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  • वरदराज पेरुमल मंदिर की अनोखी जलवास परंपरा, कांचीपुरम में आस्था और इतिहास का संगम..

    वरदराज पेरुमल मंदिर की अनोखी जलवास परंपरा, कांचीपुरम में आस्था और इतिहास का संगम..


    नई दिल्ली:
    तमिलनाडु का प्राचीन और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर कांचीपुरम सदियों से धार्मिक आस्था और परंपराओं का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। इसी पवित्र नगर में स्थित वरदराज पेरुमल मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर माना जाता है। द्रविड़ शैली की भव्य वास्तुकला से सुसज्जित यह मंदिर न केवल अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए बल्कि अपनी अनूठी परंपराओं के कारण भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान रखता है।

    स्थानीय परंपराओं के अनुसार यह मंदिर भगवान विष्णु के वरदराज पेरुमल स्वरूप की आराधना का केंद्र है, जहां वे अपनी दिव्य शक्ति और कृपा के प्रतीक के रूप में पूजे जाते हैं। मंदिर परिसर में विशाल गोपुरम, विस्तृत प्रांगण और बारीक नक्काशी इसकी प्राचीन कला और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं। माना जाता है कि यह स्थान सदियों से भक्तों की आस्था और विश्वास का केंद्र रहा है और यहां आने वाले श्रद्धालु इसे अत्यंत पवित्र मानते हैं।

    इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में से एक भगवान विष्णु की प्रतिमा से जुड़ी जलवास की प्रथा है। मान्यता के अनुसार प्रतिमा को एक पवित्र जल कुंड में लंबे समय तक रखा जाता है और विशेष अवसरों पर ही भक्तों को इसके दर्शन प्राप्त होते हैं। इस परंपरा को लेकर श्रद्धालुओं में गहरी आस्था है और इसे दिव्य संरक्षण और आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि प्रतिमा वर्षों तक जल में रहने के बावजूद अपनी संरचना में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं दिखाती, जिससे इसकी पवित्रता और भी विशेष मानी जाती है।

    मंदिर से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध मान्यता गर्भगृह में स्थित दो छिपकलियों से संबंधित है, जिन्हें लेकर श्रद्धालुओं में विशेष विश्वास देखा जाता है। परंपरा के अनुसार इन छिपकलियों के दर्शन को शुभ माना जाता है और इसे जीवन में समृद्धि और बाधाओं के निवारण से जोड़कर देखा जाता है। यह मान्यता मंदिर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

    जलवास परंपरा के कारण भगवान विष्णु की प्रतिमा को लंबे अंतराल के बाद ही बाहर निकाला जाता है और इसी कारण भक्तों को इसके दर्शन का अवसर भी विशेष समय पर ही प्राप्त होता है। वर्तमान परंपरा के अनुसार अगली बार प्रतिमा के दर्शन कई वर्षों बाद होने की संभावना बताई जाती है, जिससे यह अवसर श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत प्रतीक्षित और दुर्लभ माना जाता है।

    वरदराज पेरुमल मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि आस्था, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक भी है, जहां हर परंपरा और विश्वास गहरी आध्यात्मिक भावना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।

  • कॉरपोरेट ड्रेस कोड विवाद: धार्मिक प्रतीकों पर अलग-अलग नियमों से बढ़ी बहस

    कॉरपोरेट ड्रेस कोड विवाद: धार्मिक प्रतीकों पर अलग-अलग नियमों से बढ़ी बहस


    नई दिल्ली:
    देश की एक प्रमुख आईवियर रिटेल कंपनी की कर्मचारी ड्रेस पॉलिसी को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है, जिसमें धार्मिक प्रतीकों से जुड़े नियमों पर तीखी बहस शुरू हो गई है। मामला तब सामने आया जब कंपनी के कथित स्टाइल गाइड में कुछ ऐसे दिशा निर्देशों का उल्लेख सामने आया, जिनमें विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े प्रतीकों और पहनावे को लेकर अलग अलग तरह के प्रावधान बताए गए हैं। इस नीति को लेकर सोशल मीडिया पर विरोध और समर्थन दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    विवाद के केंद्र में यह दावा है कि कंपनी की नीति में हिजाब पहनने की अनुमति दी गई है, हालांकि उसके लिए रंग और डिजाइन से जुड़ी कुछ शर्तें निर्धारित हैं। इसी तरह पगड़ी पहनने की अनुमति का भी उल्लेख है, लेकिन उसमें भी एक समान रंग को लेकर दिशा निर्देश दिए गए हैं। दूसरी ओर तिलक, बिंदी और कलावा जैसे धार्मिक प्रतीकों के उपयोग पर रोक जैसी बात सामने आने के बाद विवाद और अधिक गहरा गया है।

    इस मुद्दे को लेकर फिल्म निर्माता और सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पंडित ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस नीति की आलोचना करते हुए इसे धार्मिक भावनाओं के प्रति असंतुलित बताया और लोगों से कंपनी के बहिष्कार की अपील की है। उनके अनुसार यह नीति एक तरफ कुछ धार्मिक पहचान को अनुमति देती है, जबकि दूसरी तरफ कुछ परंपरागत प्रतीकों को प्रतिबंधित करती है, जो समानता के सिद्धांत पर सवाल खड़े करता है।

    उनकी टिप्पणी के बाद यह मामला तेजी से चर्चा में आ गया और सोशल मीडिया पर दो अलग अलग विचार सामने आने लगे। एक वर्ग का मानना है कि कॉरपोरेट संस्थानों में ड्रेस कोड का उद्देश्य पेशेवर माहौल बनाए रखना होता है, इसलिए कुछ समान नियम जरूरी होते हैं। वहीं दूसरा वर्ग इसे धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा मुद्दा मान रहा है और इसे अनुचित प्रतिबंध के रूप में देख रहा है।

    इस विवाद में यह भी चर्चा का विषय बन गया है कि कॉरपोरेट संस्थानों में व्यक्तिगत धार्मिक प्रतीकों और पेशेवर ड्रेस कोड के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कई लोगों का मानना है कि कंपनियों को ऐसा नियम बनाना चाहिए जो सभी कर्मचारियों के लिए समान हो और किसी विशेष समुदाय को लेकर अलग अलग व्याख्या की स्थिति न बने।

     इस पूरे मामले पर संबंधित कंपनी की ओर से कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है और इस पर बहस सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुकी है।
  • छत्तीसगढ़ औद्योगिक हादसा: वेदांता प्लांट में धमाके के बाद 14 मौतों ने बढ़ाई देशभर में चिंता

    छत्तीसगढ़ औद्योगिक हादसा: वेदांता प्लांट में धमाके के बाद 14 मौतों ने बढ़ाई देशभर में चिंता

    नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के शक्ति जिले में स्थित एक औद्योगिक संयंत्र में हुए भीषण हादसे ने देश की बड़ी खनन और धातु कंपनी वेदांता ग्रुप की औद्योगिक सुरक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 14 अप्रैल को सिंघानातराई गांव स्थित प्लांट में उच्च दबाव वाले बॉयलर की नली फटने से अचानक अत्यंत गर्म भाप का तेज रिसाव हुआ, जिससे मौके पर अफरा तफरी मच गई। लगभग 600 डिग्री सेल्सियस तक पहुंची इस भाप की चपेट में आने से कई कर्मचारियों की जान चली गई और कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार मृतकों की संख्या कम से कम 14 बताई जा रही है, जबकि घायलों का विभिन्न अस्पतालों में उपचार जारी है।

    इस दुर्घटना ने एक बार फिर औद्योगिक इकाइयों में सुरक्षा मानकों की वास्तविक स्थिति पर व्यापक बहस छेड़ दी है।घटना के बाद स्थानीय प्रशासन और राज्य सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जांच के आदेश जारी किए हैं। जिला प्रशासन ने अलग से मजिस्ट्रेट जांच भी शुरू कर दी है ताकि दुर्घटना के कारणों की विस्तृत और निष्पक्ष जांच की जा सके।

    राज्य के मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है और घायलों को भी राहत राशि प्रदान करने की बात कही है। वहीं केंद्र स्तर पर भी इस घटना को लेकर गहरा शोक व्यक्त किया गया और पीड़ित परिवारों को राहत देने के लिए सहायता राशि की घोषणा की गई है।

    यह पहली बार नहीं है जब वेदांता ग्रुप का नाम औद्योगिक सुरक्षा को लेकर चर्चा में आया हो।

    कंपनी के विभिन्न खनन, धातु, तेल और ऊर्जा क्षेत्रों में कार्यस्थल सुरक्षा को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। पिछले वर्षों में समूह के अलग अलग परिचालनों में कार्यस्थल पर होने वाली मौतों के मामलों में उतार चढ़ाव देखा गया है, जो औद्योगिक सुरक्षा उपायों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। कई रिपोर्टों में यह भी संकेत मिला है कि बड़े औद्योगिक समूहों में सुरक्षा मानकों के पालन में असमानता देखने को मिलती रही है।

    वित्त वर्ष 2025 की वार्षिक रिपोर्ट में भी कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़ी शिकायतों में उल्लेखनीय वृद्धि का संकेत दिया गया है। कर्मचारियों और श्रमिकों द्वारा दर्ज की गई स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी शिकायतों की संख्या में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग दोगुना इजाफा देखा गया, जो कार्यस्थल के माहौल और सुरक्षा व्यवस्थाओं की गंभीर समीक्षा की आवश्यकता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारी औद्योगिक इकाइयों में तकनीकी निगरानी और नियमित सुरक्षा ऑडिट को और अधिक सख्त किए बिना ऐसे हादसों को रोकना कठिन होगा।

    इस घटना के बाद औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिक संगठनों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि बड़े उद्योगों में उत्पादन के दबाव के साथ साथ सुरक्षा मानकों का पालन उतना ही जरूरी है, लेकिन कई बार इसे पर्याप्त प्राथमिकता नहीं दी जाती। इसी कारण गंभीर दुर्घटनाएं सामने आती हैं, जिनका सीधा असर श्रमिकों के जीवन और उनके परिवारों पर पड़ता है।

    प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि जांच पूरी पारदर्शिता के साथ की जाएगी और यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल प्लांट में कामकाज को लेकर भी समीक्षा की जा रही है और सुरक्षा प्रोटोकॉल को तत्काल प्रभाव से मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं।

    Keywords: industrial safety, Vedanta Group, boiler explosion, workplace accident, Chhattisgarh plant

    Description:

    छत्तीसगढ़ के शक्ति जिले में हुए भीषण औद्योगिक हादसे ने वेदांता ग्रुप की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना की जांच जारी है और प्रशासन ने राहत व मुआवजे की घोषणा की है।

  • 33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई

    33 साल बाद मिला न्याय: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पूर्व वायुसेना अधिकारी को मिलेगी सम्मानजनक विदाई


    नई दिल्ली। तीन दशक पहले नौकरी से बर्खास्त किए गए भारतीय वायुसेना (IAF) के एक पूर्व अधिकारी को आखिरकार न्याय मिल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने 1993 की बर्खास्तगी को अवैध और अनुचित ठहराते हुए न सिर्फ उसे रद्द किया, बल्कि अधिकारी को सम्मानजनक विदाई देने का ऐतिहासिक आदेश भी दिया है।

    अदालत ने कहा कि किसी भी सैनिक के लिए उसका सम्मान सबसे बड़ी पूंजी होता है, और उसे बहाल करना न्याय का अहम हिस्सा है।

    कोर्ट का बड़ा फैसला
    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने पूर्व स्क्वाड्रन लीडर आर. सूद की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि वायुसेना की कार्रवाई कानूनी रूप से कमजोर और त्रुटिपूर्ण थी।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

    वायुसेना प्रमुख द्वारा तय तारीख पर उन्हें औपचारिक विदाई दी जाए
    विदाई उसी सम्मान के साथ हो, जिसके वे नियमित सेवानिवृत्ति पर हकदार होते

    क्या था मामला?
    यह पूरा विवाद 1987 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप था कि एक नागरिक ड्राइवर को रेगिस्तान में छोड़ दिया गया था, जहां बाद में उसके अवशेष मिले। इसी मामले में कार्रवाई करते हुए 22 सितंबर 1993 को वायुसेना अधिनियम की धारा 19 के तहत आर. सूद को सेवा से हटा दिया गया था।

    सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?

    पहले ही मिल चुकी थी क्लीन चिट
    एक आपराधिक अदालत ने सबूतों के अभाव में आर. सूद को पहले ही बरी कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मुकदमा चलाने लायक सबूत ही नहीं थे, तो विभागीय कार्रवाई का आधार भी कमजोर हो जाता है।
    सजा में भेदभाव पर सख्त टिप्पणी
    कोर्ट ने पाया कि इस मामले में वरिष्ठ अधिकारी को मामूली सजा दी गई, जबकि आदेश का पालन करने वाले आर. सूद को बर्खास्त कर दिया गया—जो स्पष्ट रूप से असमानता है।

    वरिष्ठ के आदेश का पालन बना सजा का कारण
    अदालत ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी को सिर्फ इसलिए कठोर सजा नहीं दी जा सकती कि उसने अपने वरिष्ठ के आदेशों का पालन किया।

    सम्मान की वापसी को प्राथमिकता
    चूंकि आर. सूद अब सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर चुके हैं, उन्हें सेवा में बहाल करना संभव नहीं है। लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया कि उन्हें सभी लाभ ऐसे दिए जाएं मानो वे कभी बर्खास्त ही नहीं हुए थे।

    सबसे अहम बात—अदालत ने आर्थिक मुआवजे से ज्यादा “सम्मान की बहाली” को प्राथमिकता दी। यह फैसला बताता है कि एक सैनिक के लिए उसकी प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पहचान होती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल बाद फिर से स्थापित कर दिया।

  • बिहार की कमान संभालते ही बड़ी परीक्षा: सम्राट चौधरी के सामने विकास की रफ्तार बढ़ाने की चुनौती

    बिहार की कमान संभालते ही बड़ी परीक्षा: सम्राट चौधरी के सामने विकास की रफ्तार बढ़ाने की चुनौती


    पटना। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार की राजनीति में नया अध्याय शुरू हो गया है। लंबे समय तक राज्य की कमान संभालने वाले नीतीश कुमार ने विकास की मजबूत नींव रखी, अब उस पर “विकसित बिहार” की इमारत खड़ी करने की जिम्मेदारी नई सरकार पर आ गई है।

    नई सरकार ने “न्याय के साथ विकास” की अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए “बदलता बिहार, बढ़ता बिहार” का नारा दिया है। लेकिन असली चुनौती अब इस बदलाव की गति को तेज करने की है।

    विकास की रफ्तार बढ़ाना सबसे बड़ी चुनौती
    नीतीश कुमार के कार्यकाल में बिहार की औसत विकास दर 10% से अधिक रही। हालांकि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विकसित राज्यों की श्रेणी में आने के लिए यह रफ्तार 20% के आसपास होनी चाहिए। ऐसे में सम्राट चौधरी के सामने कम समय में दोगुनी गति से विकास करने की बड़ी चुनौती है।

    शपथ लेने के तुरंत बाद ही उन्होंने अधिकारियों को साफ संकेत दे दिया कि काम की रफ्तार बढ़ानी होगी और लटकाने की प्रवृत्ति खत्म करनी होगी।

    डबल इंजन सरकार—ताकत या उम्मीद?
    राज्य में नई सरकार की एक बड़ी ताकत केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन है। “डबल इंजन” मॉडल के चलते केंद्र से सहयोग और संसाधनों की उम्मीद बढ़ जाती है।

    हालांकि, विशेष राज्य का दर्जा अभी तक नहीं मिल पाया है, लेकिन विशेष पैकेज के जरिए कुछ आर्थिक मदद जरूर मिली है।

    आर्थिक संसाधन बढ़ाना बड़ी चुनौती
    बिहार की सबसे बड़ी कमजोरी सीमित आंतरिक आय है। राज्य का आंतरिक राजस्व करीब 75 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा है, जिसे तेजी से बढ़ाने की जरूरत है।

    केंद्र से करों और अनुदान में बड़ी हिस्सेदारी मिलती है
    बजट में कर्ज का भी प्रावधान है
    लेकिन अपनी आय अभी भी जरूरत के मुकाबले कम है

    ऐसे में सरकार को नए राजस्व स्रोत तलाशने और कठोर आर्थिक फैसले लेने पड़ सकते हैं।

    रोजगार, पलायन और गरीबी—तीन बड़ी चिंताएं
    बिहार की जमीनी चुनौतियां अब भी गंभीर हैं:

    बेरोजगारी
    कम प्रति व्यक्ति आय
    बड़े पैमाने पर पलायन

    जातीय सर्वेक्षण में लाखों परिवार गरीब पाए गए हैं। सरकार ने उन्हें आर्थिक सहायता देने और महिलाओं को रोजगार से जोड़ने की योजनाएं शुरू की हैं, लेकिन इन पर भारी खर्च भी आएगा।

    अवसर भी कम नहीं
    नई सरकार के पास चुनौतियों के साथ अवसर भी हैं:

    प्रशासनिक ढांचा पहले से व्यवस्थित
    सुशासन की छवि
    केंद्र का समर्थन
    और नेतृत्व में नई ऊर्जा

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी सम्राट चौधरी की कार्यक्षमता और जमीनी अनुभव पर भरोसा जताया है।

    बिहार आज एक अहम मोड़ पर खड़ा है। मजबूत नींव तैयार है, लेकिन ऊंची उड़ान के लिए तेज फैसले, बेहतर संसाधन प्रबंधन और रोजगार सृजन पर फोकस जरूरी होगा।

    अब देखना यह है कि सम्राट चौधरी इन चुनौतियों को अवसर में बदलकर “विकसित बिहार” के लक्ष्य को कितनी तेजी से हासिल कर पाते हैं।

  • महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर संसद में आज टकराव के आसार

    महिला आरक्षण और परिसीमन बिल को लेकर संसद में आज टकराव के आसार

    नई दिल्ली। महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को गुरुवार को संसद में पेश किया गया, जिसके साथ ही सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन गई। माना जा रहा है कि 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाला यह विशेष सत्र राजनीतिक रूप से बेहद गरम रहेगा। विपक्ष ने बिल का समर्थन तो किया है, लेकिन परिसीमन से जुड़े प्रावधानों पर कड़ा विरोध जताया है।

    नंबर गेम में NDA के लिए चुनौती
    संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जबकि NDA के पास फिलहाल यह संख्या पूरी नहीं है। ऐसे में सरकार को विपक्षी दलों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। लोकसभा में सीटों की मौजूदा संख्या बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव भी इस विधेयक का हिस्सा है।

    पीएम मोदी ने बताया नारी सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद की विशेष बैठक को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि देश नारी सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। उन्होंने इसे माताओं और बहनों के सम्मान से जोड़ते हुए कहा कि यह राष्ट्र के सम्मान का विषय है।

    तमिलनाडु CM स्टालिन का विरोध
    तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने केंद्र सरकार के परिसीमन प्रस्ताव को ‘काला कानून’ करार देते हुए कड़ा विरोध जताया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कदम दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है और वहां की जनता के अधिकारों को नुकसान पहुंचा सकता है।

    2011 जनगणना पर आधारित होगा परिसीमन
    सूत्रों के अनुसार, परिसीमन प्रक्रिया 2011 की जनगणना के आधार पर की जा रही है क्योंकि 2026 की जनगणना के परिणाम देर से आने की संभावना है। सरकार का उद्देश्य 2029 तक महिला आरक्षण को लागू करना है, जिसके लिए समयबद्ध प्रक्रिया जरूरी बताई जा रही है।

    परिसीमन आयोग के गठन की भी तैयारी
    सरकार ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026’ के साथ परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश संशोधन विधेयक भी पेश कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इन्हें सदन में रखा। प्रस्ताव के अनुसार परिसीमन आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट के पूर्व या वर्तमान न्यायाधीश की अध्यक्षता में किया जाएगा।

    विरोध के मूड में विपक्ष
    INDIA गठबंधन ने महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए परिसीमन प्रस्ताव का विरोध करने का फैसला लिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस प्रक्रिया के जरिए राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करना चाहती है। इसे लेकर गठबंधन के भीतर रणनीति तैयार की जा रही है और संसद में तीखा विरोध देखने की संभावना है।

  • लखनऊ अग्निकांड: 1200 झोपड़ियां राख, 6 बच्चे अब भी लापता, CM योगी ने दिए जांच और राहत के निर्देश

    लखनऊ अग्निकांड: 1200 झोपड़ियां राख, 6 बच्चे अब भी लापता, CM योगी ने दिए जांच और राहत के निर्देश

    लखनऊ। विकासनगर सेक्टर-12 में रिंग रोड किनारे स्थित अवैध बस्ती में बुधवार शाम भीषण आग लग गई। कुछ ही समय में आग ने विकराल रूप लेते हुए करीब 1200 झोपड़ियों को अपनी चपेट में ले लिया। झोपड़ियों में रखे लगभग 100 गैस सिलिंडर फटने से पूरे इलाके में जोरदार धमाके हुए और भगदड़ मच गई।

    घटना के बाद 22 दमकल गाड़ियों ने देर रात तक आग बुझाने का प्रयास किया। इस दौरान आग की तीव्रता इतनी अधिक थी कि इलाके में दहशत फैल गई। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार लगभग 50 मवेशियों के जलने की आशंका जताई जा रही है, हालांकि प्रशासन ने इसकी पुष्टि नहीं की है।

    सूचना में देरी का आरोप, आग ने मिनटों में लिया विकराल रूप
    स्थानीय लोगों का आरोप है कि आग लगने के बाद समय पर पुलिस और दमकल विभाग को सूचना दी गई, लेकिन मदद देर से पहुंची। इस बीच आग तेजी से फैलती गई और एक के बाद एक झोपड़ियां जलने लगीं। बताया गया कि आग एक झोपड़ी से शुरू हुई और कुछ ही देर में पूरी बस्ती को अपनी चपेट में ले लिया। लोगों ने पुलिस कंट्रोल रूम पर कॉल लगाने में भी देरी और तकनीकी दिक्कतों की बात कही है।

    भगदड़ में 6 बच्चे लापता, सर्च ऑपरेशन जारी
    भीषण हादसे के दौरान मची अफरा-तफरी में दो परिवारों के छह बच्चे लापता हो गए हैं, जिनमें एक परिवार के चार और दूसरे के दो बच्चे शामिल हैं। पुलिस और प्रशासन की टीमें देर रात तक बच्चों की तलाश में जुटी रहीं और आसपास के इलाकों में सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

    पथराव और हंगामा, प्लॉट मालिक पर आग लगाने के आरोप
    घटना के बाद गुस्साए लोगों ने प्लॉट मालिक के घर का घेराव कर हंगामा किया और उस पर आग लगवाने का आरोप लगाया। इस दौरान कुछ लोगों ने पथराव भी किया, जिसे रोकने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। आरोप है कि प्लॉट मालिक कुछ दिन से झोपड़ियां हटाने के लिए दबाव बना रहा था।

    वीडियो बनाने और ट्रैफिक जाम से बिगड़े हालात
    घटना स्थल पर भीड़ द्वारा वीडियो बनाने और रास्ता बाधित करने से राहत कार्य प्रभावित हुआ। दमकल की गाड़ियां भी जाम में फंस गईं, जिसके बाद पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। इसी दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया, जिसमें सिविल डिफेंस के वार्डन समेत कई लोग घायल हो गए। इसके कारण इलाके में करीब दो किलोमीटर लंबा जाम लग गया और यातायात पूरी तरह बाधित हो गया।

    आग पर काबू, राहत और पुनर्वास की तैयारी
    दमकल विभाग ने रात करीब 10 बजे तक आग पर आंशिक नियंत्रण पा लिया। प्रशासन ने आसपास के लगभग 30 घरों को खाली कराया और कई सिलिंडर सुरक्षित बाहर निकाले। घटना की गंभीरता को देखते हुए उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए गए हैं। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और पीड़ितों के लिए भोजन व आवास की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

  • जांच खत्म करे अमेरिका…. भारत ने अतिरिक्त उत्पादन के आरोपों को किया खारिज

    जांच खत्म करे अमेरिका…. भारत ने अतिरिक्त उत्पादन के आरोपों को किया खारिज


    नई दिल्ली।
    भारत (India) ने अमेरिका (America) के व्यापार प्रतिनिधित (यूएसटीआर-USTR) की ओर से लगाए गए आरोपों को सख्ती के साथ खारिज किया। उन्होंने भारत समेत कई देशों पर अतिरिक्त उत्पादन (Excess Production) और औद्योगिक असंतुलन (Industrial Imbalance) का आरोप लगाया था। भारत ने कहा कि जांच शुरू करने वाले नोटिस में इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस कारण नहीं दिया गया है।

    भारत ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह यह निष्कर्ष निकाले कि भारत ने कोई नकारात्मक काम नहीं किया है और उसके खिलाफ जो जांच चल रही है, उसे समाप्त कर दे। यह बात भारत सरकार ने अपने जवाब में यूएसटीआर को बताई।

    11 मार्च को अमेरिका ने अपने व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ जांच शुरू करने की घोषणा की। इनमें भारत, चीन, जापान और यूरोपीय संघ शामिल हैं। इस जांच का उद्देश्य उन ‘अनुचित विदेशी नीतियों या तरीकों’ को देखना और उन पर कार्रवाई करना है, जिनसे अमेरिकी विनिर्माण उद्योग को नुकसान होता है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने जांच शुरू करने की घोषणा की। यह जांच 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301(बी) के तहत की गई है। इस जांच में अलग-अलग देशों की ‘नीतियों, कार्यों और तरीकों’ की जांच की जाएगी। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि क्या उन देशों में उद्योगों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता है और विनिर्माण क्षेत्र में असंतुलन है।


    जांच के दायर में कौन-कौन देश?

    इस जांच के दायरे में आने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं- बांग्लादेश, कंबोडिया, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, इंडोनेशिया, जापान, कोरिया, मलयेशिया, मेक्सिको, नॉर्वे, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, ताइवान, थाईलैंड और वियतनाम।


    अमेरिकी जांच पर भारत ने क्या कहा?

    अमेरिका के जांच नोटिस के जवाब में भारत सरकार ने कहा कि वह इस नोटिस में लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह और सख्ती से खारिज करती है। भारत ने कहा कि यह जांच नोटिस सिर्फ बड़े आर्थिक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें भारत सरकार की किसी खास नीति या काम का नाम नहीं बताया गया है, जिसे गलत या भेदभावपूर्ण कहा जा सके या जो अमेरिका के व्यापार को नुकसान पहुंचाता हो, जैसा कि कानून की धारा 301(b) में जरूरी है।

    भारत ने कहा है कि नोटिस में इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस कारण या शुरुआती सबूत नहीं दिए गए हैं। यह दावा कि भारत के बड़े उद्योगों में ‘जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता’ है और इससे अमेरिका के साथ व्यापार में अधिक लाभ (ट्रेड सरप्लस) होता है, उसके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है।

    भारत ने कहा कि यह जांच 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 और 302 के नियमों के अनुसार सही तरीके से शुरू नहीं की गई है। इसलिए भारत ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से अनुरोध किया है कि वह भारत के पक्ष में फैसला दे, जांच को खत्म करे और इसे तुरंत बंद कर दे।

    भारत ने आगे कहा है कि चूंकि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू हो चुकी है, इसलिए किसी भी व्यापारिक चिंता को इसी बातचीत के जरिए हल किया जाना चाहिए। भारत ने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दों का समाधान एकतरफा कदमों से नहीं, बल्कि आपसी बातचीत के ढांचे के भीतर होना चाहिए।

  • सबरीमाता मंदिर में महिलाओं की एंट्री मामले में SC ने कहा- आप किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते

    सबरीमाता मंदिर में महिलाओं की एंट्री मामले में SC ने कहा- आप किसी धर्म को खोखला नहीं कर सकते


    नई दिल्ली।
    सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के 9 जज की संविधान पीठ ने बुधवार को कहा कि सामाजिक कल्याण और सुधार के नाम पर किसी धर्म को खोखला नहीं किया जा सकता। संविधान पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी अदालत के लिए लाखों लोगों की आस्था को गलत ठहराना मुश्किल है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (Chief Justice Surya Kant) की अगुवाई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने यह टिप्पणी सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) सहित विभिन्न संप्रदायों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।

    मंदिर का प्रबंधन कर रहे त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) की ओर वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने बहस के चौथे दिन धार्मिक मामलों में जनहित याचिका की स्वीकार्यता के मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि क्या अदालत किसी ऐसे व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर सकता है जो उस धर्म से संबंधित नहीं है, लेकिन उस धर्म की किसी धार्मिक प्रथा पर सवाल उठा रहा हो? इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी अदालत के लिए सबसे मुश्किल काम शायद यह घोषणा करना हो सकता है कि लाखों लोगों की आस्था गलत या भ्रामक है।

    जस्टिस नागरत्ना ने भी इसी तरह की चिंताएं जाहिर की और कहा कि ऐसी जहनित याचिकाओं पर तब तक विचार नहीं करना चाहिए, जब तक कि याचिकाकर्ता का उस मामले से कोई सीधा संबंध न हो। उन्होंने कहा कि ‘सामाजिक सुधार के नाम पर किसी भी धर्म के मूल स्वरूप को बदला नहीं जा सकता।

    9 जजों की पीठ कर रही सुनवाई
    वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि 9 जजों की इस संविधान पीठ को इस मामले की पेचीदगियों को सुलझाना होगा, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें आवश्यकता के सिद्धांत को इस मामले में हावी नहीं होने देना चाहिए। टीडीबी की ओर से संविधान पीठ को तर्क दिया कि संवैधानिक सुरक्षा केवल जरूरी धार्मिक प्रथाओं तक ही सीमित नहीं रख सकते, और यह तय करना अदालतों का काम नहीं है कि कोई धार्मिक प्रथा ‘जरूरी’ है या नहीं।

    वरिष्ठ अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि संविधान पीठ को यह भी बताया गया कि किसी समुदाय की मान्यताओं और प्रथाओं का मूल्यांकन उस समुदाय की अपनी मान्यताओं के आधार पर करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अदालत समुदाय की मान्यता स्वीकार करने के लिए बाध्य है, और उस मान्यता पर फैसला सुनाना अदालत का काम नहीं है।

    सिंघवी ने पीठ से कहा कि आप किसी ‘खिलौने की दुकान’ या किसी रेस्टोरेंट से नहीं निपट रहे हैं। आप एक ऐसे देवता से निपट रहे हैं जो शाश्वत ब्रह्मचारी हैं, जो गृहस्थ आश्रम के सभी रूपों से दूर रहते हैं। इसलिए, यह तर्क दिया जा सकता है कि 11 साल क्यों नहीं, 49 साल क्यों नहीं।

    अनुच्छेद में ‘सामाजिक सुधार’ शब्द का इस्तेमाल क्यों?
    जस्टिस सुंदरेश ने सवाल किया कि अनुच्छेद 25(2)(बी) में ‘सामाजिक सुधार’ वाक्यांश का इस्तेमाल क्यों किया गया, जबकि अनुच्छेद 25 की शुरुआत में ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इसके जवाब में वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि ऐसा शायद कुछ ऐसी प्रथाओं से निपटने के लिए किया गया हो, जिन्हें किसी भी निष्पक्ष मापदंड पर सही नहीं ठहराया जा सकता।

    नैतिकता के आधार पर कानून रद्द नहीं कर सकते
    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि कानून को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर रद्द नहीं कर सकते। इसे संविधान के भाग-3 का उल्लंघन करने के आधार पर या विधायी अक्षमता के आधार पर रद्द कर सकते हैं। अधिवक्ता सिंघवी ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता जैसा कोई भी सिद्धांत एक बाहरी मानक लेकर आता है, जिसे संभालना बहुत खतरनाक हो जाता है।

    संवैधानिक नैतिकता के खतरे को संभाल नहीं सकते
    सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि संवैधानिक नैतिकता का खतरा इसे आंकने के उन मानकों से है, जिन्हें संभाला नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी तरह से व्यक्तिपरकता और व्यक्तिगत राय की जरूरत होती है। इस पर सिंघवी ने कहा कि यह एक बेकाबू घोड़ा है, एक डायनासोर है, जिस पर मेरे लॉर्ड्स (जजों) सवारी नहीं कर सकते।

  • अनिल अंबानी पर ED का शिकंजा, RHFL–RCFL लोन घोटाले में दो पूर्व अधिकारी गिरफ्तार

    अनिल अंबानी पर ED का शिकंजा, RHFL–RCFL लोन घोटाले में दो पूर्व अधिकारी गिरफ्तार

    नई दिल्ली । प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अनिल अंबानी से जुड़े मामलों में कार्रवाई तेज करते हुए रिलायंस समूह के दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों अमिताभ झुनझुनवाला और अमित बापना को गिरफ्तार किया है। ये दोनों लंबे समय से अनिल अंबानी के करीबी सहयोगी माने जाते हैं।

    लोन धोखाधड़ी मामले में मनी लॉन्ड्रिंग जांच
    यह कार्रवाई रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड (RHFL) और रिलायंस कमर्शियल फाइनेंस लिमिटेड (RCFL) से जुड़े कथित लोन धोखाधड़ी और धनशोधन मामले में की गई है। एजेंसी का आरोप है कि फर्जी या मुखौटा कंपनियों के जरिए बैंक ऋण का दुरुपयोग किया गया।

    अमिताभ झुनझुनवाला हिरासत में
    अधिकारियों के अनुसार, पूछताछ के बाद अमिताभ झुनझुनवाला को धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत हिरासत में लिया गया। इसके बाद उन्हें अदालत में पेश कर आगे की विस्तृत पूछताछ के लिए रिमांड की मांग की गई। बता दें कि झुनझुनवाला मार्च 2003 से सितंबर 2019 तक रिलायंस कैपिटल लिमिटेड के निदेशक रहे हैं, जो RHFL और RCFL की होल्डिंग कंपनी है। जांच एजेंसियां इस अवधि में हुए वित्तीय लेनदेन और फैसलों की भी पड़ताल कर रही हैं।

    इससे पहले CBI ने भी अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशंस लिमिटेड (RCom) के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आरोप है कि फर्जी वित्तीय प्रस्तुतियों और फंड हेराफेरी के जरिए LIC को करीब 3,750 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया गया। जांच में फोरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट को आधार बनाया गया है।