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  • हंतावायरस का खतरा बढ़ा: साधारण बुखार समझने की गलती पड़ सकती है भारी, डॉक्टरों ने दी गंभीर चेतावनी

    हंतावायरस का खतरा बढ़ा: साधारण बुखार समझने की गलती पड़ सकती है भारी, डॉक्टरों ने दी गंभीर चेतावनी


    नई दिल्ली। Hantavirus Infection को लेकर दुनियाभर में चिंता बढ़ती जा रही है। हाल के मामलों में कई लोगों की मौत के बाद डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि इस वायरस के शुरुआती लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे दिखते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में यह गंभीर मेडिकल इमरजेंसी बन सकता है।

    विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआत में मरीज को बुखार, थकान, सिरदर्द, शरीर दर्द, ठंड लगना, उल्टी और पेट से जुड़ी परेशानी हो सकती है। यही वजह है कि कई लोग इसे डेंगू, फ्लू या सामान्य वायरल संक्रमण समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।

    अमृता अस्पताल फरीदाबाद के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप बजाद के मुताबिक यह संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित चूहों और कृन्तकों के यूरिन, लार और मल के संपर्क से फैलता है। लंबे समय से बंद कमरों, गोदामों या स्टोर रूम की सफाई के दौरान धूल के जरिए वायरस शरीर में पहुंच सकता है।

    डॉक्टरों का कहना है कि असली खतरा तब शुरू होता है जब संक्रमण फेफड़ों को प्रभावित करने लगता है। मरीज को सांस लेने में तकलीफ, सीने में जकड़न, सूखी खांसी और ऑक्सीजन लेवल गिरने जैसी समस्याएं होने लगती हैं। गंभीर मामलों में फेफड़ों में पानी भर सकता है और मरीज को ICU या वेंटिलेटर की जरूरत पड़ सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे खतरनाक रूप Hantavirus Pulmonary Syndrome माना जाता है, जिसकी मृत्यु दर गंभीर मामलों में 35 से 40 प्रतिशत तक बताई गई है।

    डॉक्टरों ने सलाह दी है कि घरों और गोदामों में चूहों की संख्या नियंत्रित रखें, सफाई के दौरान मास्क और दस्ताने पहनें तथा बंद कमरों में उचित वेंटिलेशन बनाए रखें। शुरुआती लक्षण दिखने पर तुरंत मेडिकल जांच कराना बेहद जरूरी माना जा रहा है

  • नई उड़ान की तैयारी: भारतीय रिसर्च और स्टार्टअप्स जुड़ेंगे दुनिया के बड़े अंतरिक्ष और तकनीकी भागीदारों से

    नई उड़ान की तैयारी: भारतीय रिसर्च और स्टार्टअप्स जुड़ेंगे दुनिया के बड़े अंतरिक्ष और तकनीकी भागीदारों से

    नई दिल्ली । भारत के शिक्षा और तकनीकी क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आकार ले रहा है, जहां अब उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे वैश्विक नवाचार और अंतरिक्ष तकनीक के केंद्र के रूप में उभरेंगे। इस नई पहल का उद्देश्य देश के शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स और तकनीकी विशेषज्ञों को अंतरराष्ट्रीय मंच से जोड़ना है, ताकि उनके विचार और तकनीक दुनिया के सामने पहुंच सकें।

    इस योजना के तहत भारतीय विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और स्टार्टअप्स को एक साझा वैश्विक मंच पर लाया जाएगा, जहां वे अपने शोध और नवाचार प्रस्तुत करेंगे। यह मंच उन्हें अंतरराष्ट्रीय निवेशकों, अंतरिक्ष तकनीक से जुड़े संगठनों और वैश्विक तकनीकी विशेषज्ञों के साथ सीधा संवाद करने का अवसर देगा। इससे भारत के युवा वैज्ञानिकों और उद्यमियों को नई दिशा और वैश्विक पहचान मिलेगी।

    पिछले कुछ वर्षों में भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों ने शोध और नवाचार के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। अब ये संस्थान केवल शैक्षणिक केंद्र नहीं रहे, बल्कि उन्नत तकनीक विकसित करने वाले नवाचार केंद्र बनते जा रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष तकनीक, डेटा साइंस और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में भारतीय शोध लगातार आगे बढ़ रहा है।

    नई पहल के तहत 100 से अधिक डीप-टेक स्टार्टअप्स और प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों को एक साथ जोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना और नवाचार को वैश्विक स्तर पर ले जाना है। इससे भारतीय स्टार्टअप्स को न केवल निवेश के अवसर मिलेंगे, बल्कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी प्राप्त होगा।

    इस पूरी प्रक्रिया में अंतरिक्ष तकनीक से जुड़े स्टार्टअप्स और कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। ये संस्थान उपग्रह निर्माण, अंतरिक्ष उपकरण, और उन्नत सैटेलाइट तकनीक जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। इनके द्वारा विकसित तकनीकें अब वैश्विक बाजार में अपनी जगह बना रही हैं, जिससे भारत की अंतरिक्ष क्षमता को नई पहचान मिल रही है।

    कुछ भारतीय तकनीकी कंपनियां पहले ही अपने उत्पाद और सेवाएं कई देशों तक पहुंचा चुकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अब अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रतिस्पर्धा में मजबूत स्थिति में है। ये कंपनियां उपग्रह आधारित समाधान, पृथ्वी निगरानी और रणनीतिक तकनीकों के विकास में सक्रिय हैं, जो आने वाले समय में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

    यह पूरी पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सोच को आगे बढ़ाती है, जिसमें शिक्षा, अनुसंधान और उद्योग के बीच मजबूत संबंध बनाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य ऐसे युवा तैयार करना है जो केवल नौकरी खोजने वाले न होकर, नए समाधान और तकनीक विकसित करने वाले नवप्रवर्तक बनें।

    भारत अब उस दिशा में आगे बढ़ रहा है जहां उसका तकनीकी और वैज्ञानिक विकास वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सके। उच्च शिक्षा संस्थानों और स्टार्टअप्स का यह संयुक्त प्रयास देश को नवाचार और अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। यह केवल एक शैक्षणिक पहल नहीं बल्कि भारत की भविष्य की तकनीकी शक्ति को मजबूत करने की एक रणनीतिक दिशा है।

  • कांग्रेस की राजनीति पर पीएम मोदी का निशाना, कहा-अकड़ और धोखे से कमजोर हुई पार्टी

    कांग्रेस की राजनीति पर पीएम मोदी का निशाना, कहा-अकड़ और धोखे से कमजोर हुई पार्टी


    नई दिल्ली । बेंगलुरु में आयोजित एक बड़ी जनसभा के दौरान देश की राजनीति को लेकर तीखे और सीधे संदेश सामने आए, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी राजनीति पर कड़ा रुख अपनाते हुए कांग्रेस पार्टी को अपने निशाने पर रखा। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि देश की राजनीति में कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है और इसका मुख्य कारण उसकी राजनीतिक सोच और कार्यशैली में जमी हुई “अकड़” है।

    प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि एक समय देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत मानी जाने वाली पार्टी अब लगातार चुनावी संघर्ष का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि जनता ने पिछले कुछ वर्षों में बार-बार अपना रुझान स्पष्ट किया है और सत्ता के समीकरण बदलते रहे हैं। इसके बावजूद पार्टी अपनी हार की समीक्षा करने के बजाय दूसरों पर दोष मढ़ती रही है।

    अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि लोकतंत्र में हार और जीत स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन हार को स्वीकार न कर दूसरों पर आरोप लगाना राजनीतिक परिपक्वता की कमी को दर्शाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ राजनीतिक दल अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए संस्थाओं और व्यवस्था पर सवाल उठाते हैं, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए सही संकेत नहीं है।

    उन्होंने आगे कहा कि वर्तमान सरकार का ध्यान विकास, जनकल्याण और स्थिर प्रशासन पर केंद्रित है। सरकार की नीतियों का उद्देश्य देश के गरीब और मध्यम वर्ग को सशक्त बनाना है। उन्होंने दावा किया कि पिछले वर्षों में बड़ी संख्या में लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं और विकास योजनाओं का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचा है।

    प्रधानमंत्री ने विपक्षी दलों की सरकारों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि कई राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक विवादों के कारण विकास कार्य प्रभावित होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ता में आने के बाद कई बार वादों और वास्तविकता के बीच अंतर दिखाई देता है, जिससे जनता में निराशा पैदा होती है।

    अपने संबोधन के दौरान उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक गठबंधन केवल सत्ता तक सीमित नहीं होने चाहिए, बल्कि उनमें आपसी विश्वास और जिम्मेदारी भी होनी चाहिए। उन्होंने यह संकेत दिया कि कई बार राजनीतिक रिश्ते समय के साथ बदल जाते हैं और इसका असर प्रशासनिक स्थिरता पर भी पड़ता है।

    अंत में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश की जनता अब अधिक जागरूक हो चुकी है और वह विकास, स्थिरता और पारदर्शिता को प्राथमिकता देती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आने वाले समय में राजनीति का केंद्र केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं बल्कि ठोस विकास कार्य और जनता की भलाई होना चाहिए।

    पूरा संबोधन राजनीतिक रूप से बेहद सख्त और आक्रामक स्वर में रहा, जिसमें प्रधानमंत्री ने विपक्षी राजनीति पर कई सवाल उठाए और सरकार की उपलब्धियों को जनता के सामने रखा।

  • बेंगलुरु में आध्यात्मिक मंच से पीएम मोदी का संदेश: समाज और युवा शक्ति ही भारत की असली ताकत

    बेंगलुरु में आध्यात्मिक मंच से पीएम मोदी का संदेश: समाज और युवा शक्ति ही भारत की असली ताकत


    नई दिल्ली । बेंगलुरु में आयोजित एक आध्यात्मिक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के विकास, समाज की भूमिका और युवाओं की शक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। यह अवसर केवल एक सार्वजनिक आयोजन नहीं था, बल्कि विचारों और संस्कृति के संगम का एक ऐसा मंच बन गया जहां भारत के भविष्य को लेकर एक सकारात्मक दृष्टिकोण सामने आया। पूरे कार्यक्रम के दौरान माहौल शांत, आध्यात्मिक और ऊर्जा से भरा हुआ दिखाई दिया।

    प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि जब किसी कार्य के पीछे स्पष्ट उद्देश्य और सेवा की भावना होती है, तो उसके परिणाम हमेशा सकारात्मक होते हैं। उन्होंने कहा कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसकी सरकार नहीं, बल्कि उसका समाज होता है। समाज जितना अधिक सक्रिय और जागरूक होता है, देश उतनी ही तेजी से प्रगति करता है।

    अपने विचार रखते हुए उन्होंने युवाओं को देश की सबसे बड़ी शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि आज का भारत तेजी से बदल रहा है और इस बदलाव के केंद्र में युवा हैं। विज्ञान, तकनीक और नवाचार के क्षेत्र में जो नए अवसर बन रहे हैं, उनमें भारतीय युवाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। देश कई क्षेत्रों में केवल भागीदारी ही नहीं कर रहा, बल्कि नेतृत्व की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।

    प्रधानमंत्री ने भारत की विविधता को उसकी सबसे बड़ी ताकत बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग भाषाएं, संस्कृतियां और परंपराएं होते हुए भी भारत एकता के सूत्र में बंधा हुआ है। यह एकता किसी दबाव से नहीं, बल्कि एक साझा सोच और भावना से बनी है, जिसमें दूसरों के लिए जीने की प्रवृत्ति प्रमुख है।

    उन्होंने यह भी कहा कि आधुनिक समय में भारत ने तकनीकी क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। डिजिटल क्रांति ने देश को नई दिशा दी है और आज भारत डिजिटल भुगतान और तकनीकी नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है। इसके साथ ही स्टार्टअप संस्कृति तेजी से बढ़ रही है और युवा उद्यमी नए विचारों के साथ आगे आ रहे हैं।

    अंतरिक्ष और विज्ञान के क्षेत्र में भी भारत की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, जहां युवा वैज्ञानिक नई उपलब्धियों को हासिल कर रहे हैं। यह सब इस बात का संकेत है कि देश एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, जहां तकनीक और मानव संसाधन दोनों मिलकर विकास की गति को आगे बढ़ा रहे हैं।

    प्रधानमंत्री ने समाज की भागीदारी को किसी भी बड़े परिवर्तन की नींव बताया। उन्होंने कहा कि जब लोग स्वयं आगे आकर जिम्मेदारी लेते हैं, तभी कोई भी आंदोलन या विकास सफल हो सकता है। इसलिए समाज की सक्रिय भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    कार्यक्रम में आध्यात्मिकता और आधुनिक विकास का अनोखा संगम देखने को मिला, जहां एक ओर परंपरा और संस्कृति का संदेश था, वहीं दूसरी ओर भविष्य की तकनीकी दिशा का संकेत भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। यह आयोजन इस विचार को मजबूत करता है कि भारत का विकास केवल आर्थिक या तकनीकी प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

  • असम में फिर मजबूत नेतृत्व की वापसी, हिमंता बिस्वा सरमा को मिला एनडीए विधायक दल का नेतृत्व, भाजपा

    असम में फिर मजबूत नेतृत्व की वापसी, हिमंता बिस्वा सरमा को मिला एनडीए विधायक दल का नेतृत्व, भाजपा

    नई दिल्ली । असम की राजनीति में एक बार फिर नेतृत्व को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है, जहां हिमंता बिस्वा सरमा को सर्वसम्मति से एनडीए विधायक दल का नेता चुना गया है। इस निर्णय के बाद देश के कई भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उन्हें बधाई देते हुए उनके नेतृत्व पर भरोसा जताया है। यह घटनाक्रम राज्य की राजनीति में स्थिरता और विकास की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।

    मुख्यमंत्रियों की ओर से आए संदेशों में असम में पिछले वर्षों में हुए विकास कार्यों और प्रशासनिक सुधारों की सराहना की गई है। कई नेताओं ने इसे जनता के विश्वास और लगातार मिल रहे समर्थन का परिणाम बताया है। साथ ही यह भी कहा गया कि आने वाले समय में राज्य की विकास यात्रा और मजबूत होगी तथा योजनाओं के क्रियान्वयन में और तेजी आएगी।

    हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व को लेकर राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यह फैसला केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। एनडीए के भीतर एकजुटता और स्थिर नेतृत्व का संदेश इस चयन के जरिए स्पष्ट रूप से सामने आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राज्य में चल रही विकास योजनाओं को नई गति मिल सकती है और केंद्र व राज्य के बीच समन्वय और बेहतर होगा।

    असम में पिछले कुछ वर्षों में बुनियादी ढांचे, सामाजिक योजनाओं और प्रशासनिक सुधारों पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसे इस नेतृत्व परिवर्तन के बाद और आगे बढ़ाने की उम्मीद जताई जा रही है। जनता के लगातार समर्थन को भी इस निर्णय के पीछे एक बड़ा कारण माना जा रहा है, जिसने राजनीतिक स्थिरता को मजबूत किया है।

    इसी बीच राष्ट्रीय स्तर पर एक अन्य कार्यक्रम में देश के विकास, संस्कृति और नेतृत्व को लेकर सकारात्मक संदेश भी सामने आए, जहां विभिन्न क्षेत्रों में हुए बदलावों और प्रगति का उल्लेख किया गया। इसमें स्वच्छता, शिक्षा, योग और आर्थिक विकास जैसे विषयों को प्रमुखता से रखा गया, जिससे देश के बदलते स्वरूप की झलक मिली।

    कुल मिलाकर असम में हिमंता बिस्वा सरमा को दोबारा नेतृत्व मिलना और विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों का समर्थन इस बात का संकेत है कि वर्तमान राजनीतिक माहौल स्थिरता और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह नेतृत्व राज्य की विकास यात्रा को किस गति से आगे ले जाता है।

  • रूस-यूक्रेन युद्ध पर पुतिन का बड़ा संकेत, बोले- जंग अंत के करीब; जेलेंस्की से बातचीत के लिए भी छोड़े दरवाजे खुले

    रूस-यूक्रेन युद्ध पर पुतिन का बड़ा संकेत, बोले- जंग अंत के करीब; जेलेंस्की से बातचीत के लिए भी छोड़े दरवाजे खुले



    नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध  को लेकर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन  ने बड़ा बयान दिया है। पुतिन ने संकेत दिए हैं कि तीन साल से ज्यादा समय से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि यदि यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बातचीत करना चाहते हैं तो मॉस्को आने का रास्ता खुला है।

    मीडिया से बातचीत में पुतिन ने स्पष्ट किया कि उन्होंने जेलेंस्की के साथ किसी औपचारिक बैठक का प्रस्ताव नहीं दिया है, लेकिन वह ऐसी मुलाकात से इनकार भी नहीं कर रहे हैं। उनके इस बयान को युद्ध खत्म करने की संभावित कूटनीतिक पहल के तौर पर देखा जा रहा है।

    रूसी राष्ट्रपति ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  और उनकी टीम की भी तारीफ की। पुतिन ने कहा कि ट्रंप प्रशासन यूक्रेन संकट को समाप्त कराने और शांति समझौते की दिशा में ईमानदारी से प्रयास कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि रूस ने युद्धविराम बढ़ाने और युद्धबंदियों की अदला-बदली जैसे प्रस्तावों को तुरंत स्वीकार किया था।

    पुतिन ने यूक्रेन पर आरोप लगाते हुए कहा कि विक्ट्री डे से पहले कीव प्रशासन कैदियों की अदला-बदली के लिए तैयार नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि रूस किसी देश के साथ रिश्ते खराब नहीं करना चाहता, लेकिन उकसावे वाली घटनाओं के कारण हालात और तनावपूर्ण हो सकते थे।

    युद्ध की शुरुआत पर बोलते हुए पुतिन ने कहा कि यूक्रेन के यूरोपीय संघ की ओर बढ़ते कदम, राजनीतिक उथल-पुथल और क्रीमिया विवाद के बाद हालात बिगड़ते गए, जिसके बाद रूस ने सैन्य अभियान शुरू किया।

    गौरतलब है कि रूस और यूक्रेन के बीच जारी यह युद्ध अब चौथे साल में पहुंच चुका है। इस संघर्ष में हजारों लोगों की जान जा चुकी है, जबकि लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। दुनिया के कई देश और अंतरराष्ट्रीय संगठन लगातार युद्ध समाप्त कराने और शांति बहाल करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं।

  • मायानगरी में जुटेगा विश्व सिनेमा का हुजूम, डॉक्युमेंट्री और शॉर्ट फिल्मों के महाकुंभ के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू

    मायानगरी में जुटेगा विश्व सिनेमा का हुजूम, डॉक्युमेंट्री और शॉर्ट फिल्मों के महाकुंभ के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू

    नई दिल्ली ।  दक्षिण एशिया में गैर-फीचर फिल्मों के सबसे पुराने और सम्मानित मंच के रूप में अपनी पहचान बना चुका मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एक बार फिर अपने 19वें संस्करण के साथ वापसी कर रहा है। जून महीने की 15 तारीख से शुरू होने वाले इस सात दिवसीय महोत्सव के लिए प्रतिनिधियों के पंजीकरण की औपचारिक शुरुआत कर दी गई है। मुंबई के पेडर रोड स्थित ऐतिहासिक एनएफडीसी कॉम्प्लेक्स में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम दुनिया भर के फिल्मकारों, निर्देशकों और सिनेमा प्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान करता है। यह फेस्टिवल केवल फिल्मों के प्रदर्शन का जरिया नहीं है, बल्कि यह उन कहानियों को आवाज देने का माध्यम है जो अक्सर व्यावसायिक सिनेमा की चकाचौंध में पीछे छूट जाती हैं।

    महोत्सव में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रतिनिधियों को आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से अपना पंजीकरण पूरा करना होगा। प्रक्रिया को पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए इसे ऑनलाइन रखा गया है, जहां नए आवेदकों को अपना विवरण साझा कर प्रोफाइल तैयार करनी होगी। सामान्य प्रतिभागियों के लिए पंजीकरण शुल्क 500 रुपये तय किया गया है, लेकिन सिनेमा की बारीकियों को समझने के लिए उत्सुक छात्रों को बड़ी राहत देते हुए उनके लिए पंजीकरण पूरी तरह निशुल्क रखा गया है। आयोजकों का उद्देश्य अधिक से अधिक युवाओं को वैश्विक सिनेमाई दृष्टिकोण और आधुनिक फिल्म निर्माण की तकनीकियों से जोड़ना है।

    पुरस्कारों की दृष्टि से इस वर्ष का महोत्सव अत्यंत भव्य होने वाला है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय श्रेणियों में प्रतिस्पर्धा करने वाली फिल्मों के लिए कुल 55 लाख रुपये की पुरस्कार राशि निर्धारित की गई है। महोत्सव के दौरान प्रदान किए जाने वाले गोल्डन और सिल्वर कोंच अवॉर्ड्स फिल्म जगत में काफी प्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसके साथ ही भारतीय सिनेमा के महान फिल्मकार के नाम पर दिया जाने वाला वी. शांताराम लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड इस साल भी चर्चा का केंद्र रहेगा। इसके अलावा नवाचार और तकनीकी कौशल को प्रोत्साहित करने के लिए प्रमोद पति अवॉर्ड, तकनीकी उत्कृष्टता पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक जैसे सम्मान भी प्रदान किए जाएंगे।

    फिल्मों के प्रदर्शन के साथ-साथ यह महोत्सव बौद्धिक चर्चाओं और कौशल विकास का भी केंद्र बनेगा। सात दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में रेड कार्पेट इवेंट्स, दिग्गज फिल्मकारों की मास्टरक्लास और पैनल डिस्कशन जैसी गतिविधियां शामिल होंगी। इस वर्ष का एक मुख्य आकर्षण ‘वेव्स डॉक बाजार’ होगा, जिसमें पहली बार इमर्सिव मार्केट को पेश किया जा रहा है, जो फिल्म निर्माताओं को अपनी कृतियों के विपणन और नए निवेशकों से जुड़ने के आधुनिक अवसर प्रदान करेगा। यह आयोजन न केवल कला की सराहना करने का स्थान है, बल्कि यह भारतीय और वैश्विक फिल्म उद्योग के भविष्य की नई इबारत लिखने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरेगा।

  • दोस्ती के खातिर संसद पहुंचे थे बिग बी, लेकिन सियासी साजिशों और आरोपों ने तीन साल में ही करा दी ग्लैमर की दुनिया में वापसी।

    दोस्ती के खातिर संसद पहुंचे थे बिग बी, लेकिन सियासी साजिशों और आरोपों ने तीन साल में ही करा दी ग्लैमर की दुनिया में वापसी।


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमिताभ बच्चन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, लेकिन उनके जीवन का एक अध्याय ऐसा भी है जिसे वह अक्सर एक कड़वी याद की तरह देखते हैं। साल 1984 में जब देश एक बड़े राजनीतिक बदलाव से गुजर रहा था, तब अपनी गहरी दोस्ती और भावनात्मक जुड़ाव के कारण अमिताभ बच्चन ने फिल्मी पर्दे की चकाचौंध छोड़ राजनीति की ऊबड़-खाबड़ गलियों में कदम रखा था। उन्होंने अपने जन्मस्थान इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया और एक अनुभवी राजनेता को रिकॉर्ड मतों से शिकस्त देकर संसद में अपनी जगह बनाई। उस वक्त ऐसा लगा था कि जनता का यह अपार प्रेम उन्हें राजनीति के शिखर पर ले जाएगा, लेकिन जल्द ही उन्हें यह महसूस होने लगा कि फिल्म के सेट और संसद के गलियारों के बीच एक गहरी खाई है जिसे पार करना उनके बस की बात नहीं थी।

    राजनीति के उस छोटे से सफर में अमिताभ बच्चन ने जमीनी हकीकत को बहुत करीब से देखा। उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण भारत के लोग कितने सीधे और सरल हैं, जो अपने नेता को देवता की तरह पूजते हैं। हालांकि, व्यवस्था के भीतर की पेचीदगियों और हर तरफ से आने वाले सवालों ने उन्हें बेचैन करना शुरू कर दिया था। उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा था कि किस तरफ बात करनी है और विरोधियों के तीखे हमलों का जवाब कैसे देना है। उन्होंने बाद के वर्षों में स्वीकार किया कि वह राजनीति के लिए बने ही नहीं थे और उनका वहां जाना पूरी तरह से एक भावुक निर्णय था। वह दो साल उनके जीवन के लिए बहुत कीमती रहे क्योंकि उन्होंने वहां से भारत की असली आत्मा को समझा, लेकिन इसके बदले उन्हें जो मानसिक शांति खोनी पड़ी, वह बहुत बड़ी कीमत थी।

    अमिताभ बच्चन के राजनीतिक करियर का दुखद अंत तब हुआ जब बोफोर्स घोटाले की आग ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। इस विवाद में उनका नाम भी घसीटा गया, जिसने महानायक की बेदाग छवि को जनता की नजरों में संदिग्ध बना दिया। उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था और विरोधियों के लगातार बढ़ते दबाव के बीच उन्होंने 1987 में अपने पद से इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। यह मामला उनके जीवन पर एक काले साये की तरह करीब ढाई दशक तक मंडराता रहा। हालांकि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद साल 2012 में उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दिया गया, लेकिन यह न्याय मिलने में बहुत देर हो चुकी थी। उनके माता-पिता उनकी बेगुनाही देखे बिना ही दुनिया से चले गए, जिसका दुख आज भी उनके शब्दों में झलकता है।

    अपने उस दौर को याद करते हुए अमिताभ बच्चन ने इसे ‘नरक’ के समान बताया था। उन्होंने साझा किया कि किस तरह उन्हें और उनके परिवार को निशाना बनाया गया और कई बड़े नेताओं ने उन्हें अपनी जान के खतरे तक की चेतावनी दी थी। जिस इंसान ने कभी राजनीति में आने का सपना भी नहीं देखा था, उसे व्यवस्था के सबसे क्रूर रूप का सामना करना पड़ा। इस कड़वे अनुभव के बाद उन्होंने कसम खा ली कि वह फिर कभी सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे। आज जब वह पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वह उन दो सालों को एक ऐसी सीख मानते हैं जिसने उन्हें यह समझा दिया कि हर सफल अभिनेता एक सफल राजनेता नहीं हो सकता और हर मैदान हर किसी के लिए नहीं बना होता।

  • अक्षय खन्ना ने खाने पर टोकने वालों को लताड़ा, बोले-दुआओं से बनती है फिल्म..

    अक्षय खन्ना ने खाने पर टोकने वालों को लताड़ा, बोले-दुआओं से बनती है फिल्म..


    नई दिल्ली । सिनेमा की दुनिया में अक्षय खन्ना को एक ऐसे मंझे हुए कलाकार के रूप में जाना जाता है जो अपनी निजी जिंदगी और सेट पर अपने व्यवहार को लेकर बेहद अनुशासित रहते हैं। अक्सर खामोश रहने वाले अक्षय के बारे में कहा जाता है कि वह अपने काम से काम रखते हैं और फालतू की चर्चाओं से दूर रहते हैं। लेकिन हाल ही में उनके एक पुराने साथी कलाकार ने उस घटना का विवरण दिया है, जिसने अक्षय के एक अलग ही पहलू को दुनिया के सामने रखा है। यह वाकया उस समय का है जब एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी और वहां एक ऐसा विवाद खड़ा हुआ जिसने शांत रहने वाले अक्षय को ‘ज्वालामुखी’ की तरह फटने पर मजबूर कर दिया। दरअसल, पूरा मामला एक सह-कलाकार के सम्मान और उसकी भूख से जुड़ा था, जिसे प्रोडक्शन टीम के कुछ लोगों ने बेहद तुच्छ समझा था।

    सेट पर मौजूद गवाहों के अनुसार, एक कैरेक्टर एक्टर जो उस फिल्म का हिस्सा थे, लंच के समय अक्षय के होटल में भोजन करने पहुंचे थे। वे किसी दूसरे होटल में ठहरे हुए थे, इसलिए तकनीकी नियमों का हवाला देकर वहां मौजूद प्रोड्यूसर के करीबियों या परिवार के सदस्यों ने उन पर आपत्ति जता दी। जैसे ही वह कलाकार भोजन का पहला निवाला लेने वाले थे, उन्हें टोक दिया गया और कहा गया कि वे वहां का खाना नहीं खा सकते। उस कलाकार को यह बात इतनी चुभ गई कि उन्होंने चुपचाप अपनी प्लेट किनारे रख दी और वहां से हटकर अकेले बैठ गए। अक्षय खन्ना दूर से यह सब देख रहे थे और उनसे एक कलाकार का यह सार्वजनिक अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ। जो अक्षय कभी किसी के विवाद में नहीं पड़ते, उस दिन उन्होंने अपनी गरिमा और शांति को किनारे रखकर मोर्चा संभाल लिया।

    अक्षय खन्ना का गुस्सा उस दिन सातवें आसमान पर था। उन्होंने न केवल उस कलाकार का पक्ष लिया बल्कि पूरी यूनिट और प्रोड्यूसर के सामने अपना विरोध दर्ज कराया। बताया जाता है कि अक्षय इस कदर आक्रोशित थे कि उन्होंने प्रोड्यूसर और संबंधित क्रू मेंबर्स को जमकर लताड़ा और शब्दों की मर्यादा भी टूट गई। उन्होंने बेहद कड़े लहजे में कहा कि कोई भी फिल्म इस बात से सफल नहीं होती कि आपने सेट पर कितनी प्लेटें बचाईं या कितना राशन कम खर्च किया। अक्षय ने दहाड़ते हुए कहा कि फिल्में लोगों की दुआओं और उनके आशीर्वाद से बनती हैं, किसी भूखे का अपमान करके नहीं। उन्होंने साफ कर दिया कि अगर एक कलाकार के साथ ऐसा व्यवहार होगा, तो काम की गुणवत्ता का कोई मोल नहीं रह जाएगा।

    इस घटना ने सेट पर मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया था क्योंकि किसी ने भी अक्षय का ऐसा ‘रौद्र रूप’ पहले कभी नहीं देखा था। अक्षय ने उस दिन यह साबित कर दिया कि वे भले ही कम बोलते हों, लेकिन जब बात किसी के स्वाभिमान और मानवता की आती है, तो वे पीछे हटने वालों में से नहीं हैं। उनके इस कड़े रुख के बाद सेट का माहौल पूरी तरह बदल गया और प्रोडक्शन को अपनी गलती का अहसास हुआ। यह किस्सा आज भी फिल्म जगत के गलियारों में चर्चा का विषय रहता है क्योंकि यह दिखाता है कि पर्दे पर विलेन की भूमिका निभाने वाला यह कलाकार असल जिंदगी में कमजोरों और अपने साथियों के लिए किसी नायक से कम नहीं है। अक्षय की इस बेबाकी ने यह संदेश दिया कि फिल्म निर्माण केवल कैमरे और लाइट्स का खेल नहीं है, बल्कि यह एक परिवार की तरह है जहां हर सदस्य का सम्मान सर्वोपरि है।

  • आईपीएल 2026 में इन 5 भारतीय सितारों को नहीं मिला मैदान पर उतरने का मौका..

    आईपीएल 2026 में इन 5 भारतीय सितारों को नहीं मिला मैदान पर उतरने का मौका..

    नई दिल्ली । क्रिकेट के सबसे बड़े मंच पर जहाँ एक ओर युवाओं की नई पौध अपनी चमक बिखेर रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे नामी खिलाड़ी भी हैं जिनका पूरा सीजन केवल डगआउट की सफेद कुर्सियों पर बैठकर बीत गया। इस सूची में सबसे ऊपर पृथ्वी शॉ का नाम आता है, जो कभी भारतीय बल्लेबाजी की अगली पीढ़ी के ध्वजवाहक माने जाते थे। दिल्ली की टीम ने उन्हें नीलामी में दोबारा अपने साथ जोड़ा तो था, लेकिन पूरे टूर्नामेंट के दौरान कप्तान और प्रबंधन ने उन्हें एक भी मैच की प्लेइंग इलेवन में जगह देना मुनासिब नहीं समझा। 75 लाख रुपये में बिकने वाले शॉ के लिए यह साल उनके करियर की सबसे बड़ी गिरावट के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि कभी उनकी गिनती टीम के सबसे महंगे और अनिवार्य खिलाड़ियों में होती थी। अब उनका पूरा सीजन बिना एक भी गेंद खेले खत्म होने की कगार पर है।

    अनुभवी तेज गेंदबाज ईशांत शर्मा की स्थिति भी कुछ इसी तरह की रही। गुजरात की टीम ने उन्हें रिटेन कर उन पर भरोसा तो जताया, लेकिन मैदान की हकीकत कुछ और ही रही। युवा तेज गेंदबाजों की बढ़ती रफ्तार और टी-20 क्रिकेट की बदलती मांग के बीच ईशांत की अनुभव वाली रणनीति टीम के समीकरणों में फिट नहीं बैठ सकी। पिछले सीजन के महंगे इकोनॉमी रेट ने उनकी राह और मुश्किल कर दी, जिसके चलते वह पूरे सीजन केवल नेट प्रैक्टिस और ड्रेसिंग रूम तक ही सीमित रह गए। उनके साथ ही अर्जुन तेंदुलकर की चर्चा भी काफी रही, जो मुंबई से ट्रेड होकर लखनऊ की टीम में पहुंचे थे। सचिन तेंदुलकर के पुत्र होने के नाते उन पर हमेशा कैमरे की नजर रही, लेकिन मैदान पर वह अपनी गेंदबाजी का जौहर दिखाने को तरसते रहे। पिछले दो वर्षों से लगातार मौकों का इंतजार कर रहे अर्जुन के लिए यह सीजन पेशेवर तौर पर बेहद निराशाजनक साबित हुआ है।

    वहीं घरेलू क्रिकेट में रनों का पहाड़ खड़ा करने वाले युवा मुशीर खान के लिए भी पंजाब की टीम का सफर केवल सीखने तक ही सीमित रहा। अपने भाई सरफराज खान की तरह आक्रामक बल्लेबाजी और स्पिन गेंदबाजी के लिए मशहूर मुशीर को इस साल एक भी मुकाबले में खुद को साबित करने की चुनौती नहीं मिली। टीम के पास मौजूद विदेशी विकल्पों और सीनियर ऑलराउंडर्स की मौजूदगी ने उन्हें बाउंड्री के बाहर ही रोके रखा। इसी फेहरिस्त में अनुभवी बल्लेबाज राहुल त्रिपाठी का नाम भी जुड़ गया है, जिनकी कोलकाता की टीम में वापसी तो हुई लेकिन वापसी का यह जश्न मैदान तक नहीं पहुंच सका। पिछले साल के खराब प्रदर्शन का असर उनके चयन पर साफ दिखा, जहाँ मैनेजमेंट ने उन पर भरोसा जताने के बजाय नए चेहरों के साथ जाना बेहतर समझा।

    इन पांचों खिलाड़ियों का भाग्य यह स्पष्ट करता है कि इस खेल के सबसे छोटे और ग्लैमरस प्रारूप में आपका नाम चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, तात्कालिक प्रदर्शन और टीम का संतुलन ही आपकी जगह तय करता है। करोड़ों के अनुबंध और प्रशंसकों की भारी उम्मीदों के बीच शुरू हुआ इन खिलाड़ियों का सफर अब प्लेऑफ के करीब आते-आते केवल डगआउट की यादों तक सीमित रह गया है। यह देखना दिलचस्प होगा कि अगले सीजन की नीलामी से पहले ये खिलाड़ी खुद को मानसिक रूप से कैसे तैयार करते हैं, क्योंकि मैदान से दूर रहकर अपनी लय बनाए रखना किसी भी पेशेवर खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है। फिलहाल, इनके लिए यह सीजन केवल एक लंबा इंतजार बनकर रह गया है।