Tag: China

  • चीन ने पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान के लिए शुरू किया नया रेल मार्ग, भारत के रणनीतिक हितों पर भी नजर

    चीन ने पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान के लिए शुरू किया नया रेल मार्ग, भारत के रणनीतिक हितों पर भी नजर

    नई दिल्ली । चीन ने अफगानिस्तान के साथ व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की दिशा में नया कदम उठाया है। चीन के शेडोंग प्रांत के लिनयी शहर से अफगानिस्तान के हैरातन के लिए पहली समर्पित मालगाड़ी रवाना की गई है। इस रेल सेवा को चीन और अफगानिस्तान के बीच जमीनी व्यापार बढ़ाने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है। नया मार्ग पाकिस्तान, खासकर कराची बंदरगाह से होकर गुजरने वाले पारंपरिक ट्रांजिट रास्तों का विकल्प बन सकता है। इसके संभावित आर्थिक और रणनीतिक प्रभावों पर भी चर्चा हो रही है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, मालगाड़ी में लगभग 80 लाख युआन यानी करीब 11 लाख अमेरिकी डॉलर मूल्य का सामान लदा है। इसके लगभग 20 दिनों में उत्तरी अफगानिस्तान के बल्ख प्रांत स्थित हैरातन ड्राई पोर्ट पहुंचने की उम्मीद है। यह शेडोंग से हैरातन तक शुरू की गई पहली समर्पित रेल माल-ढुलाई सेवा बताई जा रही है, जो दोनों क्षेत्रों को सीधे जोड़ने के उद्देश्य से संचालित की जा रही है।

    इस खेप में लिनयी में निर्मित कपड़े, रासायनिक कच्चा माल, औजार और निर्माण मशीनरी शामिल हैं। चीन से रवाना होने के बाद मालगाड़ी कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान से होकर गुजरेगी। इसके बाद तेरमेज सीमा चौकी के रास्ते अफगानिस्तान में प्रवेश करेगी और हैरातन पहुंचेगी। इस मार्ग के जरिए चीन को अफगानिस्तान तक सामान पहुंचाने के लिए एक वैकल्पिक जमीनी संपर्क उपलब्ध हो सकता है।

    अफगानिस्तान चारों ओर से जमीन से घिरा देश है और वहां घरेलू रेल नेटवर्क का विस्तार सीमित है। ऐसे में क्षेत्रीय रेल संपर्क उसके लिए व्यापार और माल परिवहन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। फिलहाल उज्बेकिस्तान की सीमा से मजार-ए-शरीफ तक रेल संपर्क उपलब्ध है। इसके अलावा ईरान के साथ खाफ-हेरात रेलवे के माध्यम से संपर्क विकसित करने के प्रयास भी चल रहे हैं। नए रेल मार्ग से अफगानिस्तान के लिए आयातित सामान की आपूर्ति के विकल्प बढ़ सकते हैं।

    चीन की इस पहल को पाकिस्तान के रास्ते होने वाले व्यापार पर निर्भरता कम करने के प्रयास के रूप में भी देखा जा रहा है। अब तक अफगानिस्तान के आयात का बड़ा हिस्सा कराची बंदरगाह से जुड़े पारंपरिक मार्गों के जरिए पहुंचता रहा है। नए गलियारे से चीन को वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था मिल सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान में चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव से जुड़ी परियोजनाओं को स्थानीय विरोध और अपेक्षित लाभ से संबंधित चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में अफगानिस्तान के साथ संपर्क बढ़ाना चीन की क्षेत्रीय व्यापार रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

    इस घटनाक्रम का भारत के लिए भी रणनीतिक महत्व है। भारत लंबे समय से अफगानिस्तान में पुनर्निर्माण और विकास से जुड़ी गतिविधियों में सहयोग करता रहा है। चीन की अफगानिस्तान में बढ़ती आर्थिक मौजूदगी से क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। हालांकि, नए रेल मार्ग के शुरू होने मात्र से भारत-अफगानिस्तान संबंधों पर किसी निश्चित प्रभाव का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। इसका वास्तविक असर व्यापार, निवेश और क्षेत्रीय सहयोग में होने वाले बदलावों से स्पष्ट होगा।

    इससे पहले भी चीन के जिआंगसू प्रांत के हैमेन से मालगाड़ी अफगानिस्तान के हैरातन पहुंच चुकी है। उस खेप में 2,000 टन से अधिक सामान था, जिसका मूल्य 2 करोड़ डॉलर से ज्यादा बताया गया था। कजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान से होकर हुई उस यात्रा में 12 दिन लगे थे। इस मार्ग पर महीने में दो बार आने-जाने वाली सेवाएं शुरू करने की योजना भी बताई गई थी।

    नए गलियारे की व्यावसायिक सफलता परिवहन लागत, समय पर डिलीवरी और माल ढुलाई की गति पर निर्भर करेगी। चीनी अधिकारियों को उम्मीद है कि इससे व्यापार सुगम होगा और खर्च घटेगा। फिलहाल यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नया मार्ग नियमित माल परिवहन में कितना उपयोगी साबित होता है और चीन-अफगानिस्तान व्यापार को किस हद तक विस्तार मिलता है।

  • कौन हैं ITBP के शौर्य कमांडो, LAC पर चीनी सैनिकों के सामने कैसे संभालते हैं मोर्चा..

    कौन हैं ITBP के शौर्य कमांडो, LAC पर चीनी सैनिकों के सामने कैसे संभालते हैं मोर्चा..


    नई दिल्ली
    । भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सीमा सुरक्षा और सैनिकों की गश्त को लेकर सतर्कता लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। अरुणाचल प्रदेश के संवेदनशील इलाकों में दोनों देशों के सैनिकों के आमने-सामने आने की स्थितियों के बीच भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के शौर्य कमांडो विशेष चर्चा में हैं। कठिन पहाड़ी परिस्थितियों में काम करने के लिए प्रशिक्षित ये जवान सीमा पर त्वरित प्रतिक्रिया देने और तनावपूर्ण परिस्थितियों से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    राजस्थान के अलवर में आयोजित ITBP के वार्षिक अभिनंदन समारोह में संगठन के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने अरुणाचल प्रदेश में LAC के कई स्थानों पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच आमना-सामना तथा तनातनी की स्थिति बने रहने की बात कही। उन्होंने शौर्य कमांडो के प्रदर्शन और उनकी भूमिका की भी सराहना की। इन विशेष दस्तों का उद्देश्य संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में जवानों की प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाना और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से काम करना है।

    शौर्य कमांडो दस्तों के गठन की पृष्ठभूमि वर्ष 2020 में लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प से जुड़ी है। इस घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त, निगरानी और सैनिकों की त्वरित तैनाती को लेकर विशेष सतर्कता की जरूरत महसूस की गई। इसी दिशा में ITBP ने अपने जवानों में से शारीरिक रूप से सक्षम, मानसिक तौर पर मजबूत और कठिन परिस्थितियों में काम करने वाले कर्मियों को चुनकर विशेष प्रशिक्षण देने की व्यवस्था विकसित की।

    इन कमांडो को भारतीय सेना की घातक प्लाटून की तर्ज पर तैयार किया गया है। इनके प्रशिक्षण में पर्वतीय क्षेत्रों में आवाजाही, अत्यधिक ठंड में काम करना, हाथों से मुकाबला करने की तकनीक, हथियारों का संचालन और तनावपूर्ण परिस्थितियों में संयम बनाए रखना शामिल है। ऊंचाई वाले इलाकों में ऑक्सीजन की कमी, दुर्गम रास्तों और बेहद कम तापमान के बीच काम करना इनके लिए बड़ी चुनौती होती है। इसलिए शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक दृढ़ता भी इनके प्रशिक्षण का अहम हिस्सा है।

    ITBP की तैनाती व्यवस्था के तहत चीन सीमा पर तैनात प्रत्येक बटालियन के साथ कम से कम एक शौर्य कमांडो टीम जोड़े जाने की जानकारी दी गई है। अरुणाचल प्रदेश जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इनकी भूमिका को देखते हुए दो अतिरिक्त इकाइयां तैयार किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। भविष्य में इन दस्तों को कंपनी स्तर तक विकसित करने और एक अलग, समर्पित बटालियन बनाने की योजना पर काम किए जाने की बात कही गई है। ऐसी इकाई तैयार होने पर जरूरत के समय विशेष प्रशिक्षित जवानों को तनावग्रस्त क्षेत्रों में तेजी से पहुंचाने की क्षमता बढ़ सकती है।

    अरुणाचल प्रदेश में बुमला और मेचूका जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में सीमा पर गश्त और सैनिकों की गतिविधियों पर निगरानी महत्वपूर्ण है। जब दोनों देशों के जवान आमने-सामने आते हैं, तब प्रशिक्षित टीमें स्थिति को संभालने, रास्ता रोकने और भारतीय क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखने में भूमिका निभा सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में त्वरित प्रतिक्रिया के साथ तनाव को अनावश्यक रूप से बढ़ने से रोकना भी महत्वपूर्ण होता है।

    सीमा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए ITBP आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संगठन ड्रोन और ड्रोन रोधी प्रणालियों सहित तकनीकी संसाधनों पर निवेश बढ़ा रहा है। सीमा पर तैनात बटालियनों में ड्रोन प्लाटून शामिल किए जाने की व्यवस्था भी बताई गई है, जिनका संचालन प्रशिक्षित जवान करते हैं। ड्रोन के जरिए दुर्गम घाटियों और ऊंची चोटियों पर गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। इससे जमीन पर तैनात जवानों को परिस्थितियों की जानकारी मिलने और जरूरत के अनुसार कार्रवाई करने में सहायता मिलती है।

    इस तरह शौर्य कमांडो की विशेष ट्रेनिंग, बटालियन स्तर पर तैनाती और आधुनिक निगरानी तकनीक का इस्तेमाल LAC पर ITBP की तैयारियों का हिस्सा है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में सीमा की सुरक्षा करते हुए इन दस्तों की भूमिका त्वरित प्रतिक्रिया, सतर्कता और संवेदनशील परिस्थितियों के प्रबंधन से जुड़ी हुई है।

  • अरुणाचल सीमा पर चीनी सैनिकों से आमना-सामना, ITBP ने तैयार कीं शौर्य कमांडो टीमें..

    अरुणाचल सीमा पर चीनी सैनिकों से आमना-सामना, ITBP ने तैयार कीं शौर्य कमांडो टीमें..

    नई दिल्ली । भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव की स्थिति को लेकर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के महानिदेशक शत्रुजीत सिंह कपूर ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि राज्य के कई सीमावर्ती स्थानों पर भारतीय जवानों और चीनी सैनिकों के बीच आमने-सामने की स्थिति बनी है। इनमें से कुछ स्थानों पर ऐसी परिस्थितियां अब भी जारी हैं। उन्होंने बल के जवानों को संबोधित करते हुए सीमावर्ती क्षेत्रों में तैनात ‘शौर्य कमांडो’ टीमों के प्रदर्शन की सराहना की।

    यह जानकारी आईटीबीपी के 65वें स्थापना दिवस से पहले आयोजित ‘हिमवीर सम्मान समारोह’ के दौरान सामने आई। कपूर ने कहा कि हाल के दिनों में अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में जवानों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है। इन स्थितियों में तैनात शौर्य कमांडो टीमों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। सीमावर्ती क्षेत्रों में लगातार सतर्कता बनाए रखने और कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए बल अपनी परिचालन क्षमताओं को मजबूत कर रहा है।

    आईटीबीपी प्रमुख के अनुसार, बल की प्रत्येक बटालियन में कमांडो टीम तैयार की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त दो और टीमें गठित करने की प्रक्रिया चल रही है। दीर्घकालिक लक्ष्य हर बटालियन में एक पूर्ण कमांडो कंपनी तैयार करना है। इसके साथ ही विशेष अभियानों के संचालन के लिए एक अलग कमांडो बटालियन बनाने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इन इकाइयों को विशेष रूप से पहाड़ी और अधिक ऊंचाई वाले दुर्गम क्षेत्रों में काम करने के लिए तैयार किया जा रहा है, जहां मौसम, भौगोलिक परिस्थितियां और सीमित पहुंच जवानों के सामने चुनौतियां पैदा करती हैं।

    सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए आईटीबीपी आधुनिक तकनीक पर भी ध्यान दे रही है। कपूर ने कहा कि ड्रोन ने युद्ध के पारंपरिक तरीकों में बदलाव किया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और अन्य उन्नत तकनीकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इसी को देखते हुए बल ड्रोन संचालन, पायलटों के प्रशिक्षण और ड्रोन निर्माण की अपनी क्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है।

    ड्रोन के साथ-साथ एंटी-ड्रोन प्रणालियों के विकास और इस्तेमाल की तैयारी भी की जा रही है। इन तकनीकों का उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन से पैदा होने वाले संभावित खतरों का मुकाबला करना और निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाना है। बल की आधुनिकीकरण योजना में ड्रोन तथा एंटी-ड्रोन प्रणालियों के लिए लगभग 1,000 करोड़ रुपये निर्धारित करने की बात कही गई है। इसके अलावा वाहनों, उपकरणों और गोला-बारूद को आधुनिक बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

    दुर्गम सीमावर्ती इलाकों में तेजी से आवाजाही और प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष वाहनों, स्वचालित जमीनी वाहनों और क्विक रिएक्शन व्हीकल को भी योजना में शामिल किया गया है। इसके साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की तैयारी है। इन कदमों का उद्देश्य जरूरत पड़ने पर जवानों और उपकरणों की तैनाती को अधिक प्रभावी बनाना है।

    भारत और चीन के बीच सीमा संबंधी मुद्दों पर सैन्य स्तर पर बातचीत भी जारी रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 6 सितंबर 2026 को अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी क्षेत्र में वाचा-दमाई बॉर्डर पर्सनल मीटिंग पॉइंट पर कोर कमांडर स्तर की बैठक हुई थी। सीमा पर दोनों देशों की अलग-अलग धारणाओं के कारण कुछ क्षेत्रों में गश्त के दौरान आमने-सामने की स्थिति बनती रही है।

    आईटीबीपी प्रमुख का बयान बताता है कि सीमा पर सतर्कता बनाए रखने के साथ-साथ बल अपनी विशेष इकाइयों, निगरानी प्रणालियों और आधुनिक उपकरणों को मजबूत करने पर ध्यान दे रहा है। हालांकि, अरुणाचल प्रदेश में जिन स्थानों पर आमने-सामने की स्थिति बनी हुई है, उनके बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

  • भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल

    भारत-चीन पर रूस से तेल खरीदने के लिए प्रतिबंध चाहता था अमेरिका, यूरोप ने किया इनकार, ऐसी खुली पोल


    नई दिल्ली। रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की रणनीति को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन का रुख चर्चा में है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश रूसी तेल खरीदने के लिए भारत और चीन पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाएं, लेकिन उसके सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। बेसेंट ने इस मुद्दे पर यूरोपीय देशों की नीति की आलोचना करते हुए कहा कि अमेरिका अकेले प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए।

    अमेरिकी टीवी चैनल NBC के कार्यक्रम ‘मीट द प्रेस’ में बातचीत के दौरान बेसेंट ने कहा कि यूरोपीय देश एक ओर रूस के खिलाफ कार्रवाई की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर रूसी ऊर्जा का आयात भी जारी रखते हैं। उनके मुताबिक, इस तरह के आयात से रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए आर्थिक मदद मिलती है।

    ‘अकेला अमेरिका ही प्रतिबंधों का बोझ क्यों उठाए?’

    बेसेंट ने कहा कि अमेरिका ने यूरोपीय सहयोगियों से भारत और चीन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया था, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब यूरोपीय देश खुद रूसी ऊर्जा खरीद रहे हैं, तो अमेरिका ही इस दिशा में अकेले कदम क्यों उठाए।

    अमेरिकी वित्त मंत्री ने यूरोप के ऊर्जा आयात को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों ने यूक्रेन की तुलना में रूस और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अधिक पैसा दिया है। बेसेंट के अनुसार, अमेरिका करीब 4 अरब डॉलर के रूसी उत्पादों का आयात करता है, जिसमें लगभग 1.8 अरब डॉलर का उर्वरक शामिल है। उन्होंने दावा किया कि यूरोपीय देशों का रूसी उत्पादों का आयात अमेरिका के मुकाबले करीब दस गुना है।

    प्रतिबंधों और टैरिफ पर 60 दिनों की अस्थायी छूट

    अमेरिकी प्रशासन के मुताबिक, रूस पर प्रतिबंधों और भारत समेत अन्य देशों पर टैरिफ से जुड़ी छूट को 60 दिनों के लिए अस्थायी रूप से दिया गया है। इसका उद्देश्य इन उपायों के आर्थिक प्रभाव का आकलन करना है।

    वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ‘लिंडसे ओ’ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट’ के तहत राष्ट्रपति को परिस्थितियों का आकलन करने की छूट है। बेसेंट के मुताबिक, शुक्रवार को राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश के जरिए 60 दिनों की छूट दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे स्थायी रूप से प्रतिबंध हटाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

    विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और उज्बेकिस्तान की छह दिवसीय यात्रा पर रवाना होने से पहले पत्रकारों से बातचीत में कहा कि राष्ट्रपति इन 60 दिनों का इस्तेमाल यह समझने के लिए करना चाहते हैं कि प्रतिबंधों और टैरिफ का वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ता है।

    रुबियो ने इस दौरान ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव, सऊदी अरब में हूती हमलों और रूस-यूक्रेन युद्ध का भी उल्लेख किया।

    ट्रंप ने फैसले को बताया था अमेरिका और दुनिया के लिए अच्छा

    शुक्रवार को मियामी के पास मार-ए-लागो रिसॉर्ट में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने फैसले का बचाव किया था। उन्होंने इसे अमेरिका और दुनिया, दोनों के लिए अच्छा निर्णय बताया। हालांकि, इस कदम को लेकर अमेरिकी राजनीति में विरोध भी सामने आया है। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसदों ने फैसले पर सवाल उठाए हैं।

    भारतीय-अमेरिकी सांसद अमी बेरा ने सोशल मीडिया पर कहा कि ट्रंप का कदम रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को राहत देने और यूक्रेन को पीछे छोड़ने जैसा है। वहीं, सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने भी ट्रंप प्रशासन के रुख की आलोचना करते हुए कहा कि सहयोगियों की ढिलाई की कीमत अमेरिका और उसके साझेदारों को चुकानी पड़ रही है।

    रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर भारत और चीन के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद ऐसे समय सामने आए हैं, जब यूक्रेन युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बना हुआ है। फिलहाल 60 दिनों की अस्थायी छूट के बाद अमेरिकी प्रशासन की अगली रणनीति पर नजर रहेगी।

  • चीन को अमेरिकी हथियार बेचने के दावे पर ट्रंप का यू-टर्न? अपने ही राजदूत के बयान से किया किनारा

    चीन को अमेरिकी हथियार बेचने के दावे पर ट्रंप का यू-टर्न? अपने ही राजदूत के बयान से किया किनारा

    वाशिंगटन। चीन को अमेरिकी हथियार बेचने के दावे को लेकर ट्रंप प्रशासन में ही विरोधाभासी बयान सामने आए हैं। अमेरिका में चीन के राजदूत डेविड पर्ड्यू ने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से पूछा था कि क्या चीन अमेरिका से हथियार खरीदना चाहेगा। हालांकि, ट्रंप ने इस दावे से अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि उन्हें ऐसी किसी बातचीत की जानकारी नहीं है। बाद में उन्होंने यह जरूर कहा कि चीन अमेरिकी हथियार खरीदना चाहेगा, क्योंकि अमेरिका बेहतर हथियार बनाता है।

    ट्रंप से सोमवार को पत्रकारों ने पर्ड्यू के बयान को लेकर सवाल किया। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने शी के साथ चीन को हथियार बेचने की बात नहीं की थी और संकेत दिया कि संभव है पर्ड्यू ताइवान से संबंधित बातचीत का जिक्र कर रहे हों। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि चीन अमेरिकी हथियार खरीदना चाहे तो यह अच्छा विचार हो सकता है।

    विदेश विभाग बोला- चीन को हथियार बेचने की कोई योजना नहीं

    ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने भी स्थिति स्पष्ट की। विभाग ने कहा कि अमेरिकी कानून चीन को हथियारों की बिक्री पर रोक लगाता है और चीन को हथियार बेचने का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही ऐसी कोई योजना। एक अमेरिकी अधिकारी ने भी कहा कि सरकार की चीन को हथियार बेचने की कोई योजना नहीं है।

    इससे पर्ड्यू के बयान और प्रशासन की आधिकारिक स्थिति के बीच अंतर साफ दिखाई देता है। पर्ड्यू ने यह नहीं बताया था कि ट्रंप ने शी से यह सवाल कब और किस संदर्भ में पूछा था। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि शी ने इसके जवाब में क्या कहा।

    पर्ड्यू ने फॉक्स न्यूज पर किया था दावा

    अमेरिकी राजदूत डेविड पर्ड्यू ने रविवार को फॉक्स न्यूज के कार्यक्रम में ट्रंप-शी बैठक से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए कहा था कि राष्ट्रपति ट्रंप दुनिया के दूसरे देशों को अमेरिकी हथियार बेचने की बात करते रहे हैं और उन्होंने एक मौके पर शी जिनपिंग से भी पूछा था कि क्या वह कुछ अमेरिकी हथियार खरीदना चाहेंगे।

    पर्ड्यू का यह बयान ऐसे समय आया जब ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री को लेकर वाशिंगटन और बीजिंग के बीच तनाव बना हुआ है। पर्ड्यू ने साथ ही कहा था कि ट्रंप ताइवान के प्रति अमेरिकी नीति में बदलाव नहीं कर रहे हैं और ‘वन चाइना’ नीति पर उनका रुख कायम है।

    ताइवान को हथियारों की बिक्री पर चीन का विरोध

    ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच विवाद का मुद्दा रही है। बीजिंग वॉशिंगटन से ताइवान को हथियारों की बिक्री रोकने की मांग करता रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका ताइवान को अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने के लिए सैन्य उपकरण उपलब्ध कराता रहा है।

    ट्रंप प्रशासन ने ताइवान के लिए करीब 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज पर फिलहाल रोक लगा रखी है। इस मुद्दे को ट्रंप ने चीन के साथ बातचीत में एक संभावित सौदेबाजी के विषय के रूप में भी पेश किया है।

    अगर चीन को हथियार बेचने की बात होती तो क्यों अहम होता मामला?

    अमेरिका और चीन के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा को देखते हुए चीन को अमेरिकी हथियारों की बिक्री अमेरिकी नीति में बड़ा बदलाव होती। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने आखिरी बार 1980 के दशक में चीन को हथियार बेचे थे। मौजूदा समय में चीन को अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक प्रतिस्पर्धी माना जाता है।

    फिलहाल अमेरिकी प्रशासन की आधिकारिक स्थिति स्पष्ट है कि चीन को हथियार बेचने का कोई प्रस्ताव या योजना नहीं है। वहीं, ट्रंप और उनके राजदूत डेविड पर्ड्यू के बयानों में अंतर ने इस मुद्दे को चर्चा में ला दिया है। चीन ने भी ट्रंप के कथित प्रस्ताव की पुष्टि नहीं की है।

  • शी जिनपिंग ने पांच साल में एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने का किया बड़ा एलान

    शी जिनपिंग ने पांच साल में एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने का किया बड़ा एलान


    नई दिल्ली ।
    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अगले पांच वर्षों में एक लाख युवा अमेरिकियों को चीन आने का निमंत्रण दिया है। इन युवाओं के लिए पढ़ाई और विभिन्न आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अवसर उपलब्ध कराने की बात कही गई है। यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब चीन और अमेरिका के बीच संबंधों में व्यापार, तकनीक और अन्य रणनीतिक मुद्दों को लेकर लगातार चर्चा बनी हुई है। शी जिनपिंग ने युवाओं को दोनों देशों के भविष्य के संबंधों से जोड़ते हुए लोगों के बीच संपर्क और आपसी समझ बढ़ाने पर जोर दिया।

    शी जिनपिंग ने कहा कि चीन और अमेरिका के रिश्तों की उम्मीद दोनों देशों के लोगों से जुड़ी है और इन संबंधों का भविष्य युवाओं के हाथ में है। इसी सोच के तहत उन्होंने अगले पांच वर्षों में एक लाख युवा अमेरिकियों को चीन आने का न्योता देने की घोषणा की। इन यात्राओं में शिक्षा के साथ सांस्कृतिक और अन्य आदान-प्रदान कार्यक्रमों को भी शामिल किया जाएगा।

    यह पहली बार नहीं है जब चीन की ओर से अमेरिकी युवाओं को इस तरह आमंत्रित किया गया है। नवंबर 2023 में भी पांच वर्षों के भीतर 50 हजार युवा अमेरिकियों को चीन बुलाने की पहल की गई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह लक्ष्य तय समय से करीब ढाई साल पहले ही पूरा हो गया। इसके बाद अब प्रस्तावित संख्या को बढ़ाकर एक लाख कर दिया गया है।

    इस पहल के तहत अमेरिकी युवाओं ने चीन के अलग-अलग हिस्सों का दौरा किया है। कई युवाओं ने वहां शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लिया, स्थानीय लोगों से मुलाकात की और चीन के इतिहास तथा आधुनिक विकास को करीब से समझने का अवसर पाया। चीन में आयोजित कार्यक्रमों में विश्वविद्यालयों के छात्रों के बीच संवाद और विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियां भी शामिल रही हैं।

    अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने चीन और अमेरिका के पुराने संबंधों का भी उल्लेख किया। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दोनों देशों के सहयोग को याद किया और कहा कि उस समय दोनों पक्षों ने फासीवादी ताकतों के खिलाफ मिलकर लड़ाई लड़ी थी। उनका कहना था कि इस साझा इतिहास को दोनों देशों के लोगों ने याद रखा है।

    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान चीन और अमेरिका के सहयोग का उल्लेख किया। उन्होंने चीन की मदद करने वाले अमेरिकी पायलटों के समूह ‘फ्लाइंग टाइगर्स’ की भूमिका को याद किया। इसके साथ ही उन्होंने दोनों देशों के बीच पुराने संपर्कों से जुड़े ‘गंग हो’ शब्द का भी जिक्र किया और इसे मिलकर काम करने के अर्थ से जोड़ा।

    शी जिनपिंग ने यह भी कहा कि चीन के राष्ट्रीय पुनरुत्थान का लक्ष्य और अमेरिका को फिर से महान बनाने की कोशिश एक-दूसरे के साथ आगे बढ़ सकती हैं। उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच दोस्ती और संपर्क बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया।

    एक लाख अमेरिकी युवाओं को चीन बुलाने की नई पहल को शिक्षा, सांस्कृतिक संपर्क और लोगों के बीच संवाद बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। पिछले कार्यक्रम में 50 हजार युवाओं का लक्ष्य समय से पहले पूरा होने के बाद अब इसकी संख्या दोगुनी की गई है। आने वाले पांच वर्षों में इस पहल के तहत कितने युवा चीन पहुंचते हैं और इससे दोनों देशों के बीच शैक्षणिक एवं सामाजिक संपर्क किस स्तर तक बढ़ता है, यह आगे स्पष्ट होगा।

  • ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात में दिखी गर्मजोशी, लेकिन बड़े मुद्दे अभी बाकी, बैठक से निकले 5 अहम संकेत

    ट्रंप-जिनपिंग की मुलाकात में दिखी गर्मजोशी, लेकिन बड़े मुद्दे अभी बाकी, बैठक से निकले 5 अहम संकेत


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात में दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी के संकेत जरूर दिखे, लेकिन कई बड़े और संवेदनशील मुद्दों पर अभी अंतिम समाधान सामने नहीं आया है। व्यापार समझौते की अवधि बढ़ाने से लेकर ताइवान, अमेरिका-चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, बैठक में ऐसे पांच मुद्दे सामने आए जो आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों की दिशा तय कर सकते हैं।

    1. ट्रेड डील सिर्फ दो महीने के लिए आगे बढ़ी

    बैठक से सबसे बड़ा व्यावहारिक नतीजा व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के रूप में सामने आया। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, अमेरिका और चीन उस ट्रेड डील को दो महीने के लिए बढ़ाने पर सहमत हुए हैं, जिसने पिछले साल दोनों देशों के बीच चल रहे ट्रेड वॉर को खत्म करने में भूमिका निभाई थी। यह समझौता नवंबर में खत्म होने वाला था।

    हालांकि, यह विस्तार लंबी अवधि का समाधान नहीं है। टैरिफ, चीन की खरीद, रेयर-अर्थ सप्लाई और तकनीकी प्रतिबंध जैसे जटिल मुद्दों पर दोनों देशों के बीच बातचीत आगे भी जारी रहेगी। यानी फिलहाल इन मुद्दों पर अंतिम सहमति के बजाय बातचीत के लिए समय बढ़ाया गया है।

    2. व्हाइट हाउस में अमेरिकी अंदाज में हुआ भव्य स्वागत

    जिनपिंग के दौरे के दौरान व्हाइट हाउस में भव्य समारोहों का आयोजन किया गया। ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति के स्वागत के लिए अमेरिकी सैन्य परंपरा और शान-शौकत को खास तौर पर प्रदर्शित किया।

    बुधवार और गुरुवार को आयोजित कार्यक्रमों में त्रिकोणीय टोपियां और विशेष वेशभूषा पहने सैनिकों ने मार्च किया। संगीत के साथ आसमान में फाइटर जेट्स और बमवर्षक विमानों ने भी उड़ान भरी। एक मौके पर जेट की तेज आवाज से राष्ट्रपति ट्रंप भी चौंक गए।

    ट्रंप ने जिनपिंग को व्हाइट हाउस के नए हेलीपैड और ‘मरीन वन’ हेलीकॉप्टर की जानकारी भी दी। इस तरह बैठक के राजनीतिक एजेंडे के साथ दोनों नेताओं की मुलाकात में प्रतीकात्मक और औपचारिक पहलू भी नजर आया।

    3. ताइवान पर चीन ने अमेरिका से सावधानी बरतने को कहा

    बैठक में ताइवान का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी के मुताबिक, शी जिनपिंग ने ट्रंप से ताइवान के सवाल पर चर्चा की और उम्मीद जताई कि अमेरिका इस मुद्दे को बेहद सावधानी से संभालेगा।

    चीनी पक्ष ने यह भी कहा कि बीजिंग चाहता है कि अमेरिका ताइवान की स्वतंत्रता का स्पष्ट रूप से विरोध करे।

    हालांकि, अमेरिका ने ताइवान को लेकर अपने पुराने रुख में कोई बदलाव नहीं किया है। इस मुद्दे पर किसी बड़े बदलाव का असर ताइवान की सुरक्षा और अमेरिकी कांग्रेस में राजनीतिक प्रतिक्रिया पर भी पड़ सकता है।

    4. ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ का जिक्र, टकराव के जोखिम पर संकेत

    शी जिनपिंग ने मुलाकात के दौरान एक बार फिर ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ का जिक्र किया। यह एक अकादमिक अवधारणा है, जिसके मुताबिक किसी उभरती हुई महाशक्ति और मौजूदा प्रमुख महाशक्ति के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से टकराव का खतरा पैदा हो सकता है।

    जिनपिंग ने हालांकि यह भी कहा कि इस जोखिम से बचा जा सकता है। उनके इस संदर्भ को अमेरिका और चीन के बीच जारी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा गया। दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के साथ सैन्य टकराव की आशंका भी लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय रही है।

    5. AI को लेकर दोनों नेताओं की सोच अलग

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के भविष्य और उसके नियमन को लेकर ट्रंप और जिनपिंग के विचारों में अंतर दिखाई दिया।

    राष्ट्रपति ट्रंप AI को ‘सुपर इंटेलिजेंस’ यानी ‘SI’ कहने पर जोर देते हैं और उनका रुख नई तरह के नियंत्रण लागू करने के प्रति सतर्कता का रहा है। दूसरी ओर, जिनपिंग ने कहा कि दुनिया की प्रमुख शक्तियों के रूप में अमेरिका और चीन की जिम्मेदारी है कि AI के विकास को नियंत्रित किया जाए।

    जिनपिंग ने जोर दिया कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि AI इंसानों के नियंत्रण में रहे और मानवता के हित में काम करे। इससे संकेत मिलता है कि तकनीक के भविष्य को लेकर दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाओं के साथ नीति और नियमन को लेकर मतभेद भी बने हुए हैं।

    स्टेट डिनर में टेक जगत के दिग्गज भी पहुंचे

    ट्रंप ने जिनपिंग के साथ बैठक के बाद व्हाइट हाउस में चीनी राष्ट्रपति के सम्मान में शानदार स्टेट डिनर का आयोजन किया। इसमें टेक्नोलॉजी जगत की कई प्रमुख हस्तियां भी शामिल हुईं।

    डिनर में गूगल के सुंदर पिचई, OpenAI के सैम ऑल्टमैन और Nvidia के जेनसेन ह्वांग जैसे टेक जगत के दिग्गज मौजूद रहे। ऐसे में बैठक के राजनीतिक और व्यापारिक एजेंडे के साथ AI और तकनीकी क्षेत्र की भूमिका भी खास तौर पर चर्चा में रही।

    कुल मिलाकर, ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात में व्यापार के मोर्चे पर सीमित अवधि का समझौता जरूर हुआ, लेकिन ताइवान, तकनीकी प्रतिबंध, रेयर-अर्थ सप्लाई और AI जैसे कई अहम मुद्दे अभी भी बातचीत के दायरे में हैं। दोनों देशों के रिश्तों में आगे की दिशा इन मुद्दों पर होने वाली अगली बातचीत से तय होगी।

  • ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात के बीच अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर पर राहत, व्यापारिक युद्धविराम जनवरी 2027 तक बढ़ाया गया

    ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात के बीच अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर पर राहत, व्यापारिक युद्धविराम जनवरी 2027 तक बढ़ाया गया


    नई दिल्ली ।
    अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से जारी व्यापारिक तनाव के बीच दोनों देशों ने फिलहाल राहत की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। दोनों देशों ने मौजूदा व्यापारिक युद्धविराम की अवधि को करीब दो महीने आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। पहले यह समझौता 10 नवंबर 2026 को समाप्त होना था, लेकिन अब इसकी अवधि बढ़ाकर 10 जनवरी 2027 कर दी गई है।

    इस फैसले से अमेरिका और चीन को टैरिफ सहित कई व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत जारी रखने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चल रहे व्यापारिक विवाद में टैरिफ, आयात-निर्यात और अन्य आर्थिक विषयों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। ऐसे में युद्धविराम की अवधि बढ़ने से बातचीत के जरिए समाधान तलाशने का अवसर मिलेगा।

    यह फैसला चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान सामने आया है। शी जिनपिंग अपनी पत्नी पेंग लियुआन के साथ अमेरिका पहुंचे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पत्नी मेलानिया ने उनका स्वागत किया। इसके बाद ट्रंप और जिनपिंग के बीच मुलाकात भी हुई।

    दोनों नेताओं की बैठक को अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बातचीत के दौरान टैरिफ समेत कई आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव कम करने और आगे की बातचीत का रास्ता बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है।

    मौजूदा व्यापारिक युद्धविराम की अवधि बढ़ाए जाने का सीधा मतलब यह है कि दोनों देशों के पास अब अपने विवादित मुद्दों पर चर्चा के लिए पहले की तुलना में अधिक समय रहेगा। इससे तत्काल व्यापारिक टकराव बढ़ने की स्थिति को टालने में मदद मिल सकती है।

    अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रखने की जरूरत पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और चीन के बीच कई मुद्दों पर मतभेद हैं, लेकिन दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद जरूरी है।

    अमेरिका और चीन दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच टैरिफ और व्यापार नीति से जुड़े फैसलों पर दुनियाभर की नजर रहती है।

    युद्धविराम की अवधि बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच सभी व्यापारिक मतभेद समाप्त नहीं हुए हैं। टैरिफ और अन्य आर्थिक मुद्दों पर आगे भी बातचीत जारी रहने की संभावना है। दोनों पक्षों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अस्थायी राहत को आगे किसी व्यापक व्यापारिक समझौते की दिशा में ले जा सकें।

    अब 10 जनवरी 2027 तक अमेरिका और चीन के पास व्यापारिक विवादों पर बातचीत आगे बढ़ाने का अतिरिक्त समय है। ट्रंप और जिनपिंग की मुलाकात के बीच हुआ यह फैसला दोनों देशों के बीच जारी व्यापारिक संवाद को बनाए रखने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

  • चीन का एआई मिशन तेज, रोबोटिक्स और सरकारी निवेश के सहारे तकनीकी ताकत बढ़ाने की तैयारी

    चीन का एआई मिशन तेज, रोबोटिक्स और सरकारी निवेश के सहारे तकनीकी ताकत बढ़ाने की तैयारी

    नई दिल्ली । चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और उन्नत विनिर्माण के क्षेत्र में अपनी क्षमता तेजी से बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। सरकार भारी निवेश, तकनीकी अनुसंधान और औद्योगिक विकास के जरिए एआई को अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की योजना पर आगे बढ़ रही है। इस रणनीति का उद्देश्य आने वाले वर्षों में चीन को वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में मजबूत स्थिति दिलाना है।

    चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हाल ही में एक प्रौद्योगिकी पार्क का दौरा किया, जहां रोबोटिक्स और एआई से जुड़ी कई परियोजनाओं को प्रदर्शित किया गया। इस दौरान उन्होंने रोबोटिक तकनीक के इस्तेमाल को देखा और कहा कि उन्नत रोबोटिक्स तथा उच्चस्तरीय विनिर्माण चीन की अगली आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। चीन की सरकार एआई को केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित रखने के बजाय विभिन्न औद्योगिक और सामाजिक क्षेत्रों में इस्तेमाल करने की दिशा में काम कर रही है।

    जिस प्रौद्योगिकी पार्क का दौरा किया गया, वहां सैकड़ों कंपनियां अत्याधुनिक चिप्स और एआई मॉडल विकसित करने में लगी हैं। स्थानीय प्रशासन इन कंपनियों को बड़े स्तर पर कंप्यूटिंग संसाधन उपलब्ध करा रहा है। इसका उद्देश्य एआई अनुसंधान और नई तकनीकों के विकास की गति को बढ़ाना है।

    चीन में एआई से जुड़े अनुसंधान का दायरा भी लगातार विस्तृत किया जा रहा है। तकनीकी प्रदर्शनों में ऐसे चिप्स और उपकरण शामिल हैं जिनका इस्तेमाल अत्याधुनिक प्रणालियों में किया जा सकता है। इसके अलावा लकवाग्रस्त मरीजों को संवाद करने में मदद करने वाली ब्रेन-इम्प्लांट तकनीक जैसे प्रयोग भी सामने आए हैं। इससे संकेत मिलता है कि चीन एआई और रोबोटिक्स को औद्योगिक उपयोग के साथ-साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में भी आगे बढ़ाना चाहता है।

    इस अभियान में सरकारी पूंजी की भूमिका काफी बड़ी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2000 से 2023 के बीच सरकार के नेतृत्व वाले फंडों ने एआई कंपनियों में 184 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया। इसके अलावा पिछले साल सरकार और सरकारी बैंकों की ओर से एआई क्षेत्र में सैकड़ों अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई थी। हालांकि निजी क्षेत्र से चीन में होने वाला एआई निवेश अभी अमेरिका की तुलना में कम बताया गया है।

    चीन की बढ़ती बुजुर्ग आबादी भी रोबोटिक्स के विकास की एक बड़ी वजह है। देश में ऐसे बुद्धिमान रोबोट तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है जो भविष्य में कामगारों की कमी को पूरा करने में मदद कर सकें। स्वास्थ्य क्षेत्र में भी एआई आधारित डिजिटल तकनीक के जरिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाओं को अधिक लोगों तक पहुंचाने की संभावनाओं पर काम हो रहा है।

    सरकार का लक्ष्य 2030 तक एआई टूल्स और एआई एजेंट्स की पहुंच चीनी समाज के 90 प्रतिशत हिस्से तक बढ़ाने का है। हालांकि इस लक्ष्य को किस तरह मापा जाएगा, इसकी स्पष्ट रूपरेखा सामने नहीं आई है।

    एआई के विस्तार के साथ चीन के सामने कुछ जोखिम भी हैं। उन्नत चैटबॉट और सूचना आधारित तकनीक सरकारी सूचना नियंत्रण की व्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। वहीं अत्याधुनिक विदेशी एआई मॉडल साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भी जोखिम बढ़ा सकते हैं। इसके बावजूद चीन सरकार एआई, रोबोटिक्स और उन्नत तकनीक में निवेश तथा अनुसंधान को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।

  • ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका जा रहे F-35 के संवेदनशील पुर्जे हॉन्गकॉन्ग कैसे पहुंचे? चीन तक पहुंचने की आशंका से बढ़ी चिंता

    ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका जा रहे F-35 के संवेदनशील पुर्जे हॉन्गकॉन्ग कैसे पहुंचे? चीन तक पहुंचने की आशंका से बढ़ी चिंता


    सिडनी।
    पांचवीं पीढ़ी के अमेरिकी स्टील्थ लड़ाकू विमान F-35 लाइटनिंग II के बेहद संवेदनशील स्पेयर पार्ट्स की एक खेप ऑस्ट्रेलिया से मरम्मत के लिए अमेरिका भेजे जाने के दौरान रहस्यमय तरीके से हॉन्गकॉन्ग की ओर डायवर्ट हो गई। घटना सामने आने के बाद अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन और अमेरिकी संसद कांग्रेस के राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हलकों में चिंता बढ़ गई है। पेंटागन ने पुष्टि की है कि इस शिपमेंट में शामिल F-35 के कुछ संवेदनशील पुर्जों का पता नहीं चल पाया है।

    क्या गायब हुआ और क्यों अहम है?

    मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गायब खेप में F-35 का कॉकपिट कैनोपी भी शामिल था। F-35 का कैनोपी सामान्य कांच या प्लास्टिक का कवर नहीं है। यह विशेष ऐक्रेलिक सामग्री से तैयार किया जाता है और इसकी सतह पर रडार-अब्जॉर्बेंट मटेरियल (RAM) की बेहद पतली पारदर्शी परत होती है।

    यह तकनीक विमान की स्टील्थ क्षमता का हिस्सा है। इसका उद्देश्य रडार तरंगों के परावर्तन को कम करना है, जिससे विमान को दुश्मन के रडार पर पकड़ना कठिन हो जाता है।

    रक्षा विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि यदि ऐसा कोई वास्तविक पुर्जा किसी प्रतिद्वंद्वी देश के हाथ लग जाए तो उसकी तकनीकी जांच से संबंधित सामग्री और तकनीक के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं आया है कि गायब पुर्जे चीन की सेना के हाथ लगे हैं।

    ऑस्ट्रेलिया से अमेरिका भेजे जा रहे थे पुर्जे

    अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, नॉर्वे, पोलैंड और नीदरलैंड समेत कई सहयोगी देश F-35 लड़ाकू विमानों का संचालन करते हैं। ऑस्ट्रेलिया में F-35 के रखरखाव की सुविधाएं मौजूद हैं, लेकिन कैनोपी की विशेष मरम्मत सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे अमेरिका भेजा जा रहा था।

    रिपोर्टों के मुताबिक, लॉकहीड मार्टिन के एक ठेकेदार या कमर्शियल शिपिंग प्रदाता के माध्यम से भेजे जा रहे कंटेनर को रास्ते में हॉन्गकॉन्ग की ओर डायवर्ट कर दिया गया। इसी कारण यह सवाल उठ रहा है कि संवेदनशील रक्षा सामग्री वाली खेप को इस मार्ग पर कैसे भेजा गया और बाद में उसके कुछ पुर्जों का पता क्यों नहीं चल सका।

    हॉन्गकॉन्ग पहुंचने से बढ़ी चिंता

    हॉन्गकॉन्ग में चीन का प्रशासनिक और सुरक्षा नियंत्रण होने के कारण अमेरिकी पक्ष के लिए यह मामला संवेदनशील माना जा रहा है। आशंका जताई जा रही है कि हॉन्गकॉन्ग में पहुंचने के बाद खेप की सुरक्षा से समझौता हुआ हो सकता है। हालांकि, अभी तक यह साबित नहीं हुआ है कि किसी चीनी एजेंसी ने F-35 के पुर्जों को जब्त या स्कैन किया है।

    अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के F-35 जॉइंट प्रोग्राम ऑफिस (JPO) ने कहा है कि वह गायब पुर्जों की स्थिति का पता लगाने और उन्हें वापस हासिल करने के लिए अमेरिकी एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहा है। मामले की जांच भी जारी है।

    F-35 स्पेयर पार्ट्स की ट्रैकिंग पर पहले भी उठे सवाल

    F-35 के स्पेयर पार्ट्स की निगरानी को लेकर पहले भी सवाल उठ चुके हैं। 2023 की अमेरिकी सरकारी जवाबदेही कार्यालय (GAO) की रिपोर्ट में बताया गया था कि लॉकहीड मार्टिन और पेंटागन की व्यवस्था में खामियों के कारण पिछले पांच वर्षों में F-35 के करीब 8.5 करोड़ डॉलर मूल्य के 10 लाख से अधिक छोटे-बड़े स्पेयर पार्ट्स की ट्रैकिंग खो गई थी।

    2025 में भारत में भी कई सप्ताह खड़ा रहा था F-35B

    F-35 को लेकर इससे पहले भी संवेदनशीलता का मामला सामने आया था। 14 जून 2025 को ब्रिटेन का F-35B स्टील्थ लड़ाकू विमान केरल के तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर आपात लैंडिंग के बाद करीब पांच सप्ताह तक वहां खड़ा रहा था। विमान 22 जुलाई 2025 तक भारत में रहा।

    विमान अरब सागर में नियमित उड़ान पर था। खराब मौसम के कारण वह अपने मूल बेस और रॉयल नेवी के विमानवाहक पोत HMS Prince of Wales पर वापस नहीं लौट सका। ईंधन कम होने के कारण उसने तिरुवनंतपुरम को आपातकालीन रिकवरी एयरफील्ड के तौर पर चुना था।

    विमान की संवेदनशील तकनीक को देखते हुए ब्रिटेन ने भारत की ओर से उपलब्ध कराई गई हैंगर सुविधा और तकनीकी सहायता का इस्तेमाल नहीं किया था। उस समय F-35 की स्टील्थ कोटिंग और एडवांस्ड सेंसर फ्यूजन सिस्टम जैसी तकनीकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं सामने आई थीं। विमान को हवाईअड्डे पर खुले में रखा गया था और उसकी सुरक्षा CISF के जिम्मे थी।

    F-35 के पुर्जों की मौजूदा घटना ने एक बार फिर इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान की सप्लाई चेन, स्पेयर पार्ट्स की निगरानी और संवेदनशील तकनीकी सामग्री की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।