Category: Religious Astrology

  • अज्ञातवास का रहस्य: क्यों बने अर्जुन ‘बृहन्नला’, उर्वशी के श्राप ने कैसे बना दिया पांडवों के लिए वरदान

    अज्ञातवास का रहस्य: क्यों बने अर्जुन ‘बृहन्नला’, उर्वशी के श्राप ने कैसे बना दिया पांडवों के लिए वरदान


    नई दिल्‍ली । भारतीय महाकाव्य महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जिनमें श्राप भी अंततः वरदान बनकर सामने आते हैं। ऐसा ही एक रहस्यमय प्रसंग उस समय का है जब पांडवों को अपने वनवास के अंतिम वर्ष में अज्ञातवास बिताना पड़ा। इस दौरान महान धनुर्धर अर्जुन ने बृहन्नला नाम से किन्नर का रूप धारण किया था। दिलचस्प बात यह है कि यह रूप उन्हें स्वर्गलोक में मिली एक घटना के कारण प्राप्त हुआ था जिसने आगे चलकर पांडवों की रक्षा में अहम भूमिका निभाई।

    कथा के अनुसार एक समय अर्जुन अपने दिव्य अस्त्र शस्त्रों की प्राप्ति के लिए स्वर्गलोक गए थे जहां उनके पिता इंद्र का निवास था। वहां अर्जुन की वीरता तेज और सौंदर्य से प्रभावित होकर प्रसिद्ध अप्सरा उर्वशी उन पर मोहित हो गईं। उन्होंने अर्जुन के सामने प्रेम प्रस्ताव रखा लेकिन अर्जुन ने अत्यंत विनम्रता के साथ उसे अस्वीकार कर दिया। अर्जुन ने कहा कि वह उर्वशी को माता के समान मानते हैं क्योंकि वह उनके पूर्वज पुरुरवा की पत्नी रह चुकी थीं। इस कारण वह उन्हें मातृभाव से देखते हैं।

    अर्जुन की यह बात सुनकर उर्वशी को गहरा अपमान महसूस हुआ। क्रोधित होकर उन्होंने अर्जुन को श्राप दे दिया कि वह नपुंसक यानी किन्नर बन जाएंगे। यह श्राप सुनकर अर्जुन व्यथित हो गए और उन्होंने अपनी पीड़ा इंद्रदेव को बताई। तब इंद्रदेव ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि यह श्राप स्थायी नहीं रहेगा बल्कि केवल एक वर्ष के लिए प्रभावी होगा। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि भविष्य में यही श्राप उनके लिए उपयोगी सिद्ध होगा।

    समय बीता और वह अवसर भी आ गया जब पांडवों को 12 वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास बिताना था। अज्ञातवास के दौरान यदि उनकी पहचान उजागर हो जाती तो उन्हें फिर से वनवास भुगतना पड़ता। ऐसे में अर्जुन के लिए उर्वशी का श्राप वास्तव में वरदान बन गया। उन्होंने बृहन्नला नाम से किन्नर का रूप धारण किया और विराट नगरी में रहने लगे।

    इस दौरान अर्जुन ने राजा विराट की पुत्री उत्तरा को नृत्य और संगीत की शिक्षा देने का कार्य किया। बृहन्नला के रूप में अर्जुन ने न केवल अपनी पहचान छिपाए रखी बल्कि पांडवों के अज्ञातवास को सफलतापूर्वक पूरा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    अज्ञातवास के समय अन्य पांडवों ने भी अपनी पहचान छिपाने के लिए अलग अलग रूप धारण किए थे। युधिष्ठिर कंक नाम से राजसभा में सलाहकार बने भीम बल्लव नाम से रसोइया बने नकुल अस्तबल की देखभाल करने लगे और सहदेव गायों की सेवा में लग गए। वहीं द्रौपदी सैरंध्री बनकर रानी सुदेष्णा की दासी के रूप में केश सजाने का कार्य करने लगीं। इस प्रकार उर्वशी का दिया हुआ श्राप अंततः पांडवों के लिए वरदान साबित हुआ और अर्जुन के बृहन्नला रूप ने महाभारत की कथा में एक अनोखा और प्रेरणादायक अध्याय जोड़ दिया।

  • खरमास 2026: 15 मार्च से मांगलिक कार्यों पर विराम, अप्रैल-मई में विवाह के शुभ मुहूर्त

    खरमास 2026: 15 मार्च से मांगलिक कार्यों पर विराम, अप्रैल-मई में विवाह के शुभ मुहूर्त


    नई दिल्ली । सनातन धर्म में ग्रहों की चाल और शुभ मुहूर्त का अत्यंत महत्व माना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित गिरिधर गोपाल चौबे के अनुसार जब सूर्य देव बृहस्पति गुरु की राशि मीन में प्रवेश करते हैं तब खरमास का आरंभ होता है। साल 2026 में यह गोचर 14 मार्च की मध्य रात्रि को तड़के 3:07 बजे होगा और 15 मार्च से मीन संक्रांति के साथ ही खरमास शुरू हो जाएगा।

    खरमास की अवधि में विवाह गृह प्रवेश मुंडन और नए व्यापार जैसी मांगलिक गतिविधियों पर रोक रहती है। पंडित चौबे बताते हैं कि इस समय पूजा पाठ दान और तप अत्यंत शुभ और फलदायी माने जाते हैं। सूर्य जब गुरु की राशियों धनु या मीन में होते हैं तो उनका तेज और प्रभाव विवाह जैसे भौतिक सुखों वाले कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता।

    विवाह के लिए शुक्र और गुरु ग्रह का उदय और शुभ स्थिति जरूरी है। गुरु को कन्या की कुंडली में पति का कारक और शुक्र को वर की कुंडली में पत्नी और दाम्पत्य सुख का प्रतीक माना जाता है। यदि ये ग्रह अस्त हों तो विवाह संपन्न नहीं किया जाता। इस वर्ष 28 फरवरी को शुक्र के मीन राशि में प्रवेश के बाद स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आया है।

    विवाह के लिए शुभ नक्षत्र जैसे रोहिणी मृगशिरा और रेवती शुभ तिथि और अनुकूल लग्न का संयोग होना आवश्यक है। रविवार सोमवार बुधवार गुरुवार और शुक्रवार को विशेष रूप से विवाह के लिए अनुकूल दिन माने जाते हैं।

    खरमास की समाप्ति 14 अप्रैल 2026 को होगी जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश कर मेष संक्रांति मनाएंगे। इसके तुरंत बाद विवाह जैसे मांगलिक कार्य फिर से शुरू किए जा सकते हैं। मिथिला पंचांग के अनुसार अप्रैल में 17 20 26 और 30 तारीखें और बनारसी पंचांग के अनुसार 15 16 20 21 25–30 अप्रैल की तिथियां विवाह के लिए अति शुभ हैं। मई माह में मिथिला पंचांग के अनुसार 1 6 8 10 और 13 मई और बनारसी पंचांग के अनुसार 1–8 12 और 13 मई को विवाह के विशेष योग बन रहे हैं।

    ग्रीष्मकाल में भी शुभ संयोग मिलते हैं। जून में 19 24–26 28 और 29 जून और जुलाई में 1 2 3 6 9 12 मिथिला पंचांग और 1 2 6–8 11 12 बनारसी पंचांग को विवाह के लिए अनुकूल मुहूर्त हैं। इसके बाद देवशयनी एकादशी के आसपास से पुनः मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा।

    पंडित चौबे कहते हैं कि जातकों को अपनी कुंडली के अनुसार स्थानीय विद्वान से सलाह लेकर ही लग्न तय करना चाहिए ताकि ग्रहों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त हो। इस प्रकार 15 मार्च से 14 अप्रैल 2026 तक खरमास रहेगा और इसके बाद अप्रैल मई के बीच विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए कई श्रेष्ठ मुहूर्त उपलब्ध हैं।

  • Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति

    Papmochani Ekadashi 2026: 16 मार्च को व्रत, शिवलिंग पर चढ़ाएं ये 5 चीजें, पापों और कष्टों से मिले मुक्ति


    नई दिल्ली। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पावन तिथि पापमोचनी एकादशी इस वर्ष 16 मार्च 2026 को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान विष्णु और महादेव की शक्ति के संगम का प्रतीक माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन विशेष साधना और शिवलिंग पर कुछ सामग्रियों का अर्पण जीवन के जटिल कष्टों, शनि दोष और पुराने पापों से मुक्ति दिलाने में अत्यंत प्रभावशाली है।

    पापमोचनी एकादशी पर शिवलिंग साधना का विशेष महत्व है। इस दिन भक्त शिवलिंग पर पांच महत्वपूर्ण चीजें अर्पित करके महादेव को प्रसन्न कर सकते हैं।

    1. शमी के पुष्प – रोग और दोषों से मुक्ति:
    नीलकंठेश्वर महादेव का स्मरण करते हुए शिवलिंग पर शमी के फूल चढ़ाएं। यह उपाय शरीर के रोगों और कुंडली में उपस्थित दोषों को दूर करने में मदद करता है।

    2. बिल्वपत्र और शहद – उत्तम स्वास्थ्य का वरदान:
    शिवलिंग पर जल अर्पित करते समय बिल्वपत्र पर थोड़ा शहद लगाकर अर्पित करें। शास्त्रों के अनुसार इससे समस्त पाप नष्ट होते हैं और भक्त को उत्तम स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    3. चावल और काले तिल – शनि दोष से राहत:
    शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से परेशान लोग इस दिन कच्चे चावल में काले तिल मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। पूजन के बाद इसे जरूरतमंद को दान करने से शनि देव की पीड़ा शांत होती है।

    4. गाय का शुद्ध घी – संकटों का नाश:
    शुद्ध गाय के घी से शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। यह उपाय घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है और जीवन में आने वाले आकस्मिक संकटों से सुरक्षा देता है।

    5. महामृत्युंजय मंत्र – संकट टालने की शक्ति:
    पूजा के अंत में महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप अवश्य करें। एकादशी की पवित्र ऊर्जा और मंत्र का प्रभाव मिलकर जीवन के बड़े संकटों और कष्टों को टालने की क्षमता रखता है।

    पापमोचनी एकादशी का व्रत 16 मार्च 2026 को रखा जाएगा और इसका पारण अगले दिन शुभ मुहूर्त में करना श्रेष्ठ माना गया है। इस दिन की साधना से न केवल जीवन के कष्ट दूर होते हैं, बल्कि जन्मों के पापों से भी मुक्ति पाने का अद्वितीय अवसर मिलता है।

  • रविवार को सूर्य पूजा का महत्व: अर्घ्य, मंत्र जाप और दान से दूर होती हैं जीवन की बाधाएं शॉर्ट डिस्क्रिप्शन

    रविवार को सूर्य पूजा का महत्व: अर्घ्य, मंत्र जाप और दान से दूर होती हैं जीवन की बाधाएं शॉर्ट डिस्क्रिप्शन


    नई दिल्ली:  हिंदू धर्म में सप्ताह के हर दिन का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है और रविवार का दिन सूर्य देव की उपासना के लिए समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से सूर्य देव की पूजा करने और उन्हें जल अर्पित करने से जीवन में सुख समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ज्योतिष शास्त्र में भी सूर्य को आत्मा का कारक और ऊर्जा का प्रमुख स्रोत माना गया है इसलिए रविवार के दिन सूर्य पूजा करने से आत्मविश्वास बढ़ता है और मानसिक शांति प्राप्त होती है।

    मान्यता है कि रविवार की सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद सूर्य को अर्घ्य देने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली कई बाधाएं दूर हो सकती हैं। इसके लिए तांबे के लोटे में जल लेकर उसमें रोली लाल फूल चावल और लाल चंदन मिलाया जाता है और फिर सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मानसिक तनाव भी कम होने लगता है।

    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य को अर्घ्य देते समय मंत्रों का जाप करना भी बेहद लाभकारी माना जाता है। सूर्य मंत्रों के जाप से मन एकाग्र होता है और व्यक्ति के भीतर नई ऊर्जा का संचार होता है। माना जाता है कि अर्घ्य देते समय ॐ सूर्याय नमः ॐ आदित्याय नमः या ॐ वासुदेवाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।

    रविवार के दिन दान पुण्य करने की भी विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन गुड़ गेहूं तांबा या लाल रंग के वस्त्रों का दान करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से सूर्य देव की कृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति के जीवन में समृद्धि तथा खुशहाली बनी रहती है। कई लोग इस दिन जरूरतमंदों को भोजन कराकर भी पुण्य प्राप्त करते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवार के दिन कुछ ऐसे उपाय भी बताए गए हैं जिनसे नकारात्मक ऊर्जा को दूर किया जा सकता है। कहा जाता है कि स्नान करने के बाद एक नींबू को अपने ऊपर से सात बार घड़ी की दिशा में घुमाकर किसी सुनसान स्थान पर फेंक देने से नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं से मुक्ति मिल सकती है।

    इसी तरह शाम के समय घर के मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख समृद्धि का वास होता है। इसके अलावा रविवार के दिन घर में समुद्री नमक के पानी से पोछा लगाने की भी परंपरा बताई जाती है जिससे घर का वातावरण सकारात्मक और शांत बना रहता है।

    धार्मिक दृष्टि से रविवार के दिन व्यवहार में भी संयम रखना जरूरी माना गया है। इस दिन कटु वाणी बोलने क्रोध करने या अहंकार दिखाने से बचने की सलाह दी जाती है। सात्विक भोजन करना और सकारात्मक सोच बनाए रखना भी इस दिन शुभ माना जाता है।

  • जैसलमेर में पहली बार चादर महोत्सव: महामरी से बचाने वाले जैन-संत की 872 साल पुरानी चादर के दर्शन, 74 लाख की बोली

    जैसलमेर में पहली बार चादर महोत्सव: महामरी से बचाने वाले जैन-संत की 872 साल पुरानी चादर के दर्शन, 74 लाख की बोली


    नई दिल्ली । राजस्थान के जैसलमेर में जैन समाज के पहले चादर महोत्सव की शुरुआत शुक्रवार को हो गई। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश विदेश से लगभग 25 हजार श्रद्धालु पहुंचे। महोत्सव का मुख्य आकर्षण थे जैन संत दादा श्री जिनदत्त सूरी महाराज के 872 साल पुराने वस्त्र जिन्हें करीब 144 साल बाद पहली बार श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए बाहर लाया गया।

    वस्त्रों का विशेष अभिषेक मानसरोवर के पवित्र जल से किया गया। अभिषेक और पूजा के लिए बोली लगाई गई जिसमें फलोदी के रहने वाले रविंद्र कुमार ने 74 लाख रुपये की बोली लगाई। पूजा के लिए भी क्रमशः 21 लाख और 11 लाख की दो बोली लगी।

    महोत्सव के दौरान जैसलमेर के प्रसिद्ध सोना किले से शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा गढ़ीसर होते हुए देदांसर ग्राउंड पहुंची। महाराष्ट्र सरकार के मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने वरघोड़ा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस दौरान ड्रोन से फूलों की बारिश की गई। सोनार किले से विंटेज कार में चादर को महोत्सव स्थल तक ले जाया गया जहां पानी के जहाज जैसी रथ में चादर को दर्शन के लिए रखा गया।महोत्सव स्थल पर परंपरानुसार चादर का विधिवत अभिषेक किया जाएगा।

    इसके साथ ही देश विदेश से आए श्रद्धालु दादागुरु इकतीसा का 1 करोड़ 8 लाख सामूहिक पाठ करेंगे।जैसलमेर जैन ट्रस्ट के अध्यक्ष महेंद्र सिंह भंसाली ने बताया कि इतिहास में विक्रम संवत 1211 में अजमेर में दादा गुरुदेव का स्वर्गवास हुआ। उनके शरीर का अंतिम संस्कार हुआ लेकिन वस्त्र सुरक्षित रहे और बाद में पाटन में रखे गए। लगभग 145 साल पहले जैसलमेर में महामारी फैलने पर महारावल ने पवित्र वस्त्रों को पाटन से मंगवाया। मान्यता है कि वस्त्रों के आते ही जैसलमेर महामारी से मुक्त हो गया। तब से ये वस्त्र जैसलमेर के ज्ञान भंडार में सुरक्षित रखे गए हैं।

    जैन समाज के इतिहास में यह पहला अवसर है जब चादर महोत्सव का आयोजन किया गया है। इस महोत्सव के माध्यम से श्रद्धालु न केवल जैन धर्म के ऐतिहासिक प्रतीकों को देख सकते हैं बल्कि उनकी पूजा अर्चना और अभिषेक में भाग लेकर धार्मिक पुण्य भी प्राप्त कर सकते हैं।

  • Sheetla Ashtami 2026: आरोग्यता की देवी माँ शीतला को क्यों प्रिय है 'ठंडा प्रसाद'? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और परंपराएं।

    Sheetla Ashtami 2026: आरोग्यता की देवी माँ शीतला को क्यों प्रिय है 'ठंडा प्रसाद'? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और परंपराएं।


    नई दिल्ली :सनातन परंपरा में चैत्र मास केवल एक कैलेंडर का महीना नहीं, बल्कि यह नई ऊर्जा, नववर्ष के उल्लास और प्रकृति के श्रृंगार का समय है। इसी पावन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘बसोड़ा’ या ‘शीतला अष्टमी’ का पर्व पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से “आरोग्यता” और “स्वच्छता” की अधिष्ठात्री देवी “माँ शीतला” को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माँ शीतला का स्वरूप अत्यंत शीतल है और वे अपने भक्तों को चेचक, खसरा और ज्वर जैसी बीमारियों से मुक्त रखती हैं।

    वर्ष 2026 में बसोड़ा का पर्व 11 मार्च को मनाया जाएगा। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, अष्टमी तिथि 11 मार्च की मध्य रात्रि 01:54 बजे से प्रारंभ होकर 12 मार्च की सुबह 04:19 बजे तक रहेगी। उदया तिथि की महत्ता के कारण 11 मार्च को ही मुख्य पूजन संपन्न होगा। इस दिन भक्तों के लिए पूजन का “शुभ मुहूर्त” सुबह 06:35 से शाम 06:27 तक रहेगा, जो साधना और संकल्प के लिए अत्यंत श्रेयस्कर है।

    बसोड़ा की सबसे विशिष्ट और अनूठी परंपरा है “बासी भोजन” का भोग। इस पर्व के नाम ‘बसोड़ा’ का अर्थ ही ‘बासी’ से जुड़ा है। लोक परंपरा के अनुसार, इस दिन घर में चूल्हा जलाना पूरी तरह वर्जित माना गया है। अग्नि को “ताप” और “उष्णता” का प्रतीक माना जाता है, जो शीतलता की देवी माँ शीतला के स्वभाव के विपरीत है। इसलिए, अष्टमी से एक दिन पहले यानी “सप्तमी” की शाम को ही विशेष पकवान जैसे मीठे चावल (ओलिया), राबड़ी, दही, पुए, और परांठे तैयार कर लिए जाते हैं। अष्टमी की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद, इन्हीं ठंडे पकवानों का भोग माता को लगाया जाता है और परिवार के सभी सदस्य इसी ‘ठंडे प्रसाद’ को ग्रहण करते हैं।

    इस परंपरा के पीछे गहरा “वैज्ञानिक तर्क” भी छिपा है। चैत्र मास वह समय होता है जब सर्दियाँ विदा हो रही होती हैं और गर्मियों का आगमन होता है। ऋतु परिवर्तन के इस संधिकाल में शरीर में पित्त और गर्मी बढ़ने की आशंका रहती है। आयुर्वेद और लोक मान्यताओं के अनुसार, शीतल भोजन ग्रहण करना शरीर को आने वाली भीषण गर्मी के लिए तैयार करने और पाचन तंत्र को संतुलित रखने का एक माध्यम है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि अब से ताजे और ठंडे भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

    पूजा की विधि भी उतनी ही सरल और भावपूर्ण है। भक्त सुबह स्वच्छ वस्त्र धारण कर हाथ में जल लेकर परिवार की “सुख-शांति” और रोगों से मुक्ति का संकल्प लेते हैं। माता की प्रतिमा को हल्दी, रोली और अक्षत अर्पित किए जाते हैं। पूजन के बाद माता के चरणों में अर्पित किए गए जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस जल को पूरे घर में छिड़कने की परंपरा है, जिससे घर की “नकारात्मक ऊर्जा” नष्ट होती है और वातावरण शुद्ध होता है। संक्षेप में, बसोड़ा का यह पर्व हमें अनुशासन, स्वच्छता और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

  • किराये के घर में शिफ्ट होने से पहले अपनाएं ये वास्तु उपाय, बनी रहेगी सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा

    किराये के घर में शिफ्ट होने से पहले अपनाएं ये वास्तु उपाय, बनी रहेगी सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा


    नई दिल्ली। आज के समय में बढ़ती आबादी और शहरीकरण के कारण बड़ी संख्या में लोग किराये के घरों में रहते हैं। हालांकि अक्सर लोग अपना घर खरीदने के बाद ही वास्तु शास्त्र पर ध्यान देते हैं लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार किराये के घर में रहने वाले लोगों के लिए भी वास्तु के नियम उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। यदि किराये के घर में प्रवेश करते समय कुछ जरूरी वास्तु उपायों का ध्यान रखा जाए तो जीवन में सुख शांति समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    वास्तु शास्त्र के अनुसार जब भी कोई व्यक्ति नए घर में प्रवेश करता है चाहे वह अपना घर हो या किराये का तो शुभ समय और शुभ मुहूर्त में ही प्रवेश करना बेहतर माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार उस समय ग्रहों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है विशेष रूप से शुक्र ग्रह की स्थिति का विचार करना लाभकारी माना जाता है। हालांकि किराये के घर में प्रवेश करते समय खरमास जैसी स्थितियों को लेकर अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती।

    विशेषज्ञों के अनुसार घर में प्रवेश के दिन नवग्रह पूजा और हवन करवाना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव कम होता है। इसके साथ ही घर के मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण लगाना भी शुभ माना जाता है क्योंकि यह समृद्धि और शुभता का प्रतीक होता है।

    ज्योतिषाचार्य पंडित मनोत्पल झा के अनुसार किराये के मकान में प्रवेश करते समय कुछ सरल नियमों का पालन करने से घर में सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। उनका कहना है कि नए घर में प्रवेश के शुरुआती दिनों में मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है।

    किराये के घर में भी पूजा के लिए उत्तर पूर्व दिशा यानी ईशान कोण को सबसे शुभ माना जाता है। इसलिए घर में पूजा स्थान इसी दिशा में बनाना चाहिए और उस स्थान को साफ सुथरा तथा व्यवस्थित रखना चाहिए। इसके अलावा घर में कहीं भी पानी के नल या पाइप से लगातार पानी टपकता नहीं रहना चाहिए क्योंकि वास्तु के अनुसार यह धन हानि का संकेत माना जाता है।

    वास्तु शास्त्र यह भी सुझाव देता है कि घर के अंदर बहुत गहरे रंग जैसे काला या गहरा लाल अधिक मात्रा में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इन रंगों का अधिक प्रयोग नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकता है। इसके बजाय हल्के और सकारात्मक रंगों का उपयोग घर के वातावरण को शांत और सुखद बनाता है।

    घर में सात्विकता और सकारात्मक माहौल बनाए रखने के लिए कुछ लोग हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करने की भी सलाह देते हैं। सुबह और शाम उनकी पूजा करने से घर में सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इसके साथ ही उत्तर पश्चिम दिशा में सुगंधित अगरबत्ती जलाने से वातावरण पवित्र और शांत रहता है।

    वास्तु विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे घर किराये का हो या अपना यदि उसमें रहने वाले लोग साफ सफाई सकारात्मक सोच और धार्मिक परंपराओं का पालन करें तो घर में सुख शांति और समृद्धि बनी रहती है।

  • शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

    शीतला अष्टमी 2026: कब है बासोड़ा पूजा? जानिए तारीख, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व


    नई दिल्ली। हिंदू धर्म में शीतला अष्टमी का पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन शीतला माता की पूजा-अर्चना कर परिवार के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। शीतला अष्टमी को कई जगहों पर बासोड़ा या बासोड़ा पूजा के नाम से भी जाना जाता है। यह व्रत हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस दिन माता शीतला को ठंडे या बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता।

    वर्ष 2026 में शीतला अष्टमी का पर्व 11 मार्च बुधवार को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च को रात 1 बजकर 54 मिनट से हो रही है और यह तिथि 12 मार्च को सुबह 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च को रखा जाएगा। इस दिन श्रद्धालुओं को पूजा के लिए लगभग 12 घंटे का शुभ समय प्राप्त होगा।

    शीतला अष्टमी के दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 36 मिनट से प्रारंभ होकर शाम 6 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। वहीं इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 58 मिनट से 5 बजकर 47 मिनट तक रहेगा जिसे स्नान और ध्यान के लिए उत्तम समय माना जाता है। हालांकि इस दिन अभिजीत मुहूर्त नहीं है। वहीं राहुकाल दोपहर 12 बजकर 31 मिनट से 2 बजे तक रहेगा इसलिए इस समय में पूजा या शुभ कार्य करने से बचना चाहिए।

    इस वर्ष शीतला अष्टमी पर वज्र योग सिद्धि योग और ज्येष्ठा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। वज्र योग सुबह से लेकर 9 बजकर 12 मिनट तक रहेगा जिसके बाद सिद्धि योग प्रारंभ होगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार वज्र योग को अधिक शुभ नहीं माना जाता इसलिए शीतला माता की पूजा सिद्धि योग में करना अधिक फलदायी माना जाता है। इस योग में की गई पूजा से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

    शीतला अष्टमी का पर्व स्वास्थ्य और रोगों से सुरक्षा से जुड़ा हुआ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से चेचक जैसे संक्रामक रोगों से रक्षा होती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। शीतला माता को ठंडा भोजन प्रिय माना जाता है इसलिए इस दिन घर में नया भोजन नहीं बनाया जाता।

    परंपरा के अनुसार शीतला सप्तमी यानी  एक दिन पहले भोजन बनाकर रखा जाता है और अगले दिन वही ठंडा भोजन माता शीतला को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद परिवार के लोग भी उसी भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से माता शीतला प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को स्वास्थ्य सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

  • चैत्र अमावस्या 2026: क्यों होगा पितरों का श्राद्ध एक दिन पहले? जानिए तारीख, मुहूर्त और महत्व

    चैत्र अमावस्या 2026: क्यों होगा पितरों का श्राद्ध एक दिन पहले? जानिए तारीख, मुहूर्त और महत्व


    नई दिल्ली । हिंदू धर्म में चैत्र अमावस्या का दिन धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह महीने की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को आता है और इस दिन स्नान दान तर्पण पिंडदान और श्राद्ध जैसे कार्य पितरों के लिए किए जाते हैं। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पितरों के लिए श्राद्ध कर्म चैत्र अमावस्या से एक दिन पहले यानी 18 मार्च बुधवार को किए जाएंगे।

    वैदिक पंचांग के अनुसार 2026 में चैत्र अमावस्या तिथि की शुरुआत 18 मार्च सुबह 8:25 बजे से हो रही है और समाप्ति 19 मार्च गुरुवार को सुबह 6:52 बजे होगी। अमावस्या तिथि 19 मार्च को सुबह 6:52 बजे समाप्त हो जाने के कारण पितरों के श्राद्ध और तर्पण का मुहूर्त 18 मार्च के दिन ही आता है। इसे दर्श अमावस्या कहा जाता है। इस समय में 11:30 बजे से लेकर दोपहर 2:30 बजे के बीच श्राद्ध पिंडदान और दान आदि किए जा सकते हैं।

    चैत्र अमावस्या के दिन का ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:51 बजे से 5:39 बजे तक है जो स्नान और धार्मिक क्रियाओं के लिए उत्तम माना जाता है। अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:05 बजे से 12:53 बजे तक रहेगा। इस बार अमावस्या शुक्ल योग और उत्तर भाद्रपद नक्षत्र में है। शुक्ल योग प्रातः से देर रात 1:17 बजे तक रहेगा जबकि उत्तर भाद्रपद नक्षत्र प्रातः से 20 मार्च को सुबह 4:05 बजे तक रहेगा।

    चैत्र अमावस्या और दर्श अमावस्या दोनों ही दिन राज पंचक में आते हैं। राज पंचक इस वर्ष 16 मार्च सोमवार शाम 6:14 बजे से प्रारंभ होकर 19 मार्च तक चलेगा। इसे शुभ फलदायी पंचक माना जाता है जो दान और धार्मिक कार्यों के लिए बेहद लाभकारी है।

    धार्मिक मान्यता है कि चैत्र अमावस्या के दिन पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से पितृ दोष की शांति होती है। इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। वहीं जो लोग पितरों को तृप्त नहीं करते उन्हें जीवन में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

    स्नान और दान करना इस दिन विशेष पुण्य का कार्य माना जाता है। इस दिन लोग पितरों को तृप्त कर पुण्य अर्जित करते हैं और अपने जीवन में सुख-समृद्धि और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार इस वर्ष चैत्र अमावस्या और दर्श अमावस्या का यह समय पितृ पूजा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • आज रंग पंचमी पर लगाएं लड्डू गोपाल को ये प्रिय भोग, घर में बनी रहेगी सुख, समृद्धि और खुशहाली

    आज रंग पंचमी पर लगाएं लड्डू गोपाल को ये प्रिय भोग, घर में बनी रहेगी सुख, समृद्धि और खुशहाली


    नई दिल्ली । रंग पंचमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी लीलाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। होली के पांच दिन बाद आने वाला यह पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है और इस दिन कई घरों और मंदिरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार और पूजा होती है। माना जाता है कि जिस घर में लड्डू गोपाल की सेवा होती है वहां हमेशा सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है।

    भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को बच्चे की तरह ही समझा जाता है। उनकी देखभाल और पूजा भी उसी तरह की जाती है जैसे घर के छोटे बच्चों की। त्योहारों के समय उनके लिए विशेष मिठाइयाँ और व्यंजन बनाना एक परंपरा रही है। रंग पंचमी पर भी भक्त लड्डू गोपाल का श्रृंगार करते हैं और उन्हें स्वादिष्ट भोग अर्पित करते हैं।

    इस दिन लड्डू गोपाल को भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। सबसे प्रिय माना जाने वाला भोग गुजिया है। होली के समय बनने वाली यह मिठाई भगवान को बहुत प्रिय मानी जाती है। कई घरों और मंदिरों में रंग पंचमी पर सबसे पहले गुजिया लड्डू गोपाल को अर्पित की जाती है। माना जाता है कि इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गुजिया के अलावा चंद्रकला और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ भी भोग में लगाई जाती हैं।

    भगवान श्रीकृष्ण को दही बहुत प्रिय है इसलिए इस दिन लड्डू गोपाल को दही या मीठी दही का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है। अगर घर में दही से कोई व्यंजन उपलब्ध हो तो उसे भी अर्पित किया जा सकता है। केवल दही और चीनी मिलाकर भोग लगाना भी भगवान को प्रिय होता है और इससे परिवार में प्रेम और आपसी सद्भाव बना रहता है।

    जलेबी और मालपुए का भोग भी इस दिन लगाना विशेष लाभकारी माना जाता है। कई मंदिरों में रंग पंचमी पर जलेबी और मालपुए का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और भगवान की कृपा से घर में खुशहाली आती है।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान को भोग लगाने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा और भक्ति है। अगर भक्त सच्चे मन से भोग अर्पित करता है तो भगवान प्रसन्न होते हैं। इसलिए रंग पंचमी पर लड्डू गोपाल की सेवा करते समय प्रेम और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भोग लगाने के बाद भगवान की आरती करना और प्रसाद को परिवार में बाँटना भी शुभ माना जाता है।

    रंग पंचमी का त्योहार ब्रज क्षेत्र की परंपराओं से जुड़ा है जहां इस दिन रंगों और गुलाल के साथ भगवान कृष्ण की पूजा होती है। मंदिरों में भजन-कीर्तन और उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह पर्व प्रेम भक्ति और आनंद का प्रतीक है और भक्त इस दिन भगवान श्रीकृष्ण से सुख समृद्धि और शांति की कामना करते हैं।

    घर में लड्डू गोपाल की पूजा सुबह स्नान के बाद करें। सबसे पहले उनका श्रृंगार करें उन्हें नए वस्त्र पहनाएं और फूलों से सजाएं। इसके बाद मिठाइयाँ और दही का भोग लगाएं भगवान की आरती करें और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें। छोटे बच्चों को पूजा में शामिल करना भी शुभ माना जाता है क्योंकि इससे उनमें भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है।