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  • बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर भारत सतर्क, विदेश मंत्रालय बोला- हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

    बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर भारत सतर्क, विदेश मंत्रालय बोला- हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में तीस्ता नदी प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना और चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CBMEC) को लेकर चीन की बढ़ती सक्रियता पर भारत ने सतर्क प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने पड़ोसी देशों में होने वाले सभी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर लगातार नजर बनाए हुए है और आवश्यकता पड़ने पर अपने हितों के अनुरूप उचित कदम उठाएगा। इस बयान को क्षेत्रीय रणनीतिक गतिविधियों के बीच भारत की सतर्क कूटनीतिक नीति के रूप में देखा जा रहा है।

    हाल के दिनों में बांग्लादेश और चीन के बीच रणनीतिक सहयोग में तेजी आई है। दोनों देशों ने तीस्ता नदी प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना पर सहयोग बढ़ाने की सहमति जताई है। इसके साथ ही चीन ने चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई है। इन दोनों परियोजनाओं को क्षेत्रीय संपर्क, आधारभूत ढांचे और आर्थिक सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पड़ोसी देशों में होने वाली सभी महत्वपूर्ण गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाती है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समय आने पर आवश्यक निर्णय लेगा। हालांकि सरकार ने संभावित कदमों या रणनीति के बारे में कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि भारत और बांग्लादेश के बीच विकास सहयोग से जुड़े कार्यक्रम दोनों देशों की आपसी सहमति और निर्धारित रोडमैप के आधार पर संचालित होते हैं। सरकार का कहना है कि इन परियोजनाओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और तीस्ता परियोजना को लेकर भारत पहले ही अपना पक्ष बांग्लादेश के समक्ष रख चुका है। भविष्य के सभी निर्णय क्षेत्रीय परिस्थितियों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इन परियोजनाओं में बढ़ती भागीदारी का रणनीतिक महत्व भी है। यदि चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारा आगे बढ़ता है तो चीन की क्षेत्रीय संपर्क क्षमता और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच मजबूत हो सकती है। इसके अलावा तीस्ता नदी परियोजना में चीनी तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी को भी भारत रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मान रहा है, क्योंकि यह इलाका भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़े संवेदनशील भूभाग के निकट स्थित है।

    बांग्लादेश की सरकार ने हाल के महीनों में नदी प्रबंधन और जल संसाधन विकास से संबंधित योजनाओं के लिए चीन से तकनीकी सहयोग की मांग की है। इसके तहत चीनी विशेषज्ञों द्वारा परियोजना की व्यवहार्यता का अध्ययन भी किया जा चुका है। दोनों देशों के बीच इस सहयोग को भविष्य में और विस्तार मिलने की संभावना जताई जा रही है।

    भारत पहले भी तीस्ता नदी के संरक्षण और प्रबंधन में सहयोग की इच्छा जता चुका है। दोनों देशों के बीच साझा नदियों के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से संवाद चलता रहा है। हालांकि तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर अब तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका है। ऐसे में चीन की बढ़ती भागीदारी के बीच भारत की सतर्क कूटनीतिक निगरानी आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्रीय घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बनी रहेगी।

  • तीस्ता नदी परियोजना पर चीन का दोटूक संदेश, भारत की आपत्तियों के बीच बोला- बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

    तीस्ता नदी परियोजना पर चीन का दोटूक संदेश, भारत की आपत्तियों के बीच बोला- बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

    नई दिल्ली । बांग्लादेश की तीस्ता नदी से जुड़ी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना को लेकर भारत की रणनीतिक चिंताएं एक बार फिर चर्चा में हैं। चीन और बांग्लादेश के बीच इस परियोजना पर बढ़ते सहयोग ने भारत की सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामान्य तौर पर ‘चिकन-नेक’ कहा जाता है, के आसपास संभावित चीनी प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस बीच चीन ने स्पष्ट किया है कि उसका बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और इसे बाहरी प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए।

    चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बीजिंग और ढाका के बीच सहयोग पूरी तरह विकास आधारित है। चीन का कहना है कि दोनों देश अपनी विकास रणनीतियों में बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं और आर्थिक सहयोग, व्यापार, जल संरक्षण, बुनियादी ढांचा तथा आजीविका जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाया जाएगा। चीन ने यह भी दोहराया कि उसके सभी सहयोगात्मक प्रयास किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाने के उद्देश्य से नहीं हैं।

    दूसरी ओर भारत इस परियोजना को केवल जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि तीस्ता नदी का क्षेत्र देश के पूर्वोत्तर हिस्से से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील इलाका है। यदि इस क्षेत्र में चीन की तकनीकी, वित्तीय या बुनियादी ढांचा संबंधी उपस्थिति बढ़ती है तो इसका असर भारत की सुरक्षा रणनीति पर पड़ सकता है।

    तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर पहले सिक्किम और पश्चिम बंगाल से गुजरती है तथा इसके बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी का भौगोलिक मार्ग भारत और बांग्लादेश के बीच साझा जल संसाधनों के साथ-साथ सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण इस क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति की सक्रिय भूमिका पर भारत लगातार सतर्क नजर बनाए हुए है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशिया में अपनी आर्थिक और आधारभूत संरचना संबंधी परियोजनाओं के माध्यम से प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। बांग्लादेश के साथ परिवहन, ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क और जल संसाधन जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग भी उसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब तीस्ता परियोजना के जरिए जल संसाधन प्रबंधन में भी चीन की भागीदारी भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा भी लंबे समय से लंबित है। ऐसे में इस नदी से जुड़ी किसी भी बड़ी अंतरराष्ट्रीय परियोजना पर भारत की विशेष नजर बनी रहती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नदी प्रबंधन से जुड़े ढांचागत विकास का प्रभाव केवल जल संसाधनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क, लॉजिस्टिक्स और सामरिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

    चीन की ओर से दिए गए ताजा बयान ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि उसका उद्देश्य केवल विकास सहयोग को आगे बढ़ाना है, लेकिन भारत के लिए इस परियोजना का महत्व कहीं अधिक व्यापक है। आने वाले समय में यह विषय भारत, बांग्लादेश और चीन के बीच कूटनीतिक संवाद तथा क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रह सकता है। भारत की प्राथमिकता इस पूरे घटनाक्रम पर सतत निगरानी रखते हुए अपनी सुरक्षा, सीमाई हितों और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंधों को बनाए रखने की होगी।

  • Earthquake : पड़ोसी देश चीन के सिचुआन प्रांत में आया भूकंप… 5.5 रही तीव्रता

    Earthquake : पड़ोसी देश चीन के सिचुआन प्रांत में आया भूकंप… 5.5 रही तीव्रता


    बीजिंग।
    वेनेजुएला (Venezuela) में भूकंप (Earthquake) की तबाही से दुनिया अब तक गमगीन है. वेनेजुएला के बाद जापान और अमेरिका में भूकंप आया. भारत और अफगानिस्तान में भी भूकंप के झटके महसूस हुए. अब भूकंप की आहट भारत के पड़ोस में सुनाई दी है. जी हां, भारत के पड़ोस यानी चीन (China) में भूकंप आया है. दक्षिण-पश्चिम चीन (Southwest China) के सिचुआन प्रांत (Sichuan Province) में 5.5 तीव्रता का तेज भूकंप आया है. स्थानीय समयानुसार देर रात भूकंप के झटके महसूस किए गए. इससे स्थानीय लोगों में दहशत फैल गई।

    दरअसल, दक्षिण-पश्चिम चीन के सिचुआन प्रांत के यिबिन शहर में देर रात 5.5 तीव्रता का जोरदार भूकंप आया. इस भूकंप के झटके चेंगदू और चोंगकिंग जैसे बड़े क्षेत्रीय केंद्रों तक महसूस किए गए. इस भूकंप से लोगों में खौफ का माहौल है. आधी रात को लोग अपने घरों से बाहर की ओर भागते दिखे. भूकंप का केंद्र गाओक्सियन काउंटी में जमीन से महज 6 किलोमीटर की गहराई पर था।

    अभी तक की जानकारी के मुताबिक, इस भूकंप से केंद्र के पास की कुछ इमारतों की दीवारों को मामूली नुकसान पहुंचा है और आपातकालीन टीमें नुकसान का आकलन कर रही हैं. अभी किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है. बता दें इससे दो दिन पहले यानी शनिवार को अफगानिस्तान में 6.2 तीव्रता का भूकंप आया था. इस भूकंप के कारण दिल्ली-एनसीआर के अलावा जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हरियाणा तथा चंडीगढ़ सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में तेज झटके महसूस किए गए थे।


    संडे को जापान में भूकंप

    इसके बाद रविवार को जापान के उत्तर-पूर्वी हिस्से में 6.1 तीव्रता का भूकंप आया था. इवाते प्रांत के तट के पास रविवार को स्थानीय समयानुसार सुबह सात बजकर 25 मिनट पर भूकंप आया. इसका केंद्र करीब 40 किलोमीटर (25 मील) की गहराई में था. भूकंप के झटके आओमोरी प्रांत और आसपास के अन्य क्षेत्रों में भी महसूस किए गए. राहत की बात यह थी कि इसमें किसी जानमाल के नुकसान की खबर नहीं आई।


    वेनेजुएला में भूकंप की तबाही

    वहीं, वेनेज़ुएला में आए भूकंप के झटकों से मरने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है. वेनेजुएला में अब तक 1500 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है. अधिकारियों के अनुसार, परिवारों ने कम से कम 68,900 लोगों के लापता होने की जानकारी दी. इस सबके बीच लोगों में हताशा बढ़ती जा रही है. वेनेज़ुएला के सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों में से एक, ला ग्वायरा में, अपने प्रियजनों और पड़ोसियों की तलाश कर रहे लोग फावड़ों, भारी मशीनों, रस्सियों और अपने हाथों का इस्तेमाल करके कंक्रीट के ढेर को हटाने की कोशिश करते दिखे।

  • चीन ने 10 अमेरिकी रक्षा कंपनियों पर लगाया निर्यात प्रतिबंध, 46 फर्मों की खरीद पर भी रोक

    चीन ने 10 अमेरिकी रक्षा कंपनियों पर लगाया निर्यात प्रतिबंध, 46 फर्मों की खरीद पर भी रोक

    बीजिंग। अमेरिका और चीन के बीच जारी कारोबारी एवं रणनीतिक टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। चीन ने अमेरिका की हालिया कार्रवाई के जवाब में 10 अमेरिकी सैन्य क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों पर निर्यात प्रतिबंध लगाने के साथ 46 रक्षा कंपनियों के उत्पादों की सरकारी खरीद पर भी रोक लगा दी है।

    चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने सोमवार को घोषणा करते हुए कहा कि देश की कंपनियां अब इन 10 अमेरिकी फर्मों को दोहरे उपयोग (डुअल-यूज) वाली वस्तुओं का निर्यात नहीं करेंगी। ऐसी वस्तुएं वे होती हैं जिनका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।

    राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उठाया कदम

    चीन का कहना है कि यह फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा और अमेरिकी सरकार द्वारा चीनी सैन्य कंपनियों की सूची का दायरा बढ़ाने के जवाब में लिया गया है। प्रतिबंधित अमेरिकी कंपनियों में सैन्य ड्रोन निर्माण और दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भी शामिल हैं।

    वहीं, चीन के वित्त मंत्रालय ने सरकारी विभागों और संस्थानों को 46 अमेरिकी रक्षा कंपनियों से उत्पाद खरीदने पर रोक लगाने का निर्देश दिया है। इनमें लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन मिसाइल्स एंड डिफेंस जैसी प्रमुख रक्षा कंपनियां भी शामिल हैं। हालांकि, चीन ने यह भी स्पष्ट किया है कि अत्यावश्यक वस्तुओं के लिए विशेष निर्यात अनुमति का आवेदन किया जा सकता है।

    अमेरिकी सूची में शामिल हुईं अलीबाबा और बायजू

    इस महीने की शुरुआत में अमेरिकी रक्षा विभाग ने कई चीनी प्रौद्योगिकी कंपनियों को उन संस्थाओं की सूची में जोड़ा था, जिनके बारे में अमेरिका का दावा है कि उनके चीन की सेना से संबंध हैं। इस सूची में अलीबाबा और बायजू जैसी कंपनियों के नाम भी शामिल किए गए।

    बायजू ने अमेरिकी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए खारिज कर दिया है। अमेरिकी सूची में शामिल होने के बाद इन कंपनियों के लिए अमेरिकी सेना से जुड़े कॉन्ट्रैक्ट हासिल करना संभव नहीं रहेगा। चीन ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा था कि यह कार्रवाई मई में राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच बनी सहमति की भावना के विपरीत है।

    तकनीक और व्यापार को लेकर जारी है खींचतान

    दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव लंबे समय से जारी है। इसका केंद्र आयात शुल्क, उन्नत तकनीक और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा है। अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर कई बार अतिरिक्त आयात शुल्क लगाए हैं, जिसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी वस्तुओं और कृषि उत्पादों पर प्रतिशोधात्मक शुल्क लागू किए। इसके अलावा सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते दोनों देशों ने एक-दूसरे पर कई निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंध लगाए हैं।

  • तिब्बत में चीन का मेगा डैम प्रोजेक्ट: ब्रह्मपुत्र पर मंडराया संकट, भारत ने बढ़ाई निगरानी

    तिब्बत में चीन का मेगा डैम प्रोजेक्ट: ब्रह्मपुत्र पर मंडराया संकट, भारत ने बढ़ाई निगरानी


    तिब्बत  । तिब्बत  में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन द्वारा दुनिया के सबसे बड़े जलविद्युत बांध के निर्माण को आगे बढ़ाए जाने से भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह महत्वाकांक्षी परियोजना भारतीय सीमा के अपेक्षाकृत निकट स्थित है और इसका सीधा प्रभाव ब्रह्मपुत्र नदी के जल प्रवाह पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस परियोजना का संचालन पूरी तरह चीन के नियंत्रण में रहा, तो निचले बहाव वाले क्षेत्रों में जल प्रबंधन, पर्यावरण और कृषि से जुड़ी कई नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।

    यारलुंग त्सांगपो नदी तिब्बत से निकलकर भारत में अरुणाचल प्रदेश के रास्ते प्रवेश करती है, जहां इसे सियांग नदी के नाम से जाना जाता है। आगे चलकर यही नदी असम में ब्रह्मपुत्र का विशाल स्वरूप धारण करती है। करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि, मत्स्य पालन और पेयजल की जरूरतें इस नदी पर निर्भर हैं। ऐसे में ऊपरी धारा में किसी बड़े निर्माण का प्रभाव निचले क्षेत्रों तक महसूस किया जा सकता है।

    चीन का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और जलविद्युत क्षमता का विस्तार है। बीजिंग का दावा है कि बांध से पर्यावरणीय नुकसान को न्यूनतम रखने का प्रयास किया जाएगा और इससे क्षेत्र के आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि भारत में कई विशेषज्ञ और नीति विश्लेषक इस दावे को सावधानी से देखने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े स्तर की परियोजना नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती है।

    विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता जल प्रवाह के नियंत्रण को लेकर है। यदि भविष्य में किसी कारणवश नदी के पानी के बहाव में बदलाव किया जाता है या जल संग्रहण की मात्रा बढ़ाई जाती है, तो इसका असर अरुणाचल प्रदेश और असम में दिखाई दे सकता है। इससे कृषि उत्पादन, नदी तटों की संरचना और स्थानीय जैव विविधता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा अचानक अधिक पानी छोड़े जाने की स्थिति में बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है।

    भारत सरकार इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है। सरकार ने संसद में भी स्पष्ट किया है कि सीमा पार नदियों से जुड़ी सभी गतिविधियों की निगरानी की जा रही है। भारत ने चीन के साथ विभिन्न कूटनीतिक माध्यमों से यह मुद्दा उठाया है और सीमा पार नदी परियोजनाओं में पारदर्शिता, डेटा साझाकरण तथा पूर्व सूचना व्यवस्था पर जोर दिया है।

    इसके साथ ही भारत पूर्वोत्तर राज्यों में अपनी तैयारियों को भी मजबूत कर रहा है। बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली, नदी निगरानी नेटवर्क, जल संसाधन प्रबंधन और आपदा प्रतिक्रिया तंत्र को आधुनिक बनाया जा रहा है। उद्देश्य यह है कि किसी भी संभावित जोखिम की स्थिति में समय रहते प्रभावी कार्रवाई की जा सके।

    विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल जल संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से भी जुड़ा हुआ है। आने वाले वर्षों में भारत और चीन के बीच सीमा पार नदियों को लेकर संवाद और पारदर्शिता की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है। फिलहाल, चीन की इस विशाल परियोजना पर भारत की नजर बनी हुई है और सरकार संभावित प्रभावों का आकलन करने में जुटी हुई है।

  • G7 में जापान का बड़ा संदेश: हिंद-प्रशांत सुरक्षा, चीन की चुनौतियां और होर्मुज जलडमरूमध्य पर जताई चिंता

    G7 में जापान का बड़ा संदेश: हिंद-प्रशांत सुरक्षा, चीन की चुनौतियां और होर्मुज जलडमरूमध्य पर जताई चिंता

    फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर व्यापक चर्चा हुई। इस दौरान जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों, चीन से जुड़ी रणनीतिक चुनौतियों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को प्रमुखता से उठाते हुए सदस्य देशों के बीच अधिक समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दुनिया के कई हिस्सों में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं भी दबाव का सामना कर रही हैं।

    जापानी प्रधानमंत्री ने जी-7 नेताओं के साथ हुई बैठकों और रात्रिभोज चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र आज विश्व राजनीति और वैश्विक व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना केवल एशियाई देशों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के आर्थिक और सामरिक हितों के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जापान ने चीन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर अपना दृष्टिकोण साझेदार देशों के सामने रखा है।

    ताकाइची ने कहा कि जी-7 देशों के बीच इस बात पर व्यापक सहमति बनी है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में सहयोग और समन्वय को और मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और मजबूत बनाने पर जोर दिया। आधुनिक तकनीक, रक्षा उत्पादन और हरित ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आवश्यक खनिजों की उपलब्धता आज दुनिया की प्रमुख आर्थिक प्राथमिकताओं में शामिल हो चुकी है।

    पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए जापानी प्रधानमंत्री ने होर्मुज जलडमरूमध्य के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार के लिए यह मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए सभी पक्षों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि समुद्री व्यापार निर्बाध रूप से जारी रहे और किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो।

    ईरान के परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा भी चर्चा का केंद्र रहा। जापान ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ सहयोग बढ़ाने और परमाणु प्रसार को रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन किया। जापान का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा के लिए परमाणु हथियारों के प्रसार को नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है।

    इसी सम्मेलन में भारत ने भी विकास साझेदारी और वैश्विक दक्षिण की भूमिका को मजबूती से उठाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि किसी भी साझेदारी की वास्तविक सफलता इस बात में है कि वह सहयोगी देशों को आत्मनिर्भर बनने में कितना सक्षम बनाती है। उन्होंने अफ्रीका में भारत की विकास परियोजनाओं, कौशल विकास कार्यक्रमों और क्षमता निर्माण प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत साझेदारी के माध्यम से दीर्घकालिक विकास को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है।

    उधर, चीन के बढ़ते निर्यात को लेकर यूरोपीय देशों की चिंताएं भी चर्चा का विषय बनी रहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी शुल्कों के बावजूद चीन का औद्योगिक उत्पादन और निर्यात क्षमता मजबूत बनी हुई है, जिससे वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा और आर्थिक संतुलन से जुड़े नए सवाल खड़े हो रहे हैं। कुल मिलाकर, जी-7 शिखर सम्मेलन ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में सुरक्षा, व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़े मुद्दे वैश्विक एजेंडे के केंद्र में रहने वाले हैं।

  • BRICS कृषि एजेंडे में ब्राजील सबसे आगे, 88% वादों पर अमल; भारत 85% के साथ दूसरे स्थान पर

    BRICS कृषि एजेंडे में ब्राजील सबसे आगे, 88% वादों पर अमल; भारत 85% के साथ दूसरे स्थान पर


    मध्यप्रदेश । इंदौर में संपन्न हुई BRICS कृषि मंत्रियों की बैठक के बाद जारी इंदौर घोषणा-पत्र और विभिन्न सार्वजनिक रिपोर्टों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि कृषि क्षेत्र में किए गए वादों और संकल्पों को लागू करने की गति सभी सदस्य देशों में समान नहीं रही। खाद्य सुरक्षा, डिजिटल कृषि, महिला सशक्तिकरण, भूमि पुनरुद्धार और कृषि व्यापार जैसे प्रमुख मुद्दों पर बीते पांच वर्षों में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए, लेकिन उनके क्रियान्वयन में देशों के बीच उल्लेखनीय अंतर देखने को मिला।

    विश्लेषण के अनुसार कृषि प्रतिबद्धताओं को लागू करने के मामले में Brazil सबसे आगे रहा। रिपोर्ट में ब्राजील का अमल स्तर 88 प्रतिशत बताया गया है। ब्राजील ने भूमि पुनरुद्धार साझेदारी, पारिवारिक खेती को बढ़ावा देने और नए कृषि एक्शन प्लान को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई। कृषि सुधारों और सतत विकास आधारित योजनाओं को लागू करने में उसकी सक्रियता अन्य सदस्य देशों की तुलना में अधिक रही।

    दूसरे स्थान पर India रहा, जहां कृषि क्षेत्र में 85 प्रतिशत प्रतिबद्धताओं पर अमल का दावा किया गया है। भारत में डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन, ड्रोन तकनीक का उपयोग, जलवायु अनुकूल गांवों का विकास, कृषि डिजिटलीकरण और महिला आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं को BRICS एजेंडे के अनुरूप माना गया। “लखपति दीदी” जैसी पहल और तकनीक आधारित खेती के प्रयासों ने भारत की स्थिति को मजबूत किया, हालांकि कुछ क्षेत्रों में प्रगति अपेक्षाकृत धीमी बताई गई है।

    तीसरे स्थान पर China रहा, जिसने खाद्य सुरक्षा, कृषि अनुसंधान और डिजिटल कृषि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। खाद्य सुरक्षा सहयोग रणनीति और तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देने में चीन की भूमिका प्रमुख रही। वहीं Russia 80 प्रतिशत अमल के साथ चौथे स्थान पर रहा। रूस ने BRICS ग्रेन एक्सचेंज और राष्ट्रीय मुद्राओं में कृषि व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की, हालांकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण कुछ सहयोगी कार्यक्रम प्रभावित हुए।

    रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि South Africa और BRICS के नए सदस्य देशों की प्रगति अपेक्षाकृत धीमी रही। दक्षिण अफ्रीका का अमल स्तर 65 प्रतिशत आंका गया, जबकि नए सदस्य देशों का औसत प्रदर्शन 45 प्रतिशत के आसपास रहा। नए सदस्य देशों में United Arab Emirates, Egypt, Iran, Ethiopia, Saudi Arabia और Indonesia शामिल हैं। इनके लिए वर्ष 2024 और 2025 की कृषि प्रतिबद्धताओं को आधार बनाकर आकलन किया गया।

    पिछले पांच वर्षों के दौरान BRICS देशों ने कई महत्वपूर्ण कृषि निर्णय लिए। वर्ष 2021 में भारत की अध्यक्षता के दौरान खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादकता और छोटे किसानों को सशक्त बनाने पर केंद्रित एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई। 2022 में चीन की मेजबानी में खाद्य सुरक्षा सहयोग रणनीति और “डेक्कन प्रिंसिपल्स ऑन फूड सिक्योरिटी” को अपनाया गया। 2023 में दक्षिण अफ्रीका ने ग्रामीण विकास और जलवायु अनुकूल कृषि को प्राथमिकता दी। 2024 में रूस ने ग्रेन एक्सचेंज और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार का प्रस्ताव रखा, जबकि 2025 में ब्राजील ने भूमि पुनरुद्धार साझेदारी और डिजिटल प्रमाणन जैसे नए प्रस्तावों को आगे बढ़ाया।

    हालांकि रिपोर्ट में BRICS की एक प्रमुख कमजोरी भी उजागर हुई है। संगठन का ढांचा पूरी तरह स्वैच्छिक है और सदस्य देशों के लिए किसी भी निर्णय को लागू करना कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसके अलावा प्रगति की निगरानी के लिए कोई स्वतंत्र तंत्र भी मौजूद नहीं है। अधिकांश मूल्यांकन सदस्य देशों की स्वयं प्रस्तुत रिपोर्टों, संयुक्त घोषणाओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर किए जाते हैं। यही कारण है कि कई बार घोषित लक्ष्यों और वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर देखने को मिलता है।

  • भारत-चीन रिश्तों पर पाकिस्तान के प्रभाव के सवाल पर चीन का जवाब, राजदूत बोले- सभी पड़ोसी हमारे लिए समान रूप से महत्वपूर्ण

    भारत-चीन रिश्तों पर पाकिस्तान के प्रभाव के सवाल पर चीन का जवाब, राजदूत बोले- सभी पड़ोसी हमारे लिए समान रूप से महत्वपूर्ण

    नई दिल्ली । भारत और चीन के संबंधों में हाल के समय में दिखाई दे रही सकारात्मक गतिविधियों के बीच भारत में चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और संवाद को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चीन अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को विशेष महत्व देता है और क्षेत्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने के पक्ष में है।

    एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान भारत, चीन और पाकिस्तान के त्रिकोणीय संबंधों को लेकर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए चीनी राजदूत ने कहा कि चीन की विदेश नीति का आधार पड़ोसी देशों के साथ मित्रता, सहयोग और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया के देशों सहित सभी पड़ोसी राष्ट्र चीन के लिए महत्वपूर्ण हैं और उनके साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना बीजिंग की प्राथमिकताओं में शामिल है।

    राजदूत ने भारत और पाकिस्तान के संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों देश न केवल एक-दूसरे के पड़ोसी हैं बल्कि चीन के भी पड़ोसी हैं। ऐसे में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए संवाद का मार्ग सबसे उपयुक्त माना जाना चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से अपने मतभेदों का समाधान खोजने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

    शू फेइहोंग ने कहा कि भौगोलिक वास्तविकताओं को बदला नहीं जा सकता और पड़ोसी देशों के बीच बेहतर संबंध पूरे क्षेत्र के विकास और समृद्धि में योगदान दे सकते हैं। उनके अनुसार, आपसी विश्वास और सहयोग न केवल संबंधित देशों के नागरिकों के लिए लाभकारी साबित होगा बल्कि व्यापक क्षेत्रीय स्थिरता को भी मजबूती देगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक राजनीति और आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। एशिया में बढ़ते आर्थिक महत्व और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच क्षेत्रीय सहयोग को लेकर विभिन्न देशों की सक्रियता बढ़ी है। चीन भी अपने पड़ोसी देशों के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करने पर लगातार जोर देता रहा है।

    राजदूत ने भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर संपर्क बढ़ा है। उन्होंने आर्थिक और व्यापारिक सहयोग में आई वृद्धि को सकारात्मक संकेत बताया। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार विस्तार कर रहा है और भविष्य में सहयोग की संभावनाएं और अधिक मजबूत हो सकती हैं।

    उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया की दो बड़ी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के रूप में भारत और चीन के पास साझा विकास, निवेश, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के पर्याप्त अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार, आर्थिक साझेदारी का विस्तार दोनों देशों के लिए लाभकारी साबित हो सकता है और क्षेत्रीय विकास को नई गति दे सकता है।

    राजनयिक हलकों में इस बयान को दक्षिण एशिया में संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने की चीन की सार्वजनिक नीति के अनुरूप माना जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग का महत्व और बढ़ गया है। ऐसे में प्रमुख एशियाई देशों के बीच संवाद, व्यापारिक साझेदारी और विश्वास निर्माण की प्रक्रिया भविष्य की कूटनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

    भारत, चीन और पाकिस्तान जैसे महत्वपूर्ण देशों के बीच संबंधों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहती है। ऐसे में संवाद, कूटनीति और सहयोग पर दिया गया जोर क्षेत्रीय शांति और दीर्घकालिक विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है।

  • सिंगापुर ने भारतीयों के खिलाफ नस्लीय नफरत फैलाने वाली 14 सोशल मीडिया पोस्ट पर रोक लगाई

    सिंगापुर ने भारतीयों के खिलाफ नस्लीय नफरत फैलाने वाली 14 सोशल मीडिया पोस्ट पर रोक लगाई

    नई दिल्ली। सिंगापुर सरकार ने भारतीयों के खिलाफ नस्लीय नफरत फैलाने वाली 14 सोशल मीडिया पोस्ट को ब्लॉक कर दिया है। यह कार्रवाई ‘ऑनलाइन क्रिमिनल हार्म्स एक्ट 2023’ (OCHA) के तहत की गई। अधिकारियों ने कहा कि ये पोस्ट जानबूझकर भारतीय समुदाय को निशाना बनाकर भड़काऊ सामग्री फैलाने के लिए बनाई गई थीं।

    सिंगापुर के गृह मंत्रालय (MHA) ने YouTube, Facebook और X को निर्देश दिए कि वे इन पोस्टों तक स्थानीय उपयोगकर्ताओं की पहुंच रोकें। सरकार ने इसे विदेशी कनेक्शन वाले गलत जानकारी फैलाने के अभियान के खिलाफ अब तक की सबसे सख्त कार्रवाई बताया। इस कदम का उद्देश्य सिंगापुर जैसे बहुसांस्कृतिक शहर-राज्य में सामाजिक सद्भाव बनाए रखना और नस्लीय तनाव को रोकना है।

    पोस्टों में क्या था कंटेंट
    अधिकारियों ने बताया कि आपत्तिजनक सामग्री पिछले महीने चीन के ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पर शुरू हुई थी। शुरुआत में यह सिंगापुर की सांस्कृतिक पहचान और जातीय राजनीति पर केंद्रित थी। बाद में पोस्ट और अधिक भड़काऊ हो गई, जिसमें दावा किया गया कि भारतीयों की बढ़ती आबादी सिंगापुर के लिए खतरा है और देश के कई संस्कृतियों वाले ढांचे को कमजोर कर रही है।

    कुछ पोस्टों में कहा गया कि सिंगापुर की सामाजिक स्थिरता उसके बहुसांस्कृतिक ढांचे की वजह से नहीं, बल्कि चीनी बहुल आबादी की वजह से बनी हुई है। इसके साथ ही कुछ पोस्टों ने भारतवंशी नेताओं के प्रभाव को लेकर आलोचना की और भारतीय प्रवासियों के बढ़ते प्रभाव को देश के हितों के लिए हानिकारक बताया।

    कंटेंट को विश्वसनीय दिखाने के लिए ‘लिटिल इंडिया’ की व्यस्त सड़कों और पगोडा स्ट्रीट पर भारतीय त्योहारों के वीडियो का इस्तेमाल किया गया। पोस्ट में अपमानजनक भाषा का भी इस्तेमाल हुआ, जैसे भारतीय आबादी की तुलना “करी (curry) के जमावड़े” से करना।

    कानूनी आधार और जांच
    MHA ने कहा कि ये पोस्ट सिंगापुर के दंड संहिता (Penal Code) की धारा 298A के तहत अपराध की श्रेणी में आ सकते हैं। यह धारा उन गतिविधियों को अपराध मानती है जो जानबूझकर नस्लीय या धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी, नफरत या दुर्भावना को बढ़ावा देती हैं।

    जांच में पता चला कि यह सामग्री संभवतः चीन स्थित प्लेटफ़ॉर्म से शुरू हुई और फिर अन्य सोशल मीडिया चैनलों पर फैल गई। अधिकारियों ने यह भी कहा कि सामग्री फैलाने के प्रयास सुनियोजित और जानबूझकर किए गए थे।

    सिंगापुर पुलिस ने प्लेटफ़ॉर्मों को निर्देश दिए कि वे सभी ज़रूरी कदम उठाएं ताकि स्थानीय उपयोगकर्ताओं को इन भड़काऊ पोस्टों तक पहुंच न मिले। अधिकारियों ने कहा कि यह कार्रवाई बहुसांस्कृतिक समाज में सद्भाव बनाए रखने और नस्लीय नफरत फैलाने वाली सामग्री से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी थी।

    इस कदम से सिंगापुर ने दिखा दिया कि वह नस्लीय और धार्मिक सद्भाव बनाए रखने में कड़ा रुख अपनाने के लिए तत्पर है, और विदेशों से आई किसी भी भड़काऊ सामग्री को रोकने के लिए कानूनी और तकनीकी माध्यमों का प्रयोग कर रहा है।

  • अमेरिका की चेतावनी: चीन पर निर्भर क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन बन सकती है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती

    अमेरिका की चेतावनी: चीन पर निर्भर क्रिटिकल मिनरल्स सप्लाई चेन बन सकती है राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती

    नई दिल्ली । वैश्विक स्तर पर रणनीतिक महत्व रखने वाले क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई चेन में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर अमेरिका ने गंभीर चिंता जताई है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा है कि दुनिया भर में जरूरी खनिजों के उत्पादन और प्रोसेसिंग पर एक ही देश की अत्यधिक निर्भरता आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा दोनों के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। उनके अनुसार लिथियम, कोबाल्ट, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और ग्रेफाइट जैसे खनिज आधुनिक तकनीक, रक्षा प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर्स और रिन्यूएबल एनर्जी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, और इन पर सीमित देशों का नियंत्रण वैश्विक असंतुलन पैदा कर सकता है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने संसद में दिए बयान में कहा कि यदि किसी जरूरी संसाधन की सप्लाई का लगभग पूरा हिस्सा एक ही देश पर केंद्रित हो जाए, तो यह स्थिति केवल आर्थिक जोखिम नहीं बल्कि रणनीतिक कमजोरी भी बन जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी निर्भरता संकट के समय राजनीतिक और आर्थिक दबाव बनाने का माध्यम बन सकती है, जिससे वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ने की आशंका रहती है।

    उन्होंने बताया कि अमेरिका इस स्थिति से निपटने के लिए दुनिया के कई देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है ताकि सप्लाई चेन को अधिक विविध और संतुलित बनाया जा सके। इसके तहत केवल कच्चे माल की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग क्षमता को भी विभिन्न देशों में विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। उनका कहना था कि अब यह रणनीति अमेरिकी विदेश नीति का एक अहम हिस्सा बन चुकी है और लगभग सभी राजनयिक मिशनों में इस विषय पर काम किया जा रहा है।

    इस मुद्दे को लेकर अमेरिका की नीति चीन के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के संदर्भ में और अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी पक्ष का मानना है कि क्रिटिकल मिनरल्स की सप्लाई पर अत्यधिक निर्भरता भविष्य में रक्षा और तकनीकी क्षेत्र में गंभीर चुनौतियां खड़ी कर सकती है। इसी कारण अमेरिका कई देशों को साथ लेकर एक व्यापक सप्लाई नेटवर्क बनाने की दिशा में काम कर रहा है, ताकि किसी एक देश पर निर्भरता को कम किया जा सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों की भूमिका लगातार बढ़ रही है, जिससे इनके उत्पादन और आपूर्ति पर नियंत्रण रखने वाले देशों की रणनीतिक शक्ति भी बढ़ती जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और अधिक तेज होती दिख रही है, जो आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यापार और तकनीकी संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

    अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि केवल खनिज ही नहीं, बल्कि दवा निर्माण जैसे अन्य क्षेत्रों में भी उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण चिंता का विषय है। उनके अनुसार भविष्य की वैश्विक नीतियों में सप्लाई चेन की सुरक्षा और विविधीकरण को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है, ताकि किसी भी संकट की स्थिति में दुनिया को बड़े व्यवधान से बचाया जा सके।