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  • Summer Skin Care Tips: गर्मी में टैनिंग, पिंपल्स और डलनेस से ऐसे बचाएं अपनी स्किन

    Summer Skin Care Tips: गर्मी में टैनिंग, पिंपल्स और डलनेस से ऐसे बचाएं अपनी स्किन


    नई दिल्ली। गर्मियों का मौसम आते ही सबसे ज्यादा असर हमारी त्वचा पर दिखाई देने लगता है। तेज धूप, पसीना, धूल और बढ़ता प्रदूषण स्किन को बेजान और रूखा बना देता है। कई लोगों को टैनिंग, पिंपल्स, ऑयली स्किन और रैशेज जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर सही तरीके से स्किन की देखभाल की जाए, तो गर्मी के मौसम में भी त्वचा को हेल्दी, फ्रेश और चमकदार बनाए रखा जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार गर्मियों में त्वचा को सबसे ज्यादा जरूरत सफाई, हाइड्रेशन और सन प्रोटेक्शन की होती है। दिन में कम से कम दो बार चेहरे को हल्के फेसवॉश से साफ करना चाहिए ताकि त्वचा पर जमा धूल, पसीना और अतिरिक्त तेल हट सके। ऑयली स्किन वाले लोगों को जेल बेस्ड फेसवॉश का इस्तेमाल करना चाहिए, जबकि ड्राई स्किन वालों के लिए मॉइश्चराइजिंग फेसवॉश बेहतर माना जाता है।

    गर्मियों में सनस्क्रीन का इस्तेमाल बेहद जरूरी होता है। धूप में निकलने से पहले SPF 30 या उससे अधिक वाला सनस्क्रीन लगाने से त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से बचाया जा सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बाहर जाने से करीब 20 मिनट पहले सनस्क्रीन लगाना चाहिए और लंबे समय तक बाहर रहने पर हर तीन से चार घंटे में दोबारा लगाना चाहिए।

    त्वचा को अंदर से स्वस्थ रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी जरूरी है। गर्मियों में शरीर जल्दी डिहाइड्रेट होता है, जिसका असर चेहरे की चमक पर साफ दिखाई देता है। दिनभर में कम से कम आठ से दस गिलास पानी पीना चाहिए। नारियल पानी, नींबू पानी और ताजे फलों का सेवन भी त्वचा को हाइड्रेट रखने में मदद करता है।

    गर्मियों में भारी और ऑयली क्रीम की जगह हल्के जेल या वॉटर बेस्ड मॉइश्चराइजर का उपयोग करना बेहतर माना जाता है। इससे त्वचा को जरूरी नमी मिलती है और चिपचिपाहट भी महसूस नहीं होती। इसके अलावा घरेलू उपाय भी स्किन को प्राकृतिक निखार देने में मददगार साबित होते हैं। दही, बेसन और हल्दी का फेस पैक टैनिंग कम करने में मदद करता है, जबकि मुल्तानी मिट्टी और गुलाब जल ऑयली स्किन को फ्रेश बनाए रखते हैं। एलोवेरा और खीरे का रस त्वचा को ठंडक देने के साथ ग्लो भी बढ़ाते हैं।

    विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि खानपान का सीधा असर त्वचा पर पड़ता है। गर्मियों में तले-भुने और ज्यादा मसालेदार भोजन से बचना चाहिए। तरबूज, खीरा, पपीता और संतरे जैसे फल स्किन के लिए बेहद फायदेमंद होते हैं। पर्याप्त नींद और तनाव से दूरी भी त्वचा को स्वस्थ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    रात में सोने से पहले चेहरा साफ करना और हल्की नाइट क्रीम या एलोवेरा जेल लगाना त्वचा की मरम्मत में मदद करता है। वहीं ज्यादा मेकअप और बार-बार स्क्रबिंग से बचना चाहिए, क्योंकि इससे त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है।

    अगर गर्मियों में छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखा जाए, तो तेज धूप और गर्म हवाओं के बीच भी त्वचा को लंबे समय तक हेल्दी, मुलायम और चमकदार बनाए रखा जा सकता है।

  • गर्मी में स्टाइल भी, सुरक्षा भी! UV कपड़े बन रहे नया फैशन ट्रेंड

    गर्मी में स्टाइल भी, सुरक्षा भी! UV कपड़े बन रहे नया फैशन ट्रेंड


    नई दिल्ली । भीषण गर्मी, चिलचिलाती धूप और लगातार बढ़ती हीटवेव के बीच अब लोगों को राहत देने का नया तरीका फैशन ट्रेंड बनता जा रहा है। पहले जहां लोग धूप से बचने के लिए सनस्क्रीन, दुपट्टा, ग्लव्स और छाते का सहारा लेते थे, वहीं अब बाजार में ऐसे खास कपड़े तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं जिनमें “सनस्क्रीन” जैसी सुरक्षा पहले से मौजूद है। UV-प्रोटेक्टिव क्लोदिंग यानी अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने वाले कपड़े अब फैशन और हेल्थ दोनों का कॉम्बिनेशन बन चुके हैं।

    इन खास कपड़ों की मांग खासतौर पर उन लोगों में तेजी से बढ़ रही है जो रोजाना बाइक, स्कूटी, साइकिल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से सफर करते हैं। लंबे समय तक धूप में रहने से होने वाली टैनिंग, सनबर्न और स्किन डैमेज से बचने के लिए लोग अब UV-सुरक्षा वाले जैकेट, शर्ट, ट्राउजर, टोपी, ग्लव्स और स्कार्फ खरीद रहे हैं।

    UV-प्रोटेक्टिव कपड़े सामान्य फैब्रिक से अलग तकनीक से तैयार किए जाते हैं। इनमें धागों की बुनाई काफी घनी होती है ताकि सूरज की हानिकारक किरणें आसानी से कपड़े के आर-पार न जा सकें। इसके अलावा इनमें पॉलिएस्टर, नायलॉन और हाई-टेक कॉटन ब्लेंड जैसे फैब्रिक का इस्तेमाल किया जाता है, जो UV किरणों को बेहतर तरीके से ब्लॉक करते हैं। कई कंपनियां इन कपड़ों पर खास मिनरल या केमिकल कोटिंग भी करती हैं, जिसमें जिंक ऑक्साइड और टाइटेनियम डाइऑक्साइड जैसे तत्व शामिल होते हैं। ये UV किरणों को रिफ्लेक्ट करने में मदद करते हैं।

    विशेषज्ञों के मुताबिक जैसे सनस्क्रीन में SPF रेटिंग होती है, वैसे ही इन कपड़ों में UPF यानी अल्ट्रावायलेट प्रोटेक्शन फैक्टर होता है। यह बताता है कि कपड़ा कितनी UV किरणों को रोक सकता है। UPF 15 से 20 वाले कपड़े सामान्य सुरक्षा देते हैं, जबकि UPF 30 से 40 अच्छी सुरक्षा माने जाते हैं। वहीं UPF 50 वाले कपड़े लगभग 98 प्रतिशत तक UV किरणों को ब्लॉक कर सकते हैं।

    फैशन और स्किन प्रोटेक्शन का यह कॉम्बिनेशन लोगों को खूब पसंद आ रहा है। पहले जहां लोग गर्मी में चेहरा ढंककर निकलते थे, वहीं अब स्टाइलिश UV जैकेट और फुल स्लीव कपड़े नया स्टाइल स्टेटमेंट बनते जा रहे हैं। खासतौर पर युवाओं और आउटडोर एक्टिविटी करने वाले लोगों में इसका क्रेज तेजी से बढ़ा है।

    बढ़ती गर्मी और सन डैमेज का डर भी इस ट्रेंड के पीछे बड़ी वजह माना जा रहा है। डॉक्टरों के अनुसार लंबे समय तक तेज धूप में रहने से स्किन एजिंग, पिग्मेंटेशन और स्किन कैंसर जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे में UV कपड़े एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं।

    हालांकि विशेषज्ञ यह भी साफ करते हैं कि UV-प्रोटेक्टिव कपड़े पहनने का मतलब यह नहीं है कि सनस्क्रीन की जरूरत खत्म हो गई। चेहरे, हाथों और शरीर के खुले हिस्सों पर सनस्क्रीन लगाना अब भी जरूरी है। साथ ही धूप का चश्मा और हाइड्रेशन भी बेहद जरूरी माना जाता है।

    जानकारों के मुताबिक अगर ये कपड़े गीले हो जाएं तो उनकी UPF क्षमता कम हो सकती है। इसलिए धूप में लंबे समय तक रहने पर अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी है। फिलहाल फैशन इंडस्ट्री में UV-प्रोटेक्टिव क्लोदिंग तेजी से अपनी जगह बना रही है। स्टाइल, आराम और सुरक्षा का यह नया फॉर्मूला आने वाले समय में गर्मियों की जरूरत बन सकता है।

  • DNA बदलकर दिल की बीमारी खत्म करने का दावा! एक इंजेक्शन से 62% घटा खराब कोलेस्ट्रॉल

    DNA बदलकर दिल की बीमारी खत्म करने का दावा! एक इंजेक्शन से 62% घटा खराब कोलेस्ट्रॉल

    नई दिल्ली । दुनियाभर में तेजी से बढ़ रही दिल की बीमारियों के बीच वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई थेरेपी विकसित करने का दावा किया है, जो भविष्य में हार्ट अटैक के खतरे को हमेशा के लिए कम कर सकती है। खास बात यह है कि इस इलाज में रोज दवाइयां खाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि सिर्फ एक इंजेक्शन शरीर के डीएनए में बदलाव कर लंबे समय तक खराब कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रख सकता है।

    यह नई तकनीक जीन-एडिटिंग यानी डीएनए में बदलाव करने वाली थेरेपी पर आधारित है। प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The New England Journal of Medicine में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक इस थेरेपी ने शुरुआती ट्रायल में बेहद उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आगे के बड़े अध्ययनों में भी ऐसे ही नतीजे मिले तो यह दिल की बीमारी के इलाज में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।

    इस रिसर्च का नेतृत्व बायोटेक कंपनी Verve Therapeutics के सीईओ और वैज्ञानिक Dr. Sekar Kathiresan ने किया। अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार यह थेरेपी शरीर में मौजूद खराब कोलेस्ट्रॉल यानी LDL को लंबे समय तक कम रखने में सक्षम दिखाई दी है।

    रिसर्च के दौरान 85 मरीजों पर ट्रायल किया गया, हालांकि फिलहाल 35 मरीजों के डेटा का विश्लेषण सामने आया है। ये सभी मरीज आनुवंशिक रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल या दिल की बीमारी से जूझ रहे थे। जिन मरीजों को इस नई दवा की सबसे ज्यादा डोज दी गई, उनमें सिर्फ एक इंजेक्शन के बाद LDL कोलेस्ट्रॉल में करीब 62 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। सबसे बड़ी बात यह रही कि जिन मरीजों को 18 महीने पहले यह थेरेपी दी गई थी, उनमें भी कोलेस्ट्रॉल का स्तर लगातार कम बना हुआ है।

    वैज्ञानिकों के मुताबिक यह थेरेपी शरीर में एक खास जीन-एडिटिंग “मशीन” की तरह काम करती है। इंजेक्शन के जरिए इसे शरीर में पहुंचाया जाता है, जहां यह खून के रास्ते सीधे लिवर तक पहुंचती है। इसके बाद यह लिवर सेल के डीएनए में मौजूद PCSK9 नाम के जीन को टारगेट करती है। यही जीन खराब कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। थेरेपी इस जीन में बदलाव कर LDL को नियंत्रित कर देती है।

    दिल के विशेषज्ञ Dr. John H. P. Alexander ने इस शोध को बेहद महत्वपूर्ण बताया है। उनका कहना है कि यदि कोलेस्ट्रॉल और दिल की बीमारी का स्थायी इलाज संभव हो जाता है तो यह मेडिकल साइंस में गेम चेंजर साबित होगा।

    हालांकि वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और इसे पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी साबित करने के लिए बड़े स्तर पर और अध्ययन किए जाएंगे। इसके बावजूद शुरुआती नतीजों ने दुनियाभर के मेडिकल समुदाय का ध्यान खींचा है।

    आमतौर पर जीन थेरेपी बेहद महंगी मानी जाती है, लेकिन रिसर्च टीम का दावा है कि भविष्य में इस दवा को आम लोगों की पहुंच में लाने की कोशिश की जाएगी। कंपनी इसे सिर्फ दुर्लभ इलाज नहीं बल्कि सामान्य हार्ट ट्रीटमेंट का हिस्सा बनाना चाहती है।

    भारत जैसे देश के लिए यह शोध बेहद अहम माना जा रहा है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल करीब 28 लाख लोगों की मौत दिल की बीमारियों से होती है। ऐसे में अगर यह थेरेपी सफल होती है तो लाखों लोगों की जान बचाई जा सकती है और हार्ट अटैक के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • 45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां

    45°C की आग उगलती गर्मी में ऐसे बचाएं खुद को, नौतपा में भूलकर भी न करें ये गलतियां


    नई दिल्ली । नौतपा के नौ दिन साल के सबसे गर्म दिनों में गिने जाते हैं। इस दौरान सूरज की किरणें सीधे धरती पर पड़ती हैं और तापमान कई शहरों में 40 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। तेज धूप, गर्म हवाएं और लू शरीर पर तेजी से असर डालती हैं। ऐसे में थोड़ी सी लापरवाही भी डीहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन और हीट स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं की वजह बन सकती है। खासकर उन लोगों के लिए खतरा ज्यादा बढ़ जाता है जिन्हें रोजमर्रा के काम, नौकरी, व्यापार या यात्रा के कारण घर से बाहर निकलना पड़ता है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा में सबसे जरूरी है कि शरीर को ज्यादा गर्म होने से बचाया जाए और पानी की कमी न होने दी जाए। डॉक्टरों का कहना है कि अगर सही सावधानी बरती जाए तो इस भीषण गर्मी के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

    घर से बाहर निकलते समय कुछ जरूरी चीजें हमेशा साथ रखनी चाहिए। पानी की बोतल, ORS या ग्लूकोज, छाता या टोपी, सनग्लास, गमछा या कॉटन कपड़ा, हल्का स्नैक और जरूरी दवाइयां साथ रखना बेहद जरूरी माना गया है। धूप में निकलते समय सिर और चेहरे को ढंकना लू से बचाने में काफी मदद करता है।

    नौतपा के दौरान सुबह 6 बजे से 10 बजे तक और शाम 5 बजे के बाद बाहर निकलना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक का समय सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। इस दौरान गर्म हवाएं और तेज धूप शरीर का तापमान तेजी से बढ़ा देती हैं। यदि जरूरी काम न हो तो इस समय बाहर निकलने से बचना चाहिए।

    पैदल चलने वालों और बाइक सवारों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बाइक चलाते समय फुल स्लीव कपड़े, ग्लव्स और हेलमेट का इस्तेमाल करें। हेलमेट के अंदर कॉटन का कपड़ा लगाने से सिर जल्दी गर्म नहीं होता। वहीं पैदल चलने वाले लोग बीच-बीच में छांव में रुककर आराम करें और हर 20 से 30 मिनट में पानी पीते रहें। खाली पेट बाहर निकलना भी खतरनाक हो सकता है।

    डॉक्टरों के अनुसार कुछ शारीरिक संकेतों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, ज्यादा पसीना आना या अचानक पसीना बंद हो जाना, तेज कमजोरी, उल्टी, सांस लेने में दिक्कत, शरीर का तापमान बढ़ना, बेहोशी या दिल की धड़कन तेज होना हीट स्ट्रोक के संकेत हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत छांव या ठंडी जगह पर जाएं और मेडिकल मदद लें।

    नौतपा में सिर्फ पानी पीना काफी नहीं होता। शरीर से पसीने के साथ जरूरी मिनरल्स भी निकल जाते हैं। इसलिए ORS, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और बेल या आम पना जैसे देसी पेय शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं। बहुत ज्यादा चाय, कॉफी, शराब और कोल्ड ड्रिंक्स से बचना चाहिए क्योंकि ये शरीर में पानी की कमी बढ़ा सकते हैं।

    बच्चों और बुजुर्गों को इस मौसम में खास देखभाल की जरूरत होती है। बच्चों को धूप में खेलने से बचाएं और उन्हें बार-बार पानी या तरल पदार्थ देते रहें। वहीं बुजुर्गों को लंबे समय तक गर्मी में न रहने दें। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर, शुगर, हार्ट या सांस की बीमारी है उन्हें अतिरिक्त सतर्क रहने की जरूरत है।

    नौतपा के दौरान लाइफस्टाइल में भी बदलाव जरूरी है। हल्का और सुपाच्य भोजन करें। तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी और मौसमी फल डाइट में शामिल करें। ढीले और सूती कपड़े पहनें ताकि शरीर में हवा का संचार बना रहे। पर्याप्त नींद और आराम भी शरीर को गर्मी से लड़ने की ताकत देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि नौतपा को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है। सही सावधानी और जागरूकता ही इस भीषण गर्मी में सबसे बड़ा बचाव है।

  • स्किन के दाग-धब्बे होंगे गायब: हल्दी के साथ 2 घरेलू चीजों का कमाल, मिलेगा नेचुरल ग्लो

    स्किन के दाग-धब्बे होंगे गायब: हल्दी के साथ 2 घरेलू चीजों का कमाल, मिलेगा नेचुरल ग्लो


    नई दिल्ली । सर्दियों के मौसम में ठंडी हवा और ड्राई स्किन के कारण चेहरा रूखा, बेजान और डल नजर आने लगता है। ऐसे में अगर आप केमिकल प्रोडक्ट्स की बजाय घरेलू नुस्खे अपनाते हैं तो त्वचा को प्राकृतिक रूप से निखारा जा सकता है। हल्दी को आयुर्वेद में त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद माना गया है। इसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो स्किन को साफ और चमकदार बनाने में मदद करते हैं। अगर हल्दी में दो खास चीजें मिलाकर फेस पर लगाया जाए तो चेहरा सर्दियों में भी खिला-खिला और ग्लोइंग नजर आ सकता है।

    1. हल्दी + दही: प्राकृतिक मॉइश्चराइजर पैक
    दही में मौजूद लैक्टिक एसिड त्वचा को एक्सफोलिएट करता है और डेड स्किन हटाने में मदद करता है। हल्दी के साथ मिलकर यह स्किन को अंदर से साफ करता है।

    कैसे बनाएं पैक:
    1 चुटकी हल्दी
    2 चम्मच ताजा दही
    दोनों को मिलाकर पेस्ट बना लें और चेहरे पर 15–20 मिनट लगाएं। फिर हल्के गुनगुने पानी से धो लें।

    फायदे:
    ड्राई स्किन से राहत
    दाग-धब्बे हल्के होते हैं
    चेहरा मुलायम और चमकदार बनता है

    2. हल्दी + शहद: ग्लो बढ़ाने वाला नेचुरल फेस मास्क
    शहद एक बेहतरीन नेचुरल मॉइश्चराइजर है जो त्वचा को हाइड्रेट रखता है। हल्दी के साथ मिलकर यह स्किन को ग्लोइंग बनाता है और पिंपल्स कम करता है।

    कैसे बनाएं पैक:
    1 चुटकी हल्दी
    1 चम्मच शहद
    इसे अच्छे से मिक्स करके चेहरे पर लगाएं और 15–20 मिनट बाद धो लें।

    फायदे:
    स्किन में नेचुरल ग्लो आता है
    मुंहासे और दाग कम होते हैं
    त्वचा सॉफ्ट और हाइड्रेट रहती है
    ध्यान रखने वाली बातें
    हल्दी बहुत ज्यादा न लगाएं, वरना स्किन पीली पड़ सकती है
    पहले पैच टेस्ट जरूर करें
    हफ्ते में 2–3 बार ही इस्तेमाल करें

    हल्दी के साथ दही या शहद का इस्तेमाल सर्दियों में त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद है। यह न केवल चेहरे को साफ करता है बल्कि उसे प्राकृतिक रूप से चमकदार भी बनाता है। नियमित उपयोग से स्किन चांद जैसी निखरी और हेल्दी दिख सकती है।

  • सीने की बेचैनी नहीं मामूली बात: दिल की चेतावनी को समय पर समझना बन सकता है जीवनरक्षक कदम

    सीने की बेचैनी नहीं मामूली बात: दिल की चेतावनी को समय पर समझना बन सकता है जीवनरक्षक कदम

    नई दिल्ली । बदलती जीवनशैली, अनियमित खानपान और बढ़ते तनाव के दौर में हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं। पहले जहां दिल की बीमारियां बढ़ती उम्र के साथ जुड़ी मानी जाती थीं, वहीं अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। हार्ट अटैक एक ऐसी गंभीर स्थिति है जो कई बार अचानक सामने आती है और मरीज तथा परिवार दोनों को संभलने का मौका तक नहीं देती। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि शरीर कई बार पहले ही कुछ संकेत देने लगता है, जिन्हें समय रहते पहचान लिया जाए तो गंभीर स्थिति से बचा जा सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार हार्ट अटैक के लक्षण हर व्यक्ति में अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं। कई मामलों में यह संकेत सामान्य शारीरिक परेशानी की तरह लगते हैं, जिसके कारण लोग उन्हें नजरअंदाज कर देते हैं। सबसे सामान्य और गंभीर संकेत सीने में दर्द, दबाव या जकड़न महसूस होना माना जाता है। कई बार यह दर्द धीरे-धीरे शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है। दर्द बाएं हाथ, कंधे, गर्दन, जबड़े, कोहनी और पीठ तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति को सामान्य दर्द समझकर टालना खतरनाक साबित हो सकता है।

    इसके अलावा अचानक सांस लेने में कठिनाई होना या बिना ज्यादा मेहनत के सांस फूलना भी दिल से जुड़ी परेशानी का संकेत हो सकता है। कई लोगों को अचानक चक्कर आने लगते हैं या शरीर में कमजोरी महसूस होने लगती है। कुछ मामलों में मतली, उल्टी या पेट में असहजता भी देखने को मिलती है, जिसके कारण लोग इसे गैस या पाचन से जुड़ी समस्या मान लेते हैं। अचानक ठंडा पसीना आना और चेहरे की रंगत फीकी पड़ जाना भी ऐसे संकेत हैं जिन्हें गंभीरता से लेना चाहिए।

    विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं और बुजुर्गों में कई बार हार्ट अटैक के लक्षण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आते। यही कारण है कि इन वर्गों में अधिक सतर्कता की आवश्यकता होती है। अगर किसी व्यक्ति में ये लक्षण लगातार कुछ मिनटों तक बने रहें या तेजी से बढ़ने लगें, तो तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेना बेहद जरूरी हो जाता है। देरी कई बार जानलेवा साबित हो सकती है।

    हृदय रोगों से बचने के लिए जीवनशैली में बदलाव सबसे अहम कदम माना जाता है। रोजाना नियमित व्यायाम, संतुलित आहार और तनाव से दूरी हृदय को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। फलों, हरी सब्जियों, साबुत अनाज और पौष्टिक भोजन को दैनिक जीवन में शामिल करना चाहिए। तला-भुना और अत्यधिक नमक या चीनी वाले खाद्य पदार्थों से दूरी बनाकर रखना फायदेमंद हो सकता है। धूम्रपान और अत्यधिक शराब सेवन हृदय के लिए गंभीर जोखिम बढ़ाते हैं, इसलिए इन आदतों से बचना जरूरी है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित स्वास्थ्य जांच कराना अब आवश्यकता बन चुका है। समय पर जांच और सतर्कता न केवल बीमारियों की पहचान आसान बनाती है, बल्कि एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन की दिशा भी तय करती है।

  • नौतपा का प्रचंड असर शुरू: इन बीमारियों से जूझ रहे लोग रहें अलर्ट, लापरवाही पड़ सकती है भारी

    नौतपा का प्रचंड असर शुरू: इन बीमारियों से जूझ रहे लोग रहें अलर्ट, लापरवाही पड़ सकती है भारी


    नई दिल्ली।
    देश के कई हिस्सों में नौतपा की शुरुआत के साथ भीषण गर्मी ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। तापमान लगातार बढ़ रहा है और तेज धूप लोगों की सेहत पर भारी पड़ने लगी है। डॉक्टरों का कहना है कि सामान्य लोगों की तुलना में पहले से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को इस दौरान अधिक सतर्क रहने की जरूरत है। बढ़ती गर्मी शरीर के प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती है, जिससे कई स्वास्थ्य समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। ऐसे में लापरवाही कई बार बड़ी परेशानी का कारण बन सकती है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक नौतपा के दौरान शरीर पर हीट स्ट्रेस तेजी से बढ़ता है। अत्यधिक पसीना निकलने से शरीर में पानी और जरूरी मिनरल्स की कमी होने लगती है। इसका सीधा असर शरीर की कार्यप्रणाली पर पड़ता है। खासतौर पर डायबिटीज, हार्ट, किडनी, अस्थमा और मोटापे से पीड़ित लोगों में जोखिम ज्यादा बढ़ जाता है। यही वजह है कि डॉक्टर इन मरीजों को समय रहते सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं।

    डायबिटीज के मरीजों में गर्मी का असर कई तरह से दिखाई देता है। शरीर में पानी की कमी होने पर ब्लड शुगर का स्तर प्रभावित हो सकता है। कई बार डिहाइड्रेशन के कारण शुगर अचानक बढ़ या घट सकती है, जिससे मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है। इसके अलावा इंसुलिन की कार्यक्षमता पर भी अधिक तापमान असर डाल सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों को समय-समय पर पानी पीने और शुगर की नियमित जांच करते रहने की सलाह दी जा रही है।

    किडनी रोगियों के लिए भी नौतपा का समय चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। अधिक पसीना निकलने से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है। इससे किडनी पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और पहले से मौजूद समस्या गंभीर हो सकती है। डॉक्टरों का मानना है कि पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना ऐसे मरीजों के लिए बेहद जरूरी है।

    हार्ट मरीजों के लिए भी बढ़ती गर्मी चिंता का विषय है। अत्यधिक तापमान शरीर के तापमान नियंत्रण तंत्र पर दबाव डालता है। कई मामलों में हीट स्ट्रोक या हीट एग्जॉशन की स्थिति बन सकती है, जिससे दिल पर अतिरिक्त भार पड़ता है। इसी तरह अस्थमा और सांस संबंधी मरीजों में गर्म हवा और वातावरणीय बदलाव सांस लेने में परेशानी बढ़ा सकते हैं।

    डॉक्टरों की सलाह है कि नौतपा के दौरान दोपहर में अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचना चाहिए। हल्के और सूती कपड़े पहनने, पर्याप्त पानी पीने, तला-भुना भोजन कम खाने और शरीर को ठंडा रखने जैसे छोटे उपाय बड़ी समस्याओं से बचा सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही सावधानी और संतुलित दिनचर्या अपनाकर भीषण गर्मी के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • आपकी चाल में छिपा है लंबी जिंदगी का राज: रिसर्च में सामने आया तेज और धीमी चाल का चौंकाने वाला असर

    आपकी चाल में छिपा है लंबी जिंदगी का राज: रिसर्च में सामने आया तेज और धीमी चाल का चौंकाने वाला असर

    नई दिल्ली। स्वस्थ और लंबी जिंदगी जीना लगभग हर व्यक्ति की इच्छा होती है। बेहतर खानपान, नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली को लंबे जीवन का आधार माना जाता है, लेकिन अब एक नई रिसर्च ने इस विषय में एक दिलचस्प पहलू सामने रखा है। अध्ययन के अनुसार केवल पैदल चलना ही नहीं, बल्कि चलने की गति भी व्यक्ति की संभावित उम्र और स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकती है। यह दावा लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि रोजमर्रा की आदत से जुड़ा यह पहलू जीवन की गुणवत्ता से सीधे जुड़ा माना जा रहा है।

    शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में बड़ी संख्या में लोगों की जीवनशैली और चलने की आदतों का विश्लेषण किया। अध्ययन के दौरान यह समझने की कोशिश की गई कि तेज गति से चलने और धीमी गति से चलने वाले लोगों के स्वास्थ्य और जीवन अवधि में क्या अंतर दिखाई देता है। शोध में पाया गया कि नियमित रूप से तेज चाल में चलने वाले लोगों की संभावित उम्र अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। वहीं धीमी गति से चलने वाले कुछ समूहों में जीवन अवधि अपेक्षाकृत कम देखी गई।

    अध्ययन के दौरान विशेषज्ञों ने यह भी संकेत दिया कि केवल शरीर का वजन या बाहरी शारीरिक स्थिति ही बेहतर स्वास्थ्य का पैमाना नहीं हो सकती। इसके बजाय व्यक्ति की सक्रिय जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियां ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग अधिक सक्रिय रहते हैं और नियमित रूप से तेज गति से चलते हैं, उनमें स्वास्थ्य संबंधी कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे शरीर की कार्यक्षमता और फिटनेस स्तर बेहतर होने की संभावना भी बढ़ती है।

    एक अन्य अध्ययन में इस विषय से जुड़ा जैविक कारण भी समझने की कोशिश की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि शरीर की कोशिकाओं और उम्र बढ़ने के बीच संबंध रखने वाले कुछ जैविक तत्वों का संबंध चलने की गति से भी हो सकता है। अध्ययन में यह संकेत मिला कि तेज चाल से चलने वाले लोगों में शरीर के कुछ ऐसे संकेतक बेहतर स्थिति में पाए गए, जिन्हें उम्र बढ़ने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये संकेतक व्यक्ति के समग्र स्वास्थ्य और भविष्य की शारीरिक स्थिति को समझने में मदद कर सकते हैं।

    हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि केवल तेज चलना ही लंबी उम्र की गारंटी नहीं है। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और तनाव नियंत्रण जैसे कई कारक एक स्वस्थ जीवन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। फिर भी यह अध्ययन संकेत देता है कि रोजमर्रा की एक साधारण आदत, जैसे चलने की गति, भी व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर सकारात्मक असर डाल सकती है। ऐसे में सक्रिय जीवनशैली अपनाना और नियमित रूप से पैदल चलना स्वास्थ्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

  • बेली फैट कम करने के लिए कौन ज्यादा असरदार? जीरा पानी और मेथी पानी को लेकर एक्सपर्ट ने दूर किया बड़ा कन्फ्यूजन

    बेली फैट कम करने के लिए कौन ज्यादा असरदार? जीरा पानी और मेथी पानी को लेकर एक्सपर्ट ने दूर किया बड़ा कन्फ्यूजन

    नई दिल्ली। आजकल वजन कम करने के लिए लोग केवल जिम और डाइटिंग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि घरेलू उपायों और डिटॉक्स ड्रिंक्स की लोकप्रियता भी तेजी से बढ़ी है। खासकर सुबह खाली पेट पी जाने वाली कुछ पारंपरिक ड्रिंक्स लोगों के बीच काफी चर्चा में रहती हैं। इनमें जीरा पानी और मेथी पानी का नाम सबसे ऊपर आता है। सोशल मीडिया और हेल्थ ट्रेंड्स के दौर में इन दोनों ड्रिंक्स को लेकर कई दावे किए जाते हैं कि ये तेजी से वजन कम करने, पेट की चर्बी घटाने और शरीर को डिटॉक्स करने में मदद कर सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों को लेकर लोगों के बीच कई गलतफहमियां भी मौजूद हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार जीरा पानी और मेथी पानी दोनों के अपने-अपने फायदे हैं, लेकिन दोनों का काम करने का तरीका अलग है। इसलिए यह कहना कि इनमें से कोई एक सभी लोगों के लिए सबसे बेहतर है, पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता। व्यक्ति की शारीरिक स्थिति, खानपान, पाचन क्षमता और लाइफस्टाइल के आधार पर इनके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं।

    जीरा पानी को लंबे समय से पाचन सुधारने वाले घरेलू उपाय के रूप में देखा जाता रहा है। माना जाता है कि यह पेट से जुड़ी समस्याओं जैसे गैस, ब्लोटिंग और अपच में राहत पहुंचाने में मदद कर सकता है। जब पाचन बेहतर होता है तो शरीर भोजन को सही तरीके से प्रोसेस कर पाता है, जिससे वजन नियंत्रित रखने में अप्रत्यक्ष सहायता मिल सकती है। इसके अलावा शरीर में जमा अतिरिक्त पानी और भारीपन की समस्या कम होने से हल्कापन महसूस हो सकता है।

    दूसरी तरफ मेथी पानी का प्रभाव भूख नियंत्रण से जोड़कर देखा जाता है। इसमें मौजूद फाइबर पेट को लंबे समय तक भरा हुआ महसूस करा सकता है, जिससे बार-बार खाने की इच्छा कम हो सकती है। जिन लोगों को अनावश्यक स्नैकिंग या ओवरईटिंग की आदत होती है, उनके लिए यह उपयोगी साबित हो सकता है। इसके अलावा ब्लड शुगर संतुलन में मदद मिलने से भी अचानक लगने वाली भूख कम हो सकती है।

    हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि इन ड्रिंक्स को वजन घटाने का जादुई उपाय मानना सही नहीं होगा। केवल जीरा या मेथी पानी पीने से तेजी से फैट लॉस होने की उम्मीद करना वास्तविकता से दूर हो सकता है। वजन घटाने के लिए संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, पानी का सही सेवन और तनाव नियंत्रण जैसे कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि इन ड्रिंक्स का सेवन सीमित मात्रा में ही करना चाहिए। अधिक सेवन करने पर कुछ लोगों को पेट संबंधी दिक्कतें या अन्य परेशानियां हो सकती हैं। खासकर गर्भवती महिलाओं, मधुमेह की दवा लेने वालों और किसी पुरानी बीमारी से जूझ रहे लोगों को ऐसे घरेलू उपाय अपनाने से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए। स्वस्थ जीवनशैली की जगह कोई एक ड्रिंक नहीं ले सकती, बल्कि यह केवल अच्छी आदतों को सपोर्ट करने का काम करती है।

  • ओवर-स्किनकेयर सिंड्रोम क्या है? जानिए कैसे बिगड़ सकती है आपकी स्किन

    ओवर-स्किनकेयर सिंड्रोम क्या है? जानिए कैसे बिगड़ सकती है आपकी स्किन


    नई दिल्ली। आज के दौर में ग्लोइंग और बेदाग त्वचा पाने की चाहत में लोग कई तरह के स्किनकेयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। सोशल मीडिया, ब्यूटी इन्फ्लुएंसर्स और वायरल ट्रेंड्स के प्रभाव में आकर लोग एक साथ कई सीरम, क्रीम, एक्सफोलिएटर और एक्टिव इंग्रीडिएंट्स को अपनी डेली रूटीन का हिस्सा बना लेते हैं। लेकिन त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत से ज्यादा स्किन केयर करना अब एक नई समस्या बनकर सामने आ रहा है, जिसे “ओवर-स्किनकेयर सिंड्रोम” कहा जा रहा है।

    विशेषज्ञ बताते हैं कि स्किन की भी एक प्राकृतिक सुरक्षा परत होती है, जिसे बार-बार फेसवॉश, स्क्रब, एसिड बेस्ड प्रोडक्ट्स और केमिकल युक्त कॉस्मेटिक्स से नुकसान पहुंच सकता है। जब लोग बिना जरूरत कई प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करते हैं, तो त्वचा की नैचुरल बैरियर कमजोर होने लगती है। इसका असर जलन, लालपन, ड्रायनेस, पिंपल्स और एलर्जी के रूप में दिखाई देता है।

    त्वचा विशेषज्ञों के मुताबिक, ओवर-स्किनकेयर सिंड्रोम के सबसे सामान्य लक्षणों में त्वचा का अत्यधिक संवेदनशील हो जाना, बार-बार दाने निकलना, चेहरे पर खुजली, स्किन का छिलना और लगातार रूखापन शामिल हैं। कई बार लोग इन समस्याओं को ठीक करने के लिए और ज्यादा प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने लगते हैं, जिससे स्थिति और खराब हो जाती है।

    डॉक्टरों का कहना है कि हर चमकदार या वायरल प्रोडक्ट हर स्किन टाइप के लिए सही नहीं होता। बिना विशेषज्ञ की सलाह के एक्टिव इंग्रीडिएंट्स जैसे रेटिनॉल, सैलिसिलिक एसिड, विटामिन-सी और केमिकल पील्स का अधिक उपयोग त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है।

    विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्किनकेयर रूटीन हमेशा सरल और संतुलित होना चाहिए। एक अच्छे फेसवॉश, मॉइस्चराइजर और सनस्क्रीन का नियमित इस्तेमाल ज्यादातर लोगों के लिए पर्याप्त होता है। इसके अलावा त्वचा को पर्याप्त आराम देना, पानी ज्यादा पीना और संतुलित आहार लेना भी जरूरी है।

    यदि किसी व्यक्ति को लगातार स्किन संबंधी समस्याएं हो रही हैं, तो घरेलू प्रयोग या सोशल मीडिया ट्रेंड्स अपनाने की बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर माना जाता है।

    ब्यूटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि स्वस्थ त्वचा पाने का मतलब केवल ज्यादा प्रोडक्ट्स लगाना नहीं, बल्कि त्वचा की जरूरत को समझकर सही देखभाल करना है।