरीज के लक्षणों बीमारी की अवधि आसपास संक्रमण की स्थिति और उसके जोखिम वाले कारकों को देखकर किया जाता है।

    स्वाइन फ्लू जिसे H1N1 इन्फ्लुएंजा भी कहा जाता है उसके लक्षण कई बार सामान्य फ्लू जैसे ही दिखाई देते हैं। इसमें बुखार खांसी गले में खराश शरीर में दर्द सिरदर्द थकान और कमजोरी जैसी समस्या हो सकती है। कुछ मरीजों में नाक बहने या बंद होने जैसी शिकायत भी देखी जाती है। सामान्य तौर पर हल्के लक्षण होने पर घबराने के बजाय आराम करना पर्याप्त हो सकता है। पर्याप्त तरल पदार्थ लेना और लक्षणों पर नजर रखना जरूरी है। हालांकि अगर बुखार लगातार बढ़ रहा हो सांस लेने में परेशानी हो छाती में दर्द हो अत्यधिक कमजोरी महसूस हो या बीमारी के लक्षण लगातार बिगड़ रहे हों तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए।

    स्वाइन फ्लू संक्रमित व्यक्ति के खांसने छींकने बोलने या सांस लेने के दौरान निकलने वाली बूंदों के जरिए फैल सकता है। संक्रमित सतह को छूने के बाद आंख नाक या मुंह को छूने से भी संक्रमण का खतरा हो सकता है। खास बात यह है कि संक्रमित व्यक्ति लक्षण दिखाई देने से पहले भी वायरस फैला सकता है। बच्चों में संक्रमण फैलने की अवधि कुछ मामलों में अधिक हो सकती है। यही वजह है कि भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी बरतना हाथों की स्वच्छता बनाए रखना और बीमारी के दौरान दूसरों से दूरी रखना महत्वपूर्ण माना जाता है।

    स्वाइन फ्लू का खतरा हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। दो साल से कम उम्र के बच्चे 65 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग गर्भवती महिलाएं और अस्थमा डायबिटीज या हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों में गंभीर बीमारी का जोखिम ज्यादा हो सकता है। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों को भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे लोगों में फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से संपर्क करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

    स्वाइन फ्लू की पुष्टि के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार नाक या गले के स्वैब से जांच करा सकते हैं। RT-PCR जैसे टेस्ट वायरस की पहचान में मदद करते हैं। लेकिन हर सामान्य बुखार में जांच कराना जरूरी नहीं है। यदि लक्षण हल्के हैं और मरीज की हालत स्थिर है तो डॉक्टर स्थिति देखकर टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। इसके उलट तेज या लगातार बुखार सांस लेने में परेशानी तेजी से बिगड़ती तबीयत या हाई रिस्क श्रेणी में आने वाले मरीजों के मामले में जांच और उपचार को लेकर जल्द चिकित्सकीय सलाह जरूरी हो सकती है।

    देश के अलग-अलग हिस्सों में बढ़ते मामलों को देखते हुए स्वास्थ्य विभागों की ओर से सावधानी बरतने की अपील की जा रही है। सार्वजनिक स्थानों पर थूकने से बचना हाथ साफ रखना बीमारी के दौरान भीड़ से दूरी बनाना और बिना चिकित्सकीय सलाह के दवाएं न लेना महत्वपूर्ण है। सबसे जरूरी बात यह है कि स्वाइन फ्लू को लेकर डरने के बजाय लक्षणों को समझकर समय पर चिकित्सा सलाह ली जाए। वर्ष 2009 में H1N1 वैश्विक महामारी का कारण बना था लेकिन आज H1N1 मौसमी इन्फ्लुएंजा का हिस्सा है। इसलिए मौजूदा मामलों को सीधे कोरोना जैसी नई महामारी मानना सही नहीं होगा। फिर भी बुजुर्गों बच्चों गर्भवती महिलाओं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह संक्रमण गंभीर हो सकता है। ऐसे में सावधानी और समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है।