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  • जांच खत्म करे अमेरिका…. भारत ने अतिरिक्त उत्पादन के आरोपों को किया खारिज

    जांच खत्म करे अमेरिका…. भारत ने अतिरिक्त उत्पादन के आरोपों को किया खारिज


    नई दिल्ली।
    भारत (India) ने अमेरिका (America) के व्यापार प्रतिनिधित (यूएसटीआर-USTR) की ओर से लगाए गए आरोपों को सख्ती के साथ खारिज किया। उन्होंने भारत समेत कई देशों पर अतिरिक्त उत्पादन (Excess Production) और औद्योगिक असंतुलन (Industrial Imbalance) का आरोप लगाया था। भारत ने कहा कि जांच शुरू करने वाले नोटिस में इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस कारण नहीं दिया गया है।

    भारत ने अमेरिका से अनुरोध किया है कि वह यह निष्कर्ष निकाले कि भारत ने कोई नकारात्मक काम नहीं किया है और उसके खिलाफ जो जांच चल रही है, उसे समाप्त कर दे। यह बात भारत सरकार ने अपने जवाब में यूएसटीआर को बताई।

    11 मार्च को अमेरिका ने अपने व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ जांच शुरू करने की घोषणा की। इनमें भारत, चीन, जापान और यूरोपीय संघ शामिल हैं। इस जांच का उद्देश्य उन ‘अनुचित विदेशी नीतियों या तरीकों’ को देखना और उन पर कार्रवाई करना है, जिनसे अमेरिकी विनिर्माण उद्योग को नुकसान होता है।

    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर ने जांच शुरू करने की घोषणा की। यह जांच 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301(बी) के तहत की गई है। इस जांच में अलग-अलग देशों की ‘नीतियों, कार्यों और तरीकों’ की जांच की जाएगी। खास तौर पर यह देखा जाएगा कि क्या उन देशों में उद्योगों में जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता है और विनिर्माण क्षेत्र में असंतुलन है।


    जांच के दायर में कौन-कौन देश?

    इस जांच के दायरे में आने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं- बांग्लादेश, कंबोडिया, चीन, यूरोपीय संघ, भारत, इंडोनेशिया, जापान, कोरिया, मलयेशिया, मेक्सिको, नॉर्वे, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, ताइवान, थाईलैंड और वियतनाम।


    अमेरिकी जांच पर भारत ने क्या कहा?

    अमेरिका के जांच नोटिस के जवाब में भारत सरकार ने कहा कि वह इस नोटिस में लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह और सख्ती से खारिज करती है। भारत ने कहा कि यह जांच नोटिस सिर्फ बड़े आर्थिक आंकड़ों पर आधारित है। इसमें भारत सरकार की किसी खास नीति या काम का नाम नहीं बताया गया है, जिसे गलत या भेदभावपूर्ण कहा जा सके या जो अमेरिका के व्यापार को नुकसान पहुंचाता हो, जैसा कि कानून की धारा 301(b) में जरूरी है।

    भारत ने कहा है कि नोटिस में इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस कारण या शुरुआती सबूत नहीं दिए गए हैं। यह दावा कि भारत के बड़े उद्योगों में ‘जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता’ है और इससे अमेरिका के साथ व्यापार में अधिक लाभ (ट्रेड सरप्लस) होता है, उसके समर्थन में कोई प्रमाण नहीं दिया गया है।

    भारत ने कहा कि यह जांच 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 और 302 के नियमों के अनुसार सही तरीके से शुरू नहीं की गई है। इसलिए भारत ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि से अनुरोध किया है कि वह भारत के पक्ष में फैसला दे, जांच को खत्म करे और इसे तुरंत बंद कर दे।

    भारत ने आगे कहा है कि चूंकि भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत शुरू हो चुकी है, इसलिए किसी भी व्यापारिक चिंता को इसी बातचीत के जरिए हल किया जाना चाहिए। भारत ने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दों का समाधान एकतरफा कदमों से नहीं, बल्कि आपसी बातचीत के ढांचे के भीतर होना चाहिए।

  • भारत अब रूस से नहीं खरीद पाएगा सस्ता तेल…. अमेरिका ने फिर लगाई पाबंदी

    भारत अब रूस से नहीं खरीद पाएगा सस्ता तेल…. अमेरिका ने फिर लगाई पाबंदी


    वाशिंगटन।
    ईरान युद्ध (Iran War) के बाद गहराए ईंधन संकट के बीच अमेरिका (America) ने रूसी तेल (Russian oil) खरीद पर लगाई पाबंदी में ढील दी थी। इसकी मियाद 11 अप्रैल को पूरी हो गई। इस दौरान भारत ने अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद देश रूस से जमकर कच्चे तेल (Crude oil) की खरीद की। अब अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ताजा फैसले ने भारत समेत कई एशियाई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने बुधवार को घोषणा की कि अमेरिका रूसी और ईरानी तेल खरीद के लिए दी गई प्रतिबंधों की छूट की समय सीमा को नहीं बढ़ाएगा।

    अमेरिका का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया के तेल बाजार में भारी अस्थिरता है। भारत जैसे देशों ने अपनी आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए इन छूटों का भरपूर लाभ उठाया था।

    क्या है पूरा मामला?
    फरवरी के अंत में अमेरिका-ईरान युद्ध छिड़ने के बाद कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थीं। दुनिया के तेल बाजार को स्थिर करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने एक अस्थायी नीति अपनाई थी। इसके तहत 12 मार्च को भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी गई थी। यह केवल उस तेल के लिए थी जो 11 मार्च से पहले जहाजों पर लद चुका था। इसी तरह ईरान के लिए भी 30 दिनों का लाइसेंस दिया गया था। रूस के लिए दी गई छूट 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई है, जबकि ईरान के लिए यह छूट 19 अप्रैल को समाप्त होने जा रही है।


    भारत के लिए बड़ा झटका

    भारत इस छूट का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण रिलायंस जैसी भारतीय रिफाइनरियों ने पहले रोसनेफ्ट और लुकोइल जैसे रूसी आपूर्तिकर्ताओं से किनारा कर लिया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, छूट मिलने के बाद भारत ने रूस से लगभग 3 करोड़ बैरल तेल के ऑर्डर दिए थे। भारत समेत कई एशियाई देशों ने अमेरिका से इन छूटों को आगे बढ़ाने की अपील की थी, जिसे अब अमेरिकी ट्रेजरी ने ठुकरा दिया है।

    ट्रंप के फैसले की खूब हुई आलोचना
    ट्रंप प्रशासन के इस रुख की अमेरिका के भीतर खासकर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा कड़ी आलोचना की जा रही थी। सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटल और अल्पसंख्यक नेता चक शूमर जैसे नेताओं ने आरोप लगाया कि इस छूट से रूस को यूक्रेन के खिलाफ अपनी युद्ध मशीनरी के लिए भारी पैसा मिल रहा है।

    डेमोक्रेट्स का कहना है कि एक तरफ रूस यूक्रेन में बच्चों की हत्या कर रहा है, तो दूसरी तरफ वह ईरान को अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने के लिए खुफिया जानकारी दे रहा है। ऐसे में उन्हें आर्थिक राहत देना खतरनाक है। ट्रेजरी सचिव बेसेंट ने स्पष्ट किया कि अब कोई नया लाइसेंस जारी नहीं किया जाएगा क्योंकि समुद्र में जो तेल 11 मार्च से पहले था, वह इस्तेमाल किया जा चुका है।


    अब आगे क्या?

    रूस और ईरान से तेल की आयात बंद होने से भारत को अब खाड़ी के अन्य देशों या अमेरिकी घरेलू बाजार पर निर्भरता बढ़ानी होगी, जो महंगा पड़ सकता है। आपूर्ति कम होने से घरेलू स्तर पर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ेगा। भारत को अब रूस के साथ व्यापार करने के लिए वैकल्पिक पेमेंट गेटवे जैसे रुपया-रुबल पर गंभीरता से विचार करना होगा, जो अमेरिकी प्रतिबंधों की जद में न आए।

  • ईरान-अमेरिका तनाव का असर: सोना-चांदी की कीमतों में लगातार दूसरे दिन तेजी

    ईरान-अमेरिका तनाव का असर: सोना-चांदी की कीमतों में लगातार दूसरे दिन तेजी


    नई दिल्ली।
     सोने और चांदी की कीमतों में आज लगातार दूसरे दिन तेजी देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बातचीत की संभावनाओं की वजह से आज इंटरनेशनल मार्केट गोल्ड और सिल्वर का रेट फिर से बढ़ा हुआ है। मौजूदा परिस्थितियों की वजह से दुनिया भर में एनर्जी संकट गहरा गया है। बता दें, पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच एक दौर की बातचीत हो गई है। लेकिन यह पूरी वार्ता विफल रही थी। दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता तब नहीं हो पाया था।

    क्या है गोल्ड का ताजा रेट (Gold Latest Price)
    COMEX gold की कीमतों में आज शुरुआती कारोबार के दौरान बढ़ोतरी देखने को मिली। जिसके बाद यह 4855 डॉलर प्रति आउंस के स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले के सत्र में सोने का भाव 2 प्रतिशत से अधिक बढ़ा था। COMEX Silver के रेट भी आज बुधवार को बढ़ोतरी देखने को मिली है। चांदी की कीमतों में उछाल के बाद यह 79 डॉलर प्रति आउंस के स्तर पर पहुंच गई थी।

  • ब्लूमबर्ग के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत आने वाले दिनों में हो सकती है। न्यूयार्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगले दो दिनों में बातचीत शुरू होने के संकेत दिए हैं। इन खबरों की वजह से मंगलवार को अमेरिकी शेयर बाजार में तेजी दर्ज की गई। वहीं, डॉलर इंडेक्स 0.3 प्रतिशत लुढ़क चुका है। बता दें, जब से युद्ध शुरू हुआ है तब से मेटल की कीमतों में 8 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है।

    कहां तक जाएगा सोने और चांदी का रेट (Gold Silver Price Outlook)
    Augmon से जुड़ी रेनिशा कहती हैं कि सोने और चांदी इस समय भी बुल रन पर सवार हैं। हालांकि, आगे का रास्ता काफी अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। रेनिशा का कहना है टेक्निकल स्तर पर, “गोल्ड 4800 से 4850 डॉलर (154000 रुपये से 155000 रुपये तक) के आस-पास रेसिस्टेंस दिखा रहा है। अगर कीमतें इसके ऊपर गई तो यह फिर 5000 डॉलर (160000 रुपये) के स्तर तक जा सकती हैं।”

    चांदी के विषय में एक्सपर्ट की राय है कि यह 77 डॉलर (246000 रुपये) के स्तर पर रेसिस्टेंस दिखा रहा है। इसके ऊपर जाने की स्थिति में चांदी का दाम 82 डॉलर से 87 डॉलर (255000 रुपये से 265000 रुपये) के स्तर तक पहुंच सकता है।”

  • सीजफायर, ईरान-इजरायल-अमेरिका की तनातनी से फिर भड़क सकता है मिडिल ईस्ट

    सीजफायर, ईरान-इजरायल-अमेरिका की तनातनी से फिर भड़क सकता है मिडिल ईस्ट


    तेहरान।
     करीब 40 दिनों से जारी भीषण संघर्ष के बाद जब अमेरिका और ईरान के बीच सीजफायर का ऐलान हुआ, तो क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगी थी। लेकिन महज 24 घंटे के भीतर ही हालात बदलते नजर आ रहे हैं। तीनों प्रमुख पक्ष—ईरान, इजरायल और अमेरिका—के बयान अलग-अलग दिशा में जाते दिख रहे हैं, जिससे सीजफायर पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।

    अमेरिका ने खारिज किया ईरान का प्रस्ताव
    कूटनीतिक मोर्चे पर सबसे बड़ा विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिका ने ईरान के 10 सूत्रीय शांति प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। अमेरिकी प्रशासन ने तीखे शब्दों में कहा कि प्रस्ताव को “कूड़े के डिब्बे में डाल दिया गया।” इससे संकेत मिला कि वॉशिंगटन ईरान की शर्तों पर आगे बढ़ने को तैयार नहीं है और वह इजरायल के रुख का समर्थन कर रहा है।


    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया कि सीजफायर समझौते में लेबनान से जुड़े हमलों को शामिल नहीं किया गया है, इसलिए उस मोर्चे पर कार्रवाई जारी रह सकती है।

    लेबनान पर इजरायल के हमले तेज
    सीजफायर के तुरंत बाद इजरायल ने समझौते की तकनीकी खामी का हवाला देते हुए कहा कि लेबनान में उसके सैन्य अभियान जारी रहेंगे। इसके बाद इजरायली हमलों में तेजी देखी गई, जिनमें 100 से अधिक लोगों के मारे जाने की खबर है।
    इजरायल का कहना है कि वह हिजबुल्लाह के ठिकानों को निशाना बनाता रहेगा और यह कार्रवाई सीजफायर का उल्लंघन नहीं मानी जाएगी।

    ईरान की चेतावनी—हमले हुए तो खत्म समझौता
    इजरायल के रुख पर ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। तेहरान ने कहा कि अगर लेबनान पर हमले जारी रहे तो सीजफायर स्वतः समाप्त माना जाएगा। ईरान ने अमेरिका और इजरायल को चेतावनी देते हुए कहा कि “गेंद अब आपके पाले में है”, यानी जवाबी कार्रवाई की संभावना बनी हुई है।

    क्या हो सकता है असर?

    अगर सीजफायर पूरी तरह टूटता है तो इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट पर पड़ सकता है। हिजबुल्लाह के सीधे युद्ध में उतरने से संघर्ष कई मोर्चों पर फैल सकता है और ईरान की प्रत्यक्ष भागीदारी का खतरा बढ़ जाएगा।
    विशेषज्ञों का मानना है कि हालात बिगड़ने पर होर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे वैश्विक स्तर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।

    महज 24 घंटे में समझौते का डगमगाना यह दिखाता है कि पक्षों के बीच अविश्वास कितना गहरा है और शांति की राह अभी भी बेहद कठिन बनी हुई है।

  • इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

    इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

    नई दिल्ली! ईरान जंग के बीच इटली ने अमेरिका को बड़ा झटका दिया है. मध्य पूर्व की ओर जा रहे एक विमान को इटली की सरकार ने सिसली में उतरने नहीं दिया है. यह खबर स्थानीय अखबार कोरिएरे डेला सेरा ने दी है. रिपोर्ट के मुताबिक इटली की सरकार ने ईरान जंग से खुद को दूर रखने के लिए यह कदम उठाया है. यह पहली बार है, जब जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कोई फैसला लिया है.
    रिपोर्ट के मुताबिक सिसली में अमेरिकी विमानों को लैंडिंग की अनुमति न मिलने से इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि सिसिली मध्य पूर्व में मिशनों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

    स्पेन के बाद इटली का एक्शन
    एक दिन पहले स्पेन ने अमेरिकी विमानों के लिए अपने एयर स्पेस को बंद कर दिया था. अब इटली ने लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है. हालांकि, इटली का मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि इटली नाटो मेंबर है. यूरोप में इटली की अहम दखलअंदाजी है. साथ ही वहां की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का काफी करीबी माना जाता है.

    मेलोनी एकमात्र यूरोप की प्रमुख नेत्री थीं, जिन्हें ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण के दौरान व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया था. कई मौकों पर मेलोनी ने ट्रंप के लिए कवच का काम किया है. ऐसे में अब ईरान जंग के दौरान इटली के इस रूख से अमेरिका को बड़ा झटका लगा है.

    इटली ने यह फैसला क्यों लिया है?
    आधिकारिक तौर पर इटली ने इस पर कोई भी बयान नहीं दिया है, लेकिन इस फैसले को हाल ही में इटली में कराए गए जनमत संग्रह से जोड़ा जा रहा है. इटली में जनमत संग्रह में मेलोनी की पार्टी को जबरदस्त हार मिली थी. इस हार की एक वजह ईरान जंग को भी बताया गया.

    जनमत संग्रह को लेकर कराए गए कई सर्वे में यह खुलासा हुआ कि ट्रंप से मेलोनी की दोस्ती की वजह से अधिकांश इटली के लोग नाराज हैं. उन्हें ईरान जंग से आर्थिक परेशानियों का डर सता रहा है. इटली में अगले साल आम चुनाव प्रस्तावित है, जिसमें मेलोनी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के लिए मैदान में उतरेंगी.

  • सीक्रेट’ ईरानी नेता से कर रहे बातचीत? अमेरिका की नजर इस बड़े नाम पर

    सीक्रेट’ ईरानी नेता से कर रहे बातचीत? अमेरिका की नजर इस बड़े नाम पर

    वाशिंगटन। अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप (Donald Trump) ने ईरान पर संभावित हमलों को पांच दिन के लिए टालते हुए बड़ा संकेत दिया है कि अमेरिका पर्दे के पीछे बातचीत की कोशिश कर रहा है। ट्रंप ने कहा कि वार्ता किसी “शीर्ष और सम्मानित” ईरानी नेता से हो रही है, लेकिन उन्होंने नाम उजागर नहीं किया। इस बयान के बाद यह अटकलें तेज हो गईं कि आखिर वह नेता कौन है जिससे अमेरिका संपर्क में है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी रणनीतिक हलकों में Mohammad Bagher Ghalibaf का नाम चर्चा में है। माना जा रहा है कि वॉशिंगटन उन्हें संभावित साझेदार के रूप में देख रहा है, जो भविष्य में ईरान की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कुछ सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी अधिकारी उन्हें ऐसे व्यक्ति के तौर पर देख रहे हैं जो संघर्ष के अगले चरण को आकार देने में मदद कर सकते हैं और संवाद की राह खोल सकते हैं।

    ट्रंप के बयान से बढ़ा सस्पेंस
    ट्रंप ने Palm Beach International Airport पर पत्रकारों से बातचीत में यह भी स्पष्ट किया कि अमेरिका किसी “दूसरे सर्वोच्च नेता” से बात नहीं कर रहा। इसे Mojtaba Khamenei की ओर इशारा माना गया, जो Ali Khamenei के बेटे हैं। ट्रंप ने कहा, “हम एक ऐसे व्यक्ति से बात कर रहे हैं जो बहुत सम्मानित हैं।” उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरानी नेतृत्व की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

    अमेरिका की रणनीति क्या?
    Politico की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन के अधिकारी यह परख रहे हैं कि क्या कालीबफ भविष्य के संभावित पार्टनर बन सकते हैं। अमेरिकी रणनीति सिर्फ सैन्य दबाव तक सीमित न रहकर राजनीतिक संवाद के जरिए लाभ हासिल करने की बताई जा रही है। हालांकि प्रशासन अभी कई विकल्पों पर विचार कर रहा है और कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।

    विशेषज्ञों की राय
    International Crisis Group के विश्लेषक Ali Vaez का कहना है कि कालीबफ ईरान के सत्ता ढांचे से गहराई से जुड़े हैं और उनसे बड़ी रियायत मिलने की संभावना कम है। उनका मानना है कि वे मौजूदा इस्लामी व्यवस्था को बनाए रखने के पक्षधर हैं।

    कालीबफ ने किया इनकार
    इस बीच कालीबफ ने अमेरिका से किसी भी बातचीत से इनकार किया है। उन्होंने X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिका के साथ कोई वार्ता नहीं हुई है और यह “फेक न्यूज” है। साथ ही ईरान की ओर से भी अमेरिका के साथ बातचीत की खबरों को खारिज कर दिया गया है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने संकेत दिया है कि सैन्य तनाव के बीच पर्दे के पीछे कूटनीतिक हलचल तेज है, लेकिन बातचीत को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

  • मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

    मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

    तेहरान। ईरान ने मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध समाप्त करने के लिए नए कानूनी और रणनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में छह शर्तें रखी हैं। यह युद्ध रविवार को अपने 23वें दिन में प्रवेश कर गया। ईरान की ओर से रखी गयी शर्तें हैं- होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार करना, युद्ध की पुनरावृत्ति रोकने की गारंटी, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करना, ईरान के इस्लामी गणराज्य को हर्जाने का भुगतान करना, सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर युद्धों को समाप्त करना और ईरान के प्रति शत्रुता रखने वाले मीडिया जगत के लोगों पर मुकदमा चलाना और उनका प्रत्यर्पण करना।

    ईरान के ये प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के एक दिन बाद आये हैं, जिसमें उन्होंने शनिवार को कहा था कि अमेरिका पश्चिम एशिया में सैन्य प्रयासों को ‘समेटने’ के लक्ष्यों को पूरा करने के ‘बहुत करीब’ है। उन्होंने संकेत दिया कि वह पश्चिम एशिया के अभियानों को खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी ने अज्ञात वरिष्ठ राजनीतिक और सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि ईरान अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपने रक्षात्मक युद्ध में पूर्व-नियोजित, बहु-चरणीय योजना लागू कर रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह रणनीति महीनों पहले विकसित की गयी थी और इसे उच्च रणनीतिक धैर्य के साथ अंजाम दिया जा रहा है।

    अधिकारी ने कहा कि पूरे क्षेत्र में अमेरिकी-इजरायली हवाई रक्षा प्रणालियों और रडार बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने और नष्ट करने के बाद ईरान ने अब इजरायली सत्ता के हवाई क्षेत्र पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ स्थापित कर लिया है। अधिकारी ने कहा कि ईरान ‘आक्रमणकारी को सजा देने’ की अपनी नीति तब तक जारी रखने का इरादा रखता है, जब तक वह अमेरिका-इजरायली आक्रामकता और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘ऐतिहासिक सबक’ नहीं सिखा देता। अधिकारी ने आगे बताया कि कई क्षेत्रीय पक्षों और मध्यस्थों ने युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से ईरान को प्रस्ताव भेजे हैं। ईरान ने उनके सामने ऐसी शर्तें रखी हैं, जिन्हें किसी भी समझौते पर पहुंचने से पहले पूरा किया जाना और गंभीरता से लिया जाना जरूरी है।
    युद्ध के दो-तीन हफ्ते चलने की और उम्मीद

    वहीं, ‘एक्सियोस’ ने व्हाइट हाउस के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कहा था कि वह संघर्ष को समेटने पर विचार कर रहे हैं, हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया कि वे अभी दो-तीन सप्ताह और सैन्य अभियानों की उम्मीद कर रहे हैं। इसके समानांतर सलाहकारों ने बातचीत के लिए जमीन तैयार करना शुरू कर दिया है, ताकि यदि कोई अवसर मिले तो उसका लाभ उठाया जा सके। पर्दे के पीछे काम करते हुए विशेष दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ पहले से ही तेहरान के अधिकारियों के साथ कूटनीतिक संपर्क की शुरुआती योजना बनाने में जुटे हैं। अधिकारियों ने कहा है कि ईरान के साथ किसी भी समझौते के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खुलवाना, इस्लामिक गणराज्य के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के विशाल भंडार का समाधान करना और उसके परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रॉक्सी मिलिशिया और आतंकी समूहों के समर्थन पर दीर्घकालिक सीमाएं तय करना आवश्यक होगा।

  • समलैंगिक हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा? सुनकर हंस पड़े ट्रंप

    समलैंगिक हैं ईरान के नए सुप्रीम लीडर मोजतबा? सुनकर हंस पड़े ट्रंप


    वॉशिंगटन/तेहरान।
     अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच ईरान के शीर्ष नेतृत्व से जुड़े एक नए विवाद ने चर्चा छेड़ दी है। एक रिपोर्ट में मोजतबा खामेनेई की निजी जिंदगी को लेकर सनसनीखेज दावे किए गए हैं, हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

    New York Post की रिपोर्ट के मुताबिक, हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक खुफिया ब्रीफिंग में यह जानकारी दी गई। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस इनपुट पर ट्रंप ने हैरानी जताई, लेकिन इस पर उनकी कथित प्रतिक्रिया को लेकर भी कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।

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  • खुफिया दावों पर भरोसे को लेकर सवाल
    रिपोर्ट में कुछ अनाम सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि यह जानकारी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों तक पहुंची और इसे “कुछ हद तक विश्वसनीय” माना गया। हालांकि, किसी भी एजेंसी या सरकार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि खुफिया इनपुट अक्सर अपुष्ट या प्रारंभिक स्तर के होते हैं, जिन्हें सार्वजनिक तौर पर सत्य मान लेना उचित नहीं होता।

    कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं
    रिपोर्ट में किए गए दावों-जैसे व्यक्तिगत संबंध या विदेश में इलाज-के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज, आधिकारिक रिकॉर्ड या स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं कराई गई है।

    ईरान के कानून और संवेदनशीलता
    ईरान में समलैंगिकता कानूनन अपराध है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। ऐसे में इस तरह के आरोप न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक रूप से भी बेहद संवेदनशील माने जाते हैं।

    मौजूदा हालात में यह मामला अधिकतर अपुष्ट रिपोर्ट्स और अनाम सूत्रों पर आधारित नजर आता है। ऐसे में इसे तथ्य की तरह नहीं, बल्कि एक विवादित दावे के रूप में ही देखा जा रहा है।

  • ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी

    ट्रंप का दावा: अमेरिकी हमलों में ईरान की नौसेना और वायु रक्षा प्रणाली पूरी तरह नष्ट, अभियान अभी जारी


    नई दिल्ली । वाशिंगटन से रवाना होते समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के खिलाफ जारी अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर बेहद चौंकाने वाला दावा किया। उन्होंने पत्रकारों को बताया कि अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ढांचे को इतनी भयंकर क्षति पहुँचाई है कि अब वहां कुछ भी सुरक्षित नहीं बचा है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि ईरान की नौसेना की पूरी क्षमता और उसकी वायु रक्षा प्रणाली अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है।

    ट्रंप के अनुसार अमेरिकी हमलों ने ईरानी एयरबेस, नौसैनिक जहाजों और रडार सिस्टम को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। इसके अलावा, उन्होंने दावा किया कि ईरान के कई शीर्ष सैन्य और राजनीतिक नेता भी इस अभियान में प्रभावित हुए हैं, जिससे नेतृत्व संकट उत्पन्न हो गया है। व्हाइट हाउस के बाहर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने अमेरिकी सेना की ताकत और कार्यक्षमता की तारीफ करते हुए इसे विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बताया।

    दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि अमेरिकी सेना ने कुछ महत्वपूर्ण ईरानी ठिकानों को जानबूझकर सुरक्षित छोड़ दिया है। उनके अनुसार, यदि अमेरिका चाहे तो केवल एक घंटे में उन बचे हुए ठिकानों को भी पूरी तरह से नष्ट कर सकता है। उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्रवाई ईरान के लिए अपने देश को फिर से खड़ा करना लगभग असंभव बना देगी।

    ट्रंप ने यह साफ किया कि अमेरिकी हमले केवल जवाबी कार्रवाई नहीं थे, बल्कि ईरान की सैन्य क्षमता को जड़ से समाप्त करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थे। उनके अनुसार ईरान की नौसेना के अधिकांश जहाज अब समुद्र की गहराई में डूब चुके हैं और वायुसेना भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त है। इस बयान से स्पष्ट होता है कि अमेरिका ने ईरान को सैन्य रूप से पंगु बनाने की पूरी योजना बनाई है।

    पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या अमेरिकी कार्रवाई अब रोक दी जाएगी। ट्रंप ने कड़ा जवाब देते हुए कहा कि अभियान अभी जारी है और सेना आगे की कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा संदेश है कि अमेरिका की सुरक्षा से खिलवाड़ भारी पड़ेगा। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताया, जिसे अमेरिका ने पहले कभी नहीं देखा।

    विश्व के रक्षा विशेषज्ञ और राजनेता अब ट्रंप के इस दावे पर बहस कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक और सैन्य पटल पर हलचल मचा दी है। पूरी दुनिया की नजरें अब इस बात पर हैं कि ईरान इस विनाशकारी दावे और सैन्य क्षति के बारे में क्या प्रतिक्रिया देता है।

  • भारत पर नया टैरिफ लगा सकता है, अमेरिका…कई देशों की व्यापारिक नीतियों की जांच शुरू

    भारत पर नया टैरिफ लगा सकता है, अमेरिका…कई देशों की व्यापारिक नीतियों की जांच शुरू


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की सरकार ने 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की उन व्यापारिक नीतियों और प्रथाओं के खिलाफ नई जांच शुरू की है, जिन्हें अमेरिका (America) ‘अनुचित’ मानता है। इस कदम से भारत (India) सहित कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ (Additional Tariff.) और अन्य जुर्माने लगने का रास्ता साफ हो सकता है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा ट्रंप की ओर से पहले लगाए गए टैरिफ को खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद वह अब नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।


    जांच के दायरे में भारत और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं

    औद्योगिक क्षमता से अधिक उत्पादन को लेकर की जा रही इस जांच के निशाने पर मुख्य रूप से भारत के साथ-साथ यूरोपीय संघ (EU), चीन, जापान और कई अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। अमेरिका के इस कड़े कदम से इन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ने की पूरी संभावना है।


    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि का कड़ा रुख

    न्यूज एजेंसी एएफपी (AFP) के हवाले से, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीर ने बताया कि ट्रंप प्रशासन दो अलग-अलग जांचें शुरू कर रहा है। पहली जांच जरूरत से ज्यादा उत्पादन पर केंद्रित है, जबकि दूसरी जांच जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात को लेकर है। उन्होंने कहा कि इस गर्मियों तक चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और मैक्सिको के खिलाफ नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं। इस सूची में ताइवान, वियतनाम, थाइलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे भी शामिल हैं। अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार कनाडा को इस जांच से बाहर रखा गया है।

    अपने रुख को स्पष्ट करते हुए ग्रीर ने कहा- हमें अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करनी है और हमें यह सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है कि हमारे व्यापारिक साझेदारों के साथ हमारा व्यापार पूरी तरह से निष्पक्ष हो। उन्होंने सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा- अगर इस समस्या को हल करने के लिए हमें टैरिफ लगाने की जरूरत पड़ी, तो हम ऐसा जरूर करेंगे। हालांकि, ग्रीर ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि भविष्य में लगाए जाने वाले संभावित जुर्माने या टैरिफ अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग होंगे या एक समान।

    ग्रीर के अनुसार, चीन की इलेक्ट्रिक वाहन (EV) उत्पादन क्षमता उसकी घरेलू मांग से कहीं अधिक है। फिर भी, वहां की शीर्ष ईवी निर्माता कंपनी BYD आक्रामक रूप से उज्बेकिस्तान, थाइलैंड, ब्राजील, हंगरी और तुर्की में अपने कारखाने स्थापित कर रही है और यूरोप में भी विस्तार करने की योजना बना रही है।

    जर्मनी और आयरलैंड के बड़े व्यापार अधिशेष को यूरोपीय संघ की अतिरिक्त क्षमता का सबूत माना गया है। इसके अलावा, अमेरिका के साथ व्यापार घाटे के बावजूद सिंगापुर में सेमीकंडक्टर की अतिरिक्त वैश्विक क्षमता है, और नॉर्वे में ईंधन व समुद्री भोजन के भारी निर्यात को इसका सबूत माना गया है।


    60 देशों पर पड़ेगा असर

    जबरन मजदूरी को लेकर जो दूसरी जांच की जा रही है, उसके बारे में ग्रीर ने बताया कि यह जांच कल दोपहर के बाद किसी भी समय शुरू हो सकती है। इस जांच की जद में लगभग 60 व्यापारिक साझेदार देश आएंगे, जिससे ग्लोबल सप्लाई चैन पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    अमेरिका ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा हस्ताक्षरित ‘उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत पहले ही चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सोलर पैनल और अन्य सामानों पर कार्रवाई की है। अमेरिका का आरोप है कि चीन ने उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए लेबर कैंप बनाए हैं (हालांकि चीन इन आरोपों से इनकार करता है)। अब इस जांच का दायरा अन्य देशों तक भी बढ़ाया जा सकता है।


    ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से ठीक पहले उठाया गया कदम

    ट्रंप प्रशासन का यह ताजा व्यापारिक कदम रणनीतिक रूप से भी काफी अहम है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब अप्रैल महीने में बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है। इस नई जांच का असर दोनों नेताओं की आगामी बातचीत पर भी देखने को मिल सकता है।