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  • सिक्किम से रेल नेटवर्क से जुड़ेगा भूटान… तेजी से चल रहा काम, बढ़ सकती है चीन की टेंशन

    सिक्किम से रेल नेटवर्क से जुड़ेगा भूटान… तेजी से चल रहा काम, बढ़ सकती है चीन की टेंशन


    नई दिल्ली।
    पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम (Northeastern State Sikkim) और पड़ोसी देश भूटान (Bhutan) जल्द भारतीय रेल (Indian Railways) के आधिकारिक मानचित्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। भारत-चीन (India-China) और भारत-भूटान सीमा (India-Bhutan border) पर रणनीतिक पहुंच और कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए रेल और रक्षा मंत्रालय ने इन परियोजनाओं पर काम तेज कर दिया है। सरकार ने सिक्किम के लिए 2027 और भूटान के लिए 2029 तक ट्रेन सेवाएं शुरू करने का लक्ष्य रखा है। भारत सरकार का यह कदम चीन के लिए टेंशन बन सकता है। चिकन नेक पर नजर रखने वाले चीन के लिए यह बड़ा झटका होगा।


    भूटान के लिए 69 किमी की रेल लाइन

    रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत-भूटान को जोड़ने के लिए 69 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय रेललाइन पर केंद्र सरकार 3500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। सरकार ने कोकराझार-गेलेफू रेललाइन को आधिकारिक तौर पर विशेष रेल परियोजना का दर्जा दिया है। ऐसा प्रशासनिक अड़चनें दूर कर भूमि अधिग्रहण और वन मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी के लिए किया गया है। यह रेल कनेक्टिवटी न केवल दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार को नई मजबूती देगा, बल्कि भूटान के गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी मास्टर प्लान को भी सीधे भारतीय रेल नेटवर्क से जोड़ेगा।


    सीमा सुरक्षा मजबूत होगी, पर्यटन को भी उड़ान

    इन दोनों परियोजनाओं से न केवल पूर्वोत्तर के दुर्गम क्षेत्रों में आम लोगों, पर्यटकों और व्यापारियों की आवाजाही सुगम और सस्ती होगी, बल्कि सीमा पर भारत का सामरिक और भौगोलिक शक्ति-संतुलन भी पूरी तरह बदल जाएगा। सीमा सुरक्षा और सैन्य रसद (लॉजिस्टिक्स) में रणनीतिक मजबूती आएगी। चीन और भूटान की सीमाओं पर स्थित इन बेहद संवेदनशील मोर्चों पर वर्तमान में मौसम खराब या भूस्खलन के कारण सेना की आवाजाही बाधित हो जाती है। नई रेल लाइन शुरू होने से वहां सैन्य साजो-सामान, हथियार और टुकड़ियों को पहुंचाने में लगने वाला समय 50 फीसदी से अधिक घट जाएगा। विशेषकर तीस्ता के नीचे बन रहे भूमिगत स्टेशन और सुरंगों से गुजरने वाला यह मार्ग हर मौसम में सुरक्षित कनेक्टिविटी प्रदान करेगा।

    सिक्किम को ब्रॉडगेज रेल सेवा से जोड़ने के लिए सेवक-रंगपो रेल परियोजना पर काम अंतिम चरण में पहुंच गया है। 44.96 किलोमीटर लंबी इस चुनौतीपूर्ण रेललाइन का लगभग 86-90 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरता है। परियोजना का सबसे मुख्य आकर्षण तीस्ता नदी के नीचे तैयार किया जा रहा तीस्ता बाजार रेलवे स्टेशन है। यह देश का पहला पूरी तरह अंडरग्राउंड रेलवे स्टेशन होगा। 12450 करोड़ की लागत से बनाई जा रही रेल लाइन पर सेफ्टी ट्रायल रन और ट्रेन परिचालन दिसंबर 2027 तक शुरू करने का लक्ष्य है।

  • नेपाल त्रासदी पर चीन की चुप्पी पर सवाल: सिर्फ 5 मौतों की जानकारी, तिब्बत में पीड़ितों से बात करने पर भी पाबंदी

    नेपाल त्रासदी पर चीन की चुप्पी पर सवाल: सिर्फ 5 मौतों की जानकारी, तिब्बत में पीड़ितों से बात करने पर भी पाबंदी


    नई दिल्ली। नेपाल में बुधवार को आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। इस आपदा में मृतकों की संख्या बढ़कर 579 हो गई है, जबकि करीब 2 हजार लोग अब भी लापता हैं। भारत के भी सैकड़ों नागरिकों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। आपदा का असर चीन के तिब्बत क्षेत्र से भी जुड़ा है, लेकिन चीन की ओर से अब तक सिर्फ 5 लोगों की मौत की जानकारी दी गई है। इससे चीन की ओर से वास्तविक नुकसान और जनहानि की जानकारी छिपाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    चीन में तबाही, लेकिन जानकारी बेहद सीमित

    द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन का सरकारी मीडिया भी इस आपदा को लेकर व्यापक रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है। कुछ पत्रकार प्रभावित इलाकों में पहुंचते हैं, लेकिन वहां पीड़ितों और स्थानीय लोगों से बातचीत करने के बजाय रिपोर्टिंग मुख्य रूप से सरकारी राहत एवं बचाव प्रयासों तक सीमित रहती है। रिपोर्टों में चीन की ओर से किए जा रहे राहत कार्यों को प्रमुखता दी जाती है, जबकि आम लोगों की स्थिति सामने नहीं आ रही है।

    नेपाल में बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि चीन के प्रभावित हिस्सों में भी नुकसान व्यापक हो सकता है। इसके बावजूद चीन की ओर से जनहानि और तबाही का विस्तृत आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    तिब्बत में पत्रकारों और स्थानीय लोगों पर पाबंदियों का आरोप

    चीन तिब्बत पर अपना दावा करता है, जबकि तिब्बत की स्वायत्तता और स्वतंत्रता की मांग लंबे समय से उठती रही है। रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत में अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की पहुंच पर कड़े प्रतिबंध हैं। स्थानीय लोगों के पत्रकारों से बातचीत करने पर भी कार्रवाई का खतरा रहता है।

    तिब्बत में भाषा और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को लेकर भी चीन की नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है। ऐसे में मौजूदा आपदा के दौरान भी स्थानीय लोगों की आवाज और जमीनी हालात के सामने न आने पर सवाल उठ रहे हैं।

    चीन ने भेजी राहत टीम, शी जिनपिंग ने की बैठक

    जानकारी के मुताबिक, चीन ने प्रभावित क्षेत्र में राहत और बचाव दल भेजे हैं। हालांकि, इन टीमों ने मौके पर किस स्तर पर और क्या काम किया, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    चीनी मीडिया ने बताया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राहत एवं बचाव कार्यों को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक की। वहीं, प्रीमियर ली कियांग ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा भी किया।

    दो और ग्लेशियरों पर नजर

    नेपाल के मौसम विभाग के अधिकारियों ने अब दो और ग्लेशियरों पर निगरानी बढ़ाने की कोशिश शुरू की है। ये दोनों ग्लेशियर उस ग्लेशियर के आसपास स्थित हैं, जिसके टूटने के बाद बुधवार को विनाशकारी बाढ़ आई थी। इससे प्रभावित क्षेत्रों में आगे किसी और आपदा की आशंका को लेकर निगरानी महत्वपूर्ण हो गई है।

    4 हजार लोगों को सुरक्षित निकाला गया

    नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के ताजा अपडेट के मुताबिक, राहत और बचाव अभियान के दौरान अब तक करीब 4,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है। हालांकि लापता लोगों की संख्या अभी भी बढ़ रही है और ताजा आंकड़े के अनुसार 1,924 लोग लापता हैं।

    बचाव अभियान को तेज करने के लिए नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के 15,000 से ज्यादा जवानों को प्रभावित इलाकों में तैनात किया गया है।

    लापता विदेशियों के आंकड़े अलग-अलग

    लापता विदेशी नागरिकों की संख्या को लेकर अलग-अलग सरकारी आंकड़े सामने आए हैं। एक सरकारी रिपोर्ट में 517 विदेशी नागरिकों और जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले कर्मचारियों के लापता होने की बात कही गई है।

    वहीं, नेपाल पुलिस के पहले जारी आंकड़ों में लापता विदेशी नागरिकों की संख्या 575 बताई गई थी। इनमें 36 देशों के नागरिक शामिल हैं। पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक लापता विदेशियों में 65 अमेरिकी, 62 यूक्रेनी और 33 ब्रिटिश नागरिक भी हैं।

    इसके अलावा प्रभावित इलाकों से 149 नेपाली पर्यटक और 1,407 स्थानीय नागरिक भी लापता बताए गए हैं। प्रशासन और सुरक्षा बल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खोज, राहत और बचाव अभियान चला रहे हैं।

  • भारत विकास की राह पर तेजी से अग्रसर…. 2021 के बाद से GDP ग्रोथ रेट में चीन को छोड़ा पीछे

    भारत विकास की राह पर तेजी से अग्रसर…. 2021 के बाद से GDP ग्रोथ रेट में चीन को छोड़ा पीछे


    नई दिल्ली।
    दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देश, भारत (India) और चीन (China), कभी एशियाई सदी (Asian Century) के दो इंजन माने जाते थे. उन्होंने अपनी आर्थिक यात्रा का आधुनिक दौर लगभग एक जैसी आय के स्तर से शुरू किया था, लेकिन जल्द ही उनके रास्ते अलग-अलग हो गए. भारत की आर्थिक वृद्धि दर (India Economic Growth rate) इस समय चीन से तेज नजर आ रही है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की GDP विकास दर का अनुमान 7.7% लगाया गया था, जबकि चीन के लिए यह लगभग 5% था. हालांकि, यह अंतर सिर्फ एक साल का नहीं है. 2015 के बाद से दोनों देशों की ग्रोथ रफ्तार में लगातार बदलाव देखने को मिला है और 2021 से भारत सालाना आर्थिक वृद्धि के मामले में चीन से आगे रहा है।

    1980 में चीन की GDP ग्रोथ करीब 7.9% थी, जबकि भारत 6.7% की दर से बढ़ रहा था. इसके बाद 1980, 1990 और 2000 के दशकों में चीन ने भारत से काफी तेज आर्थिक विस्तार किया. हालांकि, 2010 के दशक में दोनों देशों की ग्रोथ के बीच का अंतर कम होने लगा. वर्ल्ड बैंक के 2025 के आंकड़ों में भारत की ग्रोथ 7.6% और चीन की करीब 5% रही. वहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के जुलाई 2026 अपडेट में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर 6.7% रहने का अनुमान लगाया गया है।


    कभी बराबर थी दोनों देशों की जीडीपी

    दोनों देशों की आर्थिक यात्रा की शुरुआत पूरी तरह अलग नहीं थी. 1987 में भारत और चीन की नॉमिनल GDP लगभग बराबर थी. PPP यानी Purchasing Power Parity के आधार पर भी 1990 में चीन भारत से बहुत आगे नहीं था. उस समय प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत चीन से आगे था. हालांकि, इसके बाद चीन ने बेहद तेज गति से आर्थिक विस्तार किया. 1961 से 2024 के बीच चीन 22 बार 10% से ज्यादा सालाना GDP ग्रोथ दर्ज कर चुका है, जबकि भारत इस अवधि में कभी भी 10% की सालाना वृद्धि दर तक नहीं पहुंचा।

    आर्थिक आकार में चीन अभी बहुत आगे
    तेज ग्रोथ के बावजूद भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के आकार में बड़ा अंतर है. 2025 में चीन की नॉमिनल GDP करीब 19.5 ट्रिलियन डॉलर रही, जबकि भारत की GDP करीब 3.96 ट्रिलियन डॉलर थी. PPP के आधार पर चीन की अर्थव्यवस्था करीब 41 ट्रिलियन डॉलर और भारत की लगभग 17.7 ट्रिलियन डॉलर रही. प्रति व्यक्ति GDP में भी दोनों देशों के बीच बड़ा अंतर है. नॉमिनल आधार पर चीन की प्रति व्यक्ति GDP करीब 13,806 डॉलर थी, जबकि भारत में यह लगभग 2,818 डॉलर रही।


    चीन का मॉडल और भारत की ताकत

    चीन ने दशकों तक इंडस्ट्री, एक्सपोर्ट और बड़े पैमाने पर निवेश के सहारे अपनी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाया. दूसरी ओर, भारत की आर्थिक वृद्धि में घरेलू मांग, सर्विसेज और निजी खपत की बड़ी भूमिका रही है. 2024 में भारत में घरेलू खपत GDP का करीब 61% थी. व्यापक तौर पर देखें तो भारतीय अर्थव्यवस्था का लगभग 70% हिस्सा खपत से जुड़ा है. चीन में घरेलू खपत का GDP में हिस्सा करीब 40% रहा।


    चीन की धीमी रफ्तार के पीछे क्या वजह

    चीन की मौजूदा सुस्ती को सिर्फ एक कमजोर साल के तौर पर नहीं देखा जा सकता. वहां प्रॉपर्टी सेक्टर का संकट, डेवलपर्स पर कर्ज का दबाव, संपत्तियों की गिरती कीमतें, कमजोर उपभोक्ता भरोसा और जनसांख्यिकीय चुनौतियां आर्थिक मांग पर असर डाल रही हैं. इन चुनौतियों के बीच चीन EV, बैटरी, सोलर उपकरण और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे सेक्टर पर जोर दे रहा है. हालांकि, इन क्षेत्रों में बढ़ती उत्पादन क्षमता के कारण ओवरकैपेसिटी की चिंता भी बढ़ी है. इससे चीन की बाहरी बाजारों पर निर्भरता और ट्रेड बैरियर का जोखिम बढ़ सकता है।


    भारत के सामने बड़ा मौका, आर्थिक आंकड़े पॉजिटिव

    पोस्ट-कोविड दौर में ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव भारत के लिए एक बड़ा अवसर लेकर आया है. कई मल्टीनेशनल कंपनियां भारत को सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग बेस नहीं, बल्कि बड़े कंज्यूमर मार्केट के तौर पर भी देख रही हैं. लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती भी है. अगर हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग चीन, वियतनाम और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में बनी रहती है और भारत मुख्य रूप से दूसरे देशों में तैयार सामान का बड़ा बाजार बन जाता है, तो इसका फायदा सीमित रह सकता है. भारत के मौजूदा आर्थिक आंकड़े उम्मीद जगाते हैं. देश का कंजम्पशन इंजन मजबूत है, सर्विस सेक्टर टिकाऊ बना हुआ है, और यहां की आबादी व बाजार का आकार ऐसे मौके देता है जो बहुत कम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को मिलते हैं।


    असली चुनौती ग्रोथ को रोजगार और आय में बदलना

    भारत का चीन से तेज बढ़ना निश्चित तौर पर एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन सिर्फ GDP ग्रोथ रेट पूरी तस्वीर नहीं बताती. चीन अब भी आर्थिक आकार, प्रति व्यक्ति आय और औद्योगिक क्षमता के मामले में भारत से काफी आगे है. भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या वह तेज आर्थिक वृद्धि को ज्यादा रोजगार, बेहतर आय, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और जीवन स्तर में सुधार में बदल पाता है. IMF और वर्ल्ड बैंक के अनुमान फिलहाल भारत की ग्रोथ रफ्तार को चीन से बेहतर दिखा रहे हैं. लेकिन अब सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि क्या भारत चीन से तेजी से विकास कर सकता है. बल्कि सवाल यह है कि क्या भारत उस बढ़त को इतने लंबे समय तक बनाए रख सकता है जिससे इन दो एशियाई दिग्गजों के बीच पैदा हुए भारी आर्थिक अंतर को खत्म किया जा सके।

  • चीन में धर्म की भी 'जासूसी'! अस्पताल से स्कूल तक आस्था पर निगरानी, मांगी जा रही जानकारी

    चीन में धर्म की भी 'जासूसी'! अस्पताल से स्कूल तक आस्था पर निगरानी, मांगी जा रही जानकारी


    नई दिल्ली। चीन में धार्मिक मान्यताओं पर सरकारी निगरानी का दायरा बढ़ने का दावा किया जा रहा है। चेंगदू के एक सरकारी अस्पताल में स्थायी कर्मचारियों के अलावा कॉन्ट्रैक्ट और अस्थायी कर्मचारियों से भी उनकी धार्मिक आस्था की जानकारी मांगे जाने की बात सामने आई है। कर्मचारियों से पूछा गया कि वे किसी धर्म को मानते हैं या नहीं। यहां तक कि किसी धर्म को न मानने वालों की जानकारी भी दर्ज करने की बात कही गई है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल ने इसे कर्मचारियों की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा एक बड़ा सर्वे बताया और इसे वैचारिक, जातीय एवं धार्मिक मामलों की नियमित जांच से जोड़ा गया। इस प्रक्रिया में कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य भी शामिल बताए गए हैं। चीन में पार्टी सदस्यों के लिए धार्मिक आस्था रखने पर प्रतिबंध होने की बात कही जाती है। ऐसे में किसी कर्मचारी के खुद को धार्मिक बताने पर उसे अपनी पार्टी शाखा को इसकी जानकारी देने के लिए कहा गया।

    स्कूलों में छात्रों और परिवारों की भी जानकारी

    धार्मिक पहचान की कथित निगरानी केवल सरकारी अस्पतालों तक सीमित नहीं बताई जा रही। रिपोर्ट में सिचुआन के एक विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कर्मचारी के हवाले से कहा गया है कि शिक्षण संस्थानों में छात्रों के साथ-साथ उनके परिवारों की धार्मिक पृष्ठभूमि की जानकारी भी जुटाई जा रही है और इसे उच्च अधिकारियों तक भेजा जाता है।

    चेंगदू शिक्षा विभाग से जुड़े एक कर्मचारी के मुताबिक, बच्चों के स्कूल में दाखिले से पहले उनके परिवारों की नियमित पृष्ठभूमि जांच होती है। इसमें परिवार की धार्मिक पहचान से जुड़ी जानकारी भी शामिल होने का दावा किया गया है। यानी कथित तौर पर निगरानी सिर्फ व्यक्ति की धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके परिवार की पृष्ठभूमि तक भी पहुंच रही है।

    ‘सिनिसाइजेशन ऑफ रिलिजन’ के तहत बढ़ा नियंत्रण

    चीन में धार्मिक गतिविधियों पर कम्युनिस्ट पार्टी का नियंत्रण पहले से ही सख्त रहा है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में धार्मिक मामलों पर पार्टी की निगरानी और मजबूत करने पर जोर दिया गया है। चीन की ‘सिनिसाइजेशन ऑफ रिलिजन’ नीति के तहत धार्मिक संगठनों और उनकी गतिविधियों को चीनी राजनीतिक एवं सांस्कृतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालने की कोशिश की जाती है।

  • ईरान युद्ध के बीच ट्रंप ने पश्चिमी प्रशांत से हटाया एयरक्राफ्ट कैरियर, चीन खुश

    ईरान युद्ध के बीच ट्रंप ने पश्चिमी प्रशांत से हटाया एयरक्राफ्ट कैरियर, चीन खुश


    नई दिल्ली। ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य अभियान के बीच अमेरिका ने पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र से अपना आखिरी विमानवाहक पोत यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन हटा लिया है। इसे मिडिल ईस्ट में लंबे समय से तैनात यूएसएस अब्राहम लिंकन की जगह भेजा जा रहा है। अमेरिका के इस फैसले से जापान और फिलीपींस जैसे सहयोगियों की चिंता बढ़ी है, जबकि चीन को पश्चिमी प्रशांत में अपनी सैन्य मौजूदगी और प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल गया है।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ा अमेरिकी नौसेना पर दबाव

    यूएसएस जॉर्ज वाशिंगटन को मिडिल ईस्ट भेजने का मुख्य उद्देश्य यूएसएस अब्राहम लिंकन को राहत देना है। लिंकन की वापसी मई में तय थी, लेकिन ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियानों के कारण उसकी तैनाती बढ़ा दी गई। यह पोत 240 से ज्यादा दिन लगातार समुद्र में रह चुका है। लंबी तैनाती के कारण अमेरिकी नौसैनिकों के तनाव और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

    प्रशांत से अमेरिकी पोत हटने पर सहयोगी चिंतित

    पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोत की गैरमौजूदगी से जापान और फिलीपींस जैसे सहयोगियों में बेचैनी बढ़ी है। रणनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका का यह कदम उसके उस रुख से अलग दिखाई देता है, जिसमें वह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखने की बात करता रहा है। हालांकि, अमेरिकी नौसेना आने वाले महीनों में किसी अन्य विमानवाहक पोत को इस क्षेत्र में तैनात कर सकती है।

    चीन को मिला ताकत दिखाने का मौका

    अमेरिकी पोत के हटने से चीन को पश्चिमी प्रशांत में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिला है। विशेषज्ञों के अनुसार, बीजिंग यह संदेश देने की कोशिश कर सकता है कि इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कमजोर हो रही है और वॉशिंगटन अपने सहयोगियों को पहले जैसी सुरक्षा गारंटी देने की स्थिति में नहीं है।

    इसी बीच चीन ने इंडोनेशिया के साथ नौसैनिक अभ्यास किया है। दक्षिण चीन सागर में स्कारबोरो शोल के पास भी चीनी सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। जापान के आसपास भी चीनी नौसेना की गतिविधियों को लेकर तनाव बना हुआ है।

    लगातार तैनाती से अमेरिकी नौसेना पर बढ़ रहा दबाव

    अमेरिकी नौसेना के पास कुल 11 विमानवाहक पोत हैं और सामान्य तौर पर इनमें से दो या तीन ही एक समय में तैनात रहते हैं। लगातार लंबी तैनाती के कारण जहाजों के रखरखाव और मरम्मत पर भी दबाव बढ़ रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सीमित शिपयार्ड क्षमता के कारण आने वाले समय में यह चुनौती और गंभीर हो सकती है।

    बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर की उपयोगिता पर भी सवाल

    आधुनिक युद्ध में ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों के बढ़ते इस्तेमाल ने बड़े विमानवाहक पोतों की सुरक्षा और उपयोगिता पर भी सवाल खड़े किए हैं। कुछ रक्षा विशेषज्ञ छोटे युद्धपोतों और पनडुब्बियों के इस्तेमाल को बढ़ाने की वकालत कर रहे हैं। अमेरिकी नौसेना के संचालन प्रमुख भी बड़े विमानवाहक पोतों पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और छोटे युद्धपोतों के इस्तेमाल की जरूरत जता चुके हैं।

  • अमेरिका ने चीन के जरिए टैरिफ बचाने के आरोपों में भारत समेत 40 से अधिक व्यापारिक साझेदारों को जोखिम वाले देशों में रखा

    अमेरिका ने चीन के जरिए टैरिफ बचाने के आरोपों में भारत समेत 40 से अधिक व्यापारिक साझेदारों को जोखिम वाले देशों में रखा

    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत 40 से अधिक देशों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि चीन अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए कुछ तीसरे देशों के रास्ते अपने सामान को अमेरिकी बाजार तक पहुंचा सकता है। इस प्रक्रिया को ट्रांसशिपमेंट के तौर पर चिन्हित किया गया है।

    अमेरिकी रिपोर्ट में भारत, कनाडा और यूरोपीय संघ के अलावा ताइवान, मैक्सिको, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम सहित कई व्यापारिक साझेदारों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों में कुछ ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जहां चीन से आने वाले सामान की मामूली प्रोसेसिंग, पैकेजिंग या लेबल बदलकर उसके मूल स्रोत को अलग तरीके से प्रदर्शित किया जा सकता है।

    ट्रंप प्रशासन के मुख्य व्यापार सलाहकार पीटर नवारो की रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रांसशिपमेंट की गतिविधियों में 2018 के बाद बढ़ोतरी देखने को मिली। इसी अवधि में अमेरिका ने चीन के कथित अनुचित व्यापारिक तौर-तरीकों के खिलाफ सेक्शन 301 के तहत अतिरिक्त टैरिफ लागू किए थे। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इन शुल्कों के प्रभाव से बचने के लिए चीनी सामान को तीसरे देशों के जरिए भेजने की कोशिशें बढ़ी हैं।

    रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे मामलों में चीन से तैयार या निर्मित वस्तुओं को किसी तीसरे देश में भेजकर उनका री-लेबलिंग, री-पैकेजिंग, री-इनवॉइसिंग या मामूली स्तर का प्रसंस्करण किया जा सकता है। इसके बाद सामान को उस देश का उत्पाद दिखाकर अमेरिका में भेजने की कोशिश की जा सकती है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि इस तरह सामान पर लागू होने वाले टैरिफ में अंतर का लाभ उठाया जा सकता है।

    अमेरिका ने इस पूरी व्यवस्था को अवैध ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क से जोड़ते हुए कहा है कि इससे व्यापार नियमों और सीमा शुल्क व्यवस्था को नुकसान पहुंचता है। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि चीनी कंपनियां ऐसे देशों और क्षेत्रों का इस्तेमाल कर सकती हैं जहां श्रम लागत अपेक्षाकृत कम हो, सीमा शुल्क निगरानी सीमित हो या मुक्त व्यापार क्षेत्रों में प्रक्रियात्मक लचीलापन उपलब्ध हो।

    इस मामले में अमेरिकी सरकार अब तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दे रही है। रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस और यूएस कस्टम्स एंड बॉर्डर प्रोटेक्शन मिलकर सीमा पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य संदिग्ध शिपमेंट की पहचान करना और यह पता लगाना है कि कहीं किसी वस्तु को तीसरे देश के माध्यम से भेजकर उसके वास्तविक मूल को छिपाने का प्रयास तो नहीं किया गया।

    भारत का नाम इस सूची में आने से अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर भी चर्चा बढ़ सकती है। हालांकि किसी देश का रिपोर्ट में उल्लेख होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां से होने वाला प्रत्येक व्यापार या शिपमेंट गैरकानूनी है। अमेरिकी प्रशासन ने मुख्य रूप से संभावित जोखिम और निगरानी की जरूरत पर जोर दिया है।

    ट्रंप प्रशासन का यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब वैश्विक व्यापार व्यवस्था में टैरिफ, सप्लाई चेन और चीन से जुड़े आयात को लेकर अमेरिकी नीतियां लगातार सख्त हो रही हैं। आने वाले समय में अमेरिकी सीमा शुल्क जांच और एआई आधारित निगरानी बढ़ने से उन देशों के निर्यातकों पर भी अतिरिक्त जांच का दबाव पड़ सकता है, जिनका नाम जोखिम वाले व्यापारिक साझेदारों में शामिल किया गया है।

  • नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत

    नेपाल PM बालेन शाह ने पहली बार भारतीय राजदूत से की वन-टू-वन मुलाकात, चीन के राजदूत से भी आज करेंगे सीधी बातचीत


    नई दिल्ली । 
    नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन मुलाकात नहीं करने की अपनी पुरानी नीति में बड़ा बदलाव किया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार उन्होंने किसी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात की। सोमवार को उन्होंने भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव से अलग बैठक की। इस दौरान दोनों के बीच भारत और नेपाल के संबंधों, विकास सहयोग और आपसी हित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    मुलाकात के दौरान नवीन श्रीवास्तव ने बालेन शाह को प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी। उन्होंने भारत की ओर से नेपाल के साथ बेहतर संबंधों और सहयोग को आगे बढ़ाने की बात कही। बालेन शाह ने भी दोनों देशों के बीच पुराने और भरोसेमंद रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया।

    नेपाल और भारत के बीच व्यापार, ऊर्जा, सड़क और विकास परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से सहयोग रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद भारतीय राजदूत के साथ बालेन शाह की पहली व्यक्तिगत बैठक को दोनों देशों के बीच सीधे संवाद की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    बालेन शाह इससे पहले विदेशी अधिकारियों और राजदूतों से अकेले मुलाकात करने से परहेज करते रहे थे। प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में उन्होंने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों के साथ वन-टू-वन बैठक नहीं करने की नीति अपनाई थी। विदेशी राजदूतों के साथ भी वह सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते थे।

    इसी नीति के तहत भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की मई में नेपाल यात्रा के दौरान भी बालेन शाह ने उनसे अलग मुलाकात नहीं की थी। इसके अलावा अमेरिकी अधिकारियों के साथ प्रस्तावित कुछ व्यक्तिगत बैठकों को भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। इसके बजाय उन्होंने काठमांडू में तैनात कई देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की थीं।

    बालेन शाह की इस नीति के पीछे उनका यह तर्क बताया जाता रहा है कि बड़े और प्रभावशाली देशों के प्रतिनिधि नेपाल की सरकारी व्यवस्था को दरकिनार कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं। सामूहिक बैठकों के जरिए वह सभी देशों के साथ समान व्यवहार और नेपाल की संप्रभुता का संदेश देना चाहते थे।

    हालांकि, सरकार गठन के करीब 100 दिन पूरे होने के बाद उनकी कार्यशैली में बदलाव दिखाई देने लगा। सलाहकारों की ओर से घरेलू और विदेशी स्तर पर अलग-अलग लोगों के साथ सीधे संवाद बढ़ाने की सलाह के बाद शाह ने नेताओं, कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें शुरू कीं। अब विदेशी राजदूतों के साथ सीधी मुलाकात भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।

    भारतीय राजदूत से मुलाकात के बाद बालेन शाह चीनी राजदूत झांग माओमिंग से भी अलग बैठक करने वाले हैं। भारत और चीन दोनों नेपाल के प्रमुख पड़ोसी और महत्वपूर्ण साझेदार हैं। एक ही दिन दोनों देशों के राजदूतों के साथ व्यक्तिगत संवाद का कार्यक्रम नेपाल की संतुलित विदेश नीति के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    नेपाल में लंबे समय से प्रधानमंत्री और बड़े देशों के राजदूतों के बीच सीधे संवाद की परंपरा रही है। कई बार ऐसी बैठकें प्रधानमंत्री के निजी आवास पर भी होती रही हैं। इन बैठकों में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की मौजूदगी जरूरी नहीं होती थी और कुछ मुलाकातों का औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था।

    बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस व्यवस्था में बदलाव आया था, लेकिन अब उनकी नीति फिर बदलती नजर आ रही है। भारत और चीन के राजदूतों के साथ सीधे संवाद से यह संकेत मिलता है कि नेपाल सरकार महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मामलों पर सामूहिक बैठकों के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संपर्क को भी जगह दे रही है।

  • चीन में डॉल्फिन तूफान का खतरा, 1400 उड़ानें रद्द और हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर भेजे गए

    चीन में डॉल्फिन तूफान का खतरा, 1400 उड़ानें रद्द और हजारों लोग सुरक्षित स्थानों पर भेजे गए

    नई दिल्ली । चीन के पूर्वी तट पर टाइफून डॉल्फिन के संभावित प्रभाव को देखते हुए प्रशासन ने व्यापक स्तर पर एहतियाती कदम उठाए हैं। रविवार को तूफान के पहुंचने की आशंका के बीच शंघाई आने-जाने वाली करीब 1400 उड़ानें रद्द कर दी गईं। इसके अलावा हांगझोउ हवाई अड्डे से संचालित होने वाली 270 उड़ानों को भी रद्द किया गया। प्रभावित इलाकों में लोगों की सुरक्षा के लिए उन्हें संवेदनशील क्षेत्रों से हटाकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

    तूफान के रविवार देर रात या सोमवार सुबह चीन के झेजियांग अथवा पड़ोसी फुजियान प्रांत के तटीय क्षेत्र में पहुंचने की संभावना जताई गई है। इसके मद्देनजर रविवार सुबह रेड टाइफून अलर्ट जारी किया गया। यह तूफान से संबंधित सबसे गंभीर चेतावनी का स्तर है। झेजियांग के मध्य और पूर्वी हिस्सों में बेहद भारी बारिश होने की आशंका जताई गई है।

    मौसम विभाग के अनुसार शंघाई के अलावा फुजियान, अनहुई और जिआंग्सू प्रांतों के कुछ हिस्सों में सोमवार दोपहर तक भारी बारिश जारी रह सकती है। जमीन से टकराने के बाद तूफान के धीरे-धीरे कमजोर होने की संभावना है। इसके बाद इसके पूर्वी चीन में उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर बढ़ने का अनुमान है।

    टाइफून डॉल्फिन का असर चीन पहुंचने से पहले जापान के ओकिनावा क्षेत्र में भी देखा गया। वहां भारी बारिश और तेज हवाओं के कारण सात लोगों को मामूली चोटें आईं। घायलों में 100 साल से अधिक उम्र का एक व्यक्ति भी शामिल है, जो तेज हवाओं की चपेट में आकर गिर गया और उसके सिर में चोट लगी। रविवार दोपहर तक ओकिनावा में करीब 5,290 घरों की बिजली आपूर्ति बाधित थी।

    ताइवान में भी तूफान के प्रभाव के कारण रविवार को द्वीप के उत्तरी हिस्से में तेज हवाओं और भारी बारिश की स्थिति बनी रही। खराब मौसम के चलते दर्जनों फेरी सेवाएं रोक दी गईं, जबकि 180 से अधिक उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। समुद्री और हवाई परिवहन पर पड़े इस असर से यात्रियों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

    चीन में तूफान के संभावित प्रभाव वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। फुजियान में शनिवार शाम तक करीब 99 हजार लोगों को जोखिम वाले इलाकों से हटाया गया। झेजियांग और फुजियान में 200 से अधिक फेरी मार्गों पर सेवाएं रोक दी गई हैं।

    तटीय और समुद्री गतिविधियों पर भी व्यापक रोक लगाई गई है। शुक्रवार सुबह तक 474 निर्माण जहाजों को बंदरगाहों पर वापस बुला लिया गया था। ऑफशोर परियोजनाओं पर काम रोक दिया गया है। यात्रियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में कुछ ट्रेन सेवाएं भी अस्थायी रूप से बंद की गई हैं।

    डॉल्फिन से करीब दो सप्ताह पहले दक्षिणी ग्वांगडोंग प्रांत में टाइफून नौल ने दस्तक दी थी। उस समय इसे इस साल चीन में पहुंचा सबसे शक्तिशाली तूफान बताया गया था। चीन पहुंचने से पहले नौल ने फिलीपींस में भी भारी असर डाला था, जहां तीन लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घर क्षतिग्रस्त हुए थे। ऐसे में डॉल्फिन के संभावित प्रभाव को देखते हुए चीन के तटीय प्रशासन ने परिवहन, निकासी और आपदा प्रबंधन से जुड़े उपायों को प्राथमिकता दी है।

  • दक्षिण चीन सागर में फिर आमने-सामने चीन और फिलीपींस, अमेरिका के रुख से बढ़ी पूरे विवाद की अहमियत

    दक्षिण चीन सागर में फिर आमने-सामने चीन और फिलीपींस, अमेरिका के रुख से बढ़ी पूरे विवाद की अहमियत


    नई दिल्ली ।दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच लंबे समय से जारी विवाद एक बार फिर चर्चा में है। स्कारबोरो रीफ को लेकर चीन की ओर से उठाए गए नए कदम पर अमेरिका ने आपत्ति जताई है। अमेरिका ने चीन द्वारा इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्रकृति क्षेत्र के रूप में विकसित करने के फैसले का विरोध करते हुए फिलीपींस के साथ खड़े रहने की बात कही है।

    स्कारबोरो रीफ दक्षिण चीन सागर में स्थित एक महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र है, जिस पर चीन और फिलीपींस दोनों अपना दावा करते रहे हैं। इस इलाके में मछली पकड़ने और समुद्री गतिविधियों को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है। फिलीपींस के मछुआरे इस क्षेत्र में लंबे समय से मछली पकड़ते रहे हैं और नए नियमों के बाद उनके सामने संभावित परेशानियों को लेकर चिंता जताई जा रही है।

    चीन ने एक अगस्त को स्कारबोरो रीफ से जुड़े नए नियम जारी किए हैं। इन नियमों में क्षेत्र की देखभाल, निगरानी और सुरक्षा से संबंधित व्यवस्थाओं का उल्लेख किया गया है। इसके तहत चीन के कई सरकारी विभाग मिलकर इस समुद्री क्षेत्र की निगरानी और प्रबंधन करेंगे। चीन का कहना है कि नए नियमों का उद्देश्य संबंधित सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना और क्षेत्र की सुरक्षा तथा संरक्षण को व्यवस्थित करना है।

    चीन ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय प्रकृति क्षेत्र के रूप में विकसित करने की मंजूरी सितंबर 2024 में दी थी। अब नए नियमों के जरिए वहां प्रशासनिक और निगरानी व्यवस्था को अधिक स्पष्ट किया गया है। हालांकि, फिलीपींस को आशंका है कि इन व्यवस्थाओं का असर उसके मछुआरों की गतिविधियों पर पड़ सकता है।

    अमेरिका ने चीन के इस कदम पर गंभीर आपत्ति जताई है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि नए नियमों से फिलीपींस के उन मछुआरों के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं, जो लंबे समय से इस क्षेत्र में मछली पकड़ते रहे हैं। अमेरिका ने चीन से क्षेत्र के आसपास मौजूद देशों के अधिकारों और हितों को ध्यान में रखने की अपील की है।

    अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में फिलीपींस के साथ है। इसके साथ ही उसने खुले और स्वतंत्र इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के समर्थन की बात दोहराई है। इससे दक्षिण चीन सागर के विवाद में अमेरिका की रणनीतिक भूमिका एक बार फिर सामने आई है।

    स्कारबोरो रीफ को लेकर विवाद की पृष्ठभूमि काफी पुरानी है। वर्ष 2016 में समुद्री कानून से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक पैनल ने दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक समुद्री दावों को कानूनी आधार नहीं माना था। फिलीपींस ने इस फैसले का समर्थन किया था, जबकि चीन ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।

    2016 के बाद भी दोनों देशों के बीच इस समुद्री क्षेत्र को लेकर मतभेद खत्म नहीं हुए। समय-समय पर समुद्री गतिविधियों, मछली पकड़ने और क्षेत्रीय अधिकारों को लेकर तनाव सामने आता रहा है। स्कारबोरो रीफ पर चीन की नई प्रशासनिक व्यवस्था ने इसी पुराने विवाद को फिर से सक्रिय कर दिया है।

    मौजूदा घटनाक्रम में चीन अपने नए नियमों को क्षेत्र के संरक्षण और निगरानी से जुड़ी व्यवस्था के तौर पर पेश कर रहा है, जबकि फिलीपींस इसे अपने मछुआरों और समुद्री अधिकारों के संदर्भ में देख रहा है। अमेरिका के खुलकर फिलीपींस का समर्थन करने से इस विवाद का कूटनीतिक महत्व भी बढ़ गया है।

    फिलहाल दक्षिण चीन सागर में चीन और फिलीपींस के बीच स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। स्कारबोरो रीफ पर लागू किए गए नए नियमों को लेकर दोनों पक्षों के रुख में अंतर साफ दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में इस क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों और दोनों देशों की प्रतिक्रियाओं पर नजर रहेगी।

  • भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर

    भारत-चीन सीमा वार्ता में LAC पर शांति के साथ नदी जल डेटा साझा करने और अपस्ट्रीम परियोजनाओं में पारदर्शिता पर जोर


    नई दिल्ली ।
    भारत और चीन के बीच सीमा मामलों को लेकर बातचीत का एक और महत्वपूर्ण दौर हुआ, जिसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC की मौजूदा स्थिति, लंबित सीमा मुद्दों, सीमा प्रबंधन और दोनों देशों के बीच नदी सहयोग से जुड़े विषयों पर चर्चा की गई। बातचीत के दौरान भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता दोनों देशों के संबंधों को सामान्य दिशा में आगे बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी है। इसके साथ ही भारत ने चीन की अपस्ट्रीम नदी परियोजनाओं से जुड़ी गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ाने और निचले बहाव वाले देशों के हितों का ध्यान रखने की आवश्यकता पर जोर दिया।

    भारत की ओर से सीमा पार नदियों से जुड़े सहयोग को दोबारा सक्रिय करने का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। भारत ने 2006 में स्थापित एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म ऑन ट्रांस-बॉर्डर रिवर्स की अगली बैठक जल्द आयोजित करने की जरूरत बताई। इस तंत्र के माध्यम से दोनों देशों के बीच सीमा पार बहने वाली नदियों से जुड़े तकनीकी और जल संसाधन संबंधी विषयों पर बातचीत होती रही है। भारत ने अपस्ट्रीम परियोजनाओं से संबंधित तकनीकी सूचनाओं को साझा करने को भी महत्वपूर्ण बताया है, ताकि नदियों के प्रवाह और संभावित प्रभावों को लेकर बेहतर समन्वय कायम किया जा सके।

    यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चीन की ओर से बड़े बांध और जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर गतिविधियां बढ़ी हैं। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि ऊपरी बहाव में बनने वाली बड़ी जल परियोजनाओं का असर निचले बहाव वाले देशों के हितों पर नहीं पड़ना चाहिए। भारत ने चीन के समक्ष अपनी चिंताओं को रखते हुए कहा है कि अपस्ट्रीम गतिविधियों के संबंध में पर्याप्त पारदर्शिता और समय पर जानकारी साझा करना जरूरी है।

    हाइड्रोलॉजिकल डेटा यानी नदियों के जल प्रवाह और जल स्तर से संबंधित आंकड़ों को साझा करना भी दोनों देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत का मानना है कि नियमित और विश्वसनीय आंकड़ों की उपलब्धता से बाढ़ जैसी परिस्थितियों से निपटने, जल संसाधन प्रबंधन बेहतर करने और सीमा पार नदियों से जुड़े संभावित जोखिमों को समझने में मदद मिल सकती है। इसी वजह से भारत ने सीमा पार नदी सहयोग को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

    भारत-चीन सीमा मामलों पर बातचीत के लिए गठित वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी WMCC की 36वीं बैठक में इन मुद्दों के साथ LAC से जुड़े लंबित विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने गलतफहमी और तनाव की स्थिति से बचने के लिए उपलब्ध कूटनीतिक और सैन्य माध्यमों का इस्तेमाल जारी रखने पर सहमति जताई। सीमा क्षेत्रों में स्थिरता बनाए रखना दोनों देशों के बीच व्यापक संबंधों में सुधार के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

    बैठक में सीमा निर्धारण और बॉर्डर मैनेजमेंट से जुड़े विषयों पर भी चर्चा हुई। पिछले वर्ष हुई स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव स्तर की 24वीं वार्ता के परिणामों को आगे बढ़ाने पर दोनों पक्षों ने विचार किया। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा निर्धारण से जुड़े कुछ मुद्दों पर शुरुआती प्रगति की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए WMCC के तहत विशेषज्ञ समूह गठित करने की दिशा में भी काम आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

    भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से दोनों देशों के संबंधों के लिए संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में LAC पर शांति बनाए रखने के साथ नदी जल और सीमा पार सहयोग जैसे विषयों पर नियमित संवाद दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। ताजा बातचीत से संकेत मिलता है कि दोनों पक्ष विवादित मुद्दों के साथ-साथ व्यावहारिक सहयोग के क्षेत्रों में भी संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले समय में सीमा वार्ता और नदी सहयोग से जुड़े तंत्र की अगली बैठकों से यह स्पष्ट होगा कि इन मुद्दों पर जमीनी स्तर पर कितना आगे बढ़ा जा सकता है।