Category: Lifestyle

  • बारिश में घूमने का बना रहे हैं प्लान तो पहुंचिए उदयपुर जानिए 7 दिन की यात्रा और खर्च

    बारिश में घूमने का बना रहे हैं प्लान तो पहुंचिए उदयपुर जानिए 7 दिन की यात्रा और खर्च


    नई दिल्ली । बारिश का मौसम शुरू होते ही राजस्थान का उदयपुर अपनी अलग ही खूबसूरती में नजर आता है। झीलों से घिरा यह ऐतिहासिक शहर मानसून के दौरान हरियाली से ढक जाता है और अरावली की पहाड़ियां बादलों की चादर ओढ़ लेती हैं। पानी से लबालब भरी झीलें और शाही महलों का नजारा इस शहर को देश के सबसे खूबसूरत मानसून पर्यटन स्थलों में शामिल कर देता है। यदि आप एक सप्ताह की यादगार यात्रा की योजना बना रहे हैं तो उदयपुर बेहतरीन विकल्प हो सकता है।

    यात्रा के पहले दिन सिटी पैलेस और लेक पिछोला की सैर करें। शाम को बोट राइड का आनंद लें और झील किनारे स्थानीय भोजन का स्वाद लें।

    दूसरे दिन फतेह सागर झील, सहेलियों की बाड़ी और स्थानीय बाजारों की सैर करें। मानसून के दौरान यहां का वातावरण बेहद सुहावना रहता है।

    तीसरे दिन सज्जनगढ़ पैलेस जाएं जिसे मानसून पैलेस भी कहा जाता है। यहां से पूरे शहर और झीलों का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। बारिश के मौसम में यह स्थान फोटोग्राफी के लिए सबसे पसंदीदा माना जाता है।

    चौथे दिन एकलिंगजी मंदिर और नाथद्वारा मंदिर का धार्मिक भ्रमण किया जा सकता है। दोनों स्थल उदयपुर से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।

    पांचवें दिन बागोर की हवेली और स्थानीय संग्रहालय देखें। शाम को पारंपरिक राजस्थानी लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम यात्रा को और यादगार बना देंगे।

    छठे दिन आसपास की अरावली पहाड़ियों और प्राकृतिक स्थलों की सैर करें। बारिश के मौसम में यहां की हरियाली और शांत वातावरण प्रकृति प्रेमियों को खूब आकर्षित करता है।

    सातवें दिन स्थानीय हस्तशिल्प बाजारों से राजस्थानी कला वस्तुएं कपड़े और स्मृति चिह्न खरीदकर अपनी यात्रा का समापन करें।

    अनुमानित खर्च
    आने जाने का यात्रा खर्च लगभग 4000 से 10000 रुपये (शहर और परिवहन के अनुसार)
    होटल का खर्च प्रति रात लगभग 2000 से 5000 रुपये
    भोजन पर प्रतिदिन लगभग 800 से 1500 रुपये
    स्थानीय घूमने और प्रवेश शुल्क लगभग 3000 से 5000 रुपये
    कुल सात दिन का औसत बजट प्रति व्यक्ति लगभग 25000 से 45000 रुपये हो सकता है।

    मानसून के दौरान यात्रा करते समय छाता या रेनकोट साथ रखें। फिसलन वाले स्थानों पर सावधानी बरतें और मौसम का पूर्वानुमान देखकर ही यात्रा की योजना बनाएं। बारिश के मौसम में उदयपुर की झीलें, महल और हरियाली मिलकर ऐसा अनुभव देती हैं जो लंबे समय तक याद रहता है।

  • मानसून में बढ़ जाता है इन 7 बीमारियों का खतरा जानिए बचाव के आसान और असरदार उपाय

    मानसून में बढ़ जाता है इन 7 बीमारियों का खतरा जानिए बचाव के आसान और असरदार उपाय


    नई दिल्ली । बारिश का मौसम गर्मी से राहत तो देता है लेकिन अपने साथ कई संक्रामक बीमारियों का खतरा भी लेकर आता है। इस दौरान जगह जगह पानी जमा होने से मच्छरों का प्रजनन तेजी से बढ़ता है जबकि दूषित पानी और गंदगी बैक्टीरिया तथा वायरस के फैलाव को बढ़ावा देते हैं। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी स्वास्थ्य पर भारी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान साफ सफाई और खानपान का विशेष ध्यान रखकर कई गंभीर बीमारियों से बचा जा सकता है।

    मानसून में सबसे अधिक फैलने वाली बीमारियों में डेंगू प्रमुख है। यह एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। तेज बुखार सिरदर्द आंखों के पीछे दर्द और शरीर तथा जोड़ों में तेज दर्द इसके सामान्य लक्षण हैं। इससे बचने के लिए घर के आसपास पानी जमा न होने दें मच्छरदानी और मच्छर भगाने वाले उत्पादों का उपयोग करें तथा पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें।

    मलेरिया भी बारिश के मौसम में तेजी से फैलता है। संक्रमित मच्छर के काटने से होने वाली इस बीमारी में ठंड लगकर बुखार आना पसीना आना कमजोरी और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। शाम के समय मच्छरों से बचाव और साफ वातावरण बनाए रखना बेहद जरूरी है।

    चिकनगुनिया भी मच्छरों के जरिए फैलने वाला संक्रमण है जिसमें तेज बुखार के साथ जोड़ों में असहनीय दर्द हो सकता है। नियमित सफाई और मच्छरों की रोकथाम इसके बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।

    बारिश में दूषित भोजन और पानी के कारण टाइफाइड का खतरा भी बढ़ जाता है। लगातार बुखार पेट दर्द कमजोरी और पाचन संबंधी समस्याएं इसके प्रमुख संकेत हैं। हमेशा स्वच्छ पानी पिएं और खुले में मिलने वाले खाद्य पदार्थों से बचें।

    हेपेटाइटिस ए भी गंदे पानी और दूषित भोजन से फैलने वाला संक्रमण है। इसमें आंखों और त्वचा का पीला पड़ना भूख कम लगना थकान और पेट दर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। भोजन और पानी की स्वच्छता इसका सबसे प्रभावी बचाव है।

    गैस्ट्रोएंटेराइटिस यानी पेट का संक्रमण भी मानसून में आम हो जाता है। दूषित भोजन या पानी के कारण दस्त उल्टी पेट दर्द और शरीर में पानी की कमी की समस्या हो सकती है। ताजा और अच्छी तरह पका हुआ भोजन खाना तथा पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी पीना जरूरी है।

    मौसम में अचानक बदलाव के कारण सर्दी जुकाम और फ्लू के मामले भी तेजी से बढ़ते हैं। नाक बहना गले में खराश खांसी और हल्का बुखार इसके सामान्य लक्षण हैं। नियमित हाथ धोना पर्याप्त नींद लेना संतुलित आहार और मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखना संक्रमण से बचने में मदद करता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान कुछ आसान सावधानियां अपनाकर इन बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है। घर और आसपास पानी जमा न होने दें केवल साफ और उबला हुआ पानी पिएं ताजा भोजन करें और बुखार या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह लें। समय पर सतर्कता ही स्वस्थ मानसून की सबसे बड़ी कुंजी है।

  • बार बार होने वाला सिरदर्द हो सकता है गंभीर बीमारी का संकेत नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

    बार बार होने वाला सिरदर्द हो सकता है गंभीर बीमारी का संकेत नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी


    नई दिल्ली । नई दिल्ली से प्राप्त मेडिकल जानकारी के अनुसार सिरदर्द को अक्सर लोग सामान्य समस्या मानकर टाल देते हैं। थकान नींद की कमी तनाव या लंबे समय तक स्क्रीन पर काम करने के बाद होने वाला सिरदर्द आम माना जाता है और आराम करने या पानी पीने से ठीक भी हो जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हर सिरदर्द सामान्य नहीं होता। जब यह समस्या बार बार होने लगे या इसके साथ शरीर में असामान्य बदलाव दिखाई देने लगें तो इसे हल्के में लेना खतरनाक हो सकता है।

    डॉक्टरों के अनुसार ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर स्थिति के शुरुआती संकेत बहुत साधारण हो सकते हैं। यही कारण है कि कई लोग इन्हें थकान या मानसिक दबाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। दिमाग में जब असामान्य कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं तो वे आसपास के हिस्सों पर दबाव डालती हैं। इस दबाव के कारण अलग अलग तरह के लक्षण सामने आ सकते हैं और यह इस बात पर निर्भर करता है कि ट्यूमर दिमाग के किस हिस्से में है और कितना बढ़ चुका है।

    अगर यह समस्या सोचने समझने या याददाश्त से जुड़े हिस्से को प्रभावित करती है तो व्यक्ति को भूलने की समस्या होने लगती है। ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत आती है और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है। कई लोग इसे उम्र या तनाव का असर मान लेते हैं जबकि यह गंभीर संकेत हो सकता है।

    यदि ट्यूमर दृष्टि से जुड़े हिस्से को प्रभावित करता है तो धुंधला दिखना दोहरी छवि दिखाई देना या नजर कमजोर होना जैसी समस्या हो सकती है। कुछ मामलों में बोलने में कठिनाई या सही शब्द चुनने में परेशानी भी देखी जा सकती है। ये लक्षण धीरे धीरे बढ़ते हैं इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते।

    इसके अलावा दिमाग के संतुलन और मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाले हिस्से पर असर पड़ने से चलने में लड़खड़ाहट हाथ पैरों में कमजोरी और रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। कुछ मरीजों में व्यवहार में बदलाव चिड़चिड़ापन या सामाजिक दूरी भी बढ़ सकती है जिसे मानसिक तनाव समझ लिया जाता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि हर सिरदर्द खतरनाक नहीं होता लेकिन कुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि सिरदर्द लगातार बढ़ रहा हो बार बार हो रहा हो नींद से जगा रहा हो या पहले से अलग और अधिक तीव्र महसूस हो तो डॉक्टर से तुरंत सलाह लेनी चाहिए।

    यदि सिरदर्द के साथ उल्टी संतुलन बिगड़ना नजर में बदलाव कमजोरी या मानसिक भ्रम जैसे लक्षण भी दिखें तो स्थिति गंभीर हो सकती है और तुरंत जांच कराना जरूरी हो जाता है। समय पर पहचान और उपचार से कई गंभीर समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है इसलिए लक्षणों को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

  • शिमला मिर्च से बढ़ता है पोटैशियम? डायलिसिस मरीजों को क्यों रखनी चाहिए सावधानी

    शिमला मिर्च से बढ़ता है पोटैशियम? डायलिसिस मरीजों को क्यों रखनी चाहिए सावधानी


    नई दिल्ली । किडनी की बीमारी या डायलिसिस की स्थिति में खानपान पर विशेष ध्यान देना बेहद जरूरी होता है। जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर से कई जरूरी मिनरल्स और अपशिष्ट पदार्थ बाहर नहीं निकल पाते। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण तत्व पोटैशियम है, जिसका संतुलन बिगड़ने पर गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

    मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर में पोटैशियम का बढ़ना हाइपरकलेमिया कहलाता है, जो दिल की धड़कन को प्रभावित कर सकता है और गंभीर मामलों में जानलेवा भी साबित हो सकता है। इसी वजह से डायलिसिस मरीजों को हमेशा लो-पोटैशियम डाइट लेने की सलाह दी जाती है।

    शिमला मिर्च को आमतौर पर एक हल्की और सुरक्षित सब्जी माना जाता है। पोषण संबंधी आंकड़ों के अनुसार, 100 ग्राम कच्ची हरी शिमला मिर्च में लगभग 170 से 180 मिलीग्राम पोटैशियम पाया जाता है। लाल और पीली शिमला मिर्च में यह मात्रा थोड़ी अधिक हो सकती है, लेकिन फिर भी इसे अन्य कई सब्जियों और फलों की तुलना में कम पोटैशियम वाला भोजन माना जाता है।

    इसके अलावा शिमला मिर्च में विटामिन C, विटामिन A और एंटीऑक्सीडेंट्स भी पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि डायलिसिस मरीज इसे पूरी तरह बंद करने की बजाय सीमित मात्रा में सेवन कर सकते हैं। इसे मुख्य भोजन का बड़ा हिस्सा नहीं बनाना चाहिए और अन्य हाई-पोटैशियम फूड जैसे टमाटर या आलू के साथ मिलाकर अधिक मात्रा में सेवन करने से बचना चाहिए।

    हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए किसी भी आहार को अपनाने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह लेना सबसे सुरक्षित तरीका माना जाता है।

  • आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की बड़ी उपलब्धि, 104 करोड़ से अधिक हेल्थ रिकॉर्ड हुए डिजिटल

    आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन की बड़ी उपलब्धि, 104 करोड़ से अधिक हेल्थ रिकॉर्ड हुए डिजिटल


    नई दिल्ली । केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) ने डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सरकार की ओर से जारी फैक्टशीट के अनुसार, अब तक 104 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड को 93 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (ABHA) से जोड़ा जा चुका है। इसके साथ ही यह मिशन दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल हेल्थ नेटवर्क में शामिल हो गया है।

    सरकार के अनुसार, सितंबर 2021 में शुरू किए गए इस मिशन का उद्देश्य पूरे देश में ऐसा डिजिटल स्वास्थ्य ढांचा तैयार करना है, जिससे स्वास्थ्य सेवाएं अधिक सुलभ, प्रभावी और एक-दूसरे से जुड़ी हो सकें। इस व्यवस्था के जरिए मरीज अपने मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित तरीके से संभाल सकते हैं। अस्पतालों में कागजी प्रक्रिया कम होती है, पंजीकरण और इलाज में लगने वाला समय घटता है तथा मरीज, डॉक्टर, अस्पताल और बीमा कंपनियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होता है।

    मिशन के तहत प्रत्येक नागरिक को आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (ABHA) के रूप में एक विशिष्ट डिजिटल हेल्थ आईडी उपलब्ध कराई जाती है। मरीज की सहमति के आधार पर यह आईडी उसके मेडिकल रिकॉर्ड को अस्पतालों, लैब, बीमा कंपनियों और विभिन्न राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों से सुरक्षित तरीके से जोड़ती है।

    सरकार ने हाल ही में आरोग्य सेतु 2.0 को भी इस मिशन के तहत डिजिटल हेल्थ एप के रूप में लॉन्च किया है। इसके जरिए नागरिक ABHA अकाउंट बना सकते हैं, डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड देख और प्रबंधित कर सकते हैं, टेली-कंसल्टेशन ले सकते हैं, अस्पताल में अपॉइंटमेंट बुक कर सकते हैं, बीमा संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और आसपास उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी भी हासिल कर सकते हैं। इसके अलावा वियरेबल डिवाइस के जरिए स्वास्थ्य की निगरानी की सुविधा भी उपलब्ध है।

    फैक्टशीट के मुताबिक, नेशनल हेल्थ अथॉरिटी की ‘स्कैन एंड शेयर’ सेवा ने अस्पतालों में ओपीडी पंजीकरण की प्रक्रिया को काफी आसान और तेज बना दिया है। 18 जून तक देशभर में 23.21 करोड़ से अधिक ABHA लिंक्ड डिजिटल टोकन जारी किए जा चुके हैं।

    सरकार ने बताया कि 18 जून तक इस योजना के तहत अस्पतालों को 107 करोड़ रुपये से अधिक, डायग्नोस्टिक सेंटर, लैब और फार्मेसी को 2.95 करोड़ रुपये से ज्यादा तथा डिजिटल हेल्थ समाधान उपलब्ध कराने वाली कंपनियों को 26 करोड़ रुपये से अधिक की प्रोत्साहन राशि दी जा चुकी है।

    इसके अलावा 2,200 से अधिक स्वास्थ्य संस्थानों को ई-सुश्रुत क्लिनिक प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है। सी-डैक द्वारा विकसित यह हल्का हॉस्पिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम छोटे अस्पतालों और क्लीनिकों को मरीजों के रिकॉर्ड और प्रशासनिक प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण करने में मदद कर रहा है। सरकार का कहना है कि यह पहल देश में डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और नागरिकों को बेहतर, तेज तथा पारदर्शी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में अहम कदम है।

  • बारिश में भीग गया स्मार्टफोन? घबराने की बजाय तुरंत अपनाएं ये आसान उपाय, सही समय पर उठाया कदम बचा सकता है आपका मोबाइल

    बारिश में भीग गया स्मार्टफोन? घबराने की बजाय तुरंत अपनाएं ये आसान उपाय, सही समय पर उठाया कदम बचा सकता है आपका मोबाइल

    नई दिल्ली । मानसून के मौसम में अचानक होने वाली बारिश अक्सर लोगों के स्मार्टफोन के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है। बाहर निकलते समय जेब या बैग में रखा मोबाइल कई बार पानी की चपेट में आ जाता है। ऐसे में घबराकर जल्दबाजी में उठाया गया एक गलत कदम फोन को हमेशा के लिए खराब कर सकता है। इसलिए मोबाइल भीगने के बाद सही तरीके अपनाना बेहद जरूरी होता है।

    अगर फोन बारिश में भीग जाए तो सबसे पहले उसे तुरंत स्विच ऑफ कर देना चाहिए। यदि डिवाइस पहले से बंद है तो उसे चालू करने की कोशिश बिल्कुल नहीं करनी चाहिए। पानी के संपर्क में आने के बाद फोन के अंदर शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में फोन ऑन रहने या बार-बार चालू करने का प्रयास करने से मदरबोर्ड और अन्य इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

    भीगे हुए मोबाइल को तुरंत चार्जिंग पर लगाना भी नुकसानदायक साबित हो सकता है। कई लोग यह जांचने के लिए कि फोन काम कर रहा है या नहीं, उसे चार्जर से जोड़ देते हैं। ऐसा करने से शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ जाता है और फोन पूरी तरह खराब हो सकता है। इसलिए जब तक फोन पूरी तरह सूख न जाए, उसे चार्जिंग से दूर रखना ही सुरक्षित माना जाता है।

    फोन बंद करने के बाद सिम कार्ड और मेमोरी कार्ड को बाहर निकाल लेना चाहिए। यदि मोबाइल की बैटरी निकालना संभव हो तो उसे भी अलग कर देना बेहतर रहता है। इससे डिवाइस के अंदर हवा का प्रवाह बढ़ता है और नमी जल्दी सूखने में मदद मिलती है। साथ ही सिम और मेमोरी कार्ड को भी संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है।

    इसके बाद फोन के बाहरी हिस्से को साफ और सूखे सूती कपड़े या टिश्यू पेपर से धीरे-धीरे पोंछना चाहिए। स्क्रीन, बैक पैनल और किनारों पर मौजूद पानी को सावधानी से हटाएं। इस दौरान फोन को जोर से हिलाने या झटकने से बचना चाहिए, क्योंकि इससे पानी अंदर तक पहुंच सकता है और नुकसान बढ़ सकता है।

    मोबाइल को सुखाने के लिए हेयर ड्रायर या किसी अन्य गर्म हवा वाले उपकरण का उपयोग नहीं करना चाहिए। तेज गर्म हवा फोन के अंदर मौजूद प्लास्टिक और अन्य संवेदनशील हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा हवा का दबाव पानी को बाहर निकालने के बजाय अंदर की ओर धकेल सकता है, जिससे समस्या और गंभीर हो सकती है।

    मानसून के दौरान मोबाइल को सुरक्षित रखने के लिए वॉटरप्रूफ कवर या सुरक्षित पाउच का इस्तेमाल करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। यदि फोन लंबे समय तक पानी में रहा हो या पूरी तरह सूखने के बाद भी सामान्य रूप से काम न करे, तो उसे स्वयं खोलने की बजाय सर्विस सेंटर में जांच कराना बेहतर रहेगा। सही समय पर बरती गई सावधानियां स्मार्टफोन को गंभीर नुकसान से बचाने के साथ उसकी कार्यक्षमता बनाए रखने में भी मदद करती हैं।

  • बारिश में जूतों से आने वाली बदबू से हैं परेशान? घर की 4 आसान चीजें मिनटों में दूर करें नमी, बैक्टीरिया और दुर्गंध की समस्या

    बारिश में जूतों से आने वाली बदबू से हैं परेशान? घर की 4 आसान चीजें मिनटों में दूर करें नमी, बैक्टीरिया और दुर्गंध की समस्या

    नई दिल्ली । मानसून का मौसम गर्मी से राहत तो देता है, लेकिन इसके साथ कई छोटी-बड़ी परेशानियां भी लेकर आता है। इनमें जूतों से आने वाली बदबू एक आम समस्या है, जिससे कई लोग रोजमर्रा की जिंदगी में असहज महसूस करते हैं। ऑफिस, स्कूल, कॉलेज या किसी सामाजिक कार्यक्रम में जूते उतारते समय अगर उनमें से तेज दुर्गंध आने लगे तो यह शर्मिंदगी का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार इसकी मुख्य वजह बारिश के मौसम में बढ़ी हुई नमी और बैक्टीरिया का तेजी से पनपना है।

    बारिश के दिनों में पैर अक्सर पसीने या पानी के संपर्क में रहते हैं। जब नमी लंबे समय तक जूतों के अंदर बनी रहती है तो बैक्टीरिया और फंगस विकसित होने लगते हैं। यही सूक्ष्म जीव दुर्गंध पैदा करते हैं। यदि समय रहते जूतों की सफाई और देखभाल न की जाए तो समस्या और बढ़ सकती है।

    इस परेशानी से राहत पाने के लिए महंगे उत्पादों की जरूरत नहीं होती। घर में मौजूद कुछ सामान्य चीजों का सही तरीके से उपयोग कर जूतों की बदबू को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सबसे प्रभावी उपायों में बेकिंग सोडा शामिल है। रात में सोने से पहले जूतों के अंदर थोड़ा-सा बेकिंग सोडा छिड़कने से यह अतिरिक्त नमी और दुर्गंध को सोख लेता है। सुबह जूतों को अच्छी तरह झाड़कर साफ कर दें। इससे जूते अधिक ताजगी भरे महसूस होते हैं।

    सूखी चाय की पत्ती या इस्तेमाल किए गए और अच्छी तरह सुखाए गए टी-बैग भी इस समस्या में उपयोगी साबित हो सकते हैं। इन्हें कुछ घंटों के लिए जूतों के अंदर रखने से नमी कम होती है और दुर्गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया की सक्रियता घटती है। यह तरीका विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभदायक है जो रोजाना लंबे समय तक जूते पहनते हैं।

    अगर बारिश में जूते भीग गए हों तो उन्हें तुरंत सुखाना बेहद जरूरी है। इसके लिए पुराने अखबार का इस्तेमाल किया जा सकता है। अखबार को मोड़कर जूतों के अंदर भर देने से वह तेजी से नमी सोख लेता है। यदि अखबार पूरी तरह गीला हो जाए तो उसे बदलकर दूसरा सूखा अखबार रख दें। इससे जूतों के अंदर नमी जमा नहीं होती और बैक्टीरिया के पनपने की संभावना कम हो जाती है।

    इसके अलावा, जब भी मौसम साफ हो और धूप निकले, जूतों को कुछ समय के लिए खुली हवा और धूप में जरूर रखें। सूर्य की किरणें प्राकृतिक रूप से नमी कम करने के साथ बैक्टीरिया और फंगस की वृद्धि को भी रोकने में मदद करती हैं। नियमित रूप से जूतों को हवा लगने देने से उनमें ताजगी बनी रहती है और दुर्गंध की समस्या दोबारा होने की संभावना कम होती है।

    मानसून के दौरान जूतों की साफ-सफाई और सही देखभाल पर थोड़ा-सा ध्यान देकर बदबू की समस्या से आसानी से बचा जा सकता है। घरेलू उपाय न केवल किफायती हैं, बल्कि नियमित उपयोग से जूतों की स्वच्छता बनाए रखने और पैरों को संक्रमण से सुरक्षित रखने में भी मददगार साबित होते हैं।

  • तेज बुखार और ठंड लगने को न करें नजरअंदाज जानिए मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय और जरूरी जांच

    तेज बुखार और ठंड लगने को न करें नजरअंदाज जानिए मलेरिया टेस्ट कराने का सही समय और जरूरी जांच


    नई दिल्ली । मानसून के साथ हर साल मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी तेजी से बढ़ जाता है। इनमें मलेरिया सबसे गंभीर संक्रामक रोगों में शामिल है। कई लोग तेज बुखार ठंड लगना और शरीर दर्द जैसी शुरुआती परेशानियों को सामान्य वायरल संक्रमण समझकर घरेलू इलाज करते रहते हैं। यही लापरवाही बीमारी को गंभीर रूप दे सकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर जांच और उचित उपचार मलेरिया से होने वाली जटिलताओं को काफी हद तक रोक सकता है।

    मलेरिया संक्रमित मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह संक्रमण शरीर में प्लाज्मोडियम नामक परजीवी के कारण होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है। शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं इसलिए कई बार मरीज सही समय पर जांच नहीं करा पाते। यदि किसी व्यक्ति को बार बार तेज बुखार आ रहा हो ठंड लग रही हो अत्यधिक पसीना आ रहा हो सिर और शरीर में तेज दर्द हो या लगातार कमजोरी महसूस हो रही हो तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

    विशेषज्ञों के अनुसार यदि बुखार 24 से 48 घंटे के भीतर ठीक नहीं हो रहा है या बुखार की दवा लेने के बाद भी राहत नहीं मिल रही है तो मलेरिया की जांच कराना जरूरी हो जाता है। खासकर ऐसे लोग जो मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं या हाल ही में ऐसे स्थानों की यात्रा करके लौटे हैं उन्हें किसी भी तरह की देरी नहीं करनी चाहिए।

    समय पर जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ मामलों में प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम नामक परजीवी से होने वाला मलेरिया बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। इलाज में देरी होने पर संक्रमण दिमाग किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को प्रभावित कर सकता है। गंभीर एनीमिया सांस लेने में परेशानी और मल्टी ऑर्गन फेलियर जैसी जानलेवा स्थितियां भी विकसित हो सकती हैं। इसलिए बिना जांच के स्वयं दवा लेने के बजाय डॉक्टर की सलाह पर ही उपचार शुरू करना चाहिए।

    मलेरिया की पुष्टि के लिए कई तरह की जांच उपलब्ध हैं। सबसे सामान्य जांच माइक्रोस्कोपी है जिसमें रक्त की स्लाइड के माध्यम से परजीवी की पहचान की जाती है। जहां यह सुविधा उपलब्ध नहीं होती वहां रैपिड डायग्नोस्टिक टेस्ट यानी आरडीटी का उपयोग किया जाता है जो कम समय में परिणाम दे देता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में क्वांटिटेटिव बफी कोट टेस्ट और पीसीआर जांच भी कराई जाती है जो संक्रमण की अधिक सटीक पहचान करने में मदद करती हैं।

    विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच होने से मरीज को सही दवा जल्दी मिल जाती है और बीमारी के गंभीर रूप लेने की संभावना काफी कम हो जाती है। साथ ही बिना जरूरत एंटीबायोटिक या मलेरिया की दवा लेने से भी बचा जा सकता है जिससे दवा प्रतिरोध जैसी समस्याएं नहीं बढ़तीं।

    मलेरिया से बचाव के लिए घर और आसपास पानी जमा न होने दें। कूलर गमले और टंकियों की नियमित सफाई करें। पूरी आस्तीन के कपड़े पहनें मच्छरदानी का उपयोग करें और जरूरत पड़ने पर मच्छर भगाने वाले रिपेलेंट का इस्तेमाल करें। यदि परिवार में किसी को लगातार बुखार आ रहा हो तो घरेलू इलाज में समय गंवाने के बजाय तुरंत जांच कराना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

  • स्किन को रखना है हेल्दी और ग्लोइंग तो अपनाएं ये आसान आदतें त्वचा रहेगी लंबे समय तक जवान

    स्किन को रखना है हेल्दी और ग्लोइंग तो अपनाएं ये आसान आदतें त्वचा रहेगी लंबे समय तक जवान


    नई दिल्ली । स्वस्थ और चमकदार त्वचा हर किसी की चाहत होती है लेकिन इसके लिए केवल महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट ही जरूरी नहीं होते। त्वचा की असली खूबसूरती अंदर से शुरू होती है। संतुलित खानपान पर्याप्त पानी नियमित देखभाल और स्वस्थ जीवनशैली मिलकर त्वचा को लंबे समय तक जवां और निखरी हुई बनाए रखने में मदद करते हैं। यदि रोजमर्रा की कुछ आसान आदतों को अपनाया जाए तो त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं से बचा जा सकता है।

    त्वचा की देखभाल का पहला नियम है उसकी नियमित सफाई। दिनभर धूल मिट्टी प्रदूषण और पसीना त्वचा पर जमा होकर रोमछिद्रों को बंद कर देते हैं। इसलिए सुबह और रात अपने स्किन टाइप के अनुसार हल्के फेस क्लेंजर से चेहरा साफ करना चाहिए। इससे त्वचा साफ रहती है और मुंहासों का खतरा भी कम होता है।

    सफाई के बाद त्वचा को मॉइस्चराइज करना भी उतना ही जरूरी है। कई लोग मानते हैं कि केवल रूखी त्वचा वालों को ही मॉइस्चराइजर की जरूरत होती है लेकिन तैलीय त्वचा को भी उचित नमी की आवश्यकता होती है। सही मॉइस्चराइजर त्वचा की प्राकृतिक नमी बनाए रखता है और उसे मुलायम तथा स्वस्थ बनाता है।

    धूप से बचाव भी स्किन केयर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तेज धूप में मौजूद अल्ट्रावायलेट किरणें त्वचा को समय से पहले बूढ़ा बना सकती हैं और झाइयों तथा सनबर्न जैसी समस्याएं पैदा कर सकती हैं। घर से बाहर निकलने से पहले सनस्क्रीन का इस्तेमाल करना और तेज धूप में लंबे समय तक रहने से बचना त्वचा की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

    त्वचा की खूबसूरती केवल बाहरी देखभाल से नहीं आती बल्कि खानपान का भी इसमें बड़ा योगदान होता है। ताजे फल हरी सब्जियां सूखे मेवे और प्रोटीन से भरपूर भोजन त्वचा को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करते हैं। विटामिन सी विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट युक्त आहार त्वचा की कोशिकाओं को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। इसके साथ ही दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर और त्वचा दोनों हाइड्रेट रहते हैं जिससे प्राकृतिक निखार बना रहता है।

    अच्छी नींद और तनाव पर नियंत्रण भी त्वचा के लिए बेहद जरूरी है। पर्याप्त नींद न मिलने और लगातार तनाव रहने से त्वचा बेजान दिखने लगती है तथा मुंहासे और समय से पहले झुर्रियां आने का खतरा बढ़ सकता है। नियमित व्यायाम और योग से रक्त संचार बेहतर होता है जिससे त्वचा तक ऑक्सीजन और पोषण आसानी से पहुंचता है।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बिना जरूरत बार बार नए ब्यूटी प्रोडक्ट बदलने से बचना चाहिए। किसी भी नए उत्पाद का उपयोग करने से पहले उसकी गुणवत्ता और अपनी त्वचा के अनुसार उसकी उपयुक्तता जरूर जांच लें। यदि त्वचा पर लगातार खुजली लालिमा दाने या अन्य गंभीर समस्या दिखाई दे तो स्वयं उपचार करने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।

    स्वस्थ त्वचा किसी एक दिन में नहीं बनती बल्कि यह नियमित देखभाल और अच्छी आदतों का परिणाम होती है। यदि सही स्किन केयर रूटीन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाए तो लंबे समय तक त्वचा को स्वस्थ चमकदार और आकर्षक बनाए रखा जा सकता है।

  • सिर्फ सिगरेट नहीं ये आदतें भी पुरुषों की फर्टिलिटी पर डालती हैं बुरा असर जानिए लो स्पर्म काउंट के बड़े कारण

    सिर्फ सिगरेट नहीं ये आदतें भी पुरुषों की फर्टिलिटी पर डालती हैं बुरा असर जानिए लो स्पर्म काउंट के बड़े कारण


    नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पुरुषों की प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें लो स्पर्म काउंट यानी वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम होना एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है। अधिकांश लोग मानते हैं कि केवल सिगरेट तंबाकू या शराब का सेवन ही इसका कारण है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कई अन्य शारीरिक और जीवनशैली से जुड़े कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। समय रहते इन कारणों की पहचान और सही उपचार से पिता बनने की संभावना को बेहतर बनाया जा सकता है।

    चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार जब एक मिलीलीटर वीर्य में लगभग डेढ़ करोड़ से कम शुक्राणु पाए जाते हैं तो इसे लो स्पर्म काउंट या ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है। यदि वीर्य में शुक्राणु बिल्कुल नहीं होते तो इसे एजूस्पर्मिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है लेकिन आधुनिक चिकित्सा के जरिए कई मामलों में इसका सफल उपचार संभव है।

    लो स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि लंबे समय तक नियमित प्रयास के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता। कई पुरुषों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। हालांकि कुछ मामलों में यौन इच्छा में कमी इरेक्शन की समस्या अंडकोष में दर्द सूजन या गांठ जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं। ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि धूम्रपान और तंबाकू के अलावा मोटापा लगातार मानसिक तनाव अत्यधिक शराब का सेवन नशीले पदार्थों का उपयोग हार्मोन असंतुलन और अनियमित जीवनशैली भी शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा वैरिकोसील थायरॉयड विकार कुछ संक्रमण और लंबे समय तक कुछ दवाओं का सेवन भी पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

    यदि कोई दंपती बिना गर्भनिरोधक के एक वर्ष तक नियमित संबंध बनाने के बाद भी संतान प्राप्ति में सफल नहीं हो पाता तो पुरुष और महिला दोनों की जांच कराना आवश्यक माना जाता है। जिन पुरुषों को पहले से अंडकोष प्रोस्टेट या यौन स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही हो उन्हें बिना देरी चिकित्सकीय परामर्श लेना चाहिए। समय पर जांच से समस्या का कारण पता लगाया जा सकता है और उसके अनुसार इलाज शुरू किया जा सकता है।

    अच्छी बात यह है कि हर लो स्पर्म काउंट का मामला स्थायी बांझपन नहीं होता। संतुलित आहार नियमित व्यायाम पर्याप्त नींद तनाव पर नियंत्रण और स्वस्थ वजन बनाए रखने से शुक्राणुओं की गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। धूम्रपान तंबाकू और शराब से दूरी बनाना भी बेहद जरूरी है। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवाओं हार्मोन थेरेपी या आधुनिक फर्टिलिटी तकनीकों की मदद से इलाज की सलाह दे सकते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पुरुषों को अपनी प्रजनन क्षमता को लेकर खुलकर बात करनी चाहिए और किसी भी समस्या को छिपाने के बजाय समय पर जांच करानी चाहिए। सही जीवनशैली नियमित स्वास्थ्य जांच और विशेषज्ञ की सलाह से अधिकांश मामलों में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। जागरूकता और समय पर उपचार ही स्वस्थ पितृत्व की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम है।