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  • राजस्थान निकाय चुनाव में BJP को बड़ा झटका, भजनलाल शर्मा, वसुंधरा राजे और भूपेंद्र यादव के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बदले समीकरण

    राजस्थान निकाय चुनाव में BJP को बड़ा झटका, भजनलाल शर्मा, वसुंधरा राजे और भूपेंद्र यादव के प्रभाव वाले क्षेत्रों में बदले समीकरण

    नई दिल्ली ।राजस्थान में हुए निकाय चुनाव के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को कई प्रमुख क्षेत्रों में झटका लगा है। चुनाव परिणामों में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव, गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुन राम मेघवाल और प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ से जुड़े क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन चर्चा में रहा। कई निकायों में BJP स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर सकी और कुछ जगहों पर निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।

    मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले भरतपुर में BJP 65 वार्ड वाले नगर निगम में केवल 20 सीटें जीत सकी। यहां निर्दलीय प्रत्याशियों ने 36 वार्डों में जीत दर्ज की। कांग्रेस को सात सीटें मिलीं, जबकि BSP और RLP के खाते में एक-एक सीट गई। इस परिणाम के बाद निर्दलीय पार्षद नगर निगम के समीकरण में महत्वपूर्ण स्थिति में पहुंच गए।

    निकाय चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने रोड शो भी किया था। इसके बावजूद भरतपुर में पार्टी बहुमत के आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी। परिणामों में निर्दलीय प्रत्याशियों की बड़ी संख्या में जीत ने नगर निगम के राजनीतिक समीकरण को बदल दिया।

    केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के संसदीय क्षेत्र अलवर में भी BJP स्पष्ट बहुमत से दूर रही। यहां पार्टी ने 28 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं। निर्दलीय प्रत्याशियों ने 13 वार्डों में जीत हासिल की और एक सीट BSP के खाते में गई।

    जोधपुर नगर निगम के 100 वार्डों में BJP और कांग्रेस दोनों को 44-44 सीटें मिलीं। वहीं 11 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे। इस तरह किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। यहां भी निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।

    प्रदेश BJP अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह जिले पाली में भी पार्टी बहुमत हासिल नहीं कर सकी। 65 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटें जीतीं, जबकि BJP को 21 सीटों पर जीत मिली। निर्दलीय प्रत्याशियों ने 15 वार्डों में सफलता हासिल की। बहुमत के लिए 34 सीटों की जरूरत थी, इसलिए पाली में बोर्ड गठन के लिए निर्दलीयों का समर्थन महत्वपूर्ण रहेगा।

    पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक प्रभाव वाले झालावाड़ में BJP को बड़ा नुकसान हुआ। झालावाड़ नगर परिषद की 45 सीटों में कांग्रेस ने 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इसके चलते BJP को यहां सत्ता से बाहर होना पड़ा।

    केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल से जुड़े बीकानेर में भी BJP को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। 80 वार्ड वाले नगर निगम में कांग्रेस ने 42 सीटों पर जीत दर्ज कर बहुमत हासिल किया, जबकि BJP 27 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस को बोर्ड बनाने के लिए किसी अन्य दल या निर्दलीय के समर्थन की आवश्यकता नहीं रही।

    भरतपुर, पाली, झालावाड़, जोधपुर, अलवर, उदयपुर और बीकानेर जैसे शहरों के नतीजों में BJP कई जगह बहुमत हासिल करने से दूर रही। निकाय चुनाव में पार्टी के प्रमुख नेताओं से जुड़े क्षेत्रों में आए इन परिणामों ने स्थानीय स्तर पर BJP के सामने चुनौती की स्थिति दिखाई है। राजस्थान में 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में निकाय चुनाव के परिणाम पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • राजस्थान निकाय चुनाव में बीजेपी के दो उम्मीदवारों को मिला सिर्फ एक-एक वोट, अपने ही वार्डों में नतीजे बने चर्चा का विषय

    राजस्थान निकाय चुनाव में बीजेपी के दो उम्मीदवारों को मिला सिर्फ एक-एक वोट, अपने ही वार्डों में नतीजे बने चर्चा का विषय

    नई दिल्ली ।राजस्थान के शहरी निकाय चुनाव के नतीजों में दो वार्डों के परिणाम खास तौर पर चर्चा में हैं। राज्य के अलग-अलग निकायों में भारतीय जनता पार्टी के दो उम्मीदवारों को सिर्फ एक-एक वोट मिला। इनमें डीडवाना-कुचामन जिले की परबतसर नगरपालिका के वार्ड 13 से चुनाव लड़ने वाले कैलाशचंद और धौलपुर जिले की सैपऊ नगरपालिका के वार्ड 19 के उम्मीदवार लक्ष्मण कोली शामिल हैं।

    कैलाशचंद ने परबतसर नगरपालिका के वार्ड 13 से चुनाव लड़ा था। इस वार्ड में कांग्रेस उम्मीदवार हीना खानम ने 376 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। निर्दलीय उम्मीदवार राशिद खान को 195 वोट मिले। बीजेपी उम्मीदवार कैलाशचंद के खाते में केवल एक वोट आया।

    कैलाशचंद ने बताया कि वह परबतसर नगरपालिका के वार्ड 12 के मतदाता हैं, लेकिन पार्टी ने उन्हें वार्ड 13 से उम्मीदवार बनाया था। उनके मुताबिक उन्हें सिर्फ एक वोट मिला और वह भी संभवतः वार्ड 13 के किसी मतदाता ने दिया। कैलाशचंद ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका अपना वोट वार्ड 12 में है, जहां वह मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं।

    दूसरी ओर, धौलपुर जिले की सैपऊ नगरपालिका के वार्ड 19 में बीजेपी उम्मीदवार लक्ष्मण कोली को भी सिर्फ एक वोट मिला। इस वार्ड में निर्दलीय उम्मीदवार अजय कुमार ने 108 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। निर्दलीय उम्मीदवार राजेश कुमार 69 वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे।

    लक्ष्मण कोली के नतीजे को लेकर यह बात भी सामने आई कि उनके परिवार के कुछ सदस्य, जिनमें पत्नी, बेटा और बहू शामिल हैं, वार्ड 19 के मतदाता हैं। इसके बावजूद उनके खाते में सिर्फ एक वोट आया। हालांकि, मतदान की गोपनीयता के कारण यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि परिवार के किसी सदस्य ने उन्हें वोट नहीं दिया। मतदाता ने किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं होती।

    राजस्थान में इस बार 309 शहरी निकायों में चुनाव हुए थे। सोमवार को इनके नतीजे सामने आए। इन चुनावों में पार्षद के 10 हजार से अधिक पदों के लिए मतदान हुआ था। ऐसे में बीजेपी के दो उम्मीदवारों को केवल एक-एक वोट मिलने का मामला खास तौर पर चर्चा में आ गया।

    परबतसर नगरपालिका का परिणाम भी इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहा। यहां कुल 25 वार्ड हैं। कांग्रेस ने 13 वार्डों में जीत दर्ज कर साधारण बहुमत हासिल किया, जबकि बीजेपी 12 वार्डों में विजयी रही। कैलाशचंद का एक वोट वाला परिणाम इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि राजस्थान में बीजेपी की सरकार है और इसके बावजूद पार्टी के उम्मीदवार को अपने चुनावी वार्ड में बेहद कम समर्थन मिला।

    दोनों मामलों में उपलब्ध नतीजे यह बताते हैं कि अलग-अलग वार्डों में उम्मीदवारों के बीच मतों का अंतर काफी बड़ा रहा। परबतसर में कांग्रेस की हीना खानम ने 376 वोट के साथ जीत हासिल की, जबकि सैपऊ में निर्दलीय अजय कुमार 108 वोट लेकर विजयी हुए। वहीं बीजेपी उम्मीदवारों के खाते में केवल एक-एक वोट दर्ज हुआ।

  • भाजपा से इस्तीफे के बाद कांग्रेस में शामिल हुए नरेंद्र बाबू, पुराने नेताओं की अनदेखी को लेकर नेतृत्व पर लगाए आरोप

    भाजपा से इस्तीफे के बाद कांग्रेस में शामिल हुए नरेंद्र बाबू, पुराने नेताओं की अनदेखी को लेकर नेतृत्व पर लगाए आरोप

    नई दिल्ली ।कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक झटका लगा है। पार्टी के पूर्व विधायक और प्रदेश ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष एनएल नरेंद्र बाबू ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है। भारत जोड़ो कन्वेंशन के दौरान उन्हें कांग्रेस की सदस्यता दिलाई गई। इस मौके पर कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बीके हरिप्रसाद ने उन्हें कांग्रेस का गमछा पहनाकर पार्टी में स्वागत किया।

    नरेंद्र बाबू के कांग्रेस में शामिल होने के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार समेत कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। कार्यक्रम में मंत्री रामलिंगारेड्डी, एचएम रेवन्ना, पूर्व मंत्री रानी सतीश, रमेश बाबू, हनुमंतरायप्पा और पूर्व मेयर रमेश समेत कई नेताओं की मौजूदगी रही।

    नरेंद्र बाबू ने कांग्रेस में शामिल होने से कुछ दिन पहले ही भाजपा से अलग होने का अपना फैसला सार्वजनिक किया था। शुक्रवार को उन्होंने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही उन्होंने पार्टी के प्रदेश ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष पद से भी त्यागपत्र दे दिया था।

    भाजपा छोड़ने की घोषणा करते समय नरेंद्र बाबू ने पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की स्थिति को लेकर सवाल उठाए थे। उनका आरोप था कि लंबे समय से पार्टी के लिए काम करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं को उचित सम्मान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा था कि उन्होंने करीब 10 साल तक भाजपा के लिए काम किया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अपेक्षित जिम्मेदारी और सम्मान नहीं मिला।

    नरेंद्र बाबू कर्नाटक के तिगाला समुदाय के प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। भाजपा से अलग होने के दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि वह अवसर देखकर पार्टी बदलने वाली राजनीति में विश्वास नहीं रखते। उनके मुताबिक, पार्टी के लिए लंबे समय तक काम करने के बावजूद उन्हें जिस तरह की जिम्मेदारी और सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला।

    उन्होंने भाजपा नेतृत्व पर राजाजीनगर और महालक्ष्मी लेआउट में भी अनदेखी का आरोप लगाया था। नरेंद्र बाबू का कहना था कि उन्हें लंबे समय तक इंतजार कराया गया। साथ ही इन क्षेत्रों में उन्हें और उनके साथ काम करने वाले लोगों को नजरअंदाज किया गया।

    भाजपा से इस्तीफा देने के बाद नरेंद्र बाबू के कांग्रेस में शामिल होने की चर्चा तेज हो गई थी। अब भारत जोड़ो कन्वेंशन के दौरान उन्होंने औपचारिक रूप से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में पार्टी में उनका स्वागत किया गया।

    नरेंद्र बाबू का भाजपा छोड़ना ऐसे समय हुआ है जब कर्नाटक की राजनीति में दोनों प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक गतिविधियां लगातार बनी हुई हैं। हालांकि, उनके पार्टी बदलने के पीछे उन्होंने मुख्य रूप से भाजपा में पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पर्याप्त सम्मान और जिम्मेदारी नहीं मिलने की बात कही है।

    कांग्रेस में शामिल होने के दौरान मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार सहित पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी रही। इस कार्यक्रम के साथ नरेंद्र बाबू का भाजपा से कांग्रेस तक का राजनीतिक सफर औपचारिक रूप से बदल गया है। उन्होंने भाजपा में करीब एक दशक तक काम करने के बाद अब कांग्रेस का रुख किया है।

  • मध्य प्रदेश में फिर बढ़ी सियासी हलचल, CM मोहन यादव समेत कई बड़े भाजपा नेता दिल्ली में, समन्वय बैठक की चर्चाएं तेज

    मध्य प्रदेश में फिर बढ़ी सियासी हलचल, CM मोहन यादव समेत कई बड़े भाजपा नेता दिल्ली में, समन्वय बैठक की चर्चाएं तेज


    मध्य प्रदेश: में राजनीतिक हलचल के बीच भारतीय जनता पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के दिल्ली पहुंचने से चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के भी नई दिल्ली पहुंचने की जानकारी सामने आई है। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया के दिल्ली बुलाए जाने की बात कही जा रही है।

    कई वरिष्ठ नेताओं के एक ही समय पर दिल्ली में मौजूद होने से मध्य प्रदेश भाजपा के राजनीतिक और संगठनात्मक समीकरणों को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं। कैबिनेट मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल और कैलाश विजयवर्गीय पहले ही दिल्ली पहुंच चुके हैं। इस तरह प्रदेश से जुड़े कई प्रमुख नेताओं की राजधानी में मौजूदगी को राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है।

    दिल्ली में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय को लेकर बैठक होने की चर्चा भी है। हालांकि, इस संभावित बैठक को लेकर अभी आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी सामने नहीं आई है। बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा होगी या इसका निश्चित एजेंडा क्या होगा, इसे लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    इसी बीच भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की है। इस मुलाकात के बाद मध्य प्रदेश भाजपा के भीतर राजनीतिक चर्चाओं ने और जोर पकड़ लिया है। वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली में मौजूदगी और अलग-अलग स्तर पर हो रही मुलाकातों को देखते हुए संगठन तथा आपसी समन्वय से जुड़े मुद्दों पर संभावनाएं जताई जा रही हैं।

    हालांकि, सभी नेताओं के दिल्ली पहुंचने की वजह एक जैसी हो, यह जरूरी नहीं है। बताया जा रहा है कि कुछ नेता ब्रिक्स सम्मेलन से जुड़े कार्यक्रमों के सिलसिले में भी राजधानी पहुंचे हैं। ऐसे में दिल्ली में मौजूद सभी नेताओं के दौरे को सीधे तौर पर मध्य प्रदेश की राजनीति से जोड़ना फिलहाल जल्दबाजी होगी।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे प्रमुख नेताओं की एक साथ दिल्ली में मौजूदगी ने फिर भी राजनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है। प्रदेश भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के राजधानी पहुंचने से संगठन और सरकार के बीच समन्वय से जुड़े संभावित विमर्श को लेकर चर्चा बढ़ी है।

    मध्य प्रदेश में भाजपा की राजनीति से जुड़े मामलों में वरिष्ठ नेताओं की बैठकों और मुलाकातों को लेकर अक्सर राजनीतिक कयास लगाए जाते रहे हैं। मौजूदा स्थिति में भी संभावित समन्वय बैठक की चर्चा के कारण कई तरह की अटकलें सामने आ रही हैं। हालांकि, बैठक के एजेंडे या उसमें होने वाली संभावित चर्चा को लेकर अभी कोई आधिकारिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

    फिलहाल इतना स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश भाजपा के कई बड़े नेता एक साथ दिल्ली में हैं और इस वजह से प्रदेश की राजनीति में हलचल महसूस की जा रही है। ब्रिक्स सम्मेलन से जुड़े कार्यक्रमों के कारण कुछ नेताओं की दिल्ली यात्रा होने की बात भी सामने आई है। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी होगा।

  • कर्नाटक मंत्री सतीश जारकीहोली के परिसरों पर ED तलाशी से विवाद गहराया, डीके शिवकुमार ने एजेंसी के इस्तेमाल पर उठाए सवाल

    कर्नाटक मंत्री सतीश जारकीहोली के परिसरों पर ED तलाशी से विवाद गहराया, डीके शिवकुमार ने एजेंसी के इस्तेमाल पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली ।कर्नाटक में मंत्री सतीश जारकीहोली से जुड़े कई ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की तलाशी के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। कार्रवाई को लेकर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए जांच एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ईडी को जांच करनी है तो वह अपनी कार्रवाई कर सकती है और कांग्रेस इस तरह के कदमों से डरने वाली नहीं है।

    डीके शिवकुमार ने कार्रवाई के समय को लेकर भी सवाल उठाए। मुख्यमंत्री के मुताबिक, सरकार के 100 दिन पूरे होने से ठीक पहले सतीश जारकीहोली से जुड़े परिसरों पर यह कार्रवाई की गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि जांच एजेंसी की कार्रवाई का समय राजनीतिक लाभ को ध्यान में रखकर तय किया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि सतीश जारकीहोली जांच में पूरा सहयोग करेंगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यदि ईडी को मामले की जांच करनी है तो वह अपना काम कर सकती है। शिवकुमार ने आरोप लगाया कि भाजपा जांच एजेंसियों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए कर रही है और इस तरह की कार्रवाई कांग्रेस को दबाव में नहीं ला सकती।

    ईडी की टीम ने सतीश जारकीहोली, उनकी बेटी और सांसद प्रियंका जारकीहोली सहित कुछ अन्य लोगों से जुड़े करीब 18 ठिकानों पर तलाशी अभियान चलाया। इन परिसरों में बेंगलुरु और बेलगावी स्थित स्थान भी शामिल बताए गए हैं। तलाशी के दौरान अधिकारियों की ओर से दस्तावेजों और अन्य सामान की जांच की जा रही है।

    कार्रवाई के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जवानों की तैनाती भी की गई। अलग-अलग स्थानों पर चल रही तलाशी के बीच राज्य में इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। मुख्यमंत्री की ओर से भाजपा पर लगाए गए आरोपों के बाद मामला कर्नाटक की राजनीति में चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।

    अधिकारियों के अनुसार, ईडी की मौजूदा कार्रवाई विदेशी मुद्रा से जुड़े नियमों के तहत दर्ज जांच से संबंधित है। यह जांच विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम यानी फेमा के प्रावधानों के तहत की जा रही है। एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि इस कार्रवाई का संबंध किसी पुराने धनशोधन मामले से नहीं है।

    तलाशी अभियान के दौरान ईडी की टीम संबंधित परिसरों में उपलब्ध दस्तावेजों और अन्य सामग्री की जांच कर रही है। जांच का केंद्र विदेशी मुद्रा से जुड़े नियमों के संभावित उल्लंघन से संबंधित पहलुओं पर है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार कार्रवाई के संबंध में सतीश जारकीहोली के परिवार या कांग्रेस की ओर से तत्काल कोई अलग प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।

    मामले ने कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को एक बार फिर तेज कर दिया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कार्रवाई को राजनीतिक संदर्भ में देखते हुए भाजपा पर हमला बोला, जबकि ईडी की ओर से इसे फेमा के तहत चल रही जांच का हिस्सा बताया गया है। अब इस कार्रवाई से जुड़े दस्तावेजों और जांच के आगे बढ़ने के साथ मामले की दिशा स्पष्ट होने की उम्मीद है।

  • पांच राज्यों के चुनावों के दौरान BJP के खजाने में आए 1473 करोड़ रुपये, असम में हुए सबसे ज्यादा खर्च

    पांच राज्यों के चुनावों के दौरान BJP के खजाने में आए 1473 करोड़ रुपये, असम में हुए सबसे ज्यादा खर्च


    नई दिल्ली
    । भारतीय जनता पार्टी (Bharatiya Janata Party-BJP) के केंद्रीय पार्टी मुख्यालय को पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों (Assembly elections) के दौरान कुल 1472.8 करोड़ रुपये मिले थे। यह जानकारी पार्टी की ओर से चुनाव आयोग को सौंपे गए चुनाव खर्च के ब्योरे से सामने आई है। फिलहाल चुनाव आयोग (Election Commission) ने असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी के खर्च से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक किए हैं। चुनाव पूरा होने के बाद 6 मई 2026 को बीजेपी का क्लोजिंग बैलेंस 7,627.2 करोड़ रुपये था। 15 मार्च 2026 को यह राशि 6,722.6 करोड़ रुपये थी।


    तीन राज्यों में बीजेपी ने 160 करोड़ रुपये खर्च किए

    बीजेपी ने केंद्रीय मुख्यालय के साथ संबंधित राज्य और जिला इकाइयों को मिलाकर असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी विधानसभा चुनावों में कुल 160 करोड़ रुपये खर्च किए। इनमें सबसे ज्यादा खर्च असम में हुआ। आंकड़ों के मुताबिक:-
    – असम: 96.3 करोड़ रुपये
    – तमिलनाडु: 51.6 करोड़ रुपये
    – पुडुचेरी: 11.9 करोड़ रुपये

    एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी ने करीब 130.4 करोड़ रुपये सामान्य चुनाव प्रचार पर खर्च किए। वहीं, 29.6 करोड़ रुपये उम्मीदवारों को एकमुश्त भुगतान और उनके आपराधिक मामलों से जुड़ी जानकारी के प्रचार पर खर्च किए गए।


    असम में प्रचार पर 76.7 करोड़ रुपये खर्च

    असम में बीजेपी ने सामान्य पार्टी प्रचार पर कुल 76.7 करोड़ रुपये खर्च किए। इसमें केंद्रीय इकाई की ओर से खर्च किए गए 23.1 करोड़ रुपये भी शामिल हैं। उम्मीदवारों पर पार्टी ने 19.5 करोड़ रुपये खर्च किए।

    स्टार प्रचारकों की यात्रा खर्च पर 27.3 करोड़ रुपये खर्च हुए, जबकि विज्ञापनों पर 37 करोड़ रुपये खर्च किए गए। प्रचार सामग्री पर 8.9 करोड़ रुपये और अन्य मदों में 2.3 करोड़ रुपये खर्च किए गए। उम्मीदवारों को कुल 19.4 करोड़ रुपये एकमुश्त राशि के तौर पर दिए गए। वहीं, उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों से जुड़ी जानकारी प्रकाशित करने पर 16.7 लाख रुपये खर्च हुए।


    तमिलनाडु में प्रचार के लिए 44.5 करोड़ रुपये

    तमिलनाडु में बीजेपी ने सामान्य पार्टी प्रचार के लिए 44.5 करोड़ रुपये खर्च करने को मंजूरी दी थी। इसके अलावा उम्मीदवारों पर 7 करोड़ रुपये खर्च किए गए।

    कांग्रेस ने 248.6 करोड़ रुपये खर्च किए
    इसी चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से पहले जारी किए गए चुनाव खर्च के ब्योरे में कुल 248.6 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी दी गई थी। पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव खर्च से जुड़े बीजेपी के स्टेटमेंट अभी चुनाव आयोग की ओर से सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

  • राज्यसभा नहीं मिलने पर स्मृति ईरानी का जवाब, अमेठी चुनाव हार और भाजपा में संगठनात्मक भूमिका पर खुलकर बोलीं

    राज्यसभा नहीं मिलने पर स्मृति ईरानी का जवाब, अमेठी चुनाव हार और भाजपा में संगठनात्मक भूमिका पर खुलकर बोलीं

    नई दिल्ली । पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने भाजपा की केंद्रीय टीम में वापसी के बाद कई मुद्दों पर बात की है। एक पॉडकास्ट के दौरान उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में अमेठी से मिली हार के बाद राज्यसभा न भेजे जाने को लेकर कहा कि भारतीय जनता पार्टी के संगठन में पद कोई पहचान नहीं होती है, वह एक मौका होता है। उन्होंने कहा, “अगर राजनीतिक ताकत महत्वपूर्ण होती, तो मैं कभी भी अमेठी नहीं जाती। क्योंकि अमेठी ऐतिहासिक रूप से भाजपा के लिए एक ‘लूजिंग सीट’ रही है।” बता दें स्मृति ईरानी 2011 से 2019 तक राज्यसभा सांसद रही थीं। इस दौरान ही उन्होंने 2019 के चुनाव में अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। बाद में 2024 लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

    टाइम्स नाऊ से बात करते हुए स्मृति ईरानी ने 2024 लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी द्वारा वापस राज्यसभा न भेजे जाने के सवाल पर भी विस्तार से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि वह जहां से आई हैं, वहां पर कभी नहीं सोचा था कि वह इस मुकाम पर पहुंचेंगी।

    मैं और देवेंद्र फडणवीस मिलकर, पुराने दिनों को याद करके हंसते हैं- स्मृति ईरानी

    इंटरव्यू के दौरान स्मृति ईरानी ने भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा में काम करने वाले दिनों को याद किया। उन्होंने कहा, “मैं पहली बार 2003 में युवा मोर्चा महाराष्ट्र में पदाधिकारी बनी थी। मेरे साथ जो उपाध्यक्ष थे, व देवेंद्र फडणवीस थे। उस समय हम लोगों ने कभी नहीं सोचा था कि यहां तक पहुंचेंगे। मैं और देवेंद्र फडणवीस जब की मिलते हैं, तो इस बात पर हंसते हैं। उस समय हम लोग प्रमोद महाजन, गोपीनाथ मुंडे को देखा करते थे। मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि हम यहां तक पहुंचेंगे।” उन्होंने जोर देकर कहा कि प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से सार्वजनिक रूप से की गई तारीफ उनके लिए एक उपलब्धि है।

    ‘घर से पेट्रोल, पानी के पैसे मांगते थे’

    भाजपा नेता स्मृति ईरानी युवा मोर्चा के दिनों को याद करते हुए कहा कि वह एक पक्की भाजपा कार्यकर्ता हैं। युवा मोर्चा के दिनों में वह अपने साथी लोगों की मदद करने के लिए घर से पेट्रोल पानी के पैसे तक लेती थी। इस पर उनके घर वाले भी कई बार टोका करते थे। उन्होंने कहा, “उस समय हम लोग ऐसे ही घूमा करते थे। घर से पेट्रोल पानी के पैसे भी लिया करते थे। घरवाले कहते थे कि अरे तुम युवा मोर्चा में हो और अभी पैसे लेते हो। तब हम कहते थे कि ‘हां, ताकि हम अपने साथियों की मदद कर सकें।’ उस वक्त हमारे जो संगठन मंत्री थे वह वी. सतीश जी थे। वह आज संसद में हैं। वह बैठकर हमें बताते थे कि जो गरीब कार्यकर्ता है उसकी मदद कैसे करनी है। उसको भी अपने साथ लेकर चलना है।” उन्होंने कहा कि जब संगठन में इस तरीके की मजबूती के साथ तैयारी की जाती है और ऐसे बैकग्राउंड से आप आते हैं, तो आपके लिए पद कोई ज्यादा मायने नहीं रखता।

    पीएम के इग्नोर करने वाले वीडियो पर भी दिया स्मृति ईरानी का जवाब

    इंटरव्यू के दौरान जब स्मृति ईरानी से बंगाल में एक कार्यक्रम के दौरान वायरल हुए वीडियो पर भी सवाल पूछा गया। विपक्ष की तरफ से आरोप लगाया जाता है कि पीएम मोदी ने इस कार्यक्रम में स्मृति ईरानी को इग्नोर किया था। इसका जवाव देते हुए ईरानी ने कहा, “हां, उस समय मैं और दादा (मिथुन) एक साथ ही बैठे हुए थे। वीडियो में पीएम मोदी की पीठ दिखाई दे रही है। किसको पता है कौन किसको हाथ जोड़ रहा है। वह पल बेहद भावुक करने वाला था। वहां जितने भी लोग मंच पर थे, सबकी अपनी कहानी थी। बंगाल में कार्यकर्ताओं ने काफी कुछ झेला है।”

    उन्होंने जोर देकर कहा कि उस समय मंच पर पुराने से पुराना कार्यकर्ता मौजूद था। प्रधानमंत्री मोदी उन लोगों का अभिवादन कर रहे थे। हमने पीएम के लिए बंगाल में गालियां सुनी हैं। ऐसे में यह सारी चीजें मायने नहीं रखतीं। मायने रखती है, तो केवल जीत और वह सुखद थी। मायने रखता है, तो बंगाल का कार्यकर्ता और उसे मिलने वाला न्याय।

  • BJP : संगठन में फेरबदल के बाद मंत्रिमंडल में विस्तार की उम्मीद… सांसदों ने दिल्ली में डाला डेरा

    BJP : संगठन में फेरबदल के बाद मंत्रिमंडल में विस्तार की उम्मीद… सांसदों ने दिल्ली में डाला डेरा


    नई दिल्ली।
    भाजपा संगठन (BJP Organization) की टीम गठन के बाद केंद्र सरकार (Central Government) में संभावित विस्तार और फेरबदल (Reshuffle) को लेकर उम्मीद लगाए सांसदों की ऊहापोह बढ़ती जा रही है। सांसद अपने क्षेत्रों से ज्यादा दिल्ली में समय बिता रहे हैं। संसद के मॉनसून सत्र (Monsoon Session) का अभी तक सत्रावसान भी नहीं हुआ है, ऐसे में सत्र के फिर से कभी भी आहूत होने की संभावना है। दूसरी तरफ मंत्रिमंडल विस्तार की भी संभावना बनी हुई है।


    मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें

    भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन (BJP President Nitin Navin) की टीम के गठन के बाद से ही इस बात की अटकलें रही हैं कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद का भी अब जल्द ही विस्तार किया जाएगा। सरकार में कई मंत्री पद खाली भी हैं। संगठन की टीम से बाहर हुए और उसमें जगह न पा सके नेताओं को अब सरकार के विस्तार को लेकर काफी उम्मीदें हैं। अटकलों के बाजार में कोई न कोई तारीख के आ जाने से इन सांसदों की उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं।


    संसद का सत्र भी बुलाया जा सकता है

    संगठन और सरकार में किसका पहले विस्तार होगा, पहले इसकी चर्चा थी, तो अब संसद सत्र को फिर से बुलाने और सरकार के विस्तार में क्या पहले होगा, इसकी अटकलें लगाई जा रही हैं। इस बात की संभावना बनी हुई है कि कभी भी फिर से संसद सत्र आयोजित हो सकता है। इसमें महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन विधेयक लाए जा सकते हैं। ये विधेयक पिछले बजट सत्र में सरकार पारित नहीं करा सकी थी। चूंकि, इसके लिए सरकार को अन्य दलों का भी समर्थन जरूरी है।

    2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार में भी यूपी का ध्यान रखा जाएगा। फिलहाल अगर पीएम मोदी को भी जोड़ लें तो उत्तर प्रदेश से 11 मंत्री हैं। लखनऊ से सांसद राजनाथ सिंह रक्षा मंत्रालय की बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इसके अलावा पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी भी उत्तर प्रदेश से ही चुनकर राज्यसभा आए हैं। इस लिस्ट में बीएल वर्मा, एसपी सिंह बघेल, अनुप्रिया पटेल, जितिन प्रसाद, पंकज चौधरी, कमलेश पासवान और कीर्तिवर्धन सिंह का नाम है।

    पार्टी में चर्चा यही है कि जिन बड़े नेताओं को केंद्रीय कार्यकारिणी में जगह नहीं मिल पाई हैं, उन्हें मंत्रिमंडल में मौका मिल सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि यूपी से लक्ष्मीकांत वाजपेयी को भी मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है। कयास पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को लेकर भी थे। हालांकि अब उन्हें अडमान निकोबार का उपराज्यपाल नियुक्त कर दिया गया है।

  • दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का LG बनाकर BJP ने साधे कई निशाने, यूपी चुनाव से पहले खेला बड़ा दांव

    दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का LG बनाकर BJP ने साधे कई निशाने, यूपी चुनाव से पहले खेला बड़ा दांव


    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह का नया उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है। राष्ट्रपति भवन की ओर से शनिवार देर रात जारी आदेश के मुताबिक उनकी नियुक्ति उस दिन से प्रभावी होगी, जिस दिन वे पदभार संभालेंगे। 62 वर्षीय दिनेश शर्मा फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं और उनका कार्यकाल नवंबर 2026 में खत्म होना था। ऐसे में उच्च सदन का कार्यकाल पूरा होने से पहले उन्हें उपराज्यपाल की संवैधानिक जिम्मेदारी दिया जाना राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों लिहाज से अहम माना जा रहा है।

    योगी सरकार में डिप्टी सीएम रह चुके हैं
    दिनेश शर्मा का उत्तर प्रदेश की राजनीति और भाजपा संगठन में लंबा अनुभव रहा है। 2017 से 2022 के बीच योगी आदित्यनाथ की पहली सरकार में वे उपमुख्यमंत्री रहे। इस दौरान माध्यमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा आईटी एवं इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्वपूर्ण विभाग उनके पास थे।

    सक्रिय राजनीति में आने से पहले वे लखनऊ विश्वविद्यालय के वाणिज्य विभाग में प्रोफेसर थे। इसके बाद वे लखनऊ के दो बार महापौर बने। 2008 में पहली बार मेयर चुने जाने के बाद 2012 में उन्होंने दोबारा यह जिम्मेदारी संभाली। संगठन में भी उनका कद लगातार बढ़ा। 2014 में उन्हें भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया और वे गुजरात के पार्टी प्रभारी की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। 2023 में दिनेश शर्मा उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुए थे। उनकी राज्यसभा सदस्यता नवंबर 2026 तक थी।

    2027 के यूपी चुनाव से जोड़कर क्यों देखा जा रहा फैसला?
    दिनेश शर्मा को नई जिम्मेदारी ऐसे वक्त मिली है, जब उत्तर प्रदेश में 2027 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति को सामान्य प्रशासनिक फेरबदल से आगे राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

    भाजपा ने हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश को लेकर संगठनात्मक स्तर पर भी कई बदलाव किए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम में यूपी से आठ नेताओं को जगह मिली है। पार्टी के इस कदम को विधानसभा चुनाव से पहले संगठन मजबूत करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच पहुंच बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

    ब्राह्मण चेहरे के तौर पर भी अहम
    दिनेश शर्मा ब्राह्मण समुदाय से आते हैं और उत्तर प्रदेश भाजपा में इस समुदाय के प्रमुख चेहरों में रहे हैं। ऐसे में अंडमान-निकोबार जैसे महत्वपूर्ण केंद्र शासित प्रदेश की जिम्मेदारी मिलने को यूपी के सामाजिक समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

    हालांकि, इस नियुक्ति को केवल जातीय समीकरणों के चश्मे से देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। दिनेश शर्मा के पास विश्वविद्यालय, संगठन, राज्य सरकार और संसद—चारों स्तरों पर काम करने का लंबा अनुभव है। यही प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव भी उनकी नई जिम्मेदारी के लिए महत्वपूर्ण आधार माना जा सकता है।

    हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री बनाना भी इसी कड़ी में
    यूपी में ब्राह्मण प्रतिनिधित्व को लेकर भाजपा की रणनीति की चर्चा के बीच पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी को राष्ट्रीय महामंत्री की जिम्मेदारी मिलना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नितिन नवीन की नई टीम में उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री बनाया गया है।

    हरीश द्विवेदी बस्ती से दो बार लोकसभा सांसद रह चुके हैं और लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से शुरू हुआ था। भाजपा संगठन में भी वे कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं। ब्राह्मण समुदाय से आने वाले द्विवेदी का उत्तर प्रदेश में संगठनात्मक आधार भी रहा है।

    भाजपा की मौजूदा रणनीति हालांकि सिर्फ ब्राह्मण या सवर्ण समीकरण तक सीमित नहीं दिखाई देती। पार्टी ने OBC, दलित और मुस्लिम समुदायों से जुड़े नेताओं को भी संगठन में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी 2027 से पहले सामाजिक समीकरणों के व्यापक संतुलन पर काम कर रही है।

    राज्यसभा में 94% उपस्थिति, 226 सवाल पूछे
    नई संवैधानिक जिम्मेदारी संभालने जा रहे दिनेश शर्मा का राज्यसभा में भी सक्रिय रिकॉर्ड रहा है। अगस्त 2026 तक सदन में उनकी उपस्थिति 94 प्रतिशत रही। इस दौरान उन्होंने 226 सवाल पूछे और 34 बहसों में हिस्सा लिया।

    अब उनके सामने अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के प्रशासन की जिम्मेदारी होगी। खास बात यह है कि वे ऐसे समय राज्यसभा से उपराज्यपाल की भूमिका में जा रहे हैं, जब उनका उच्च सदन का कार्यकाल समाप्त होने वाला था।

    2024 के झटके के बाद 2027 पर BJP का फोकस
    उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव बेहद अहम है। 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य में पार्टी के प्रदर्शन को अपेक्षाकृत झटका लगा था। इसके बाद संगठन में चुनावी प्रदर्शन, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और सामाजिक समीकरणों को लेकर मंथन हुआ।

    अब एक तरफ यूपी के नेताओं को केंद्रीय संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जा रही हैं, वहीं दिनेश शर्मा जैसे अनुभवी और बड़े ब्राह्मण चेहरे को संवैधानिक पद पर भेजा गया है। इन फैसलों को साथ रखकर देखें तो भाजपा की रणनीति में दो समानांतर लक्ष्य नजर आते हैं—OBC, दलित और अन्य सामाजिक समूहों के बीच आधार मजबूत करना और अपने पारंपरिक सवर्ण समर्थन को भी मजबूती से साथ बनाए रखना।

    इस लिहाज से दिनेश शर्मा की नियुक्ति सिर्फ अंडमान-निकोबार के प्रशासनिक बदलाव तक सीमित नहीं है। यह भाजपा के लिए संगठन, सामाजिक संतुलन और 2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव की तैयारी—तीनों स्तरों पर महत्व रखने वाला फैसला है।

  • पीएम मोदी के जन्मदिन से भाजपा का सेवा संकल्प अभियान, एक महीने में 13 कार्यक्रमों के जरिए देशभर में जनसंपर्क की तैयारी

    पीएम मोदी के जन्मदिन से भाजपा का सेवा संकल्प अभियान, एक महीने में 13 कार्यक्रमों के जरिए देशभर में जनसंपर्क की तैयारी

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से भारतीय जनता पार्टी देशभर में एक महीने का सेवा संकल्प अभियान शुरू करने जा रही है। यह अभियान 17 सितंबर से 17 अक्टूबर तक चलाने की योजना है। पार्टी के अनुसार, इसके जरिए सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण, विकास और विकसित भारत से जुड़े संदेशों को जनता तक पहुंचाया जाएगा। अभियान को प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने से भी जोड़ा गया है।

    भाजपा सामान्य तौर पर प्रधानमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर सेवा पखवाड़े का आयोजन करती रही है, लेकिन इस बार कार्यक्रम का विस्तार एक महीने तक किया गया है। नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार शपथ ली थी। इस आधार पर अक्टूबर 2026 में उनके सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। पार्टी इस अवसर को भी व्यापक जनसंपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से रेखांकित करने की तैयारी कर रही है।

    अभियान के तहत करीब 13 प्रमुख कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। इसकी शुरुआत 17 सितंबर को आशीर्वाद का दीया कार्यक्रम से होगी। इसके माध्यम से देशभर में विभिन्न स्थानों और घरों में दीप प्रज्वलन किया जाएगा। बच्चों के लिए चित्रकला और भाषण प्रतियोगिताओं का आयोजन भी प्रस्तावित है, जिनका विषय देश के भविष्य और सपनों से जुड़ा होगा।

    नमो सेवा गाथा के तहत नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से लोगों तक विभिन्न संदेश पहुंचाने की योजना है। वहीं कहानी बदलाव की कार्यक्रम में सरकारी योजनाओं से लाभ पाने वाले लोगों की सफलता की कहानियां सामने रखी जाएंगी। इसका उद्देश्य कल्याणकारी योजनाओं के असर को सीधे लाभार्थियों के अनुभवों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना है।

    अभियान में आंगन का उत्सव भी शामिल किया गया है। इसके तहत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और लाभार्थी माताओं को सम्मानित करने के साथ पोषण तथा मातृ कल्याण से जुड़े विषयों पर संवाद की योजना है। भाजपा का लक्ष्य देशभर में करीब 14 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं तक पहुंच बनाने का है।

    प्रधानमंत्री मोदी की जन्मभूमि गुजरात के वडनगर और उनकी संसदीय कर्मभूमि वाराणसी को भी अभियान में विशेष स्थान दिया गया है। जल, जन और सेवा संकल्प यात्रा के जरिए दोनों स्थानों से जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। गुजरात में वडनगर से वाराणसी और फिर वापस वडनगर तक बाइक यात्राओं की भी योजना है। इन यात्राओं के दौरान जनसंवाद के साथ सेवा और सांस्कृतिक गतिविधियां होंगी।

    सेवा मेरा योगदान कार्यक्रम के तहत रक्तदान शिविर, स्वच्छता अभियान, पौधरोपण और डिजिटल साक्षरता जैसी गतिविधियां प्रस्तावित हैं। सेवा सेतु अभियान के जरिए ब्लॉक और विधानसभा स्तर पर शिविर लगाए जाएंगे, जहां लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने में सहायता दी जाएगी। संबंधित विभागों के अधिकारियों की मौजूदगी में पात्र लोगों के दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी कराने की योजना है।

    अभियान के दौरान 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी जयंती और 7 अक्टूबर को प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष कार्यक्रम होंगे। अंतिम चरण में जनसेवा महाकुंभ आयोजित करने की योजना है, जिसमें जनप्रतिनिधियों और पार्टी कार्यकर्ताओं की भागीदारी होगी।

    भाजपा इस अभियान को केवल सेवा गतिविधियों तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ विपक्ष के राजनीतिक मुद्दों का जवाब देने के लिए भी इसका इस्तेमाल कर सकती है। इस तरह अभियान को संगठनात्मक जनसंपर्क, लाभार्थी संपर्क और राजनीतिक संवाद के संयुक्त कार्यक्रम के रूप में देखा जा रहा है।