Category: Religious Astrology

  • हरतालिका तीज पर सुहागिनें रखेंगी निर्जला व्रत…. भूलकर भी न करें ये गलतियां

    हरतालिका तीज पर सुहागिनें रखेंगी निर्जला व्रत…. भूलकर भी न करें ये गलतियां


    नई दिल्ली। ह
    रतालिका तीज (Hartalika Teej 2026) का व्रत सुहागिन महिलाओं (Married women) के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं और माता पार्वती (Mother Parvati) तथा भगवान शिव (Lord Shiva) की पूजा करती हैं। कई महिलाएं निर्जला व्रत भी रखती हैं, जिसके कारण पूरे दिन बिना पानी और भोजन के रहना पड़ सकता है। ऐसे में पूजा-पाठ के साथ अपनी सेहत का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।

    तीज व्रत को लेकर घर-परिवार में कई तरह की परंपराएं होती हैं। कोई पूरे दिन निर्जला रहती हैं, तो कुछ महिलाएं अपनी स्वास्थ्य स्थिति और पारिवारिक परंपरा के अनुसार फलाहार करती हैं। समस्या तब हो सकती है जब व्रत रखने के उत्साह में महिलाएं शरीर के संकेतों को नजरअंदाज कर दें या व्रत खोलते समय अचानक बहुत ज्यादा खाना खा लें।

    इसके अलावा सुबह की तैयारी में बिना कुछ खाए ज्यादा मेहनत करना, पर्याप्त आराम न लेना, पहले से पानी कम पीना और व्रत खत्म होते ही भारी भोजन करना ऐसी आदतें हैं, जिनसे परेशानी हो सकती है तो इस तीज व्रत रखते समय किन आम गलतियों से बचना चाहिए? निर्जला व्रत में किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए और व्रत खोलते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए? आइए जानते हैं।


    व्रत से पहले अचानक पानी पीना बंद न करें

    अगर आप निर्जला व्रत रखने वाली हैं तो एक दिन पहले से ही पानी या तरल पदार्थ लेना कम कर देना सही तरीका नहीं है। शरीर को सामान्य रूप से हाइड्रेट रखना जरूरी है। दिनभर की गर्मी, उमस और आपकी गतिविधि के अनुसार पर्याप्त तरल लेने पर अगले दिन व्रत के दौरान शरीर पर अचानक दबाव कम हो सकता है। हालांकि पानी की कितनी मात्रा आपके लिए उचित है, यह मौसम, उम्र, गतिविधि और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। किसी बीमारी या डॉक्टर की विशेष सलाह होने पर उसी को प्राथमिकता दें।

    व्रत के नाम पर शरीर के संकेतों को नजरअंदाज न करें

    तीज का व्रत धार्मिक आस्था से जुड़ा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तबीयत खराब होने के बावजूद किसी भी कीमत पर व्रत जारी रखा जाए। बहुत ज्यादा कमजोरी, चक्कर, बेहोशी जैसा महसूस होना, भ्रम, अत्यधिक प्यास या असामान्य कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, डायबिटीज या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को व्रत रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेना बेहतर है।


    सुबह से ही बहुत ज्यादा काम करने की गलती

    तीज के दिन पूजा, सजावट, मेहंदी, तैयारियां और घर के कामों के बीच महिलाएं अक्सर खुद के लिए आराम का समय नहीं निकाल पातीं। निर्जला व्रत के दौरान लगातार खड़े रहना या बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत करना थकान बढ़ा सकता है। कोशिश करें कि पूजा की जरूरी तैयारी पहले ही पूरी कर लें। भारी काम परिवार के दूसरे सदस्यों को सौंपें और दिन में बीच-बीच में आराम करें।


    धूप और गर्मी में ज्यादा देर रहने से बचें

    अगर तीज का व्रत निर्जला है तो गर्म मौसम में लंबे समय तक धूप में रहने से परेशानी बढ़ सकती है। शरीर में पानी की कमी का जोखिम बढ़ सकता है और कमजोरी या चक्कर जैसी समस्या हो सकती है। पूजा या किसी धार्मिक कार्यक्रम के लिए बाहर जाना हो तो मौसम को ध्यान में रखें और संभव हो तो ठंडी या छायादार जगह में रहें।


    व्रत खोलते ही भारी खाना न खाएं

    दिनभर के व्रत के बाद सबसे आम गलती होती है कि पूजा खत्म होते ही लोग बहुत ज्यादा खाना खा लेते हैं। लंबे समय तक खाली पेट रहने के बाद अचानक बहुत तला-भुना या भारी भोजन करने से पेट में असहजता हो सकती है। व्रत खोलते समय धीरे-धीरे और सीमित मात्रा में भोजन लेना बेहतर है। फल, हल्का भोजन या आसानी से पचने वाली चीजों से शुरुआत की जा सकती है। इसके बाद जरूरत के अनुसार सामान्य भोजन लिया जा सकता है।


    सिर्फ चाय-कॉफी के भरोसे न रहें

    जो महिलाएं निर्जला व्रत नहीं रखतीं, उनके लिए भी दिनभर केवल चाय या कॉफी लेते रहना अच्छा विकल्प नहीं है। व्रत में फलाहार करने वाली महिलाएं अपने लिए पौष्टिक और संतुलित विकल्प चुन सकती हैं। फल, दूध या दही जैसे खाद्य पदार्थ और घर में प्रचलित फलाहारी भोजन अपनी जरूरत के अनुसार लिया जा सकता है। अत्यधिक मीठे या बहुत तले हुए फलाहारी स्नैक्स को ही पूरे दिन का भोजन बना लेना संतुलित विकल्प नहीं है।


    दवाइयों को लेकर लापरवाही न करें

    अगर आप रोजाना कोई जरूरी दवा लेती हैं तो व्रत के कारण उसे अपने मन से बंद या समय में बदलाव न करें। कुछ दवाओं का भोजन या पानी के साथ लेना जरूरी हो सकता है। ऐसी स्थिति में व्रत रखने से पहले डॉक्टर से बात करें और दवा के समय या व्रत की पद्धति को लेकर उचित सलाह लें। धार्मिक आस्था के साथ स्वास्थ्य संबंधी जिम्मेदारी को नजरअंदाज करना सही नहीं है।


    इस तीज रखें आस्था के साथ सेहत का भी ध्यान

    तीज के दिन सजना-संवरना, पूजा करना और परिवार के साथ त्योहार मनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि आप स्वस्थ रहें। व्रत से पहले शरीर को सामान्य रूप से हाइड्रेट रखें, जरूरत से ज्यादा मेहनत से बचें। तबीयत खराब होने पर लक्षणों को नजरअंदाज न करें और व्रत खोलते समय भोजन धीरे-धीरे लें। आस्था के साथ सावधानी भी जरूरी है, क्योंकि स्वस्थ रहकर ही त्योहार की खुशी पूरी तरह महसूस की जा सकती है।

  • Vastu Upay: बेड और बाथरूम में भूलकर भी न करें भोजन! जानें खाने की सही जगह और शुभ दिशा

    Vastu Upay: बेड और बाथरूम में भूलकर भी न करें भोजन! जानें खाने की सही जगह और शुभ दिशा


    नई दिल्ली । वास्तु शास्त्र में घर की सुख शांति और समृद्धि के लिए कई तरह के नियम बताए गए हैं। इन्हीं में भोजन करने से जुड़े कुछ नियम भी शामिल हैं। मान्यता है कि भोजन केवल शरीर की भूख मिटाने का साधन नहीं है बल्कि इसे घर की सकारात्मक ऊर्जा और सुख समृद्धि से भी जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि खाना खाते समय जगह साफ हो और आसपास का वातावरण शांत हो इसका विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। आजकल व्यस्त जीवनशैली में लोग सुविधा के अनुसार कहीं भी बैठकर खाना शुरू कर देते हैं। कई लोगों को टीवी या मोबाइल देखते हुए बेड पर भोजन करने की आदत होती है जबकि वास्तु मान्यताओं के अनुसार कुछ जगहों पर बैठकर खाना शुभ नहीं माना जाता।

    सबसे पहले बेड पर बैठकर खाना खाने की आदत से बचने की सलाह दी जाती है। आज के समय में टीवी देखते हुए या मोबाइल चलाते हुए बिस्तर पर खाना खाना आम हो गया है लेकिन वास्तु के अनुसार भोजन के लिए बेड को उचित स्थान नहीं माना जाता। मान्यता है कि ऐसा करने से घर के वातावरण में नकारात्मकता बढ़ सकती है और मानसिक शांति प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा खाने के टुकड़े बिस्तर पर गिरने से गंदगी और साफ सफाई से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं।

    इसी तरह घर के मुख्य दरवाजे के बिल्कुल पास बैठकर भोजन करने से भी बचने की सलाह दी जाती है। मुख्य द्वार घर में आने जाने का प्रमुख स्थान होता है और यहां लगातार लोगों की आवाजाही रहती है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार इस जगह पर बैठकर भोजन करने से घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है और सुख समृद्धि में बाधा आने की आशंका मानी जाती है। इसलिए भोजन के लिए घर की कोई शांत और स्वच्छ जगह चुनना बेहतर माना जाता है।

    बाथरूम के सामने या उसके बिल्कुल आसपास बैठकर खाना खाने से भी बचना चाहिए। वास्तु शास्त्र में भोजन के स्थान की स्वच्छता को काफी महत्वपूर्ण माना गया है। बाथरूम के पास भोजन करने से वातावरण की स्वच्छता और सकारात्मकता प्रभावित होने की मान्यता है। इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि भोजन हमेशा साफ और व्यवस्थित स्थान पर ही किया जाए।

    टूटे हुए या गंदे बर्तनों में भोजन करना भी वास्तु के अनुसार अच्छा नहीं माना जाता। प्लेट कटोरी या गिलास टूट गया हो तो उसे इस्तेमाल करने के बजाय अलग कर देना बेहतर माना जाता है। मान्यता है कि टूटे बर्तन घर की सकारात्मकता और सुख शांति को प्रभावित कर सकते हैं। इसी तरह भोजन हमेशा साफ बर्तनों में करना चाहिए ताकि स्वच्छता के साथ सकारात्मक माहौल भी बना रहे।

    अंधेरी या बहुत कम रोशनी वाली जगह पर भोजन करने से भी बचने की सलाह दी जाती है। भोजन करते समय पर्याप्त रोशनी और साफ वातावरण होना जरूरी माना जाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार ऐसी जगह भोजन करना बेहतर होता है जहां प्राकृतिक या कृत्रिम रोशनी पर्याप्त हो।

    वहीं भोजन के लिए साफ शांत और व्यवस्थित स्थान को शुभ माना जाता है। पारंपरिक वास्तु मान्यताओं के अनुसार पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके भोजन करना अच्छा माना जाता है। जमीन पर आराम से बैठकर भोजन करना भी भारतीय परंपरा में शुभ और सुविधाजनक माना गया है। हालांकि ये बातें वास्तु से जुड़ी मान्यताएं हैं वैज्ञानिक रूप से इनका आर्थिक स्थिति पर सीधा प्रभाव प्रमाणित नहीं है।
  • सितंबर में होगा बड़ा शुक्र गोचर, 7 राशियों की चमकेगी किस्मत, नौकरी-कारोबार में मिलेंगे नए मौके

    सितंबर में होगा बड़ा शुक्र गोचर, 7 राशियों की चमकेगी किस्मत, नौकरी-कारोबार में मिलेंगे नए मौके


    नई दिल्ली। सितंबर की शुरुआत ग्रहों की चाल के लिहाज से खास रहने वाली है। 2 सितंबर 2026 को शुक्र अपनी ही राशि तुला में प्रवेश करेंगे। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार शुक्र को धन, सुख-सुविधा, प्रेम, सौंदर्य, भौतिक सुख और वैवाहिक जीवन का कारक माना जाता है। ऐसे में शुक्र का अपनी राशि तुला में गोचर कई राशियों के लिए आर्थिक और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

    शुक्र 2 सितंबर को दोपहर 1 बजकर 51 मिनट पर तुला राशि में प्रवेश करेंगे और 6 नवंबर तक इसी राशि में रहेंगे। अपनी ही राशि में शुक्र की मौजूदगी को विशेष माना जाता है। इस दौरान कुछ राशि वालों के लिए नौकरी में नए अवसर, कारोबार में लाभ, आमदनी के नए साधन और रिश्तों में मजबूती के योग बन सकते हैं।

    मेष राशि- करियर में मिल सकता है नया मौका

    मेष राशि वालों के लिए शुक्र का गोचर करियर और आर्थिक मामलों में लाभकारी रह सकता है। नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी या बेहतर नौकरी का ऑफर मिल सकता है। नौकरी बदलने की योजना बना रहे लोगों को भी अच्छा विकल्प मिलने के संकेत हैं। कारोबारियों को नई डील से फायदा हो सकता है। आर्थिक स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आएगा। प्रेम संबंधों में भी मधुरता बढ़ने की संभावना है।

    कर्क राशि- काम की होगी सराहना, सुधरेगी आर्थिक स्थिति

    कर्क राशि के जातकों के लिए यह गोचर सकारात्मक परिणाम लेकर आ सकता है। कार्यक्षेत्र में आपके काम की सराहना होगी और वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिल सकता है। कारोबार से जुड़े लोगों को नई डील या प्रोजेक्ट मिलने के योग हैं। परिवार का माहौल सुखद रहेगा। आय के लिहाज से भी समय पहले की तुलना में बेहतर हो सकता है।

    कन्या राशि- अटके काम पकड़ेंगे रफ्तार, कमाई के नए रास्ते

    कन्या राशि वालों को शुक्र गोचर के दौरान आर्थिक राहत मिल सकती है। लंबे समय से अटके काम पूरे होने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। कमाई का नया जरिया सामने आ सकता है। नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी मिलने या नौकरी बदलने का अवसर मिल सकता है। आर्थिक परेशानी को लेकर चल रहा तनाव कम होने की उम्मीद है। प्रेम जीवन में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

    तुला राशि- आत्मविश्वास बढ़ेगा, तरक्की के खुलेंगे रास्ते

    शुक्र का गोचर तुला राशि में ही होने वाला है, इसलिए इस राशि के जातकों के लिए इसे विशेष माना जा रहा है। आत्मविश्वास बढ़ेगा और व्यक्तित्व में निखार आएगा। नौकरी और कारोबार में आगे बढ़ने के नए अवसर मिल सकते हैं। लंबे समय से अटके आर्थिक मामलों में भी गति आने के संकेत हैं। रिश्तों में मधुरता बढ़ सकती है।

    कुंभ राशि- मजबूत होगी आर्थिक स्थिति

    कुंभ राशि वालों के लिए शुक्र का गोचर आर्थिक दृष्टि से लाभकारी रह सकता है। नौकरी से जुड़ी परेशानियां कम हो सकती हैं। नई जिम्मेदारियों के साथ तरक्की के रास्ते खुल सकते हैं। कारोबारियों को नया काम शुरू करने या निवेश का अवसर मिल सकता है। इस दौरान घर, वाहन या सुख-सुविधाओं से जुड़ी चीजों पर खर्च होने की संभावना भी है।

    मकर राशि- करियर में नए अवसर, आय-व्यय में रहेगा संतुलन

    मकर राशि वालों के लिए यह गोचर करियर में आगे बढ़ने के मौके लेकर आ सकता है। कारोबारियों को नए प्रोजेक्ट से फायदा मिलने की संभावना है। पुराने अटके काम पूरे हो सकते हैं। किसी बड़ी वस्तु की खरीदारी पर खर्च हो सकता है, लेकिन आमदनी और खर्च के बीच संतुलन बनाए रखने में सफलता मिल सकती है। नौकरी में बदलाव या नई जिम्मेदारी से जुड़े फैसले भी सामने आ सकते हैं।

    धनु राशि- पैसा और प्रेम दोनों में शुभ संकेत

    धनु राशि वालों के लिए शुक्र का गोचर आर्थिक और प्रेम जीवन दोनों के लिहाज से अच्छा रह सकता है। आय के नए स्रोत बन सकते हैं। पहले किए गए किसी निवेश से लाभ मिलने की संभावना है और पैसों से जुड़ी पुरानी चिंता कम हो सकती है। प्रेम संबंधों में नजदीकियां बढ़ेंगी और पार्टनर के साथ अच्छा समय बिताने का मौका मिलेगा। कारोबारियों को भी लाभ के अवसर मिल सकते हैं।

    शुक्र गोचर क्यों है खास?

    वैदिक ज्योतिष में शुक्र को धन, भौतिक सुख-सुविधाओं, प्रेम, कला, सौंदर्य, विलासिता और दांपत्य जीवन का कारक माना जाता है। शुक्र का तुला राशि में गोचर इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि तुला उसकी अपनी राशि है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में शुक्र से जुड़े क्षेत्रों में मजबूती देखने को मिल सकती है।

    हालांकि, किसी व्यक्ति की कुंडली में शुक्र किस भाव में गोचर कर रहा है और उसका परिणाम कितना शुभ रहेगा, यह उसकी जन्मकुंडली, लग्न और अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी निर्भर करता है। इसलिए इसे सिर्फ सामान्य ज्योतिषीय संकेत के तौर पर ही देखना चाहिए और महत्वपूर्ण आर्थिक या व्यक्तिगत फैसले केवल राशिफल के आधार पर नहीं लेने चाहिए।

  • भगवान कृष्ण को ही क्‍यों लगाते हैं 56 भोग? इसके पीछे हैं 3 पौराणिक मान्यताएं

    भगवान कृष्ण को ही क्‍यों लगाते हैं 56 भोग? इसके पीछे हैं 3 पौराणिक मान्यताएं


    नई दिल्ली। जन्माष्टमी हो या दिवाली के बाद मनाया जाने वाला अन्नकूट पर्व, भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। खास बात यह है कि छप्पन भोग में सिर्फ मिठाइयां ही शामिल नहीं होतीं, बल्कि मीठे-नमकीन व्यंजन, फल, पेय और कई तरह के पारंपरिक पकवान भी शामिल किए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि आखिर भगवान कृष्ण को 56 तरह के भोग ही क्यों लगाए जाते हैं? इस संख्या के पीछे तीन प्रमुख पौराणिक मान्यताएं बताई जाती हैं।

    पहली मान्यता : 7 दिन और 8 प्रहर से बना 56 का आंकड़ा

    पौराणिक कथा के अनुसार, माता यशोदा बाल स्वरूप भगवान कृष्ण को दिन में 8 प्रहर में 8 बार भोजन कराती थीं। जब भगवान कृष्ण ने इंद्र के प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया, तब वे लगातार 7 दिन तक अन्न-जल ग्रहण नहीं कर सके।

    कथा के अनुसार, आठवें दिन जब बारिश थमी और भगवान ने गोवर्धन पर्वत नीचे रखा, तब ब्रजवासियों और माता यशोदा ने सात दिनों के दौरान भगवान के लिए तय किए गए आठों प्रहर के भोजन को एक साथ परोसा। यानी 7 दिन × 8 प्रहर = 56। तभी से कृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा शुरू होने की मान्यता है।

    दूसरी मान्यता : दिव्य कमल की 56 पंखुड़ियां

    एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार, गोलोक में भगवान कृष्ण राधा जी के साथ जिस दिव्य कमल पर विराजमान रहते हैं, उसमें 56 पंखुड़ियां होती हैं। इस कमल की तीन परतें बताई गई हैं।

    पहली परत में 8, दूसरी में 16 और तीसरी परत में 32 पंखुड़ियां मानी जाती हैं। तीनों को जोड़ने पर संख्या 8+16+32=56 होती है। इसी वजह से भी भगवान कृष्ण को 56 भोग अर्पित करने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    तीसरी मान्यता : गोपिकाओं ने अर्पित किए थे 56 भोग

    श्रीमद्भागवत कथा से जुड़ी एक अन्य मान्यता में बताया जाता है कि भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने की इच्छा से गोपिकाओं ने एक महीने तक प्रतिदिन भोर में यमुना में स्नान किया और कात्यायिनी माता की पूजा-अर्चना करते हुए व्रत रखा।

    जब भगवान कृष्ण ने उनकी मनोकामना पूरी करने की सहमति दी, तब गोपिकाओं ने प्रसन्न होकर भगवान को 56 प्रकार के भोग बनाकर अर्पित किए। इस मान्यता को भी छप्पन भोग की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

    छप्पन भोग में क्या-क्या होता है?

    छप्पन भोग में अलग-अलग परंपराओं और क्षेत्रों के अनुसार व्यंजनों की सूची बदल सकती है। इसमें मिठाइयों के साथ नमकीन पकवान, फल, पेय और विभिन्न प्रकार के पारंपरिक भोजन शामिल किए जाते हैं। भक्त इन्हें श्रद्धा और प्रेम के साथ भगवान कृष्ण को अर्पित करते हैं।

    यानी 56 भोग सिर्फ व्यंजनों की संख्या नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त करने की धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पौराणिक कथाओं पर आधारित है। इन मान्यताओं की अलग-अलग परंपराओं में अलग-अलग व्याख्या मिल सकती है। हम इनकी तथ्यात्मक पुष्टि नहीं करते हैं।

  • इस साल जन्माष्टमी की तिथि को लेकर असमंजस …. पंचांग में देखें सही तारीख और मुहूर्त

    इस साल जन्माष्टमी की तिथि को लेकर असमंजस …. पंचांग में देखें सही तारीख और मुहूर्त


    नई दिल्ली।
    भगवान श्रीकृष्ण (Lord Sri Krishna) का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (Krishna Paksha Ashtami) तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. इस वजह से हर साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Shri Krishna Janmashtami) इस तिथि को ही मनाते हैं और कोशिश करते हैं कि उस दिन तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र भी हो. लेकिन ऐसा हर बार हो, यह संभव नहीं है. इस बार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर को है या फिर 5 सितंबर को? इस पर कन्फ्यूजन दूर करने के लिए पंचांग से जानते हैं जन्माष्टमी की सही तारीख और मुहूर्त के बारे में.

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लिए भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि 4 सितंबर को 2:25 एएम पर शुरू हो रही है और 5 सितंबर को 12:13 एएम तक विद्यमान रहेगी. उदयातिथि के आधार पर देखा जाए तो जन्माष्टमी की तिथि 4 सितंबर को पूरे दिन है, वहीं रोहिणी नक्षत्र में रात 11 बजकर 04 मिनट तक है।

    भगवान श्रीकृष्ण जन्म मध्य रात्रि में हुआ था, तो 4 और 5 सितंबर की रात वह समय भी प्राप्त होगा. इस आधार पर इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सिंतबर शुक्रवार को मनाना उत्तम रहेगा. भाद्रपद में और भी कई व्रत-त्योहार हैं।


    वज्र योग और मृगशिरा नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव

    4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के समय मृगशिरा नक्षत्र और वज्र योग होगा. बाल गोपाल भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उत्सव मध्य रात्रि में मनाते हैं. उस दिन हर्षण योग प्रात:काल से लेकर दोपहर 03:44 पी एम तक रहेगा. उसके बाद से वज्र योग प्रारंभ होगा, जो 5 सितंबर को दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगा. वहीं रोहिणी नक्षत्र प्रात:काल से लेकर रात 11:04 पी एम तक है, उसके बाद से मृगशिरा नक्षत्र प्रारंभ है।


    जन्माष्टमी मुहूर्त 2026

    इस साल जन्माष्टमी का मुहूर्त रात में 11:57 बजे से लेकर देर रात 12:43 बजे तक है. इसमें भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होगा और उत्सव मनाया जाएगा. जन्माष्टमी का ब्रह्म मुहूर्त 04:30 ए एम से 05:15 ए एम तक रहेगा. इस समय में स्नान करके व्रत का संकल्प कर लें. अभिजीत मुहूर्त दिन में 11:55 बजे से लेकर दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा. अमृत काल रात में 08:03 पी एम से लेकर 09:33 पी एम तक है.


    जन्माष्टमी व्रत का पारण समय

    जो लोग जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे, वे देर रात 12:43 बजे के बाद पारण करके व्रत को पूरा करेंगे. जिनके यहां उदयाति​थि यानि सूर्योदय के बाद पारण होता है, वे 5 सितंबर को सूर्योदय बाद पारण करेंगे.

    जन्माष्टमी पर राहुकाल कब है?
    जन्माष्टमी के दिन राहुकल सुबह में 10 बजकर 45 मिनट पर प्रारंभ होगा और दोपहर में 12 बजकर 20 मिनट पर खत्म होगा. उस दिन आपको कोई शुभ काम करना है तो राहुकाल का ध्यान रखें. उसमें न करें।

  • मंगल बदलेंगे नक्षत्र, इन 5 राशियों को करियर-धन से जुड़े मामलों में मिलेगा लाभ

    मंगल बदलेंगे नक्षत्र, इन 5 राशियों को करियर-धन से जुड़े मामलों में मिलेगा लाभ


    नई दिल्ली। सितंबर की शुरुआत में मंगल की चाल में बदलाव होने जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों के राशि परिवर्तन के साथ नक्षत्र परिवर्तन का भी राशियों पर प्रभाव पड़ता है। मंगल 2 सितंबर 2026 को देवगुरु बृहस्पति के स्वामित्व वाले पुनर्वसु नक्षत्र में प्रवेश करेंगे और 24 सितंबर तक इसी नक्षत्र में रहेंगे। मंगल और गुरु की यह स्थिति कुछ राशियों के लिए शुभ मानी जा रही है। इस अवधि में करियर, कारोबार, धन और संपत्ति से जुड़े मामलों में सकारात्मक परिणाम मिलने के योग बन सकते हैं।

    मेष राशि

    मंगल का नक्षत्र परिवर्तन मेष राशि के लोगों के लिए आर्थिक लिहाज से फायदेमंद रह सकता है। अचानक धन लाभ के अवसर बन सकते हैं। कारोबारियों को काम के विस्तार का मौका मिल सकता है, जबकि नौकरीपेशा लोगों को कार्यक्षेत्र में सफलता मिलने की संभावना है। परिवार से जुड़ी कोई अच्छी खबर मिल सकती है। लंबे समय से किसी काम के लिए किए जा रहे प्रयास भी सफल हो सकते हैं।

    कर्क राशि

    कर्क राशि के जातकों के लिए मंगल का यह बदलाव परिवार और संपत्ति से जुड़े मामलों में राहत ला सकता है। पुरानी पारिवारिक परेशानियों का समाधान निकलने की उम्मीद है। पैतृक संपत्ति से जुड़े मामलों में लाभ हो सकता है। मकान, जमीन या वाहन खरीदने की योजना बना रहे लोगों के लिए समय अनुकूल रह सकता है। करियर में किसी प्रभावशाली व्यक्ति का सहयोग भी मिल सकता है।

    वृश्चिक राशि

    वृश्चिक राशि वालों के लिए मंगल का पुनर्वसु नक्षत्र में प्रवेश कार्यक्षेत्र में नए अवसर लेकर आ सकता है। काम में आ रही बाधाएं कम हो सकती हैं। नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारी या पद मिलने के योग बन सकते हैं। अधिकारियों की ओर से आपके काम की तारीफ हो सकती है। साथ ही आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत हैं।

    धनु राशि

    धनु राशि के लोगों के लिए यह अवधि नई शुरुआत के लिहाज से बेहतर साबित हो सकती है। किसी महत्वपूर्ण काम में सफलता मिलने की संभावना है। जीवनसाथी और परिवार का साथ मिलेगा। आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है और निवेश के नए अवसर सामने आ सकते हैं। लंबे समय से अटका हुआ पैसा वापस मिलने से भी राहत मिल सकती है।

    मीन राशि

    मीन राशि के जातकों के लिए मंगल का पुनर्वसु नक्षत्र में जाना सकारात्मक परिणाम देने वाला माना जा रहा है। कारोबार बढ़ाने के नए अवसर मिल सकते हैं। कामकाज की बाधाएं दूर होने से तनाव कम हो सकता है। नौकरी और रोजगार से जुड़े मामलों में तरक्की के योग बन सकते हैं। इस दौरान किसी खास व्यक्ति से मुलाकात भी भविष्य में लाभ दे सकती है।

    मंगल के नक्षत्र परिवर्तन को क्यों माना जा रहा खास?

    ज्योतिषीय मान्यताओं में मंगल को साहस, ऊर्जा, पराक्रम, भूमि और संपत्ति का कारक माना गया है। वहीं पुनर्वसु नक्षत्र के स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। ऐसे में मंगल का पुनर्वसु नक्षत्र में प्रवेश कुछ राशियों के लिए नई शुरुआत, प्रगति और उन्नति से जोड़कर देखा जाता है।

  • साल 2026 का आखिरी चंद्र ग्रहण आज… जानिए किस राशि पर इसका क्या होगा प्रभाव?

    साल 2026 का आखिरी चंद्र ग्रहण आज… जानिए किस राशि पर इसका क्या होगा प्रभाव?


    नई दिल्ली।
    आज 28 अगस्त को साल का आखिरी व दूसरा चंद्र ग्रहण (Chandra Grahan 2026) लग चुका है. जिस चंद्र ग्रहण की हम बात कर रहे हैं, वह सामान्य या पूर्ण चंद्र ग्रहण नहीं है. यह उपच्छाया चंद्र ग्रहण (Penumbral Lunar Eclipse) है, जिसे मालिन्य चंद्र ग्रहण भी कहा जाता है. भारतीय समय के अनुसार, इसका समापन दोपहर 12 बजकर 31 मिनट पर होगा।

    ज्योतिषीय दृष्टि से यह उपछाया चंद्र ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में लगेगा. शतभिषा नक्षत्र के स्वामी राहु हैं, जबकि कुंभ राशि के स्वामी शनि हैं. ऐसे में ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस ग्रहण में शनि और राहु का प्रभाव भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


    मेष राशि

    मेष राशि वालों के लिए यह ग्रहण अनुकूल माना जा रहा है. करियर में बड़ा अवसर मिल सकता है और लंबे समय से सफलता के लिए प्रयास कर रहे लोगों को अच्छे परिणाम मिलने की संभावना है. स्थान परिवर्तन के योग भी बन सकते हैं और यह बदलाव आपके लिए लाभकारी साबित हो सकता है. हालांकि अगले 15 दिन से एक महीने के दौरान यात्राओं में सावधानी रखें. किसी भी यात्रा में लापरवाही न करें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद शिव मंदिर जाकर भगवान शिव को जल अर्पित करें. ऐसा करना आपके लिए शुभ माना जाता है.


    वृषभ राशि

    वृषभ राशि के लोगों के रुके हुए काम इस दौरान पूरे होने की संभावना है. लंबे समय से चली आ रही समस्याओं का समाधान मिल सकता है. अगर कोई विवाद, झगड़ा या कानूनी मामला चल रहा है तो उसमें भी राहत मिलने की संभावना है. करियर के मामले में स्थिति सामान्य से बेहतर रह सकती है, लेकिन कोई बड़ा जोखिम लेने से बचें. अपने महत्वपूर्ण कार्यों को समय पर पूरा करने का प्रयास करें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद भगवान शिव को एक लोटा जल अर्पित करें.

    मिथुन राशि
    मिथुन राशि के लोगों को अगले 15 दिन से एक महीने तक विशेष सावधानी बरतने की जरूरत हो सकती है. स्वास्थ्य का ध्यान रखें और बेवजह के विवाद या कानूनी मामलों से बचने का प्रयास करें. संतान को लेकर चिंता बढ़ सकती है. संतान के स्वास्थ्य या करियर को लेकर परेशानियां सामने आ सकती हैं. ऐसे में उनसे बातचीत करें और उनकी समस्याओं को समझने का प्रयास करें. यात्राओं में विशेष सावधानी रखें. अगर बहुत जरूरी न हो तो लंबी यात्राओं से बचना बेहतर होगा.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    कर्क राशि

    कर्क राशि के लोगों के लिए यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण रह सकता है. करियर में अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है. नौकरी और व्यापार को लेकर सतर्क रहें और किसी तरह की लापरवाही न करें. स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें. चोट, दुर्घटना या अचानक स्वास्थ्य संबंधी परेशानी से बचने के लिए सावधानी जरूरी है. परिवार की महिलाओं, विशेष रूप से माता, पत्नी, बेटी या बहन के स्वास्थ्य पर भी ध्यान दें. अगले एक महीने तक काम का उतना ही दबाव लें, जितना आप आसानी से संभाल सकें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चीनी का दान करें.


    सिंह राशि

    सिंह राशि वालों को स्वास्थ्य को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है. पाचन और हड्डियों से संबंधित समस्याओं पर ध्यान दें. चोट या फ्रैक्चर जैसी स्थिति से बचने के लिए सावधानी रखें. करियर में किसी तरह का जोखिम न लें. नौकरीपेशा लोग विशेष रूप से अपने काम में लापरवाही से बचें. पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में भी तनाव की स्थिति बन सकती है, इसलिए धैर्य से काम लें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चावल का दान करें.


    कन्या राशि

    कन्या राशि वालों को स्वास्थ्य के मामले में सावधानी रखनी चाहिए. चोट या दुर्घटना से बचने के लिए सतर्क रहें. कान, नाक और गले से जुड़ी परेशानियों का ध्यान रखें. लिखापढ़ी, दस्तावेजों और पैसे के लेन-देन में विशेष सावधानी बरतें. किसी भी कागज पर बिना जांचे हस्ताक्षर न करें. पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों में भी सोच-समझकर व्यवहार करें, क्योंकि छोटी गलतफहमी विवाद का कारण बन सकती है.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    तुला राशि

    तुला राशि वालों को धन के मामले में सावधान रहने की जरूरत है. अचानक खर्च या आर्थिक नुकसान की स्थिति बन सकती है. पैसों के लेन-देन में जल्दबाजी न करें. स्वास्थ्य के मामले में भी सावधान रहें. पाचन और पेट से जुड़ी समस्याएं परेशान कर सकती हैं. चोट या दुर्घटना से बचने के लिए सतर्कता जरूरी है. करियर में कोई लापरवाही न करें और नौकरीपेशा लोग अपने काम को गंभीरता से लें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चीनी का दान करें.


    वृश्चिक राशि

    वृश्चिक राशि के लोगों के पारिवारिक जीवन में कुछ परेशानियां आ सकती हैं. माता-पिता, पति-पत्नी या अन्य करीबी लोगों के साथ मतभेद हो सकते हैं. बेवजह का तनाव और विवाद बढ़ने की संभावना है. धन और संपत्ति के मामले में अगले एक महीने तक सावधानी रखें. प्रॉपर्टी खरीदने, बेचने या बड़ा निवेश करने में जल्दबाजी न करें. रिश्तों और मित्रता में भी धैर्य से काम लें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    धनु राशि

    धनु राशि वालों के लिए यह ग्रहण अनुकूल परिणाम दे सकता है. करियर में लंबे समय से चली आ रही रुकावटें दूर हो सकती हैं. रुका हुआ काम पूरा होने और करियर में सफलता मिलने की संभावना है. आर्थिक मामलों में भी सुधार देखने को मिल सकता है. फंसा हुआ या लंबे समय से रुका पैसा मिलने की संभावना है. हालांकि भाई-बहन के साथ संबंधों का ध्यान रखें और उनके स्वास्थ्य को लेकर भी सजग रहें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद शिव मंदिर जाकर भगवान शिव को जल अर्पित करें.


    मकर राशि

    मकर राशि वालों को स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए. आंख, कान, नाक और गले से जुड़ी परेशानियों से सावधान रहें. नौकरी या व्यापार जैसा चल रहा है, उसे फिलहाल स्थिरता से चलने दें. करियर में कोई बड़ा जोखिम न लें. नई नौकरी, स्थान परिवर्तन, प्रॉपर्टी खरीदने या अन्य बड़े फैसलों में जल्दबाजी से बचें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चावल का दान करें.

    कुंभ राशि

    यह ग्रहण कुंभ राशि में लग रहा है, इसलिए कुंभ राशि वालों को विशेष रूप से अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने की जरूरत बताई जा रही है. स्वास्थ्य के मामले में लापरवाही न करें. रिश्तों और संबंधों में भी सतर्क रहें. गुस्से या विवाद की वजह से कोई करीबी रिश्ता प्रभावित न हो, इसका ध्यान रखें. महत्वपूर्ण कामों को टालने से बचें, क्योंकि देरी आपके लिए परेशानी का कारण बन सकती है.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को दूध का दान करें.


    मीन राशि

    मीन राशि वालों के मन पर इस ग्रहण का असर पड़ने की बात कही जा रही है. मानसिक तनाव, चिंता और बेचैनी बढ़ सकती है. बेवजह की बातों को लेकर ज्यादा सोचने से बचें. स्थान परिवर्तन के योग भी बन सकते हैं. ऐसे में जीवन या करियर से जुड़े बदलाव सामने आ सकते हैं. भावनात्मक रूप से खुद को मजबूत रखें और जल्दबाजी में कोई फैसला न लें. यात्रा और दुर्घटना के मामलों में भी सावधानी बरतें.

    उपाय: ग्रहण समाप्त होने के बाद किसी जरूरतमंद व्यक्ति को चीनी का दान करें.

  • तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"

    तीर्थ में मृत्यु पर क्या कहते हैं शास्त्र? "पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की मान्यता, लेकिन…"


    नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचाई है। हादसे में जान-माल के नुकसान के साथ बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबर है। यह आपदा उस समय आई, जब नेपाल और तिब्बत के रास्ते कैलास मानसरोवर की तीर्थयात्रा चल रही थी। हादसे में प्रभावित भारतीयों में बड़ी संख्या श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की बताई जा रही है।

    इस घटना के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तीर्थ में या तीर्थयात्रा के दौरान हो जाए तो हिंदू धर्मग्रंथ इसे किस दृष्टि से देखते हैं? क्या पुण्यभूमि में प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है? शास्त्रों और पुराणों में कई तीर्थों में देहत्याग की महिमा बताई गई है, लेकिन इसके साथ कर्म और अंतिम समय के विचारों को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    तीर्थ का अर्थ ही है भवसागर से पार जाने का माध्यम

    भारतीय परंपरा में तीर्थ केवल कोई धार्मिक स्थान नहीं है। ‘तीर्थ’ का अर्थ उस स्थान या माध्यम से जुड़ा है, जिसके सहारे मनुष्य संसार के बंधनों से पार जाने का प्रयास करता है। इसी कारण नदियों के तट, पर्वत, देवस्थल और प्राचीन धार्मिक नगर तीर्थ माने गए हैं।

    तीर्थयात्रा में स्नान, दर्शन, दान, तप, जप और आत्मशुद्धि जैसी साधनाएं शामिल होती हैं। इसलिए इसे केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की यात्रा नहीं, बल्कि धार्मिक संकल्प और साधना के रूप में देखा गया है।

    गीता में अंतिम समय के विचारों को सबसे अधिक महत्व

    तीर्थ में मृत्यु की मान्यता को समझने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता का संदर्भ महत्वपूर्ण है। आठवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अंतिम समय में मनुष्य की मानसिक अवस्था और उसके विचारों का महत्व बताते हैं।

    श्रीकृष्ण कहते हैं—

    अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
    यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥

    अर्थात जो व्यक्ति अंतिम समय में मेरा स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है, वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है।

    अगले श्लोक में इसी सिद्धांत को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है—

    यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
    तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥

    अर्थात मनुष्य अंतिम समय में जिस भाव का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी भाव को प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रीय दृष्टि से केवल मृत्यु का स्थान ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उस समय व्यक्ति का चित्त किस अवस्था में था, इसे भी अहम माना गया है।

    काशी में मृत्यु को लेकर सबसे बड़ी धार्मिक मान्यता

    तीर्थ में देहत्याग की चर्चा हो तो काशी का उल्लेख सबसे पहले आता है। काशी को ‘अविमुक्त क्षेत्र’ कहा गया है। स्कंदपुराण के काशीखंड सहित कई पौराणिक परंपराओं में इसकी विशेष महिमा बताई गई है।

    धार्मिक मान्यता है कि काशी में देह त्यागने वाले व्यक्ति को भगवान शिव तारक मंत्र का उपदेश देते हैं और उसे संसार के बंधन से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। इसी विश्वास के कारण सदियों से लोग जीवन के अंतिम चरण में काशी जाकर रहने की इच्छा रखते रहे हैं।

    हालांकि इतिहास में ‘करवत काशी’ जैसी कठोर परंपराओं का भी उल्लेख मिलता है। ऐसी मान्यताओं में मोक्ष की कामना से लोग काशी में जानबूझकर प्राण त्यागने तक के प्रयास करते थे। मीरा के पदों और कबीर की रचनाओं में भी ‘करवत कासी’ का संदर्भ मिलता है।

    केदार की यात्रा और कैलास पहुंचने की कथा

    स्कंदपुराण में तीर्थयात्रा से जुड़ी वसिष्ठ और उनके गुरु हिरण्यगर्भ की कथा भी मिलती है। दोनों हिमालय में केदार की यात्रा पर जाते हैं। यात्रा के दौरान असिधारा पर्वत पर हिरण्यगर्भ की मृत्यु हो जाती है।

    पुराण की कथा के अनुसार, तीर्थयात्रा के दौरान देह त्यागने और अंतिम समय में चित्त की शुद्ध अवस्था के कारण शिवगण उन्हें दिव्य विमान से कैलास ले जाते हैं। इस कथा में तीर्थयात्री की मृत्यु को शिवलोक की प्राप्ति से जोड़ा गया है।

    गरुड़ पुराण में पवित्र भूमि पर मृत्यु का उल्लेख

    गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प, अध्याय 14 में मृत्यु के बाद धर्मराज की सभा तक पहुंचने वाले पुण्यात्माओं का वर्णन मिलता है। इसमें काशी में मृत्यु, धर्म की रक्षा करते हुए प्राण त्यागने और योग करते हुए शरीर छोड़ने वालों के साथ पवित्र जल में दुर्घटनावश डूबने या पवित्र तीर्थ और पुण्यभूमि में मृत्यु होने का भी उल्लेख किया गया है।

    इसमें ऐसे पुण्यात्माओं के लिए धर्मराज की सभा की ओर जाने वाले उत्तरी मार्ग का वर्णन मिलता है। इससे यह संकेत मिलता है कि धार्मिक परंपरा में पुण्यभूमि पर मृत्यु को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया गया है।

    पांडवों की कथा बताती है कि केवल स्थान ही सब कुछ नहीं

    महाभारत में पांडवों की अंतिम यात्रा का प्रसंग भी इस विषय को अलग दृष्टि से समझाता है। यात्रा के दौरान द्रौपदी और चारों भाई एक-एक करके गिरते जाते हैं। युधिष्ठिर उनके पतन को उनके जीवन में मौजूद अलग-अलग दोषों से जोड़ते हैं।

    इस प्रसंग से यह विचार सामने आता है कि भारतीय शास्त्रीय परंपरा में स्थान के साथ कर्म और चित्त की भी भूमिका है। यानी किसी पवित्र स्थान पर मृत्यु को महत्व दिया गया है, लेकिन मनुष्य के कर्म और उसकी मानसिक अवस्था को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया गया।

    प्रयाग और अयोध्या की भी अलग धार्मिक मान्यताएं

    पद्मपुराण के स्वर्गखंड में प्रयाग और उसके आसपास के तीर्थों की महिमा का वर्णन मिलता है। इसमें गंगा और यमुना के तट पर स्थित तीर्थों में देह त्यागने की धार्मिक महत्ता बताई गई है। यहां तक कहा गया है कि इन पवित्र तीर्थों में मृत्यु पाने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता।

    इसी तरह स्कंदपुराण के वैष्णवखंड में अयोध्या में देहत्याग को ‘स्वर्गद्वार’ का मार्ग बताया गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ऐसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।

    क्या तीर्थ में मृत्यु से निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है?

    शास्त्रीय मान्यताओं को समग्र रूप से देखें तो इसका उत्तर इतना सीधा नहीं है कि तीर्थ में मृत्यु होते ही हर व्यक्ति को निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है। अलग-अलग पुराणों में कुछ तीर्थों की मृत्यु-महिमा जरूर बताई गई है, लेकिन गीता जैसे ग्रंथ अंतिम समय के भाव, स्मरण और चित्त की अवस्था को भी निर्णायक महत्व देते हैं।

    यही कारण है कि तीर्थयात्रा को केवल पर्यटन नहीं माना गया। इसमें संयम, उपवास, स्नान, दान, जप, देवदर्शन और सांसारिक आसक्तियों से दूरी जैसी साधनाएं जुड़ी हैं।

    इस दृष्टि से तीर्थयात्रा धार्मिक संकल्प के साथ शुरू होने वाली आध्यात्मिक यात्रा है। मान्यता है कि पुण्यभूमि का वातावरण मनुष्य के चित्त को ईश्वर और आध्यात्मिक चिंतन की ओर ले जाता है। इसलिए तीर्थ में मृत्यु को विशेष पुण्य से जोड़कर देखा गया है, लेकिन उसके साथ व्यक्ति के कर्म और अंतिम मानसिक भाव को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

  • कल का राशिफल: 28 अगस्त को ग्रहों की बदलेगी चाल 3 राशियों को मिलेगा धन लाभ नौकरी और कारोबार में बनेंगे नए अवसर

    कल का राशिफल: 28 अगस्त को ग्रहों की बदलेगी चाल 3 राशियों को मिलेगा धन लाभ नौकरी और कारोबार में बनेंगे नए अवसर


    नई दिल्ली। कल यानी 28 अगस्त का दिन ज्योतिषीय दृष्टि से कई राशियों के लिए महत्वपूर्ण रहने वाला है। ग्रहों की चाल और उनकी स्थिति का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में अलग अलग रूपों में दिखाई दे सकता है। किसी राशि के जातकों को लंबे समय से अटके काम में सफलता मिलने के संकेत हैं तो किसी के लिए आर्थिक मामलों में राहत के योग बन सकते हैं। नौकरी करने वाले लोगों को कार्यक्षेत्र में नई जिम्मेदारी या महत्वपूर्ण अवसर मिल सकता है जबकि व्यापार से जुड़े जातकों के लिए भी दिन लाभकारी साबित हो सकता है। हालांकि हर राशि के लिए दिन का प्रभाव अलग रहेगा इसलिए जरूरी है कि किसी भी बड़े फैसले में जल्दबाजी से बचें और परिस्थितियों को समझकर आगे बढ़ें।

    मेष राशि वालों के लिए कल का दिन आत्मविश्वास बढ़ाने वाला रह सकता है। कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत और सक्रियता का सकारात्मक परिणाम मिल सकता है। वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिलने से कोई महत्वपूर्ण काम आगे बढ़ सकता है। आर्थिक स्थिति सामान्य से बेहतर रहने की संभावना है लेकिन अनावश्यक खर्च पर नियंत्रण रखना जरूरी होगा। परिवार में किसी सदस्य की उपलब्धि से खुशी का माहौल बन सकता है।

    वृषभ राशि के जातकों को कल अपने काम पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी। कारोबार में नए संपर्क भविष्य में फायदा पहुंचा सकते हैं। किसी पुराने निवेश से लाभ मिलने की संभावना बन सकती है। नौकरी में जिम्मेदारियां बढ़ सकती हैं लेकिन इसके साथ आपकी स्थिति भी मजबूत होगी। रिश्तों के मामले में बातचीत के जरिए गलतफहमी दूर करने की कोशिश करें।

    मिथुन राशि के लिए कल का दिन नई योजनाओं को आगे बढ़ाने का हो सकता है। नौकरी बदलने या किसी नए प्रोजेक्ट से जुड़ने की सोच रहे हैं तो सकारात्मक संकेत मिल सकते हैं। विद्यार्थियों के लिए पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ेगी। धन से जुड़े मामलों में सावधानी बरतें और बिना पूरी जानकारी के निवेश करने से बचें।

    कर्क राशि वालों के लिए परिवार और निजी जीवन महत्वपूर्ण रहेगा। घर के किसी सदस्य के साथ चल रही परेशानी बातचीत से सुलझ सकती है। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारी बढ़ सकती है और इसका भविष्य में फायदा मिलने की संभावना है। आर्थिक रूप से दिन संतुलित रहेगा लेकिन अचानक कोई खर्च सामने आ सकता है।

    सिंह राशि के जातकों के लिए कल आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता का दिन रह सकता है। किसी महत्वपूर्ण काम में आपकी राय को प्राथमिकता मिल सकती है। कारोबारियों को नई डील या ग्राहक से लाभ मिलने की संभावना है। हालांकि सफलता के साथ अहंकार से बचना जरूरी होगा। प्रेम संबंधों में साथी के साथ समय बिताने का अवसर मिल सकता है।

    कन्या राशि वालों को कल योजनाबद्ध तरीके से काम करने का लाभ मिलेगा। नौकरी में रुका हुआ काम पूरा हो सकता है और वरिष्ठ अधिकारी आपके प्रदर्शन से प्रभावित हो सकते हैं। धन के मामले में स्थिति मजबूत हो सकती है। स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही न करें और काम के बीच पर्याप्त आराम लें।

    तुला राशि के लिए कल का दिन रिश्तों और करियर दोनों के लिहाज से अहम रह सकता है। साझेदारी के काम में फायदा मिल सकता है लेकिन किसी भी समझौते को ध्यान से पढ़कर ही आगे बढ़ें। प्रेम जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकता है। खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा।

    वृश्चिक राशि वालों को कल किसी पुराने प्रयास का परिणाम मिल सकता है। आर्थिक लाभ के अवसर बनेंगे लेकिन जोखिम भरे फैसलों से बचना बेहतर रहेगा। कार्यक्षेत्र में विरोध करने वालों से दूरी बनाए रखें और अपनी रणनीति पर ध्यान दें। परिवार में किसी शुभ समाचार से मन प्रसन्न हो सकता है।

    धनु राशि के जातकों के लिए कल भाग्य का साथ मिलने के संकेत हैं। नौकरी कारोबार या शिक्षा से जुड़े मामलों में आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है। यात्रा का योग भी बन सकता है। किसी अनुभवी व्यक्ति की सलाह भविष्य के लिए उपयोगी साबित होगी। निवेश से जुड़े फैसलों में सोच समझकर कदम उठाएं।

    मकर राशि वालों को मेहनत का फल मिलने की संभावना है। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारी और प्रभाव दोनों बढ़ सकते हैं। आर्थिक मामलों में पुराने विवाद या अटकी रकम को लेकर राहत मिल सकती है। परिवार के साथ समय बिताने से मानसिक तनाव कम होगा।

    कुंभ राशि के लिए कल का दिन नए विचार और नई शुरुआत लेकर आ सकता है। नौकरी में बदलाव या नई जिम्मेदारी का अवसर मिल सकता है। कारोबार में तकनीक और नए संपर्कों का लाभ होगा। हालांकि जल्दबाजी में कोई बड़ा वित्तीय फैसला लेने से बचें।

    मीन राशि वालों के लिए कल का दिन मिलाजुला रह सकता है। आर्थिक स्थिति में सुधार के अवसर मिलेंगे लेकिन खर्च भी बढ़ सकता है। प्रेम और पारिवारिक संबंधों में भावनात्मक संतुलन बनाए रखना जरूरी होगा। किसी पुराने मित्र से मुलाकात या बातचीत मन को प्रसन्न कर सकती है।

    कुल मिलाकर 28 अगस्त का दिन कई राशियों के लिए अवसरों से भरा रह सकता है। ज्योतिषीय संकेतों के अनुसार मेहनत सही दिशा में हो तो सफलता की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। हालांकि राशिफल सामान्य ज्योतिषीय गणनाओं पर आधारित है और इसे निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं लेना चाहिए। अपने निर्णय परिस्थितियों और व्यक्तिगत विवेक के आधार पर लेना बेहतर रहेगा।

  • रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां

    रक्षाबंधन क्यों मनाते हैं? जानिए राखी से जुड़ी पौराणिक कहानियां


    उज्जैन।
    रक्षाबंधन भारत के उन त्योहारों में शामिल है, जिनका अर्थ केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने तक सीमित नहीं है। सावन की पूर्णिमा पर मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के स्नेह, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। समय के साथ राखी की परंपरा ने भी अलग-अलग रूप लिए और इसका अर्थ पारिवारिक रिश्ते से आगे बढ़कर सामाजिक एकता और भाईचारे तक पहुंचा।

    रक्षाबंधन का मतलब क्या है?

    ‘रक्षाबंधन’ शब्द संस्कृत के ‘रक्षा’ और ‘बंधन’ से मिलकर बना है, जिसका सामान्य अर्थ रक्षा का बंधन माना जाता है। इस दिन बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं, तिलक करती हैं, आरती उतारती हैं और उसके सुख-स्वास्थ्य की कामना करती हैं। भाई भी बहन की रक्षा और हर परिस्थिति में उसका साथ देने का संकल्प लेता है।

    हालांकि आज यह परंपरा सिर्फ सगे भाई-बहन तक सीमित नहीं है। कई जगह चचेरे-ममेरे भाई-बहन, मित्र और सामाजिक रूप से जुड़े लोग भी एक-दूसरे को राखी बांधते हैं।

    कृष्ण और द्रौपदी की कहानी

    रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित पौराणिक कथाओं में भगवान कृष्ण और द्रौपदी का प्रसंग शामिल है। महाभारत की प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार कृष्ण की उंगली में चोट लगने पर खून निकल आया। द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया।

    मान्यता है कि कृष्ण ने इस स्नेह और अपनत्व को याद रखा। इसी प्रसंग को बाद में रक्षा के भाव से जोड़कर देखा गया और इसे राखी की परंपरा से संबंधित लोकप्रिय कथाओं में जगह मिली।

    राजा बलि और माता लक्ष्मी का प्रसंग

    रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य कथा भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और राजा बलि की है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर उनके राज्य की रक्षा के लिए वहां रहने लगे थे।

    माता लक्ष्मी विष्णु से अलग नहीं रहना चाहती थीं। कथा के अनुसार उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बलि की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई माना। इसके बाद बलि ने भगवान विष्णु को उनके साथ वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस कहानी को श्रावण पूर्णिमा पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से जोड़ा जाता है।

    यमराज और यमुना की कहानी

    एक अन्य लोकप्रिय कथा मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार यमुना ने यमराज की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र की कामना की थी।

    इसी प्रसंग के आधार पर रक्षाबंधन को भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।

    इंद्र की कलाई पर शुचि ने बांधा रक्षा सूत्र

    रक्षा सूत्र की शक्ति से जुड़ी एक और पौराणिक कथा देवताओं और असुरों के युद्ध की है। कहा जाता है कि युद्ध में इंद्र कमजोर पड़ रहे थे। तब उनकी पत्नी शुचि ने गुरु बृहस्पति की सलाह पर इंद्र की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा।

    इसके बाद इंद्र ने युद्ध में विजय हासिल की। इस कथा में रक्षा सूत्र को सुरक्षा, शक्ति और आत्मविश्वास के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

    सिकंदर की पत्नी और राजा पुरु की कहानी कितनी प्रसिद्ध है?

    राखी से जुड़ी एक लोकप्रिय ऐतिहासिक कथा सिकंदर और भारतीय शासक राजा पुरु से संबंधित है। कहा जाता है कि सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु को राखी भेजकर उन्हें अपना भाई बनाया था। बाद में सिकंदर और पुरु के बीच युद्ध हुआ और प्रचलित कथा के अनुसार पुरु ने राखी के रिश्ते का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया।

    हालांकि इस प्रसंग को लेकर इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं और इसे प्रमाणित ऐतिहासिक घटना की बजाय लोकप्रिय कथा के रूप में देखना अधिक उचित माना जाता है।


    रानी कर्णावती और हुमायूं की कहानी

    रक्षाबंधन से जुड़ी सबसे चर्चित ऐतिहासिक कहानियों में मेवाड़ की रानी कर्णावती और मुगल शासक हुमायूं का प्रसंग भी है। लोकप्रिय मान्यता के अनुसार, संकट के समय रानी कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेजकर मदद मांगी थी।

    कहा जाता है कि हुमायूं ने इस रिश्ते का सम्मान किया और रानी की सहायता के लिए आगे बढ़ा। हालांकि इस कहानी के ऐतिहासिक प्रमाणों और घटनाक्रम को लेकर भी इतिहासकारों में बहस है।

    जब राखी बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक

    रक्षाबंधन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव बंगाल विभाजन के विरोध से जुड़ा है। 1905 में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल विभाजन की घोषणा के दौरान रवींद्रनाथ टैगोर ने राखी को सामाजिक एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया।

    टैगोर ने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधकर एकता का संदेश देने की अपील की। इस तरह राखी का अर्थ केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सामाजिक सद्भाव और एकजुटता का प्रतीक भी बनी।

    रक्षाबंधन पर कैसे होती है पूजा और रस्म?

    रक्षाबंधन के दिन बहनें पूजा की थाली तैयार करती हैं। इसमें आमतौर पर राखी, कुमकुम, अक्षत, दीपक और मिठाई रखी जाती है। भाई को तिलक लगाने और आरती करने के बाद उसकी कलाई पर राखी बांधी जाती है। इसके बाद मिठाई खिलाई जाती है और भाई बहन को उपहार देता है।

    आजकल राखियों के स्वरूप में भी काफी बदलाव आया है। पारंपरिक धागे वाली राखियों के साथ चांदी, सोने, रुद्राक्ष, मोती और कई तरह की डिजाइन वाली राखियां बाजार में उपलब्ध होती हैं।

    देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग परंपराएं

    श्रावण पूर्णिमा का महत्व भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूपों में दिखाई देता है।

    • नारली पूर्णिमा: महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में मछुआरा समुदाय समुद्र देवता वरुण की पूजा करता है और समुद्र में नारियल अर्पित करता है।
    • अवनि अवित्तम: दक्षिण भारत में कई ब्राह्मण समुदायों में इस दिन यज्ञोपवीत बदलने की परंपरा है। इसे उपाकर्म भी कहा जाता है।
    • कजरी पूर्णिमा: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों में कजरी गीत, पूजा और अच्छी फसल की कामना से जुड़ी परंपराएं हैं।
    • झूलन पूर्णिमा: पश्चिम बंगाल और ओडिशा में राधा-कृष्ण को झूले पर विराजमान कर इस पर्व को मनाने की परंपरा है।

    समय के साथ बदल गया राखी का अर्थ

    रक्षाबंधन की सबसे खास बात यह है कि इसका मूल भाव रिश्ते में सुरक्षा और विश्वास है, लेकिन समय के साथ इसकी व्याख्या बदलती रही है। कभी यह भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रहा, तो कभी सामाजिक एकता और भाईचारे का माध्यम बना।

    आज राखी को केवल भाई द्वारा बहन की रक्षा के वादे के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे के साथ खड़े रहने और रिश्ते की जिम्मेदारी निभाने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। यही बदलता अर्थ रक्षाबंधन को हर दौर में प्रासंगिक बनाए रखता है।