Tag: China

  • भारत के न्योते पर बांग्लादेश की चुप्पी से बढ़ी हलचल, शेख हसीना प्रत्यर्पण और चीन से बढ़ती नजदीकी पर नजर

    भारत के न्योते पर बांग्लादेश की चुप्पी से बढ़ी हलचल, शेख हसीना प्रत्यर्पण और चीन से बढ़ती नजदीकी पर नजर


    नई दिल्ली ।
    बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए भारत आएंगे या नहीं, इसे लेकर स्थिति अभी साफ नहीं है। भारत में 12-13 सितंबर के बीच ब्रिक्स बैठक होनी है। लगभग सभी देश इसमें शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन बांग्लादेश के शिखर सम्मेलन से दूरी बनाने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय पर हो रहा है, जब शेख हसीना के प्रत्यर्पण और तीस्ता नदी के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है। साथ ही बांग्लादेश में चीन के बढ़ते दखल के भी संकेत मिल रहे हैं। भारत अब तक बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को नई दिल्ली आने का दो बार न्योता दे चुका है।

    बुधवार को बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलील-उर-रहमान पत्रकारों से बात कर रहे थे। इस दौरान उनसे पीएम रहमान के ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने को लेकर सवाल पूछा गया। सवाल सुनते ही उन्होंने चुप्पी साध ली और विषय बदलने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि वह वहां अपने देश के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं हैं और उनसे महासभा के अध्यक्ष के रूप में ही सवाल किए जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई द्विपक्षीय मुद्दा है तो वह विदेश मंत्री के तौर पर उस पर अलग से बात कर सकते हैं।

    भारत का न्योता

    भारत ने रहमान को BIMSTEC शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भी बुलाया है। इसमें भारत, श्रीलंका, थाईलैंड, बांग्लादेश, म्यांमा, नेपाल और भूटान शामिल हैं। हालांकि, भारत की तरफ से यह भी कहा जा चुका है कि रहमान के आने की अभी कोई पुष्टि नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इसकी जानकारी दी थी।

    इससे पहले जब रहमान प्रधानमंत्री बने, तब भारत ने उन्हें नई दिल्ली आने का न्योता दिया था। हालांकि, उस समय भी उनकी यात्रा की पुष्टि नहीं हुई थी और ऐसी खबरें सामने आई थीं कि रहमान चीन जाने की तैयारी कर रहे हैं। वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने यात्रा उस समय के लिए टाल दी थी। बाद में वह म्यांमार और बीजिंग पहुंचे थे।

    एक ओर बांग्लादेश भारत के सामने अपनी शर्तें रख रहा है, वहीं बैठकों में डीजल सप्लाई बढ़ाने समेत कई तरह की मदद भी मांग रहा है।

    किस मूड में है बांग्लादेश

    अगस्त में बांग्लादेश ने कहा था कि प्रधानमंत्री को भारत यात्रा की कोई जल्दी नहीं है। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने कहा था कि अगर राष्ट्रीय हितों के आधार पर किसी समझौते पर पहुंचा जाता है तो अगले सप्ताह या उसके अगले सप्ताह यात्रा हो सकती है। उन्होंने कहा था कि इसे लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। इससे पहले भी बांग्लादेश ने कहा था कि रहमान की यात्रा के लिए भारत को अनुकूल माहौल बनाना होगा।

    क्या शेख हसीना हैं वजह

    साल 2024 में हुए छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना बांग्लादेश छोड़कर भारत आ गई थीं। बाद में जब 2026 में रहमान सरकार ढाका में आई, तो उनके प्रत्यर्पण की मांग तेज हो गई। हाल ही में एक और मंत्री जाहिद उर रहमान ने कहा है कि हसीना को भारत से लेकर आएंगे और उन्हें फांसी दे दी जाएगी। हालांकि, इससे पहले बांग्लादेश सरकार ने कहा था कि पूर्व प्रधानमंत्री को सभी कानूनी सहायता और सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी।

    प्रत्यर्पण के मुद्दे पर पहले से तनावपूर्ण रिश्ते तब और खराब हुए, जब हसीना ने भारत में रहते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। बांग्लादेश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले ही इस पर आपत्ति जताई थी और बाद में अपना रुख और सख्त कर लिया था। भारत ने स्पष्ट किया था कि हसीना की प्रेस कॉन्फ्रेंस से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

    क्या चीन है कारण

    जून में तारिक रहमान चीन की यात्रा पर पहुंचे थे और इस दौरान बांग्लादेश की ओर से बीजिंग से निवेश मांगने की खबरें सामने आई थीं। यात्रा के दौरान कई द्विपक्षीय समझौते भी हुए थे। बांग्लादेश ने बीजिंग से तीस्ता नदी के मुद्दे पर मदद मांगी थी। इसके अलावा मोंगला पोर्ट पर SEZ यानी स्पेशल इकोनॉमिक जोन बनाए जाने से जुड़ी डील भी चर्चा में रही थी। ढाका के इन कदमों को भारत बारीकी से देख रहा था।

  • न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    न सूरज की रोशनी, न बारिश का असर, चीन में बंद कोयला खदानों के अंदर खेती की नई तकनीक पर हो रहा प्रयोग

    नई दिल्ली । खेती के लिए आमतौर पर खुली जमीन, धूप, पानी और सही मौसम की जरूरत होती है. लेकिन क्लाइमेट चेंज के दौर में यही चीजें किसानों के लिए चुनौती बनती जा रही हैं. कहीं सूखा फसल खराब कर देता है तो कहीं ज्यादा बारिश पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है.

    चीन के वैज्ञानिक अब इसी समस्या का एक अलग रास्ता खोज रहे हैं. उनका आइडिया है कि खेती को जमीन के ऊपर करने के बजाय जमीन के नीचे ले जाया जाए. इसके लिए बंद हो चुकी कोयला खदानों का इस्तेमाल किया जा सकता है. खदानों में मौजूद बड़ी खाली जगह को एक तरह के हाईटेक फार्म में बदला जाएगा, जहां फसल के लिए जरूरी रोशनी, पानी, तापमान और हवा को इंसान अपने हिसाब से कंट्रोल कर सकेगा. हालांकि, इसका मकसद सिर्फ अनाज उगाना नहीं, बल्कि भविष्य की स्पेस कॉलोनियों के लिए खेती की टेक्नोलॉजी तैयार करना भी है.

    अंधेरी खदान में आएगी नकली धूप

    जमीन के कई मीटर नीचे सूरज की रोशनी पहुंचना संभव नहीं है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि पौधे बढ़ेंगे कैसे? वैज्ञानिकों के प्लान में इसका जवाब आर्टिफिशियल लाइटिंग है. इसका मतलब खदान के अंदर ऐसी लाइट लगाई जाएगी, जो पौधों को ग्रो करने के लिए जरूरी रोशनी देगी. इस काम में खदानों का पुराना इंफ्रास्ट्रक्चर भी मदद कर सकता है. कई खदानों में पहले से पावर सप्लाई और वेंटिलेशन सिस्टम मौजूद हैं. इन्हें खेती की जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करने की संभावना देखी जा रही है. इसका मतलब बाहर चाहे रात हो या दिन, बारिश हो या तेज धूप, जमीन के नीचे मौजूद पौधों के लिए एक अलग ही मौसम तैयार किया जा सकेगा.

    गर्मी के लिए धरती की एनर्जी

    जमीन के अंदर एक और फायदा है. यहां का तापमान खुले मैदान की तरह लगातार तेजी से ऊपर-नीचे नहीं होता. वैज्ञानिक इस स्थिर वातावरण का फायदा उठाने की योजना बना रहे हैं. इसके लिए जियोथर्मल एनर्जी यानी धरती के अंदर मौजूद गर्मी का इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे अंडरग्राउंड फार्म में पौधों के लिए जरूरी तापमान बनाए रखने में मदद मिलेगी. साथ ही पारंपरिक फ्यूल पर निर्भरता कम करने और ग्रीनहाउस गैसों के एमिशन को घटाने की कोशिश भी की जा सकती है. इसका मतलब जिस खदान को कभी कोयला निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता था, वही जगह आगे चलकर क्लीन एनर्जी और खेती के एक्सपेरिमेंट का सेंटर बन सकती है.

    जहरीले पानी को भी बनाया जाएगा यूजफुल

    कोयला खदानों में सिर्फ खाली जगह ही नहीं होती. वहां जमा पानी भी एक बड़ी समस्या बन सकता है. कई बार इस पानी में ऐसे केमिकल और हैवी मेटल्स पाए जा सकते हैं, जिन्हें सीधे खेती में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. वैज्ञानिक इस समस्या के लिए पानी को साफ करने वाली तकनीक का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं. मेम्ब्रेन सेपरेशन जैसी टेक्नोलॉजी के जरिए पानी से नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों को अलग करने की कोशिश होगी. इसके बाद साफ किए गए पानी का इस्तेमाल कुछ फसलों की सिंचाई में किया जा सकता है. चाय और रेपसीड जैसी फसलों का भी जिक्र किया गया है. हालांकि, कौन सी फसल जमीन के नीचे इस सिस्टम में सबसे अच्छी तरह उग सकती है, यह भी रिसर्च का हिस्सा होगा.

    असली मकसद खेती से कहीं बड़ा

    पहली नजर में लग सकता है कि चीन का यह पूरा प्लान सिर्फ जमीन की कमी को दूर करने के लिए बनाया गया है. लेकिन वैज्ञानिकों की दिलचस्पी इससे कहीं आगे की है. दरअसल, अंडरग्राउंड फार्म को एक तरह की एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग लैब के तौर पर इस्तेमाल करने की योजना है. यहां वैज्ञानिक देखेंगे कि बिना प्राकृतिक वातावरण के पौधों को किस तरह जिंदा रखा जा सकता है. रोशनी कितनी होनी चाहिए, पानी किस तरह इस्तेमाल किया जाए, हवा और तापमान कैसे कंट्रोल हों और कार्बन का पौधों पर क्या असर पड़े, इन सभी चीजों पर एक्सपेरिमेंट किया जा सकता है.

    धरती के नीचे की खेती जाएगी अंतरिक्ष तक

    इस रिसर्च का सबसे दिलचस्प हिस्सा स्पेस मिशन से जुड़ा है. भविष्य में अगर इंसान चांद या मंगल जैसे दूसरे ग्रहों पर लंबे समय तक रहना चाहता है तो वहां खुले खेत बनाना बेहद मुश्किल होगा. वहां न धरती जैसा वातावरण है, न आसानी से उपलब्ध पानी और न ही खेती के लिए सामान्य मौसम. ऐसे में जमीन के नीचे या पूरी तरह कंट्रोल किए गए एनवायरनमेंट में खाना उगाने की टेक्नोलॉजी बेहद काम आ सकती है. चीन के वैज्ञानिकों का यह एक्सपेरिमेंट इसी दिशा में एक टेस्टिंग ग्राउंड की तरह काम कर सकता है. आज जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बंद पड़ी कोयला खदान में किया जाएगा, कल उसी के किसी बेहतर वर्जन से दूसरे ग्रहों पर पौधे उगाने की कोशिश की जा सकती है.

    हजारों बंद खदानें बन सकती हैं नया फार्म

    चीन में पिछले कई सालों में बड़ी संख्या में कोयला खदानें बंद हुई हैं. एक दशक में करीब बारह हजार खदानें बंद की जा चुकी हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है. ऐसे में देश के पास जमीन के नीचे ऐसे कई बड़े इलाके मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल नए तरीके से किया जा सकता है. वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, आने वाले समय में बंद खदानों में मौजूद विशाल खाली जगह अंडरग्राउंड एग्रीकल्चर के लिए इस्तेमाल हो सकती है. हालांकि, इसे बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले कई सवालों के जवाब तलाशने होंगे.

    आसान नहीं होगी जमीन के नीचे खेती

    अंडरग्राउंड फार्म का आइडिया सुनने में जितना शानदार लगता है, इसे असल में लागू करना उतना ही आसान नहीं होगा. आर्टिफिशियल लाइटिंग के लिए बड़ी मात्रा में बिजली चाहिए. तापमान और हवा को कंट्रोल करने के लिए भी लगातार एनर्जी की जरूरत होगी. इसके अलावा खदानों की सेफ्टी, पानी की क्वालिटी और अंदर काम करने वाले लोगों की सुरक्षा भी अहम मुद्दे होंगे. इसलिए फिलहाल इसे बड़े पैमाने की खेती का तैयार मॉडल मानना जल्दबाजी होगी. वैज्ञानिक पहले यह समझना चाहते हैं कि बंद खदानों को किस तरह सुरक्षित और उपयोगी एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर में बदला जा सकता है.

    आज खदान, कल अंतरिक्ष का खेत

    चीन का यह प्रयोग खेती की पारंपरिक सोच को जरूर बदलने वाला है. जिस जगह कभी धरती के अंदर से कोयला निकाला जाता था, वहीं अब पौधों को उगाने की कोशिश की जा रही है. फिलहाल इसका सबसे बड़ा मकसद करोड़ों टन अनाज जमीन के नीचे पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसा सिस्टम समझना है जिसमें इंसान प्राकृतिक मौसम पर निर्भर हुए बिना खाना उगा सके. अगर यह प्रयोग सफल होता है तो इसका फायदा सिर्फ चीन की बंद खदानों तक सीमित नहीं रहेगा. क्लाइमेट चेंज से जूझती दुनिया से लेकर भविष्य में चांद और मंगल पर बनने वाली इंसानी बस्तियों तक, जमीन के नीचे खेती की यह टेक्नोलॉजी एक दिन बेहद काम की साबित हो सकती है.

  • BRICS सम्मेलन में भारत-चीन के बीच कारोबार पर अहम बातचीत, तकनीक और निवेश से जुड़ी अड़चनें उठाएगा भारत

    BRICS सम्मेलन में भारत-चीन के बीच कारोबार पर अहम बातचीत, तकनीक और निवेश से जुड़ी अड़चनें उठाएगा भारत

    नई दिल्ली । में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन से पहले भारत और चीन के बीच आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत अहम हो सकती है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है और उनके साथ बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी आ सकता है। ऐसे में भारत चीन से आने वाली हाईटेक वस्तुओं के आयात में आ रही अड़चनों और चीन में भारतीय कंपनियों के निवेश से जुड़े प्रतिबंधों का मुद्दा उठा सकता है।

    भारत सरकार की ओर से चीनी तकनीक और महत्वपूर्ण सामान के आयात से जुड़ी परेशानियों पर उद्योग संगठनों के साथ विचार-विमर्श किया जा रहा है। सरकार ने चीन की ओर से प्रमुख तकनीकी उत्पादों पर लगाए गए प्रतिबंधों का भी अध्ययन किया है। भारतीय उद्योग जगत का मानना है कि इन प्रतिबंधों का असर देश की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

    चीन की ओर से कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्यात संबंधी प्रतिबंध लगाए गए हैं। इनमें इंगट और वेफर तकनीक, बैटरी सेल और उससे जुड़ी तकनीक, हाई वोल्टेज डायरेक्ट करंट यानी HVDC उपकरण तथा कुछ विशेष ट्रांसमिशन कंपोनेंट्स शामिल हैं। HVDC तकनीक लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने में महत्वपूर्ण होती है और इससे ट्रांसमिशन के दौरान होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है। यह रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड से जोड़ने और बिजली व्यवस्था को स्थिर रखने में भी उपयोगी मानी जाती है।

    भारत की चिंता यह है कि महत्वपूर्ण तकनीक और कच्चे माल की आपूर्ति में लगातार अड़चनें आने से घरेलू विनिर्माण को नुकसान हो सकता है। इससे बैकवर्ड इंटीग्रेशन की प्रक्रिया भी प्रभावित होने की आशंका है। भारत बातचीत के दौरान प्रक्रियागत बाधाओं और सोर्सिंग से जुड़े नियमों में राहत के साथ पारस्परिकता का मुद्दा उठा सकता है, यानी दोनों देशों की कंपनियों को समान स्तर की सुविधा मिले।

    हालांकि भारत-चीन व्यापार की तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून अवधि में चीन को भारत का निर्यात पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 28 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 5.55 अरब डॉलर हो गया। अमेरिकी टैरिफ के कारण कुछ क्षेत्रों में निर्यात प्रभावित होने के बीच चीन को बढ़े निर्यात ने भारत को कुछ राहत दी।

    भारत और चीन के संबंधों में हाल के महीनों में कुछ नरमी भी दिखाई दी है। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की बहाली, नाथू ला के रास्ते सीमा व्यापार फिर शुरू होना और लोगों के बीच संपर्क बढ़ना इसी बदलाव के संकेत हैं। इसके अलावा, लैंड बॉर्डर साझा करने वाले देशों से FDI से जुड़े नियमों में भी कुछ बदलाव किए गए हैं।

    बिजली क्षेत्र में भी भारत ने चीन के साथ कुछ मामलों में नियमों में ढील दी है। मार्च में सरकारी बिजली उपकरण कंपनी BHEL को चीन से 21 महत्वपूर्ण वस्तुओं की खरीद पांच साल तक करने की अनुमति दी गई। जून में भारत में कारखाने रखने वाली चार चीनी बिजली उपकरण कंपनियों को महत्वपूर्ण बिजली परियोजनाओं से जुड़े सरकारी टेंडरों में भाग लेने की अनुमति मिली।

    2020 में LAC पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद चीनी कंपनियों के लिए सरकारी खरीद और निवेश से जुड़े नियम कड़े किए गए थे। अब कुछ क्षेत्रों में सीमित राहत से दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में व्यावहारिक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।

    BRICS सम्मेलन भारत-चीन के बीच इन आर्थिक मुद्दों पर उच्चस्तरीय बातचीत का अवसर बन सकता है। भारत की प्राथमिकता हाईटेक सामान और जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति आसान कराने के साथ भारतीय कंपनियों के लिए चीन में निवेश का माहौल बेहतर करना हो सकती है। ऐसे में शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर होने वाली बातचीत पर खास नजर रहेगी।

  • चीन ने खोजी नई तकनीक….परमाणु हथियार बनाने के लिए समुद्र के पानी से यूरेनियम निकालने की तैयारी

    चीन ने खोजी नई तकनीक….परमाणु हथियार बनाने के लिए समुद्र के पानी से यूरेनियम निकालने की तैयारी


    बीजिंग।
    चीन (China) ने एक नई तकनीक इजाद (New Technology Invented) की है, जिससे वह समुद्र के पानी से परमाणु हथियार (Nuclear Weapons) बनाने के लिए यूरेनियम (Uranium) हासिल कर सकता है। चीनी शोधकर्ताओं ने इस बारे में बड़ी सफलता हासिल की है। चीन द्वारा विकसित किए गए इस नए मटीरियल से वह समुद्र से यूरेनियम निकाल पाने में सक्षम होगा। खास बात यह है कि इस मामले में चीन ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है। अमेरिका, समुद्र के एक ग्राम पानी से मात्र 6 मिलीग्राम यह पदार्थ निकाल पाता था। वहीं, चीन ने एक मिलीग्राम समुद्री पानी से 50.4मिलीग्राम पदार्थ निकालने में कामयाबी हासिल की है। इस तरह से अब समुद्र का पानी, परमाणु ईंधन के लिए अहम स्रोत बन गया है।


    क्या है यह मटीरियल

    चीन समुद्री पानी से जो मटीरियल निकालने में सफल हुआ है, उसका नाम है फॉसकेज। यह एक स्पंज जैसा मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर है, जिसमें फॉस्फेट होता है। साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, यह रासायनिक जाल की तरह काम करते हैं। शोधकर्ताओं ने इस प्रयोग के दौरान फॉसकेज को मिलीमीटर-साइज के बीड्स (छोटी गोलियों) में बदल दिया। इन्हें खुले समुद्र में इस्तेमाल करना और वापस निकालना आसान है। इन बीड्स ने प्रति ग्राम 22.55मिलीग्राम यूरेनियम सोखा और सात बार दोबारा इस्तेमाल किए जाने पर भी काम करते रहे।


    क्या हैं इसके मायने

    चीन के लिए यह तकनीक बहुत ज्यादा मायने रखती है। इससे चीन के घरेलू यूरेनियम प्रोडक्शन में तेजी से इजाफा होगा। चीन ने साल 2024 में घरेलू खदानों से 1600 टन यूरेनियम का उत्पादन किया। हालांकि वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के मुताबिक चीन को इससे कहीं ज्यादा 13,000 टन यूरेनियम की जरूरत है। इस भारी गैप को पूरा करने के लिए चीन आयात पर निर्भर था। ऐसे में समुद्र के पानी से यूरेनियम की पूर्ति होने से चीन का काम काफी आसान हो जाएगा।


    समुद्र के पानी में कैसे पहुंचा यूरेनियम

    गौरतलब है कि पूरी दुनिया में धरती पर 7.9 मिलियन टन यूरेनियम के ज्ञात स्रोत हैं। वहीं, समुद्र में यह आंकड़ा 4.5 बिलियन टन का हो सकता है। यह यूरेनियम समुद्र के पानी में बारिश के वक्त चट्टानों से धुलकर नदियों के रास्ते पहुंचा है। यह यूरेनियम है तो बहुत बड़ी मात्रा में, लेकिन इसे समुद्र के पानी निकालना बहुत बड़ी चुनौती है। एक टन समुद्री पानी में मात्र 3.3 मिलीग्राम यूरेनियम होता है। यानी, समुद्र के पानी से यूरेनियम प्रॉसेस करने के लिए बहुत ज्यादा मात्रा में इसके पानी की जरूरत होगी।


    क्या हैं चुनौतियां

    ऐसा नहीं है कि समुद्र के पानी में केवल यूरेनियम ही है। इसमें और भी बहुत सारी चीजें घुली हुई हैं। ऐसे में यूरेनियम को समुद के पानी से अलग करना बहुत बड़ी चुनौती है। अमेरिका में शोधकर्ताओं इस चुनौती से पार पाने के लिए कई साल मेहनत की। ओक रिज नेशनल लैबोरेट्री ने स्पेशलाइज्ड फाइबर्स डिजाइन किए। इसकी मदद से यूरेनियम कैप्चर किया जाता था। वहीं, पैसेफिक नॉर्थवेस्ट नेशनल लेबोरेट्री ने प्राकृतिक रूप से बहते समुद्री पानी के ऊप्र इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग किया। हालांकि इतनी कवायदों के बावजूद यह लोग एक ग्राम समुद्री पानी से मात्र 6 मिलीग्राम यूरेनियम ही निकाल पाते थे।

  • अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन कोर कमांडर वार्ता आज, वचा-दमाई में एलएसी तनाव घटाने पर होगी अहम चर्चा

    अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन कोर कमांडर वार्ता आज, वचा-दमाई में एलएसी तनाव घटाने पर होगी अहम चर्चा


    नई दिल्ली । 
    अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर हालिया तनाव के बीच भारत और चीन की सेनाओं के बीच आज 6 सितंबर को पहली बार कोर कमांडर स्तर की उच्चस्तरीय सैन्य वार्ता होने जा रही है। यह बैठक अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में स्थित वचा-दमाई बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर आयोजित की जाएगी। दोनों पक्षों के बीच होने वाली इस बातचीत को पूर्वी सेक्टर में सीमा प्रबंधन और तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    अब तक भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर की अधिकांश महत्वपूर्ण सैन्य वार्ताएं पूर्वी लद्दाख के चुशूल-मोल्दो बॉर्डर मीटिंग पॉइंट पर होती रही हैं। अरुणाचल प्रदेश में पहली बार इसी स्तर की बैठक होने से दोनों सेनाओं के बीच पूर्वी सेक्टर से जुड़े स्थानीय और परिचालन संबंधी मुद्दों पर सीधे संवाद का नया माध्यम स्थापित होगा।

    भारतीय पक्ष का नेतृत्व 3 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कालिया करेंगे। रंगापहार स्थित 3 कोर, जिसे स्पीयर कोर के नाम से भी जाना जाता है, अरुणाचल प्रदेश में एलएसी के कई संवेदनशील और दुर्गम इलाकों की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालती है। राज्य में एलएसी की सुरक्षा के लिए तेजपुर स्थित 4 कोर और रंगापहार स्थित 3 कोर की महत्वपूर्ण भूमिका है।

    बैठक की पृष्ठभूमि में ऊपरी सुबनसिरी जिले के ताकसिंग क्षेत्र में हालिया तनाव और दोनों पक्षों के बीच उत्पन्न गतिरोध को प्रमुख वजह माना जा रहा है। भारत और चीन के बीच एलएसी की स्थिति को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। कई स्थानों पर इन्हीं मतभेदों के कारण सैनिक आमने-सामने आ जाते हैं और स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति बनती है।

    ऐसे में सैन्य कमांडरों की सीधी बातचीत का उद्देश्य जमीन पर पैदा होने वाली गलतफहमियों को रोकना और मौजूदा मतभेदों का बातचीत के माध्यम से समाधान तलाशना है। भारत की ओर से सीमा से जुड़े मामलों में स्पष्ट और दृढ़ रुख बनाए रखने के साथ सैन्य संपर्क के माध्यम से स्थिरता कायम करने पर जोर दिया जाता रहा है।

    अरुणाचल प्रदेश में होने वाली यह बैठक राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया चीन यात्रा के बाद बने व्यापक कूटनीतिक माहौल में हो रही है। दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों के बीच सीमा प्रबंधन, शांति और सैन्य संपर्क को मजबूत करने को लेकर बातचीत हुई थी। इसी प्रक्रिया के तहत सीमा पर संवाद के अतिरिक्त तंत्र विकसित करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।

    भारत और चीन के संबंधों में वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद एलएसी पर सैन्य तैयारियों को लेकर विशेष सतर्कता रही है। पूर्वी लद्दाख में लंबे समय तक चले गतिरोध के दौरान भारत ने सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी सैन्य मौजूदगी और परिचालन क्षमता को मजबूत किया। अब अरुणाचल सेक्टर में उच्चस्तरीय सैन्य संवाद शुरू होना सीमा प्रबंधन के दायरे के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है।

    भारतीय सेना ने अरुणाचल क्षेत्र में अपनी परिचालन तैयारियों की भी समीक्षा की है। 3 कोर मुख्यालय में वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की ओर से क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति, तैनाती और क्षमताओं को लेकर नियमित आकलन किया जाता रहा है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस क्षेत्र में सैन्य बुनियादी ढांचे और तैयारियों का महत्व भी काफी अधिक है।

    वचा-दमाई में होने वाली वार्ता से तत्काल किसी बड़े समाधान की अपेक्षा के बजाय दोनों सेनाओं के बीच संवाद को मजबूत करने, स्थानीय तनाव नियंत्रित करने और एलएसी पर स्थिरता बनाए रखने के प्रयासों को आगे बढ़ाने की उम्मीद है। पूर्वी सेक्टर में इस नए सैन्य संपर्क तंत्र से भविष्य में सीमा से जुड़े मुद्दों पर सीधे बातचीत का रास्ता और मजबूत हो सकता है।

  • 11 दिन बाद भी नेपाल में तबाही का असर बरकरार, चीन-नेपाल व्यापार मार्ग तबाह होने से आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव

    11 दिन बाद भी नेपाल में तबाही का असर बरकरार, चीन-नेपाल व्यापार मार्ग तबाह होने से आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव

    नई दिल्ली । नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और हिमस्खलन के 11 दिन बाद भी तबाही का मंजर जारी है। चीन-नेपाल के बीच जमीनी व्यापार का प्रमुख केंद्र ग्यिरोंग पोर्ट और उससे जुड़ी सीमा चौकी पूरी तरह तबाह हो चुकी है। लगातार सामने आ रहीं तस्वीरें इसकी भयावह स्थिति बयां कर रही हैं। चीन ने नेपाल में हुई इस तबाही से हुए नुकसान पर भले ही चुप्पी साध रखी हो, लेकिन इस आर्थिक गलियारे के ठप होने से नेपाल की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति शृंखला पर असर साफ दिखने लगा है। भारत के जाने-माने भू-रणनीतिकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी का कहना है कि इस रास्ते होने वाला व्यापार पूरी तरह ठप होने से काठमांडो को अपनी आर्थिक जरूरतों के लिए भारत पर और अधिक निर्भर होना पड़ेगा।

    महंगाई का दिखने लगा असर

    बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत ट्रांस-हिमालय कनेक्टिविटी नेटवर्क में चीन ग्यिरोंग क्रॉसिंग को एक रणनीतिक केंद्र मानता है। ग्यिरोंग बंद होने से आपूर्ति शृंखला बाधित हो गई है। इससे चीनी सामानों की कमी हो रही है और नेपाल के घरेलू बाजार में महंगाई का दबाव बढ़ रहा है। यहां दोनों देशों के बीच ट्रकों की आवाजाही, माल की चेकिंग, क्लियरेंस और स्टोरेज के लिए बड़े ड्राई पोर्ट और गोदाम बने थे।

    लाखों टन मलबा साफ करने के बाद ही शुरू हो पाएगा मार्ग

    तबाही के बाद व्यापारिक गतिविधियां पूरी तरह बहाल करने में अभी काफी समय लगेगा। भारी मालवाहक ट्रैफिक सुरक्षित रूप से फिर से शुरू होने से पहले इंजीनियरों को लाखों टन मलबा साफ करना होगा, ऊंचे पहाड़ी रास्तों को स्थिर करना होगा, हिमस्खलन के कारण ऊपर की ओर बनी झीलों के खतरे को कम करना होगा और बह चुके पुलों का पुनर्निर्माण करना होगा।

    चमत्कार: दो और जिंदगियां बचाई गईं

    अब इसे कुदरत का करिश्मा कहें या चमत्कार, नेपाल में विनाशकारी बाढ़ के 11वें दिन शनिवार को मलबे में दबे एक चार मंजिला मकान से एक बुजुर्ग महिला को जिंदा निकाला गया। परिजनों ने महिला के जीवित मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी और उनका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार भी कर दिया था। वहीं, बचाव दलों ने अपर त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना से जुड़ी एक सुरंग से एक चीनी नागरिक को भी सुरक्षित बाहर निकालने में सफलता हासिल की है। नेपाल सशस्त्र पुलिस बल के अनुसार, नुवाकोट जिले के बिदुर शहर में 60 वर्षीय चंडिका श्रेष्ठ एक चार मंजिला इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल पर कीचड़ और मलबे के नीचे फंसी हुई थीं।

    अब तक 1,344 की मौत

    26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा पर आए हिमस्खलन के बाद भोटेकोशी नदी में आई इस विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। देश भर में मृतकों का आंकड़ा 1,344 तक पहुंच गया है, जबकि 589 विदेशी नागरिकों सहित लगभग 5,000 लोग अब भी लापता हैं, जिनमें भारत के भी 250 से अधिक नागरिक शामिल हैं। तेज धारा देख पहाड़ की ओर भागे 130 लोग, सामने ही बह गया एक साथी… गोरखपुर। पिपराइच निवासी आशुतोष उपाध्याय हाइड्रो पावर में काम कर रहे थे। बचकर किसी तरह पहुंचे हैं। बताया अचानक सभी लोग भागने लगे। नदी की तेज होती धारा देखकर मैं और करीब 130 लोग जान बचाने के लिए पहाड़ की ओर भागे। हम लोग तो बच गए पर एक साथी सामने ही बह गया।

  • भारत के साथ संयुक्त विकास के वादे से पीछे हटा मालदीव, थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की CHEC से किया समझौता

    भारत के साथ संयुक्त विकास के वादे से पीछे हटा मालदीव, थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की CHEC से किया समझौता

    नई दिल्ली । मालदीव ने थिलाफुशी पोर्ट के विकास को लेकर चीन की कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी यानी CHEC के साथ समझौता किया है। यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2024 में मालदीव और भारत के बीच थिलाफुशी पोर्ट को संयुक्त रूप से विकसित करने की योजना सामने आई थी। ऐसे में परियोजना के पहले चरण के लिए चीनी कंपनी को जिम्मेदारी देने के फैसले से भारत की रणनीतिक चिंताएं बढ़ सकती हैं।

    मालदीव पोर्ट्स लिमिटेड और CHEC के बीच हुए समझौते के तहत परियोजना का काम सिंगल नॉमिनेशन के आधार पर सौंपा गया है। CHEC चीन की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन कंपनी यानी CCCC से जुड़ी है। कंपनी पहले भी कई देशों में बंदरगाह और परिवहन से संबंधित बड़े प्रोजेक्ट में काम कर चुकी है।

    CHEC की अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट, केन्या का नैवाशा इनलैंड कंटेनर डिपो, गुयाना का एयरपोर्ट प्रोजेक्ट और प्रशांत क्षेत्र में नाउरू पोर्ट का पुनर्विकास शामिल रहा है। कंपनी को लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में वित्तीय प्रबंधन, अनुबंध और परियोजना जोखिम से जुड़े सवाल भी उठते रहे हैं। इसी वजह से मालदीव के मौजूदा आर्थिक हालात के बीच इस फैसले को लेकर रणनीतिक स्तर पर चर्चा तेज हो गई है।

    थिलाफुशी पोर्ट परियोजना का उद्देश्य माले पोर्ट पर बढ़ते दबाव को कम करना और मालदीव के औद्योगिक केंद्र थिलाफुशी की कनेक्टिविटी तथा व्यापारिक क्षमता को बढ़ाना है। वर्ष 2024 में राष्ट्रपति मोहम्मद मुइजू की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने माले पोर्ट पर भीड़ कम करने के लिए थिलाफुशी पोर्ट के संयुक्त विकास की योजना की घोषणा की थी। इसलिए अब चीन की कंपनी के साथ समझौते को भारत-मालदीव संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब मालदीव आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। देश के चालू खाते और राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी का अनुमान है। इसके साथ ही आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भी कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उसके व्यापक आर्थिक प्रभावों ने छोटे द्वीपीय देश की अर्थव्यवस्था के सामने अतिरिक्त दबाव पैदा किया है।

    दूसरी ओर, भारत पिछले कई वर्षों से मालदीव में बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। भारत के सहयोग से ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट यानी GMCP का निर्माण हुआ है, जो माले को विलिंगिली, गुल्हिफाल्हु और थिलाफुशी जैसे क्षेत्रों से जोड़ने की दिशा में अहम परियोजना है। इसे मालदीव की सबसे बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में शामिल किया जाता है।

    भारत ने पिछले वर्षों में मालदीव में कई विकास परियोजनाओं को पूरा किया है, जिनका लाभ स्थानीय आबादी को मिला है। ऐसे में थिलाफुशी पोर्ट के लिए चीन की कंपनी का चयन दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के व्यापक परिदृश्य में अहम घटनाक्रम है। चीन की बढ़ती भागीदारी से हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी मौजूदगी को लेकर भारत की चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।

    मालदीव के लिए चुनौती यह भी है कि वह आर्थिक जरूरतों, बुनियादी ढांचा विकास और क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन के बीच किस तरह तालमेल कायम करता है। थिलाफुशी पोर्ट समझौता आने वाले समय में मालदीव की विदेश नीति और भारत तथा चीन के साथ उसके संबंधों की दिशा के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत दे सकता है।

  • पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    पश्चिम एशिया तनाव के बीच जेडी वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को बताया अधिक जिम्मेदार देश, दबाव बढ़ाने के संकेत

    नई दिल्ली ।पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को लेकर अमेरिकी रणनीति और चीन की संभावित भूमिका पर महत्वपूर्ण बयान दिया है। वेंस ने ईरान की तुलना में चीन को अधिक जिम्मेदार देश बताते हुए कहा कि बीजिंग ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के अमेरिकी प्रयास में सहयोग के लिए तैयार है।

    अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट शुरू किया है। इस अभियान का उद्देश्य ईरान की आर्थिक गतिविधियों और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों पर दबाव बढ़ाना बताया जा रहा है। ऐसे में चीन का सहयोग अमेरिकी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि चीन ईरान के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक संबंध रखने वाले देशों में शामिल है।

    वेंस ने कहा कि चीन सरकार इस मामले में सहयोग करने के लिए तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अमेरिका और चीन के बीच कई नीतिगत मतभेद मौजूद हैं। इसके बावजूद उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच संबंधों को सकारात्मक बताया।

    ईरान और चीन की तुलना करते हुए वेंस ने कहा कि चीन अंतरराष्ट्रीय विवादों में अपनी बात मनवाने के लिए वाणिज्यिक जहाजों पर उसी तरह गोलीबारी करने वाला देश नहीं है, जैसा अमेरिका ईरान के मामले में आरोप लगा रहा है। उनका बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में समुद्री मार्गों और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी हुई है।

    वेंस के अनुसार तुर्किये, अजरबैजान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर और अन्य खाड़ी देश भी अलग-अलग स्तर पर अमेरिका की मदद कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ देश सार्वजनिक रूप से अपनी स्थिति जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन निजी तौर पर वे वाणिज्यिक जहाजों पर हमलों को लेकर ईरान पर दबाव बनाने के पक्ष में हैं।

    अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने ईरान के खिलाफ आगे की रणनीति को लेकर भी स्पष्ट संकेत दिए। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन के पास आर्थिक, सैन्य, राजनयिक और गुप्त उपायों सहित कई विकल्प मौजूद हैं। हालांकि उन्होंने इन विकल्पों की विस्तृत जानकारी देने से इनकार किया।

    वेंस ने कहा कि अमेरिकी प्रशासन अपनी योजनाओं को सार्वजनिक नहीं करेगा, क्योंकि ऐसा करने से राष्ट्रपति ट्रंप की निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो सकती है। उनका कहना था कि राष्ट्रपति को परिस्थितियों के अनुसार फैसला लेने के लिए रणनीतिक गोपनीयता बनाए रखना जरूरी है।

    वेंस ने हालिया अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ईरान वहां वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाने वाली गतिविधियां बंद नहीं करता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख ऊर्जा परिवहन मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी लंबे समय तक व्यवधान से कच्चे तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसका असर एशिया और यूरोप सहित उन अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है जो पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात करती हैं।

    अमेरिका की ओर से चीन के सहयोग का दावा इस पूरे घटनाक्रम में विशेष महत्व रखता है। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच व्यापार और रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद रहे हैं, लेकिन ईरान के खिलाफ दबाव अभियान में संभावित सहयोग पश्चिम एशिया की बदलती कूटनीतिक परिस्थितियों को दर्शाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चीन वास्तव में अमेरिकी आर्थिक दबाव अभियान में किस स्तर तक सहयोग करता है और ईरान की प्रतिक्रिया क्या रहती है।

  • सिक्किम से रेल नेटवर्क से जुड़ेगा भूटान… तेजी से चल रहा काम, बढ़ सकती है चीन की टेंशन

    सिक्किम से रेल नेटवर्क से जुड़ेगा भूटान… तेजी से चल रहा काम, बढ़ सकती है चीन की टेंशन


    नई दिल्ली।
    पूर्वोत्तर राज्य सिक्किम (Northeastern State Sikkim) और पड़ोसी देश भूटान (Bhutan) जल्द भारतीय रेल (Indian Railways) के आधिकारिक मानचित्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे। भारत-चीन (India-China) और भारत-भूटान सीमा (India-Bhutan border) पर रणनीतिक पहुंच और कनेक्टिविटी मजबूत करने के लिए रेल और रक्षा मंत्रालय ने इन परियोजनाओं पर काम तेज कर दिया है। सरकार ने सिक्किम के लिए 2027 और भूटान के लिए 2029 तक ट्रेन सेवाएं शुरू करने का लक्ष्य रखा है। भारत सरकार का यह कदम चीन के लिए टेंशन बन सकता है। चिकन नेक पर नजर रखने वाले चीन के लिए यह बड़ा झटका होगा।


    भूटान के लिए 69 किमी की रेल लाइन

    रेल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत-भूटान को जोड़ने के लिए 69 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय रेललाइन पर केंद्र सरकार 3500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। सरकार ने कोकराझार-गेलेफू रेललाइन को आधिकारिक तौर पर विशेष रेल परियोजना का दर्जा दिया है। ऐसा प्रशासनिक अड़चनें दूर कर भूमि अधिग्रहण और वन मंजूरी की प्रक्रिया में तेजी के लिए किया गया है। यह रेल कनेक्टिवटी न केवल दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों और व्यापार को नई मजबूती देगा, बल्कि भूटान के गेलेफू माइंडफुलनेस सिटी मास्टर प्लान को भी सीधे भारतीय रेल नेटवर्क से जोड़ेगा।


    सीमा सुरक्षा मजबूत होगी, पर्यटन को भी उड़ान

    इन दोनों परियोजनाओं से न केवल पूर्वोत्तर के दुर्गम क्षेत्रों में आम लोगों, पर्यटकों और व्यापारियों की आवाजाही सुगम और सस्ती होगी, बल्कि सीमा पर भारत का सामरिक और भौगोलिक शक्ति-संतुलन भी पूरी तरह बदल जाएगा। सीमा सुरक्षा और सैन्य रसद (लॉजिस्टिक्स) में रणनीतिक मजबूती आएगी। चीन और भूटान की सीमाओं पर स्थित इन बेहद संवेदनशील मोर्चों पर वर्तमान में मौसम खराब या भूस्खलन के कारण सेना की आवाजाही बाधित हो जाती है। नई रेल लाइन शुरू होने से वहां सैन्य साजो-सामान, हथियार और टुकड़ियों को पहुंचाने में लगने वाला समय 50 फीसदी से अधिक घट जाएगा। विशेषकर तीस्ता के नीचे बन रहे भूमिगत स्टेशन और सुरंगों से गुजरने वाला यह मार्ग हर मौसम में सुरक्षित कनेक्टिविटी प्रदान करेगा।

    सिक्किम को ब्रॉडगेज रेल सेवा से जोड़ने के लिए सेवक-रंगपो रेल परियोजना पर काम अंतिम चरण में पहुंच गया है। 44.96 किलोमीटर लंबी इस चुनौतीपूर्ण रेललाइन का लगभग 86-90 प्रतिशत हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरता है। परियोजना का सबसे मुख्य आकर्षण तीस्ता नदी के नीचे तैयार किया जा रहा तीस्ता बाजार रेलवे स्टेशन है। यह देश का पहला पूरी तरह अंडरग्राउंड रेलवे स्टेशन होगा। 12450 करोड़ की लागत से बनाई जा रही रेल लाइन पर सेफ्टी ट्रायल रन और ट्रेन परिचालन दिसंबर 2027 तक शुरू करने का लक्ष्य है।

  • नेपाल त्रासदी पर चीन की चुप्पी पर सवाल: सिर्फ 5 मौतों की जानकारी, तिब्बत में पीड़ितों से बात करने पर भी पाबंदी

    नेपाल त्रासदी पर चीन की चुप्पी पर सवाल: सिर्फ 5 मौतों की जानकारी, तिब्बत में पीड़ितों से बात करने पर भी पाबंदी


    नई दिल्ली। नेपाल में बुधवार को आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। इस आपदा में मृतकों की संख्या बढ़कर 579 हो गई है, जबकि करीब 2 हजार लोग अब भी लापता हैं। भारत के भी सैकड़ों नागरिकों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। आपदा का असर चीन के तिब्बत क्षेत्र से भी जुड़ा है, लेकिन चीन की ओर से अब तक सिर्फ 5 लोगों की मौत की जानकारी दी गई है। इससे चीन की ओर से वास्तविक नुकसान और जनहानि की जानकारी छिपाए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

    चीन में तबाही, लेकिन जानकारी बेहद सीमित

    द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन का सरकारी मीडिया भी इस आपदा को लेकर व्यापक रिपोर्टिंग नहीं कर रहा है। कुछ पत्रकार प्रभावित इलाकों में पहुंचते हैं, लेकिन वहां पीड़ितों और स्थानीय लोगों से बातचीत करने के बजाय रिपोर्टिंग मुख्य रूप से सरकारी राहत एवं बचाव प्रयासों तक सीमित रहती है। रिपोर्टों में चीन की ओर से किए जा रहे राहत कार्यों को प्रमुखता दी जाती है, जबकि आम लोगों की स्थिति सामने नहीं आ रही है।

    नेपाल में बाढ़ के प्रभाव को देखते हुए आशंका जताई जा रही है कि चीन के प्रभावित हिस्सों में भी नुकसान व्यापक हो सकता है। इसके बावजूद चीन की ओर से जनहानि और तबाही का विस्तृत आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया गया है।

    तिब्बत में पत्रकारों और स्थानीय लोगों पर पाबंदियों का आरोप

    चीन तिब्बत पर अपना दावा करता है, जबकि तिब्बत की स्वायत्तता और स्वतंत्रता की मांग लंबे समय से उठती रही है। रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बत में अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की पहुंच पर कड़े प्रतिबंध हैं। स्थानीय लोगों के पत्रकारों से बातचीत करने पर भी कार्रवाई का खतरा रहता है।

    तिब्बत में भाषा और संस्कृति से जुड़े मुद्दों को लेकर भी चीन की नीतियों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है। ऐसे में मौजूदा आपदा के दौरान भी स्थानीय लोगों की आवाज और जमीनी हालात के सामने न आने पर सवाल उठ रहे हैं।

    चीन ने भेजी राहत टीम, शी जिनपिंग ने की बैठक

    जानकारी के मुताबिक, चीन ने प्रभावित क्षेत्र में राहत और बचाव दल भेजे हैं। हालांकि, इन टीमों ने मौके पर किस स्तर पर और क्या काम किया, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    चीनी मीडिया ने बताया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने राहत एवं बचाव कार्यों को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक की। वहीं, प्रीमियर ली कियांग ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा भी किया।

    दो और ग्लेशियरों पर नजर

    नेपाल के मौसम विभाग के अधिकारियों ने अब दो और ग्लेशियरों पर निगरानी बढ़ाने की कोशिश शुरू की है। ये दोनों ग्लेशियर उस ग्लेशियर के आसपास स्थित हैं, जिसके टूटने के बाद बुधवार को विनाशकारी बाढ़ आई थी। इससे प्रभावित क्षेत्रों में आगे किसी और आपदा की आशंका को लेकर निगरानी महत्वपूर्ण हो गई है।

    4 हजार लोगों को सुरक्षित निकाला गया

    नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के ताजा अपडेट के मुताबिक, राहत और बचाव अभियान के दौरान अब तक करीब 4,000 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा चुका है। हालांकि लापता लोगों की संख्या अभी भी बढ़ रही है और ताजा आंकड़े के अनुसार 1,924 लोग लापता हैं।

    बचाव अभियान को तेज करने के लिए नेपाल सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के 15,000 से ज्यादा जवानों को प्रभावित इलाकों में तैनात किया गया है।

    लापता विदेशियों के आंकड़े अलग-अलग

    लापता विदेशी नागरिकों की संख्या को लेकर अलग-अलग सरकारी आंकड़े सामने आए हैं। एक सरकारी रिपोर्ट में 517 विदेशी नागरिकों और जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले कर्मचारियों के लापता होने की बात कही गई है।

    वहीं, नेपाल पुलिस के पहले जारी आंकड़ों में लापता विदेशी नागरिकों की संख्या 575 बताई गई थी। इनमें 36 देशों के नागरिक शामिल हैं। पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक लापता विदेशियों में 65 अमेरिकी, 62 यूक्रेनी और 33 ब्रिटिश नागरिक भी हैं।

    इसके अलावा प्रभावित इलाकों से 149 नेपाली पर्यटक और 1,407 स्थानीय नागरिक भी लापता बताए गए हैं। प्रशासन और सुरक्षा बल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर खोज, राहत और बचाव अभियान चला रहे हैं।