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  • पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल गरमाया, अमित शाह ने कांग्रेस और टीएमसी पर साधा निशाना

    पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल गरमाया, अमित शाह ने कांग्रेस और टीएमसी पर साधा निशाना


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच राजनीतिक सरगर्मी लगातार तेज होती जा रही है। दम दम उत्तर विधानसभा क्षेत्र में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री ने कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस पर तीखे राजनीतिक हमले किए। उन्होंने अपने संबोधन में राज्य की राजनीतिक स्थिति और आगामी मतदान को लेकर कई महत्वपूर्ण दावे किए, जिससे चुनावी माहौल और अधिक गरम हो गया है।

    सभा के दौरान उन्होंने दावा किया कि इस बार पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बदलाव देखने को मिल सकता है और मौजूदा नेतृत्व को जनता का समर्थन कम होता दिख रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य की जनता अब बदलाव की ओर देख रही है और आगामी चुनाव परिणाम इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

    अपने संबोधन में उन्होंने कांग्रेस पार्टी को भी निशाने पर लिया और कहा कि राज्य में उसका प्रभाव काफी कमजोर हो चुका है। उनके अनुसार, कांग्रेस लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति में प्रभावी भूमिका निभाने में असफल रही है और इस बार भी उसके लिए स्थिति अनुकूल नहीं दिखाई दे रही है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पार्टी राज्य में अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने में संघर्ष कर रही है।

    सभा में दिए गए भाषण के दौरान राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया गया। उन्होंने विपक्षी नेताओं की हालिया टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि राजनीतिक विमर्श में भाषा और मर्यादा का ध्यान रखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के साथ बयान देना आवश्यक है ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान बना रहे।

    इसके अलावा उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था और प्रशासनिक स्थिति पर भी टिप्पणी की। उनका कहना था कि राज्य में कई मुद्दों पर जनता असंतोष व्यक्त कर रही है और यह आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे मतदान के दिन सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें और अपने मताधिकार का प्रयोग करें।

    राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह के बयान चुनावी माहौल में मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास माने जाते हैं। पश्चिम बंगाल में पहले से ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तीव्र है और विभिन्न दल अपनी रणनीति के तहत मतदाताओं को आकर्षित करने में जुटे हुए हैं।

    चुनाव आयोग की निगरानी में राज्य में मतदान प्रक्रिया की तैयारी चल रही है और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने स्तर पर प्रचार अभियान को अंतिम चरण में पहुंचा रहे हैं, जिससे राज्य का राजनीतिक परिदृश्य लगातार बदलता दिखाई दे रहा है।

    आने वाले दिनों में मतदान और उसके बाद के परिणाम राज्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे। फिलहाल सभी दल अंतिम चरण के प्रचार में पूरी ताकत लगा रहे हैं और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।

  • महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!

    महिला आरक्षण बिल का विरोध…. अमित शाह के राजनीतिक दांव में उलझी अखिलेश की रणनीति!


    नई दिल्ली।
    शतरंज हो या राजनीति, चाल संभलकर खेलनी होती है. अमित शाह (Amit Shah) को भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) का ‘चाणक्य’ माना जाता है, वहीं अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ने लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन करके दिखा दिया कि वह राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं. यह बात भी दीगर है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव में इंडिया गठबंधन ने संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के नैरेटिव के जरिए जीत हासिल की थी, लेकिन राजनीति में काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती है. अब बारी थी अमित शाह की. सरकार ने लोकसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Women Empowerment Act) से जुड़े तीन बिल पेश किए. मकसद था कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा में 33 फीसदी आरक्षण दिया जाए, लेकिन सारे विपक्षी दलों ने विरोध कर दिया और आखिरकार बिल लोकसभा में गिर गया।


    लोकसभा में गिरा बिल, अब क्या करेगी सरकार?

    सदन में संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर मतदान हुआ. मतदान में बिल के समर्थन में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े. लोकसभा में किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. जब महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया, तो परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 को सरकार ने आगे नहीं बढ़ाया. अब सवाल है कि क्या सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों का संयुक्त सत्र बुलाकर बिल पास कराएगी, हालांकि सरकार ने यह साफ नहीं किया है।


    महिला आरक्षण बिल के विरोध में सपा

    महिला आरक्षण बिल पर सपा के मुखिया अखिलेश यादव अपने पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के पदचिन्हों पर चल रहे हैं. चाहे सत्ता में रहे हों या बाहर, वे महिला आरक्षण बिल में भी आरक्षण की मांग करते रहे, लेकिन कोई भी सरकार आरक्षण में आरक्षण देने को तैयार नहीं थी. 1996 में एच. डी. देवगौड़ा की सरकार में यह बिल पेश किया गया, लेकिन सरकारें आती-जाती रहीं और बिल पास नहीं हुआ. यह बिल इंद्र कुमार गुजराल की सरकार से होते हुए अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार तक पहुंचा, लेकिन बात सदन में मारपीट तक पहुंच गई. वाजपेयी सरकार के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसदों ने इसे सदन में फाड़ डाला. बिल पेश करने पर कानून मंत्री थंबी दोरई की कमीज भी फाड़ दी गई थी. फिर यह बिल मनमोहन सिंह की सरकार में आया। उस समय आरजेडी सरकार का हिस्सा थी, तो समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन कर रही थी, लेकिन बिल का विरोध जारी रहा. हालांकि यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, लेकिन लोकसभा में फंस गया।


    अखिलेश यादव क्यों करते हैं विरोध

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि बीजेपी ‘नारी’ को नारा बनाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने यह भी कहा कि वे बिल के समर्थन में हैं, लेकिन सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे छिपी साजिश का विरोध करते हैं. अखिलेश की मांग थी कि ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं को इस बिल में आरक्षण दिया जाए, जबकि अमित शाह ने जवाब दिया कि संविधान में मुस्लिमों के लिए कोई आरक्षण का प्रावधान नहीं है. वहीं अखिलेश का आरोप था कि सरकार जाति जनगणना से बचना चाहती है, तो अमित शाह ने जवाब दिया कि इस जनगणना में जाति जनगणना भी होगी. इस पर सपा के धर्मेंद्र यादव ने कहा कि जनगणना में जाति का कॉलम नहीं है. अमित शाह ने जवाब दिया कि आदमी की जाति होती है, घर की जाति नहीं होती है. अभी घरों की गणना हो रही है, उसके बाद लोगों की गणना होगी, जिसमें जाति भी शामिल रहेगी।


    आगे कुआं, पीछे खाई

    देश बदल रहा है, लोगों की आकांक्षाएं बदल रही हैं. खासकर महिलाएं शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतर कर रही हैं. इसकी भनक अखिलेश यादव को है. उनके शासनकाल में जो कानून-व्यवस्था का हाल हुआ था, उसका खामियाजा वे करीब 10 साल से भुगत रहे हैं. योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में हत्याएं, बलात्कार, दहेज के मामले और एसिड अटैक के मामलों में कमी आई है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के मुताबिक, 2016 में यूपी में हत्याएं 4889 थीं, जो 2023 में घटकर 3307 हो गईं. 2016 में बलात्कार की घटनाएं 4816 थीं, जो 2023 में घटकर 3556 हो गई हैं. 2016 में दहेज हत्याएं 2473 थीं, जो 2023 में घटकर 2141 हो गई हैं. महिलाओं पर एसिड फेंकने के मामले 57 थे, जो 2023 में 31 हो गए हैं. 2016 में महिलाओं के शील भंग (लज्जा भंग की कोशिश) के मामले 11335 थे, जो 2023 में घटकर 9549 हो गए हैं.

    एक तरफ अखिलेश के शासनकाल के आंकड़े हैं, तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के कानून-व्यवस्था का इकबाल है कि जनसंख्या बढ़ने के बावजूद अपराध घट रहे हैं. इस बात का अहसास अखिलेश को है, लेकिन अगर वे इस बिल का समर्थन करते, तो पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के वोटर नाराज हो सकते थे. वहीं अब बिल का विरोध करने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी उन्हें “महिला विरोधी” बताकर घेर सकती है.


    महिलाओं पर मुलायम की बातों की गूंज

    भले मुलायम सिंह यादव नहीं रहे, लेकिन महिलाओं पर उनके बयान अभी तक प्रदेश की जनता भूली नहीं है. लोकसभा 2014 के दौरान अप्रैल में मुरादाबाद की एक रैली में उन्होंने कहा था, ‘क्या बलात्कार के मामले में फांसी की सजा दी जानी चाहिए? वे लड़के हैं, उनसे गलतियां हो जाती हैं.’ इसी बिल की चर्चा के दौरान बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी मुलायम सिंह के पुराने बयान का जिक्र करते हुए सपा के धर्मेंद्र यादव को जवाब दिया. कंगना का कहना था कि मुलायम सिंह ने कहा था कि यह कानून नौजवानों को संसद में सीटी बजाने के लिए उकसाएगा. मुलायम सिंह ने ये भी कहा था कि महिला आरक्षण बिल के मौजूदा स्वरूप से सिर्फ बड़े घरों और शहरों की लड़कियों को फायदा मिलेगा. हमारे गांव की गरीब महिलाएं ज्यादा आकर्षक नहीं होतीं. ये सारी बातें जनता के संज्ञान में हैं.


    अखिलेश की चुनौतियां

    अखिलेश यादव को यह भी डर सता रहा है कि परिसीमन से उत्तर प्रदेश की राजनीति का गणित और केमिस्ट्री बदल सकती है. परिसीमन से यूपी में 120 से ज्यादा सीटें हो सकती हैं. इससे कहीं बीजेपी को फायदा न हो जाए. हालांकि, अखिलेश यादव बड़ी चालाकी से राजनीति कर रहे हैं. पीडीए का फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में चल गया. इंडिया गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें जीतकर यह बता दिया कि लोकतंत्र में कोई भी सत्ता स्थायी नहीं होती और जनमत जब करवट लेता है, तो मजबूत से मजबूत राजनीतिक दीवारें ढह जाती हैं. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि मुलायम सिंह यादव अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी अपने बलबूते पर 36 सीटें नहीं जीत पाए थे, जो अखिलेश ने जीतकर दिखा दिया. हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा उपचुनाव में सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी लगातार झारखंड को छोड़कर महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार के चुनाव जीत चुकी है. मतलब संविधान खत्म करने और आरक्षण खत्म करने का मुद्दा फिलहाल ठंडा पड़ चुका है जो कि सिर्फ यूपी में ही चल पाया.


    अखिलेश की अग्नि परीक्षा

    भले ही अखिलेश और विपक्ष के विरोध से बिल संसद में गिर गया है, लेकिन इसका एक जोखिम भी है. शहरी और महिला वोटर्स के एक हिस्से में नकारात्मक संदेश गया है. सत्ता पक्ष अब उन्हें “महिला विरोधी” बताकर हमला करेगा. वहीं अखिलेश यह बताने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने पीडीए के हक के लिए बिल का विरोध किया. मतलब महिला आरक्षण बिल की दोधारी तलवार पर अखिलेश चल रहे हैं. जरा सी चूक हुई, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. लेकिन अगर चालाकी से चले, तो फायदा भी हो सकता है. वहीं महिलाओं के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ सरकार के कामों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जनधन योजना, शौचालय, मुफ्त सिलेंडर, किसान सम्मान निधि और प्रदेश में अपराध को लेकर जीरो टॉलरेंस, खासकर एंटी रोमियो स्क्वॉड. अब समय ही तय करेगा कि महिला आरक्षण बिल का विरोध अखिलेश के लिए राजनीतिक जोखिम साबित होता है या रणनीतिक बढ़त।

  • बंगाल चुनाव में भाजपा का बड़ा दांव, महिलाओं को ₹3000 मासिक सहायता और 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा

    बंगाल चुनाव में भाजपा का बड़ा दांव, महिलाओं को ₹3000 मासिक सहायता और 33 प्रतिशत आरक्षण का वादा

    नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया है, जहां भारतीय जनता पार्टी ने अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर दिया है। इस घोषणापत्र को ‘संकल्प पत्र’ नाम दिया गया है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने कोलकाता में जारी किया। पार्टी ने इसे राज्य के विकास और बदलाव का रोडमैप बताते हुए कई बड़े वादों की घोषणा की है।

    इस घोषणापत्र में सबसे अधिक फोकस महिलाओं, युवाओं और सरकारी कर्मचारियों पर किया गया है। महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता योजना के तहत हर पात्र महिला को प्रतिमाह तीन हजार रुपये सीधे बैंक खाते में देने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही महिलाओं को सरकारी नौकरियों में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण देने का भी वादा किया गया है, जिससे उनकी भागीदारी को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

    युवाओं के लिए भी घोषणापत्र में बड़े वादे किए गए हैं। बेरोजगार युवाओं को प्रतिमाह तीन हजार रुपये का भत्ता देने की बात कही गई है, साथ ही आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा करने का दावा किया गया है। इसके जरिए राज्य में रोजगार संकट को कम करने की रणनीति प्रस्तुत की गई है।

    शिक्षा के क्षेत्र में भी कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। लड़कियों के लिए केजी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा की बात कही गई है, जिससे शिक्षा को अधिक सुलभ और समावेशी बनाया जा सके। पार्टी का कहना है कि इस कदम से शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा।

    सरकारी कर्मचारियों के लिए भी बड़ा वादा किया गया है, जिसके तहत सरकार बनने के बाद पैंतालीस दिनों के भीतर सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और बकाया महंगाई भत्ते का भुगतान सुनिश्चित करने की बात कही गई है। इस घोषणा को कर्मचारियों को साधने की एक बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

    इसके अलावा राज्य में समान नागरिक संहिता को लेकर भी बड़ा ऐलान किया गया है। पार्टी ने कहा है कि यदि उन्हें सत्ता मिलती है तो छह महीने के भीतर समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। इस घोषणा ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।

    घोषणापत्र में सीमा सुरक्षा और घुसपैठ के मुद्दे को भी प्रमुखता दी गई है। पार्टी ने दावा किया है कि राज्य की सीमाओं को अधिक मजबूत बनाया जाएगा और अवैध गतिविधियों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। साथ ही भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विशेष कदम उठाने का वादा किया गया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घोषणापत्र चुनावी रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें विभिन्न वर्गों को सीधे आर्थिक और सामाजिक लाभ का आश्वासन देकर समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई है। वहीं सत्तारूढ़ दल की ओर से इन वादों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया आने की संभावना जताई जा रही है

  • बिहार मॉडल पर काम; बंगाल में 15 दिनों तक क्या-क्या करेंगे अमित शाह?

    बिहार मॉडल पर काम; बंगाल में 15 दिनों तक क्या-क्या करेंगे अमित शाह?

    कोलकाता पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने पिछले सप्ताह भवानीपुर में एक बड़ी चुनावी रैली के दौरान घोषणा की कि वे आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान लगातार 15 दिनों तक बंगाल में ही प्रवास करेंगे।
    वहीं, शुभेंदु अधिकारी की नामांकन रैली के दौरान शाह ने हुंकार भरते हुए कहा कि भाजपा इस बार 294 सीटों वाली विधानसभा में 175 से अधिक सीटें जीतकर एक ऐतिहासिक बदलाव लाएगी।

    अमित शाह का यह ऐलान भवानीपुर की धरती से आया, जो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का अपना निर्वाचन क्षेत्र है। भाजपा ने यहां ममता बनर्जी के कट्टर प्रतिद्वंद्वी शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है। शाह ने इस मुकाबले को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, “अगर भवानीपुर की जनता भाजपा को यहां जीत दिलाती है, तो बंगाल में सत्ता परिवर्तन अपने आप हो जाएगा। यह ममता दीदी की विदाई का सबसे छोटा रास्ता (शॉर्टकट) होगा।”

    गौरतलब है कि शुभेंदु अधिकारी ने पिछले चुनाव में नंदीग्राम से ममता बनर्जी को पराजित किया था। इस बार भाजपा ने उन्हें नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों ही हाई-प्रोफाइल सीटों से मैदान में उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।
    कैसा होगा अमित शाह का 15 दिनों का कैंप प्लान?

    सूत्रों के अनुसार, अमित शाह का यह 15 दिवसीय प्रवास केवल रैलियों तक सीमित नहीं रहेगा। वे माइक्रो-मैनेजमेंट के तहत राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रातें बिताएंगे और वॉर रूम से चुनावी कमान संभालेंगे। अमित शाह सिलीगुड़ी और बालुरघाट जैसे क्षेत्रों में रुकेंगे, जहां 2019 के बाद से भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा है। वे हुगली, खड़गपुर और दुर्गापुर जैसे इलाकों में भी डेरा डालेंगे। यहां मुख्य ध्यान उन 40 सीटों पर होगा जहां 2021 के चुनाव में भाजपा 5% से भी कम अंतर से हार गई थी।
    देर रात तक बैठकें

    शाह की रणनीति का मुख्य हिस्सा रात 2 बजे तक चलने वाली संगठनात्मक बैठकें होंगी। इनमें वे बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेंगे, नाराज नेताओं को मनाएंगे और टिकट वितरण से उपजे असंतोष को दूर करेंगे।
    MP, महाराष्ट्र और बिहार का फॉर्मूला

    अमित शाह की यह कार्यशैली नई नहीं है। इससे पहले उन्होंने मध्य प्रदेश (2023), महाराष्ट्र (2024) और बिहार (2025) के विधानसभा चुनावों में भी इसी तरह का गहन प्रवास किया था।

    बिहार में भाजपा के ऐतिहासिक प्रदर्शन और पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने की सफलता के पीछे शाह की क्लस्टर रणनीति को ही श्रेय दिया जाता है। बंगाल में भी वे राज्य को विभिन्न सांगठनिक क्लस्टरों में बांटकर खुद निगरानी करेंगे।

    2021 के चुनावों में भाजपा ने 3 से सीधे 77 सीटों पर छलांग लगाई थी और उसका वोट शेयर करीब 38% तक पहुंच गया था। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने वापसी की और भाजपा की सीटों की संख्या 18 से घटकर 12 रह गई। अब अमित शाह का पूरा जोर उन सीटों पर है जिन्हें भाजपा जीतते-जीतते हार गई थी। जलपाईगुड़ी, राजगंज और मेखलीगंज जैसे क्षेत्रों में शाह खुद रणनीति बनाएंगे ताकि पिछली गलतियों को न दोहराया जाए।

  • अमित शाह का राहुल गांधी पर कड़ा प्रहार, बोले- नक्सलियों के साथ रहते-रहते खुद बन गए नक्सलवादी

    अमित शाह का राहुल गांधी पर कड़ा प्रहार, बोले- नक्सलियों के साथ रहते-रहते खुद बन गए नक्सलवादी


    नई दिल्ली।
    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Union Home Minister Amit Shah) ने सोमवार को लोकसभा (Lok Sabha) में कांग्रेस और सदन में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर करार प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि नक्सलियों के साथ रहते-रहते एक पार्टी के नेता खुद नक्सलवादी बन गए। शाह ने देश को वामपंथी उग्रवाद से मुक्त किए जाने के मुद्दे पर सदन में हुई चर्चा का जवाब देते हुए राहुल गांधी पर नक्सलियों का समर्थन करने का आरोप लगाया। गृह मंत्री ने कहाकि राहुल गांधी जी अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई बार नक्सलियों और उनके हमर्ददों के साथ देखे गए हैं। भारत जोड़ो यात्रा में कई नक्सल फ्रंटल संगठन ने हिस्सा लिया, जिसका रिकॉर्ड भी है।


    राहुल गांधी कैसे बच सकते हैं

    अमित शाह ने दावा किया कि 2010 में ओडिशा में लाडो शिकोका के साथ राहुल ने मंच साझा किया। शिकोका ने उसी मंच से भड़काऊ भाषण दिया और उन्हें माला भी पहनाई। उन्होंने यह भी दावा किया कि 2018 में हैदराबाद में, राहुल ने जीवी राव से मुलाकात की, जो (नक्सल) विचाराधारा के करीब थे। मई 2025 में शांति समन्वय समिति (सीसीपी) के सदस्यों से मुलाकात की। विपक्षी सदस्यों के शोरगुल के बीच शाह ने कहाकि 172 जवानों को मारने वाला (माड़वी) हिडमा जब मारा गया, तो इंडिया गेट पर नारे लगे कि कितने हिडमा मारेगो, हर घर से हिडमा निकलेगा। उन्होंने कहा कि इससे संबंधित वीडियो को राहुल गांधी ने स्वयं ट्वीट किया था और ऐसे में वह कैसे बच सकते हैं।


    कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा दोषी

    शाह ने कांगेस पर निशाना साधते हुए कहा कि इन्होंने 1970 से लेकर मार्च 2026 तक नक्सलाद और नरसंहार का समर्थन किया है। उन्होंने कहाकि जो 20 हजार लोग मारे गए, उसका कोई दोषी है तो वह कांग्रेस की वामपंथी विचारधारा है…। गृह मंत्री ने राहुल पर निशाना साधते हुए कहाकि नक्सलियों के साथ रहते-रहते एक पार्टी और उसके नेता खुद नक्सलवादी बन गए। इसका जवाब इस देश की जनता को उन्हें चुनाव में देना पड़ेगा। यह बात रुकेगी नहीं। जनता की अदालत में उन्हें जवाब देना पड़ेगा। उन्होंने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि मनमोहन सिंह सरकार के दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) का गठन किया गया और इस तरह एक संविधानेत्तर मंच बनाया गया, जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी थीं।


    जयराम रमेश पर भी आरोप

    शाह ने यह दावा भी किया कि कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने महेश राउत नाम के एक नक्सली की रिहाई के लिए अपनी पार्टी शासित एक राज्य के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। उन्होंने सवाल किया कि जब केंद्र सरकार का एक संविधानेत्तर प्राधिकरण, जो प्रधानमंत्री से भी ऊपर था, के सदस्य यदि नक्सलवाद के समर्थक हों तो किस तरह से नक्सलियों का हौसला टूटेगा? और यह कांग्रेस पार्टी ने किया था। उन्होंने यह दावा भी किया कि 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब प्रधानमंत्री ग्रामीण विकास फेलोशिप शुरू की, तो उसका एक लाभार्थी नक्सलवादी बना।

    शाह ने कांग्रेस नेता पी चिदंबरम पर भी प्रहार करते हुए दावा किया कि छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के 76 जवानों के मारे जाने के बाद कांग्रेस नेता ने कहा था कि हम आपसे हथियार डालने को नहीं कह सकते। हम जानते हैं कि आप ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि आप हथियारबंद आजादी की लड़ाई में विश्वास करते हैं।

  • बिहार की राजनीति में नया मोड़ नीतीश कुमार सहित एनडीए के पांच उम्मीदवारों ने भरा राज्यसभा नामांकन

    बिहार की राजनीति में नया मोड़ नीतीश कुमार सहित एनडीए के पांच उम्मीदवारों ने भरा राज्यसभा नामांकन


    नई दिल्ली :बिहार की राजनीति में राज्यसभा चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री Nitish Kumar ने गुरुवार को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया। खास बात यह रही कि नामांकन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah भी मौजूद रहे। इस घटनाक्रम को बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इसे संभावित राजनीतिक बदलाव के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
    नामांकन प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस के पांचों दलों ने एक साथ अपना नामांकन पर्चा दाखिल किया। इनमें नीतीश कुमार के अलावा नितिन नबीन, रामनाथ ठाकुर, शिवेश कुमार राम और उपेंद्र कुशवाहा शामिल हैं। सभी उम्मीदवार बिहार विधान सभा परिसर पहुंचे और राज्यसभा चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल किया।

    नामांकन के दौरान अमित शाह की मौजूदगी ने इस प्रक्रिया को और भी राजनीतिक रूप से अहम बना दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम बिहार की आगामी राजनीतिक रणनीति से भी जुड़ा हो सकता है।

    इससे पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट साझा करते हुए बताया कि उन्होंने पटना में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह से शिष्टाचार मुलाकात की। उन्होंने अपने संदेश में जनता का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि पिछले दो दशकों से अधिक समय से बिहार की जनता ने उन पर भरोसा बनाए रखा है और उसी विश्वास के बल पर उन्होंने राज्य की सेवा पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ की है।

    अपने पोस्ट में नीतीश कुमार ने यह भी कहा कि उनके संसदीय जीवन की शुरुआत से ही यह इच्छा रही है कि वे बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ साथ संसद के दोनों सदनों के भी सदस्य बनें। इसी भावना के तहत उन्होंने इस बार राज्यसभा का सदस्य बनने की इच्छा जताई है और चुनाव मैदान में उतरने का फैसला लिया है।

    गौरतलब है कि Election Commission of India ने 18 फरवरी को देश के 10 राज्यों में खाली हो रही 37 सीटों के लिए राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया था। इन सीटों पर चुनाव इसलिए कराए जा रहे हैं क्योंकि मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त होने वाला है।

    निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान 16 मार्च को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक कराया जाएगा। इसके बाद उसी दिन शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी और परिणाम घोषित किए जाएंगे।

    नामांकन से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पटना स्थित मुख्यमंत्री आवास पहुंचे थे जहां उन्होंने नीतीश कुमार से मुलाकात की। इस बैठक में भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री Samrat Choudhary सहित कई अन्य नेता भी मौजूद रहे। बताया जा रहा है कि इस दौरान राज्यसभा चुनाव के साथ साथ बिहार की मौजूदा राजनीतिक स्थिति और आगे की रणनीति को लेकर भी चर्चा की गई।

  • नीतीश कुमार का राज्यसभा नामांकन: अमित शाह ने स्वागत किया, JDU कार्यकर्ताओं ने किया हंगामा

    नीतीश कुमार का राज्यसभा नामांकन: अमित शाह ने स्वागत किया, JDU कार्यकर्ताओं ने किया हंगामा


    नई दिल्ली। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को विधानसभा पहुंचकर राज्यसभा सदस्य के लिए नामांकन दाखिल किया। उनके साथ बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन, रामनाथ ठाकुर, उपेन्द्र कुशवाहा और शिवेश कुमार भी मौजूद रहे। इस दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कार्यक्रम में शिरकत की और नीतीश कुमार के लंबे और भ्रष्टाचार-मुक्त राजनीतिक सफर की सराहना की। शाह ने कहा कि नीतीश का कार्यकाल बिहार के इतिहास में स्वर्णिम पृष्ठ के रूप में लिखा जाएगा और उन्होंने बिहार को जंगलराज से मुक्त करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने बिहार की सड़कों और ग्रामीण विकास में भी योगदान दिया और अपनी राजनीतिक यात्रा में किसी तरह के भ्रष्टाचार का आरोप कभी नहीं लगा।

    नामांकन के बाद नीतीश कुमार ने कहा कि राज्यसभा में जाने के बावजूद वे बिहार की नई सरकार को हर तरह से सहयोग देंगे। उन्होंने अपने संसदीय जीवन के महत्व और जनता के प्रति जिम्मेदारी पर जोर दिया। नीतीश के इस ऐलान के बाद तेजस्वी यादव ने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि बिहार में महाराष्ट्र मॉडल लागू किया गया है और बीजेपी ने नीतीश को हाईजैक कर दिया। उनका कहना था कि सहयोगी पार्टी को ताकत से दबाकर नीतीश को राज्यसभा भेजा गया।

    नीतीश के राज्यसभा नामांकन की खबर मिलते ही सुबह से ही JDU कार्यकर्ता उनके मुख्यमंत्री आवास पर इकट्ठा होने लगे। कार्यकर्ताओं ने अपने नेता के प्रति समर्थन जताते हुए कहा कि वे नीतीश कुमार को कहीं नहीं जाने देंगे। इस दौरान CM हाउस के बाहर भावुक दृश्य देखने को मिले और कई कार्यकर्ता रोते हुए नजर आए। कार्यकर्ताओं ने बीजेपी कोटे के मंत्रियों सुरेंद्र मेहता, JDU MLC संजय गांधी और JDU विधायक प्रेम मुखिया को भी CM हाउस से बाहर निकाल दिया।

    JDU कार्यालय में भी नाराज कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ की और हंगामा किया। कई जिलों जैसे बेगूसराय और नालंदा में नीतीश के राज्यसभा जाने का विरोध हुआ। कार्यकर्ताओं ने ललन सिंह, विजय चौधरी, संजय झा मुर्दाबाद के नारे लगाए, जिसके कारण JDU ऑफिस का गेट बंद कर दिया गया। जदयू प्रवक्ता राजीव रंजन ने कहा कि नीतीश कुमार के योगदान की चर्चा दशकों तक होती रहेगी और कार्यकर्ताओं के लिए यह फैसला सहज रूप से अपनाना मुश्किल है, लेकिन वे इसे स्वीकार करेंगे।

    अमित शाह ने इस अवसर पर कहा कि नीतीश कुमार 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री रहे और अब लंबे अरसे के बाद राज्यसभा सांसद के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश कर रहे हैं। शाह ने उनके प्रशासनिक कौशल, सादगी और बिहार में विकास कार्यों के लिए किए गए योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने बिहार के हर गांव और घर में बिजली पहुंचाई और पीएम मोदी के नेतृत्व में सभी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाया।

    नीतीश कुमार ने भी अपने पोस्ट में कहा कि संसदीय जीवन के लिए उनका सपना है कि वे दोनों सदनों का अनुभव लें और बिहार के विकास के लिए काम करें। उन्होंने कार्यकर्ताओं और जनता से अपील की कि वे बिहार की नई सरकार को सहयोग दें और पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखें।

    राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्यसभा के लिए नीतीश का नामांकन और JDU कार्यकर्ताओं का गुस्सा बिहार में राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। यह घटना न केवल राज्य की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है, बल्कि आगामी दिनों में बिहार की सियासत में हलचल और बढ़ सकती है।

    नीतीश कुमार का यह कदम उनके समर्थकों और आलोचकों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। राज्यसभा में जाने के साथ ही वे राष्ट्रीय स्तर पर फिर से सक्रिय भूमिका निभाएंगे, वहीं कार्यकर्ताओं का विरोध और नाराजगी बीजेपी और JDU के बीच संबंधों की जटिलता को भी दर्शाता है।

  • BJP के मिशन 2027 की हरिद्वार से होगी शुरुआत, अमित शाह 7 मार्च को करेंगे शंखनाद

    BJP के मिशन 2027 की हरिद्वार से होगी शुरुआत, अमित शाह 7 मार्च को करेंगे शंखनाद


    देहरादून।
    भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party) मिशन 2027 का बिगुल हरिद्वार (Haridwar) से फूंकने जा रही है। इसीलिए पार्टी ने विशेष रणनीति के तहत सरकार के चार साल पर आयोजित किए जा रहे जश्न के कार्यक्रमों की शुरूआत हरिद्वार से करने का निर्णय लिया है। सात मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) मिशन 2027 के लिए रोडमैप तय करेंगे।


    हरिद्वार ही क्यों चुना

    दरअसल, 2022 के विधानसभा चुनावों में हरिद्वार से भाजपा बुरी तरह पिछड़ गई थी। राज्य की सत्ता में लौटने के बावजूद हरिद्वार में भाजपा का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और 11 विधानसभा सीटों में से पार्टी महज तीन सीटों पर सिमट कर रह गई। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने हरिद्वार में अपने प्रदर्शन को सुधारा। लेकिन पार्टी की असल परीक्षा अभी विधानसभा चुनावों में होनी है। इसीलिए भाजपा ने हरिद्वार पर विशेष फोकस शुरू कर दिया है। पिछले दिनों हुई पार्टी कोर ग्रुप की बैठक में हारी हुई सीटों पर फोकस करने का निर्णय लिया गया था।


    अमित शाह की शीर्ष नेताओं संग बैठक

    जिसके लिए सबसे पहले हरिद्वार को चुना गया है। सरकार के चार साल पर आयोजित होने वाले जश्न के कार्यक्रमों की शुरूआत भी इसी रणनीति के तहत हरिद्वार से की जा रही है। पार्टी सूत्रों ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सात मार्च को हरिद्वार में विशाल जनसभा को संबोधित करने के साथ ही संगठन के शीर्ष नेताओं के साथ भी बैठक करेंगे। जिसमें आगामी रणनीति पर मुहर लगाई जाएगी।


    हार के बावजूद कांग्रेस का अच्छा रहा प्रदर्शन

    हरिद्वार में 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा जहां सिर्फ तीन सीटों पर सिमट गई वहीं कांग्रेस ने पांच सीटें जीत ली थी। बाद में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने मंगलौर सीट भी अपने कब्जे में कर ली। इस समय कांग्रेस के पास हरिद्वार जिले की ज्वालापुर, भगवानपुर, झबरेड़ा, पिरान कलियर, मंगलौर और हरिद्वार ग्रामीण सीटों को मिलाकर कुल छह विधायक हैं। इसके अलावा हरिद्वार में एक सीट बसपा और एक निर्दलीय ने जीती थी।


    हरिद्वार में सिर्फ तीन सीटें जीती थी

    2022 के विधानसभा चुनावों में हरिद्वार में भाजपा सिर्फ तीन सीटों को जीत पाई थी। उनमें हरिद्वार, बीएचईएल रानीपुर और रुड़की हैं। जबकि अन्य सीटों पर कांग्रेस, बसपा और निर्दलीय उम्मीदवार जीतकर आए हैं।

  • दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों से बैठक: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बजट और प्रशासनिक मुद्दों पर जताई कड़ी अपील

    दिल्ली में केंद्रीय मंत्रियों से बैठक: मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बजट और प्रशासनिक मुद्दों पर जताई कड़ी अपील

    नई दिल्ली। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दिल्ली प्रवास के दौरान केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह से मुलाकात की, जिसमें दोनों ने राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों पर विस्तृत चर्चा की। इस बैठक में राज्य सरकार के बजट संबंधी बकाया राशि को समय पर जारी करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। चालू वित्त वर्ष में केंद्र से प्रदेश को कुल 44,000 करोड़ रुपए मिलने हैं, लेकिन जनवरी तक मात्र 9,500 करोड़ रुपए ही जारी किए जा सके हैं। इसी मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने केंद्रीय मंत्रियों से आग्रह किया कि बची हुई राशि 31 मार्च से पहले राज्य सरकार को उपलब्ध कराई जाए, ताकि प्रदेश में विकास कार्य और योजनाएं समय पर पूरी हो सकें।

    इसके अलावा मुख्यमंत्री ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से सौजन्य भेंट की। इस दौरान प्रदेश में संगठनात्मक सुधार और आगामी नियुक्तियों पर चर्चा हुई। इसी क्रम में पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से भी दिल्ली में मुलाकात की। इस बैठक में नर्मदा परियोजना के वैज्ञानिक अध्ययन और बलिदानी वीरनारी कार्यक्रम के संबंध में भी चर्चा की गई।

    मुख्यमंत्री का यह दिल्ली दौरा वित्तीय और प्रशासनिक मामलों के साथ-साथ संगठनात्मक सुधार और प्रदेश के विकास लक्ष्यों को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्रीय मंत्रियों और अन्य अधिकारियों से संवाद के जरिए प्रदेश सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि बकाया राशि समय पर मिले और विकास योजनाएं बाधा रहित ढंग से लागू हो सकें। इस दौरे में प्रशासनिक मामलों, बजट वितरण और संगठनात्मक स्थिरता के मुद्दों पर फोकस किया गया।

  • कैसे नक्सल मुक्त हुआ मध्य प्रदेश? DGP कैलाश मकवाना ने खोला रणनीति का राज, इन नेताओं को दिया श्रेय

    कैसे नक्सल मुक्त हुआ मध्य प्रदेश? DGP कैलाश मकवाना ने खोला रणनीति का राज, इन नेताओं को दिया श्रेय


    इंदौर। मध्य प्रदेश को नक्सलवाद के प्रभाव से मुक्त घोषित किए जाने के बाद पुलिस महानिदेशक DGP लाश मकवाना का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने इस उपलब्धि को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति केंद्र सरकार के स्पष्ट निर्देश और सुरक्षा एजेंसियों के समन्वित अभियान का परिणाम बताया।

    डीजीपी कैलाश मकवाना ने कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नक्सलवाद लंबे समय से एक गंभीर चुनौती रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस रणनीतिक ढंग से कार्रवाई की गई उससे प्रदेश में नक्सल नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करने में सफलता मिली। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि प्रधानमंत्री Narendra Modi और केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah की ओर से स्पष्ट निर्देश थे कि मार्च 2026 तक नक्सलवाद को समाप्त करना है। इन्हीं निर्देशों के अनुरूप प्रदेश में अभियान को तेज किया गया।

    डीजीपी ने यह भी बताया कि जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इस मुद्दे पर मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई तब पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों ने योजनाबद्ध तरीके से अभियान चलाया। लगातार सर्च ऑपरेशन संवेदनशील इलाकों में विशेष बल की तैनाती खुफिया तंत्र की मजबूती और तकनीक आधारित निगरानी से नक्सल गतिविधियों पर निर्णायक प्रहार किया गया।

    कैलाश मकवाना के अनुसार इस सफलता के पीछे केवल पुलिस कार्रवाई ही नहीं बल्कि अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल भी अहम रहा। वन क्षेत्र सीमावर्ती जिलों और पहले से चिन्हित संवेदनशील इलाकों में संयुक्त ऑपरेशन चलाए गए। स्थानीय स्तर पर विश्वास बहाली के प्रयास ग्रामीणों के साथ संवाद और विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन ने भी नक्सल संगठनों की जड़ें कमजोर कीं।

    उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल सुरक्षा बलों की नहीं बल्कि पूरे शासन-प्रशासन की सामूहिक कोशिश का परिणाम है। प्रदेश में जिन क्षेत्रों को पहले नक्सल प्रभावित माना जाता था वहां अब शांति का वातावरण है और विकास कार्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

    डीजीपी ने यह भी स्पष्ट किया कि अब फोकस केवल नक्सल गतिविधियों को खत्म करने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि शांति और विकास को स्थायी बनाए रखने पर रहेगा। संवेदनशील क्षेत्रों में लगातार निगरानी सामुदायिक पुलिसिंग और विकास योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि दोबारा किसी भी प्रकार की उग्र गतिविधियां पनपने न पाएं।