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  • बिहार निवेश के मामले में आज भी पिछड़ा राज्य… निवेशकों को आकर्षित करने में सबसे पीछे

    बिहार निवेश के मामले में आज भी पिछड़ा राज्य… निवेशकों को आकर्षित करने में सबसे पीछे


    पटना।
    बिहार (Bihar) आज भी निवेश (Investment) आकर्षित करने की कसौटी पर सबसे पिछड़ा राज्य है। आधारभूत संरचना, संसाधनों की उपलब्धता, कारोबारी माहौल और जमीन आवंटन की जटिलता के मोर्चे पर राज्य आज भी पिछड़ा है। नीति आयोग (NITI Aayog) की हालिया रैकिंग रिपोर्ट (Ranking Report) में बिहार देश के बड़े 17 राज्यों में सबसे नीचे 17वें स्थान पर और 36 राज्यों में 26वें स्थान पर है। नीति आयोग द्वारा जुलाई 2026 में जारी निवेश अनुकूल सूचकांक में बिहार को देश के तीसरे श्रेणी के राज्यों में शामिल किया गया है।

    रिपोर्ट में राज्य को सौ अंकों में कुल 41.2 अंक ही प्राप्त हुए हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट में मानकों के अनुरूप राज्यों को चार श्रेणियों में बांटा गया है। तीसरी श्रेणी (40 से 45 अंक) में बिहार के साथ झारखंड, पंजाब, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, मेघालय, नागालैंड और पुदुचेरी शामिल हैं। वहीं, उच्च प्रदर्शन (50 से अधिक अंक) वाले पांच राज्यों में गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और तामिलनाडु शामिल हैं।


    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निचले पायदान पर

    निवेश अनुकूल सूचकांक में बताया गया है कि बिहार में वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) सिर्फ 0.16 मिलियन डॉलर रहा जबकि इसी वित्तीय वर्ष में महाराष्ट्र में 15,116 मिलियन डॉलर, दिल्ली में 6523.43 मिलियन डॉलर और कर्नाटक में 6571 मिलियन डॉलर रहा। कुल एफडीआई का 85 प्रतिशत हिस्सा महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, तामिलनाडु को मिल जाता है। इसी तरह पेटेंट के मामले में भी बिहार फिसड्डी रहा। रिपोर्ट के अनुसार बिहार से वित्तीय वर्ष 2023 में कंपनियों द्वारा कुल दाखिल पेटेंट का 0.48 प्रतिशत ही दाखिल हो सका।

    जबकि देश के बड़े राज्यों का औसत पेटेंट दाखिल करने की दर 3.6 प्रतिशत रही। रिपोर्ट में राज्य में समर्पित(डेडिकेटेड) औद्योगिक पार्क, औद्योगिक आधारभूत संरचना के अलावा निवेश आकर्षित करने के लिए संरक्षा और सुरक्षा की दिशा में काम करने की सलाह दी गई है। आधारभूत संरचना, कारोबारी माहौल, संसाधन, सरकारी नीतियां, विनियामक सुगमता, वित्तीय सेहत, संस्थागत वातावरण (इंस्टीटयूशनल इन्वायरमेंट) और पर्यावरणीय लचीलापन की बात भी कही गई।


    दूरगामी रणनीति अपनानाी होगी

    अर्थशास्त्री और नालंदा विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर सुधांशु कुमार के अनुसार निवेश अनुकूल सूचकांक में बिहार की खराब स्थिति चिंता का विषय है। बड़े राज्यों में सबसे नीचे बिहार की स्थिति राज्य की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों को उजागर करती है जो पहले भी कई अध्ययनों में सामने आती रही हैं। नवाचार और एमएसएमई आधार दोनों ही पिछड़े हैं, जबकि सुरक्षा, भूमि आवंटन और रोजगार की कमी निवेशकों को रोकती है। रिपोर्ट के अनुसार प्रति व्यक्ति जीएसडीपी बड़े राज्यों के औसत से 72 फीसदी कम है। निर्णायक दृष्टि और समयबद्ध दूरगामी रणनीति अपनाकर बिहार निम्न विकास के जाल से बाहर निकल सकता है और एक सशक्त आर्थिक भविष्य की ओर बढ़ सकता है।


    क्या है निवेश अनुकूल सूचकांक

    निवेश अनुकूल सूचकांक के तहत देश के विभिन्न राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में निवेशक और व्यवसाय के लिए कितना अनुकूल माहौल है। इसका मूल्यांकन किया गया है। नीति आयोग ने देश में पहली बार राज्यों की निवेश तैयारियों का मूल्यांकन कर रिपोर्ट और रैंकिंग जुलाई 2026 में जारी की है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार देश में मजबूत निवेश पारिस्थितिकी तंत्र(इकोसिस्टम) विकसित कर देश को 2047 तक विकसित देश बनाने के उद्देश्य से इस सूचकांक को जारी किया गया है। इसमें देश के सभी 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश को विभिन्न श्रेणियों के तहत शामिल किया गया है।


    कमियां गिनाईं, सुझाव दिये

    1. बिहार में भूमि आवंटन प्रक्रिया जटिल और उलझाऊ है
    2. रोजगार के अवसर सीमित हैं।
    3. राज्य के द्वितीय और तृतीय श्रेणी वाले शहरों में वायु संपर्कता कम है
    4. बिजली की निर्बाध उपलब्धता के लिए अभी और काम करने की जरूरत है
    5. निवेश आकर्षित करने के लिए संरक्षा और सुरक्षा पर फोकस करने की जरुरत

  • तिब्बत-नेपाल सीमा पर एक और झील फटने से बढ़ा खतरा, बिहार के इन क्षेत्रों में हाई अलर्ट

    तिब्बत-नेपाल सीमा पर एक और झील फटने से बढ़ा खतरा, बिहार के इन क्षेत्रों में हाई अलर्ट


    पटना।
    कुदरत के कहर से जूझ रहे नेपाल (Nepal) पर शुक्रवार को खतरा तब और बढ़ गया, जब तिब्बत-नेपाल सीमा (Tibet-Nepal border) पर बनी एक और झील फट गई। संभावित खतरे से निबटने के लिए बिहार के सभी तटबंधों की चौकसी बढ़ा दी गई है। सरकार के आदेश पर वाल्मीकिनगर एवं कोसी बराज (Kosi Barrage) पर सतर्कता बढ़ा दी गई है। विशेषकर गंडक नदी के जलस्तर में हो रहे उतार-चढ़ाव और भारी मात्रा में मलबा के आगमन को देखते हुए जल संसाधन विभाग ने सारण तटबंध सहित सभी महत्वपूर्ण तटबंधों की चौबीसों घंटे निगरानी का आदेश दिया गया है।


    पड़ोसी देश में जलप्रलय के बाद कोसी बराज पर बढ़ी सतर्कता

    नेपाल में आई बाढ़ से भारी तबाही के बाद वीरपुर बराज पर निगरानी कड़ी कर दी गई है। कोसी बराज के 56 में से 17 फाटक खोल दिए गए हैं। जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार पूर्वी और पश्चिमी दोनों तटबंध पूरी तरह सुरक्षित हैं। सभी स्पर, स्टड एवं अन्य संरचनाओं की स्थिति सामान्य है। कंट्रोल रूम के अनुसार शुक्रवार सुबह आठ बजे कोसी बराज से घटते क्रम में 1,42,360 क्यूसेक पानी डिस्चार्ज दर्ज किया गया। इसी समय बराह क्षेत्र में 90,800 क्यूसेक दर्ज किया गया। दोपहर 12 बजे कोसी बराज का डिस्चार्ज 1,34,225 क्यूसेक दर्ज हुआ, जबकि बराह में बढ़कर 99,500 क्यूसेक रहा। शाम छह बजे कोसी बराज का डिस्चार्ज बढ़कर 1,44,775 क्यूसेक पहुंच गया। बराह में डिस्चार्ज 99,500 क्यूसेक रहा। विभाग अलर्ट है। नेपाल के भोटे कोशी से 10 हजार क्यूसेक तक अतिरिक्त पानी आने की संभावना है, जिसका कोसी के प्रवाह पर असर पड़ने की संभावना नहीं है।


    दिन रात काम कर रही इंजीनियरों की टीम

    संभी संबंधित अधिकारियों को अलर्ट रहने का निर्देश दे दिया गया है, ताकि बाढ़ आने पर तुरंत आवश्यक कार्रवाई शुरू कर दी जाए। जल संसाधन विभाग ने संबंधित जिलों के पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों को भी अलर्ट मोड में रहने को कहा है। संबंधित जिले के जिलाधिकारी अपने अधीन तटबंधों की लगातार निगरानी कर रहे हैं। जल संसाधन विभाग के मुख्यालय स्तर पर हर आधे घंटे पर गंडक नदी के डिस्चार्ज की जानकारी ली जा रही है। इंजीनियरों की टीम चौबीसो घंटे काम कर रही है।


    क्या बोले डिप्टी सीएम विजय चौधरी?

    उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा कि ग्लेशियर फटने से नेपाल में बाढ़ की तबाही हुई है। लेकिन बिहार के वाल्मिकीनगर अवस्थित गंडक बराज से नेपाल के उस केंद्रबिंदु की दूरी लगभग 250-300 किलोमीटर है। इस कारण नेपाल से आने वाले पानी का प्रवाह-प्रभाव नीचे आते-आते कम हो गया है। इसका लाभ बिहार को हुआ। इसके अलावा गंडक के पूरे प्रवाह में पहले से भी सामान्य से कम पानी था। खतरे के निशान से नदी बह रही थी। इसलिए जो भी पानी आया, उससे बहुत भयावह स्थिति नहीं बनी। शुक्रवार को गंडक में वाल्मीकिनगर बराज के समीप लगभग एक लाख क्यूसेक पानी का डिस्चार्ज होता रहा।


    नेपाल की दो दर्जन नदियों से उत्तर बिहार को खतरा

    नेपाल की पहाड़ियों से आने वाली गंडक समेत दो दर्जन से अधिक पहाड़ी नदियों से पश्चिम चंपारण जिले समेत उत्तर बिहार को खतरा है। नेपाल की त्रिशूली नदी जैसा हादसा सीमावर्ती क्षेत्रों में होने पर पश्चिम चंपारण समेत उत्तर बिहार में गंडक व सिकरहना तबाही मचा सकती हैं। नेपाल से आने वाली नारायणी नदी ही भारत में गंडक के नाम से जानी जाती है। इसमें काली गंडक, मर्स्यांगदी, माड़ी और सेती नदियां आकर मिलती हैं। नेपाल के देवघाट के पास नारायणी में त्रिशूली नदी मिलती है।

    नेपाल डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के समन्वयक डॉ. विवास बहादुर बस्न्यात व नवलपरासी जिले के वरिष्ठ जल विज्ञानी बिनोद पराजुली बताते हैं कि त्रिशूली नदी तिब्बत के क्यिरोंग जिले की पेखु कांगरी पर्वतमाला से निकलती है। त्रिशूली नदी अपने साथ भोटेकोशी, ल्हेन्दे खोला, मैलमंग खोला, चिलीमे खोला, आंखू खोला और बूढ़ी गंडक नदी को लेकर नारायणी में मिलती है। ऊंची पहाड़ियों से निकलने के कारण यह नदी बेहद खतरनाक मानी जाती है। त्रिशूली नदी में ही बाढ़ के कारण नेपाल में भारी तबाही मची है। दोबारा झील टूटने से इसका असर भारतीय क्षेत्र पर भी पड़ सकता है।


    तिब्बत के नाले से निकली गंडक, नाम जुगूं खोला था

    नदियों के विशेषज्ञ देवी लाल यादव ने बताया कि गंडक तिब्बत के कागबेनी के नाले से निकलती है। यहां उसका नाम जुगूं खोला है। अन्नपूर्णा के पास यह काली गंडकी के नाम से जानी जाती है। इसमें ठाकुर जी मिलती हैं। आगे बढ़ने पर कृष्णा गंडकी और देवघाट में नारायणी के नाम से जानी जाती है। बराज से पूर्व यह गंडक हो जाती है। नेपाल में 123 लेक आउट हैं। इन झीलों पर अवरोधक बने हुए हैं। कभी भी इनमें बर्स्ट आउट हो सकता है। इससे भारी तबाही मच सकती है।

    सिकरहना लाई थी तबाही
    रामनगर और गौनाहा से आने वाली डेढ़ दर्जन पहाड़ी नदियां लौरिया, चनपटिया व सिकटा में आकर सिकरहना से मिलती हैं। 2017 में सिकरहना में बाढ़ आने पर चंपारण, मुजफ्फरपुर समेत बेगूसराय में तबाही मची थी।

    बताते चलें कि 26 अगस्त को नेपाल में प्रलयंकारी बाढ़ आ गई थी। पानी गंडक में प्रवाह होने से गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर जिले में बाढ़ आने की संभावना जताई गई थी। इसे देखते हुए जल संसाधन विभाग ने गंडक बराज पर मुख्यालय स्तर से अधीक्षण अभियंता के नेतृत्व में एक तकनीकी दल को तैनात कर दिया है। गंडक बराज के सभी 36 गेटों को खोल दिया है, ताकि नेपाल से आने वाला बाढ़ का पानी निकल सके।

  • बिहार में गंगा के तेज बहाव में मजदूरों से भरी नाव डूबी, 19 ने तैरकर बचाई जान, 2 लापता

    बिहार में गंगा के तेज बहाव में मजदूरों से भरी नाव डूबी, 19 ने तैरकर बचाई जान, 2 लापता


    पटना। बिहार के नवगछिया स्थित राघोपुर में गंगा के तेज बहाव के बीच तटबंध मरम्मत में लगी बालू से लदी नाव पलटकर डूब गई। नाव में कुल 21 मजदूर सवार थे। हादसे के बाद 19 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया, जबकि दो मजदूर अब भी लापता हैं। दोनों की तलाश में एसडीआरएफ की टीम गंगा में सर्च ऑपरेशन चला रही है।

    हादसे का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें तेज बहाव के बीच नाव अचानक पलटती और देखते ही देखते नदी में समाती दिखाई दे रही है। हादसे के बाद कुछ मजदूर तैरकर बाहर निकले, जबकि मौके पर पहुंची एसडीआरएफ टीम ने भी रेस्क्यू कर लोगों को सुरक्षित निकाला।

    किन लोगों की तलाश जारी
    चश्मदीद वेदानंद कुमार के मुताबिक, नाव को किनारे लाया जा रहा था, लेकिन तेज धारा उसे फिर बीच नदी में खींच ले गई। इसी दौरान नाव पलट गई। नाव में मजदूरों के अलावा दो मांझी भी मौजूद थे। लापता लोगों की पहचान भागलपुर के लोदीपुर निवासी मजदूर बादल मंडल और नवगछिया के तीनटंगा निवासी मांझी सिकंदर मंडल के रूप में हुई है।

    डीएम अलंकृता पांडे ने बताया कि 19 लोगों को बचा लिया गया है और दो की तलाश जारी है। प्रारंभिक तौर पर नदी में भंवर बनने से नाव पलटने की आशंका है। उन्होंने यह भी कहा कि मजदूरों के लिए लाइफ जैकेट अनिवार्य होने के निर्देश के पालन में चूक हुई।

    नाव से काम पर रोक, ट्रैक्टर से जारी रहेगा काम

    डीएम के मुताबिक, मामले में संबंधित वेंडर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाएगी। सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन कॉन्ट्रैक्टर्स की थी, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल नावों से काम रोक दिया गया है और ट्रैक्टरों के जरिए तटबंध का सुरक्षा कार्य जारी रखा जाएगा।

    दो दिन पहले टूटा था तटबंध
    राघोपुर-काजीकोरैया तटबंध दो दिन पहले सुबह करीब 3 बजे टूट गया था। यह स्थान बिहार के ऊर्जा मंत्री बुलो मंडल के आवास से करीब 300 मीटर दूर है। तटबंध टूटने के बाद मंत्री के आवास समेत आसपास के सैकड़ों घरों में बाढ़ का पानी घुस गया।

    तटबंध के टूटे हिस्से को बंद करने और कटाव रोकने के लिए जल संसाधन विभाग ने 300 से ज्यादा मजदूरों को लगाया है। बालू की बोरियों, बांस-बल्लियों और हाथी पांव की मदद से नदी के दबाव को कम करने की कोशिश की जा रही है।

    खतरे के निशान से ऊपर गंगा
    गंगा का जलस्तर लगातार चिंता बढ़ा रहा है। नदी 33.68 मीटर के खतरे के निशान से ऊपर बह रही है और जलस्तर 33.95 मीटर तक पहुंच गया है। तेज करंट और जगह-जगह मिट्टी दरकने के कारण तटबंध की मरम्मत में मुश्किलें आ रही हैं। हालांकि, फरक्का बैराज के सभी फाटक खोल दिए गए हैं। इससे आने वाले दिनों में गंगा के जलस्तर में कमी आने की उम्मीद जताई जा रही है।

  • मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    मखाने की खेती को मिल रहा तकनीक और निर्यात का सहारा, उत्पादन बढ़ने से बिहार सहित किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार

    नई दिल्ली ।भारत का मखाना क्षेत्र आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार करने की दिशा में बढ़ रहा है। बढ़ती घरेलू मांग, बेहतर बाजार कीमत, उत्पादन में वृद्धि और निर्यात के विस्तार के कारण वर्ष 2029-30 तक देश का मखाना बाजार 11 हजार से 12 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचने की संभावना जताई गई है। केंद्र सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, मखाना अब केवल पारंपरिक खाद्य उत्पाद नहीं रह गया है, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक और प्रीमियम स्नैक के रूप में घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रहा है।

    वित्त वर्ष 2021-22 से 2024-25 के बीच मखाना उत्पादन में करीब 4 से 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन इसी अवधि में इसकी औसत कीमत लगभग 500 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। कीमतों में यह वृद्धि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं की बढ़ती मांग, प्रीमियम उत्पादों की लोकप्रियता और सीमित आपूर्ति जैसे कारणों से जुड़ी है।

    मखाने को कम वसा और पोषण से भरपूर खाद्य पदार्थ के रूप में देखा जाता है। पौध-आधारित भोजन और क्लीन-लेबल उत्पादों की ओर बढ़ते वैश्विक रुझान ने भी इसकी मांग को मजबूत किया है। घरेलू बाजार के साथ विदेशों में भी भारतीय मखाने की खपत बढ़ रही है, जिससे किसानों और प्रसंस्करण से जुड़े कारोबार के लिए नए अवसर पैदा हो रहे हैं।

    वर्ष 2024-25 में देश में मखाने का कुल उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन रहा था। इस दौरान औसत उत्पादकता 2.03 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई। वर्ष 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान में उत्पादन बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन और उत्पादकता 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर पहुंचने की संभावना है। उत्पादन और उत्पादकता में यह बढ़ोतरी खेती के आधुनिक तरीकों के बढ़ते इस्तेमाल को दर्शाती है।

    मखाना उत्पादन में बिहार देश का प्रमुख राज्य है। वर्ष 2025-26 में बिहार का उत्पादन लगभग 60 हजार मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। राज्य में औसत उत्पादकता करीब 2 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी सबसे बड़ी होने के कारण मखाना क्षेत्र के विस्तार का सीधा लाभ राज्य के किसानों को मिलने की संभावना है।

    पारंपरिक तौर पर मखाने की खेती तालाबों और जलाशयों में की जाती रही है, लेकिन अब फील्ड सिस्टम खेती और उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। स्वर्ण वैदेही और सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों से पैदावार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इससे खेती के दायरे का विस्तार करने और उत्पादन से जुड़े जोखिम कम करने में भी मदद मिल रही है।

    भारत हर साल 60 हजार मीट्रिक टन से अधिक मखाने का उत्पादन करता है। इसमें करीब 40 प्रतिशत हिस्सा निर्यात होता है, जो लगभग 23 हजार से 25 हजार मीट्रिक टन के बराबर है। शेष उत्पादन की खपत घरेलू बाजार में होती है। घरेलू मखाना बाजार ने 2021-22 से 2024-25 के बीच करीब 17 से 18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की है।

    सरकार ने इस क्षेत्र की संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय बजट 2025-26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की थी। इसके अलावा 2025-26 से 2030-31 के लिए 476.03 करोड़ रुपये की मखाना विकास केंद्रीय क्षेत्र योजना को मंजूरी दी गई है। इसके तहत अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, किसानों का कौशल विकास, कटाई के बाद प्रबंधन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात को बढ़ावा दिया जाएगा।

    मखाना क्षेत्र में उत्पादन और बाजार दोनों के विस्तार से किसानों को बेहतर कीमत और नए बाजार मिलने की संभावना है। यदि उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रसंस्करण क्षमता में लगातार सुधार होता है, तो भारतीय मखाना वैश्विक प्रीमियम स्नैक बाजार में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

  • जनगणना 2027 में जाति के सवाल पर गिरिराज सिंह का राहुल गांधी पर हमला, बोले अपनी जाति बतानी पड़ेगी

    जनगणना 2027 में जाति के सवाल पर गिरिराज सिंह का राहुल गांधी पर हमला, बोले अपनी जाति बतानी पड़ेगी

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना 2027 के लिए सवालों की सूची जारी कर दी है। इस बार जनगणना में जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी। इसी मुद्दे को लेकर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि अब उन्हें भी अपनी जाति बतानी पड़ेगी। उनके इस बयान के बाद जाति जनगणना का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

    गिरिराज सिंह ने कहा कि जनगणना में जब जाति से संबंधित जानकारी मांगी जाएगी तो राहुल गांधी को भी अपनी जाति बतानी होगी। उन्होंने राहुल गांधी पर राजनीतिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि उन्हें अपनी जाति के बारे में जवाब देना पड़ा तो उनके लिए स्थिति अलग हो सकती है। केंद्रीय मंत्री ने इस दौरान राहुल गांधी के राजनीतिक रुख पर भी सवाल उठाए।

    जनगणना 2027 के लिए जारी किए गए प्रश्नों में जाति से संबंधित सवाल को विशेष रूप से शामिल किया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार जाति संबंधी प्रश्न सूची में 10वें स्थान पर है। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के साथ जाति की जानकारी का विकल्प भी जोड़ा गया है। यह बदलाव सामाजिक संरचना से जुड़ा विस्तृत आंकड़ा तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    आजादी के बाद होने वाली जनगणनाओं के संदर्भ में यह प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस बार सभी समुदायों की जाति संबंधी जानकारी दर्ज किए जाने की व्यवस्था की गई है। वर्ष 2011 की जनगणना के फॉर्म में जाति से जुड़े सवाल के तहत मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित जानकारी दर्ज की जाती थी।

    नई जनगणना में केवल जाति तक सीमित जानकारी नहीं ली जाएगी। व्यक्ति का नाम, परिवार के मुखिया से संबंध, वैवाहिक स्थिति, विवाह के समय उम्र, पति या पत्नी का नाम, राष्ट्रीयता और धर्म जैसे विषयों से संबंधित जानकारी भी दर्ज की जाएगी। इसके साथ माता-पिता से जुड़ी जानकारी भी जनगणना प्रक्रिया का हिस्सा होगी।

    शिक्षा और डिजिटल साक्षरता को लेकर भी सवाल पूछे जाने हैं। व्यक्ति किसी शैक्षणिक संस्थान में पढ़ रहा है या नहीं, उसकी उच्चतम शैक्षणिक योग्यता क्या है और संबंधित अध्ययन क्षेत्र कौन सा है, जैसी जानकारियां दर्ज की जाएंगी। इससे देश की शिक्षा व्यवस्था और मानव संसाधन से जुड़े आंकड़ों को बेहतर तरीके से समझने में मदद मिल सकती है।

    जनगणना में लोगों की आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी जानकारी भी जुटाई जाएगी। व्यक्ति ने पिछले एक वर्ष में काम किया है या नहीं, उसका व्यवसाय क्या है और वह किस क्षेत्र में कार्य करता है, जैसे प्रश्न शामिल किए गए हैं। कामगार की श्रेणी और काम से जुड़ी अन्य गतिविधियों के बारे में भी जानकारी ली जाएगी।

    इसके अलावा काम की तलाश, काम करने की उपलब्धता और कार्यस्थल तक आने जाने से जुड़े विवरण भी दर्ज किए जाएंगे। जनगणना के दौरान मोबाइल नंबर, आधार, मतदाता पहचान पत्र और बैंक खाते से संबंधित सवालों को भी शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    जाति जनगणना को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच पहले से राजनीतिक मतभेद रहे हैं। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लंबे समय से जातिगत आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में जनगणना 2027 में जाति संबंधी जानकारी शामिल किए जाने का निर्णय राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • पूर्णिया के झंडा चौक पर 1947 की ऐतिहासिक रात से लगातार निभाई जा रही मध्यरात्रि ध्वजारोहण की अनोखी परंपरा।

    पूर्णिया के झंडा चौक पर 1947 की ऐतिहासिक रात से लगातार निभाई जा रही मध्यरात्रि ध्वजारोहण की अनोखी परंपरा।

    नई दिल्ली । स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब पूरा देश 15 अगस्त की सुबह राष्ट्रीय ध्वज फहराने और जश्न की तैयारियों में जुटा होता है, वहीं बिहार के पूर्णिया जिले में एक अनोखी और ऐतिहासिक परंपरा दशकों से निभाई जा रही है। शहर के भट्ठा बाजार स्थित प्रसिद्ध झंडा चौक पर 14 अगस्त की मध्यरात्रि ठीक 12 बजकर 01 मिनट पर तिरंगा फहराया जाता है। स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी यह ऐतिहासिक और गौरवशाली परंपरा विगत 79 वर्षों से लगातार बिना किसी रुकावट के जारी है।

    इस अनूठी परंपरा की शुरुआत 14 अगस्त 1947 की उस ऐतिहासिक रात को हुई थी, जब पूरा देश आजादी की औपचारिक घोषणा का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। उस वक्त पूर्णिया के स्थानीय नागरिक और स्वतंत्रता सेनानी भट्ठा बाजार स्थित एक दुकान के बाहर रेडियो पर प्रसारित हो रहे समाचार सुन रहे थे। जैसे ही ऑल इंडिया रेडियो पर देश के स्वतंत्र होने की आधिकारिक घोषणा हुई, पूरा क्षेत्र देश भक्ति के जयकारों से गूंज उठा।

    स्वतंत्रता सेनानी रामेश्वर प्रसाद सिंह और उनके सहयोगियों ने तय किया कि आजादी की पहली सांस के साथ ही राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा। उन्होंने तुरंत बांस और रस्सी की व्यवस्था की और रात ठीक 12:01 बजे तिरंगा फहरा दिया। इस ऐतिहासिक घटना के बाद ही उस स्थान का नाम औपचारिक रूप से ‘झंडा चौक’ रखा गया और वहां मौजूद लोगों ने हर वर्ष इस परंपरा को इसी समय दोहराने का सामूहिक संकल्प लिया।

    वर्ष 1947 में ली गई वह शपथ आज भी पूरी निष्ठा और राष्ट्रीय सम्मान के साथ निभाई जा रही है। शुरुआत करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के निधन के बाद उनकी अगली पीढ़ियां इस धरोहर और परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। स्थानीय नागरिक और सामाजिक कार्यकर्ता हर साल 14 अगस्त की रात झंडा चौक पर एकत्र होते हैं और घड़ी की सुई 12:01 पर पहुंचते ही राष्ट्रगान और देशभक्ति के नारों के साथ ध्वजारोहण करते हैं।

    मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में स्वतंत्रता दिवस को लेकर अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। भोपाल, इंदौर और ग्वालियर जैसे शहरों में जहां 15 अगस्त की सुबह प्रभात फेरियों और मुख्य समारोहों के साथ तिरंगा फहराया जाता है, वहीं बिहार के पूर्णिया की यह मध्यरात्रि ध्वजारोहण की परंपरा पूरे देश के लिए कौतूहल और प्रेरणा का विषय बनी रहती है।

    हर साल की तरह इस बार भी 14 अगस्त की देर रात झंडा चौक पर भारी संख्या में जनसैलाब उमड़ा। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के हाथों में राष्ट्रीय ध्वज नजर आया। रोशनी से जगमगाते चौराहे पर रात 12:01 बजते ही जैसे ही तिरंगा लहराया गया, पूरा माहौल भारत माता की जय और वंदे मातरम के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।

    यह ऐतिहासिक आयोजन केवल एक रस्म नहीं बल्कि उन अमर सेनानियों के प्रति श्रद्धांजलि है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। पूर्णिया वासियों के लिए यह क्षण अत्यंत गर्व और स्वाभिमान का प्रतीक है, जो नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और राष्ट्रीय इतिहास से जोड़े रखता है।

    स्थानीय प्रशासन और पुलिस विभाग द्वारा भी इस वार्षिक आयोजन के अवसर पर सुरक्षा और व्यवस्था के व्यापक इंतजाम किए जाते हैं। 79 वर्षों से चली आ रही यह निष्ठा साबित करती है कि देशभक्ति का यह जज्बा आने वाले कई दशकों तक इसी तरह अमर रहेगा।

  • भारत ने 20 से अधिक देशों में 7 हजार टन से ज्यादा मखाना भेजा, बिहार के किसानों को मिला वैश्विक बाजार का लाभ

    भारत ने 20 से अधिक देशों में 7 हजार टन से ज्यादा मखाना भेजा, बिहार के किसानों को मिला वैश्विक बाजार का लाभ

    नई दिल्ली ।भारत का मखाना निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में नई ऊंचाई पर पहुंचा है। इस अवधि में भारत ने 20 से अधिक देशों को 7,000 मीट्रिक टन से ज्यादा मखाना और उससे बने मूल्यवर्धित उत्पादों का निर्यात किया। अमेरिका, मध्य पूर्व और अफ्रीकी देशों सहित कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय मखाने की मांग बढ़ने से बिहार के किसानों और इस क्षेत्र से जुड़े उद्योग को नए अवसर मिल रहे हैं।

    मखाना उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। देश के कुल मखाना उत्पादन का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा बिहार में होता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में भारतीय मखाने की बढ़ती मांग का सीधा लाभ राज्य के उत्पादकों, प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यातकों को मिल सकता है।

    मखाना निर्यात को बेहतर तरीके से दर्ज करने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी अलग पहचान बनाने के लिए केंद्र सरकार ने जुलाई 2025 से इसके लिए अलग एचएस कोड लागू किया है। इससे मखाने के व्यापार और निर्यात से जुड़े आंकड़ों की निगरानी अधिक स्पष्ट तरीके से की जा सकेगी।

    इसी क्रम में बिहार से जीआई टैग प्राप्त मिथिला मखाने की पहली व्यावसायिक समुद्री खेप ऑस्ट्रेलिया भेजी गई है। इस खेप के जरिए बिहार के एक प्रमुख भौगोलिक संकेतक उत्पाद ने नए अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश किया है। बिहटा स्थित औद्योगिक क्षेत्र से 18 मीट्रिक टन मिथिला मखाना ऑस्ट्रेलिया भेजा गया।

    इस खेप के लिए मखाना दरभंगा जिले के किसानों से खरीदा गया था। निर्यात से जुड़ी इस पहल का उद्देश्य बिहार के स्थानीय उत्पाद को वैश्विक बाजार से जोड़ना और किसानों को बेहतर मूल्य दिलाने वाली आपूर्ति श्रृंखला तैयार करना है।

    इस निर्यात प्रक्रिया से जुड़े किसानों को मौजूदा बाजार भाव की तुलना में करीब 18 प्रतिशत अधिक कीमत मिलने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि किसानों को सीधे निर्यात आधारित बाजारों से जोड़ने और मूल्यवर्धित आपूर्ति श्रृंखला विकसित करने से उनकी आमदनी बढ़ाने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

    मखाने की वैश्विक मांग बढ़ने के पीछे स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों के प्रति उपभोक्ताओं की बढ़ती रुचि को भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। ऐसे में भारतीय मखाना कृषि आधारित निर्यात के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उत्पाद के रूप में अपनी जगह मजबूत कर सकता है।

    बिहार सरकार भी मखाना क्षेत्र की पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने पर जोर दे रही है। इसमें किसानों के साथ प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यातकों को सहयोग देने तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों की जरूरत के अनुरूप गुणवत्ता बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

    राज्य के कृषि मंत्री ने मखाने को बिहार की पहचान से जुड़ा उत्पाद बताते हुए कहा है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बिहार आधारित निर्यातकों की भागीदारी बढ़ने से किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। उन्होंने वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए गुणवत्ता मानकों के पालन को महत्वपूर्ण बताया।

    मखाना प्रसंस्करण से जुड़े फोरी समुदाय की पारंपरिक विशेषज्ञता को भी इस उद्योग की महत्वपूर्ण ताकत माना गया है। राज्य सरकार की ओर से इस समुदाय समेत मखाना क्षेत्र से जुड़े अन्य हितधारकों को सहयोग जारी रखने की बात कही गई है।

    ऑस्ट्रेलिया में जीआई टैग वाले मिथिला मखाने की पहली समुद्री खेप पहुंचना बिहार के कृषि उत्पादों के लिए नए बाजारों के विस्तार का संकेत है। आने वाले समय में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, मध्य पूर्व और अफ्रीकी देशों में मांग बढ़ने से मखाना उद्योग में प्रसंस्करण, निर्यात और रोजगार के नए अवसर बन सकते हैं। इससे बिहार के किसानों को घरेलू बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय मूल्य श्रृंखला से जुड़ने का अतिरिक्त अवसर मिलेगा।

  • पीयूष गोयल बोले- मिथिला मखाना की बढ़ती विदेशी मांग से बिहार के किसानों को मिल रहे आय और रोजगार के नए अवसर

    पीयूष गोयल बोले- मिथिला मखाना की बढ़ती विदेशी मांग से बिहार के किसानों को मिल रहे आय और रोजगार के नए अवसर

    नई दिल्ली । बिहार के प्रसिद्ध जीआई टैग प्राप्त मिथिला मखाना ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को बताया कि बिहार से पहली बार 18 मीट्रिक टन मिथिला मखाना समुद्री मार्ग के जरिए ऑस्ट्रेलिया निर्यात किया गया है। इस उपलब्धि को राज्य के किसानों और कृषि निर्यात क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का कहना है कि विदेशी बाजारों में मिथिला मखाना की बढ़ती मांग से बिहार के किसानों के लिए आय बढ़ाने और नए कारोबारी अवसर पैदा होने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।

    पीयूष गोयल ने बताया कि कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से जीआई टैग वाले मिथिला मखाना की खेप ऑस्ट्रेलिया भेजी गई। खास बात यह रही कि निर्यात के लिए मखाना सीधे दरभंगा के किसानों से खरीदा गया। इससे स्थानीय उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ने का अवसर मिला। मंत्री के अनुसार, इस पहल में शामिल किसानों को सामान्य बाजार भाव की तुलना में लगभग 18 प्रतिशत अधिक लाभ प्राप्त हुआ है। इससे मखाना उत्पादन से जुड़े किसानों की आय बढ़ाने की संभावनाओं को बल मिला है।

    मिथिला मखाना बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मिथिला क्षेत्र में उत्पादित यह कृषि उपज अपनी गुणवत्ता, स्वाद और पौष्टिकता के लिए देश के साथ-साथ विदेशी बाजारों में भी पहचान बना रही है। बदलती खाद्य आदतों के बीच मखाना स्वास्थ्यवर्धक स्नैक के रूप में तेजी से लोकप्रिय हुआ है। कम तेल में तैयार किए जाने वाले और विभिन्न स्वादों में उपलब्ध मखाने की मांग विशेष रूप से शहरी तथा अंतरराष्ट्रीय उपभोक्ता बाजार में बढ़ी है।

    ऑस्ट्रेलिया को समुद्री मार्ग से हुआ यह निर्यात ऐसे समय में हुआ है, जब बिहार के मखाना उत्पाद लगातार नए विदेशी बाजारों में पहुंच बना रहे हैं। इससे पहले बिहार से पहली बार समुद्री मार्ग के जरिए कनाडा को भी मखाना निर्यात किया गया था। उस दौरान दरभंगा से सात मीट्रिक टन फ्लेवर्ड मखाना कनाडा भेजा गया था। इस निर्यात को भी कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया था।

    विदेशी बाजारों में बढ़ती मांग का असर केवल मखाना किसानों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। निर्यात बढ़ने से मखाना की सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और मूल्य संवर्धन से जुड़े कारोबार को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। इससे बिहार में कृषि आधारित छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय मांग लगातार बनी रहती है तो स्थानीय स्तर पर मखाना प्रसंस्करण केंद्रों और आधुनिक पैकेजिंग सुविधाओं के विस्तार को भी बढ़ावा मिल सकता है।

    ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे बाजारों में भारतीय मखाने की पहुंच बढ़ना बिहार के कृषि उत्पादों के लिए सकारात्मक संकेत है। समुद्री मार्ग से निर्यात होने से बड़े अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक नियमित आपूर्ति की संभावनाएं बढ़ती हैं और कृषि उत्पादों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल करने में मदद मिलती है। इससे किसानों को स्थानीय बाजार पर निर्भर रहने के बजाय व्यापक बाजार तक पहुंच बनाने का अवसर मिल सकता है।

    मिथिला मखाना का लगातार विदेशी बाजारों में पहुंचना बिहार के कृषि निर्यात के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। बेहतर कीमत, बढ़ता निर्यात और प्रसंस्करण क्षेत्र में संभावित निवेश किसानों की आय बढ़ाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती दे सकता है। आने वाले समय में यदि अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी मिथिला मखाना की मांग बढ़ती है तो बिहार भारत के प्रमुख कृषि निर्यात केंद्रों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।

  • पीयूष गोयल बोले, बिहार की प्रतिभा और उत्पादों को मिल रही नई पहचान, मुक्त व्यापार समझौतों से बढ़ेंगे निर्यात के अवसर

    पीयूष गोयल बोले, बिहार की प्रतिभा और उत्पादों को मिल रही नई पहचान, मुक्त व्यापार समझौतों से बढ़ेंगे निर्यात के अवसर

    नई दिल्ली । वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शनिवार को कहा कि बिहार की प्रतिभा और राज्य में तैयार होने वाले उत्पादों को वैश्विक बाजार में नई पहचान मिल रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार की ओर से किए जा रहे नए मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए के माध्यम से बिहार के किसानों, छोटे उद्योगों, उद्यमियों और निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच के नए अवसर तैयार हो रहे हैं।

    गोयल ने कहा कि बिहार के कृषि और कृषि-प्रसंस्कृत उत्पादों के साथ टेक्सटाइल, चमड़ा, फुटवियर, इंजीनियरिंग, रसायन और फार्मास्युटिकल क्षेत्र से जुड़े उत्पादों के लिए दुनिया के विभिन्न बाजारों के दरवाजे खुल रहे हैं। इससे राज्य के उत्पादों को घरेलू बाजार से आगे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने और निर्यात बढ़ाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने इस बदलाव को बिहार की आर्थिक क्षमता और स्थानीय प्रतिभा के लिए महत्वपूर्ण अवसर बताया।

    केंद्र सरकार के अनुसार, भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 863.1 अरब डॉलर का रिकॉर्ड निर्यात दर्ज किया है। सरकार लगातार भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने और मौजूदा बाजारों में पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है। मुक्त व्यापार समझौतों के जरिए भारतीय कंपनियों को विभिन्न देशों में व्यापार करने के लिए बेहतर परिस्थितियां उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है। इससे निर्यात को अधिक विविध बनाने के साथ श्रम-प्रधान क्षेत्रों को भी मजबूत करने की उम्मीद है।

    सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक साझेदार देशों के साथ कई महत्वपूर्ण मुक्त व्यापार समझौतों को आगे बढ़ाया है। इनमें भारत-मॉरीशस सीईसीपीए, भारत-यूएई सीईपीए, भारत-ऑस्ट्रेलिया ईसीटीए, भारत-ईएफटीए टीईपीए, भारत-ओमान सीईपीए, भारत-यूके सीईटीए और भारत-न्यूजीलैंड एफटीए जैसे समझौते शामिल हैं। इन समझौतों का उद्देश्य द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के साथ भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार उपलब्ध कराना है।

    एफटीए के तहत व्यापारिक साझेदार देशों के बीच शुल्क और अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम करने की दिशा में काम किया जाता है। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बढ़ सकती है। विशेष रूप से टेक्सटाइल, परिधान, चमड़ा और फुटवियर जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए ऐसे समझौते रोजगार और उत्पादन बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

    सरकार का कहना है कि व्यापार समझौतों को तैयार करते समय भारतीय उद्योग, किसानों, निर्यातकों और अन्य हितधारकों के हितों को ध्यान में रखा जा रहा है। इसके साथ ही विदेशी बाजारों में तकनीकी मानकों और नियमों से जुड़ी बाधाओं को कम करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। अलग-अलग देशों के मानकों को समझने और भारतीय उत्पादों को उनके अनुरूप तैयार करने से निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रवेश आसान हो सकता है।

    निर्यात को बढ़ावा देने के लिए सरकार निर्यात संवर्धन मिशन, विदेशों में भारतीय मिशनों, निर्यात संवर्धन परिषदों, उद्योग संगठनों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ मिलकर काम कर रही है। द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय मंचों पर लगातार बातचीत के जरिए भारतीय उत्पादों के लिए बेहतर बाजार पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में बिहार के कृषि, विनिर्माण और श्रम-प्रधान क्षेत्रों के उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार में विस्तार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

  • बांकीपुर में बीजेपी का गढ़ कैसे टूटा? प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत के पीछे रहे ये 5 बड़े फैक्टर

    बांकीपुर में बीजेपी का गढ़ कैसे टूटा? प्रशांत किशोर की ऐतिहासिक जीत के पीछे रहे ये 5 बड़े फैक्टर


    पटना । बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात के विधानसभा उपचुनावों के नतीजों में सबसे ज्यादा चर्चा बांकीपुर सीट की रही, जहां जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19 हजार से अधिक वोटों से पराजित कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की उम्मीदवार रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं।

    यह हार बीजेपी के लिए इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि बांकीपुर सीट 1995 से पार्टी के कब्जे में थी। यह सीट हाल ही में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में नितिन नवीन ने इसी सीट पर करीब 52 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी, लेकिन महज आठ महीने बाद पार्टी को यहां हार का सामना करना पड़ा।

    1. सम्राट चौधरी के नेतृत्व की पहली परीक्षा
    बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी की पहली चुनावी परीक्षा थी। चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने मुकाबले को सीधे अपने और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बीच की लड़ाई के रूप में पेश किया। जीत के बाद भी उन्होंने कहा कि बांकीपुर की जनता ने बीजेपी नेतृत्व को स्पष्ट संदेश दिया है कि बिहार को बेहतर नेतृत्व की जरूरत है।

    2. लंबे समय से सत्ता विरोधी माहौल
    करीब तीन दशक से यह सीट नितिन नवीन और उनके परिवार के पास रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लगातार एक ही परिवार के प्रतिनिधित्व के कारण क्षेत्र में सत्ता विरोधी भावना (एंटी-इनकंबेंसी) मजबूत हो चुकी थी। स्थानीय विकास और बदलाव के मुद्दे पर प्रशांत किशोर ने इसका लाभ उठाया।

    3. स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित प्रचार
    प्रशांत किशोर ने चुनाव प्रचार में बड़े राजनीतिक वादों के बजाय स्थानीय विकास को प्राथमिकता दी। उन्होंने जनता से कहा कि विधायक बनने के बाद क्षेत्र रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन कुछ महीनों में बदलाव दिखाई देगा। यह व्यावहारिक संदेश मतदाताओं को प्रभावित करता नजर आया।

    4. राजद के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध
    विश्लेषकों के अनुसार मुस्लिम-यादव (एम-वाई) वोट बैंक का एक हिस्सा इस बार राजद के बजाय जन सुराज के साथ गया। बीजेपी को हराने की रणनीति के तहत कई मतदाताओं ने प्रशांत किशोर को मजबूत विकल्प माना। इसका असर यह रहा कि राजद तीसरे स्थान पर खिसक गया और उसकी जमानत तक जब्त हो गई।

    5. सवर्ण वोटों का झुकाव
    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी के पारंपरिक सवर्ण वोट बैंक, खासकर ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय के एक हिस्से ने इस बार प्रशांत किशोर का समर्थन किया। बांकीपुर में इन समुदायों का प्रभाव निर्णायक माना जाता है और वोटों का यह बदलाव चुनाव परिणाम पर भारी पड़ा।

    बीजेपी के लिए बड़ा संदेश
    बांकीपुर उपचुनाव का परिणाम सिर्फ एक सीट की हार-जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बिहार की राजनीति में बदलते समीकरणों का संकेत माना जा रहा है। वहीं, जन सुराज पार्टी के लिए यह पहली चुनावी जीत भविष्य की राजनीति में उसकी बढ़ती भूमिका का संकेत मानी जा रही है।