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  • बंगाल में सत्ता बदलाव का बड़ा असर! झारखंड के अवैध कारोबार पर कसेगा शिकंजा, सियासत में भी हलचल

    बंगाल में सत्ता बदलाव का बड़ा असर! झारखंड के अवैध कारोबार पर कसेगा शिकंजा, सियासत में भी हलचल


    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन के संकेतों ने न सिर्फ राज्य की राजनीति बदली है, बल्कि इसका असर पड़ोसी Jharkhand तक देखने को मिल सकता है। करीब 15 साल बाद बन रहे नए सियासी समीकरणों के बीच अवैध कारोबार और सीमा से जुड़ी गतिविधियों पर भी असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

    माना जा रहा है कि नई सरकार के आने के बाद अवैध नेटवर्क पर सख्ती बढ़ सकती है। खासतौर पर Bharatiya Janata Party की संभावित नीतियों को देखते हुए ऐसे कारोबार में शामिल लोगों के बीच डर का माहौल बनना शुरू हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन गतिविधियों पर लगाम लगाने को सरकार प्राथमिकता दे सकती है।

    झारखंड लंबे समय से पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश  से जुड़े अवैध कारोबार के लिए एक “ट्रांजिट कॉरिडोर” के रूप में देखा जाता रहा है। राज्य के कई जिले जैसे साहिबगंज, पाकुड़, दुमका, जामताड़ा, धनबाद, बोकारो, रामगढ़, रांची, सरायकेला-खरसावां और पूर्वी सिंहभूम पश्चिम बंगाल से सटे होने के कारण इन गतिविधियों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

    अब अगर बंगाल में सख्ती बढ़ती है, तो इन जिलों में चल रहे अवैध नेटवर्क पर सीधा असर पड़ सकता है। इससे झारखंड की राजनीति भी प्रभावित हो सकती है, जहां मौजूदा महागठबंधन सरकार पर दबाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पूर्वी भारत की सुरक्षा और राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि नई नीतियां जमीन पर कितनी तेजी से लागू होती हैं और उनका वास्तविक असर क्या पड़ता है।

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  • बंगाल में BJP की बढ़त के पीछे अमित शाह की रणनीति बनी सबसे बड़ा फैक्टर, चुनावी खेल पूरी तरह बदला

    बंगाल में BJP की बढ़त के पीछे अमित शाह की रणनीति बनी सबसे बड़ा फैक्टर, चुनावी खेल पूरी तरह बदला

    नई दिल्ली।पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के रुझानों ने इस बार राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। शुरुआती आंकड़ों में भाजपा कई सीटों पर आगे दिखाई दे रही है, जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अधिक ध्यान जिस बात पर जा रहा है, वह है भाजपा की रणनीतिक तैयारी और उसके पीछे माने जा रहे प्रमुख नेतृत्व की भूमिका।

    चुनाव से काफी पहले ही राज्य में पार्टी ने अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर काम शुरू कर दिया था। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया और स्थानीय मुद्दों को गहराई से समझने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य यह था कि पार्टी केवल बड़े मंचों तक सीमित न रहे, बल्कि सीधे मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत कर सके।

    इस पूरी रणनीति के केंद्र में एक स्पष्ट योजना दिखाई दी, जिसमें जमीनी स्तर पर संगठन को सक्रिय करना और अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावशाली चेहरों को आगे लाना शामिल था। इससे पार्टी को उन इलाकों में भी समर्थन मिलने लगा, जहां पहले उसकी स्थिति कमजोर मानी जाती थी।

    चुनावी अभियान के दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों को लगातार जनता के बीच रखा गया। इनमें कानून व्यवस्था, सुरक्षा, भ्रष्टाचार और विकास से जुड़े विषय प्रमुख रहे। साथ ही रोजगार और निवेश को लेकर भी मजबूत संदेश दिया गया, जिससे युवाओं और शहरी वर्ग तक पहुंच बनाने में मदद मिली।

    अभियान के दौरान महिलाओं की सुरक्षा को भी एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने रखा गया। कई जनसभाओं में यह बात प्रमुखता से उठाई गई कि राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है। इसके साथ ही विकास मॉडल को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई, जिसमें भविष्य की दिशा को लेकर अलग दृष्टिकोण पेश किया गया।

    पूरे चुनावी अभियान के दौरान संगठनात्मक स्तर पर लगातार निगरानी और समन्वय बनाए रखा गया। रणनीति केवल चुनावी रैलियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसे हर स्तर पर लागू किया गया। कार्यकर्ताओं को लगातार दिशा-निर्देश दिए जाते रहे, जिससे अभियान में निरंतरता बनी रही।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में भाजपा की बढ़त केवल किसी एक कारण से नहीं है, बल्कि यह कई स्तरों पर की गई तैयारियों का परिणाम है। संगठन की मजबूती, जमीनी संपर्क और मुद्दों की स्पष्टता ने इस स्थिति को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    फिलहाल रुझानों में भाजपा को बढ़त मिलती दिख रही है, जिससे राजनीतिक हलचल और तेज हो गई है। हालांकि अंतिम परिणाम आने तक तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं होगी, लेकिन इतना तय है कि इस चुनाव ने राज्य की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है और आगे आने वाले समय में इसके असर और भी गहरे दिखाई दे सकते हैं।

  • भगवान बुद्ध का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक, अमित शाह ने बताया शांति का मार्ग

    भगवान बुद्ध का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक, अमित शाह ने बताया शांति का मार्ग

    नई दिल्ली। लद्दाख की शांत और पवित्र वादियों में उस समय एक विशेष आध्यात्मिक माहौल देखने को मिला जब भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के दर्शन के लिए लोगों की बड़ी संख्या एकत्र हुई। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में Amit Shah ने कहा कि भगवान बुद्ध का संदेश केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह आज भी उतना ही जीवंत और प्रासंगिक है जितना वह 2500 साल पहले था।

    उनके अनुसार बुद्ध का ज्ञान मानव जीवन के हर दौर में दिशा दिखाने वाला प्रकाश है।

    अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बुद्ध पूर्णिमा का यह अवसर केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का क्षण है। जब इतने लंबे अंतराल के बाद पवित्र अवशेषों का पुनः आगमन लद्दाख की धरती पर हुआ, तो यह न केवल आस्था का विषय बना, बल्कि लोगों के लिए एक भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण भी साबित हुआ। इस आयोजन ने क्षेत्र में शांति और सकारात्मक ऊर्जा का वातावरण निर्मित किया।

    अमित शाह ने भगवान बुद्ध के जीवन को मानवता के लिए एक आदर्श उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि सिद्धार्थ से तथागत बनने की यात्रा करुणा, त्याग और आत्मज्ञान की ऐसी मिसाल है, जो हर व्यक्ति को जीवन में सही दिशा अपनाने की प्रेरणा देती है। बुद्ध का संदेश अहिंसा, मध्यम मार्ग और संतुलित जीवन पर आधारित था, जो आज के समय में पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

    उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में बहुत कम ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनके जीवन की घटनाएं इतनी गहराई से प्रतीकात्मक हों। जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों का एक ही आध्यात्मिक अर्थ में जुड़ जाना उनके जीवन की विशिष्टता को दर्शाता है। यह अपने आप में मानवता के लिए एक दुर्लभ और प्रेरणादायक उदाहरण है।

    लद्दाख की सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र सदियों से बौद्ध धम्म का केंद्र रहा है। यहां न केवल बौद्ध विचारधारा को संरक्षित किया गया, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाया गया। यह भूमि शांति, करुणा और सह-अस्तित्व की जीवंत मिसाल है, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक हो गई है।

    अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में जब दुनिया कई चुनौतियों से गुजर रही है, तब भगवान बुद्ध का संदेश समाधान का मार्ग दिखाता है। उनका विचार आज भी उतना ही प्रभावशाली है और मानवता को एक बेहतर, शांत और संतुलित दिशा की ओर ले जाने की क्षमता रखता है।

  • समानता और सेवा के संदेश के साथ मनाया गया गुरु अमरदास जी का प्रकाश पर्व, नेताओं ने किया नमन

    समानता और सेवा के संदेश के साथ मनाया गया गुरु अमरदास जी का प्रकाश पर्व, नेताओं ने किया नमन

    नई दिल्ली । सिख धर्म के तीसरे गुरु श्री गुरु अमरदास जी के प्रकाश पर्व के अवसर पर देशभर में श्रद्धा और सम्मान का माहौल देखने को मिला। इस पावन अवसर पर कई प्रमुख नेताओं ने गुरु साहिब को नमन करते हुए उनके आदर्शों और शिक्षाओं को याद किया। पूरे देश में यह दिन सेवा, समानता और विनम्रता के संदेश के रूप में मनाया गया।

    इस अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने गुरु अमरदास जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनके जीवन से हमें निस्वार्थ सेवा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने समाज में समानता और मानवता के कल्याण के लिए जो संदेश दिया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी गुरु साहिब को नमन करते हुए उनके जीवन को समर्पण, सेवा और विनम्रता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि गुरु अमरदास जी ने समाज में महिलाओं को सम्मान और समान अधिकार दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश दिया, जो आज भी प्रेरणादायक है।

    इसके अलावा अन्य नेताओं ने भी इस अवसर पर अपने संदेश साझा किए और गुरु अमरदास जी के जीवन मूल्यों को याद किया। कई संदेशों में ‘पंगत और संगत’ की परंपरा का उल्लेख किया गया, जिसे सामाजिक एकता और समानता का मजबूत आधार माना जाता है।

    गुरु अमरदास जी की शिक्षाओं में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने, समानता स्थापित करने और मानवता को सर्वोपरि रखने का संदेश शामिल है। उनके विचार आज भी समाज को दिशा देने का काम करते हैं और लोगों को एकता के सूत्र में बांधते हैं।

    इस प्रकाश पर्व ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि गुरु साहिब की शिक्षाएं केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने वाली हैं, जो हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेंगी।

  • पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल गरमाया, अमित शाह ने कांग्रेस और टीएमसी पर साधा निशाना

    पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल गरमाया, अमित शाह ने कांग्रेस और टीएमसी पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच राजनीतिक सरगर्मी लगातार तेज होती जा रही है। दम दम उत्तर विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस पर तीखे राजनीतिक हमले किए। उन्होंने अपने संबोधन में राज्य की राजनीतिक स्थिति और आगामी मतदान को लेकर कई महत्वपूर्ण दावे किए, जिससे चुनावी माहौल और अधिक गरम हो गया है।

    सभा के दौरान उन्होंने दावा किया कि इस बार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है और मौजूदा नेतृत्व को जनता का समर्थन कम होता दिख रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता अब बदलाव की ओर देख रही है और आगामी चुनाव परिणाम इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

    अपने संबोधन में उन्होंने कांग्रेस पार्टी को भी निशाने पर लिया और कहा कि राज्य में उसका प्रभाव काफी कमजोर हो चुका है। उनके अनुसार, कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभाने में असफल रही है और इस बार भी उसके लिए स्थिति अनुकूल नहीं दिखाई दे रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पार्टी राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने में संघर्ष कर रही है।

    सभा में दिए गए भाषण के दौरान राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया। उन्होंने विपक्षी नेताओं की हालिया टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीतिक विमर्श में भाषा और मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के साथ बयान देना आवश्यक है ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान बना रहे।

    इसके अलावा उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उनका कहना था कि राज्य में कई मुद्दों पर जनता असंतोष व्यक्त कर रही है और यह आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे मतदान के दिन सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें और अपने मताधिकार का प्रयोग करें।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह के बयान चुनावी माहौल में मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास माने जाते हैं। पश्चिम बंगाल में पहले से ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तीव्र है और विभिन्न दल अपनी रणनीति के तहत मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटे हुए हैं।

    चुनाव आयोग की निगरानी में राज्य में मतदान प्रक्रिया की तैयारी चल रही है और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर प्रचार अभियान को अंतिम चरण में पहुंचा रहे हैं, जिससे राज्य का राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदलता दिखाई दे रहा है।

    आने वाले दिनों में मतदान और उसके बाद के परिणाम राज्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे। फिलहाल सभी दल अंतिम चरण के प्रचार में पूरी ताकत लगा रहे हैं और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।

  • बंगाल चुनाव में भाजपा का बड़ा दांव, महिलाओं को ₹3000 मासिक सहायता और 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा

    बंगाल चुनाव में भाजपा का बड़ा दांव, महिलाओं को ₹3000 मासिक सहायता और 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है, जहां भारतीय जनता पार्टी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया है। इस घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ नाम दिया गया है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कोलकाता में जारी किया। पार्टी ने इसे राज्य के विकास और बदलाव का रोडमैप बताते हुए कई बड़े वादों की घोषणा की है।

    इस घोषणापत्र में सबसे अधिक फोकस महिलाओं, युवाओं और सरकारी कर्मचारियों पर किया गया है। महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता योजना के तहत हर पात्र महिला को प्रतिमाह तीन हजार रुपये सीधे बैंक खाते में देने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही महिलाओं को सरकारी नौकरियों में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का भी वादा किया गया है, जिससे उनकी भागीदारी को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

    युवाओं के लिए भी घोषणापत्र में बड़े वादे किए गए हैं। बेरोजगार युवाओं को प्रतिमाह तीन हजार रुपये का भत्ता देने की बात कही गई है, साथ ही आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करने का दावा किया गया है। इसके जरिए राज्य में रोजगार संकट को कम करने की रणनीति प्रस्तुत की गई है।

    शिक्षा के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। लड़कियों के लिए केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा की बात कही गई है, जिससे शिक्षा को अधिक सुलभ और समावेशी बनाया जा सके। पार्टी का कहना है कि इस कदम से शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा।

    सरकारी कर्मचारियों के लिए भी बड़ा वादा किया गया है, जिसके तहत सरकार बनने के बाद पैंतालीस दिनों के भीतर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और बकाया महंगाई भत्ते का भुगतान सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इस घोषणा को कर्मचारियों को साधने की एक बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

    इसके अलावा राज्य में समान नागरिक संहिता को लेकर भी बड़ा ऐलान किया गया है। पार्टी ने कहा है कि यदि उन्हें सत्ता मिलती है तो छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। इस घोषणा ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

    घोषणापत्र में सीमा सुरक्षा और घुसपैठ के मुद्दे को भी प्रमुखता दी गई है। पार्टी ने दावा किया है कि राज्य की सीमाओं को अधिक मजबूत बनाया जाएगा और अवैध गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विशेष कदम उठाने का वादा किया गया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घोषणापत्र चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें विभिन्न वर्गों को सीधे आर्थिक और सामाजिक लाभ का आश्वासन देकर समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई है। वहीं सत्तारूढ़ दल की ओर से इन वादों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया आने की संभावना जताई जा रही है

  • बिहार मॉडल पर काम; बंगाल में 15 दिनों तक क्या-क्या करेंगे अमित शाह?

    बिहार मॉडल पर काम; बंगाल में 15 दिनों तक क्या-क्या करेंगे अमित शाह?

    कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने पिछले सप्ताह भवानीपुर में एक बड़ी चुनावी रैली के दौरान घोषणा की कि वे आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान लगातार 15 दिनों तक बंगाल में ही प्रवास करेंगे।
    वहीं, शुभेंदु अधिकारी की नामांकन रैली के दौरान शाह ने हुंकार भरते हुए कहा कि भाजपा इस बार 294 सीटों वाली विधानसभा में 175 से अधिक सीटें जीतकर एक ऐतिहासिक बदलाव लाएगी।

    अमित शाह का यह ऐलान भवानीपुर की धरती से आया, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपना निर्वाचन क्षेत्र है। भाजपा ने यहां ममता बनर्जी के कट्टर प्रतिद्वंद्वी शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है। शाह ने इस मुकाबले को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, “अगर भवानीपुर की जनता भाजपा को यहां जीत दिलाती है, तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन अपने आप हो जाएगा। यह ममता दीदी की विदाई का सबसे छोटा रास्ता (शॉर्टकट) होगा।”

    गौरतलब है कि शुभेंदु अधिकारी ने पिछले चुनाव में नंदीग्राम से ममता बनर्जी को पराजित किया था। इस बार भाजपा ने उन्हें नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों ही हाई-प्रोफाइल सीटों से मैदान में उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
    कैसा होगा अमित शाह का 15 दिनों का कैंप प्लान?

    सूत्रों के अनुसार, अमित शाह का यह 15 दिवसीय प्रवास केवल रैलियों तक सीमित नहीं रहेगा। वे माइक्रो-मैनेजमेंट के तहत राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रातें बिताएंगे और वॉर रूम से चुनावी कमान संभालेंगे। अमित शाह सिलीगुड़ी और बालुरघाट जैसे क्षेत्रों में रुकेंगे, जहां 2019 के बाद से भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा है। वे हुगली, खड़गपुर और दुर्गापुर जैसे इलाकों में भी डेरा डालेंगे। यहां मुख्य ध्यान उन 40 सीटों पर होगा जहां 2021 के चुनाव में भाजपा 5% से भी कम अंतर से हार गई थी।
    देर रात तक बैठकें

    शाह की रणनीति का मुख्य हिस्सा रात 2 बजे तक चलने वाली संगठनात्मक बैठकें होंगी। इनमें वे बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेंगे, नाराज नेताओं को मनाएंगे और टिकट वितरण से उपजे असंतोष को दूर करेंगे।
    MP, महाराष्ट्र और बिहार का फॉर्मूला

    अमित शाह की यह कार्यशैली नई नहीं है। इससे पहले उन्होंने मध्य प्रदेश (2023), महाराष्ट्र (2024) और बिहार (2025) के विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह का गहन प्रवास किया था।

    बिहार में भाजपा के ऐतिहासिक प्रदर्शन और पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने की सफलता के पीछे शाह की क्लस्टर रणनीति को ही श्रेय दिया जाता है। बंगाल में भी वे राज्य को विभिन्न सांगठनिक क्लस्टरों में बांटकर खुद निगरानी करेंगे।

    2021 के चुनावों में भाजपा ने 3 से सीधे 77 सीटों पर छलांग लगाई थी और उसका वोट शेयर करीब 38% तक पहुंच गया था। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने वापसी की और भाजपा की सीटों की संख्या 18 से घटकर 12 रह गई। अब अमित शाह का पूरा जोर उन सीटों पर है जिन्हें भाजपा जीतते-जीतते हार गई थी। जलपाईगुड़ी, राजगंज और मेखलीगंज जैसे क्षेत्रों में शाह खुद रणनीति बनाएंगे ताकि पिछली गलतियों को न दोहराया जाए।

  • अमित शाह का राहुल गांधी पर कड़ा प्रहार, बोले- नक्सलियों के साथ रहते-रहते खुद बन गए नक्सलवादी

    अमित शाह का राहुल गांधी पर कड़ा प्रहार, बोले- नक्सलियों के साथ रहते-रहते खुद बन गए नक्सलवादी


    नई दिल्ली।
    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Union Home Minister Amit Shah) ने सोमवार को लोकसभा (Lok Sabha) में कांग्रेस और सदन में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर करार प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि नक्सलियों के साथ रहते-रहते एक पार्टी के नेता खुद नक्सलवादी बन गए। शाह ने देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त किए जाने के मुद्दे पर सदन में हुई चर्चा का जवाब देते हुए राहुल गांधी पर नक्सलियों का समर्थन करने का आरोप लगाया। गृह मंत्री ने कहाकि राहुल गांधी जी अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलियों और उनके हमर्ददों के साथ देखे गए हैं। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठन ने हिस्सा लिया, जिसका रिकॉर्ड भी है।


    राहुल गांधी कैसे बच सकते हैं

    अमित शाह ने दावा किया कि 2010 में ओडिशा में लाडो शिकोका के साथ राहुल ने मंच साझा किया। शिकोका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और उन्हें माला भी पहनाई। उन्होंने यह भी दावा किया कि 2018 में हैदराबाद में, राहुल ने जीवी राव से मुलाकात की, जो (नक्सल) विचाराधारा के करीब थे। मई 2025 में शांति समन्वय समिति (सीसीपी) के सदस्यों से मुलाकात की। विपक्षी सदस्यों के शोरगुल के बीच शाह ने कहाकि 172 जवानों को मारने वाला (माड़वी) हिडमा जब मारा गया, तो इंडिया गेट पर नारे लगे कि कितने हिडमा मारेगो, हर घर से हिडमा निकलेगा। उन्होंने कहा कि इससे संबंधित वीडियो को राहुल गांधी ने स्वयं ट्वीट किया था और ऐसे में वह कैसे बच सकते हैं।


    कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा दोषी

    शाह ने कांगेस पर निशाना साधते हुए कहा कि इन्होंने 1970 से लेकर मार्च 2026 तक नक्सलाद और नरसंहार का समर्थन किया है। उन्होंने कहाकि जो 20 हजार लोग मारे गए, उसका कोई दोषी है तो वह कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा है…। गृह मंत्री ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहाकि नक्सलियों के साथ रहते-रहते एक पार्टी और उसके नेता खुद नक्सलवादी बन गए। इसका जवाब इस देश की जनता को उन्हें चुनाव में देना पड़ेगा। यह बात रुकेगी नहीं। जनता की अदालत में उन्हें जवाब देना पड़ेगा। उन्होंने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का गठन किया गया और इस तरह एक संविधानेत्तर मंच बनाया गया, जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं।


    जयराम रमेश पर भी आरोप

    शाह ने यह दावा भी किया कि कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने महेश राउत नाम के एक नक्सली की रिहाई के लिए अपनी पार्टी शासित एक राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। उन्होंने सवाल किया कि जब केंद्र सरकार का एक संविधानेत्तर प्राधिकरण, जो प्रधानमंत्री से भी ऊपर था, के सदस्य यदि नक्सलवाद के समर्थक हों तो किस तरह से नक्सलियों का हौसला टूटेगा? और यह कांग्रेस पार्टी ने किया था। उन्होंने यह दावा भी किया कि 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप शुरू की, तो उसका एक लाभार्थी नक्सलवादी बना।

    शाह ने कांग्रेस नेता पी चिदंबरम पर भी प्रहार करते हुए दावा किया कि छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के 76 जवानों के मारे जाने के बाद कांग्रेस नेता ने कहा था कि हम आपसे हथियार डालने को नहीं कह सकते। हम जानते हैं कि आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आप हथियारबंद आजादी की लड़ाई में विश्वास करते हैं।

  • बिहार की राजनीति में नया मोड़ नीतीश कुमार सहित एनडीए के पांच उम्मीदवारों ने भरा राज्यसभा नामांकन

    बिहार की राजनीति में नया मोड़ नीतीश कुमार सहित एनडीए के पांच उम्मीदवारों ने भरा राज्यसभा नामांकन


    नई दिल्ली :बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने गुरुवार को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया। खास बात यह रही कि नामांकन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah भी मौजूद रहे। इस घटनाक्रम को बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसे संभावित राजनीतिक बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
    नामांकन प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस के पांचों दलों ने एक साथ अपना नामांकन पर्चा दाखिल किया। इनमें नीतीश कुमार के अलावा नितिन नबीन, रामनाथ ठाकुर, शिवेश कुमार राम और उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। सभी उम्मीदवार बिहार विधान सभा परिसर पहुंचे और राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल किया।

    नामांकन के दौरान अमित शाह की मौजूदगी ने इस प्रक्रिया को और भी राजनीतिक रूप से अहम बना दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बिहार की आगामी राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ा हो सकता है।

    इससे पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि उन्होंने पटना में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से शिष्टाचार मुलाकात की। उन्होंने अपने संदेश में जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों से अधिक समय से बिहार की जनता ने उन पर भरोसा बनाए रखा है और उसी विश्वास के बल पर उन्होंने राज्य की सेवा पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ की है।

    अपने पोस्ट में नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि उनके संसदीय जीवन की शुरुआत से ही यह इच्छा रही है कि वे बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ साथ संसद के दोनों सदनों के भी सदस्य बनें। इसी भावना के तहत उन्होंने इस बार राज्यसभा का सदस्य बनने की इच्छा जताई है और चुनाव मैदान में उतरने का फैसला लिया है।

    गौरतलब है कि Election Commission of India ने 18 फरवरी को देश के 10 राज्यों में खाली हो रही 37 सीटों के लिए राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था। इन सीटों पर चुनाव इसलिए कराए जा रहे हैं क्योंकि मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त होने वाला है।

    निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान 16 मार्च को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक कराया जाएगा। इसके बाद उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी और परिणाम घोषित किए जाएंगे।

    नामांकन से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पटना स्थित मुख्यमंत्री आवास पहुंचे थे जहां उन्होंने नीतीश कुमार से मुलाकात की। इस बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री Samrat Choudhary सहित कई अन्य नेता भी मौजूद रहे। बताया जा रहा है कि इस दौरान राज्यसभा चुनाव के साथ साथ बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और आगे की रणनीति को लेकर भी चर्चा की गई।