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  • सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: याचिकाकर्ताओं और वकीलों को न्यायपालिका को बदनाम न करने की चेतावनी

    सुप्रीम कोर्ट का सख्त संदेश: याचिकाकर्ताओं और वकीलों को न्यायपालिका को बदनाम न करने की चेतावनी


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने शुक्रवार को एक अर्जी पर नाराजगी जताते हुए याचिकाकर्ता (Petitioner)को फटकार लगाई और एक लाख रुपये का जुर्माना भी ठोक दिया। यह याचिका अल्पसंख्यक स्कूलों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों (Provisions)के तहत छूट देने के सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की याचिका दायर करके न्यायपालिका को बदनाम न करें।

    जस्टिस बीवी नागरत्ना और आर महादेवन की पीठ यूनाइटेड वॉयस फॉर एजुकेशन फोरम एनजीओ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में कहा गया था कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को दी गई छूट असंवैधानिक है, क्योंकि यह उन्हें आरटीई दायित्वों से पूरी तरह से छूट देती है। पीठ ने कहा कि अगर वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं तो उन्हें भी दंडित करना होगा। कोर्ट ने जुर्माना लगाते हुए कहा कि सख्त संदेश देना जरूरी है। आप कानून के जानकार और पेशेवर हैं और आप अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर करते हैं? आप कोर्ट के महत्व को समझते नहीं हैं। 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में आरटीई एक्ट को आर्टिकल 30(1) के तहत अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं माना था।

    इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उस याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि ‘म्यूचुअल फंड सही है’ जैसे लोकप्रिय विज्ञापन अभियान निवेशकों को गुमराह करते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ इस साल सितंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट के एक आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें एसोसिएशन ऑफ म्यूचुअल फंड्स इन इंडिया को निवेशक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए दी गई छूट को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

    साथ ही, देश में सभी इमारतों को भूकंप रोधी बनाने और भूकंप की स्थिति से निपटने के लिए समाधान की मांग करने वाली याचिका शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिकाकर्ता ने पीठ को बताया कि पहले यह माना जाता था कि दिल्ली सबसे ज्यादा भूकंप संभावित क्षेत्र है, लेकिन नई रिपोर्ट में पता चला है कि देश का 75 प्रतिशत क्षेत्र भूकंप संभावित है। इस पर जज ने कहा तो क्या सभी लोगों को चांद पर रहने भेज दिया जाए? इस पर याचिकाकर्ता ने कहा कि वह भूकंप से कम नुकसान के उपाय अपनाने की बात लेकर कोर्ट पहुंचे हैं। देश में भूकंप के खतरे को ध्यान में रखते हुए भवन और दूसरे निर्माण होने चाहिए।

    याचिकाकर्ता ने जापान में हाल ही में आए भूकंप का जिक्र किया। उन्होंने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए वहां पर होने वाले विशेष किस्म के भवन निर्माण पर चर्चा करनी चाही, लेकिन पीठ ने उन्हें रोका। कोर्ट ने कहा कि मीडिया में कौन सी रिपोर्ट प्रकाशित हो रही है, उसके आधार पर कोर्ट में सुनवाई नहीं होती। यह विषय नीतिगत है।

  • अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले पर भड़कीं जस्टिस नागरत्ना, याचिकाकर्ता पर लगाया 1 लाख का जुर्माना

    अल्पसंख्यकों से जुड़े मामले पर भड़कीं जस्टिस नागरत्ना, याचिकाकर्ता पर लगाया 1 लाख का जुर्माना


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने शुक्रवार (12 दिसंबर) को उस रिट याचिकाकर्ता(Petitioner) को कड़़ी फटकार लगाई, जिसने अल्पसंख्यक(minority) विद्यालयों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के तहत छूट देने के शीर्ष न्यायालय के पूर्व के आदेश को चुनौती दी थी। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने इस रिट पिटीशन को देश की न्यायपालिका को नीचा दिखाने और उसे ध्वस्त करे की एक कोशिश करार दिया और याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगा दिया।

    जस्टिस नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी की, “आप सुप्रीम कोर्ट के साथ ऐसा नहीं कर सकते। हम गुस्से में हैं। अगर आप ऐसे मामले दायर करना शुरू कर देंगे तो यह इस देश की पूरी न्याय प्रणाली के खिलाफ होगा। आपको अपने मामले की गंभीरता का पता नहीं है। हम खुद को 1 लाख रुपये के जुर्माने तक ही सीमित रख रहे हैं। ऐसे मामले दायर करके इस देश की न्यायपालिका को नीचा न दिखाएं।”

    न्यायपालिका को बदनाम मत कीजिए
    कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि वकील सुप्रीम कोर्ट के अपने ही फैसलों के खिलाफ ऐसी याचिकाएं दायर करने की सलाह कैसे दे रहे हैं? याचिका दायर करने के लिए वकील को फटकार लगाते हुए पीठ ने कहा, ‘‘इस तरह के मामले दायर करके देश की न्यायपालिका को बदनाम मत कीजिए। यहां क्या हो रहा है? क्या वकील इस तरह की सलाह दे रहे हैं? हमें वकीलों को दंडित करना होगा।’’ पीठ ने कहा, “हम केवल एक लाख रुपये का जुर्माना ही लगा रहे हैं।’’

    आप देश की न्यायपालिका को ध्वस्त करना चाहते हैं
    न्यायालय ने कहा, ‘‘आप कानून के जानकार लोग और पेशेवर हैं और आप अनुच्छेद 32 के तहत इस न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर करते हैं? घोर दुरुपयोग। हम संयम बरत रहे हैं। हम अवमानना ​​का आदेश जारी नहीं कर रहे हैं। आप इस देश की न्यायपालिका को ध्वस्त करना चाहते हैं।’’

    किस NGO ने दायर की थी याचिका?
    उच्चतम न्यायालय गैर-सरकारी संगठन ‘यूनाइटेड वॉइस फॉर एजुकेशन फोरम’ द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया था कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को दी गई छूट असंवैधानिक है क्योंकि यह उन्हें शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के दायित्वों से पूर्ण रूप से छूट प्रदान करती है। न्यायालय ने 2014 में दिए फैसले में कहा था कि आरटीई अधिनियम अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक विद्यालयों पर लागू नहीं होता है, जो धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और शासन का अधिकार प्रदान करता है।

  • फर्स्ट एसी बोगी में दिखा चूहा, पूर्व विधायक ने मारकर वीडियो किया शेयर, मोदी सरकार पर साधा निशाना

    फर्स्ट एसी बोगी में दिखा चूहा, पूर्व विधायक ने मारकर वीडियो किया शेयर, मोदी सरकार पर साधा निशाना


    नई दिल्‍ली । भाजपा (BJP)छोड़ राजद में शामिल हुए पीरपैंती (भागलपुर) के पूर्व विधायक ललन पासवान ने शुक्रवार को बांका इंटरसिटी (Banka Intercity)एक्सप्रेस ट्रेन में चूहे को मारकर अपना वीडियो शेयर किया। उन्होंने ट्रेनों में चूहे के आतंक और यात्रियों की परेशानी का जिक्र करते हुए रेलवे में मेंटेनेंस, (Maintenance)हाउसकीपिंग(Housekeeping) सहित अन्य काम के निजीकरण पर सवाल उठाया। ललन ने बताया कि वह गुरुवार की रात बांका इंटरसिटी से फर्स्ट एसी कोच में पटना से भागलपुर आ रहे थे। जब फर्स्ट एसी बोगी में इतने बड़े-बड़े चूहे यात्रियों को काट रहे हैं तो स्लीपर और सेकेंड और थर्ड एसी जैसी बोगियों की क्या स्थिति होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

    पूर्व विधायक ने बताया कि ट्रेन खुलने के बाद वह अपनी सीट पर सो रहे थे तो इसी दौरान एक घंटे तक चूहे के आतंक से परेशान रहे। चूहा चेहरे पर आ-जा रहा था। ट्रेनों में अव्वल दर्जे की बोगियों में हाउसकीपिंग की यह स्थिति है। ठेका लेने वाली प्राइवेट एजेंसियों की कोई निगरानी नहीं है। यात्री ट्रेनों में परेशान हैं। चूहा किसी का सामान काट रहा है तो किसी के शरीर पर कूद रहा है और काट रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

    उन्होंने आशंका जताई कि जब ये ट्रेनें यार्ड में खड़ी होती हैं तो इसके पीछे सांप और अन्य जीव भी बोगियों में आ सकते हैं। चूहा स्वयं कई बीमारियों का कारण है। रेलवे और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यात्रियों की इन परेशानियों पर संज्ञान ले। उन्होंने बताया कि वह एक बोनाफाइड यात्री के रूप में टिकट लेकर यात्रा कर रहे थे और उनका हक है कि सुरक्षित और सुलभ यात्रा रेलवे उपलब्ध कराए। इस बाबत मालदा रेल मंडल के पीआरओ रसराज माजी ने कहा कि बांका इंटरसिटी का मेंटनेंस दानापुर डिवीजन से होता है।

    भाजपा ने टिकट काटा तो राजद में शामिल हुए थे
    बीते विधानसभा चुनाव में पीरपैंती के सीटिंग विधायक ललन पासवान का अंतिम समय में भाजपा से टिकट कट गया। इससे नाराज ललन पहले तो राजद प्रत्याशी के चुनाव प्रचार में जुट गए फिर चुनाव के दौरान ही पटना में जाकर पूर्व सीएम राबड़ी देवी से आशीर्वाद लेकर राजद में शामिल हो गए। पाला बदलने के बाद वह भाजपा को लगातार निशाने पर ले रहे हैं।

  • हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद निर्माण के लिए जुटाए 5 करोड़ रुपये और सोने के गहने

    हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद निर्माण के लिए जुटाए 5 करोड़ रुपये और सोने के गहने


    कोलकाता । पश्चिम बंगाल(West Bengal) की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee)की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) विधायक हुमायूं कबीर(Humayun Kabir) मुर्शिदाबाद जिले में “बाबरी मस्जिद”(Babri Masjid) के अपने सपने को साकार करने के लिए देश-विदेश से भारी मात्रा में चंदा प्राप्त कर रहे हैं। 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद विध्वंस की 33वीं बरसी पर आधारशिला रखे जाने के बाद से, अब तक लगभग 5 करोड़ की राशि जुटाई जा चुकी है।

    एक रिपोर्ट के मुताबिक, हुमायूं कबीर ने बताया कि उन्हें एक ही व्यक्ति से 1 करोड़ का चंदा देने का वादा किया गया था, जो अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। वह पश्चिम बंगाल इस्लामिक फाउंडेशन ऑफ इंडिया (WBIFI) द्वारा विदेशी फंडिंग प्राप्त करने के लिए बैंकिंग प्रावधान स्थापित किए जाने के बाद विदेशों से और अधिक धन प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे हैं।

    उन्होंने बेहद आत्मविश्वास से कहा, “हमें कतर, सऊदी अरब, बांग्लादेश और इंग्लैंड सहित विदेशों से दान के लिए फोन आ रहे हैं।” पूर्व टीएमसी विधायक को न केवल बाबरी मस्जिद के अपने सपने पर भरोसा है, बल्कि आधारशिला समारोह में मिले भारी समर्थन के बाद अपनी नई राजनीतिक पारी पर भी पूरा भरोसा है।

    23 बीघा भूमि पर बाबरी मस्जिद के निर्माण का प्रभारी डब्ल्यूबीआईएफआई की समिति के सदस्यों द्वारा प्रतिदिन शाम को दान बक्सों से जमा किए गए धन के ट्रंक गिने जाते हैं। गुरुवार को ही 23,01,495 की राशि के साथ एक सोने की अंगूठी, एक सोने की नथ और सोने की बालियां एकत्र की गईं।

    पार्टी द्वारा निलंबित किए जाने के बावजूद, हुमायूं कबीर का राजनीति छोड़ने का कोई इरादा नहीं है। वास्तव में, वह बंगाल की राजनीति में एक बड़ी भूमिका निभाने को लेकर आश्वस्त हैं। उन्होंने दावा किया, “चुनाव के बाद मैं किंगमेकर बनूंगा। मेरे बिना कोई सरकार नहीं बना सकता।” भरतपुर से विधायक कबीर 17 दिसंबर को पश्चिम बंगाल विधानसभा में मौजूद रहेंगे, लेकिन उनका इस्तीफा देने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया, “मुझे यह महीना खत्म कर लेने दीजिए, मैं इस्तीफे के बारे में जनवरी में सोचूंगा।”

    वह 22 दिसंबर को अपनी नई पार्टी शुरू करने के लिए तैयार हैं, हालांकि उन्होंने अभी तक नाम का खुलासा नहीं किया है। कबीर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी, एआईएमआईएम के साथ गठबंधन की उम्मीद कर रहे थे, जो सफल नहीं हो सका। वह मुर्शिदाबाद जिले में कांग्रेस और वाम मोर्चा के साथ सीट शेयरिंग का फॉर्मूला बनाना चाहते हैं, जिसकी घोषणा वह अपनी पार्टी के गठन के बाद करेंगे।

    इस बीच, टीएमसी ने कबीर के ‘बाबरी मस्जिद’ एजेंडे से दूरी बना ली है। टीएमसी का कहना है कि यह पार्टी की समावेशी राजनीति की विचारधारा के अनुरूप नहीं है। आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय के लगभग 30 प्रतिशत मतदाता हैं, जबकि हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय में शामिल मतुआ बंगाल में 17 प्रतिशत हैं। इनके वोट भाजपा और टीएमसी के बीच विभाजित हैं।

    जिस दिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की आधारशिला रखी गई थी, टीएमसी ने एकता दिवस का आयोजन किया था। इसके माध्यम से पार्टी ने सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खड़े होने का स्पष्ट संदेश दिया।

    टीएमसी ने मुर्शिदाबाद में आधारशिला समारोह से कुछ दिन पहले कबीर को दूसरी बार पार्टी से निष्कासित कर दिया था। कांग्रेस से टीएमसी में शामिल हुए कबीर ने सत्ताधारी सरकार के पहले कार्यकाल में जूनियर कैबिनेट मंत्री के रूप में कार्य किया था, इससे पहले उन्हें 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद वह 2018 में भाजपा में शामिल हो गए, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी से चुनाव हार गए। 6 साल का निष्कासन पूरा होने के बाद कबीर टीएमसी में फिर से शामिल हो गए थे।

  • भारत-चीन संबंधों में नई पहल, बिजनेस वीजा प्रक्रिया आसान बनाने उठाया ये बड़ा कदम

    भारत-चीन संबंधों में नई पहल, बिजनेस वीजा प्रक्रिया आसान बनाने उठाया ये बड़ा कदम


    नई दिल्‍ली । भारत ने चीनी तकनीशियनों (Technicians)और पेशेवरों(Professionals) के लिए बिजनेस वीजा में लगने वाली लालफीताशाही (Red tape)को काफी हद तक खत्म कर दिया है। दो सरकारी अधिकारियों ने यह जानकारी दी। यह भारत-चीन (India-China)संबंधों को फिर से पटरी पर लाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। 2020 के बाद से चल रही वीजा संबंधी देरी के कारण भारतीय उद्योग को अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा था।

    अधिकारियों के अनुसार, अब एक अतिरिक्त प्रशासनिक जांच की परत हटा दी गई है और बिजनेस वीजा की मंजूरी चार हफ्ते से भी कम समय में हो रही है। 2020 में लद्दाख सीमा विवाद के बाद भारत ने लगभग सभी चीनी नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी और बिजनेस वीजा की जांच गृह मंत्रालय तथा विदेश मंत्रालय के अलावा अन्य एजेंसियों तक विस्तारित कर दी थी।

    एक अधिकारी ने बताया कि वीजा से जुड़ी सभी समस्याएं पूरी तरह हल कर दी गई हैं। हमने अतिरिक्त प्रशासनिक जांच को हटा दिया है और अब बिजनेस वीजा चार सप्ताह के अंदर जारी किए जा रहे हैं। विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय, वाणिज्य मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय तथा नीति आयोग की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।

    भारत की इस पहल पर चीन के विदेश मंत्रालय ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि बीजिंग ने भारत की ओर से लोगों के आपसी आदान-प्रदान को सुगम बनाने के लिए सकारात्मक कदम को नोटिस किया है। उन्होंने कहा- चीन, भारत के साथ संवाद और परामर्श बनाए रखने के लिए तैयार है ताकि आपसी संपर्क को और आसान बनाया जा सके।

    थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फोरम (ORF) के अनुमान के अनुसार, सख्त वीजा नियमों की वजह से पिछले चार साल में भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को करीब 15 अरब डॉलर (लगभग 1.25 लाख करोड़ रुपये) का उत्पादन नुकसान हुआ। शाओमी जैसी बड़ी चीनी कंपनियों को तकनीशियनों की कमी का सामना करना पड़ा था। सौर ऊर्जा क्षेत्र भी कुशल चीनी श्रमिकों की कमी से प्रभावित रहा।

    इस साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात साल बाद पहली चीन यात्रा और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के बाद दोनों देशों ने 2020 के बाद पहली बार सीधी उड़ानें भी बहाल कर दी हैं। वीजा नियमों में यह ढील पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता वाली एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों पर आधारित है। यह समिति चीन से निवेश संबंधी कुछ अन्य प्रतिबंधों को भी हटाने पर विचार कर रही है, क्योंकि मौजूदा प्रतिबंध विदेशी निवेशकों का मनोबल गिरा रहे थे।

    इंडियन सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (ICEA) के अध्यक्ष पंकज मोहिंद्रू ने कहा- सीमा-क्षेत्र से लगे देशों के कुशल पेशेवरों के लिए वीजा प्रक्रिया तेज करने का सरकार का फैसला स्वागत योग्य है। यह सहयोगात्मक रुख को दर्शाता है और उद्योग की लंबे समय से चली आ रही मांग को स्वीकार करता है। यह बदलाव ऐसे समय आया है जब भारत मोबाइल फोन, कंपोनेंट्स और सब-असेंबली सहित कई क्षेत्रों में उत्पादन को बड़े पैमाने पर बढ़ा रहा है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय सामानों पर 50% तक टैरिफ लगाने के बाद भारत ने अपनी कूटनीतिक गणना में बदलाव किया है। इस पृष्ठभूमि में चीन के साथ संबंधों को फिर से मजबूत करना और रूस के साथ रिश्ते गहरे करना भारत की नई रणनीति का हिस्सा है, साथ ही अमेरिका के साथ व्यापार समझौते पर बातचीत भी जारी है।

    दूसरे सरकारी अधिकारी ने कहा- हम चीन संबंधी कुछ प्रतिबंधों को सावधानी से हटा रहे हैं, ताकि समग्र कारोबारी माहौल बेहतर हो और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिले। हाल ही में भारत ने उपभोक्ता करों में कटौती और श्रम कानूनों में ढील देकर भी विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने की कोशिश की है।

  • सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में पेश किया निजी संकल्प, सभी सांसदों ने प्रस्ताव को दिया समर्थन

    सुधा मूर्ति ने राज्यसभा में पेश किया निजी संकल्प, सभी सांसदों ने प्रस्ताव को दिया समर्थन


    नई दिल्‍ली । राज्यसभा(Rajya Sabha) में शुक्रवार को उस समय एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के तमाम सांसद(Member of Parliament) एकसाथ खड़े नजर आए। विभिन्न दलों के सदस्यों ने मनोनीत सदस्य सुधा मूर्ति के एक निजी संकल्प की सराहना की, जिसमें उन्होंने तीन से छह साल के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा और पोषण गारंटी का प्रस्ताव दिया था। सुधा मूर्ति ने एक निजी संकल्प पेश करते हुए कहा कि एक शिक्षित माता अर्थव्यवस्था में अपना विशेष योगदान देती है। उन्होंने यह भी कहा कि गर्भवर्ती महिलाओं(Pregnant women) और स्तनपान कराने वाली माताओं को सही पोषण देने से बच्चों का समुचित शारीरिक एवं मानसिक विकास होता है। संकल्प में छोटे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य सेवाएं और प्री-प्राइमरी(Pre-primary) शिक्षा की पर्याप्त सुविधाएं शामिल किए जाने का भी संकल्प है।

    उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं का नाम बदलकर आशा कार्यकर्ता या दीपम् कार्यकर्ता करना चाहिए। प्रस्ताव का समर्थन करते हुए डीएमके के पी. विल्सन ने कहा, 12वीं तक की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए। आप की स्वाति मालीवाल ने भी इसका समर्थन किया।

    सुधा मूर्ति के निजी संकल्प में प्रावधान किया गया है कि तीन से छह वर्ष के सभी बच्चों के लिए पोषण, स्वास्थ्य सेवाओं, प्री प्राइमरी शिक्षा सहित निशुल्क एवं अनिवार्य प्रारंभिक बाल्यवस्था एवं प्रारंभिक शिक्षा की गारंटी देने के लिए संविधान में एक नवीन अनुच्छेद अत:स्थापित करने पर विचार किया जाए। उन्होंने कहा कि तीन से छह वर्ष तक बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक विकास समुचित ढंग से होना बहुत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कई बार बच्चे के अभिभावक इतने शिक्षित और जानकार नहीं होते कि वे इस पक्ष की ओर ध्यान दे पायें।

    मनोनीत सदस्य ने कहा कि यदि इस आयु में बच्चों को आंगनवाड़ी भेज कर उन्हें समुचित पोषण और शिक्षा दी जाये तो उन्हें आगे चलकर एक अच्छा नागरिक बनाने और साफ-सफाई का ध्यान रखने आदि के अच्छे गुण सिखाये जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे केंद्रों पर बच्चा जाता है तो उसके अंदर विभिन्न शारीरिक कमियों जैसे देखने, बोलने की क्षमता में कमी और कुपोषण से होने वाली समस्याओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है क्योंकि वहां बच्चों की समय समय पर जांच होती है।

    मूर्ति ने सुझाव दिया कि जिस तरह से सरकार ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढाओ’ का अभियान छेड़ा है ठीक उसी तरह तीन से छह साल तक के बच्चों को आंगनवाड़ी में भेजने के लिए अभियान चलाया जाए। उन्होंने कहा कि इस काम में निगमित दायित्व कोष (सीएसआर) की भी मदद ली जाए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का नाम बदलकर आशा कार्यकर्ता या दीपम् कार्यकर्ता करना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘‘यदि हमें अपने देश को विकसित राष्ट्र बनाना है तो हमें अपने बच्चों की तीन से छह वर्ष की आयु में विकास पर ध्यान देना होगा।’’

    उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने जब इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की और जब जमशेदपुर में टाटा की नौकरी का विज्ञापन देखा जिसमें लिखा था कि इसमें महिलाएं आवेदन नहीं करें। उन्होंने जे आर डी टाटा को एक पोस्टकार्ड लिखकर कहा कि उनकी कंपनी देश की आधी आबादी से अवसर क्यों छीन रहीं है क्योंकि देश के विकास में आधी आबादी को भी भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए।

    मूर्ति ने कहा कि यह जेआरडी टाटा की महानता थी कि उन्होंने एक अपरिचित लड़की का सुझाव मानते हुए लड़कियों अपने यहां काम करने का अवसर दिया।

    भारतीय जनता पार्टी की मेधा विश्राम कुलकर्णी ने कहा कि वह मूर्ति द्वारा आंगनवाड़ी को सशक्त बनाने के लिए लाये गये इस प्रस्ताव का समर्थन करती हैं।

    उन्होंने कहा कि भाजपा की ओर से वह देश के विभिन्न भागों में आंगनवाड़ी के कामकाज देखने गयी थीं और उन्हें यह बताते हुए खुशी हो रही है कि अधिकतर राज्यों में आंगनवाड़ी में बहुत अच्छा कामकाज होता है।

    कुलकर्णी ने कहा कि कोविड के दौरान आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने जितना काम किया, जितनी चिकित्सकों की सहायता की, घर-घर जाकर रोगियों के बारे में जानकारी ली, वैसा कहीं और देखने को नहीं मिलता है।

    उन्होंने सुझाव दिया कि आंगनवाड़ी की कक्षाएं चलाने के लिए ऐसी कार्यकर्ताओं को अधिक कोष दिया जाना चाहिए।

    चर्चा में भाग लेते हुए द्रमुक के पी विल्सन ने तमिलनाडु में स्कूली शिक्षा के लिए केंद्र द्वारा दिया जाने वाला धन रोके जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने शिक्षा अर्हता परीक्षा को अनिवार्य बनाये जाने के नियम का विरोध करते हुए कहा कि इससे देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की बड़ी कमी होने की आशंका है।

    आम आदमी पार्टी की स्वाति मालीवाल् ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि जापान सहित विभिन्न देशों में तीन से छह वर्ष की आयु के बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास पर बहुत ध्यान दिया जाता है। उन्होंने कहा कि आज भारत में शिक्षा का विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है लेकिन इनकी गुणवत्ता में काफी अंतर है।

    उन्होंने कहा कि आज तीन से छह वर्ष के बच्चों के विकास के लिए गली गली में प्ले स्कूल हैं जो केवल अमीर एवं मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए ही खुले हैं। उन्होंने कहा कि गरीब एवं वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केंद्र होते है किंतु उनकी कार्यकर्ताओं पर इतना बोझ होता है कि वे बच्चों के विकास पर समुचित ध्यान नहीं दे पातीं।

  • 148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला

    148 लोगों की मौत वाली रेल दुर्घटना में आरोपियों को नहीं मिलेगी जमानत, SC का कड़ा फैसला


    नई दिल्‍ली । सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court)ने ‘जेल नहीं, जमानत'(Bail) के सिद्धांत में अपवाद को जोड़ते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता(Personal freedom) का अधिकार संरक्षित तो है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की संप्रभुता से जुड़े मामलों में केवल इसी आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। विशेषकर गैरकानूनी(illegal) गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA जैसे कानूनों के तहत दर्ज मामलों में अदालत को व्यापक राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखना होगा।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी सीबीआई की उस अपील पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। यह मामला 9 जून 2010 को पश्चिम बंगाल में हुई भीषण रेल दुर्घटना से जुड़ा है, जब रेलवे ट्रैक से छेड़छाड़ किए जाने के कारण ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई और एक मालगाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में 148 लोगों की मौत हुई थी और 170 से अधिक यात्री घायल हुए थे। पश्चिम बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में माओवादियों द्वारा रेलवे ट्रैक उखाड़ने से ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस पटरी से उतर गई थी और एक मालगाड़ी से टकरा गई थी। निर्दोष लोगों की मौतों के अलावा, सरकार को सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान से करीब 25 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।

    राष्ट्रीय हित सर्वोपरि
    पीठ ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं है। यह राष्ट्रीय हित, संप्रभुता और देश की अखंडता जैसे उच्चतर उद्देश्यों के अधीन है। अदालत ने कहा कि न्याय की तराजू को एक ओर संविधान द्वारा प्रदत्त अनुच्छेद 21 के अधिकार और दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे ‘न्यायसंगत अपवादों’ के बीच संतुलन बनाना होता है।

    फैसले को लिखते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि कुछ मामले अपनी प्रकृति और प्रभाव के कारण व्यापक दृष्टिकोण की मांग करते हैं, जहां मुद्दा केवल किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का होता है।

    माओवादी साजिश और भारी नुकसान
    अदालत के अनुसार, यह रेल हादसा माओवादी कैडरों द्वारा अंजाम दी गई साजिश का नतीजा था। इसका उद्देश्य झारग्राम क्षेत्र में राज्य पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की संयुक्त तैनाती को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव बनाना था। इस घटना में न केवल बड़ी संख्या में निर्दोष यात्रियों की जान गई और लोग घायल हुए, बल्कि सार्वजनिक संपत्ति को भी करीब 25 करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचा।

    विरोध का अधिकार, लेकिन हिंसा नहीं
    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नागरिक को सरकार की नीतियों के खिलाफ कानून के दायरे में रहकर विरोध करने का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन निर्दोष लोगों की जान लेने वाली बर्बर और अमानवीय हरकतों को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि ट्रेन पटरियों से छेड़छाड़ कर लगभग 150 यात्रियों की मौत का कारण बनने वाले कृत्य को किसी भी लोकतांत्रिक अधिकार के तहत संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

    12 साल की कैद पर भी जमानत नहीं
    आरोपियों की ओर से यह दलील भी दी गई थी कि वे 12 साल से अधिक समय से जेल में हैं, इसलिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 436A के तहत उन्हें जमानत मिलनी चाहिए। इस धारा के अनुसार, यदि कोई अंडरट्रायल आरोपी किसी अपराध की अधिकतम सजा के आधे से अधिक समय तक जेल में रह चुका हो, तो उसे जमानत दी जा सकती है।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आतंकवादी कृत्यों जैसे अपराधों में संभावित सजा मृत्युदंड तक हो सकती है। ऐसे में 12 साल की कैद को धारा 436A के तहत जमानत का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    UAPA में उलटा बोझ और निष्पक्ष सुनवाई
    अदालत ने UAPA के तहत आरोपियों पर डाले गए ‘रिवर्स बर्डन’ (उलटे बोझ) का भी उल्लेख किया, जिसमें आरोपी को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट्स को निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में आरोपियों को उनके खिलाफ इस्तेमाल होने वाले सभी दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे अपनी रक्षा की तैयारी कर सकें और निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित हो सके।

    शीघ्र सुनवाई के निर्देश
    15 साल से अधिक पुराने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल को तेजी से पूरा करने का आदेश दिया है, ताकि न्याय में और देरी न हो। इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में जमानत के सिद्धांतों को स्पष्ट करने और ‘बेल, नॉट जेल’ के व्यापक सिद्धांत पर एक महत्वपूर्ण अपवाद के रूप में देखा जा रहा है।

  • उच्च शिक्षा में बड़े बदलाव की तैयारी, UGC, AICTE और NCTE की जगह सिंगल रेगुलेटर को कैबिनेट ने दी मंजूरी

    उच्च शिक्षा में बड़े बदलाव की तैयारी, UGC, AICTE और NCTE की जगह सिंगल रेगुलेटर को कैबिनेट ने दी मंजूरी


    नई दिल्‍ली । देश के हायर एजुकेशन(Higher Education) सिस्टम में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल(Union Cabinet) ने यूजीसी,(UGC,) एआईसीटीई(AICTE) और एनसीटीई ( एनसीटीई )जैसे निकायों की जगह उच्च शिक्षा नियामक निकाय स्थापित करने वाले विधेयक को शुक्रवार को मंजूरी दे दी। प्रस्तावित विधेयक जिसे पहले भारत का उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) विधेयक नाम दिया गया था, अब विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण विधेयक के नाम से जाना जाएगा। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रस्तावित एकल उच्च शिक्षा नियामक का मकसद विश्वविद्यालय(university) अनुदान आयोग (यूजीसी), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) की जगह लेना है।

    अधिकारी ने बताया, विकसित भारत शिक्षा अधीक्षण की स्थापना से संबंधित विधेयक को मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। यूजीसी गैर-तकनीकी उच्च शिक्षा क्षेत्र की, जबकि एआईसीटीई तकनीकी शिक्षा की देखरेख करती है और एनसीटीई शिक्षकों की शिक्षा के लिए नियामक निकाय है।

    मेडिकल-लॉ कॉलेज दायरे में नहीं
    प्रस्तावित आयोग को उच्च शिक्षा के एकल नियामक के रूप में स्थापित किया जाएगा, लेकिन मेडिकल और लॉ कॉलेज इसके दायरे में नहीं आएंगे। इसके तीन प्रमुख कार्य प्रस्तावित हैं-विनियमन, मान्यता और व्यावसायिक मानक निर्धारण। वित्त पोषण, जिसे चौथा क्षेत्र माना जाता है, अभी तक नियामक के अधीन प्रस्तावित नहीं है।

    HECI के अंतर्गत चार वर्टिकल (प्रभाग) होंगे
    – राष्ट्रीय उच्च शिक्षा विनियामक परिषद – चिकित्सा और विधि शिक्षा को छोड़कर सभी क्षेत्रों का नियमन करेगी

    – राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद – गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रत्यायन ( एक्रीडिएशन) निकाय

    – सामान्य शिक्षा परिषद (जनरल एजुकेशन काउंसिल )- शिक्षण के तौर तरीके और मानक निर्धारित करेगी

    – उच्च शिक्षा अनुदान परिषद – फंड से जुड़े मामले देखेगी (सरकार का नियंत्रण बना रहेगा)

    क्या होगा फायदा
    – एक रिपोर्ट के मुताबिक अधिकारियों ने कहा कि नए फ्रेमवर्क से गवर्नेंस सरल होगी। रेगुलेटर का ओवरलैप कम होगा। सरकारी और प्राइवेट संस्थानों में शैक्षणिक गुणवत्ता तथा सीखने के रिजल्ट पर ज्यादा फोकस होगा। शिक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘इस विभाजन का उद्देश्य हितों के टकराव को रोकना, सूक्ष्म प्रबंधन (माइक्रोमैनेजमेंट) को कम करना और एक अधिक पारदर्शी नियामकीय ढांचा तैयार करना है।’

    – प्रस्तावित कानून के तहत उच्च शिक्षा के कामकाज का व्यवस्थित तरीके से बंटवारा होगा। रेगुलेशन, एक्रीडिएशन, पढ़ने पढ़ाने के मानक सेट करना और फंड, इन सभी कार्यों को अलग-अलग वर्टिकल्स के माध्यम से संचालित किया जाएगा। इससे किसी एक संस्था में लंबे समय से चली आ रही बहु-शक्तियों की केंद्रीकरण की स्थिति समाप्त होगी।

    – नए विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि यह उच्च शिक्षा क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक खामियों को दूर करता है। एक-दूसरे के अधिकार क्षेत्रों से टकराने वाले कई नियामक निकायों के कारण अकसर विरोधाभासी नियम बनते रहे हैं, मंजूरियों में देरी हुई है। छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (पूर्व में कानपुर विश्वविद्यालय) के कुलपति प्रोफेसर विनय पाठक ने कहा, ‘सिंगल रेगुलटर शैक्षणिक मानकों में सामंजस्य ला सकता है, समान गुणवत्ता मानक सुनिश्चित कर सकता है और विश्वविद्यालयों को पाठ्यक्रम, शिक्षण पद्धति और शोध में नवाचार के लिए अधिक स्वतंत्रता दे सकता है, साथ ही परिणामों के प्रति जवाबदेह भी बनाए रखेगा।’

    2018 में भी इस बिल का तैयार हुआ था ड्राफ्ट
    यूनिफाइड रेगुलेटर (एक ही संस्था द्वारा पूरी उच्च शिक्षा की निगरानी) का विचार कई सालों से चल रहा है। एचईसीआई बिल का पहला ड्राफ्ट 2018 में आया था। उस समय इसका मकसद यूजीसी को खत्म करके एक नया केंद्रीय आयोग बनाना था, लेकिन उस वक्त राज्य स्तर पर इसका विरोध हुआ। राज्य सरकारों ने कहा कि इससे सब कुछ केंद्र सरकार के नियंत्रण में आ जाएगा। इस वजह से इस बिल पर काम आगे नहीं बढ़ा। अब जो नया बिल लाया जा रहा है, वह एनईपी 2020 में दिए गए विजन को लागू करने की कोशिश है। एनईपी 2020 कहता है कि उच्च शिक्षा की व्यवस्था को आधुनिक और सरल बनाने के लिए एक ही रेगुलेटर होना चाहिए, जो तकनीकी शिक्षा और शिक्षक शिक्षा जैसी सभी चीजों को देखे।

  • UP बीजेपी अध्यक्ष के लिए पंकज चौधरी का नाम तय… आज नामांकन और कल लगगी मुहर

    UP बीजेपी अध्यक्ष के लिए पंकज चौधरी का नाम तय… आज नामांकन और कल लगगी मुहर


    लखनऊ।
    यूपी भाजपा (UP BJP) का 18वां अध्यक्ष चुनने के लिए प्रदेश भाजपा कार्यालय (State BJP office) में शनिवार को नामांकन होगा। रविवार को एक बड़े आयोजन में प्रदेश अध्यक्ष के नाम की औपचारिक घोषणा केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल (Union Minister Piyush Goyal) करेंगे। इस पद के दावेदार तो कई माने जा रहे हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी (Pankaj Chaudhary) के नाम लगभग तय हो गया है। पंकज शनिवार को दिल्ली से लखनऊ आ रहे हैं। वह चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डे से प्रदेश भाजपा कार्यालय पहुंचेंगे। सूत्रों के मुताबिक नामांकन के पूर्वनियोजित समय भी तब्दीली करके उसे आगे बढ़ाया गया है। पहले दोपहर दो से तीन बजे के बीच नामांकन की प्रक्रिया पूरी होनी थी।

    इससे पहले शुक्रवार दोपहर को भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष राजधानी लखनऊ पहुंचे और उन्होंने सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से उनके सरकारी आवास पर मुलाकात की। उसके बाद वह प्रदेश भाजपा कार्यालय में चुनाव संबंधी बैठक में शामिल हुए। बैठक के बाद वह दिल्ली वापस लौट गए हैं। पार्टी के प्रदेश चुनाव अधिकारी डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय के मुताबिक शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय परिषद सदस्यों के लिए नामांकन, नामांकन पत्रों की जांच और नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। वहीं, रविवार को अगर जरूरी हुआ तो मतदान होगा अन्यथा दोपहर में नए प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों की घोषणा कर दी जाएगी।


    ओबीसी चेहरे पर कयास

    भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के निर्वाचन के लिए गुरुवार को कार्यक्रम जारी होने के बाद से ही इस कुर्सी के दावेदारों को लेकर कयासों का दौर जारी है। विपक्ष के पीडीए की काट के लिए ओबीसी चेहरे पर दांव लगाना लगभग तय है। गुरुवार से ही तमाम नाम चर्चा में हैं, जिनमें केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी, कैबिनेट मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, धर्मपाल सिंह, केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, राज्यसभा सांसद बाबू राम निषाद आदि के नाम हैं। शुक्रवार को भी इन नामों पर पार्टी के भीतर ही लोग अपनी-अपनी राय जाहिर करते सुने गए। हालांकि, शुक्रवार देर रात पंकज चौधरी के नाम की चर्चा बाकियों से कहीं ज्यादा थी।

    बीएल संतोष ने दोनों डिप्टी सीएम संग की बैठक
    शुक्रवार शाम को बीएल संतोष की अगुआई में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी, प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह, दोनों उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व ब्रजेश पाठक संग बैठक हुई, जिसमें केंद्रीय संगठन से आए निर्देश और चुनाव की प्रक्रिया को लेकर चर्चा की गई। गुरुवार देर रात चुनाव का कार्यक्रम घोषित होने के बाद शुक्रवार सुबह से ही भाजपा के प्रदेश कार्यालय पर तेज चहलकदमी देखी जा रही थी। पार्टी के तमाम पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की आवाजाही का सिलसिला बना रहा। हर पदाधिकारी के आने-जाने के दरम्यान प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए एक नाम सुर्खियों में तैरता और फिर धीरे-धीरे उसका असर फीका पड़ता और दूसरे नाम पर कयासबाजी शुरू हो जा रही थी। इन्हीं चर्चाओं में रेखा वर्मा और साध्वी निरंजन ज्योति के नाम के भी दावे किए जाते रहे।


    464 मतदाताओं के नाम तय

    प्रदेश भाजपा कार्यालय में दिन भर अलग-अलग बैठकों के बाद 464 मतदाताओं के नाम तय किए गए हैं। तय मतदाताओं में प्रदेश परिषद सदस्यों के अलावा पांच सांसदों और 34 विधायक शामिल हैं। भाजपा की चुनाव प्रक्रिया के मुताबिक, भाजपा विधानमंडल के सदस्यों की कुल संख्या का 10 प्रतिशत और यूपी कोटे के लोकसभा व राज्यसभा सांसदों में से दस को मतदाता सूची में जगह मिलती है। प्रदेश में भाजपा के विधायकों की संख्या 258 और विधान परिषद सदस्यों की संख्या 79 है। पार्टी के 33 लोकसभा और 24 राज्यसभा सांसद हैं। पार्टी द्वारा जारी आधिकारिक कार्यक्रम के मुताबिक केंद्रीय चुनाव अधिकारी बनाए गए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल प्रदेश अध्यक्ष के नाम की घोषणा करेंगे।


    दस साल में चार अध्यक्ष, तीन ओबीसी

    मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी भाजपा के 17वें प्रदेश अध्यक्ष हैं। हालांकि, व्यक्तियों की संख्या के मुताबिक गिना जाए तो वह पार्टी के प्रदेश मुखिया का 15वां चेहरा हैं। वर्ष 1980 में बनी पार्टी के पहले प्रदेश अध्यक्ष माधो प्रसाद त्रिपाठी थे। इसके बाद 2017 तक कल्याण सिंह और विनय कटियार को छोड़ दिया जाए तो पार्टी के प्रदेश प्रमुख के पद पर ज्यादातर ब्राह्मणों और क्षत्रियों का ही कब्जा रहा। हालांकि, बीते लगभग एक दशक में पार्टी की पॉलिटिक्स ओबीसी केंद्रित हुई है। वर्ष 2016 के बाद से अब तक चार प्रदेश अध्यक्ष चुने जा चुके हैं, जिनमें तीन ओबीसी हैं। इनमें 2016-17 में केशव प्रसाद मौर्य, 2019-22 तक स्वतंत्र देव सिंह और 2022 से अब तक चौधरी भूपेंद्र सिंह प्रदेश अध्यक्ष बने। इस बीच 2017-19 में डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे।


    आज-कल के कार्यक्रम की जिम्मेदारी तय

    दोनों दिनों के कार्यक्रमों के लिए दिनभर सिलसिलेवार बैठकें हुईं। उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश महामंत्री संजय राय को शनिवार को होने वाले नामांकन कार्यक्रम की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं, रविवार को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की घोषणा का कार्यक्रम डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के सभागार में होगा। इस कार्यक्रम की जिम्मेदारी उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और प्रदेश महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ला को दी गई है। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने अध्यक्ष के चुनाव को लेकर कहा कि ‘भाजपा एक लोकतांत्रिक पार्टी है और हमारे यहां एक चुनाव की पद्धति है और उसके आधार पर चुनाव की प्रक्रिया होती है।

    पार्षद से केंद्रीय मंत्री का सफर
    केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी सात बार के सांसद हैं। वह कुर्मी समाज से आते हैं। वर्ष 1989 में उन्होंने गोरखपुर नगर निगम के लिए पार्षद का चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा था। उसके बाद से उन्होंने पार्टी और संगठन दोनों में कई जिम्मेदारियां निभाईं। वह फिलहाल केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री हैं।

  • छग के वरिष्ठ BJP नेता ने ताड़का’ और ‘सुरसा’ से की बंगाल की CM ममता बनर्जी की तुलना

    छग के वरिष्ठ BJP नेता ने ताड़का’ और ‘सुरसा’ से की बंगाल की CM ममता बनर्जी की तुलना


    रायपुर।
    छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) (Bharatiya Janata Party -BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री अजय चंद्राकर (Ajay Chandrakar) ने शुक्रवार को पश्चिम बंगाल (West Bengal) की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister Mamata Banerjee) की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Home Minister Amit Shah) पर की गई टिप्पणी के लिए आलोचना की। उन्होंने बनर्जी की तुलना रामायण में वर्णित राक्षसी ‘ताड़का’ और ‘सुरसा’ से करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक अंत निश्चित है। चंद्राकर ने शुक्रवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि बनर्जी को भाजपा या उसके नेतृत्व के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

    जब उनसे पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की ओर से शाह पर की गई टिप्पणी के बारे में पूछा गया, तब उन्होंने कहा, ‘वह बंगाल के लिए ताड़का और सुरसा हैं। किसी देश के गृह मंत्री पर टिप्पणी करने से पहले सोचना चाहिए। बंगाल को उन्होंने (ममता ने) क्या दिया-यह सोचना चाहिए। माननीय गृह मंत्री ने कहा है कि घुसपैठिये इस देश का प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तय नहीं कर सकते। ममता जी धमकी नहीं दे सकतीं। वह जमाना लद गया। वह कांग्रेस को धमकी दे सकती हैं कि ‘इंडिया’ गठबंधन का नेतृत्व मैं करुंगी। भाजपा या भाजपा नेतृत्व को किसी तरह के अपशब्द कहने का उनको कोई अधिकार नहीं है। वह खुद ‘ताड़का’ और ‘सुरसा’ जैसी हैं, जिसका (राजनीतिक) वध निश्चित है।’

    पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2026 में होने वाले हैं। गुरुवार को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के कृष्णानगर में एक रैली को संबोधित करते हुए बनर्जी ने आरोप लगाया था कि शाह मतदाता सूचियों से ‘डेढ़ करोड़ नाम’ हटाने की कोशिशों को सीधे तौर पर निर्देशित कर रहे हैं। ममता ने चेतावनी दी कि अगर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान एक भी पात्र मतदाता का नाम हटाया गया, तो वह अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाएंगी।

    पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने कहा था, ‘देश का गृहमंत्री खतरनाक है। उनकी आंखों में यह साफ दिखता है। एक आंख में ‘दुर्योधन’ दिखता है, और दूसरी में ‘दु:शासन’।’ बनर्जी ने आरोप लगाया कि 2026 के विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले एसआईआर का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में किया जा रहा है। उन्होंने कहा, ‘वे वोटों के लिए इतने भूखे हैं कि उन्होंने अब एसआईआर शुरू कर दिया है। अगर किसी पात्र व्यक्ति का नाम कट गया, तो मैं तब तक धरना दूंगी, जब तक नाम जुड़ नहीं जाता। पश्चिम बंगाल में कोई निरुद्ध केंद्र नहीं बनेगा।’