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  • उज्जैन में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने किए महाकालेश्वर के दर्शन, सुख-शांति के लिए की विशेष प्रार्थना

    उज्जैन में विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने किए महाकालेश्वर के दर्शन, सुख-शांति के लिए की विशेष प्रार्थना

    मध्य प्रदेश।  विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने शुक्रवार को उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर पहुंचकर भगवान महाकाल के दर्शन किए। उन्होंने मंदिर में विधि-विधान के साथ पूजन-अर्चन किया और मध्य प्रदेश समेत पूरे देश में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखने की प्रार्थना की।

    उज्जैन की धार्मिक पहचान भगवान महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी हुई है। इसी आस्था के केंद्र में विधानसभा अध्यक्ष के पहुंचने पर मंदिर परिसर में निर्धारित व्यवस्थाओं के अनुसार उनका स्वागत किया गया। मंदिर प्रबंध समिति की ओर से सहायक प्रशासक मूलचंद जूनवाल ने उनका स्वागत और सत्कार किया।

    मंदिर पहुंचने के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने भगवान महाकाल के दर्शन किए। उन्होंने पूजा की विभिन्न प्रक्रियाओं में हिस्सा लेते हुए प्रदेश और देशवासियों के कल्याण की कामना की। पूजन के दौरान उन्होंने मध्य प्रदेश में सुख-शांति और समृद्धि बनाए रखने के लिए भगवान महाकाल से प्रार्थना की।

    दर्शन के बाद नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि बाबा महाकाल के दर्शन करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ है। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि मध्य प्रदेश और देश में सुख-समृद्धि बनी रहे तथा सभी प्रदेशवासियों का कल्याण हो।

    उन्होंने उज्जैन को आस्था और धार्मिक परंपराओं की महत्वपूर्ण नगरी बताते हुए कहा कि बाबा महाकाल की नगरी में आकर दर्शन करना उनके लिए सौभाग्य की बात है। मंदिर में दर्शन के दौरान श्रद्धालुओं में भी उत्साह का माहौल दिखाई दिया।

    नरेंद्र सिंह तोमर का यह दौरा ऐसे समय हुआ जब उज्जैन लगातार धार्मिक और पर्यटन गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर रहा है। महाकालेश्वर मंदिर में देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु नियमित रूप से दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

    विधानसभा अध्यक्ष के मंदिर दौरे को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था भी सख्त रखी गई थी। मंदिर परिसर और आसपास पुलिस तथा सुरक्षा कर्मचारियों की तैनाती की गई थी। अधिकारियों और कर्मचारियों ने निर्धारित सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत व्यवस्थाओं को संभाला।

    दर्शन और पूजन के दौरान मंदिर की सामान्य व्यवस्थाओं को भी बनाए रखा गया। श्रद्धालुओं की आवाजाही तथा धार्मिक गतिविधियां नियमित रूप से संचालित होती रहीं। मंदिर प्रबंध समिति के अधिकारी और कर्मचारी भी इस दौरान मौजूद रहे।

    पूजन कार्यक्रम पूरा होने के बाद नरेंद्र सिंह तोमर मंदिर परिसर से रवाना हो गए। उनके दौरे के दौरान मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और प्रदेश तथा देश की खुशहाली की कामना पर जोर रहा।

    महाकालेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रदेशवासियों के कल्याण और देश में सुख-समृद्धि की कामना दोहराई। उनका यह धार्मिक दौरा उज्जैन की धार्मिक परंपरा और जनप्रतिनिधियों की आस्था से जुड़ा कार्यक्रम रहा।

  • राशन के पैसे के इस्तेमाल पर डिजिटल निगरानी, CBDC आधारित DBT से बदलेगी खाद्य सब्सिडी की व्यवस्था

    राशन के पैसे के इस्तेमाल पर डिजिटल निगरानी, CBDC आधारित DBT से बदलेगी खाद्य सब्सिडी की व्यवस्था


    चंडीगढ़। सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी PDS में खाद्य सब्सिडी की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में CBDC यानी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी आधारित डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर व्यवस्था का शुभारंभ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पंजाब के राज्यपाल और चंडीगढ़ के प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने की। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और केंद्रीय राज्य मंत्री निमुबेन जयंतीभाई बंभणिया भी कार्यक्रम में मौजूद रहीं।

    इस नई व्यवस्था को खाद्य सब्सिडी के डिजिटल वितरण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयोग माना जा रहा है। सरकारी योजना के तहत चंडीगढ़ और दादरा एवं नगर हवेली ऐसे पहले केंद्र शासित प्रदेश हैं जहां पात्र लाभार्थियों तक खाद्य सब्सिडी प्रोग्रामेबल CBDC यानी डिजिटल रुपये के रूप में पहुंचाने की व्यवस्था शुरू की जा रही है। इसका मकसद सब्सिडी के वितरण को पारदर्शी और ट्रेसेबल बनाने के साथ यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी सहायता निर्धारित उद्देश्य के लिए ही इस्तेमाल हो।

    CBDC आधारित DBT की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रोग्रामेबल होना है। सामान्य बैंक खाते में मिलने वाली नकद राशि का इस्तेमाल लाभार्थी अपनी जरूरत के मुताबिक कर सकता है लेकिन इस व्यवस्था में डिजिटल लाभ को एक निर्धारित उद्देश्य से जोड़ा जा सकता है। खाद्य सब्सिडी के मामले में राशि का इस्तेमाल राशन और जरूरी खाद्य वस्तुओं की खरीद के लिए किया जा सकेगा। इसके लिए अधिकृत या सूचीबद्ध दुकानदारों के माध्यम से डिजिटल भुगतान की व्यवस्था होगी।

    इस व्यवस्था से लाभार्थियों को खाद्य वस्तुओं के चयन में भी अधिक विकल्प मिलने की बात कही गई है। गेहूं और चावल के अलावा दाल या अन्य आवश्यक खाद्य वस्तुओं की खरीद का विकल्प भी उपलब्ध कराया जा सकता है। तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि सब्सिडी की राशि को किसी दूसरे काम में डायवर्ट न किया जा सके। शिवराज सिंह चौहान ने इस पहल को तकनीक और जनकल्याणकारी योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल का उदाहरण बताया और इसे विकसित करने वाली विभागीय टीम की सराहना की।

    चंडीगढ़ में शुरू किया गया मॉडल केवल स्थानीय प्रयोग तक सीमित नहीं माना जा रहा है। सरकार इसे भविष्य में अन्य क्षेत्रों में लागू किए जाने वाले मॉडल के रूप में देख रही है। इससे खाद्य सब्सिडी के वितरण में होने वाले लेनदेन का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा और पूरी प्रक्रिया को अधिक ट्रेसेबल बनाया जा सकेगा। इससे सरकारी सहायता के सही लाभार्थी तक पहुंचने और उसके निर्धारित उद्देश्य में इस्तेमाल होने की निगरानी मजबूत होने की उम्मीद है।

    कार्यक्रम के दौरान शिवराज सिंह चौहान ने किसानों और गरीबों के हितों को सरकार की प्राथमिकता बताया। उन्होंने कहा कि कृषि नीति और खाद्य सुरक्षा से जुड़े फैसलों में किसान हित और जनहित सर्वोच्च रहेंगे। उन्होंने देश में गेहूं और धान के पर्याप्त भंडार का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करने में सक्षम है और जरूरत पड़ने पर खाद्यान्न का निर्यात भी कर सकता है।

    केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को भी गरीब परिवारों के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा बताया। उनका कहना था कि खाद्य सुरक्षा से परिवारों के खर्च का बोझ कम होता है और बची हुई राशि बच्चों की शिक्षा तथा दूसरी जरूरी जरूरतों पर खर्च की जा सकती है। सरकार का लक्ष्य है कि जरूरतमंद परिवारों तक योजनाओं का लाभ बिना अनावश्यक बाधा के पहुंचे।

    शिवराज सिंह चौहान ने तकनीक आधारित इस पहल को सरकार की उस सोच से जोड़ा जिसमें सरकारी योजनाओं का लाभ कागजों और फाइलों तक सीमित न रहकर सीधे लोगों की जिंदगी में दिखाई देना चाहिए। CBDC आधारित DBT इसी दिशा में एक नया प्रयोग है जिसमें डिजिटल रुपये के जरिए खाद्य सब्सिडी को अधिक उद्देश्यपूर्ण और पारदर्शी तरीके से लाभार्थियों तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

  • आरबीआई के नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 50 अरब डॉलर तक पूंजी आने की संभावना, रिपोर्ट में बड़ा अनुमान

    आरबीआई के नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 50 अरब डॉलर तक पूंजी आने की संभावना, रिपोर्ट में बड़ा अनुमान


    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से हाल के महीनों में किए गए तरलता समर्थन उपायों और नियामकीय सुधारों से देश के बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पूंजी प्रवाह की संभावना जताई गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इन पहलों के चलते भारतीय बैंकिंग प्रणाली में करीब 50 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त पूंजी आ सकती है। इससे बैंकों की पूंजीगत स्थिति मजबूत होने के साथ विदेशी मुद्रा तरलता में भी सुधार की उम्मीद है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई की एफसीएनआर बी जमा योजना के तहत भारतीय बैंक अब तक 36.7 अरब डॉलर जुटा चुके हैं। उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, विशेष सुविधा की निर्धारित समयसीमा समाप्त होने से पहले यह राशि बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। इससे बैंकों को विदेशी मुद्रा संसाधनों का अतिरिक्त आधार मिलेगा और वित्तीय प्रणाली की मजबूती बढ़ सकती है।

    भारतीय बैंकिंग क्षेत्र फिलहाल व्यापक नियामकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आरबीआई ने तरलता प्रबंधन, ऋण जोखिम, पूंजी पर्याप्तता, ग्राहक संरक्षण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से जुड़े गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में सुधारों को आगे बढ़ाया है। इनका उद्देश्य बैंकिंग व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, मजबूत और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना है।

    विदेशी मुद्रा जमा को बढ़ावा देने के लिए एफसीएनआर बी स्वैप सुविधा और अनिवासी भारतीयों की जमा दरों से संबंधित अस्थायी सीमा हटाने जैसे कदम भी उठाए गए हैं। इन उपायों से विदेशी जमाकर्ताओं के लिए भारतीय बैंकों में जमा करना अधिक आकर्षक हुआ है। साथ ही हेजिंग लागत में कमी आने से बैंकों को विदेशी मुद्रा संसाधन जुटाने में मदद मिली है।

    बैंकिंग क्षेत्र में हो रहे बदलाव केवल पूंजी जुटाने तक सीमित नहीं हैं। नियामकीय ढांचे में ऋण जोखिम और पूंजी प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जा रहे हैं। अपेक्षित क्रेडिट नुकसान यानी ईसीएल ढांचे और संशोधित बेसल तीन क्रेडिट रिस्क मानदंडों की दिशा में बढ़ना बैंकिंग क्षेत्र के लिए अहम बदलाव माना जा रहा है।

    इन प्रावधानों का असर बैंकों की ऋण मूल्य निर्धारण रणनीति पर पड़ सकता है। बैंकों को यह आकलन करना होगा कि किसी ऋण के लिए कितनी पूंजी रखी जाए, जोखिम के अनुरूप ब्याज दर कैसे तय की जाए और अलग-अलग पोर्टफोलियो में जोखिम का प्रबंधन किस तरह किया जाए। इससे बैंकिंग कारोबार की लागत, पूंजी आवंटन और लाभप्रदता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    तकनीकी क्षेत्र में भी नियामकीय अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। एआई गवर्नेंस से जुड़े नियमों का उद्देश्य बैंकों में नई तकनीकों के इस्तेमाल के दौरान जोखिम, पारदर्शिता और ग्राहक हितों को सुरक्षित रखना है। आने वाले समय में वे बैंक अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकते हैं जो पूंजी नियोजन, जोखिम प्रबंधन और तकनीकी गवर्नेंस में तेजी से बदलाव लागू करेंगे।

    आरबीआई के कदमों का असर भारत के बाहरी क्षेत्र पर भी दिखाई देने की संभावना जताई गई है। एक अन्य अनुमान के अनुसार, देश का पूंजी खाता अधिशेष बढ़कर करीब 108 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा लगभग 2 अरब डॉलर रहा था।

    भुगतान संतुलन को लेकर भी सकारात्मक अनुमान सामने आया है। वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का भुगतान संतुलन करीब 64 अरब डॉलर के अधिशेष में रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।

    यदि विदेशी मुद्रा प्रवाह और बैंकिंग क्षेत्र की पूंजी स्थिति में अपेक्षित सुधार होता है, तो इससे वित्तीय प्रणाली की स्थिरता को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, नियामकीय बदलावों का वास्तविक प्रभाव बैंकों की तैयारी, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और घरेलू ऋण मांग सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।

  • मुख्यमंत्री कार्यालय में अब हर दिन तय रहेंगे अधिकारी, मंत्रालय और समत्व के लिए जारी हुआ साप्ताहिक रोस्टर

    मुख्यमंत्री कार्यालय में अब हर दिन तय रहेंगे अधिकारी, मंत्रालय और समत्व के लिए जारी हुआ साप्ताहिक रोस्टर


    भोपाल। मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री कार्यालय और मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में अब सप्ताह के सातों दिन अधिकारियों की मौजूदगी और जिम्मेदारियां तय रहेंगी। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से अधिकारियों का साप्ताहिक रोस्टर जारी किया गया है। इसके तहत सोमवार से रविवार तक अलग-अलग अधिकारियों को मंत्रालय और समत्व में जिम्मेदारी सौंपी गई है। अधिकारियों को मुख्यमंत्री के निर्धारित कार्यक्रमों बैठकों और मुलाकातों से जुड़े कार्यों में समन्वय की जिम्मेदारी निभानी होगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों को व्यवस्थित तरीके से संचालित करने के साथ आम नागरिकों से होने वाली मुलाकातों के दौरान भी प्रशासनिक समन्वय सुनिश्चित करना है।

    जारी रोस्टर के अनुसार सोमवार को मंत्रालय में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे की ड्यूटी रहेगी। वहीं समत्व में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर जिम्मेदारी संभालेंगे। मंगलवार को मंत्रालय में डॉ. सुदाम खाड़े और अरुण परमार मौजूद रहेंगे जबकि समत्व में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा को जिम्मेदारी दी गई है। इस तरह सप्ताह की शुरुआत से ही मुख्यमंत्री के सरकारी कार्यक्रमों और निवास कार्यालय से जुड़े कार्यों के लिए अधिकारियों की मौजूदगी सुनिश्चित की गई है।

    बुधवार को मंत्रालय में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर की ड्यूटी तय की गई है। इसी दिन समत्व में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे जिम्मेदारी संभालेंगे। गुरुवार को मंत्रालय में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा मौजूद रहेंगे जबकि समत्व में डॉ. सुदाम खाड़े और अरविंद दुबे की ड्यूटी रहेगी। शुक्रवार को मंत्रालय में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और अरुण परमार जिम्मेदारी संभालेंगे। वहीं समत्व में कुमार पुरुषोत्तम और अरुण परमार को तैनात किया गया है।

    शनिवार और रविवार के लिए भी रोस्टर में अलग व्यवस्था की गई है। शनिवार को मंत्रालय में किसी अधिकारी की निर्धारित ड्यूटी नहीं रखी गई है जबकि समत्व में डॉ. इलेया राजा टी और आदित्य शर्मा जिम्मेदारी संभालेंगे। रविवार को भी मंत्रालय में कोई अधिकारी निर्धारित नहीं है। इस दिन समत्व में कौशलेंद्र विक्रम सिंह और सुधीर कोचर जिम्मेदारी संभालेंगे। इससे स्पष्ट है कि सप्ताहांत में मुख्यमंत्री निवास कार्यालय यानी समत्व पर प्रशासनिक समन्वय की व्यवस्था जारी रहेगी।

    रोस्टर में अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल कार्यालय में मौजूद रहने तक सीमित नहीं है। उन्हें मुख्यमंत्री से संबंधित महत्वपूर्ण बैठकों चर्चाओं और कार्यक्रमों में उपस्थित रहकर आवश्यक समन्वय करना होगा। मुख्यमंत्री कार्यालय की कार्यप्रणाली में विभिन्न विभागों और अधिकारियों के बीच तालमेल बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में दिन के हिसाब से जिम्मेदारी तय होने से कार्यक्रमों की तैयारी और उनसे जुड़े प्रशासनिक कार्यों को समय पर पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि रोस्टर में शामिल कोई अधिकारी किसी कारण से अनुपस्थित रहता है तो संबंधित लिंक अधिकारी उसकी जिम्मेदारी संभालेगा। यानी अधिकारी की अनुपस्थिति की स्थिति में भी कामकाज प्रभावित न हो इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था रखी गई है। यह व्यवस्था मुख्यमंत्री के कार्यक्रमों के दौरान प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    इस साप्ताहिक रोस्टर के जरिए मुख्यमंत्री कार्यालय में कामकाज को अधिक व्यवस्थित करने और जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। खास तौर पर मुख्यमंत्री की बैठकों और आम नागरिकों से मुलाकातों के दौरान अधिकारियों की उपलब्धता सुनिश्चित होने से समन्वय बेहतर होने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री सचिवालय की ओर से पहले भी विभागीय समीक्षा और जनहित से जुड़े मामलों पर समयबद्ध कार्रवाई पर जोर दिया जाता रहा है।

  • CJI सूर्यकांत ने NALSAR छात्रों के विवाद में BCI को फटकारा, कहा विरोध के कारण छात्रों का करियर प्रभावित नहीं होना चाहिए

    CJI सूर्यकांत ने NALSAR छात्रों के विवाद में BCI को फटकारा, कहा विरोध के कारण छात्रों का करियर प्रभावित नहीं होना चाहिए


    नई दिल्ली ।महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुए हमले के एक दिन बाद शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने पंजाब की शांति, धार्मिक सद्भाव और देश के विकास को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।

    सुखबीर बादल ने कहा कि कुछ ताकतें पंजाब के शांतिपूर्ण माहौल और सांप्रदायिक भाईचारे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी कोशिशों से वह पीछे नहीं हटेंगे और राज्य में शांति तथा सभी समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखने के लिए मजबूती से खड़े रहेंगे।

    उन्होंने कहा कि उनके लिए पंजाब और देश का विकास सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव को भी उन्होंने उतना ही अहम बताया। उनके मुताबिक, पंजाब की सामाजिक संरचना और आपसी भाईचारे को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने दिया जाना चाहिए।

    सुखबीर बादल ने अपने पिता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को भी याद किया। उन्होंने कहा कि प्रकाश सिंह बादल ने हमेशा सभी समुदायों और क्षेत्रों को साथ लेकर चलने की कोशिश की। उनके अनुसार, उनके पिता की राजनीति में सांप्रदायिक सौहार्द और पंजाब की शांति को विशेष महत्व दिया जाता था।

    सुखबीर बादल ने कहा कि प्रकाश सिंह बादल ने कभी उन ताकतों के सामने समझौता नहीं किया, जो पंजाब के शांतिपूर्ण वातावरण को प्रभावित करना चाहती थीं। उन्होंने इसी सोच को आगे बढ़ाने की बात कही और कहा कि राज्य में भाईचारा बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल है।

    नांदेड़ की घटना का जिक्र करते हुए सुखबीर बादल ने अपने ऊपर हुए पिछले हमले की भी बात की। उन्होंने कहा कि दोनों घटनाओं का संबंध बेहद पवित्र धार्मिक स्थलों से है। उन्होंने पहले अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर और अब नांदेड़ स्थित तख्त हजूर साहिब में हुई घटनाओं का उल्लेख किया।

    उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी कोशिशें क्यों न की जाएं, अंतिम निर्णय ईश्वर के हाथ में है। सुखबीर बादल ने विश्वास जताया कि गुरु साहिब का आशीर्वाद उनके साथ है और पंजाब की शांति को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें अपने उद्देश्य में सफल नहीं होंगी।

    अकाली दल प्रमुख ने कहा कि पंजाब ने लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों का सामना किया है और राज्य की जनता शांति तथा भाईचारे को महत्व देती है। उन्होंने कहा कि किसी भी घटना का असर पंजाब के सामाजिक माहौल पर नहीं पड़ना चाहिए और सभी समुदायों को संयम बनाए रखना जरूरी है।

    सुखबीर बादल ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ऐसी घटनाओं से भयभीत होकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने पंजाब की एकता, धार्मिक सद्भाव और विकास को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    नांदेड़ की घटना के बाद उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और पंजाब के सामाजिक माहौल को लेकर चर्चा तेज है। बादल ने लोगों से शांति बनाए रखने और किसी भी ऐसी कोशिश को सफल नहीं होने देने की अपील की, जिससे समुदायों के बीच तनाव पैदा हो सकता है।

  • MP Board का बड़ा फैसला: माता-पिता दोनों को खो चुके छात्रों की परीक्षा फीस माफ, 2026-27 से मिलेगा लाभ

    MP Board का बड़ा फैसला: माता-पिता दोनों को खो चुके छात्रों की परीक्षा फीस माफ, 2026-27 से मिलेगा लाभ


    मध्य प्रदेशमध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल ने उन विद्यार्थियों के लिए संवेदनशील पहल की है जिन्होंने अपने माता और पिता दोनों को खो दिया है। मंडल के फैसले के अनुसार ऐसे पात्र विद्यार्थियों को अब बोर्ड परीक्षाओं में शामिल होने के लिए परीक्षा शुल्क और नामांकन शुल्क जमा नहीं करना होगा। यह सुविधा शैक्षणिक सत्र 2026-27 की परीक्षाओं से लागू होगी। इस फैसले का लाभ उन विद्यार्थियों को मिलेगा जो माता-पिता के निधन के बाद किसी रिश्तेदार के सहारे अपनी पढ़ाई जारी रख रहे हैं या शासन द्वारा संचालित अथवा शासन से मान्यता प्राप्त संस्था और अनाथालय में रहकर शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

    मंडल का यह निर्णय ऐसे बच्चों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है जिनके सामने माता-पिता के निधन के बाद पढ़ाई जारी रखना पहले ही बड़ी चुनौती होती है। कई मामलों में बच्चों की जिम्मेदारी रिश्तेदारों पर आ जाती है जबकि कुछ विद्यार्थी सरकारी या मान्यता प्राप्त संस्थाओं के संरक्षण में शिक्षा पूरी करते हैं। ऐसी स्थिति में स्कूल और बोर्ड की फीस भी उनके लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन सकती है। अब परीक्षा और नामांकन शुल्क से राहत मिलने के बाद इन विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा की तैयारी पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर मिलेगा।

    फीस छूट का लाभ लेने के लिए मंडल ने दस्तावेजों की प्रक्रिया भी निर्धारित की है। परीक्षा फॉर्म भरते समय पात्र विद्यार्थी को माता और पिता दोनों के मृत्यु प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने होंगे। यानी केवल एक अभिभावक की मृत्यु होने की स्थिति में यह विशेष छूट लागू नहीं होगी। मंडल की ओर से तय पात्रता के अनुसार दोनों माता-पिता के निधन का प्रमाण देना जरूरी होगा।

    यदि कोई विद्यार्थी किसी शासन द्वारा संचालित या शासन से मान्यता प्राप्त संस्था में रहकर पढ़ाई कर रहा है तो उसे संस्था की ओर से जारी प्रमाण-पत्र भी देना होगा। इस प्रमाण-पत्र में विद्यार्थी की स्थिति और संबंधित संस्था में उसके आश्रय में रहने की जानकारी स्पष्ट होनी चाहिए। निर्धारित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने पर विद्यार्थी को शुल्क छूट का लाभ नहीं मिल सकेगा। इसलिए स्कूलों और संबंधित संस्थाओं के लिए यह जरूरी होगा कि वे पात्र विद्यार्थियों को परीक्षा फॉर्म भरने से पहले आवश्यक कागजी प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध कराएं।

    मंडल का यह फैसला केवल परीक्षा शुल्क कम करने तक सीमित नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य आर्थिक कठिनाइयों के कारण किसी बच्चे की शिक्षा प्रभावित होने से रोकना भी है। माता-पिता दोनों को खो चुके विद्यार्थी कई बार बेहद सीमित संसाधनों में पढ़ाई जारी रखते हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षा में शामिल होने का शुल्क उनके लिए छोटी रकम नहीं होती। फीस माफ होने से उन्हें आर्थिक सहायता के साथ मानसिक राहत भी मिल सकती है।

    मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक यह व्यवस्था सत्र 2026-27 से लागू होगी और पात्र विद्यार्थी मंडल की संबंधित परीक्षाओं में शुल्क छूट का लाभ ले सकेंगे। इस पहल को शिक्षा को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

    इस फैसले से उन बच्चों को यह भरोसा मिलेगा कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद उनकी शिक्षा और परीक्षा का रास्ता आर्थिक परेशानी के कारण नहीं रुकेगा। हालांकि पात्र विद्यार्थियों को समय रहते मृत्यु प्रमाण-पत्र और संस्था से संबंधित जरूरी दस्तावेज तैयार रखने होंगे ताकि परीक्षा फॉर्म भरते समय उन्हें किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।

  • 970 किलो मेफेड्रोन केस में बड़ा अपडेट, वीरेंद्र बसोया दुबई से भारत लाया गया; अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क की जांच तेज

    970 किलो मेफेड्रोन केस में बड़ा अपडेट, वीरेंद्र बसोया दुबई से भारत लाया गया; अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क की जांच तेज


    नई दिल्ली ।
    ड्रग्स तस्करी से जुड़े एक बड़े मामले में भारतीय जांच एजेंसियों को अहम सफलता मिली है। 970 किलो मेफेड्रोन की बरामदगी से जुड़े मामले में वांछित आरोपी वीरेंद्र सिंह बसोया को दुबई से भारत लाया गया है। उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी था और भारत सरकार की पहल के बाद संयुक्त अरब अमीरात से उसे डिपोर्ट करने की प्रक्रिया पूरी की गई।

    वीरेंद्र बसोया पर पुणे से जुड़े एक बड़े कथित ड्रग्स नेटवर्क में शामिल होने का आरोप है। जांच में सामने आए मामले की अनुमानित कीमत करीब 6,000 करोड़ रुपये बताई गई है। आरोप है कि इस नेटवर्क के जरिए बड़ी मात्रा में मेफेड्रोन की खेप तैयार कर उसे विदेश भेजने की योजना बनाई गई थी।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बसोया की भारत वापसी को लेकर जानकारी साझा करते हुए कहा कि विदेशों में छिपे ड्रग्स तस्करों के खिलाफ कार्रवाई जारी है। उन्होंने नशीले पदार्थों के नेटवर्क को खत्म करने की दिशा में एजेंसियों की कार्रवाई और सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर जोर दिया।

    मामले की जांच के दौरान 21 फरवरी 2024 को दिल्ली में कार्रवाई की गई थी। इस कार्रवाई में दिवेश चरंजीत भूतानी और संदीपकुमार राजपाल बैसोया को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी सामने आई थी। उनके कब्जे से करीब 970 किलो मेफेड्रोन बरामद होने का दावा किया गया था।

    जांच में आरोप लगाया गया कि गिरफ्तार किए गए आरोपी कथित तौर पर वीरेंद्र सिंह बसोया के निर्देश पर काम कर रहे थे। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया और कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों तथा विदेश में मौजूद संदिग्धों की भूमिका की पड़ताल शुरू हुई।

    जांच एजेंसियों के अनुसार मेफेड्रोन की खेप को विदेश भेजने के लिए लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का इस्तेमाल किए जाने की योजना थी। इस सिलसिले में डेल्टा लॉजिस्टिक्स से जुड़े कुछ लोगों पर भी कार्रवाई की गई। संदीप हनुमानसिंह यादव और देवेंद्र रामफुल यादव को मामले में गिरफ्तार किए जाने की जानकारी है।

    मामले में जांच आगे बढ़ने के साथ वीरेंद्र बसोया के बेटे ऋषभ का नाम भी सामने आया। उसके खिलाफ भी रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए जाने की जानकारी है। वह फिलहाल विदेश में बताया जा रहा है। जांच एजेंसियां अब कथित ड्रग्स नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और इसकी अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की जानकारी जुटाने में लगी हैं।

    वीरेंद्र बसोया की भारत वापसी को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह लंबे समय से देश से बाहर था और उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तलाश की प्रक्रिया चल रही थी। उसके भारत आने के बाद जांच एजेंसियों को मामले की कथित साजिश, नेटवर्क के संचालन और विदेशों तक नशीले पदार्थ पहुंचाने की योजना से जुड़े कई सवालों के जवाब हासिल करने का अवसर मिल सकता है।

    जांच एजेंसियां अब बसोया से मामले में उसकी कथित भूमिका और अन्य आरोपियों से संबंधों को लेकर पूछताछ कर सकती हैं। साथ ही बरामद मेफेड्रोन की खेप, उसके स्रोत, तैयार करने की प्रक्रिया और कथित अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े पहलुओं की भी जांच आगे बढ़ सकती है।

    हालांकि, जांच में लगाए गए आरोपों को अदालत में अंतिम रूप से साबित किया जाना बाकी है। किसी भी आरोपी की कानूनी जिम्मेदारी का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा। फिलहाल बसोया की भारत वापसी के बाद इस मामले में जांच और कानूनी कार्रवाई के अगले चरण पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।

  • एक सीरीज में मचाया तहलका फिर टीम इंडिया से हुए दूर, जानिए विजय भारद्वाज का पूरा क्रिकेट सफर

    एक सीरीज में मचाया तहलका फिर टीम इंडिया से हुए दूर, जानिए विजय भारद्वाज का पूरा क्रिकेट सफर


    नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट में कई ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिनका अंतरराष्ट्रीय करियर बेहद छोटा रहा लेकिन घरेलू क्रिकेट में उनकी उपलब्धियां किसी बड़े सितारे से कम नहीं रहीं। विजय भारद्वाज भी इसी सूची में शामिल हैं। 15 अगस्त 1975 को बेंगलुरु में जन्मे इस ऑलराउंडर ने भारतीय टीम में धमाकेदार अंदाज में दस्तक दी थी। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 1999-2000 के एलजी कप में उनके प्रदर्शन ने उन्हें रातोंरात चर्चा में ला दिया था। गेंद और बल्ले दोनों से प्रभाव छोड़ने वाले भारद्वाज को उस टूर्नामेंट में प्लेयर ऑफ द सीरीज चुना गया था।

    एलजी कप में विजय भारद्वाज ने अपनी ऑफ स्पिन गेंदबाजी से शानदार प्रदर्शन करते हुए 10 विकेट हासिल किए थे। निचले क्रम में बल्लेबाजी करते हुए उन्होंने 89 रन भी बनाए थे। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें भारतीय क्रिकेट के भविष्य के अहम खिलाड़ियों में गिना जाने लगा। उनकी उपयोगिता यह थी कि वह जरूरत के मुताबिक बल्लेबाजी के साथ गेंदबाजी और फील्डिंग में भी योगदान दे सकते थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में उस शुरुआती सफलता को वह लंबे समय तक बरकरार नहीं रख सके।

    विजय भारद्वाज ने सितंबर 1999 में भारत के लिए वनडे डेब्यू किया और इसके बाद टेस्ट क्रिकेट में भी मौका मिला। उनका अंतरराष्ट्रीय करियर कुल तीन टेस्ट और 10 वनडे तक ही सीमित रहा। तीन टेस्ट की तीन पारियों में उन्होंने 28 रन बनाए और एक विकेट लिया। वहीं 10 वनडे में उन्होंने 136 रन बनाने के साथ 16 विकेट अपने नाम किए। उनका आखिरी वनडे मुकाबला 2002 में जिम्बाब्वे के खिलाफ रहा। इसके बाद उनकी भारतीय टीम में वापसी नहीं हो सकी।

    लेकिन अगर विजय भारद्वाज के पूरे क्रिकेट करियर को केवल भारत के लिए खेले 13 मुकाबलों के आधार पर देखा जाए तो उनकी कहानी अधूरी रह जाएगी। कर्नाटक के लिए उनका घरेलू क्रिकेट करियर बेहद प्रभावशाली रहा। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 96 मैचों की 149 पारियों में 5553 रन बनाए। इस दौरान उनके बल्ले से 14 शतक और 26 अर्धशतक निकले। गेंदबाजी में भी उन्होंने 59 विकेट हासिल किए। लिस्ट ए क्रिकेट में उनके नाम 1707 रन और 46 विकेट दर्ज हैं।

    कर्नाटक के मजबूत दौर में भारद्वाज टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। वह 1990 के दशक में कर्नाटक की तीन रणजी ट्रॉफी खिताबी जीत का हिस्सा रहे। 2000 से 2002 तक उन्होंने कर्नाटक की कप्तानी भी की। घरेलू क्रिकेट में उनके लगातार प्रदर्शन ने साबित किया कि वह सिर्फ एक सीरीज के खिलाड़ी नहीं थे बल्कि लंबे समय तक उच्च स्तर पर प्रदर्शन करने की क्षमता रखते थे। उनके करियर पर चोटों और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का भी असर पड़ा और यही वजह रही कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका सफर अपेक्षा के मुताबिक आगे नहीं बढ़ सका।

    4 नवंबर 2006 को विजय भारद्वाज ने क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास ले लिया। इसके बाद उन्होंने खेल से दूरी बनाने के बजाय कोचिंग और कमेंट्री को अपना नया रास्ता बनाया। वह नेशनल क्रिकेट एकेडमी से लेवल थ्री कोच के रूप में प्रमाणित हैं। आईपीएल के शुरुआती दौर में वह रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के सहायक कोच भी रहे। इसके अलावा ओमान क्रिकेट टीम के फील्डिंग कोच के रूप में भी काम किया। बाद के वर्षों में उन्होंने कन्नड़ क्रिकेट कमेंट्री और विश्लेषण के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

    विजय भारद्वाज की कहानी यही बताती है कि किसी खिलाड़ी के करियर को केवल अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों से नहीं आंका जा सकता। भारत के लिए उनका सफर भले ही छोटा रहा लेकिन कर्नाटक क्रिकेट में उनका योगदान और बाद में कोचिंग व कमेंट्री के जरिए खेल से जुड़ाव उनकी क्रिकेट विरासत को आज भी खास बनाता है।

  • नांदेड़ हमले के बाद सुखबीर सिंह बादल ने कहा, डरने वाला नहीं, पंजाब की शांति और सांप्रदायिक सद्भाव सर्वोच्च प्राथमिकता

    नांदेड़ हमले के बाद सुखबीर सिंह बादल ने कहा, डरने वाला नहीं, पंजाब की शांति और सांप्रदायिक सद्भाव सर्वोच्च प्राथमिकता

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र के नांदेड़ में हुए हमले के एक दिन बाद शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह डरने वाले नहीं हैं। उन्होंने पंजाब की शांति, धार्मिक सद्भाव और देश के विकास को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बताया।

    सुखबीर बादल ने कहा कि कुछ ताकतें पंजाब के शांतिपूर्ण माहौल और सांप्रदायिक भाईचारे को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसी कोशिशों से वह पीछे नहीं हटेंगे और राज्य में शांति तथा सभी समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखने के लिए मजबूती से खड़े रहेंगे।

    उन्होंने कहा कि उनके लिए पंजाब और देश का विकास सबसे महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही धार्मिक और सांप्रदायिक सद्भाव को भी उन्होंने उतना ही अहम बताया। उनके मुताबिक, पंजाब की सामाजिक संरचना और आपसी भाईचारे को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी कोशिश को सफल नहीं होने दिया जाना चाहिए।

    सुखबीर बादल ने अपने पिता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को भी याद किया। उन्होंने कहा कि प्रकाश सिंह बादल ने हमेशा सभी समुदायों और क्षेत्रों को साथ लेकर चलने की कोशिश की। उनके अनुसार, उनके पिता की राजनीति में सांप्रदायिक सौहार्द और पंजाब की शांति को विशेष महत्व दिया जाता था।

    सुखबीर बादल ने कहा कि प्रकाश सिंह बादल ने कभी उन ताकतों के सामने समझौता नहीं किया, जो पंजाब के शांतिपूर्ण वातावरण को प्रभावित करना चाहती थीं। उन्होंने इसी सोच को आगे बढ़ाने की बात कही और कहा कि राज्य में भाईचारा बनाए रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल है।

    नांदेड़ की घटना का जिक्र करते हुए सुखबीर बादल ने अपने ऊपर हुए पिछले हमले की भी बात की। उन्होंने कहा कि दोनों घटनाओं का संबंध बेहद पवित्र धार्मिक स्थलों से है। उन्होंने पहले अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर और अब नांदेड़ स्थित तख्त हजूर साहिब में हुई घटनाओं का उल्लेख किया।

    उन्होंने कहा कि चाहे कितनी भी कोशिशें क्यों न की जाएं, अंतिम निर्णय ईश्वर के हाथ में है। सुखबीर बादल ने विश्वास जताया कि गुरु साहिब का आशीर्वाद उनके साथ है और पंजाब की शांति को नुकसान पहुंचाने वाली ताकतें अपने उद्देश्य में सफल नहीं होंगी।

    अकाली दल प्रमुख ने कहा कि पंजाब ने लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों का सामना किया है और राज्य की जनता शांति तथा भाईचारे को महत्व देती है। उन्होंने कहा कि किसी भी घटना का असर पंजाब के सामाजिक माहौल पर नहीं पड़ना चाहिए और सभी समुदायों को संयम बनाए रखना जरूरी है।

    सुखबीर बादल ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ऐसी घटनाओं से भयभीत होकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने पंजाब की एकता, धार्मिक सद्भाव और विकास को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता दोहराई।

    नांदेड़ की घटना के बाद उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब धार्मिक स्थलों की सुरक्षा और पंजाब के सामाजिक माहौल को लेकर चर्चा तेज है। बादल ने लोगों से शांति बनाए रखने और किसी भी ऐसी कोशिश को सफल नहीं होने देने की अपील की, जिससे समुदायों के बीच तनाव पैदा हो सकता है।

  • दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजी इतिहास सिलेबस में बड़ा बदलाव, दिल्ली सल्तनत पर केंद्रित मुख्य पेपर नए पाठ्यक्रम से हटाया गया

    नई दिल्ली । दिल्ली विश्वविद्यालय ने पोस्टग्रेजुएट इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलाव किया है। जुलाई 2026 से लागू नए सिलेबस में दिल्ली सल्तनत के इतिहास से जुड़े एक प्रमुख पेपर को तीसरे सत्र की अंतिम सूची से हटा दिया गया है। यह बदलाव नई शिक्षा नीति और नए पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप किए गए पाठ्यक्रम संशोधन का हिस्सा बताया गया है।

    हटाए गए विषय का नाम दिल्ली सल्तनत : मध्यकालीन उत्तर भारत में सत्ता की बनावट था। इस पेपर में 13वीं और 14वीं सदी के दौरान दिल्ली सल्तनत की राजनीतिक व्यवस्था, शासन प्रणाली और सत्ता के स्वरूप का अध्ययन कराया जाता था। विषय के जरिए विद्यार्थियों को उस दौर के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक बदलावों को समझने का अवसर मिलता था।

    नए पाठ्यक्रम में केवल दिल्ली सल्तनत से जुड़े पेपर में ही बदलाव नहीं हुआ है। उत्तर भारत के इतिहास से संबंधित लगभग 1400 से 1550 की अवधि वाला एक अन्य विषय भी तीसरे सत्र की अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया है। इससे मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन की संरचना में बदलाव दिखाई देता है।

    पाठ्यक्रम में प्रस्तावित कई अन्य विषयों को भी अंतिम रूप से जगह नहीं मिली है। इनमें शुरुआती भारत में महिलाओं और लिंग से संबंधित इतिहास, प्राचीन भारत में राजनीतिक व्यवस्था तथा प्राचीन भारतीय साहित्य में धर्म और समाज जैसे विषय शामिल हैं। इन बदलावों के कारण इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक विषयों का दायरा पहले की तुलना में अलग हो गया है।

    इतिहास विभाग की ओर से तीसरे सत्र के लिए कुल 38 विशेष वैकल्पिक विषय प्रस्तावित किए गए थे। अंतिम पाठ्यक्रम में इनमें से 16 विषयों को ही शामिल किया गया है। इस तरह 22 प्रस्तावित विषय अंतिम सूची का हिस्सा नहीं बने हैं। विश्वविद्यालय के नए पीजी ढांचे के तहत विषयों के चयन और संरचना को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    दिल्ली सल्तनत से संबंधित पेपर को हटाए जाने को समझने के लिए स्नातक और परास्नातक स्तर के पाठ्यक्रम के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। परास्नातक स्तर पर हटाए गए पेपर में केवल सल्तनत काल की घटनाओं का सामान्य परिचय नहीं दिया जाता था, बल्कि सत्ता, शासन और इतिहास को समझने के अलग-अलग दृष्टिकोणों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाता था।

    वहीं स्नातक स्तर पर दिल्ली सल्तनत के इतिहास से संबंधित विषय अभी अलग स्वरूप में पढ़ाया जाता है। इसमें इस कालखंड की प्रमुख घटनाओं, शासकों, राजनीतिक परिस्थितियों और व्यापक ऐतिहासिक विकास का अध्ययन शामिल होता है। इसलिए पीजी के एक विशेष पेपर को हटाने का अर्थ यह नहीं है कि दिल्ली सल्तनत का इतिहास दिल्ली विश्वविद्यालय की पूरी शैक्षणिक व्यवस्था से समाप्त हो गया है।

    नए बदलावों के पीछे विश्वविद्यालय की पाठ्यक्रम संरचना को नई शिक्षा नीति और संशोधित पीजी शिक्षा ढांचे के अनुरूप तैयार करने की प्रक्रिया बताई गई है। इसमें वैकल्पिक विषयों की संख्या, उनकी विशेषज्ञता और विद्यार्थियों के लिए उपलब्ध अध्ययन क्षेत्रों को नए तरीके से व्यवस्थित किया गया है।

    इतिहास जैसे विषय में पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव अकादमिक अध्ययन की दिशा को प्रभावित करते हैं। विशेष रूप से परास्नातक स्तर पर विषयों का चयन विद्यार्थियों को किसी ऐतिहासिक कालखंड को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का अवसर देता है। ऐसे में नए पाठ्यक्रम के तहत शामिल विषयों और हटाए गए विषयों को लेकर अकादमिक क्षेत्र में चर्चा होना स्वाभाविक है।

    दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किए गए इस संशोधित पाठ्यक्रम के तहत अब विद्यार्थियों को उपलब्ध अंतिम 16 वैकल्पिक विषयों में से अपने अध्ययन क्षेत्र का चयन करना होगा। विश्वविद्यालय की नई व्यवस्था में इतिहास के विभिन्न कालखंडों और विषयगत क्षेत्रों को नए शैक्षणिक ढांचे के अनुरूप व्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।