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  • बच्चे की नींद के लिए आयुर्वेदिक उपाय: रात में सोने की परेशानी दूर करें

    बच्चे की नींद के लिए आयुर्वेदिक उपाय: रात में सोने की परेशानी दूर करें


    नई दिल्ली। छोटे बच्चों के लिए रात में अच्छी नींद आना कभी-कभी चुनौती बन जाता है। दिनभर खेल-कूद और खाने के बाद भी कई बार बच्चे रात को बार-बार डरकर उठ जाते हैं या बेचैनी के कारण नींद पूरी नहीं ले पाते। इससे न केवल बच्चा चिड़चिड़ा महसूस करता है, बल्कि पूरा परिवार भी थक जाता है।

    आयुर्वेदिक दृष्टिकोण
    आयुर्वेद में इसे तंत्रिका तंत्र और स्नायु से जोड़कर देखा गया है। नींद की समस्या को संतुलित करने के लिए आयुर्वेद बच्चों को रात को सोने से पहले थोड़े से घी में गुड़ मिलाकर देने की सलाह देता है। घी तंत्रिका तंत्र को शांत करता है और वात को संतुलित रखता है, जिससे शरीर रिलैक्स महसूस करता है। गुड़ हल्की ऊर्जा और स्थिरता देता है। इस उपाय से बच्चा गहरी नींद में सोता है और बार-बार नींद टूटने की समस्या कम होती है।

    वात और तंत्रिका तंत्र पर असर
    रात के समय शरीर में वात की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे नींद प्रभावित होती है। घी वात को नियंत्रित रखकर तंत्रिका तंत्र को शांत करता है। इसके अलावा, इससे नींद लाने वाले हॉर्मोन भी सही तरीके से बनते हैं। बच्चे की दिनचर्या में संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।

    स्क्रीन टाइम और वातावरण का ध्यान
    अत्यधिक मोबाइल या टीवी का उपयोग मस्तिष्क को सक्रिय बनाए रखता है और नींद में बाधा डालता है। इसलिए रात के समय बच्चों को मोबाइल से दूर रखें और सोने का समय शांत वातावरण में बिताएं। कमरे का हल्का अंधेरा और शांति नींद को बेहतर बनाने में मदद करता है।

    कब डॉक्टर से सलाह लें
    अगर बच्चा रात में अत्यधिक डरता है या आयुर्वेदिक उपाय से आराम नहीं मिलता, तो तुरंत बाल विशेषज्ञ से सलाह लें। कभी-कभी नींद की परेशानी किसी और स्वास्थ्य समस्या की वजह से भी हो सकती है।

  • गर्मियों में सहजन का सेवन: पाचन सुधारने और इम्युनिटी बढ़ाने का प्राकृतिक तरीका

    गर्मियों में सहजन का सेवन: पाचन सुधारने और इम्युनिटी बढ़ाने का प्राकृतिक तरीका


    नई दिल्ली। गर्मी के मौसम में अक्सर पाचन संबंधी परेशानियां, थकान, कमजोरी और वजन बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। ऐसे में आयुर्वेद हमें सहजन (मोरिंगा) खाने की सलाह देता है, जिसे ‘चमत्कारी वरदान’ भी कहा जाता है। इसका कारण यह है कि इसके पत्ते, फूल और फल सभी औषधीय गुणों से भरपूर हैं।

    पोषक तत्वों से भरपूर सहजन
    नेशनल हेल्थ मिशन के अनुसार, सहजन में विटामिन ए, बी, सी, कैरोटीन, आयरन, जिंक, पोटैशियम, मैग्नीशियम और फाइबर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह गर्मियों में शरीर को ठंडक देने, पाचन तंत्र को मजबूत करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है।

    पाचन और वजन नियंत्रण में सहजन की भूमिका
    सहजन में मौजूद फाइबर पेट को साफ रखता है और कब्ज, गैस, अपच जैसी समस्याओं से राहत देता है। भारी भोजन के बाद पाचन बिगड़ने पर सहजन मदद करता है। यह मेटाबॉलिज्म को तेज करता है, जिससे भोजन जल्दी पचता है और शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा नहीं होती। फाइबर की मौजूदगी भूख को नियंत्रित करती है और बार-बार खाने की आदत पर लगाम लगाती है।

    डिटॉक्स और ऊर्जा देने वाला सहजन
    गर्मी में शरीर में पानी और हानिकारक तत्व जमा हो जाते हैं। सहजन प्राकृतिक रूप से डिटॉक्स करता है, सूजन कम करता है और शरीर को हल्का-फुल्का बनाता है। साथ ही यह रक्त में शुगर का स्तर स्थिर रखता है, इसलिए डायबिटीज रोगियों के लिए भी सहजन बेहद फायदेमंद है।

    थकान कम करने और इम्युनिटी बढ़ाने में सहजन
    सहजन में कैल्शियम और विटामिन सी होते हैं, जो गर्मियों में शरीर में ऊर्जा बनाए रखते हैं और कमजोरी दूर करते हैं। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और गर्मियों में बीमारियों से बचाव में मदद करते हैं।

    सेवन के आसान तरीके
    गर्मियों में सहजन को सब्जी, पत्तों का साग, सूप या जूस के रूप में रोजाना खाया जा सकता है। पत्तों को सुखाकर पाउडर बनाकर पानी में मिलाकर पीना भी फायदेमंद है। नियमित सेवन से पाचन मजबूत होता है, वजन नियंत्रण में मदद मिलती है, और शरीर की इम्युनिटी प्राकृतिक तरीके से बढ़ती है।

    गर्मियों में सहजन का सेवन पाचन सुधारने, वजन नियंत्रित रखने, ऊर्जा बनाए रखने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का सबसे प्राकृतिक और आसान तरीका है। यह शरीर को ठंडक देने, डिटॉक्स करने और थकान कम करने में भी मदद करता है, जिससे गर्मियों का मौसम स्वस्थ और हल्का-फुल्का महसूस होता है।

  • क्या आपका बच्चा कम खाता है और जल्दी थक जाता है? हो सकती है ये गंभीर समस्या, जानें समाधान

    क्या आपका बच्चा कम खाता है और जल्दी थक जाता है? हो सकती है ये गंभीर समस्या, जानें समाधान


    नई दिल्ली बच्चे बार-बार अपने मोनिका से काम करते हैं कभी खाना कम खाते हैं, तो कभी खेलने में इतना मगन हो जाते हैं कि पढ़ाई-लिखाई की ओर ध्यान नहीं देते। लेकिन अगर आपका बच्चा लगातार कम खा रहा है, जल्दी थक जाता है, चैलेंज में दिलचस्पी नहीं है और पढ़ाई में भी दिलचस्पी नहीं है, तो इसे बच्चे में न लें।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ये लक्षण यानि की कमी की ओर इशारा कर सकते हैं। बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होता है। समय की पहचान और सही पोषण से इसे आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों के भोजन में विभिन्नता होनी चाहिए। अगर बच्चे को लगातार थकान महसूस हो रही है या भूख नहीं लग रही है तो डॉक्टर से जांच जरूर करवाएं। रक्त परीक्षण से पुष्टि हो सकती है। डॉक्टर की सलाह से आयरन की रेटिंग भी ली जा सकती है।

    राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अनुसार, बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है, लेकिन सही समय पर ध्यान और डिजिटल आहार से इसे आसानी से सीखा जा सकता है। इनमें मुख्य रूप से आयरन की कमी होती है। इससे बच्चे की खून और खांसी की स्थिति नहीं होती है, जिससे थकान, कमजोरी और भूख न लगना जैसे लक्षण होते हैं। अगर समय पर इलाज न किया जाए तो बच्चे का विकास रुक सकता है और पढ़ाई-लिखाई पर भी बुरा असर पड़ता है।

    ऐसी परिस्थिति में डरना नहीं बल्कि लक्षण के साथ समाधान पर काम करना चाहिए। बच्चों में बीमारी के मुख्य लक्षण बताएं तो उन्हें जल्दी थकान महसूस होना, कम भूख लगना, पीला चेहरा और कमजोरी, ध्यान केंद्रित न हो पाना और बार-बार बीमार पड़ना है।

    परिवार से बचाव के लिए हरी पत्तीदार शैली जैसे पालक, मेथी, मसालों का सागा आदि बच्चों को दैनिक अवकाश दें। ये आयरन का अच्छा स्रोत हैं। मूंग, चना, राजमा जैसी दालहन और चावल के अनाज और प्रोटीन की प्रचुरता पाई जाती है। इनकी थाली में शामिल करें। विटामिन सी से युक्त फल जैसे सेंट्रा, इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, लेम्बोर्गिनी आदि भी शामिल करें। विटामिन सी आयरन के अवशोषण में मदद मिलती है। बच्चों के आहार में दूध, दही और पनीर शामिल करें। स्रोत जैसे गुड़ आदि भी परियोजनाओं से अन्य बचाव में सहायक हैं।

  • विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस 2026: समझ और स्वीकार्यता की ओर बढ़ते कदम

    विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस 2026: समझ और स्वीकार्यता की ओर बढ़ते कदम


    नई दिल्ली। हर साल 2 अप्रैल को दुनिया भर में विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ एक तारीख नहीं है, बल्कि समाज को संदेश और समावेशी बनाने की याद है। यह हमें सिखाया जाता है कि हमारे आसपास मौजूद ऑटिज़्म से जुड़े लोगों को किसी सहानुभूति के पात्र नहीं, बल्कि समान अधिकार और सम्मान का दर्जा दिया गया है। उनकी दुनिया को देखना और इशारों का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन समाज में विविधता और समृद्ध जगह है।

    ऑटिज़्म क्या है? बीमारी नहीं, एक अलग विचार का उपाय

    ऑटिज्म, जिसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) कहा जाता है, कोई भी बीमारी “ठीक” नहीं होती। यह दिमाग का काम करने का एक अलग तरीका है, जिसे न्यूरोडायवर्सिटी कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि हर व्यक्ति की सोच, व्यवहार और अनुभव का तरीका अलग होता है। ऑटिज्म से जुड़े लोग अक्सर नी को गहराई से महसूस करते हैं और अपनी खामियां भी महसूस करते हैं।

    पहचान का संकेत: हर बच्चा अलग

    ऑटिज़्म के संकेत आम तौर पर बचपन में दिखाई देते हैं। जैसे—आंखों में कम संपर्क बनाना, बातचीत में देरी, बार-बार एक ही गतिविधि करना या अभिनव में बदलाव से जुड़ना। कुछ बच्चों को तेज रोशनी, आवाज या स्पर्श से भी परेशानी हो सकती है। लेकिन यह शर्त जरूरी है कि हर ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्ति अलग होता है—किसी में लक्षण ज्यादा, तो किसी में कम हो सकते हैं।

    गलतफहमियां तोड़ना जरूरी है

    समाज में आज भी ऑटिज़्म को लेकर कई मिथक और गलत धारणाएँ हैं। इसे अक्सर कमजोरी या समझ की कमी माना जाता है, जबकि यह केवल एक अलग तरह की क्षमता है। सही जानकारी और जागरूकता से ही इन गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है। जब लोग समझेंगे, तभी वे सही व्यवहार भी कर पाएंगे।

    जड़ता: बदलाव की पहली सीढ़ी

    ऑटिज़्म से जुड़े लोगों को बदलने की कोशिश करने के बजाय उन्हें वैसे ही स्वीकार करना ज़रूरी है जैसे वे हैं। विशेष रूप से बच्चों के मामले में, उनके व्यवहार को जज करने के बजाय लोड करना चाहिए। परिवार, स्कूल और समाज का सहयोग उनके पास मौजूद है और उन्हें आगे बढ़ने में मदद करता है।

    सम्मान और समान अवसर का अधिकार

    हर व्यक्ति की तरह ऑटिज्म से जुड़े लोगों को भी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जीवन में बेरोजगारी का अधिकार मिलना चाहिए। आज कई संस्थान और स्कूल समावेशी शिक्षा (इनक्लूसिव एजुकेशन) की दिशा में काम कर रहे हैं, ताकि ऐसे बच्चों को बुनियादी ढांचे में शामिल किया जा सके।

    चिकित्सक और सहायता से कुशल जीवन

    अगर ऑटिज्म के प्रोटोटाइप की पहचान प्रारंभिक अवस्था में हो जाए, तो सही दिशा-निर्देश और थेरेपी से लेकर बच्चों के विकास में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी और बिहेवियरल थेरेपी जैसे उपाय काफी प्रभावशाली साबित होते हैं। इसके साथ ही परिवार का सहयोग और सकारात्मक माहौल भी बेहद जरूरी है।

    समावेशी समाज की ओर कदम

    आज के दौर में जागरूकता से पहले कहीं भी ज्यादा फायदा है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बाकी है। हमें ऐसा समाज क्यों बनाना होगा, जहां हर व्यक्ति-चाहे वह किसी भी तरह से अलग न हो-खुद को सुरक्षित, स्थापित और प्रतिष्ठित महसूस करे।

  • कोशिकाओं का ‘ब्लैक बॉक्स’ तैयार, अब सेल बताएंगे अपनी पूरी कहानी

    कोशिकाओं का ‘ब्लैक बॉक्स’ तैयार, अब सेल बताएंगे अपनी पूरी कहानी


    नई दिल्ली विज्ञान की दुनिया में एक ऐसी खोज सामने आई है, जो भविष्य की चिकित्सा और जीव विज्ञान को पूरी तरह बदल सकती है। जनवरी 2026 में प्रतिष्ठित जर्नल Science में प्रकाशित एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने कोशिकाओं के लिए एक तरह का “ब्लैक बॉक्स” विकसित किया है। इस नई तकनीक को “टाइम वोल्ट” नाम दिया गया है, जिसे Yu-Kai Shao और उनकी टीम ने तैयार किया है। यह तकनीक अब कोशिकाओं के भीतर होने वाली गतिविधियों को न केवल रिकॉर्ड कर सकती है, बल्कि उन्हें भविष्य में पढ़ना भी संभव बनाती है।

    क्या है ‘टाइम वोल्ट’? समझिए आसान भाषा में

    जैसे किसी हवाई जहाज का ब्लैक बॉक्स उड़ान के दौरान हर घटना को रिकॉर्ड करता है, वैसे ही टाइम वोल्ट कोशिका के अंदर जीन की गतिविधियों का पूरा रिकॉर्ड रखता है। अब तक वैज्ञानिक केवल यह देख पाते थे कि किसी कोशिका में इस समय क्या हो रहा है—यानी एक “तस्वीर” मिलती थी। लेकिन यह समझना मुश्किल था कि कुछ समय पहले उस कोशिका में क्या बदलाव हुए थे, जो बाद में किसी बीमारी या बदलाव का कारण बने। टाइम वोल्ट इस कमी को दूर करता है और कोशिका का “अतीत” भी दिखाता है।

    एमआरएनए की रिकॉर्डिंग: असली गेमचेंजर

    यह तकनीक कोशिका के अंदर मौजूद मैसेंजर आरएनए यानी mRNA को कैप्चर करके सुरक्षित रखती है। mRNA वह संदेश होता है, जो बताता है कि कौन-सा जीन कब और कैसे काम कर रहा है। टाइम वोल्ट इन संदेशों को खास “वोल्ट पार्टिकल्स” में स्टोर कर देता है, जिससे यह डेटा कई दिनों तक सुरक्षित रहता है। बाद में वैज्ञानिक इन रिकॉर्ड्स को पढ़कर यह समझ सकते हैं कि पहले कौन-से जीन सक्रिय थे और उनका आगे क्या असर पड़ा।

    कैंसर रिसर्च में बड़ा ब्रेकथ्रू

    इस तकनीक का इस्तेमाल खासतौर पर Lung Cancer पर किया गया, जहां चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। वैज्ञानिकों ने पाया कि कुछ कैंसर कोशिकाएं दवा दिए जाने से पहले ही ऐसी स्थिति में होती हैं, जिससे वे बाद में दवाओं के असर से बच जाती हैं। इन कोशिकाओं को “पर्सिस्टर सेल्स” कहा जाता है। टाइम वोल्ट की मदद से उन जीन की पहचान संभव हुई, जो पहले नजर नहीं आते थे लेकिन दवा के प्रति प्रतिरोध (ड्रग रेजिस्टेंस) विकसित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

    इलाज की रणनीति बदलने की क्षमता

    जब इन छिपे हुए जीन को टारगेट किया गया, तो दवा से बचने वाली कोशिकाओं की संख्या में कमी देखी गई। इसका मतलब है कि भविष्य में डॉक्टर पहले से यह अनुमान लगा सकेंगे कि कौन-सी कोशिकाएं दवा से बच सकती हैं और उसी के अनुसार इलाज की योजना बना सकेंगे। यह कैंसर जैसी जटिल बीमारियों के इलाज में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

    जीव विज्ञान में नई दिशा

    टाइम वोल्ट तकनीक ने जीव विज्ञान में एक नई खिड़की खोल दी है। अब कोशिकाएं केवल वर्तमान की जानकारी ही नहीं देंगी, बल्कि अपना पूरा “इतिहास” भी सहेजकर रखेंगी। इससे वैज्ञानिक यह समझ पाएंगे कि किसी बीमारी की शुरुआत कैसे हुई और उसे रोकने के बेहतर तरीके क्या हो सकते हैं।

    भविष्य के लिए उम्मीद

    यह खोज न केवल कैंसर बल्कि अन्य बीमारियों के अध्ययन में भी क्रांतिकारी साबित हो सकती है। आने वाले समय में यह तकनीक पर्सनलाइज्ड मेडिसिन (व्यक्तिगत उपचार) को और सटीक बना सकती

  • बालों में डैंड्रफ? जानें कारण और बचाव के आसान तरीके

    बालों में डैंड्रफ? जानें कारण और बचाव के आसान तरीके

    नई दिल्ली। अगर आपको बार-बार डैंड्रफ का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारण काफी आप परेशान हो गई हैं तब हम आपके लिए कुछ खास टिप्स लेकर आए हैं जिसे अपनाकर आप इसे ठीक कर सकती हैं। इसके साथ ही आपको कुछ बातों पर विशेष ध्यान रखना होगा उसे बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना होगा वरना यह काफी बढ़ सकता है।कई लोग इससे छुटकारा पाने के लिए महंगे शैंपू, हेयर प्रोडक्ट्स और घरेलू नुस्खों का सहारा लेते हैं जबकि आपको इससे जुड़ी सारी बातों पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।

    क्यों बढ़ता है डैंड्रफ
    बार-बार होने वाला डैंड्रफ शरीर या स्कैल्प में किसी अंदरूनी गड़बड़ी का संकेत भी हो सकता है। अगर आपको ऐसी बार-बार समस्या हो रही है तब आपको इस पर बहुत अच्छे से विचार करना चाहिए इसे बिल्कुल भी नजर अंदाज नहीं करना चाहिए। वरना आगे जाकर यह समस्या काफी ज्यादा आपको परेशान कर सकती है।

    स्कैल्प का ड्राई होना
    डैंड्रफ का सबसे कॉमन कारण होता है जब आपका स्कैल्प सूखा होता है। जब सिर की स्किन में नमी की कमी हो जाती है, तो ऊपरी परत सूखकर झड़ने लगती है और सफेद परत के रूप में दिखाई देती है।

    स्कैल्प में ऑयल और गंदगी का जमा होना
    अगर बालों की रेगुलर सफाई नहीं की जाती, तो स्कैल्प पर तेल, धूल और गंदगी जमा होने लगती है। यह स्थिति बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए अनुकूल माहौल बनाती है, जिससे डैंड्रफ तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए आपको इन सब चीजों पर ध्यान रखना चाहिए।

    गलत हेयर प्रोडक्ट्स
    ऐसे शैंपू या हेयर प्रोडक्ट्स जो आपके स्कैल्प के अनुकूल नहीं होते, वे समस्या को और बढ़ा सकते हैं। ज्यादा केमिकल वाले प्रोडक्ट्स स्कैल्प को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए आपको बार-बार अपने शैंपू को नहीं बदलना चाहिए। इन सबका अगर आप अच्छे से ध्यान रखेंगी तो आपको काफी फायदा होगा।

  • घर पर ही पार्लर जैसा Pedicure, पैर होंगे मुलायम और चमकदार

    घर पर ही पार्लर जैसा Pedicure, पैर होंगे मुलायम और चमकदार


    नई दिल्ली  आज के समय में पार्लर जाना सबसे बड़ा खर्च समझ में आता है। पार्लर जाने का मतलब आप घर से बाहर निकलो फिर धूप हो या ठंड। फिर पार्लर में बैठकर काफी टाइम बिताओ और ऊपर से पार्लर के इतने सारे खर्चे होते हैं कि आपको काफी ज्यादा सेविंग करना पड़ता है तब जाकर वह सारी चीजें हो पाती है। लेकिन अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। अगर आप अपने पैरों को खूबसूरत बनाना चाहती हैं और टैनिंग को दूर करना चाहती हैं। तो किसी भी वीकेंड पर आप घर पर पार्लर जैसा पेडिक्योर कर सकती हैं।

    बस करें ये काम
    महिलाएं अपने पैरों को खूबसूरत बनाने के लिए पार्लर में जाकर पेडिक्योर करवाती हैं। इसका जेब खर्च पर भी असर दिखने लगता है। अगर आप भी घर पर पेडिक्योर करने की सोच रही हैं। तो चलिए इसके बारे में सारी जानकारी आपको देते हैं।

    इस प्रकार पैरों को बनाए खूबसूरत
    घर पर पेडिक्योर करने के लिए एक टब में हल्का गर्म पानी लें।जब तक पानी गर्म हो, तब तक अगर आपके पैरों में नेलपेंट लगी है, तो इसको रिमूव कर दें।फिर हल्के गुनगुने पानी में थोड़ा बेकिंग सोडा, शैंपू, आधा चम्मच नमक और थोड़ा सा नींबू का रस मिक्स करें।इसमें एप्पल साइडर विनेगर भी मिला लें।फिर पैरों को 30 मिनट तक पानी में रखें।अब हल्के हाथों से पैरों की मसाज करें।स्क्रब का इस्तेमाल करके पैरों की मसाज कर सकती हैं। मसाज के दौरान नाखून, एड़ी और तलवों की सफाई करें।अच्छे से सफाई के बाद अपने पैरों को दूसरे टब में रखें औऱ साफ पानी से पैरों को धो लें।

    पैरों को साफ पानी से धो लें और इनको साफ कपड़े से पोंछकर सुखा लें।आप चाहें तो किसी खास तेल की मदद से पैरों की मसाज भी कर सकती हैं।इसके बाद नाखूनों को शेप में काटकर नेलपेंट लगाएं।नेलपेंट लगने के बाद आप पैरों पर अच्छी फुट क्रीम या लोशन लगा सकती हैं।

  • समर सुपरफूड करेला: शुगर कंट्रोल से लेकर डाइजेशन तक फायदेमंद

    समर सुपरफूड करेला: शुगर कंट्रोल से लेकर डाइजेशन तक फायदेमंद


    नई दिल्ली गर्मी के मौसम में ही शरीर में कई तरह की समस्याएं बढ़ती हैं जैसे पाचन खराब होना, ब्लड शुगर की कमी, थकान और कमजोरी। ऐसे में करेला (करेला) एक प्राकृतिक औषधि की तरह काम करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, करेले का नियमित सेवन न केवल गर्मी से राहत देता है, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत भी बनाता है।

    पोषक तत्व सेपूर्ती

    आयुष मंत्रालय के अनुसार, करेला विटामिन ए, बी और सी, बीटा कैरोटीन, आयरन, ड्रैगन, पोटेशियम, मैग्नीशियम और मैग्नीज जैसे कई आवश्यक पोषक तत्वों से भरपूर है। ये तत्व शरीर को ऊर्जा प्रदान के साथ-साथ इमामत सिस्टम को भी मजबूत बनाते हैं।

    शराब में मिलावट

    डायबिटीज के इलाज के लिए करेला को बेहद फायदेमंद माना जाता है। इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। गर्मियों में जब शुगर लेवल बढ़ने का खतरा सबसे ज्यादा होता है, तब करेले का सब्जी या सब्जी नियमित रूप से लेना आश्चर्यजनक साबित होता है।

    पाचन तंत्र को बनाए रखें

    गर्मी में अपच, गैस, कब्ज और पेट दर्द जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। ऐसे में करेला पाचन क्रिया को सुधारने और पेट को साफ रखने में मदद मिलती है। यह पेट दर्द से तुरंत राहत पाने के लिए जाना जाता है।

    शरीर को ठंडा और ठंडा रखा जाता है

    करेला प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है, जो शरीर की अतिरिक्त गर्मी को बाहर निकालने में मदद करता है। यह डिहाइड्रेशन से प्रमाणित है और समुद्र तट पर शरीर को ठंडक प्रदान करता है।

    प्रतिरक्षा और वजन नियंत्रण

    करेले में मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। साथ ही यह खून को साफ करता है और मेटाबॉलिज्म को तेज गति से वजन को नियंत्रित में रखने में भी मदद करता है।

    सेवन का सही तरीका

    गर्मियों में सुबह खाली पेट करेले का प्लांट सबसे ज्यादा खतरनाक माना जाता है। इसके अलावा आप करेले की सब्जी, सूखा या अन्य प्रकार के करेले भी अपने आहार में शामिल कर सकते हैं. हालाँकि, अगर आपको किसी तरह की एलर्जी या अन्य स्वास्थ्य समस्या है, तो इसका सेवन पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

  • गर्मी में खाली पेट बाहर निकलना पड़ सकता है भारी, जानें जरूरी सावधानियां

    गर्मी में खाली पेट बाहर निकलना पड़ सकता है भारी, जानें जरूरी सावधानियां


    नई दिल्ली घर में नवजात शिशु का जन्म खुशियों की सौगात लेकर आता है, लेकिन इस खुशी के पीछे कई बार ऐसी बुद्धिमान छिपी होती हैं, जिन पर अक्सर ध्यान नहीं जाता। आमतौर पर ‘पोस्टपार्टम डिप्रेशन’ को सिर्फ मां से जुड़कर देखा जाता है, लेकिन अब एक नई स्टडी ने इस धारणा को बदल दिया है। JAMA Network Open में प्रकाशित शोध के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद पिता भी मानसिक तनाव और डिप्रेशन का सामना करते हैं। यह समस्या जन्म के तुरंत बाद नहीं, बल्कि 9 से 12 महीने के भीतर ज्यादा गंभीर रूप ले सकती है, जब गर्भधारण का दबाव बढ़ जाता है।

    स्वीडन में किए गए इस बड़े अध्ययन में करीब 10 लाख पिताओं के डेटा का विश्लेषण किया गया। शोध में सामने आया कि शुरुआती महीनों में पिता लगातार सामान्य नजर आते हैं, क्योंकि उनका पूरा ध्यान मां और बच्चे की देखभाल पर होता है। वे अपनी थकान, मानसिक दबाव और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता है, काम और परिवार के बीच संतुलन बनाना कठिन हो जाता है। नींद की कमी, आर्थिक जिम्मेदारियां और बदलावों का दबाव धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यही कारण है कि बच्चे के जन्म के लगभग एक साल के भीतर डिप्रेशन और तनाव का खतरा 30 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ जाता है।

    शोध में यह भी सामने आया कि पुरुष अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त नहीं कर समझता। सामाजिक दबाव और ‘मजबूत बने रहने’ की सोच के कारण वे अपनी मानसिक स्थिति के बारे में बात करने से बचते हैं। यही कारण है कि समस्या गंभीर होने तक पहचान में नहीं आती। दिव्यांगों का मानना ​​है कि यदि समय रहते इस स्थिति को समझा जाए और सही समर्थन दिया जाए, तो पिता भी इस दौर से आसानी से निकल सकते हैं। परिवार और समाज को चाहिए कि वे पिता की भावनाओं को समझें और उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाए रखने में सहयोग करें।

    दिव्यांगों के अनुसार, पिता को अपनी दिनचर्या में संतुलन बनाए रखना चाहिए, पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करनी चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर सहकर्मियों या प्रोफेशनल मदद लेने से बढ़ना नहीं चाहिए। साथ ही, पार्टनर के साथ खुलकर बातचीत करना और दिव्यांगों को साझा करना भी इस समस्या को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। यह अध्ययन इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि नवजात के जन्म के बाद मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल सिर्फ मां ही नहीं, बल्कि पिता के लिए भी उतनी ही जरूरी है।

  • नवजात के बाद पिता भी होते हैं डिप्रेशन का शिकार, स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

    नवजात के बाद पिता भी होते हैं डिप्रेशन का शिकार, स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा


    नई दिल्ली नए बच्चे का जन्म आमतौर पर खुशी का मौका माना जाता है, लेकिन अब एक नई स्टडी ने इस धारणा के पीछे छिपी एक अहम सच्चाई उजागर की है। JAMA Network Open में प्रकाशित शोध के अनुसार, पिता भी बच्चे के जन्म के बाद डिप्रेशन और मानसिक तनाव का सामना करते हैं, खासकर कुछ महीनों बाद।

    क्या कहती है स्टडी?
    स्वीडन में करीब 10 लाख पिताओं पर रिसर्च की गई बच्चे के जन्म के तुरंत बाद नहीं, बल्कि 9–12 महीने बाद जोखिम बढ़ता हैइस दौरान डिप्रेशन और तनाव का खतरा 30% से ज्यादा बढ़ जाता है

    क्यों बढ़ता है पिता में डिप्रेशन?

    शोध के मुताबिक, शुरुआती समय में पिता अपनी भावनाओं को दबाकर परिवार की जिम्मेदारियों में लग जाते हैं। लेकिन समय के साथ:

    नींद की कमी बनी रहती है
    काम और परिवार का संतुलन मुश्किल हो जाता है
    आर्थिक दबाव बढ़ता है
    रिश्तों में बदलाव आता है

    इन सबका असर धीरे-धीरे मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है और डिप्रेशन या स्ट्रेस डिसऑर्डर के रूप में सामने आता है।  बड़ी समस्या: पुरुष मदद नहीं मांगते स्टडी में यह भी सामने आया कि: पिता अक्सर अपनी भावनाओं को छिपाते हैं सामाजिक दबाव के कारण खुलकर बात नहीं करते इसी वजह से समस्या गंभीर होने तक पहचान में नहीं आती

    क्या करना चाहिए?
    पिता भी अपनी मानसिक स्थिति को सीरियस लें
    पार्टनर और परिवार से खुलकर बात करें
    जरूरत पड़े तो काउंसलिंग या प्रोफेशनल मदद लें
    परिवार को भी चाहिए कि वे पिता की भावनाओं को समझें और सपोर्ट करें