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  • अमेरिका ने बताई भारत को रूस से तेल खरीदने की छूट देने की वजह, कही ये बात

    अमेरिका ने बताई भारत को रूस से तेल खरीदने की छूट देने की वजह, कही ये बात


    नई दिल्ली।
    भारत (India) से समुद्री मार्ग में पहले से मौजूद रूसी कच्चे तेल (Russian Crude Oil) को खरीदकर उसे भारतीय रिफाइनरियों (Indian Refineries) की ओर मोड़ने का अनुरोध करने के बाद अब अमेरिका (America) की तरफ से भारत को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। अमेरिका ने बताया है कि आखिर उन्होंने भारत को यह रूसी तेल खरीदने की यह तथाकथित ‘छूट’ क्यों दी है। बुधवार को वाइट हाउस (White House) ने एक बयान में कहा है कि भारत को इसकी ‘इजाजत’ इसीलिए दी गई क्योंकि भारत के लोग अच्छे हैं। इस दौरान यह भी दावा किया गया कि भारत ने पूर्व में रूसी तेल ना खरीदने की उनकी शर्तों को माना है, इसीलिए अमेरिका ने भारत को यह विशेष ‘छूट’ दी।

    वाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि यह फैसला इसलिए किया गया क्योंकि भारत में हमारे साथी अच्छे लोग रहे हैं। लेविट ने कहा, “हम इस फैसले पर इसलिए पहुंचे क्योंकि भारत में हमारे साथी अच्छे साथी रहे हैं और उन्होंने पहले ही रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया था, जिस पर रोक लगी है। इसलिए, जब हम ईरानियों की वजह से दुनिया में तेल सप्लाई में इस अस्थायी कमी को पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं, तो हमने भारत को रूसी तेल लेने की इजाजत दी है।”


    अमेरिका ने की थी घोषणा

    उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका ने इस फैसले को इसलिए मंजूरी दी क्योंकि भारत आने वाला यह रूसी तेल पहले से ही समुद्र मार्ग में था और रूस को इससे कोई खास वित्तीय फायदा नहीं होगा।” बता दें कि इससे पहले अमरीका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पिछले सप्ताह घोषणा की थी पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति आसान बनाने के मकसद से भारत को उन पोत पर लदे रूसी तेल की खरीद की ‘अनुमति” दी गई है, जो पहले से समुद्री मार्गों पर हैं। इस फैसले को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने मंजूरी दी है।


    क्या बोले थे अमेरिकी वित्त मंत्री

    स्कॉट बेसेंट ने एक इंटरव्यू में भारत को अमेरिका का अच्छा साझेदार बताया था। उन्होंने कहा था, ”दुनिया में तेल की पर्याप्त आपूर्ति है। वित्त मंत्रालय ने भारत में हमारे सहयोगियों को उस रूसी तेल की खरीद शुरू करने की कल सहमति दे दी जो पहले से समुद्र में है। भारतीयों ने बहुत अच्छा सहयोग दिया है। हमने उनसे कहा था कि वे प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीद बंद कर दें। उन्होंने ऐसा किया। वे इसकी जगह अमेरिकी तेल लेने वाले थे लेकिन दुनिया भर में तेल की अस्थायी कमी को दूर करने के लिए हमने उन्हें रूसी तेल स्वीकार करने की अनुमति दे दी है। हम रूसी तेल के अन्य प्रकारों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।”


    अमेरिका ने लगाया था जुर्माना

    इससे पहले अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद कर यूक्रेन युद्ध की फंडिंग करने का आरोप लगाते हुए कई महीनों तक मोटा जुर्माना वसूला था। अमेरिका ने भारत पर पहले 25 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ के अलावा 25 फीसदी जुर्माना लगा दिया था, जिसके बाद अमेरिका भारत से आयातित उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ वसूल रहा था। हालांकि अमेरिका के साथ हुई हालिया ट्रेड डील और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद अब इस टैरिफ को हटा दिया गया है।


    भारत ने स्पष्ट किया है अपना रुख

    वहीं भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत ने कहा है कि ऊर्जा बाजार के उतार-चढ़ाव वाले माहौल में, नई दिल्ली अपनी 1.4 बिलियन की आबादी को प्राथमिकता देना जारी रखेगा।” बता दें कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है।

  • ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    ईरान से टकराव में रोज अरबों डॉलर खर्च कर रहा अमेरिका

    वॉशिंगटन। दुनिया में जब भी कोई युद्ध शुरू होता है तो आमतौर पर ध्यान बमबारी, मिसाइल हमलों और सैनिकों की तैनाती पर जाता है, लेकिन हर युद्ध की एक बड़ी कीमत भी होती है। अमेरिका और ईरान (Iran) के बीच जारी संघर्ष में अमेरिका का सैन्य खर्च तेजी से बढ़ रहा है। शुरुआती आकलन बताते हैं कि अमेरिका इस अभियान पर हर दिन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है।

    यह खर्च केवल हथियारों के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है। इसमें मिसाइल, लड़ाकू विमानों का संचालन, नौसैनिक बेड़े की तैनाती, रक्षा प्रणाली, सैन्य ठिकानों का संचालन और युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई भी शामिल है।

    रोज करीब 891 मिलियन डॉलर का खर्च
    वॉशिंगटन स्थित थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies के विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका इस संघर्ष में प्रति दिन करीब 891.4 मिलियन डॉलर खर्च कर रहा है। यह अनुमान सैन्य अभियान Operation Epic Fury के पहले 100 घंटों के खर्च के आधार पर लगाया गया है।

    इन शुरुआती घंटों में कुल खर्च करीब 3.7 अरब डॉलर रहा, जिससे रोजाना खर्च का औसत करीब 891 मिलियन डॉलर निकाला गया। कुछ अन्य विश्लेषणों के मुताबिक वास्तविक खर्च इससे भी ज्यादा हो सकता है और यह 1 अरब से बढ़कर 1.43 अरब डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।

    सबसे ज्यादा पैसा हथियारों पर
    इस युद्ध में सबसे बड़ा खर्च हथियारों और मिसाइलों पर हो रहा है। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.1 अरब डॉलर केवल इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई (म्यूनिशन रिप्लेसमेंट) पर खर्च किए गए हैं।

    इसके अलावा सैन्य ऑपरेशन चलाने में भी भारी खर्च आता है। इसमें युद्धपोत, लड़ाकू विमान, सैन्य ठिकाने और सैनिकों की तैनाती शामिल है। शुरुआती चरण में प्रत्यक्ष सैन्य संचालन पर लगभग 196 मिलियन डॉलर खर्च हुए, जबकि युद्ध में हुए नुकसान और सैन्य ढांचे की मरम्मत पर करीब 350 मिलियन डॉलर का अनुमान लगाया गया है।

    Pentagon के अधिकारियों के अनुसार, संघर्ष के पहले सप्ताह में ही कुल खर्च करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें लगभग 4 अरब डॉलर सिर्फ मिसाइल और उन्नत इंटरसेप्टर सिस्टम पर खर्च हुए।

    विमानवाहक पोत की तैनाती भी महंगी
    युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने विमानवाहक पोत और नौसैनिक बेड़े को भी क्षेत्र में तैनात किया है। अनुमान है कि दो विमानवाहक पोतों के संचालन पर ही रोज करीब 13 मिलियन डॉलर खर्च होते हैं। इसके अलावा हवाई हमले, मिसाइल रक्षा प्रणाली और सैनिकों की आवाजाही जैसे कई सैन्य अभियानों से खर्च लगातार बढ़ रहा है।

    युद्ध लंबा चला तो बढ़ेगी लागत
    विश्लेषकों का कहना है कि अभी संघर्ष शुरुआती चरण में है, इसलिए खर्च बहुत ज्यादा दिखाई दे रहा है। अगर युद्ध लंबे समय तक चला तो इसकी कुल लागत और तेजी से बढ़ सकती है।

    पिछले युद्धों ने भी खाली किया खजाना
    अमेरिका के पिछले युद्धों का इतिहास बताता है कि लंबे सैन्य अभियान बेहद महंगे साबित होते हैं।

    Iraq War पर अमेरिका ने करीब 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए।

    War in Afghanistan की लागत लगभग 2.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई।

    9/11 के बाद विभिन्न युद्ध अभियानों पर अमेरिका का कुल खर्च करीब 8 ट्रिलियन डॉलर तक आंका गया है, जिसमें सैनिकों की देखभाल, कर्ज पर ब्याज और अन्य दीर्घकालिक खर्च भी शामिल हैं।

    असली खतरा तेल आपूर्ति पर
    विशेषज्ञों के मुताबिक इस संकट का सबसे बड़ा आर्थिक खतरा केवल युद्ध नहीं बल्कि ऊर्जा आपूर्ति है। Strait of Hormuz दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल परिवहन का प्रमुख समुद्री मार्ग है। अगर यहां लंबे समय तक बाधा आती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ सकता है।

    अनुमान है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 120 से 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती हैं, तो अमेरिका में महंगाई 1 से 2 प्रतिशत अंक तक बढ़ सकती है।

    वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर
    तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केवल ईंधन ही महंगा नहीं होगा, बल्कि परिवहन लागत, औद्योगिक उत्पादन और वैश्विक बाजारों पर भी दबाव बढ़ेगा। साथ ही अमेरिकी सेना का ईंधन खर्च भी बढ़ जाएगा, जिससे युद्ध की कुल लागत और ज्यादा हो सकती है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में वैश्विक अर्थव्यवस्था को 100 अरब डॉलर से ज्यादा का झटका लग सकता है। फिलहाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था शुरुआती खर्च संभाल सकती है, लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो इसका आर्थिक बोझ काफी भारी पड़ सकता है।

  • युद्ध के बीच ईरान के तेल भंडार पर अमेरिका की नजर…. ट्रंप के बयान से हलचल

    युद्ध के बीच ईरान के तेल भंडार पर अमेरिका की नजर…. ट्रंप के बयान से हलचल


    तेहरान।
    युद्ध के बीच अमेरिका (America) अब ईरान के तेल पर भी कब्जे (Controls Iran oil ) के संकेत दे रहा है। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा है कि इसे लेकर बातचीत जरूर हुई थी। उन्होंने इस मुद्दे पर ज्यादा जानकारी नहीं दी। खास बात है कि ईरान पहले ही आरोप लगा चुका है कि अमेरिका दुनिया के तेल संसाधनों पर अवैध नियंत्रण हासिल करना चाहता है। जबकि, अमेरिका दावा करता है कि इजरायल के हित में वह युद्ध लड़ रहा है।

    राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मुद्दे पर खुलकर बात नहीं की थी कि अमेरिका ईरानी तेल पर कब्जा करना चाहता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर कुछ लोगों ने बात जरूर की है। इस दौरान उन्होंने वेनेजुएला का भी जिक्र किया।

    ट्रंप ने कहा, ‘आपने वेनेजुएला को देखा।’ उन्होंने कहा, ‘लोगों ने इसके बारे में सोचा है, लेकिन अभी इस पर बात करना जल्दबाजी होगी।’ खास बात है कि ट्रंप ने बीते महीने कहा था कि अमेरिका को अपने नए दोस्त से 80 मिलियन बैरल तेल मिला है।


    अमेरिकी की बड़ी साजिश, ईरान के आरोप

    ईरान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य ईरान तेल संसाधनों पर अवैध नियंत्रण हासिल करना है। अगर वे ईरान और वेनेजुएला दोनों के तेल पर नियंत्रण कर लेता है तो दुनिया के लगभग 31 प्रतिशत तेल संसाधनों पर उनका नियंत्रण हो जाएगा। अमेरिका ने खुले तौर पर स्वीकार किया है कि वह यह युद्ध इजरायल के हित में लड़ रहा। अमेरिका बेनकाब हो चुका है।


    तेल मोर्चे पर है अमेरिका की नजर

    व्हाइट हाउस ने सोमवार को कहा कि वर्तमान में तेल कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, वो कुछ समय की ही है। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने बयान में कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी पूरी ऊर्जा टीम ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू होने से काफी पहले ही ऊर्जा बाजारों को स्थिर रखने के लिए एक मजबूत योजना तैयार कर ली थी, और वे सभी विश्वसनीय विकल्पों की समीक्षा जारी रखेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि प्रशासन ऊर्जा बाजारों में स्थिरता बनाए रखने के लिए आगे भी आवश्यक कदम उठा सकता है।


    कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था

    ईरान युद्ध के तेज होने से पश्चिम एशिया में उत्पादन और पोत परिवहन पर मंडराते खतरे के बीच सोमवार को कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं थीं। हालांकि, बाद में कीमतों में कुछ नरमी देखी गई, लेकिन इस उथल-पुथल से दुनिया भर के शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय तेल मानक ब्रेंट क्रूड की कीमत सुबह उछलकर 119.50 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, लेकिन बाद में यह 101 डॉलर के करीब आ गई। इसी तरह, अमेरिकी बेंचमार्क वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) 119.48 डॉलर तक पहुंचने के बाद घटकर 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर आ गया।


    क्या थी वजह

    कीमतों में आई ताजा नरमी का कारण उन खबरों को माना जा रहा था जिनमें कहा गया था कि जी-7 देश रणनीतिक तेल भंडार से आपूर्ति जारी करने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, बाद में सोमवार को ही जी-7 समूह ने फिलहाल इन सुरक्षित भंडारों का उपयोग न करने का फैसला किया है। फ्रांस के वित्त मंत्री ने कहा कि समूह बाजार को स्थिर करने के लिए तैयार है, लेकिन फिलहाल हम भंडार से तेल निकालने की स्थिति तक नहीं पहुंचे हैं। इससे पहले शनिवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने भी सामरिक भंडार के इस्तेमाल की संभावना को कमतर बताया था।

  • ईरान-USA-इजराइल जंग: मजबूरी में लड़ रहा ईरान, नए सुप्रीम लीडर घायल, UAE ने मिसाइलों को नष्ट किया

    ईरान-USA-इजराइल जंग: मजबूरी में लड़ रहा ईरान, नए सुप्रीम लीडर घायल, UAE ने मिसाइलों को नष्ट किया


    नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल के साथ जारी ईरान संघर्ष आज 10वें दिन पहुंच गया है। ईरान ने साफ किया है कि यह जंग उनकी पसंद नहीं, बल्कि मजबूरी में लड़नी पड़ रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि इस जंग को देश पर जबरन थोप दिया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल मध्यस्थता या सीजफायर पर चर्चा करना संभव नहीं है, क्योंकि सैन्य टकराव जारी है और प्राथमिकता देश की सुरक्षा पर है।बघाई ने जोर देकर कहा कि ईरान ने जंग शुरू नहीं की थी, और किसी अन्य देश तुर्किये, साइप्रस और अजरबैजान पर हमला नहीं किया गया।

    नए सुप्रीम लीडर पर हमला
    ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल हमले में मौत हुई थी। 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज अली खामेनेई ने 1979 की इस्लामिक क्रांति में अहम भूमिका निभाई थी और 1981 में आठ साल के लिए राष्ट्रपति भी रहे।

    उनके उत्तराधिकारी, मुजतबा खामेनेई, बीती रात नए सुप्रीम लीडर घोषित हुए, लेकिन उन्हें हाल ही में इजराइली हमले में चोट लगी। ईरानी सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी ने कहा कि नए नेतृत्व से देश में उम्मीद और एकजुटता बढ़ी है, जबकि अमेरिका और इजराइल के लिए यह निराशाजनक संकेत है।

    UAE ने रोकी ईरान की मिसाइलें और ड्रोन
    संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने ईरान से दागी गई 12 बैलिस्टिक मिसाइलें और 17 ड्रोन हवा में ही नष्ट कर दिए। युद्ध शुरू होने के बाद UAE की तरफ कुल 253 मिसाइलें और 1,440 ड्रोन दागे जा चुके हैं।

    स्थिति तनावपूर्ण, लेकिन ईरान ने मजबूती दिखाई
    ईरानी अधिकारियों ने कहा कि देश की सुरक्षा मजबूत है और नए सुप्रीम लीडर के नेतृत्व में ईरान और भी एकजुट दिखाई देगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश की रक्षा के लिए मजबूरी में जंग लड़नी पड़ रही है, और किसी अन्य क्षेत्र पर आक्रामकता नहीं दिखाई जा रही।

  • अमेरिका-ईरान युद्ध का असर, कच्चे तेल की कीमतें $100 पार, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

    अमेरिका-ईरान युद्ध का असर, कच्चे तेल की कीमतें $100 पार, पेट्रोल-डीजल महंगे होने की आशंका

    नई दिल्ली। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भूचाल ला दिया है। सोमवार को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में ही कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गईं। इस उछाल ने ग्लोबल इकोनॉमी में चिंता बढ़ा दी है और आने वाले दिनों में आम आदमी की रसोई और ईंधन पर असर होने की संभावना जताई जा रही है।

    एक दिन में 17% की भारी तेजी

    सोमवार को अमेरिकी बेंचमार्क (WTI) क्रूड की कीमत $15.66 की वृद्धि के साथ $106.56 प्रति बैरल पर पहुंच गई। यानी एक ही दिन में लगभग 17.23% का उछाल देखा गया। वहीं, ब्रेंट क्रूड की कीमत $14.23 बढ़कर $106.92 प्रति बैरल हो गई। शुक्रवार तक तेल बाजार $90 के आसपास स्थिर था, लेकिन वीकेंड में बिगड़े हालात ने बाजार का समीकरण बदल दिया।

    10 दिन से जारी है अमेरिका-ईरान संघर्ष

    कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल पिछले 10 दिनों से अमेरिका और ईरान-इजरायल के बीच जारी संघर्ष की वजह से आया है। अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के सैन्य और ऊर्जा ठिकानों को निशाना बनाया गया, जिसमें प्रमुख ईंधन डिपो भी शामिल थे। इसके जवाब में ईरान ने भी आक्रामक हमले किए। खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी और इजरायली ठिकानों पर ईरान की कार्रवाई ने सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा दिया।

    ईरान की चेतावनी

    ईरान के संसदीय अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने चेतावनी दी है कि संघर्ष जारी रहा तो देश के तेल क्षेत्र पर विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है। उनका कहना है कि इस स्थिति में ईरान न तो तेल उत्पादन कर पाएगा और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचना संभव होगा। इस बयान से वैश्विक सप्लाई चेन में जोखिम बढ़ गया है।

    कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी की आशंका

    विशेषज्ञों की चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह वह संकरा समुद्री मार्ग है जिससे दुनिया के कुल कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान ने फिलहाल इसे बंद नहीं किया है, लेकिन चेतावनी दी है कि संघर्ष बढ़ा तो अमेरिका और इजरायल से जुड़े व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाया जा सकता है। यदि मार्ग अवरुद्ध होता है, तो तेल की कीमतों में और उछाल संभव है।

    अमेरिका की प्रतिक्रिया

    अमेरिका ने कहा है कि यह संकट लंबे समय तक नहीं रहेगा। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के अनुसार, मौजूदा उछाल केवल मार्केट का डर है और कुछ हफ्तों तक ही बने रहने की संभावना है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट ने भी कहा कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई भविष्य में तेल उद्योग के लिए फायदेमंद होगी।

    ट्रंप का बयान

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा कि संघर्ष के कारण तेल की कीमतें बढ़ी हैं, लेकिन इसे सुरक्षा की कीमत मानना चाहिए। उनका मानना है कि जैसे ही ईरान का परमाणु खतरा समाप्त होगा, तेल की कीमतें तेजी से नीचे आएंगी। इस उछाल के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की अस्थिरता बनी हुई है, और आने वाले हफ्तों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी असर देखने को मिल सकता है।

  • 10 नए बैटलशिप बना रहा अमेरिका, पुराने युद्धपोतों से 100 गुना ज्यादा ताकतवर होंगे: ट्रंप

    10 नए बैटलशिप बना रहा अमेरिका, पुराने युद्धपोतों से 100 गुना ज्यादा ताकतवर होंगे: ट्रंप

     वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने हाल ही में अमेरिकी सैन्य रणनीति और विदेश नीति को लेकर कई बड़े दावे किए हैं। उन्होंने कहा कि अमेरिका ऐसे 10 अत्याधुनिक बैटलशिप तैयार कर रहा है, जो पुराने युद्धपोतों की तुलना में करीब 100 गुना ज्यादा शक्तिशाली होंगे। ट्रंप के मुताबिक इन युद्धपोतों का मकसद दुश्मनों को सीधे टक्कर देने से पहले ही डर पैदा करना है, ताकि वे किसी तरह का जोखिम उठाने से बचें।

    ट्रंप ने बताया कि उन्होंने महंगे रॉकेट सिस्टम की जगह बड़े बैटलशिप्स के इस्तेमाल का सुझाव दिया था। उनके अनुसार 30 लाख डॉलर तक के महंगे रॉकेट दागने के बजाय बड़े गोले दागने वाले युद्धपोत अधिक प्रभावी साबित हो सकते हैं। उनका कहना है कि इन नए बैटलशिप्स की मौजूदगी ही दुश्मनों को चुनौती देने से रोकने के लिए काफी होगी।

    ‘शक्ति से शांति’ की नीति पर जोर
    डोनाल्‍ड ट्रंप ने खुद को शांतिवादी बताते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में कई बड़े संघर्षों को खत्म किया गया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने आठ युद्ध समाप्त करवाए और यूरोप की सुरक्षा के लिए भी लगातार प्रयास किए। ट्रंप का कहना था कि महासागरों से घिरे होने के कारण अमेरिका पर सीधे खतरे अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन फिर भी वैश्विक शांति बनाए रखने के लिए मजबूत सैन्य शक्ति जरूरी है।

    उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का भी जिक्र किया और कहा कि व्यापार और टैरिफ जैसे आर्थिक उपायों के जरिए संकट को कम करने में मदद मिली, जिससे संभावित बड़ा युद्ध टल गया।

    वेनेजुएला में ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’
    ट्रंप ने लैटिन अमेरिका की स्थिति पर बोलते हुए बताया कि जनवरी 2026 में अमेरिकी सेना ने ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत वेनेजुएला में एक विशेष कार्रवाई की। उनके मुताबिक इस ऑपरेशन में देश के तत्कालीन नेता Nicolás Maduro को पकड़ लिया गया।
    ट्रंप ने इस अभियान को “18 मिनट की शुद्ध सैन्य कार्रवाई” बताते हुए कहा कि इसके बाद वेनेजुएला में नई सरकार बनी है, जिसके साथ अमेरिका सहयोग कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस बदलाव के बाद देश में तेल उत्पादन बढ़ा है और अमेरिका के साथ सोने तथा अन्य खनिजों को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौता भी हुआ है।

    ईरान पर कार्रवाई का दावा
    राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को भी बड़ी सफलता बताया। उन्होंने दावा किया कि तीन दिनों के भीतर अमेरिकी सेना ने ईरान के 42 नौसैनिक जहाजों को नष्ट कर दिया। ट्रंप के अनुसार इस कार्रवाई में कुछ बड़े युद्धपोत भी शामिल थे, जिससे ईरान की नौसैनिक क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा।

    उन्होंने ‘मिडनाइट हैमर’ नामक बी-2 बमवर्षक हमले का भी जिक्र किया और कहा कि इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को बड़ा झटका लगा। ट्रंप के मुताबिक उस समय ईरान परमाणु हथियार बनाने से कुछ ही महीनों दूर था, लेकिन अमेरिकी कार्रवाई से इस खतरे को टाल दिया गया।

    आक्रामक लेकिन निर्णायक विदेश नीति

    ट्रंप ने अपने बयानों में बार-बार कहा कि उनकी नीति “शक्ति के जरिए शांति” बनाए रखने की है। उनके अनुसार मजबूत सैन्य तैयारी, आर्थिक दबाव और रणनीतिक कार्रवाई के जरिए दुनिया में स्थिरता कायम की जा सकती है।

    उन्होंने नए बैटलशिप्स के निर्माण, वेनेजुएला में कार्रवाई और ईरान के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन को अपनी विदेश नीति की प्रमुख उपलब्धियों के तौर पर पेश किया। ट्रंप का कहना है कि उनकी रणनीति का उद्देश्य युद्ध शुरू करना नहीं, बल्कि संभावित संघर्षों को रोकना है।

  • टेक्सास में 90 फीट ‘अभय हनुमान’ प्रतिमा पर विवाद: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस तेज

    टेक्सास में 90 फीट ‘अभय हनुमान’ प्रतिमा पर विवाद: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी की बहस तेज


    नई दिल्ली। अमेरिका के टेक्सास राज्य के शुगर लैंड शहर में स्थापित 90 फीट ऊंची अभय हनुमान प्रतिमा को लेकर विवाद गहरा गया है। पंचलोहा से निर्मित यह भव्य प्रतिमा उत्तर अमेरिका की सबसे ऊंची हनुमान प्रतिमाओं में से एक मानी जा रही है। अगस्त 2024 में विस्तृत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इसका लोकार्पण किया गया था। निजी भूमि पर स्थापित यह प्रतिमा स्थानीय हिंदू समुदाय के लिए आस्था शक्ति और शांति का प्रतीक बन चुकी है लेकिन हाल के दिनों में इसे लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई है।

    विवाद की शुरुआत तब हुई जब टेक्सास स्थित एक रिपब्लिकन कार्यकर्ता कार्लोस टुर्सियोस ने सोशल मीडिया पर प्रतिमा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी साझा की। पोस्ट में नस्लीय और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया और यह आरोप लगाया गया कि प्रवासी समुदाय अमेरिका में “धीरे-धीरे कब्जा” कर रहा है। उनके कुछ समर्थकों ने भी आपत्तिजनक और आप्रवासी-विरोधी नारे लगाए जिससे मामला और तूल पकड़ गया।

    इस बयान के बाद भारतीय-अमेरिकी समुदाय और कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि प्रतिमा निजी संपत्ति पर स्थापित है और अमेरिकी संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आती है। समुदाय के प्रतिनिधियों का तर्क है कि किसी भी धार्मिक प्रतीक को नस्लीय या सांस्कृतिक आधार पर निशाना बनाना न केवल असंवेदनशील है बल्कि असंवैधानिक भावना को भी बढ़ावा देता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका की बहुसांस्कृतिक पहचान में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान मूलभूत सिद्धांत है।

    यह पहली बार नहीं है जब इस मंदिर परिसर की प्रतिमा विवाद में आई हो। इससे पहले भी कुछ समूहों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया था। उस समय भी स्थानीय प्रशासन और सामुदायिक नेताओं ने संयम और संवाद की अपील की थी। हालांकि इस बार सोशल मीडिया की तीव्रता ने विवाद को राष्ट्रीय बहस का रूप दे दिया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा केवल एक प्रतिमा तक सीमित नहीं है बल्कि अमेरिका में धार्मिक विविधता आप्रवासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे व्यापक विषयों से जुड़ा हुआ है। एक पक्ष इसे धार्मिक और नस्लीय असहिष्णुता का उदाहरण मान रहा है तो दूसरा पक्ष इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में देख रहा है। संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है लेकिन यह अधिकार घृणा या हिंसा को बढ़ावा देने का औचित्य नहीं बन सकता।

    फिलहाल शुगर लैंड की अभय हनुमान प्रतिमा आस्था के साथ-साथ सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है। यह विवाद इस बात की याद दिलाता है कि बहुसांस्कृतिक समाजों में संवाद संवेदनशीलता और पारस्परिक सम्मान कितने आवश्यक हैं। अमेरिका जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक प्रतीकों को लेकर उठने वाले प्रश्न केवल स्थानीय नहीं रहते बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर पहचान अधिकार और सहअस्तित्व की बहस को जन्म देते हैं।

  • ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना

    ईरान छोड़ ट्रंप का नया टारगेट, अब इस देश पर अमेरिका का निशाना


    वाशिंगटन । इस समय पूरी दुनिया की नजरें मिडिल ईस्ट पर टिकी हुई हैं। ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शनों और तेहरान पर संभावित हमले की अटकलों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना फोकस बदल दिया है। अब उनकी नजरें सात समंदर पार नहीं, बल्कि पड़ोसी देश मैक्सिको पर हैं, जहां ड्रग कार्टेलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात हो रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मैक्सिको पर दबाव डाल रहा है कि वह अमेरिकी सेना को अपनी सीमा में प्रवेश की अनुमति दे।

    दरअसल, अमेरिका मैक्सिको में मादक पदार्थों (खासकर फेंटानिल) के खिलाफ चलाए जा रहे अभियानों में अपनी सेना को शामिल करने की मांग कर रहा है। दूसरी तरफ मैक्सिको की सरकार विदेशी सैन्य हस्तक्षेप को सिरे से नकार रही है। अमेरिकी अधिकारी विशेष अभियान दलों के सैनिकों या सीआईए अधिकारियों को मैक्सिकन सैनिकों के साथ मिलकर ऑपरेशन चलाने की मंजूरी मांग रहे हैं।

    न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त राज्य अमेरिका मैक्सिको की धरती पर फेंटानिल की प्रयोगशालाओं को नष्ट करने के मकसद से चलाए जा रहे अभियानों में अमेरिकी सैन्य बलों की भागीदारी के लिए मैक्सिको से मंजूरी हासिल करने के प्रयास तेज कर रहा है। अमेरिकी अधिकारी चाहते हैं कि संदिग्ध फेंटानिल उत्पादन स्थलों पर छापेमारी के दौरान मैक्सिकन सैनिकों के साथ विशेष अभियान दल के सैनिक या सीआईए अधिकारी शामिल हों। यह अनुरोध दोनों देशों के बीच फेंटानिल संकट को लेकर हुई उच्च-स्तरीय सुरक्षा वार्ताओं के बाद आया है।

    बता दें कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ट्रंप ने मैक्सिको को चेतावनी दी थी कि वह अगला निशाना बन सकता है। उन्होंने कहा था कि अब हम ड्रग तस्करों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने जा रहे हैं। मैक्सिको पर ड्रग तस्करों का कब्जा है। उस देश की हालत देखना बेहद दुखद है, लेकिन ड्रग तस्करों का ही राज है और वे हर साल हमारे देश में 2.5 लाख से 3 लाख लोगों की जान ले रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया था कि अमेरिका इन ड्रग कार्टेलों से निपटने के लिए मैक्सिको में जमीनी ठिकानों पर हमला कर सकता है।

    इन धमकियों के बावजूद मैक्सिकन राष्ट्रपति क्लाउडिया शीनबाम ने अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के विचार को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने ट्रंप के साथ सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी को लेकर हुई ‘अच्छी बातचीत’ के बाद अपना विरोध दोहराया है। शीनबाम ने पहले भी ट्रंप की ओर से सैन्य कार्रवाई के प्रस्तावों को ठुकरा दिया था और मैक्सिकन ड्रग कार्टेलों के खिलाफ प्रयासों में विदेशी सैन्य भागीदारी से लगातार इनकार किया है।

  • पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध

    पिछले 6 माह में बिगड़े भारत से रिश्ते… अमेरिकी ही कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप की नीति का विरोध


    वाशिंगटन।
    भारत (India) और अमेरिका (America) के रिश्ते पिछले 6 महीनों से लगातार खराब स्थिति में हैं। ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के बाद भारत ने खुले तौर पर अमेरिकी बयानों का विरोध किया, जिसके परिणाम स्वरूप ट्रंप प्रशासन (Trump Administration) ने पाकिस्तान (Pakistan) के साथ अपनी नजदीकी बढ़ाते हुए भारत पर आर्थिक हमला करने की कोशिश की। राष्ट्रपति ट्रंप की इस नीति का अमेरिका में ही कई लोगों ने विरोध किया, यहां तक कि उनके सहयोगियों ने भी भारत को लेकर अपनाई जा रही इस नीति का विरोध ही किया। अब अमेरिकी वैश्विक मामलों के जानकार, लेखक और प्रोफेसर फ्रांसिस फुकुयामा ने ट्रंप की इस नीति को लेकर उन पर हमला बोला है। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने अपने निजी व्यवहार के लिए अमेरिका के हितों को दरकिनार कर दिया।

    एक इंटरव्यू के दौरान ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति पर बात करते हुए प्रोफेसर ने कहा कि उनकी वैश्विक नीति क्या है इस पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा, “ट्रंप की वैश्विक नीति निजी लाभ पर आधारित है। उदाहरण के लिए पिछले 20 से 30 वर्षों में अमेरिका में किसी की भी सरकार रही हो, वह भारत के साथ बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करती रही है। क्योंकि हम दक्षिण एशिया में चीन को काउंटर करना चाहते हैं। लेकिन ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को केवल इसलिए खराब कर दिया क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन नहीं किया था।”

    प्रोफेसर ने कहा, “ट्रंप के इस फैसले से आप पूरी तरह से समझ सकते हैं कि कैसे उन्होंने अपने निजी लाभ के लिए अमेरिकी हितों को अलग रख दिया। ऐसे में अगर कोई यह सोच रहा है कि ट्रंप प्रशासन की कोई वैश्विक नीति होगी, तो वह परेशान ही होगा।”

    आपको बता दें, इस साल जनवरी में जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सत्ता में आए थे, तो भारत में लोगों की राय यह थी कि भारत और अमेरिका के रिश्ते सही होंगे। ट्रंप और पीएम मोदी की निजी दोस्ती दोनों देशों के बीच में मजबूत साझेदारी का आधार बनेगी। शुरुआती समय में ऐसा दिखा भी। लेकिन मई के महीने में सबकुछ बदल गया।

    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की तरफ से किए गए ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप टीम का बयान दोस्ती वाला नहीं था। भारत सरकार के ऐलान करने से पहले ही ट्रंप ने सोशल मीडिया के जरिए सीजफायर का ऐलान कर दिया। यह भारत सरकार के लिए असहज करने वाली स्थिति थी। इसके बाद ट्रंप लगातार इस बात को कहते रहे कि भारत और पाकिस्तान के बीच उन्होंने सीजफायर करवाया है, जबकि भारत ने शुरुआत से ही इस बात को कहा कि सीजफायर के लिए पाकिस्तानी डीजीएमओ की तरफ से फोन आया था इसके बाद यह हुआ।

    दोनों देशों के बीच बिगड़ती इस परिस्थिति का पाकिस्तान ने बड़ी अच्छी तरह से फायदा उठाया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुले तौर पर इस सीजफायर के लिए ट्रंप को धन्यवाद किया और लगे हाथ उन्हें नोबेल पीस प्राइज के लिए समर्थन भी दे दिया। इस पूरे वाकये के बाद भारत और अमेरिका के संबंध लगातार गिरावट की तरफ जाने लगे। अमेरिका ने भारत के ऊपर 50 फीसदी टैरिफ लगा दिया। ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार भारत के खिलाफ बयानबाजी की जाने लगी। भारत ने भी अपनी स्थिति को साफ किया और ट्रंप या अमेरिका के आगे किसी भी तरीके से झुकने से इनकार कर दिया।

    दरअसल, कश्मीर और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय स्थिति पर भारत की स्थिति दशकों से साफ रही है कि भारत इसमें किसी भी तीसरे देश का दखल नहीं चाहता है। शिमला समझौते के तहत पाकिस्तान भी इस पर राजी है, लेकिन पाकिस्तान हमेशा से ही इस मुद्दे में तीसरे देश को शामिल करने के लिए तैयार रहता है। ऐसे में अगर पीएम मोदी नोबेल के लिए ट्रंप को समर्थन देते तो यह भारत की साख के लिए सही नहीं होता और न ही भारत के स्टैंड के मुताबिक होता।

  • अफगानिस्तान मुद्दे पर पूछे गए सवाल पर गुस्‍साए डोनाल्‍ड ट्रंप, पत्रकार से कहा- ‘क्या तुम बेवकूफ हो?’

    अफगानिस्तान मुद्दे पर पूछे गए सवाल पर गुस्‍साए डोनाल्‍ड ट्रंप, पत्रकार से कहा- ‘क्या तुम बेवकूफ हो?’


    नई दिल्‍ली । वाइट हाउस के सामने हुई गोलीबारी को लेकर मीडिया से बात कर रहे राष्ट्रपति ट्रंप एक सवाल पर अपना आपा खो बैठे। एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस घटना के लिए अपने पूर्ववर्ती जो बाइडन प्रशासन को दोष क्यों दिया? इस सवाल को सुनते ही ट्रंप भड़क गए और गुस्से में पत्रकार की तरफ देखते हुए बोले, ‘क्या तुम बेवकूफ हो?’

    गौरतलब है कि कल हुई इस घटना के बाद से ही ट्रंप लगातार बाइडन प्रशासन पर इसका दोष दे रहे हैं। क्योंकि आरोपी रहमानुल्लाह बाइडन प्रशासन के दौरान ही अफगानिस्तान से अमेरिका आया था। आरोपी रहमानुल्लाह बाइडन के ऑपरेशन अलाइज वेलकम अभियान के दौरान अमेरिका आया था।

    ट्रंप ने रिपोर्टर पर अपनी भड़ास निकालते हुए कहा, “दोष दे रहा हूं क्योंकि वे (बाइडन) हजारों ऐसे लोगों को अमेरिका लेकर आए थे, जिन्हें यहां होना ही नहीं चाहिए था। तुम ऐसे सवाल पूछ रहे हो क्योंकि तुम बेवकूफ इंसान हो।” राष्ट्रपति ने कहा कि बाइडन प्रशासन ने एक कानून पारित किया है, जिसकी वजह से हम इन लोगों को वापस नहीं भेज सकते। उन्होंने पूरे हालात को गड़बड़ करार देते हुए कहा कि अफगानिस्तान का मामला एक गंदगी था। इन (प्रवासियों को) शुरू से ही यहां नहीं होना चाहिए था।

    इसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने दोनों नेशनल गार्ड्स की सेहत का अपडेट देते हुए बताया कि इसमें घायल एक जवान सैनिक सारा बेकस्ट्राम की मौत हो चुकी है।

    ट्रंप और उनकी टीम की तरफ से लगातार लगाए जा रहे आरोपों के बीच बाइडन समर्थकों ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है। बाइडन प्रशासन के समर्थकों का कहना है कि इस कार्यक्रम के तहत जिन लोगों को लाया गया था, उन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मदद की थी। इस कार्यक्रम को व्यापक सुरक्षा जांच के बाद ही पूरा किया गया था। अफगानिस्तान में तालिबान के वापस आने के बाद इन लोगों के जीवन के लिए यह कार्यक्रम जरूरी था।

    गौरतलब है कि बाइडन प्रशासन की इस पहल के तहत करीब 76 हजार अफगान नागरिकों को अमेरिका लाया गया था। इनमें से कई अमेरिकी सैनिक और राजनयिकों के साथ दुभाषिए और अनुवादक के रूप में काम करते थे।