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  • दतिया में चुनावी शतरंज बिछी, बीजेपी-कांग्रेस की तैयारी तेज; दामोदर यादव बन सकते हैं गेमचेंजर

    दतिया में चुनावी शतरंज बिछी, बीजेपी-कांग्रेस की तैयारी तेज; दामोदर यादव बन सकते हैं गेमचेंजर


    मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव ने प्रदेश की राजनीति को नई ऊर्जा दे दी है। कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा, कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी ने अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देना शुरू कर दिया है। चुनाव आयोग को 2 अक्टूबर 2026 तक उपचुनाव कराना है, ऐसे में राजनीतिक दलों की सक्रियता लगातार बढ़ती जा रही है।

    भारतीय जनता पार्टी की ओर से पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पूरी तरह चुनावी मोर्चा संभाले हुए हैं। पिछले दो महीनों से वे दतिया क्षेत्र में सामाजिक और जातीय समीकरणों को साधने के प्रयासों में जुटे हैं। यादव, पाल, क्षत्रिय सहित विभिन्न समाजों के लोगों को भाजपा से जोड़ने के लिए लगातार सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है। मई महीने के दौरान कई चरणों में अलग-अलग वर्गों के लोगों को पार्टी की सदस्यता दिलाई गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा उपचुनाव से पहले अपने पारंपरिक और नए सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।

    डॉ. मिश्रा ने विभिन्न कार्यक्रमों में भाजपा की विकासवादी नीतियों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को जनता का विश्वास मिलने का दावा किया है। लगातार हो रही सदस्यता गतिविधियों को भाजपा की चुनावी तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। यदि उपचुनाव होता है तो पार्टी की ओर से डॉ. नरोत्तम मिश्रा को उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना सबसे अधिक मानी जा रही है।

    वहीं कांग्रेस की रणनीति संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने पर केंद्रित है। पार्टी ने दतिया विधानसभा क्षेत्र में ब्लॉक, मंडलम और बूथ स्तर तक बैठकों का सिलसिला शुरू कर दिया है। कार्यकर्ताओं को चुनावी प्रबंधन और बूथ स्तर की तैयारियों के निर्देश दिए जा रहे हैं। 2 जून को प्रस्तावित बड़ा कार्यकर्ता सम्मेलन कांग्रेस के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है।

    हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती टिकट चयन को लेकर है। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती अपने बेटे को टिकट दिलाने की कोशिशों में लगे हैं। दूसरी ओर पाठ्यपुस्तक निगम के पूर्व उपाध्यक्ष अवधेश नायक भी मजबूत दावेदार के रूप में सामने आए हैं। नायक का तर्क है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी हित में त्याग किया था, इसलिए इस बार उन्हें मौका मिलना चाहिए। इसके अलावा कई अन्य नेता भी टिकट की दौड़ में शामिल हैं, जिससे पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है।

    कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल संगठनात्मक एकता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चुनावी रणनीति तैयार की जा रही है ताकि उपचुनाव में भाजपा को कड़ी चुनौती दी जा सके।

    इधर आजाद समाज पार्टी भी दतिया में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने में लगी है। पार्टी नेता दामोदर यादव लगातार किसान सम्मेलनों, जनसंपर्क अभियानों और कार्यकर्ता बैठकों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। उनका दावा है कि बसपा और कांग्रेस के कई कार्यकर्ता उनकी पार्टी से जुड़ रहे हैं। पार्टी ने उन्हें संभावित उम्मीदवार के रूप में आगे बढ़ाने के संकेत भी दिए हैं।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मुकाबला भले ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा दिखाई दे रहा हो, लेकिन आजाद समाज पार्टी की सक्रियता चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। खासकर यदि दामोदर यादव कुछ खास सामाजिक वर्गों और असंतुष्ट मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल रहते हैं तो मुकाबला त्रिकोणीय रंग ले सकता है।

    उधर निर्वाचन आयोग ने भी उपचुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। दतिया में ईवीएम की फर्स्ट लेवल चेकिंग की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जिससे स्पष्ट है कि प्रशासनिक स्तर पर भी चुनावी तैयारियां गति पकड़ रही हैं।

    दतिया उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति में प्रभाव और संगठनात्मक ताकत की परीक्षा भी माना जा रहा है। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा, सामाजिक समीकरण और स्थानीय मुद्दे इस चुनाव की दिशा तय करेंगे।

  • मई में 56% ज्यादा बारिश, मध्य प्रदेश में गर्मी पर ब्रेक; कई जिलों में बारिश और तेज हवाएं

    मई में 56% ज्यादा बारिश, मध्य प्रदेश में गर्मी पर ब्रेक; कई जिलों में बारिश और तेज हवाएं


    मध्य प्रदेश । मध्य प्रदेश में लगातार सक्रिय मौसम प्रणाली के कारण गर्मी का असर काफी हद तक कम हो गया है। प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में आंधी, बारिश और तेज हवाओं का दौर जारी है, जिससे दिन और रात दोनों के तापमान में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अनुसार बीते 24 घंटों के दौरान कई जिलों में अच्छी बारिश हुई, जबकि श्योपुर जिले में आकाशीय बिजली गिरने से एक व्यक्ति की मौत हो गई।

    रविवार और सोमवार की दरमियानी रात प्रदेश के कई हिस्सों में मौसम सुहावना बना रहा। खंडवा प्रदेश का सबसे ठंडा शहर रहा, जहां न्यूनतम तापमान 19 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। वहीं पचमढ़ी में तापमान 19.4 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया। राजधानी भोपाल में रात का तापमान 24.5 डिग्री, इंदौर में 26.4 डिग्री, ग्वालियर में 24.7 डिग्री, उज्जैन में 26 डिग्री और जबलपुर में 24.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

    प्रदेश के अन्य जिलों में भी तापमान सामान्य से नीचे रहा। दमोह में 21.8 डिग्री, रीवा में 22 डिग्री, खरगोन और छिंदवाड़ा में 23.4 डिग्री, उमरिया में 23.5 डिग्री तथा दतिया में 23.7 डिग्री सेल्सियस तापमान रिकॉर्ड किया गया। मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बादल, नमी और वर्षा गतिविधियों के कारण लोगों को भीषण गर्मी से राहत मिली है।

    बारिश की बात करें तो सतना जिले में सबसे अधिक वर्षा दर्ज की गई, जहां 24 घंटे के दौरान सवा इंच से ज्यादा पानी बरसा। दतिया में आधा इंच बारिश रिकॉर्ड की गई। इसके अलावा शिवपुरी, गुना, ग्वालियर, श्योपुर, रीवा, सिवनी, बैतूल, सिंगरौली, मैहर और उमरिया समेत कई जिलों में बारिश हुई। राजधानी भोपाल में भी सोमवार सुबह से तेज हवाओं के साथ मौसम खुशनुमा बना रहा।

    मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार मई महीने में प्रदेश में सामान्य से लगभग 56 प्रतिशत अधिक वर्षा दर्ज की गई है। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि इस बार प्री-मानसून गतिविधियां सामान्य से कहीं अधिक सक्रिय रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी विक्षोभ, चक्रवाती परिसंचरण और अरब सागर-बंगाल की खाड़ी से आ रही नमी के संयुक्त प्रभाव के कारण प्रदेश में बार-बार मौसम बदल रहा है।

    हालांकि बारिश और ठंडक के बीच आकाशीय बिजली का खतरा भी बढ़ गया है। श्योपुर में बिजली गिरने की घटना ने मौसम विभाग की चेतावनियों की गंभीरता को एक बार फिर उजागर किया है। विशेषज्ञों ने लोगों से खराब मौसम के दौरान खुले मैदानों, पेड़ों और बिजली के खंभों के पास खड़े होने से बचने की सलाह दी है।

    मौसम विभाग का अनुमान है कि अगले कुछ दिनों तक प्रदेश के कई हिस्सों में बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं का सिलसिला जारी रह सकता है। इससे तापमान में और गिरावट आने की संभावना है। किसानों के लिए यह मौसम फायदेमंद माना जा रहा है, लेकिन तेज हवाओं और बिजली गिरने की घटनाओं को देखते हुए सतर्कता बरतने की आवश्यकता है।

    गर्मी से परेशान लोगों के लिए यह बदलाव राहत लेकर आया है, लेकिन मौसम के लगातार बदलते मिजाज को देखते हुए प्रशासन और नागरिकों दोनों को सावधानी बरतनी होगी।

  • आत्महत्या या हत्या? ट्विशा केस में CBI जोड़ रही हर कड़ी, समर्थ से हो रही लंबी पूछताछ

    आत्महत्या या हत्या? ट्विशा केस में CBI जोड़ रही हर कड़ी, समर्थ से हो रही लंबी पूछताछ


    मध्य प्रदेश । भोपाल के चर्चित ट्विशा शर्मा मौत मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो की जांच लगातार नए खुलासे कर रही है। मामले में आरोपी समर्थ की फरारी को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आई हैं। जांच एजेंसी को मिले शुरुआती तथ्यों के अनुसार एफआईआर दर्ज होने के बाद समर्थ तत्काल शहर नहीं छोड़ पाया था और करीब तीन दिनों तक भोपाल में ही अलग-अलग स्थानों पर रुका रहा। इसके बाद वह जबलपुर पहुंचा, जहां उसने लगभग पांच दिनों तक अपनी मौजूदगी छिपाए रखी। अब सीबीआई इस पूरे घटनाक्रम की बारीकी से पड़ताल कर रही है।

    जांच एजेंसी का मुख्य फोकस यह जानने पर है कि फरारी के दौरान समर्थ कहां-कहां रुका, किन लोगों के संपर्क में रहा और उसे किस-किस व्यक्ति ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सहायता पहुंचाई। इसके लिए उसके मोबाइल फोन, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन हिस्ट्री, बैंकिंग ट्रांजेक्शन और डिजिटल चैट्स की विस्तृत जांच की जा रही है। अधिकारियों का मानना है कि इन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से फरारी के दौरान की गतिविधियों की पूरी तस्वीर सामने आ सकती है।

    मामले में एक नया पहलू ट्विशा की कथित प्रेग्नेंसी और गर्भपात से भी जुड़ा हुआ है। इसी क्रम में सीबीआई ने उस डॉक्टर को भी पूछताछ के लिए तलब किया है, जिसने कथित तौर पर ट्विशा को मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी यानी गर्भपात की सलाह दी थी। जांच एजेंसी यह समझना चाहती है कि प्रेग्नेंसी और गर्भपात को लेकर जो दावे किए जा रहे हैं, उनमें कितनी सच्चाई है और उनका इस पूरे मामले से क्या संबंध हो सकता है।

    सूत्रों के अनुसार पूछताछ के दौरान समर्थ लगातार यह दावा कर रहा है कि ट्विशा की मौत आत्महत्या का मामला है। उसका कहना है कि गर्भपात के बाद ट्विशा मानसिक तनाव और अवसाद से गुजर रही थी, जिसके कारण उसने यह कदम उठाया। हालांकि जांच एजेंसी केवल उसके बयानों पर निर्भर नहीं है और हर दावे को वैज्ञानिक तथा फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर परख रही है।

    सीबीआई इस मामले को आत्महत्या और हत्या दोनों संभावनाओं के दृष्टिकोण से देख रही है। जांचकर्ता यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि घटना से पहले दोनों के संबंधों की स्थिति क्या थी, क्या किसी प्रकार का विवाद या मारपीट हुई थी और घटनास्थल से मिले साक्ष्य क्या संकेत देते हैं। यदि यह आत्महत्या थी तो उसके पीछे तत्काल कारण क्या था और यदि नहीं, तो फिर वास्तविक घटनाक्रम क्या रहा।

    जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा घटनास्थल से लेकर अस्पताल तक की पूरी टाइमलाइन तैयार करना भी है। सीबीआई समर्थ से लगातार पूछताछ कर रही है कि उसने सबसे पहले ट्विशा को किस अवस्था में देखा, उसे फंदे से किसने उतारा, उस समय घर में कौन-कौन मौजूद था और अस्पताल ले जाने तक क्या-क्या घटनाएं हुईं। इन सभी बयानों का मिलान फोरेंसिक रिपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों से किया जा रहा है।

    इसके अलावा जांच एजेंसी उन लोगों की भी पहचान करने में जुटी है जिन्होंने एफआईआर दर्ज होने के बाद समर्थ को फरार रहने में मदद की हो सकती है। यदि जांच में किसी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।

    ट्विशा शर्मा मौत मामला शुरुआत से ही कई सवालों और विवादों के घेरे में रहा है। अब सीबीआई हर एंगल से जांच कर रही है ताकि घटनाओं की वास्तविक श्रृंखला सामने लाई जा सके और यह स्पष्ट हो सके कि यह मामला आत्महत्या का था या इसके पीछे कोई और सच्चाई छिपी हुई है।

  • चीन के डॉक्टरों ने पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट किए सुअर के लिवर और दोनों किडनी

    चीन के डॉक्टरों ने पहली बार इंसान के शरीर में एकसाथ ट्रांसप्लांट किए सुअर के लिवर और दोनों किडनी

    नई दिल्ली। दुनिया भर में अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही मानव अंगों की भारी कमी को दूर करने की दिशा में वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने एक ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में पहली बार शोधकर्ताओं की एक विशेष टीम ने एक इंसान के शरीर में जेनेटिक रूप से संशोधित यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड सुअर का पूरा लिवर और उसकी दोनों किडनियां एक साथ सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित करने का कारनामा कर दिखाया है।
    इस बेहद जटिल और अत्याधुनिक सर्जरी को अंग प्रत्यारोपण की दुनिया में एक बड़ी संभावित क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। अब तक सुअर के अंगों को इंसानों में लगाने के जितने भी प्रयास किए गए थे, वे केवल किसी एक अंग तक ही सीमित थे। यह पहला मौका है जब डॉक्टरों ने तकनीकी बाधाओं को पार करते हुए एक साथ कई अंगों का बहु-अंग प्रत्यारोपण करने में सफलता पाई है।

    इस अभूतपूर्व चिकित्सा परीक्षण को अंजाम देने के लिए डॉक्टरों ने एक ऐसे ५३ वर्षीय व्यक्ति को चुना जो पहले से ही पूरी तरह ब्रेन-डेड घोषित हो चुका था। मरीज के परिजनों ने चिकित्सा अनुसंधान के महत्व को समझते हुए इस ऐतिहासिक प्रयोग के लिए अपनी स्वैच्छिक सहमति प्रदान की थी। जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से विशेष रूप से तैयार किए गए सुअर के इन अंगों को जब मरीज के शरीर में प्रत्यारोपित किया गया, तो उन्होंने लगभग पांच दिनों तक बिना किसी बड़ी रुकावट के बेहद प्रभावी तरीके से काम किया।

    इस पूरी प्रक्रिया के दौरान डॉक्टरों को रियल टाइम में यह देखने और समझने का दुर्लभ अवसर मिला कि जानवरों के अंग किसी मानव शरीर के भीतर किस तरह की जैविक प्रतिक्रियाएं देते हैं। विज्ञान की भाषा में इस तरह के प्रत्यारोपण को जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है, जिसका सीधा मतलब एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में पूरे अंग, कोशिकाएं या टिशू ट्रांसप्लांट करना होता है।

    इस बेहद जटिल सर्जरी के बाद जो परिणाम सामने आए, उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। वर्षों से वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे थे कि क्या सुअर के अंग इंसानों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं, और अब सुअर के डीएनए को एडिट करने की तकनीक ने इसे एक ठोस हकीकत में बदल दिया है।

    ट्रांसप्लांटेशन के शुरुआती चौबीस घंटों के भीतर मरीज के शरीर में इन बाहरी अंगों को अस्वीकार करने या रिजेक्ट करने के कोई भी लक्षण या संकेत नहीं देखे गए। विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही समय में कई अंगों का प्रत्यारोपण करना तकनीकी रूप से अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है और इसमें मरीज की जान जाने का जोखिम भी कई गुना बढ़ जाता है, लेकिन इसके बावजूद अंगों का सुचारू रूप से काम करना बहु-अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी कामयाबी है।

    डॉक्टरों और शोधकर्ताओं के अनुसार, प्रत्यारोपण संपन्न होने के महज उन्नीस घंटों के भीतर ही सुअर के लिवर ने मानव शरीर के अनुकूल काम करते हुए पित्त का निर्माण और रिसाव शुरू कर दिया था, जो इसके सामान्य रूप से सक्रिय होने का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है। इसके अलावा, गंभीर बीमारी के कारण मरीज के शरीर में क्रिएटिनिन और यूरिया का जो स्तर खतरनाक रूप से बढ़ा हुआ था, वह सुअर की दोनों किडनियां लगते ही तेजी से गिरकर बिल्कुल सामान्य स्तर पर लौट आया। इस सकारात्मक बदलाव ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रत्यारोपित की गई दोनों किडनियां मानव शरीर के भीतर अपने महत्वपूर्ण जैविक कार्यों को पूरी तरह से निभाने में सक्षम थीं।

    इस चमत्कारिक सफलता के बाद भी वैज्ञानिक अभी पूरी तरह से सतर्क हैं और उनका कहना है कि इस तकनीक को जीवित मरीजों पर आजमाने से पहले अभी कई और कड़े परीक्षणों की आवश्यकता होगी। भविष्य में इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अभी ब्रेन-डेड व्यक्तियों और जीवित बंदरों पर और अधिक गहन अध्ययन किए जाएंगे। वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि सुअर के अंगों के माध्यम से किसी भी प्रकार के अज्ञात या खतरनाक वायरस और बैक्टीरिया इंसानों के भीतर प्रवेश न कर पाएं। बहरहाल, दुनिया भर में लाखों लोग हर साल किडनी, लिवर और हार्ट जैसे अंगों की प्रतीक्षा में दम तोड़ देते हैं, ऐसे में इस नई तकनीक ने चिकित्सा जगत में चिकित्सा अनुसंधान के एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत कर दी है।

  • 210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?

    210 साल पुराने लिपुलेख विवाद की पूरी कहानी, आखिर कहां से शुरू हुआ विवाद?


    नई दिल्ली। भारत और नेपाल के बीच लिपुलेख दर्रे को लेकर चला आ रहा सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। बालेन शाह ने ब्रिटेन की भूमिका का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के समय से चले आ रहे सीमा विवादों को वह यूनाइटेड किंगडम के सामने भी उठाएंगे। इसके बाद 210 साल पुराने इस विवाद पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    लिपुलेख दर्रा हिमालयी क्षेत्र में स्थित एक रणनीतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मार्ग है। यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले को तिब्बत के पुरांग क्षेत्र से जोड़ता है। यही दर्रा कैलास मानसरोवर यात्रा के प्रमुख मार्गों में से एक माना जाता है। भारत और चीन के बीच हुए समझौतों के तहत वर्षों से इस मार्ग का उपयोग तीर्थयात्रियों और सीमित व्यापारिक गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है।

    इस विवाद की जड़ वर्ष 1816 में हुई ऐतिहासिक सुगौली संधि में छिपी है। यह संधि तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई थी। संधि के अनुसार काली नदी को भारत और नेपाल की सीमा माना गया था। हालांकि विवाद इस बात को लेकर है कि काली नदी का वास्तविक उद्गम स्थल कौन सा है।

    भारत का दावा है कि काली नदी का उद्गम लिपुलेख क्षेत्र के निकट स्थित कालापानी इलाके से होता है। इस आधार पर भारत लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र को अपने भूभाग का हिस्सा मानता है। दूसरी ओर नेपाल का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है। यदि नेपाल के दावे को सही माना जाए तो कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा का इलाका नेपाल के क्षेत्र में आता है।

    विवाद को और जटिल बनाने वाला एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि वर्ष 1865 के आसपास ब्रिटिश प्रशासन ने सीमा निर्धारण में कुछ बदलाव किए थे। भारत का पक्ष है कि बाद के आधिकारिक नक्शों और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर यह क्षेत्र भारत का हिस्सा रहा है। वहीं नेपाल का आरोप है कि ब्रिटिश शासन के दौरान सीमा निर्धारण में उसके हितों की अनदेखी की गई थी।

    यह विवाद वर्ष 2020 में तब और तेज हो गया जब भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली रणनीतिक सड़क का उद्घाटन किया। नेपाल ने इसका विरोध करते हुए नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया गया। इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया था।

    भारत का लगातार यही रुख रहा है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और आपसी बातचीत के माध्यम से होना चाहिए। नई दिल्ली किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता के पक्ष में नहीं रही है। वहीं नेपाल में समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दल और नेता इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की वकालत करते रहे हैं।

    लिपुलेख विवाद केवल सीमा रेखा का सवाल नहीं है बल्कि इसमें ऐतिहासिक दस्तावेज, सामरिक महत्व, धार्मिक आस्था और दोनों देशों के राष्ट्रीय हित भी जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि दो सदियों बाद भी यह मुद्दा पूरी तरह सुलझ नहीं सका है और समय-समय पर दोनों पड़ोसी देशों के रिश्तों में चर्चा का विषय बन जाता है।

  • विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस

    विदेशी प्रभाव बढ़ाने की कोशिश? पाकिस्तान के खर्च को लेकर नई बहस


    नई दिल्ली। अमेरिका की सत्ता और नीति निर्धारण के केंद्र वाशिंगटन में पाकिस्तान की सक्रिय लॉबिंग को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। विदेशी मामलों के विशेषज्ञ रोबिंदर सचदेव ने अमेरिकी विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम यानी एफएआरए के सार्वजनिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए दावा किया है कि पाकिस्तान अमेरिका में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर महीने औसतन नौ लाख डॉलर यानी लगभग साढ़े आठ करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। यह खुलासा ऐसे समय में सामने आया है जब पाकिस्तान कई कूटनीतिक और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    एफएआरए के दस्तावेजों के अनुसार पाकिस्तान का वार्षिक लॉबिंग खर्च लगभग एक से 1.2 करोड़ डॉलर के बीच पहुंच चुका है। यह राशि अमेरिकी राजनीतिक गलियारों, सरकारी एजेंसियों और प्रभावशाली नीति निर्माताओं तक पहुंच बनाने के लिए खर्च की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश द्वारा लॉबिंग फर्मों की सेवाएं लेना असामान्य नहीं है, लेकिन पाकिस्तान द्वारा किया जा रहा खर्च उसकी मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए काफी बड़ा माना जा रहा है।

    रोबिंदर सचदेव के अनुसार पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारियों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए कई पेशेवर लॉबिंग फर्मों को अनुबंध पर रखा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अमेरिकी गृह विभाग से जुड़े स्तर पर संपर्क स्थापित करने के लिए एक फर्म को हर महीने 50 हजार डॉलर दिए जा रहे हैं। वहीं व्यापार और आर्थिक मामलों से संबंधित मुद्दों को संभालने वाली एक अन्य कंपनी को लगभग ढाई लाख डॉलर प्रति माह का भुगतान किया जा रहा है।

    सबसे ज्यादा चर्चा उस अनुबंध को लेकर है जिसे हाल ही में बढ़ाया गया है। बताया गया है कि एक लॉबिंग फर्म को पहले 25 हजार डॉलर मासिक भुगतान किया जाता था, लेकिन अब उसके साथ लगभग 12 लाख डॉलर का बड़ा समझौता किया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक बेचैनी और अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की कोशिशों को दर्शाता है।

    रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान की ओर से चलाया जा रहा यह अभियान उन दावों से अलग तस्वीर पेश करता है जो हाल के महीनों में पाकिस्तानी नेतृत्व की ओर से किए गए थे। विशेष रूप से सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के उन बयानों का उल्लेख किया जा रहा है जिनमें उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान अमेरिकी मध्यस्थता से जुड़े दावे किए थे।

    एफएआरए दस्तावेजों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह भी दावा किया गया है कि मई 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने वाशिंगटन में अपने संपर्क अभियान को तेज कर दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक 6 से 9 मई के बीच पाकिस्तानी प्रतिनिधियों और एजेंटों ने अमेरिकी संसद, पेंटागन और ट्रेजरी विभाग से जुड़े अधिकारियों के साथ दर्जनों आपातकालीन बैठकें की थीं। इन बैठकों का उद्देश्य पाकिस्तान के पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करना और अमेरिकी नीति निर्माताओं तक अपनी बात पहुंचाना बताया गया।

    अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लॉबिंग एक सामान्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन पाकिस्तान के कथित खर्च और गतिविधियों को लेकर सामने आई जानकारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वैश्विक मंचों पर प्रभाव कायम रखने के लिए देश किस हद तक संसाधन झोंक रहे हैं। आने वाले समय में इन खुलासों पर पाकिस्तान की आधिकारिक प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय हलकों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण रहेगी।
  • रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ पर फिर गरमाया मामला: कराची के पूर्व मेयर के दावे ने आलोचकों को दिया करारा जवाब

    रणवीर सिंह की ‘धुरंधर’ पर फिर गरमाया मामला: कराची के पूर्व मेयर के दावे ने आलोचकों को दिया करारा जवाब

    नई दिल्ली। भारतीय सिनेमा जगत की ब्लॉकबस्टर एक्शन-थ्रिलर फिल्म ‘धुरंधर’ और उसके सीक्वल को लेकर चल रहा वैचारिक विवाद अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। अभिनेता रणवीर सिंह और निर्देशक आदित्य धर की इस बेहद चर्चित फिल्म को लेकर जहां भारत के भीतर ही कुछ बुद्धिजीवियों, समीक्षकों और सोशल मीडिया विश्लेषकों द्वारा इसे एक ‘प्रोपेगैंडा फिल्म’ करार दिया जा रहा था, वहीं अब इस पूरे मामले में सरहद पार से आए एक बड़े बयान ने आलोचकों को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है। पाकिस्तान के कराची शहर के पूर्व मेयर और वरिष्ठ पत्रकार आरिफ अजाकिया ने फिल्म के समर्थन में खुलकर अपनी बात रखी है।

    उन्होंने एक प्रतिष्ठित वैश्विक पत्रकारिता कार्यक्रम ‘टॉक जर्नलिज्म’ के दौरान यह सनसनीखेज दावा किया कि फिल्म में दिखाई गई पाकिस्तान के ल्यारी इलाके की जमीनी हकीकत और आतंकी नेटवर्क को खत्म करने की जो कहानी पर्दे पर उतारी गई है, वह पूरी तरह से सच पर आधारित है। इस बयान का वीडियो सामने आने के बाद से ही फिल्म की आलोचना करने वाले धड़ों के बीच सन्नाटा पसर गया है।

    आरिफ अजाकिया ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपनी पुरानी राजनीतिक पृष्ठभूमि का हवाला देते हुए कहा कि जिस दौर की घटनाओं और मिशन को फिल्म ‘धुरंधर’ में फिल्माया गया है, उस समय वह स्वयं कराची के उस विशेष प्रशासनिक क्षेत्र के मेयर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि उनका जन्म और पालन-पोषण कराची के उसी विवादित ल्यारी इलाके में हुआ है, जहां बलूच गैंग और विभिन्न आतंकी संगठनों का एक समय पर भारी वर्चस्व हुआ करता था।

    पूर्व मेयर के अनुसार, वह उस दौर के सुरक्षा हालातों और पर्दे के पीछे चलने वाली गतिविधियों के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं, इसलिए वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह स्वीकार करते हैं कि फिल्म के भीतर जो कुछ भी दिखाया गया है, उसमें रत्ती भर भी झूठ नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने मंच से अपनी जड़ों के बारे में बात करते हुए यह भी स्वीकार किया कि भले ही उनका जन्म कराची में हुआ हो, लेकिन उनके माता-पिता अविभाजित भारत के जूनागढ़, गुजरात से ताल्लुक रखते थे, इसलिए वह स्वयं को पाकिस्तानी मानने की बजाय भारतीय मूल का नागरिक कहलाना अधिक पसंद करते हैं।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के सिनेमाघरों में धूम मचाने वाली इस फिल्म की कहानी की बात करें तो ‘धुरंधर’ और इसका हालिया सीक्वल दर्शकों को एक बेहद संजीदा और खतरनाक खुफिया मिशन पर ले जाता है। फिल्म की पटकथा में दिखाया गया है कि किस प्रकार भारतीय खुफिया एजेंसी का एक जांबाज अधिकारी जसकीरत, विषम परिस्थितियों के बीच अपना नाम और पहचान बदलकर हमजा बन जाता है और पाकिस्तान के सबसे संवेदनशील इलाके ल्यारी के एक खतरनाक बलूच गैंग में सफलतापूर्वक घुसपैठ करता है।

    वहां रहते हुए वह न केवल स्थानीय अपराधियों के तंत्र को ध्वस्त करता है बल्कि एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन के मंसूबों को भी नेस्तनाबूद कर देता है। रणवीर सिंह के दमदार अभिनय से सजी इस फिल्म में सारा अर्जुन, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन जैसे स्थापित कलाकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। जहाँ एक तरफ इस फिल्म की आलोचना करने वाले इसे केवल एक काल्पनिक और अतिशयोक्तिपूर्ण कहानी बता रहे थे, वहीं अब खुद कराची की कमान संभाल चुके एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी द्वारा इसे सच का आईना बताए जाने के बाद इस फिल्म की प्रामाणिकता पर उठ रहे तमाम सवालों पर पूरी तरह से विराम लग गया है।

  • बार-बार पड़ते हैं बीमार? समझिए विटामिन-सी और विटामिन-डी में कौन है इम्युनिटी का असली हीरो

    बार-बार पड़ते हैं बीमार? समझिए विटामिन-सी और विटामिन-डी में कौन है इम्युनिटी का असली हीरो


    नई दिल्ली। मौसम बदलते ही सर्दी-जुकाम होना, बार-बार संक्रमण की चपेट में आना, जल्दी थक जाना और शरीर में कमजोरी महसूस होना अक्सर कमजोर इम्युनिटी के संकेत माने जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में लोगों के बीच रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है। खासकर कोरोना महामारी के बाद विटामिन-सी और विटामिन-डी को लेकर लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गई। हालांकि आज भी बहुत से लोगों के मन में यह सवाल बना रहता है कि इम्युनिटी मजबूत करने के लिए आखिर सबसे ज्यादा जरूरी कौन है-विटामिन-सी या विटामिन-डी?

    स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसका सीधा जवाब यह है कि दोनों ही विटामिन शरीर के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक को दूसरे से ज्यादा महत्वपूर्ण मानना सही नहीं होगा। मजबूत इम्यून सिस्टम के लिए दोनों का संतुलित स्तर बनाए रखना आवश्यक है।

    विटामिन-सी को लंबे समय से प्राकृतिक इम्युनिटी बूस्टर माना जाता रहा है। यह शरीर में श्वेत रक्त कोशिकाओं यानी व्हाइट ब्लड सेल्स की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में मदद करता है। ये कोशिकाएं शरीर को वायरस, बैक्टीरिया और अन्य संक्रमणों से बचाने का काम करती हैं। इसके अलावा विटामिन-सी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट भी है जो शरीर को फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाता है। कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि पर्याप्त मात्रा में विटामिन-सी का सेवन करने से सर्दी-जुकाम की अवधि और उसकी गंभीरता कुछ हद तक कम हो सकती है।

    दूसरी ओर विटामिन-डी को भी इम्यून सिस्टम का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जाता है। यह शरीर की टी-सेल्स और अन्य प्रतिरक्षा कोशिकाओं को सक्रिय करने में मदद करता है जो संक्रमण पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया के खिलाफ रक्षा कवच का काम करती हैं। विटामिन-डी शरीर में सूजन को नियंत्रित रखने में भी सहायक होता है जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली संतुलित रूप से कार्य करती है। शोध बताते हैं कि जिन लोगों में विटामिन-डी की कमी होती है उनमें श्वसन संबंधी संक्रमण, फ्लू और अन्य बीमारियों का खतरा अधिक हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सप्लीमेंट्स के भरोसे इम्युनिटी मजबूत नहीं की जा सकती। इसके लिए संतुलित आहार, पर्याप्त नींद, नियमित व्यायाम, तनाव पर नियंत्रण और स्वस्थ जीवनशैली भी उतनी ही जरूरी है। यदि शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व सही मात्रा में मिलते रहें तो इम्यून सिस्टम बेहतर तरीके से काम करता है।

    विटामिन-सी की पूर्ति के लिए आंवला, संतरा, नींबू, अमरूद, कीवी, स्ट्रॉबेरी और शिमला मिर्च जैसे खाद्य पदार्थों को अपने आहार में शामिल किया जा सकता है। वहीं विटामिन-डी के लिए सुबह की धूप सबसे अच्छा स्रोत मानी जाती है। इसके अलावा अंडे की जर्दी, फैटी फिश, मशरूम और फोर्टिफाइड डेयरी उत्पादों का सेवन भी लाभदायक होता है।

    कुल मिलाकर इम्युनिटी को मजबूत बनाने के लिए विटामिन-सी और विटामिन-डी दोनों ही जरूरी हैं। एक संक्रमण से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है तो दूसरा इम्यून सिस्टम को सक्रिय और संतुलित बनाए रखता है। इसलिए बेहतर स्वास्थ्य के लिए दोनों पोषक तत्वों की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करना ही सबसे समझदारी भरा कदम है।

  • पर्दे पर रहे विरोधी, असल जिंदगी में निकले बेहद करीबी रिश्तेदार: जानिए रेखा और अभिनेता तेज सप्रू का अनोखा फैमिली कनेक्शन

    पर्दे पर रहे विरोधी, असल जिंदगी में निकले बेहद करीबी रिश्तेदार: जानिए रेखा और अभिनेता तेज सप्रू का अनोखा फैमिली कनेक्शन

    नई दिल्ली। बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री की सबसे रहस्यमयी और सदाबहार अभिनेत्रियां में शुमार रेखा के पेशेवर जीवन और उनकी व्यक्तिगत प्रेम कहानी से तो दुनिया भली-भांति वाकिफ है, परंतु उनके पारिवारिक ताने-बाने को लेकर आज भी कई ऐसे अनसुने पहलू हैं जिनसे आम जनमानस पूरी तरह अनजान है। साठ के दशक से सिल्वर स्क्रीन पर राज करने वाली रेखा का हिंदी सिनेमा के एक बेहद लोकप्रिय और खूंखार विलेन का किरदार निभाने वाले अभिनेता तेज सप्रू के साथ बेहद करीबी और सगा पारिवारिक संबंध है।
    गुजरे जमाने के इस मशहूर खलनायक और रेखा के बीच का यह रिश्ता बेहद गहरा और आत्मीय है, जिसके चलते असल जिंदगी में ये दोनों एक-दूसरे के बेहद खास रिश्तेदार माने जाते हैं। पर्दे पर एक-दूसरे के विपरीत भूमिकाओं में नजर आने वाले इन दोनों उम्दा कलाकारों के बीच जीजा और साली का एक मजबूत पारिवारिक पवित्र रिश्ता है, जिसकी जड़ें रेखा की माता के वैवाहिक जीवन के इतिहास से सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं।

    इस पारिवारिक जुड़ाव की पेचीदगियों को समझने के लिए रेखा की माता पुष्पावली के जीवन चक्र को जानना बेहद आवश्यक है। अपने दौर की प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय अभिनेत्री पुष्पावली ने चालीस और पचास के दशक में कई फिल्मों में काम कर अपने बच्चों का भरण-पोषण किया था। वर्ष 1940 में आई. वी. रंगाचारी से विवाह के बाद वर्ष 1946 में उनका अलगाव हो गया, जिसके बाद उनकी नजदीकियां तमिल सिनेमा के दिग्गज अभिनेता जेमिनी गणेशन के साथ बढ़ीं। इस गहरे रिश्ते के चलते रेखा और उनकी बहन राधा का जन्म हुआ, हालांकि जेमिनी गणेशन ने सार्वजनिक तौर पर कभी इस रिश्ते को पूर्ण स्वीकृति नहीं दी।

    जेमिनी गणेशन से अलग होने के पश्चात पुष्पावली ने अकेले ही अपनी बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी उठाई और इसी संघर्षपूर्ण दौर में उनकी जिंदगी में विख्यात सिनेमेटोग्राफर के. प्रकाश की एंट्री हुई। के. प्रकाश और पुष्पावली के विवाह के बाद उनके घर दो बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें एक बेटा सेशू और एक बेटी धनलक्ष्मी शामिल थीं। रेखा अपनी सभी बहनों और भाई के साथ एक ही छत के नीचे बड़ी हुईं और अपनी सौतेली बहन धनलक्ष्मी के साथ भी उनका बेहद गहरा और अटूट स्नेह रहा है।

    देशभर के सिनेमा प्रेमियों के लिए यह बेहद दिलचस्प तथ्य है कि रेखा की यही छोटी सौतेली बहन धनलक्ष्मी आगे चलकर मशहूर अभिनेता तेज सप्रू की जीवनसंगिनी बनीं। धनलक्ष्मी और तेज सप्रू के इस विवाह के बाद से ही तकनीकी और पारिवारिक रूप से तेज सप्रू रिश्ते में रेखा के सगे जीजा बन गए।
    रेखा और तेज सप्रू के इस बेहद करीबी पारिवारिक रिश्ते के बारे में फिल्म इंडस्ट्री और प्रशंसकों के बीच बहुत ही सीमित लोगों को जानकारी है। इन दोनों कलाकारों ने न केवल पारिवारिक स्तर पर बल्कि पेशेवर मोर्चे पर भी एक-दूसरे का साथ निभाया है और ‘जाल’ तथा ‘इंसाफ का तराजू’ जैसी करीब तीन सुपरहिट फिल्मों में सह-कलाकार के रूप में एक साथ स्क्रीन भी साझा की है।
    रेखा अपने सभी भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं और आज भी अपनी बहनों के बेहद करीब मानी जाती हैं, जहां उनकी सगी बहन राधा विवाह के बाद अमेरिका में बस चुकी हैं, वहीं सौतेली बहन धनलक्ष्मी और जीजा तेज सप्रू के साथ उन्हें अक्सर पारिवारिक समारोहों में बेहद आत्मीयता के साथ वक्त बिताते हुए देखा जाता है।