Category: Religious Astrology

  • चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मां दुर्गा की पूजा से मिलेगा जीवन में सुख और समृद्धि चैत्रनवरात्रि2026

    चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से मां दुर्गा की पूजा से मिलेगा जीवन में सुख और समृद्धि चैत्रनवरात्रि2026



    नई दिल्‍ली ।
    हिंदू कैलेंडर के अनुसार चैत्र माह का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। इसी माह से हिंदू नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से जहां नववर्ष 1 जनवरी को आता है वहीं हिंदू नववर्ष चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होता है। इसी दिन से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत भी होती है। यह एक प्रमुख धार्मिक पर्व है जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। चैत्र नवरात्रि का आयोजन विशेष रूप से शांति समृद्धि और सुख-शांति की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दौरान भक्त मां दुर्गा की उपासना के साथ-साथ व्रत भी रखते हैं ताकि उनका जीवन खुशहाल और समृद्ध हो सके।

    चैत्र नवरात्रि 2026: तिथि और अवधि

    चैत्र नवरात्रि 2026 का आरंभ 19 मार्च को होगा जो कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है। यह दिन विशेष रूप से कलश स्थापना के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसके बाद नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा की उपासना का सिलसिला चलता है। नवमी तिथि 27 मार्च को आएगी और इसी दिन राम नवमी का पर्व भी मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से राम भक्तों द्वारा श्रीराम के जन्मोत्सव की पूजा की जाती है। चैत्र नवरात्रि की समाप्ति 27 मार्च को होगी। इस दिन विशेष रूप से दिनभर देवी पूजा की जाती है और उपवासी भक्तों द्वारा व्रत का पारण किया जाता है।

    चैत्र नवरात्रि 2026: कलश स्थापना मुहूर्त

    चैत्र नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना की जाती है जिसे घटस्थापना भी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से एक पवित्र मिट्टी के कलश को घर के पूजा स्थान पर स्थापित किया जाता है और फिर देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा शुरू होती है।

    19 मार्च 2026 को कलश स्थापना का मुहूर्त इस प्रकार है

    सुबह का मुहूर्त 06:00 AM – 06:45 AM
    दोपहर का मुहूर्त 11:30 AM – 12:15 PM
    सांयकाल का मुहूर्त 06:00 PM – 06:45 PM

    इन मुहूर्तों में से जो भी समय आपके लिए सुविधाजनक हो उस समय कलश स्थापना कीजिए। विशेष रूप से शुद्धि और पवित्रता का ध्यान रखें। पूजा के दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ देवी दुर्गा की उपासना करें और व्रत का संकल्प लें।

    देवी पूजा और विशेष अनुष्ठान

    चैत्र नवरात्रि के दौरान प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है। इस प्रकार के अनुष्ठानों से मनुष्य को न केवल मानसिक शांति मिलती है बल्कि उसके जीवन में आने वाली समस्याओं का समाधान भी संभव होता है।

    प्रथम दिन 19 मार्च मां शैलपुत्री की पूजा होती है। दूसरे दिन 20 मार्च मां ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। तीसरे दिन 21 मार्च मां चंद्रघंटा की पूजा होती है। चौथे दिन 22 मार्च मां कूष्मांडा की पूजा होती है पांचवे दिन 23 मार्च मां स्कंदमाता की पूजा होती है। छठे दिन 24 मार्च मां कात्यायनी की पूजा होती है। सातवे दिन 25 मार्च मां कालरात्रि की पूजा होती है। आठवे दिन 26 मार्च मां महागौरी की पूजा होती है नौवे दिन 27 मार्च मां सिद्धिदात्री की पूजा होती है साथ ही साथ राम नवमी का पर्व मनाया जाता है। इन नौ दिनों में व्रति पूजा और उपासना से भक्तों को मानसिक शारीरिक और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

    चैत्र नवरात्रि 2026 का आरंभ 19 मार्च से हो रहा है और इसके साथ ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी होती है। यह समय देवी दुर्गा की उपासना व्रत और पूजा का होता है जिससे भक्त अपने जीवन में सुख शांति और समृद्धि की कामना करते हैं। कलश स्थापना के दौरान विशेष मुहूर्त का पालन करें और नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा कर अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाएं। इस अवसर पर घर में मां दुर्गा का व्रत करना और उनकी पूजा करना निश्चित रूप से जीवन में सुख और शांति लेकर आता है।इस अवसर पर घर में मां दुर्गा का व्रत करना और उनकी पूजा करना निश्चित रूप से जीवन में सुख और शांति लेकर आता है।

  • Saphala Ekadashi 2025: सफला एकादशी पर करें ये पावन उपाय, खुल जाएंगे धन-संपत्ति और सफलता के द्वार!

    Saphala Ekadashi 2025: सफला एकादशी पर करें ये पावन उपाय, खुल जाएंगे धन-संपत्ति और सफलता के द्वार!


    हिंदू धर्म । में वर्ष भर आने वाली एकादशियों में से सफला एकादशी को विशेष रूप से सौभाग्य, धन-संपन्नता और मनोकामना पूर्ति की एकादशी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन किए गए उपाय व्यक्ति को कुबेर जी की कृपा, नौकरी–व्यवसाय में सफलता और जीवन में रुके हुए कामों को गति प्रदान करते हैं।

    पंचांग के अनुसार, वर्ष 2025 में सफला एकादशी का व्रत सोमवार, 15 दिसंबर को पड़ेगा।
    यह तिथि भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों को प्रसन्न करने का शुभ अवसर मानी जाती है।

    सफला एकादशी 2025: धन-संपत्ति के लिए सबसे प्रभावी उपाय
    1. गन्ने के रस से अभिषेक

    उपाय:
    इस दिन भगवान विष्णु का गन्ने के रस से अभिषेक करें।

    लाभ:
    बुध ग्रह मजबूत होता है, व्यापार में तरक्की, नौकरी में उन्नति और आर्थिक स्थिति शीघ्र सुधरती है।

    2. एकाक्षी नारियल और हल्दी का चमत्कारी उपाय

    उपाय:

    भगवान विष्णु को एकाक्षी नारियल अर्पित करें।

    पूजा में हल्दी की गांठ, चने की दाल और गुड़ चढ़ाएं।

    पूजा के बाद नारियल और हल्दी की गांठ को लाल कपड़े में बांधकर तिजोरी या धन स्थान पर रखें।

    लाभ:
    घर में स्थायी धन-समृद्धि का वास होता है और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    3. पीपल वृक्ष की पूजा और दीपदान

    उपाय:

    सुबह पीपल के पेड़ की जड़ में दूध और जल अर्पित करें।

    शाम को सरसों के तेल का दीपक जलाकर पीपल वृक्ष के नीचे रखें।

    इसके बाद 11 बार परिक्रमा करें।

    लाभ:
    पितृदोष व कालसर्प दोष से राहत मिलती है, जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और धन लाभ के योग बनते हैं।

    4. दक्षिणावर्ती शंख से अभिषेक

    उपाय:

    दक्षिणावर्ती शंख को पीतल के पात्र में रखें।

    उसमें गंगाजल और केसर मिलाकर भगवान विष्णु का अभिषेक करें।

    अभिषेक के बाद शंख को पूजा स्थल पर रख दें।

    लाभ:
    मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और हर क्षेत्र में सफलता मिलने लगती है।

    5. तुलसी दल का विशेष प्रयोग

    उपाय:

    7 या 21 तुलसी दल लें।

    उन पर हल्दी लगाकर भगवान विष्णु को अर्पित करें।

    पूजा के बाद तुलसी दल को अपने पर्स या तिजोरी में रखें।

    लाभ:
    जीवन में सुख-शांति बढ़ती है और घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती।

    सफला एकादशी पर दान का विशेष पुण्य
    1. अन्न दान

    गरीबों को चावल, दाल, गेहूं आदि देना अत्यंत शुभ माना गया है। इससे घर में अन्न की बरकत बनी रहती है।

    2. गर्म कपड़ों का दान

    पौष माह में विशेष रूप से गर्म वस्त्र दान करना उत्तम फलदायी है।

    3. फल का दान

    भगवान विष्णु को फल अर्पित करने के बाद उन्हीं फलों का दान करने से पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

    15 दिसंबर 2025 को आने वाली सफला एकादशी धन वृद्धि, सफलता और शुभ फलों का मार्ग खोलने वाली तिथि है। सही विधि से पूजा और इन उपायों के पालन से भक्तों पर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • हनुमान अष्टमी 12 दिसंबर: बजरंगबली की पूजा से मिलता है ग्रहदोष और संकटों से छुटकारा

    हनुमान अष्टमी 12 दिसंबर: बजरंगबली की पूजा से मिलता है ग्रहदोष और संकटों से छुटकारा

    पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली हनुमान अष्टमी इस वर्ष 12 दिसंबर को देशभर में धूमधाम से मनाई जाएगी। इस दिन हनुमान भक्त विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक, आरती और भंडारे का आयोजन करते हैं। कई मंदिरों से चल समारोह भी निकाले जाते हैं।

    हनुमान अष्टमी से जुड़ी प्राचीन मान्यताएँ

    ज्योतिषाचार्य पं. हरिहर पंड्या बताते हैं कि हनुमान अष्टमी से अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हैं।
    सबसे प्रचलित कथा के अनुसार, त्रेतायुग में हनुमानजी ने पाताल लोक में अहिरावण का वध किया था और भगवान श्रीराम व लक्ष्मण को बंदीगृह से मुक्त कराया था। इस विजयोत्सव के कारण ही इस दिन को अत्यंत शुभ माना जाता है।

    एक अन्य मान्यता के अनुसार, अहिरावण का वध करने के बाद हनुमानजी पृथ्वी के नाभि केंद्र उज्जैन लौटे और यहीं विश्राम किया। संयोग से वह दिन पौष कृष्ण अष्टमी का था। तभी से उज्जैन में हनुमान अष्टमी उत्साहपूर्वक मनाई जाती है।

    उज्जैन में विशेष उत्सव और दर्शन का महत्व

    उज्जैन के नानाखेड़ा स्थित चाणक्यपुरी के श्री परशुराम मंदिर में विराजित भजनानंद हनुमानजी के दर्शन का इस दिन विशेष महत्व माना गया है। हर वर्ष बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन, पूजा और आशीर्वाद के लिए पहुंचते हैं। इस बार भी मंदिर प्रांगण में विशेष अनुष्ठान, आरती और भंडारे का आयोजन किया जाएगा।

    हनुमान पूजा से मिलता है ग्रहों के विपरीत प्रभाव से समाधान

    ज्योतिष के अनुसार, जिन लोगों की जन्मपत्री में शनि, मंगल, राहु या अन्य ग्रह प्रतिकूल प्रभाव में हों, उनके लिए हनुमानजी की उपासना अत्यंत फलदायी मानी गई है।

    विशेष रूप से-

    शनि की साढ़ेसाती

    शनि की ढैय्या

    मंगल या राहु के दोष

    से प्रभावित जातकों को हनुमान अष्टमी पर हनुमानजी को तेल और सिंदूर चढ़ाना चाहिए। साथ ही हनुमान चालीसा और हनुमान अष्टक का पाठ करने से संकटों से मुक्ति मिलती है।

    इसके अतिरिक्त, प्रत्येक शनिवार और मंगलवार को हनुमान मंदिर में दीपक लगाने, प्रसाद चढ़ाने और दर्शन करने से भी जीवन के कष्ट दूर होने की मान्यता है।

  • 12 दिसंबर को हनुमान अष्टमी बजरंगबली की पूजा से ग्रहों के विपरीत प्रभाव से मिलेगी मुक्ति

    12 दिसंबर को हनुमान अष्टमी बजरंगबली की पूजा से ग्रहों के विपरीत प्रभाव से मिलेगी मुक्ति


    उज्जैन ।
    हनुमान अष्टमी 12 दिसंबर को मनाई जाएगी। यह दिन विशेष रूप से हनुमानजी के भक्तों के लिए महत्वपूर्ण होता है। मान्यता है कि त्रेतायुग में हनुमानजी ने पाताल लोक में अहिरावण का वध करके भगवान राम और लक्ष्मण को मुक्त किया था। इस वजह से यह दिन विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। हनुमानजी की पूजा से न केवल भक्तों को मानसिक शांति और शक्ति मिलती है बल्कि ग्रहों के विपरीत प्रभाव से मुक्ति भी मिलती है।

    हनुमानजी की पूजा का महत्व

    हनुमान अष्टमी के दिन देशभर के मंदिरों में विशेष पूजा आरती और भंडारे आयोजित किए जाते हैं। हनुमानजी का अभिषेक पूजन सुबह होता है जबकि शाम को महाआरती होती है। इस दिन कई मंदिरों में चल समारोह भी निकलते हैं जिनमें श्रद्धालु अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं। उज्जैन में हनुमान अष्टमी विशेष रूप से धूमधाम से मनाई जाती है क्योंकि यहाँ हनुमानजी ने पाताल लोक से लौटने के बाद विश्राम किया था। यह विश्राम पृथ्वी के नाभि केंद्र पर स्थित उज्जैन में हुआ था और यह संयोग था कि उस दिन पौष कृष्ण अष्टमी तिथि थी।

    हनुमानजी की पूजा से प्राप्त लाभ

    इस दिन हनुमानजी की पूजा करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विशेष रूप से उन लोगों के लिए हनुमान अष्टमी का दिन बहुत शुभ होता है जिनकी जन्म पत्रिका में शनि मंगल या राहु की विपरीत स्थिति है। ऐसे व्यक्तियों को हनुमानजी की आराधना करने से नकारात्मक ग्रहों के प्रभाव से मुक्ति मिलती है। अगर किसी व्यक्ति पर शनि की साढ़े साती या ढैया का प्रभाव हो तो वह इस दिन हनुमानजी को तेल और सिंदूर चढ़ाएं हनुमान चालीसा और हनुमान अष्टक का पाठ करें। यह उन्हें संकटों से मुक्त कर सकता है।

    शनि और मंगल की अनुकूलता के लिए विशेष उपाय

    ज्योतिषाचार्य पं. हरिहर पंड्या के अनुसार हनुमान अष्टमी का दिन शनि और मंगल के अनुकूल होने के लिए विशेष रूप से लाभकारी है। यदि किसी की जन्म पत्रिका में इन ग्रहों की विपरीत स्थिति है तो हनुमानजी की पूजा से ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सकता है। प्रत्येक शनिवार और मंगलवार को हनुमानजी की पूजा करने और दीपक लगाने से भी व्यक्ति को जीवन में आ रही समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।

    उज्जैन में हनुमान अष्टमी का विशेष महत्व

    उज्जैन में हनुमान अष्टमी का पर्व और भी अधिक महत्व रखता है क्योंकि यहाँ हनुमानजी ने पाताल लोक से लौटने के बाद विश्राम किया था। इस दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है और भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। विशेष रूप से नानाखेड़ा चाणक्यपुरी स्थित श्री परशुराम मंदिर में हनुमानजी के दर्शन का विशेष महत्व है। यहाँ पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं और विशेष पूजा करते हैं। इस बार भी हनुमान अष्टमी पर यहाँ विशेष उत्सव का आयोजन किया जाएगा।
    हनुमान अष्टमी का पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह मानसिक और शारीरिक शांति सुख और समृद्धि की प्राप्ति का भी एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस दिन हनुमानजी की पूजा से न केवल व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है बल्कि वह ग्रहों के विपरीत प्रभाव से भी मुक्त होता है। तो इस हनुमान अष्टमी आप भी बजरंगबली की आराधना करें और अपनी जीवन यात्रा को और भी सफल बनाएं।

  • Saphala Ekadashi 2025: जानें सफला एकादशी के व्रत का महत्व, तारीख और जरूरी नियम

    Saphala Ekadashi 2025: जानें सफला एकादशी के व्रत का महत्व, तारीख और जरूरी नियम


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को विशेष और पवित्र माना गया है। भगवान विष्णु को समर्पित यह दिन भक्तों के लिए कल्याणकारी माना गया है। साल में कुल 24 एकादशी आती हैं और हर एकादशी आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ मानी जाती है। इन्हीं में से एक है-सफला एकादशी, जिसे पौष मास के कृष्ण पक्ष में रखा जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत व पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सफलता, सुख और समृद्धि आती है। 2025 में सफला एकादशी का व्रत शुभ योग में पड़ रहा है, इसलिए इसका महत्व और बढ़ जाता है।

    सफला एकादशी 2025 की तिथि और समय

    हिंदू पंचांग के अनुसार पौष मास की कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि

    14 दिसंबर 2025 को रात 08:46 बजे शुरू होगी,

    और 15 दिसंबर 2025 को रात 10:09 बजे समाप्त होगी।

    पंचांग गणना के अनुसार सफला एकादशी व्रत 15 दिसंबर 2025 (सोमवार) को रखा जाएगा। द्वादशी तिथि में उपवास का पारण किया जाएगा।

    सफला एकादशी का महत्व

    सफला एकादशी का अर्थ है-“सफलता देने वाली एकादशी।” मान्यता है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा जीवन में रुके हुए कार्यों को गति देता है और हर प्रकार के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं। कहा जाता है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से एकादशी का व्रत रखता है, उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
    इस दिन भगवान विष्णु के पूजन का फल अनेक यज्ञों के समान बताया गया है। साथ ही यह व्रत साधक को मानसिक शांति, आर्थिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करता है।

    क्या करें सफला एकादशी के दिन?

    सफला एकादशी के दिन कुछ खास नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है। इनका पालन करने से व्रत का पूरा फल मिलता है-

    1. स्नान और संकल्प

    सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

    2. भगवान विष्णु की पूजा

    विष्णु भगवान की प्रतिमा या चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं।

    पीले फूल, फल, चंदन और तुलसी अर्पित करें।

    घर के पूजा स्थल में शांति और पवित्रता बनाए रखें।

    3. तुलसी पूजा

    तुलसी माता को भगवान विष्णु के पूजन का अनिवार्य अंग माना गया है।

    तुलसी चालीसा का पाठ करें।

    भगवान के भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करें।

    4. मंत्र जाप

    सफला एकादशी के दिन निम्न मंत्रों का जाप अत्यंत शुभ माना गया है-

    “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

    या फिर

    “हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे…”

    5. ब्रह्मचर्य और संयम

    इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन, वाणी तथा व्यवहार से शुद्ध बने रहें।

    6. द्वादशी पर पारण

    व्रत का पारण द्वादशी तिथि में शुभ मुहूर्त पर ही किया जाना चाहिए।
    पारण से पहले –

    ब्राह्मणों, जरूरतमंदों या गरीबों को भोजन कराएं।

    अनाज, फल, तिल, वस्त्र आदि का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है।

    क्या न करें सफला एकादशी को?

    व्रत का पूरा फल पाने के लिए इस दिन कुछ बातों का खास ध्यान रखना जरूरी है-

    1. चावल का सेवन न करें

    एकादशी पर चावल खाना धार्मिक रूप से वर्जित है।

    2. तामसिक भोजन से दूर रहें

    लहसुन, प्याज, मांसाहार, शराब आदि का सेवन वर्जित है।

    3. तुलसी पत्ती न तोड़ें

    एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना दोषकारी माना जाता है।

    4. साफ-सफाई से संबंधित कार्य न करें

    बाल, नाखून या दाढ़ी न कटवाएं।

    5. झूठ, निंदा और कलह से बचें

    किसी की बुराई न करें, झूठ न बोलें और विवाद से दूर रहें।

    निष्कर्ष

    सफला एकादशी आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी दिन है। इस दिन भगवान विष्णु की आराधना, व्रत और दान करने से जीवन में सफलता, शांति और समृद्धि का मार्ग खुलता है। सही नियमों का पालन करने से यह व्रत मनोवांछित फल प्रदान करता है।

  • शनि देव की पनौती: छोटी और बड़ी पनौती, क्या है वरदान या अभिशाप

    शनि देव की पनौती: छोटी और बड़ी पनौती, क्या है वरदान या अभिशाप


    नई दिल्‍ली । पनौती शब्द को अक्सर बुरी किस्मत अशुभता और नकरात्मकता से जोड़ा जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनि देव की पनौती का संबंध ज्योतिषशास्त्र में किससे है और यह वास्तव में वरदान है या अभिशाप ज्योतिष के अनुसार शनि देव की पनौती मुख्य रूप से साढ़ेसाती और ढैय्या से जुड़ी होती है जिन्हें बड़ी पनौती और छोटी पनौती कहा जाता है।

    शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या

    ज्योतिष में शनि देव की पनौती को दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है बड़ी पनौती साढ़ेसाती और छोटी पनौती ढैय्या । शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव व्यक्ति की राशि पर लगभग 7.5 वर्षों तक रहता है, जबकि ढैय्या का प्रभाव ढाई वर्षों तक होता है। इन दोनों के समय में व्यक्ति को कई तरह की मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर इन्हें बुरा समय माना जाता है लेकिन इसका एक गहरा उद्देश्य भी होता है।

    बड़ी पनौती साढ़ेसाती

    शनि की साढ़ेसाती एक गंभीर और लंबा चलने वाला समय होता है, जब शनि अपनी राशि से सातवें आठवें और नवें घर में भ्रमण करता है। इस दौरान व्यक्ति को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जैसे आर्थिक संकट रिश्तों में समस्याएं, करियर में बाधाएं या शारीरिक और मानसिक तनाव। हालांकि यह समय चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन शनि का यह समय व्यक्ति को संयम अनुशासन और धैर्य सिखाने का भी कार्य करता है। इस अवधि में व्यक्ति को अपने कर्मों का फल मिलता है और उसे अपने जीवन के उद्देश्य को समझने का अवसर मिलता है।

    छोटी पनौती ढैय्या

    शनि की ढैय्या एक छोटा लेकिन असरदार समय होता है। यह शनि के पहले या दूसरे घर में भ्रमण करते हुए उत्पन्न होता है और यह लगभग ढाई वर्षों तक रहता है। इस दौरान व्यक्ति को कम गंभीर लेकिन फिर भी परेशानियां उत्पन्न हो सकती हैं। हालांकि ढैय्या की अवधि में उतनी कठिनाई नहीं होती जितनी साढ़ेसाती में होती है लेकिन यह भी व्यक्ति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ढैय्या का उद्देश्य भी जीवन में संतुलन और आत्म-निर्भरता की दिशा में काम करना होता है।

    वरदान या अभिशाप

    ज्योतिषाचार्य अनीष व्यास के अनुसार शनि की पनौती को अभिशाप कहना पूरी तरह से गलत होगा। हालांकि यह समय कठिन होता है परंतु इसका उद्देश्य व्यक्ति को मजबूत संयमित और समझदार बनाना होता है। शनि की पनौती की अवधि में अगर व्यक्ति अपने कार्यों पर ध्यान देता है सही रास्ते पर चलता है और ईमानदारी से काम करता है तो यह उसे जीवन में बेहतर दिशा और सफलता दिला सकती है।

    शनि की पनौती जीवन के कई पहलुओं को मजबूत करने में मदद करती है। यह व्यक्ति को उन कमजोरियों को पहचानने और सुधारने का मौका देती है, जिनसे वह खुद भी अनजान हो सकता है। इसलिए शनि की पनौती को अभिशाप नहीं बल्कि एक कठिन लेकिन आवश्यक अनुभव माना जा सकता है, जो व्यक्ति के आत्म विकास में सहायक होता है।

    भद्राकाल और शुभ कार्यों में अड़चन

    ज्योतिष के अनुसार शनि की बहन भद्रा को भी पनौती माना जाता है। भद्रा का समय शुभ कार्यों में रुकावट डालता है यही कारण है कि हिंदू धर्म में भद्राकाल के दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इसी तरह शनि का प्रभाव भी कुछ हद तक जीवन के महत्वपूर्ण कार्यों को टालने और व्यक्ति को आत्म-निरीक्षण की ओर प्रेरित करता है।

    शनि की पनौती चाहे वह छोटी हो या बड़ी किसी व्यक्ति के जीवन में एक अवश्यम्भावी चुनौती के रूप में आती है जो उसे अपने कर्मों और जीवन की दिशा पर विचार करने का अवसर देती है। शनि का यह समय वरदान हो सकता है अगर व्यक्ति इसे सही तरीके से समझे और आत्म निर्भरता संयम और अनुशासन को अपनाए। अत: शनि की पनौती को अभिशाप नहीं बल्कि जीवन के विकास का एक महत्वपूर्ण भाग माना जाना चाहिए।

  • तेजी से अमीर बनाते हैं ये 3 मूलांक! जानिए अंकशास्त्र के फास्ट अर्निंग नंबर…

    तेजी से अमीर बनाते हैं ये 3 मूलांक! जानिए अंकशास्त्र के फास्ट अर्निंग नंबर…


    नई दिल्ली ।अंकशास्त्र में हर मूलांक का स्वभाव, सोच और काम करने का तरीका अलग होता है। लेकिन कुछ मूलांक ऐसे माने जाते हैं जिनके लोगों में तेजी से पैसा कमाने की क्षमता स्वाभाविक रूप से अधिक होती है। विशेषज्ञों के अनुसार इन मूलांक वालों की ताकत किस्मत नहीं, बल्कि उनका दृष्टिकोण जोखिम उठाने का साहस और सही मौकों को पकड़ने की क्षमता होती है। आइए जानते हैं कौन-से मूलांक वाले लोग आर्थिक तरक्की की दौड़ में सबसे आगे रहते हैं।

    मूलांक 1 जन्म तिथि: 1, 10, 19, 28
    अंक 1 के जातक जन्मजात नेता माने जाते हैं। इनमें आत्मविश्वास भरपूर होता है और ये काम को शुरू करके दिखाने में यकीन रखते हैं। इनकी प्रमुख खूबियां: ,खुद पर मजबूत भरोसा,  तुरंत निर्णय लेने की क्षमता, पद, शक्ति और जिम्मेदारी पाने में तेज मूलांक 1 के लोग बिजनेस, मैनेजमेंट, मीडिया से लेकर राजनीति तक-हर जगह तेजी से नाम और पैसा कमाते हैं। इनकी तरक्की का आधार मेहनत और नेतृत्व कौशल होता है।

    मूलांक 3 जन्म तिथि: 3, 12, 21, 30

    मूलांक 3 वालों की सबसे बड़ी ताकत होती है-नेटवर्किंग और टाइमिंग। ये सही लोगों से सही समय पर जुड़ने की कला जानते हैं।  खासियत:  प्रभावी संपर्क   बनाना सही मौके  पर तुरंत कदम   उठाना प्लानिंग और रणनीति   में माहिर इनकी कमाई अक्सर अचानक बढ़ती है क्योंकि ये अवसरों को पहचानकर तुरंत फायदा उठाते हैं। शिक्षा, प्रशासन, मैनेजमेंट और सरकारी क्षेत्रों में इनकी पकड़ मजबूत होती है।

    अंकशास्त्र में मूलांक 5 को सबसे फास्ट मनी नंबर कहा जाता है। बुध ग्रह का प्रभाव इन्हें तेज सोच स्मार्ट वर्क और कम्युनिकेशन की ताकत देता है  इनकी तीन शक्तियां: जोखिम लेने में बिल्कुल नहीं डरते बाजार और ट्रेंड की तेज समझ  बदलावों के साथ तुरंत खुद को ढाल लेना  फाइनेंस, ट्रेडिंग, मार्केटिंग, सेल्स और बिजनेस-इन सभी क्षेत्रों में मूलांक 5 के लोग पैसा तेजी से कमाने के लिए जाने जाते हैं। लोगों से मजबूत रिश्ते बनाना इनकी आर्थिक सफलता का आधार होता है।

    मूलांक 6 जन्म तिथि: 6, 15, 24
    मूलांक 6 वाले लोगों में आकर्षण, रचनात्मकता और लोगों को प्रभावित करने की क्षमता बेहतरीन होती है। मुख्य खूबियां: आय के नए और रचनात्मक स्रोत खोजना  पार्टनरशिप में लाभ लोगों पर अच्छा प्रभाव यह मूलांक रियल एस्टेट, कला, फैशन, डिजाइनिंग, मीडिया और लाइफस्टाइल इंडस्ट्री में शानदार पैसा दिलाता है। इनके पास धन अक्सर सहजता से आता है।

    मूलांक 8 जन्म तिथि: 8, 17, 26
    मूलांक 8 की कमाई की शुरुआत धीमी रहती है, लेकिन एक बार लक्ष्य तय करने के बाद ये लोग गजब की स्थिर और भारी आर्थिक प्रगति करते हैं। इनकी खासियत: अनुशासन और कठोर मेहनत  लक्ष्य पर निरंतर फोकस 28 से 35 वर्ष के बाद आय में तेज वृद्धि लंबी अवधि में मूलांक 8 वाले बड़े धन का निर्माण करते हैं। प्रशासन, कानून, उद्योग और मैनेजमेंट से जुड़े क्षेत्रों में इनकी चमक ज्यादा दिखती है। अंकशास्त्र के अनुसार मूलांक 1, 3, 5, 6 और 8 वाले लोग सबसे तेज आर्थिक विकास करते हैं। हर मूलांक की सफलता की अपनी वजह है-

    मूलांक 1: नेतृत्व, मूलांक 3: नेटवर्किंग, मूलांक 5: जोखिम और स्मार्टनेस, मूलांक 6: प्रभाव और क्रिएटिविटी, मूलांक 8: मेहनत और स्थिर सफलता।  अंकशास्त्र मानता है कि इन मूलांक वालों में पैसा कमाने की क्षमता स्वभाव से ही अधिक होती है, और सही दिशा में प्रयास करें तो ये जीवन में तेजी से आर्थिक ऊंचाइयां छू लेते हैं।

  • सफला एकादशी 2025: सफलता के लिए विशेष योग, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त

    सफला एकादशी 2025: सफलता के लिए विशेष योग, जानें पूजा का शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली / सफला एकादशी 2025 15 दिसंबर को पड़ रही है; व्रत और पूजा करने से सुख-समृद्धि, सफलता और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, अभिजीत मुहूर्त दोपहर 11:56 से 12:27 बजे तक है।सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। सालभर में कुल 24 एकादशी आती हैं जिनमें से कुछ शुक्ल पक्ष में और कुछ कृष्ण पक्ष में पड़ती हैं। इनमें से सफला एकादशी हर साल पौष महीने के कृष्ण पक्ष में मनाई जाती है। इस वर्ष, सफला एकादशी 15 दिसंबर 2025 को पड़ रही है।

    सफला एकादशी का महत्व
    सफला एकादशी के दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करने से व्यक्ति के सभी कार्य सफल होते हैं और उसे जीवन में सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इस दिन की पूजा से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और धन-समृद्धि की प्राप्ति के योग बनते हैं। इस अवसर पर मनोकामनाओं की पूर्णता की भी मान्यता है।

    सफला एकादशी 2025 तिथि
    वैदिक पंचांग के अनुसार, पौष कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 14 दिसंबर 2025 की रात 08:47 बजे शुरू होकर 15 दिसंबर 2025 की रात 10:08 बजे समाप्त होगी। इसलिए पंचांग के अनुसार 15 दिसंबर को ही सफला एकादशी का व्रत रखा जाएगा।

    सफला एकादशी 2025 शुभ मुहूर्त
    सफला एकादशी के दिन अभिजीत मुहूर्त भी बन रहा है। यह मुहूर्त दोपहर 11:56 बजे से शुरू होकर 12:27 बजे तक रहेगा। इस समय में व्रत रखने और पूजा-अर्चना करने का विशेष लाभ माना जाता है।

    सफला एकादशी पर जाप करने योग्य मंत्र-
    व्रत और पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्रों का जाप करने से विशेष पुण्य और सफलता प्राप्त होती है-

    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
    ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीवासुदेवाय नमः
    ॐ नमो नारायणाय

    लक्ष्मी-विनायक मंत्र –
    दन्ताभये चक्र दरो दधानं,
    कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।
    धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया
    लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।

    पूजा विधि और लाभ-
    सफला एकादशी पर व्रत रखने से भगवान विष्णु की कृपा हमेशा बनी रहती है। इस दिन की पूजा से हर क्षेत्र में सफलता, धनलाभ और सम्मान की प्राप्ति होती है। जिनकी कोई विशेष मनोकामना होती है, उसे बोलकर या मन ही मन कहकर पूरी होने की मान्यता है।

    विशेष जानकारी-

    इस साल अभिजीत मुहूर्त में पूजा-अर्चना करना और उपवास रखना विशेष शुभ माना गया है। सोलह वर्षों तक व्रत का महत्व बढ़ता है और यह दिन हर भक्त के लिए आध्यात्मिक एवं आर्थिक उन्नति का अवसर लेकर आता है।

  • पौष मास 2025: भगवान विष्णु और सूर्य देव की पूजा का महत्व

    पौष मास 2025: भगवान विष्णु और सूर्य देव की पूजा का महत्व



    नई दिल्ली ।
    हिंदू कैलेंडर का दसवां महीना पौष मास धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इस महीने में भगवान विष्णु और सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। पौष मास में कई प्रमुख व्रत और त्योहार आते हैं, जो भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए माने जाते हैं। इस महीने में खरमास की शुरुआत होती है और इसके साथ ही भक्त गुरु गोविंद सिंह जयंती, पुत्रदा एकादशी, कालाष्टमी, मासिक शिवरात्रि जैसे महत्वपूर्ण पर्व मनाते हैं। पौष मास को आम बोलचाल में पूष का महीना भी कहा जाता है।

    पौष मास 2025 की शुरुआत और प्रमुख व्रत

    पौष मास 2025 की शुरुआत 5 दिसंबर, शुक्रवार से हो रही है। इस दिन पौष कृष्ण प्रतिपदा तिथि है और साथ ही रोहिणी व्रत रखा जाएगा। रोहिणी व्रत उस समय मनाया जाता है जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र प्रबल होता है। यह व्रत जैन धर्म और हिंदू धर्म में समान रूप से महत्व रखता है। इसके बाद 7 दिसंबर, रविवार को पौष कृष्ण चतुर्थी के दिन अखुरथ संकष्टी चतुर्थी व्रत मनाया जाएगा। इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

    मध्य पौष मास: मासिक व्रत और त्यौहार

    11 दिसंबर, गुरुवार को कालाष्टमी व्रत और मासिक कृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। वहीं 15 दिसंबर, सोमवार को पौष कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी होगी। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन में सफलता और मानसिक शांति प्राप्त होती है। 16 दिसंबर, मंगलवार को धनु संक्रांति होगी, जब सूर्य धनु राशि में प्रवेश करेंगे और खरमास की शुरुआत होगी। इसके अगले दिन 17 दिसंबर, बुधवार को बुध प्रदोष व्रत रखा जाएगा। इसी तरह, 18 दिसंबर, गुरुवार को मासिक शिवरात्रि मनाई जाएगी, जो हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पड़ती है।

    पौष अमावस्या और अन्य महत्वपूर्ण तिथियां

    19 दिसंबर, शुक्रवार को पौष अमावस्या है, जो व्रत और दान के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। इसके अलावा, 24 दिसंबर, बुधवार को विघ्नेश्वर चतुर्थी का पर्व मनाया जाएगा। पौष शुक्ल चतुर्थी के दिन विघ्नेश्वर चतुर्थी का आयोजन होता है। 27 दिसंबर, शनिवार को गुरु गोविंद सिंह जयंती मनाई जाएगी। यह पर्व सिख धर्म के संस्थापक गुरु गोविंद सिंह के जन्मोत्सव के रूप में पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। इसके बाद 30 दिसंबर, मंगलवार को पौष शुक्ल एकादशी के रूप में पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा। इस व्रत को संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

    पौष पूर्णिमा और माघ मास की शुरुआत

    पौष मास का समापन 3 जनवरी 2026, शनिवार को पौष पूर्णिमा के साथ होगा। इस दिन से माघ स्नान की परंपरा प्रारंभ होती है। माघ मास में संगम में स्नान करने का विशेष महत्व है। प्रयागराज सहित अन्य पवित्र स्थलों पर माघ मेले का आयोजन होता है, जहां हजारों श्रद्धालु कल्पवास और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

    पौष मास का धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश

    पौष मास में किए जाने वाले व्रत और त्यौहार जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिक शांति और सामाजिक कल्याण लाने का माध्यम हैं। भगवान विष्णु और सूर्य देव की पूजा  अन्न और धन का दान, पवित्र नदियों में स्नान करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है बल्कि मन और आत्मा की शुद्धि भी होती है। पौष मास में श्रद्धा और भक्ति के साथ किए गए कर्म सौभाग्य और समृद्धि के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

  • मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2025: सत्यनारायण पूजा से लेकर स्नान-दान तक, जानें आज का पूरा महत्व और शुभ मुहूर्त

    मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2025: सत्यनारायण पूजा से लेकर स्नान-दान तक, जानें आज का पूरा महत्व और शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली । मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2025 आज श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। इस दिन सत्यनारायण पूजा स्नान-दान और व्रत से सौ गुना पुण्य तथा लक्ष्मी-नारायण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा 2025 हिंदू धर्म के सबसे पावन पर्वों में से एक मानी जाती है, जिसे आज पूरे देश में श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ मनाया जा रहा है। यह तिथि भगवान विष्णु मां लक्ष्मी और भगवान सत्यनारायण को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन स्नान दान, मंत्र-जप और सत्यनारायण पूजन से साधारण दिनों की तुलना में कई गुना अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।

    सत्यनारायण पूजा का शुभ मुहूर्त

    ज्योतिषीय गणना के मुताबिक आज भगवान सत्यनारायण की विशेष पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 50 मिनट से दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक है। इसके अतिरिक्त शाम को 5 बजकर 21 मिनट से 5 बजकर 49 मिनट तक का समय भी पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना गया है।

    स्नान-दान का शुभ समय

    पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य के लिए सुबह 6 बजकर 54 मिनट से 9 बजकर 51 मिनट तक का समय सबसे उत्तम बताया गया है। इस दौरान श्रद्धालु गंगा यमुना जैसी पवित्र नदियों में स्नान कर दान करते हैं और पुण्य फल की कामना करते हैं।

    क्यों खास है मार्गशीर्ष मास

    मार्गशीर्ष मास का हिंदू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है मैं महीनों में मार्गशीर्ष हूं जिससे इस महीने की पवित्रता और भी बढ़ जाती है। माना जाता है कि इस महीने में की गई साधना जप तप और दान का प्रभाव शीघ्र फल देता है।

    सत्यनारायण पूजा और व्रत की विधि

    मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन भक्त प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं, व्रत का संकल्प लेते हैं और भगवान विष्णु के सत्यनारायण स्वरूप की विधि-विधान से पूजा करते हैं। कई श्रद्धालु पूरे दिन निर्जल व्रत रखते हैं जबकि कुछ फलाहार व्रत करते हैं। संध्या समय सत्यनारायण व्रत कथा का श्रवण करना अनिवार्य माना गया है।

    दान-पुण्य का विशेष महत्व
    मार्गशीर्ष पूर्णिमा को दान-पुण्य के लिए भी अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन अन्न, वस्त्र तिल घी सोना और धन का दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। कई जगहों पर गौ-दान की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।

    पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान

    इस तिथि पर पितरों के लिए तर्पण और पिंड-दान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन तर्पण करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार पर अपना आशीर्वाद बनाए रखते हैं, जिससे वंश में सुख-शांति और उन्नति बनी रहती है।

    पुराणों में वर्णित महत्व

    नारद पुराण और स्कंद पुराण में मार्गशीर्ष पूर्णिमा के महत्व का विशेष उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार इस दिन किया गया प्रत्येक पुण्य कर्म सौ गुना फल देता है। यही कारण है कि यह तिथि साधकों और भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का श्रेष्ठ अवसर मानी जाती है।

    चंद्र दर्शन का धार्मिक महत्व

    पूर्णिमा की रात चंद्र दर्शन कर भगवान को अर्घ्य देना अत्यंत शुभ माना गया है। चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक ग्रह है, इसलिए उसका पूजन करने से मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।

    मार्गशीर्ष पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश

    कुल मिलाकर मार्गशीर्ष पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि ईश्वर से जुड़ाव और परोपकार का भी दिन है। इस दिन सत्यनारायण पूजन दान-पुण्य और पितृ तर्पण के माध्यम से भक्त अपने जीवन में सुख-समृद्धि, सौभाग्य और सकारात्मक बदलाव की कामना करते हैं।