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  • गुड़ और चीनी में कौन ज्यादा हेल्दी? जानिए शरीर पर दोनों का असर और एक्सपर्ट राय

    गुड़ और चीनी में कौन ज्यादा हेल्दी? जानिए शरीर पर दोनों का असर और एक्सपर्ट राय

    नई दिल्ली। मीठा खाने की चाहत हर किसी में होती है, लेकिन जब बात सेहत की आती है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि चीनी और गुड़ में से कौन ज्यादा बेहतर विकल्प है। दोनों ही खाने में मिठास जोड़ते हैं, लेकिन शरीर पर इनका असर अलग-अलग होता है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि रोजमर्रा की जिंदगी में किसका सेवन ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद माना जाता है।

    चीनी को आमतौर पर रिफाइंड प्रक्रिया से तैयार किया जाता है, जिसमें इसके प्राकृतिक पोषक तत्व लगभग खत्म हो जाते हैं और केवल शुद्ध कैलोरी बचती है। यही कारण है कि इसे खाली कैलोरी का स्रोत भी कहा जाता है। दूसरी ओर गुड़ कम प्रोसेस्ड होता है और इसमें कुछ प्राकृतिक खनिज जैसे आयरन, पोटैशियम और कैल्शियम मौजूद रहते हैं, जो शरीर के लिए कुछ हद तक लाभकारी माने जाते हैं।

    गुड़ को पारंपरिक रूप से एक प्राकृतिक मिठास के रूप में देखा जाता है। कई लोग इसे सर्दी-जुकाम में राहत पाने, पाचन सुधारने और शरीर को ऊर्जा देने के लिए उपयोग करते हैं। भोजन के बाद थोड़ी मात्रा में गुड़ खाने की परंपरा भी इसलिए रही है क्योंकि यह डाइजेशन को बेहतर करने में मदद करता है। इसके अलावा महिलाओं में आयरन की कमी को पूरा करने में भी इसे उपयोगी माना जाता है।

    हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि गुड़ पूरी तरह से बिना नुकसान वाला विकल्प है। किसी भी चीज का अत्यधिक सेवन शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। गुड़ में भी प्राकृतिक शुगर मौजूद होती है, जो अधिक मात्रा में लेने पर कैलोरी बढ़ा सकती है और वजन बढ़ने का कारण बन सकती है। इसलिए संतुलन बेहद जरूरी है।

    वहीं दूसरी ओर सफेद चीनी का अधिक सेवन कई स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा हुआ है। यह शरीर में ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ाती है, जिससे तुरंत ऊर्जा तो मिलती है लेकिन वह जल्दी खत्म भी हो जाती है। लंबे समय तक अधिक चीनी का सेवन मोटापा, डायबिटीज, हृदय रोग और दांतों की समस्याओं का कारण बन सकता है। इसके अलावा यह त्वचा की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को भी तेज कर सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार अगर मीठे का सेवन सीमित मात्रा में किया जाए तो गुड़ चीनी की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकता है। रोजाना लगभग 10 से 15 ग्राम गुड़ को सुरक्षित मात्रा माना जाता है, लेकिन यह व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति पर भी निर्भर करता है। सुबह गुनगुने पानी के साथ थोड़ा गुड़ लेना या चाय में चीनी की जगह सीमित मात्रा में गुड़ का उपयोग करना एक बेहतर विकल्प हो सकता है।

    डायबिटीज से पीड़ित लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि गुड़ और चीनी दोनों में प्राकृतिक शुगर होती है जो ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में किसी भी मीठे पदार्थ का सेवन डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

  • AC से बाहर निकलते ही धूप में जाना पड़ सकता है भारी, बढ़ सकता है बीमारी का खतरा

    AC से बाहर निकलते ही धूप में जाना पड़ सकता है भारी, बढ़ सकता है बीमारी का खतरा


    नई दिल्ली । भीषण गर्मी के बीच एयर कंडीशनर (AC) लोगों की जरूरत बन चुका है। घर, ऑफिस और गाड़ियों में लोग घंटों AC में समय बिता रहे हैं, लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि लंबे समय तक AC में रहने के बाद अचानक तेज धूप और गर्म हवा में निकलना शरीर पर भारी पड़ सकता है। यह बदलाव शरीर के लिए एक तरह का “थर्मल शॉक” बन जाता है, जिससे कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ सकती हैं।

    तापमान में अचानक बदलाव क्यों करता है नुकसान?
    विशेषज्ञों के अनुसार, AC कमरे की गर्मी और नमी को काफी कम कर देता है, जिससे वातावरण बेहद ड्राई हो जाता है। इसका असर सीधे गले, त्वचा और सांस लेने की प्रणाली पर पड़ता है। जब व्यक्ति अचानक ऐसे वातावरण से तेज धूप में जाता है, तो शरीर को तापमान के अंतर को एडजस्ट करने में समय लगता है। इसी दौरान शरीर पर दबाव बढ़ता है और सिरदर्द, चक्कर या कमजोरी जैसी समस्याएं शुरू हो सकती हैं।

    किन समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है
    डॉक्टरों के मुताबिक, अचानक तापमान बदलने से कई तरह की दिक्कतें हो सकती हैं—
    सिरदर्द और चक्कर आना
    थकान और कमजोरी महसूस होना
    डिहाइड्रेशन (पानी की कमी)
    गले में खराश और सूखी खांसी
    हीट एक्सॉशन का खतरा
    अस्थमा और एलर्जी के मरीजों में बढ़ी परेशानी
    विशेष रूप से वे लोग जो लंबे समय तक AC में काम करते हैं और सीधे धूप में निकलते हैं, उन्हें ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।

    शरीर को कैसे करें सुरक्षित
    हेल्थ एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि AC से निकलते ही सीधे धूप में जाने से बचना चाहिए। शरीर को धीरे-धीरे बाहरी तापमान के अनुसार ढालना जरूरी है।
    AC से निकलकर कुछ मिनट छांव या सामान्य तापमान में रुकें
    दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं
    नारियल पानी, नींबू पानी और छाछ का सेवन करें
    हल्के और ढीले कॉटन कपड़े पहनें
    बाहर निकलते समय टोपी, छाता या स्कार्फ का उपयोग करें
    बहुत ठंडा पानी या ड्रिंक तुरंत न पिएं

    विशेषज्ञों की सलाह
    डॉक्टरों का कहना है कि गर्मियों में शरीर को हाइड्रेट रखना और तापमान के अचानक बदलाव से बचना सबसे जरूरी है। छोटी-छोटी सावधानियां अपनाकर हीट से जुड़ी कई गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है।

  • शिमला जाने से पहले क्या तैयारी करें? सफर को आरामदायक बनाने के जरूरी टिप्स

    शिमला जाने से पहले क्या तैयारी करें? सफर को आरामदायक बनाने के जरूरी टिप्स


    नई दिल्ली । अगर आप शिमला घूमने की योजना बना रहे हैं, तो यात्रा से पहले कुछ जरूरी तैयारियां कर लेना बेहद जरूरी है। सही प्लानिंग आपके ट्रिप को ज्यादा आरामदायक और बजट फ्रेंडली बना सकती है। खासकर पहाड़ी इलाकों में मौसम तेजी से बदलता है, इसलिए तैयारी पहले से होना जरूरी है।

    1. मौसम की जानकारी जरूर ले
    शिमला में मौसम जल्दी बदलता है।
    गर्मियों में हल्की ठंड रहती है
    सर्दियों में बर्फबारी और तेज ठंड पड़ती है
    मानसून में फिसलन और भूस्खलन का खतरा रहता है
    यात्रा से पहले मौसम अपडेट जरूर चेक करें।

    2. कपड़े सही पैक करें
    गर्मियों में भी हल्की जैकेट रखें
    सर्दियों में भारी ऊनी कपड़े, ग्लव्स और कैप जरूरी हैं
    आरामदायक स्पोर्ट्स शूज़ या ग्रिप वाले जूते पहनें
    बारिश के मौसम में रेनकोट या छाता साथ रखें

    3. होटल पहले से बुक करे
    सीजन के समय शिमला में होटल जल्दी फुल हो जाते हैं। इसलिए ऑनलाइन एडवांस बुकिंग करना बेहतर रहता है। मॉल रोड के पास होटल महंगे हो सकते हैं, जबकि थोड़ा दूर रहने पर बजट विकल्प मिल जाते हैं।

    4. यात्रा के जरूरी दस्तावेज रखें
    आधार कार्ड या अन्य आईडी प्रूफ
    होटल बुकिंग की कॉपी
    ट्रेन/बस/फ्लाइट टिकट
    जरूरी दवाइयां और मेडिकल किट

    5. रास्ते की तैयारी करें
    अगर आप सड़क मार्ग से जा रहे हैं तो:
    गाड़ी की सर्विस पहले करा लें
    ब्रेक और टायर जरूर चेक करें
    पहाड़ी रास्तों के लिए अनुभवी ड्राइवर बेहतर रहता है
    6. घूमने की जगहों की लिस्ट बना लें
    मॉल रोड, जाखू मंदिर, कुफरी और द रिज जैसी जगहें पहले से प्लान कर लें ताकि समय बच सके।

    7. कैश और नेटवर्क का ध्यान रखें
    कुछ पहाड़ी इलाकों में नेटवर्क कमजोर हो सकता है। डिजिटल पेमेंट हर जगह उपलब्ध नहीं होता, इसलिए थोड़ा कैश साथ रखें।

    8. स्वास्थ्य का रखें ध्या
    ऊंचाई वाले इलाकों में कुछ लोगों को चक्कर या सांस की दिक्कत हो सकती है।
    पानी पर्याप्त पिएं
    ज्यादा दौड़भाग से बचें
    जरूरी दवाइयां साथ रखें
    यात्रा को यादगार बनाने के लिए
    स्थानीय खानपान का आनंद लें, लेकिन साफ-सफाई का ध्यान रखें। पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों से बचें और पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता का सम्मान करें।

  • कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वालों के लिए गाइड, इन बातों की अनदेखी पड़ सकती है भारी

    कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वालों के लिए गाइड, इन बातों की अनदेखी पड़ सकती है भारी


    नई दिल्ली । कैलाश मानसरोवर यात्रा को हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन धर्मों में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन यह यात्रा जितनी आध्यात्मिक है, उतनी ही कठिन और चुनौतीपूर्ण भी है। तिब्बत क्षेत्र में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील तक पहुंचने के लिए यात्रियों को 5000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों से गुजरना पड़ता है, जहां ऑक्सीजन का स्तर कम होता है और मौसम बेहद अनिश्चित रहता है।

    ऊंचाई और मौसम सबसे बड़ी चुनौती
    इस यात्रा में सबसे बड़ी परेशानी हाई एल्टीट्यूड की होती है। यहां कई लोगों को सांस लेने में दिक्कत, सिरदर्द, चक्कर और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा तेज हवाएं, बर्फबारी और अचानक तापमान गिरना आम बात है, जिससे यात्रा और कठिन हो जाती है।

    यात्रा से पहले हेल्थ चेकअप जरूर
    विशेषज्ञों के अनुसार यात्रा पर जाने से पहले पूरी मेडिकल जांच कराना बेहद जरूरी है। खासकर जिन लोगों को–
    दिल की बीमारी
    ब्लड प्रेशर
    डायबिटीज
    सांस से जुड़ी समस्या
    उनके लिए डॉक्टर की अनुमति के बिना यात्रा करना जोखिम भरा हो सकता है।

    फिटनेस और तैयारी सबसे जरूर
    कैलाश मानसरोवर यात्रा में शारीरिक सहनशक्ति बेहद अहम भूमिका निभाती है। इसलिए यात्रा से कुछ महीने पहले ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए।
    रोजाना वॉक और हल्की दौड़
    प्राणायाम और एक्सरसाइज
    स्टैमिना बढ़ाने वाली गतिविधियां
    इससे शरीर ऊंचाई वाले वातावरण के लिए तैयार हो जाता है।

    सही समय का चयन भी जरूरी
    यात्रा के लिए मई से जून का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि इस दौरान मौसम अपेक्षाकृत साफ रहता है। जुलाई से सितंबर में बारिश और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है, जबकि नवंबर से अप्रैल तक भारी बर्फबारी के कारण यात्रा लगभग बंद रहती है।

    दस्तावेज और अनुमति जरूरी
    इस यात्रा के लिए कुछ जरूरी दस्तावेज और अनुमति अनिवार्य हैं-
    वैध पासपोर्ट
    चीन ग्रुप वीजा
    तिब्बत ट्रैवल परमिट
    सरकारी अनुमति
    आमतौर पर यह यात्रा अधिकृत एजेंसियों या सरकारी कार्यक्रमों के जरिए ही कराई जाती है।

    क्या-क्या सामान साथ रखें?
    यात्रा के दौरान मौसम अचानक बदल सकता है, इसलिए सही पैकिंग बहुत जरूरी है—
    गर्म कपड़े और थर्मल वियर
    वॉटरप्रूफ जैकेट
    मजबूत ट्रैकिंग शूज
    सनस्क्रीन, सनग्लासेस और टोपी
    ग्लव्स और मफलर

    मेडिकल किट और जरूरी सामान
    यात्रा में सीमित सुविधाओं को देखते हुए मेडिकल किट साथ रखना जरूरी है, जिसमें शामिल हों—
    बुखार और दर्द की दवाएं
    डिहाइड्रेशन की दवा
    ऊंचाई पर होने वाली समस्याओं की दवाएं
    एनर्जी बार और सूखे मेवे
    पानी शुद्ध करने वाली टेबलेट

    कैलाश मानसरोवर यात्रा केवल आस्था की नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक तैयारी की भी परीक्षा है। सही योजना, फिटनेस और सावधानियों के साथ यह यात्रा सुरक्षित और यादगार अनुभव बन सकती है।

  • छोटे बच्चों में मोटापा बढ़ना क्यों है चिंता की बात? जानें संभावित बीमारी

    छोटे बच्चों में मोटापा बढ़ना क्यों है चिंता की बात? जानें संभावित बीमारी


    नई दिल्ली । आजकल छोटे बच्चों में तेजी से बढ़ता वजन माता-पिता के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है। अक्सर इसे ज्यादा खाना, जंक फूड या कम खेलकूद का असर मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार यह समस्या शरीर में हार्मोनल गड़बड़ी, खासकर थायरॉइड बीमारी का संकेत हो सकती है। यदि बच्चे का वजन तेजी से बढ़ रहा हो और साथ में थकान, सुस्ती, कमजोरी या पढ़ाई में ध्यान न लगने जैसी परेशानियां भी दिखाई दें, तो तुरंत सतर्क होने की जरूरत है।

    क्या होता है थायरॉइड और क्यों है जरूरी?
    थायरॉइड गले के सामने मौजूद तितली के आकार की एक छोटी ग्रंथि होती है, जो शरीर के मेटाबॉलिज्म, ग्रोथ और दिमाग के विकास को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाती है। जब यह ग्रंथि सही तरीके से काम नहीं करती, तो बच्चों की शारीरिक और मानसिक वृद्धि प्रभावित होने लगती है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों में सबसे आम समस्या हाइपोथायरॉइडिज्म होती है। इसमें थायरॉइड ग्रंथि जरूरत से कम हार्मोन बनाती है। यह बीमारी कई बार आनुवंशिक भी हो सकती है और परिवार में पहले से मौजूद रहती है।

    बच्चों में दिख सकते हैं ये लक्षण
    अगर बच्चे में नीचे दिए गए लक्षण लगातार दिखाई दें, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी हो जाता है—
    तेजी से वजन बढ़ना
    हमेशा थकान और सुस्ती रहना
    कब्ज की समस्या
    ठंड ज्यादा लगना
    बालों का रूखा होना
    पढ़ाई में ध्यान कम लगना
    लंबाई की ग्रोथ धीमी होना
    गले में सूजन दिखाई देना
    डॉक्टरों का कहना है कि केवल मोटापा हमेशा थायरॉइड का संकेत नहीं होता, लेकिन मोटापे के साथ सुस्ती और ग्रोथ रुकने लगे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    जन्म से भी हो सकती है बीमारी
    बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार कुछ बच्चों में जन्म के समय से ही थायरॉइड की समस्या हो सकती है, जिसे जन्मजात हाइपोथायरॉइडिज्म कहा जाता है। वहीं कई बच्चों में यह समस्या धीरे-धीरे बड़े होने के साथ विकसित होती है।

    हाइपरथायरॉइडिज्म भी बन सकता है परेशानी
    कुछ मामलों में बच्चों में हाइपरथायरॉइडिज्म भी देखने को मिलता है। इसमें थायरॉइड जरूरत से ज्यादा हार्मोन बनाने लगता है। इसके कारण बच्चे का वजन तेजी से कम होने लगता है और घबराहट, चिड़चिड़ापन, दस्त और आंखों का उभरना जैसी समस्याएं सामने आती हैं।

    समय पर इलाज बेहद जरूरी
    विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते जांच और इलाज शुरू कर दिया जाए तो थायरॉइड को आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। इसकी पहचान साधारण ब्लड टेस्ट से हो जाती है। अधिकतर मामलों में बच्चों को रोजाना दवा देकर हार्मोन संतुलित रखे जाते हैं।

    अगर इलाज में देरी हो जाए तो बच्चे की शारीरिक वृद्धि, मानसिक विकास और पढ़ाई पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसलिए बच्चों के वजन और व्यवहार में अचानक बदलाव को सामान्य मानकर अनदेखा नहीं करना चाहिए।

  • चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास

    चिलचिलाती धूप में शरीर को ठंडा रखने का आसान तरीका, घर पर बनाएं फालसा छाछ और पाएं ताजगी का अहसास


    नई दिल्ली ।भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बीच शरीर को ठंडा और हाइड्रेट रखना एक बड़ी जरूरत बन जाता है। ऐसे समय में लोग आमतौर पर छाछ, लस्सी और नींबू पानी का सहारा लेते हैं, लेकिन रोज एक ही स्वाद से मन ऊब जाता है। इसी वजह से फालसा छाछ एक बेहतरीन और पारंपरिक विकल्प के रूप में सामने आती है, जो न केवल शरीर को ठंडक देती है बल्कि अपने खट्टे-मीठे स्वाद से ताजगी का नया अनुभव भी कराती है। यह पेय गर्मियों में शरीर को अंदर से ठंडा रखने और लू के असर को कम करने में मददगार माना जाता है।

    फालसा एक मौसमी फल है जिसमें प्राकृतिक रूप से ठंडक देने वाले गुण पाए जाते हैं। जब इसे दही और मसालों के साथ मिलाकर छाछ के रूप में तैयार किया जाता है तो यह एक सुपर समर ड्रिंक बन जाता है। यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के साथ-साथ ऊर्जा भी प्रदान करता है और पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने में मदद करता है।

    फालसा छाछ बनाने के लिए सबसे पहले ताजे फालसा को अच्छी तरह धोकर एक बर्तन में लिया जाता है। इसमें हल्की मात्रा में चीनी या मिश्री और थोड़ा पानी मिलाकर इसे हाथों से अच्छे से मसल लिया जाता है ताकि इसका गूदा अलग हो जाए और स्वाद पूरी तरह निकल आए। इसके बाद इस मिश्रण को छानकर बीज अलग कर दिए जाते हैं और एक गाढ़ा खट्टा-मीठा जूस तैयार किया जाता है।

    इसके बाद एक बड़े बर्तन में ताजा दही लिया जाता है और उसमें ठंडा पानी मिलाया जाता है। इसी में तैयार फालसा जूस डाला जाता है। स्वाद को संतुलित बनाने के लिए काला नमक और भुना जीरा पाउडर मिलाया जाता है। इन सभी चीजों को अच्छे से मथकर तब तक फेंटा जाता है जब तक मिश्रण हल्का झागदार और स्मूद न हो जाए। यह प्रक्रिया छाछ को और अधिक स्वादिष्ट और पाचक बना देती है।

    तैयार छाछ को सर्व करने के लिए गिलास में बर्फ के टुकड़े डाले जाते हैं और ऊपर से यह ठंडी फालसा छाछ डाली जाती है। इसे पुदीने की पत्तियों और भुने जीरे से सजाकर परोसा जाता है। इसका स्वाद न केवल शरीर को ठंडक देता है बल्कि मानसिक रूप से भी ताजगी का अहसास कराता है।

    गर्मी के मौसम में यह पेय शरीर के लिए कई तरह से फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद दही के प्रोबायोटिक्स पाचन को सुधारते हैं और पेट की जलन को कम करते हैं। वहीं फालसा में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन C शरीर को लू और तेज धूप के असर से बचाने में मदद करते हैं। यह ड्रिंक शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखकर डिहाइड्रेशन से भी राहत दिलाती है।

    इस तरह फालसा छाछ सिर्फ एक पेय नहीं बल्कि गर्मियों में शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने का एक आसान और स्वादिष्ट उपाय है, जिसे घर पर आसानी से तैयार किया जा सकता है और रोजाना सेवन किया जा सकता है।

  • चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी

    चंदन फेस पैक: त्वचा को निखारने का प्राकृतिक उपाय, लेकिन सावधानी जरूरी


    नई दिल्ली। चंदन यानी सैंडलवुड आयुर्वेद में सदियों से त्वचा की देखभाल के लिए उपयोग किया जाता रहा है। इसे फेस पैक या लेप के रूप में लगाने से त्वचा को ठंडक, निखार और कई प्रकार की समस्याओं से राहत मिलती है। खासकर गर्मी के मौसम में चंदन फेस केयर लेप को बेहद फायदेमंद माना जाता है।

    चंदन फेस पैक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह त्वचा की जलन और सनबर्न को शांत करता है। गर्मी या धूप के कारण होने वाली त्वचा की लालिमा को यह कम करने में मदद करता है। इसके नियमित उपयोग से त्वचा का रंग साफ और चमकदार दिखाई देने लगता है। साथ ही यह मुंहासों (acne) और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक माना जाता है।

    चंदन में मौजूद प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण त्वचा को संक्रमण से बचाते हैं। यह अतिरिक्त तेल (excess oil) को नियंत्रित करने में भी मदद करता है, जिससे ऑयली स्किन वालों के लिए यह विशेष रूप से उपयोगी माना जाता है। कई लोग इसे बेसन, हल्दी या गुलाब जल के साथ मिलाकर फेस पैक के रूप में उपयोग करते हैं।

    हालांकि, चंदन फेस पैक के कुछ नुकसान भी हो सकते हैं। संवेदनशील त्वचा (sensitive skin) वाले लोगों को इससे एलर्जी, खुजली या रैशेज की समस्या हो सकती है। यदि चंदन की गुणवत्ता शुद्ध न हो या उसमें केमिकल मिले हों, तो यह त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है।

    कुछ लोगों में इसका अधिक उपयोग त्वचा को अत्यधिक सूखा (dry) बना सकता है। इसलिए इसे हफ्ते में 2–3 बार से ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उपयोग से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी माना जाता है ताकि किसी भी तरह की एलर्जी से बचा जा सके।

    विशेषज्ञों के अनुसार, सैंडलवुड का सही और सीमित उपयोग त्वचा के लिए लाभकारी है, लेकिन गलत तरीके से या अधिक मात्रा में उपयोग नुकसानदेह भी हो सकता है। इसलिए हमेशा प्राकृतिक और शुद्ध चंदन पाउडर का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो चंदन फेस केयर लेप एक पारंपरिक और प्रभावी स्किन केयर उपाय है, जो सही तरीके से इस्तेमाल करने पर त्वचा को प्राकृतिक निखार और ठंडक प्रदान करता है। लेकिन सावधानी और संतुलन इसके उपयोग की सबसे बड़ी जरूरत है।

  • बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन

    बाजार के स्क्रब छोड़िए, ये फल देंगे नैचुरल ग्लो और स्मूद स्किन


    नई दिल्ली। त्वचा की देखभाल में नेचुरल उपाय हमेशा से प्रभावी माने गए हैं। खासकर फल (fruits) से बने स्क्रब स्किन को बिना नुकसान पहुंचाए साफ और चमकदार बनाने में मदद करते हैं। बाजार के केमिकल स्क्रब की तुलना में प्राकृतिक फलों से बने स्क्रब ज्यादा सुरक्षित और लाभकारी माने जाते हैं।

    त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार पपीता एक बेहतरीन प्राकृतिक स्क्रब माना जाता है। इसमें मौजूद एंजाइम (papain) त्वचा की मृत कोशिकाओं (dead skin cells) को हटाने में मदद करता है और स्किन को मुलायम बनाता है। यह मुंहासों और दाग-धब्बों को कम करने में भी सहायक होता है।

    स्ट्रॉबेरी भी स्क्रब के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसमें प्राकृतिक एसिड और एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो त्वचा को साफ करने के साथ-साथ पोर्स को टाइट करते हैं। यह स्किन को फ्रेश और ग्लोइंग बनाती है।

    केला भी एक अच्छा विकल्प है, खासकर ड्राय स्किन वालों के लिए। इसमें मौजूद विटामिन और मिनरल्स त्वचा को नमी प्रदान करते हैं और स्किन को सॉफ्ट बनाते हैं। इसे शहद के साथ मिलाकर स्क्रब की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

    संतरे का छिलका या उसका पाउडर भी एक प्राकृतिक स्क्रब की तरह काम करता है। यह त्वचा से अतिरिक्त तेल हटाने और टैनिंग कम करने में मदद करता है। इसमें विटामिन C होता है जो स्किन को ब्राइट बनाने में सहायक होता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि फलों से बने स्क्रब का नियमित लेकिन सीमित उपयोग ही करना चाहिए। हफ्ते में 2 बार स्क्रब करना पर्याप्त होता है। अधिक स्क्रबिंग से त्वचा में जलन या सूखापन हो सकता है।

    हालांकि, हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए किसी भी नए फल से बने स्क्रब को इस्तेमाल करने से पहले पैच टेस्ट करना जरूरी है। अगर त्वचा संवेदनशील है तो हल्के और सौम्य फलों का ही उपयोग करना चाहिए।

    कुल मिलाकर कहा जाए तो पपीता, स्ट्रॉबेरी, केला और संतरा जैसे फल त्वचा के लिए प्राकृतिक और सुरक्षित स्क्रब के रूप में बेहतरीन विकल्प हैं। सही तरीके से इस्तेमाल करने पर ये स्किन को साफ, स्वस्थ और प्राकृतिक रूप से चमकदार बना सकते हैं।

  • मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय

    मटके का पानी रहेगा घंटों बर्फ जैसा ठंडा: गर्मी में अपनाएं ये देसी और आसान उपाय


    नई दिल्ली । भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच ठंडा पानी हर किसी की जरूरत बन चुका है। कई इलाकों में तापमान 45 डिग्री के पार पहुंचने के कारण घरों में रखा पानी भी जल्दी गर्म हो जाता है। ऐसे में फ्रिज का पानी भले ही तुरंत राहत देता है, लेकिन सेहत की दृष्टि से लोग अब फिर से मटके के पानी की ओर लौटने लगे हैं। मटके का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा और ताजगी देने वाला माना जाता है, लेकिन अत्यधिक गर्मी में यह भी जल्दी सामान्य तापमान पकड़ लेता है। इसी समस्या के समाधान के लिए पुराने समय से अपनाए जा रहे देसी तरीके एक बार फिर चर्चा में हैं।

    जानकारों के अनुसार, मटके के पानी को लंबे समय तक ठंडा रखने का सबसे सरल तरीका उसे सूती कपड़े से ढंकना है। कपड़े को गीला करके मटके के चारों ओर लपेटने से उसमें मौजूद नमी धीरे-धीरे वाष्पित होती रहती है, जिससे मटके की सतह ठंडी बनी रहती है और अंदर का पानी भी अपेक्षाकृत ठंडा रहता है। कई जगहों पर लोग सूती कपड़े की जगह टाट या जूट के बोरे का उपयोग भी करते हैं, जो गर्मी में बेहतर कूलिंग प्रभाव देते हैं।

    इसके अलावा मटके को रखने का स्थान भी पानी की ठंडक पर बड़ा असर डालता है। यदि मटका सीधे धूप या गर्म सतह पर रखा जाए तो पानी तेजी से गर्म हो जाता है। ऐसे में ग्रामीण इलाकों में एक पुराना तरीका अपनाया जाता है, जिसमें मटके को गीली रेत या मिट्टी के बीच रखा जाता है। रेत में मौजूद नमी और ठंडक मटके को बाहर से ठंडा रखती है, जिससे पानी लंबे समय तक ताजा और ठंडा बना रहता है।

    कुछ घरेलू उपायों में नया मटका इस्तेमाल करने से पहले उसमें सेंधा नमक डालकर कुछ समय तक पानी भरकर रखने की परंपरा भी शामिल है। माना जाता है कि इससे मटके की प्राकृतिक ठंडक बनाए रखने की क्षमता बढ़ जाती है। बाद में उस पानी को निकालकर ताजा पानी भरने पर मटका अधिक प्रभावी ढंग से पानी को ठंडा रखता है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि मटके का पानी न केवल प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है बल्कि यह स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर विकल्प है। अत्यधिक ठंडा फ्रिज का पानी कई बार गले और पाचन पर असर डाल सकता है, जबकि मटके का पानी शरीर को संतुलित तरीके से ठंडक प्रदान करता है। इसी कारण अब शहरों में भी लोग पारंपरिक तरीकों की ओर लौटते दिखाई दे रहे हैं और इन देसी जुगाड़ों को फिर से अपनाया जा रहा है, ताकि गर्मी के मौसम में बिना बिजली के भी ठंडे पानी का आनंद लिया जा सके।

  • घर और दफ्तर में बांस का पौधा लगाने से पहले जान लें ये जरूरी नियम, सही डंठल दिला सकते हैं सुख, समृद्धि और तरक्की

    घर और दफ्तर में बांस का पौधा लगाने से पहले जान लें ये जरूरी नियम, सही डंठल दिला सकते हैं सुख, समृद्धि और तरक्की

    नई दिल्ली ।  वास्तु शास्त्र के अनुसार फेंगशुई में भी पेड़-पौधों को विशेष महत्व दिया गया है. फेंगशुई के मुताबिक, कुछ पौधे नकारात्मक ऊर्जा को सोखकर पॉजिटिव एनर्जी का संचार करते हैं. फेंगशुई में बांस के पौधे को बेहद प्रभावशाली माना गया है. कहा जाता है कि अगर इस पौधे को घर या दफ्तर में सही दिशा और स्थान पर लगाया जाए, तो वहां मौजूद तमाम नकारात्मक ऊर्जा अपने आप नष्ट हो जाती है. इसके परिणामस्वरूप जीवन में तरक्की अपने आप होने लगती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि घर या दफ्तर में कितने डंठल वाला बांस का पौधा लगाना शुभ होता है? आइए, इसे फेंगशुई के अनुसार जानते हैं.

    एक डंठल वाला बांस का पौधा

    फेंगशुई के मुताबिक, घर में एक डंठल वाला बांस का पौधा भी लगाना शुभ है. एक डंठल वाला बांस का पौधा घर-परिवार की एकता और विकास के लिए खास होता है. ऐसा बांस का पौधा कार्यों में एकाग्रता और आत्मविश्वास को मजबूत करने में सहायक होता है. ऐसे बांस के पौधे को दफ्तर में लगाने से करियर में तरक्की के रास्ते खुलते हैं.
    दो डंठल वाला बांस का पौधा
    फेंगशुई के अनुसार, दो डंठल वाला बांस का पौधा प्रेम, दांपत्य सुख और साझेदारी का प्रतीक है. इसे बेडरूम में लगाने से शादीशुदा जिंदगी में खुशहाल रहती है. साथ ही पार्टनर के प्रति प्यार और लगाव बढ़ता है.

    तीन डंठल वाला बांस का पौधा

    तीन डंठल वाला बांस का पौधा लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाली का प्रतीक है. इसे घर में रखने से नकारात्मक ऊर्जा अपने आप दूर हो जाती है और घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है.
    5 डंठल वाला बांस का पौधा
    फेंगशुई की मानें तो 5 डंठल वाला बांस का पौधा धन, शक्ति और सफलता का प्रतीक होता है. मान्यतानुसार, इसे घर की उत्तर दिशा में रखने से धन की स्थिति अच्छी होती है. इसके अलावा इसे दफ्तर में लगाने से तरक्की के रास्ते खुलते हैं.

    8 और 10 डंठल वाला बांस का पौधा

    आठ डंठल वाले बांस के पौधे को धन और समृद्धि का प्रतीक माना गया है. वहीं 10 डंठल वाला बैम्बू प्लांट सफलता का प्रतीक होता है. इसलिए इसे घर का दफ्तर में लगाने से तरक्की और खुशहाली में चार चांद लग जाते हैं.
    किस दिशा में लगाएं बांस का पौधा?
    फेंगशुई के मुताबिक, डंठल वाले बांस के पौधे को ड्राइंग या बेडरूम में लगाया जा सकता है. इसे पूरब दिशा की ओर लगाना अत्यंत शुभ माना गया है. घर की इस दिशा में बांस का पौधा लगाने से परिवार में आपसी सामंजस्य और प्यार बना रहता है. दांपत्य जीवन में खुशहाली के लिए इस पौधे को कांच के जार में लगा उस पर लाल रंग का रिबन जरूर बांधना चाहिए. ऐसा करने से शादीशुदा जिंदगी खुशहाल रहती है. जबकि, इसे दफ्तर के पूर्व या दक्षिण दिशा में लगाना चाहिए. ऐसा करने से आर्थिक उन्नति होती है.