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  • ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी

    ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच संघर्ष जारी है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि चीन और रूस इस संघर्ष में ईरान की मदद नहीं करेंगे. हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर दोनों देश इसमें शामिल होते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

    डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि बीजिंग में हाल ही में हुई मुलाकात के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार नहीं देगा या बेचेगा, और न ही चीनी कंपनियों के जरिए ऐसा किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने भी उनसे कहा था कि रूस तेहरान को हथियार नहीं बेचेगा।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि मैं उन पर भरोसा करता हूं.’ उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि दोनों में से कोई भी देश इस टकराव में ईरान की मदद कर रहा है।

    रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप की यह टिप्पणी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के सांसदों को यह बताने के कुछ दिनों बाद आई है कि रूस और चीन ऐसे मामलों में शामिल थे, जो ईरान की कुछ गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे. हालांकि उन्होंने इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी।

    बताया जा रहा है कि गल्फ में CIA के ठिकानों पर हुए ईरानी हमलों के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही हैं कि क्या रूस ने टारगेटिंग इंफॉर्मेशन या ड्रोन तकनीक के जरिए ईरान की मदद की है. हालांकि, क्रेमलिन ने इस रिपोर्ट पर कोई भी कमेंट करने से इनकार कर दिया है।

  • चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह

    चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह


    नई दिल्ली। चीन में इन दिनों बंदरों की कीमतों में ऐसी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है कि वे सोने से भी ज्यादा महंगे साबित हो रहे हैं। खासतौर पर मकॉक बंदरों की मांग इतनी बढ़ गई है कि एक-एक बंदर की कीमत करीब 24 से 25 लाख रुपये तक पहुंच गई है। भारी कीमत चुकाने के बाद भी कई वैज्ञानिकों को ये बंदर आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

    इन बंदरों का इस्तेमाल नई दवाओं की खोज और मेडिकल रिसर्च में किया जाता है। हालांकि, कीमतों में अचानक आए इस उछाल के कारण कुछ शोधकर्ताओं को अपनी स्टडी तक रोकनी पड़ रही है।

    क्यों बढ़ी मकॉक बंदरों की कीमत?
    रिपोर्ट के अनुसार, गुआंगझोउ की जिनान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक गुओ शियांगयू दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के लिए नॉन-ह्यूमन प्राइमेट मॉडल विकसित करने पर शोध कर रहे हैं। इसके लिए उनकी लैब में मकॉक बंदरों की जरूरत होती है, लेकिन अब इनकी बढ़ती कीमत और कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है।

    चीनी नव वर्ष के बाद से लैब में इस्तेमाल होने वाले मकॉक बंदरों की कीमत लगातार बढ़ी है। वर्तमान में सप्लायर एक मकॉक बंदर के लिए करीब 1 लाख 80 हजार युआन, यानी लगभग 25 लाख 58 हजार 772 रुपये तक मांग रहे हैं।

    गुओ शियांगयू के मुताबिक, समस्या सिर्फ कीमत की नहीं है। कई बार इतनी अधिक रकम देने के बावजूद भी बंदर उपलब्ध नहीं हो पाते, क्योंकि मांग बहुत ज्यादा है और सप्लाई सीमित है। गुओ ग्वांगडोंग प्रोविंशियल की-लैबोरेटरी ऑफ नॉन-ह्यूमन प्राइमेट रिसर्च से जुड़े हैं।

    रिसर्च के लिए मकॉक बंदर ही क्यों जरूरी?
    वैज्ञानिकों के अनुसार, मकॉक बंदर इंसानों के सबसे करीब माने जाने वाले जीवों में शामिल हैं। इनके डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है। इसी वजह से नई दवाओं और उपचारों की जांच के लिए इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है।

    गुओ ने बताया कि उनकी लैब को हर साल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए करीब 30 से 50 बंदरों की जरूरत होती है। इनमें पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल एनालिसिस जैसे शोध शामिल हैं।

    चीन में दवा और बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। चीनी सरकार नई दवाओं और बायोलॉजिकल मेडिसिन के विकास को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों की दवा क्षेत्र में पकड़ को चुनौती देकर चीन को दुनिया का प्रमुख मेडिसिन हब बनाना है।

    दवा बनाने की प्रक्रिया में बंदरों की भूमिका
    किसी भी नई दवा को सीधे बाजार में लॉन्च नहीं किया जाता। पहले उसे प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है और इसके बाद जानवरों पर परीक्षण किए जाते हैं, ताकि दवा के प्रभाव और सुरक्षा का आकलन किया जा सके। इन चरणों में सफल होने के बाद ही संबंधित अधिकारियों की अनुमति और सर्टिफिकेशन के बाद दवा बाजार में लाई जाती है।

    घटती संख्या बनी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती
    चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है। देश में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट अटैक और ऑटोइम्यून जैसी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं पर तेजी से काम हो रहा है।

    लेकिन मकॉक बंदरों की कमी अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। बढ़ती मांग के कारण जंगलों में इनकी संख्या पर भी असर पड़ रहा है। अनुमान है कि चीन में वर्ष 2025 से 2027 के बीच हर साल लैब रिसर्च के लिए करीब 49 हजार से 52 हजार बंदर ही उपलब्ध हो पाएंगे।

  • अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    अमेरिकी चुनाव में दखल के ट्रंप के आरोपों पर चीन का पलटवार, बोला- बेबुनियाद दावे बंद करें, बेहतर संबंधों के लिए माहौल बनाएं

    नई दिल्ली । अमेरिका और चीन के बीच एक बार फिर चुनावी हस्तक्षेप के आरोपों को लेकर जुबानी टकराव तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीन पर अमेरिकी चुनावों में दखल देने और करोड़ों मतदाताओं का डेटा हासिल करने के आरोप लगाए जाने के बाद बीजिंग ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। चीन ने कहा है कि उसने कभी अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया और न ही उसकी ऐसी कोई मंशा है।

    चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने प्रेस वार्ता के दौरान कहा कि अमेरिका की ओर से लगाए गए आरोप तथ्यहीन और मनगढ़ंत हैं। उन्होंने कहा कि चीन को बदनाम करने के उद्देश्य से इस प्रकार के बयान दिए जा रहे हैं। उनके अनुसार चीन हमेशा दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति का पालन करता है और अमेरिकी चुनाव उसके लिए किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने का विषय नहीं हैं।

    चीन ने अमेरिका से अपील की कि वह चुनावी राजनीति में चीन का नाम घसीटना बंद करे और दोनों देशों के संबंधों को बेहतर बनाने के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करे। प्रवक्ता ने संकेत दिया कि यदि दोनों देश स्थिर और रचनात्मक संबंध चाहते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप की बजाय संवाद और सहयोग पर अधिक ध्यान देना चाहिए।

    यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क बनाए रखने की कोशिशें भी जारी हैं। इसी वर्ष अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन का दौरा कर राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए नए संवाद तंत्र पर सहमति जताई थी। इसके बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अमेरिका दौरे की भी तैयारी चल रही है, जिसे दोनों देशों के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इस बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने आरोप लगाया कि चीन ने अमेरिकी चुनावी प्रणाली को प्रभावित करने के उद्देश्य से करोड़ों मतदाताओं का डेटा अवैध रूप से हासिल किया। उनके अनुसार इस कथित डेटा में मतदाताओं के नाम, पते, फोन नंबर, राजनीतिक संबद्धता और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां शामिल थीं। ट्रंप ने दावा किया कि इन सूचनाओं का उपयोग चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और अन्य गतिविधियों के लिए किया जा सकता था।

    ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के पास चीन की कथित गतिविधियों से संबंधित जानकारी थी, लेकिन वह पूरी तरह सार्वजनिक नहीं की गई। उन्होंने दावा किया कि कुछ रिपोर्टों में चीन द्वारा अमेरिकी कारोबारी नेताओं और मीडिया से जुड़े लोगों को प्रभावित करने के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया था। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण सूचनाएं शीर्ष स्तर तक समय पर नहीं पहुंचाई गईं।

    हालांकि चीन ने इन सभी आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि ऐसे दावों का कोई आधार नहीं है। बीजिंग का कहना है कि दोनों देशों के बीच मतभेदों का समाधान संवाद और आपसी सम्मान के माध्यम से होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक मुद्दों पर पहले से ही तनाव बना हुआ है। ऐसे में चुनावी हस्तक्षेप जैसे आरोप दोनों देशों के संबंधों में नई चुनौती पैदा कर सकते हैं।

    फिलहाल दोनों देशों की ओर से अपने-अपने दावों पर कायम रहने के कारण यह विवाद कूटनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है। आने वाले समय में उच्चस्तरीय बैठकों और आधिकारिक संवाद के दौरान इस मुद्दे पर दोनों पक्षों का रुख अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण माना जाएगा।

  • UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    UN में भारत की मेंबरशिप की बात पर क्या बोला चीन, 4 ताकतवर देश पहले से ही साथ

    नई दिल्‍ली। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं। अब भारत की इस दावेदारी पर चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। खास बात है कि चीन वीटो अधिकार प्राप्त सदस्य है।

    UNSC यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की अस्थायी सदस्यता के दावे पर अब चीन ने भी प्रतिक्रिया दे दी है। पड़ोसी मुल्क ने कहा है कि वह इस तरह की खबरों पर गौर कर रहा है। खास बात है कि पहले ही कई बड़े देश भारत का साथ दे रहे हैं।

    चीन की तरफ से यह बयान ऐसे समय पर आया है, जब भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर प्रचार अभियान की शुरुआत कर चुके हैं।
    क्या बोला चीन

    चीन ने गुरुवार को कहा कि उसने 2028-29 की अवधि के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता हासिल करने की भारत की दावेदारी से जुड़ी खबरों पर गौर किया है। सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने की भारत की घोषणा पर चीन के रुख के बारे में पूछे जाने पर चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने यहां संवाददाता सम्मेलन में कहा, ‘चीन ने इससे जुड़ी खबरों पर गौर किया है।’
    क्या बोले जयशंकर

    विदेश मंत्री जयशंकर ने सोमवार को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम में सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत के आधिकारिक प्रचार अभियान की शुरुआत की। इस कार्यक्रम में विभिन्न देशों के राजदूत, राजनयिक और अधिकारी शामिल हुए थे।

    जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र के प्रति भारत का दृष्टिकोण ‘शांति अर्थात मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के जरिये समग्र प्रगति सुनिश्चित करने’ पर आधारित है।

    उन्होंने सुरक्षा परिषद में भारत के संभावित कार्यकाल की प्राथमिकताओं का भी विस्तार से उल्लेख किया था।
    चीन नहीं करता भारत का समर्थन

    चीन सुरक्षा परिषद के वीटो अधिकार प्राप्त पांच स्थायी सदस्यों में शामिल है लेकिन उसने अभी तक भारत की दावेदारी का समर्थन नहीं किया है। इसके विपरीत, पांच स्थायी सदस्यों में शामिल अन्य चार देश-अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और फ्रांस-सुधार के बाद गठित होने वाली संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का स्पष्ट रूप से समर्थन कर चुके हैं।
    किस देश से है मुकाबला

    सुरक्षा परिषद में 2028-29 के कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होंगे। इसमें एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।

    भारत पिछली बार 2021-22 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य बना था।

    यह संयुक्त राष्ट्र के 15 सदस्यीय इस शक्तिशाली निकाय में भारत का आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-1951, 1967-1968, 1972-1973, 1977-1978, 1984-1985, 1991-1992 और 2011-2012 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रह चुका है।
    सुरक्षा परिषद में नहीं हुआ खास सुधार

    भारत का कहना है कि UNSC का 80 साल पुराना ढांचा मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिहाज से उपयुक्त नहीं है। और इसी वजह से यह वैश्विक संस्था दुनिया भर में जारी संघर्षों से हो रही मानवीय पीड़ा को खत्म करने में प्रभावी साबित नहीं हुई।

    भारत ने यह भी कहा कि विकासशील देशों की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से पूरा करने के लिए वैश्विक वित्तीय ढांचे में भी बदलाव होना चाहिए।

    स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने मंगलवार को कहा, ‘हाल के वर्षों में संयुक्त राष्ट्र को लेकर लोगों की धारणा नकारात्मक हुई है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जारी संघर्षों में सुरक्षा परिषद प्रभावी ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर पाई है।’

  • चीन पर निर्भरता होगी कम: 51 अरब डॉलर के उत्पाद देश में बनाने की तैयारी, क्या है सरकार का प्लान?

    चीन पर निर्भरता होगी कम: 51 अरब डॉलर के उत्पाद देश में बनाने की तैयारी, क्या है सरकार का प्लान?


    नई दिल्ली। सरकार ने घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और चीन पर आयात निर्भरता घटाने के लिए 51 अरब डॉलर मूल्य के ऐसे प्रमुख आयातित उत्पादों की पहचान की है, जिनका उत्पादन देश में किया जा सकता है। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान को गति देने के लिए आयातित वस्तुओं का व्यापक आकलन किया गया।

    मार्च, 2026 को समाप्त वित्त वर्ष में भारत ने 775 अरब डॉलर का आयात किया। इसमें करीब 398 अरब डॉलर के उत्पाद देश में बनाए जा सकते थे। सत्रों के मुताबिक, उत्पादों का चयन आर्थिक मजबूती, आपूर्ति शृंखला और चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम करने को ध्यान में रखकर किया गया है।
    विनिर्माण के लिए किन उत्पादों की हुई पहचान?
    विनिर्माण क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण जिन उत्पादों की पहचान की गई है, उनमें कपड़े, जूते-चप्पल, इलेक्ट्रिक वाहन, सौर पैनल और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में उपयोग वाले कच्चे माल एवं कलपुर्जे शामिल हैं। इस सूची में शामिल करीब 100 उत्पादों पर तत्काल कार्रवाई होगी। इनका घरेलू उत्पादन बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और प्रोत्साहन योजनाओं के जरिये विनिर्माण क्षमता विकसित करने की रणनीति बनाई जा रही है।

    सिरदर्द बन रहा चीन से होने वाला आयात?
    भारत का 2025-26 में चीन से आयात 132 अरब डॉलर था। यह अन्य देशों के मुकाबले सबसे अधिक है। इसमें फैक्टरियों के लिए जरूरी इनपुट और मशीनरी भी शामिल हैं। सरकार ने पाया, पिछले साल आयातित 48.3 करोड़ डॉलर के जूतों का सोल भारत में बनने में दो हफ्ते लगते हैं, जबकि चीन में तीन से पांच दिन लगते हैं।

    केंद्र का मकसद ताइवान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और इटली की फर्मों संग संयुक्त उद्यम बनाकर इस अंतर को पाटना है। अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में भी ऐसे ही हालात हैं। चीनी सोलर फोटोवोल्टिक सेल घरेलू निर्माताओं पर भारी पड़ रहे हैं।

  • चीन के जिनजियांग शहर में जूतों की फैक्ट्री में लगी भीषण आग…..28 लोगों की मौत

    चीन के जिनजियांग शहर में जूतों की फैक्ट्री में लगी भीषण आग…..28 लोगों की मौत


    बीजिंग।
    चीन (China) के जिनजियांग शहर (Jinjiang City) में गुरुवार को जूतों की फैक्ट्री (Shoe factory) में भीषण आग लगने से 28 लोगों की मौत हो गई। स्थानीय अधिकारियों ने यह जानकारी दी। घटना के वीडियो में इमारत और उसके आसपास की आग की लपटें उठती हुई दिख रही हैं। आपातकालीन प्रबंधन मंत्रालय ने आग लगने के बाद बचाव और राहत कार्यों के लिए संयुक्त कार्य दल पूर्वी चीन (Eastern China) के फुजियान प्रांत (Fujian Province) के जिनजियांग शहर भेज दिए हैं।

    मंत्रालय ने बताया कि आग दोपहर करीब 12 बजे लगी। सरकारी समाचार एजेंसी ‘शिन्हुआ’ की खबर के अनुसार, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अधिकारियों को तलाश और बचाव अभियानों में हरसंभव प्रयास करने, घटना का कारण पता लगाने और जवाबदेही तय करने का निर्देश दिया है।


    जिनपिंग ने दिए सख्त आदेश

    जिनपिंग ने घटना की तेजी से जांच करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई करने का आदेश दिया। शहर के फायर डिपार्टमेंट ने एक बयान में कहा कि आग जिनजियांग शहर में हुईटेंग शू कंपनी की एक फैक्ट्री में लगी, जिसे चीन की जूतों की राजधानी भी कहा जाता है। आग लगने का कारण तुरंत पता नहीं चला, और यह भी साफ नहीं है कि हाल के सालों में चीन में लगी सबसे जानलेवा आग में और लोग घायल हुए हैं या नहीं। लोकल मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लोग छत पर फंस गए थे।


    हिरासत में फैक्ट्री का मालिक और इंचार्ज

    शिन्हुआ के अनुसार, फैक्ट्री के मालिक और दूसरे इंचार्ज को हिरासत में ले लिया गया है और कंपनी के अकाउंट फ्रीज कर दिए गए हैं। स्टेट ब्रॉडकास्टर CCTV के वीडियो में कई मंजिल वाली एक बिल्डिंग का अगला हिस्सा जला हुआ काला और सफेद धुएं से ढका हुआ दिख रहा है। पहले के फुटेज में दिख रहा है कि कई मंजिलों पर आग लगी हुई थी और बिल्डिंग घने काले धुएं से ढकी हुई थी।

    जब आग लगी, तब फैक्ट्री में 237 वर्कर और दो विजिटर थे। अधिकारियों ने 213 लोगों को निकाला या बचाया है। सरकारी ब्रॉडकास्टर CCTV के मुताबिक, मरने वाले 28 लोगों में से दो को हॉस्पिटल ले जाने के बाद मृत घोषित कर दिया गया।


    जूते की राजधानी है जिनजियांग

    तटीय फुजियान प्रांत में जिनजियांग जूते और कपड़े बनाने का एक बड़ा हब है और इसे अक्सर चीन की जूते की राजधानी कहा जाता है। एक स्थानीय अधिकारी ने CCTV को बताया कि शुरुआती जांच से पता चलता है कि आग फैक्ट्री के ग्राउंड फ्लोर पर लगी थी। अधिकारी ने कहा कि बिल्डिंग में रखा जूता बनाने का सामान बहुत ज्यादा आग पकड़ने वाला था और इससे आग तेजी से फैल सकती थी। वहां मौजूद सामान और चिपकने वाली चीजों की वजह से, मौके पर तेज गंध थी, जिससे आंखों में जलन हो रही थी। सरकारी ब्रॉडकास्टर ने फायरफाइटर्स के हवाले से बताया कि सीढ़ियों पर भी बहुत सारा सामान जमा हो गया था, जिससे बचाव और आग बुझाने के काम में रुकावट आ रही थी।

  • सरकारी आर्थिक दावों पर उठाई थी आवाज, अब नहीं रहे अर्थशास्त्री गाओ शानवेन; निधन के बाद फिर तेज हुई पारदर्शिता पर बहस

    सरकारी आर्थिक दावों पर उठाई थी आवाज, अब नहीं रहे अर्थशास्त्री गाओ शानवेन; निधन के बाद फिर तेज हुई पारदर्शिता पर बहस

    नई दिल्ली । चीन के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में गिने जाने वाले गाओ शानवेन का 55 वर्ष की आयु में निधन हो गया। चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार उनका निधन बीमारी के कारण हुआ है। हालांकि उनकी मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर विभिन्न तरह की चर्चाएं भी सामने आई हैं। गाओ लंबे समय तक चीन की अर्थव्यवस्था, पूंजी बाजार और आर्थिक नीतियों पर अपनी स्पष्ट और स्वतंत्र राय रखने के लिए जाने जाते रहे। उन्हें देश के प्रभावशाली मैक्रो-इकोनॉमिस्ट्स में शामिल किया जाता था और उनके विचारों को वित्तीय जगत में गंभीरता से लिया जाता था।

    गाओ शानवेन सरकारी निवेश समूह एसडीआईसी सिक्योरिटीज के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री रहे थे। उन्होंने कई वर्षों तक चीन की आर्थिक नीतियों, विकास दर और वित्तीय बाजारों का विश्लेषण किया। उनकी पहचान ऐसे विशेषज्ञ के रूप में बनी, जो आर्थिक आंकड़ों और नीतिगत फैसलों पर खुलकर अपनी राय रखते थे। इसी स्पष्टवादिता के कारण वे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार चर्चा में बने रहे।

    वर्ष 2024 के अंत में गाओ उस समय व्यापक सुर्खियों में आए, जब उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में चीन की आधिकारिक आर्थिक वृद्धि दर पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि वर्ष 2021 से 2023 के बीच चीन की वास्तविक आर्थिक वृद्धि सरकारी दावों से काफी कम रही। उन्होंने उपभोग, रोजगार और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े संकेतकों का हवाला देते हुए कहा था कि उपलब्ध आर्थिक आंकड़े आधिकारिक विकास दर से पूरी तरह मेल नहीं खाते। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय आर्थिक जगत में भी व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

    इन टिप्पणियों के बाद उनके खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की खबरें सामने आईं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार सार्वजनिक मंचों पर उनकी गतिविधियां सीमित कर दी गईं। उनके कुछ लेख, वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री भी हटाई गई। बाद में उन्हें अपने पद से हटाए जाने और निवेश सलाहकार लाइसेंस समाप्त होने की जानकारी भी सामने आई। इन घटनाओं ने चीन में आर्थिक विश्लेषण की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक विचारों के लिए उपलब्ध स्थान को लेकर कई सवाल खड़े किए।

    करीबी सूत्रों के अनुसार गाओ शानवेन पिछले कुछ समय से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। बीमारी का पता चलने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बना ली थी। लंबे समय तक सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूर रहने के बाद उन्होंने एक शैक्षणिक कार्यक्रम में वीडियो संदेश के माध्यम से संक्षिप्त उपस्थिति दर्ज कराई थी। इसके बाद उनकी सार्वजनिक गतिविधियां बेहद सीमित रहीं।

    गाओ शानवेन के निधन के बाद चीन के सोशल मीडिया मंचों पर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। कई लोगों ने उन्हें बेबाक और स्वतंत्र सोच रखने वाला अर्थशास्त्री बताया। वहीं कुछ प्रतिक्रियाओं में आर्थिक आंकड़ों की पारदर्शिता, स्वतंत्र विश्लेषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर भी चर्चा देखने को मिली। हालांकि इन प्रतिक्रियाओं के बीच आधिकारिक स्तर पर केवल उनके निधन पर शोक व्यक्त किया गया।

    अर्थशास्त्र और वित्तीय विश्लेषण के क्षेत्र में गाओ शानवेन का योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा। उन्होंने आर्थिक आंकड़ों की व्याख्या और नीतिगत चर्चाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका निधन ऐसे समय हुआ है जब वैश्विक अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही है और आर्थिक पारदर्शिता तथा विश्वसनीय आंकड़ों की भूमिका पहले से अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • चीन के गांसू में भीषण भूस्खलन से भारी तबाही, 21 मजदूरों की मौत, कई घंटे तक चला राहत एवं बचाव अभियान

    चीन के गांसू में भीषण भूस्खलन से भारी तबाही, 21 मजदूरों की मौत, कई घंटे तक चला राहत एवं बचाव अभियान

    नई दिल्ली । चीन के पश्चिमी गांसू प्रांत में आए भीषण भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। लोंगनान शहर के नानहे क्षेत्र में मंगलवार सुबह हुए इस हादसे में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई, जबकि सात अन्य घायल हो गए। प्रशासन ने राहत एवं बचाव अभियान पूरा होने के बाद मृतकों और घायलों की संख्या की पुष्टि की है। हादसे के बाद पूरे क्षेत्र में आपातकालीन बचाव दलों को तैनात किया गया और कई घंटों तक मलबा हटाने का अभियान चलाया गया।

    जानकारी के अनुसार, भूस्खलन सुबह लगभग सात बजे उस समय हुआ जब घाटी क्षेत्र में स्थित सरकारी वानिकी फार्म के आसपास रहने वाले लोग अपने दैनिक कार्यों की तैयारी कर रहे थे। अचानक पहाड़ी से भारी मात्रा में मिट्टी और चट्टानें नीचे आ गईं, जिससे आसपास का इलाका मलबे में दब गया। इस घटना की चपेट में कुल 33 लोग आ गए, जिनमें अधिकांश स्थानीय ग्रामीण और अस्थायी मजदूर शामिल थे।

    राहत दलों ने तत्काल मौके पर पहुंचकर खोज एवं बचाव अभियान शुरू किया। भारी मशीनों और विशेष उपकरणों की मदद से मलबा हटाया गया तथा फंसे लोगों को बाहर निकालने का प्रयास किया गया। अभियान के दौरान पांच लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया, जबकि सात घायलों को प्राथमिक उपचार के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया। प्रशासन के अनुसार उनकी स्थिति फिलहाल स्थिर बनी हुई है।

    प्रभावित लोगों में अधिकांश वे मजदूर थे जिन्हें घाटी में स्थित सरकारी फॉरेस्ट्री फार्म में अस्थायी रूप से काम पर लगाया गया था। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि राहत कार्य में कई एजेंसियों ने संयुक्त रूप से हिस्सा लिया और प्रभावित क्षेत्र में लगातार निगरानी रखी गई ताकि किसी संभावित खतरे से बचा जा सके। बचाव अभियान पूरा होने के बाद प्रशासन ने मृतकों की संख्या की आधिकारिक पुष्टि की।

    हादसे के बाद स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित इलाके को सुरक्षा कारणों से सील कर दिया है। विशेषज्ञों की टीम घटनास्थल का निरीक्षण कर रही है और यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि भूस्खलन किन परिस्थितियों में हुआ। शुरुआती स्तर पर किसी एक कारण की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, हालांकि क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और हालिया मौसम की परिस्थितियों को भी जांच का हिस्सा बनाया गया है।

    गांसू प्रांत का पर्वतीय इलाका पहले भी प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील माना जाता रहा है। यहां कई स्थानों पर ऊंचे पहाड़, संकरी घाटियां और अस्थिर ढलान होने के कारण भूस्खलन का जोखिम बना रहता है। प्रशासन समय-समय पर जोखिम वाले क्षेत्रों की निगरानी करता है, लेकिन इस बार हुई घटना ने स्थानीय स्तर पर व्यापक नुकसान पहुंचाया है।

    चीनी प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, भविष्य में इस तरह की घटनाओं से बचाव के लिए जोखिम वाले क्षेत्रों का विस्तृत सर्वेक्षण और सुरक्षा उपायों को मजबूत करने पर भी जोर दिया जा रहा है। फिलहाल अधिकारियों का ध्यान प्रभावित लोगों की सहायता, घायलों के उपचार और हादसे के कारणों की विस्तृत जांच पर केंद्रित है।

  • बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर भारत सतर्क, विदेश मंत्रालय बोला- हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

    बांग्लादेश की तीस्ता परियोजना में चीन की बढ़ती भूमिका पर भारत सतर्क, विदेश मंत्रालय बोला- हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

    नई दिल्ली । बांग्लादेश में तीस्ता नदी प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना और चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CBMEC) को लेकर चीन की बढ़ती सक्रियता पर भारत ने सतर्क प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत अपने पड़ोसी देशों में होने वाले सभी महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर लगातार नजर बनाए हुए है और आवश्यकता पड़ने पर अपने हितों के अनुरूप उचित कदम उठाएगा। इस बयान को क्षेत्रीय रणनीतिक गतिविधियों के बीच भारत की सतर्क कूटनीतिक नीति के रूप में देखा जा रहा है।

    हाल के दिनों में बांग्लादेश और चीन के बीच रणनीतिक सहयोग में तेजी आई है। दोनों देशों ने तीस्ता नदी प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना पर सहयोग बढ़ाने की सहमति जताई है। इसके साथ ही चीन ने चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई है। इन दोनों परियोजनाओं को क्षेत्रीय संपर्क, आधारभूत ढांचे और आर्थिक सहयोग के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत के विदेश मंत्रालय ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पड़ोसी देशों में होने वाली सभी महत्वपूर्ण गतिविधियों पर लगातार निगरानी रखी जाती है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समय आने पर आवश्यक निर्णय लेगा। हालांकि सरकार ने संभावित कदमों या रणनीति के बारे में कोई विस्तृत जानकारी साझा नहीं की।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी दोहराया कि भारत और बांग्लादेश के बीच विकास सहयोग से जुड़े कार्यक्रम दोनों देशों की आपसी सहमति और निर्धारित रोडमैप के आधार पर संचालित होते हैं। सरकार का कहना है कि इन परियोजनाओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और तीस्ता परियोजना को लेकर भारत पहले ही अपना पक्ष बांग्लादेश के समक्ष रख चुका है। भविष्य के सभी निर्णय क्षेत्रीय परिस्थितियों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इन परियोजनाओं में बढ़ती भागीदारी का रणनीतिक महत्व भी है। यदि चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारा आगे बढ़ता है तो चीन की क्षेत्रीय संपर्क क्षमता और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच मजबूत हो सकती है। इसके अलावा तीस्ता नदी परियोजना में चीनी तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी को भी भारत रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मान रहा है, क्योंकि यह इलाका भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से जुड़े संवेदनशील भूभाग के निकट स्थित है।

    बांग्लादेश की सरकार ने हाल के महीनों में नदी प्रबंधन और जल संसाधन विकास से संबंधित योजनाओं के लिए चीन से तकनीकी सहयोग की मांग की है। इसके तहत चीनी विशेषज्ञों द्वारा परियोजना की व्यवहार्यता का अध्ययन भी किया जा चुका है। दोनों देशों के बीच इस सहयोग को भविष्य में और विस्तार मिलने की संभावना जताई जा रही है।

    भारत पहले भी तीस्ता नदी के संरक्षण और प्रबंधन में सहयोग की इच्छा जता चुका है। दोनों देशों के बीच साझा नदियों के प्रबंधन को लेकर लंबे समय से संवाद चलता रहा है। हालांकि तीस्ता नदी के जल बंटवारे पर अब तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हो सका है। ऐसे में चीन की बढ़ती भागीदारी के बीच भारत की सतर्क कूटनीतिक निगरानी आने वाले समय में इस पूरे क्षेत्रीय घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू बनी रहेगी।

  • तीस्ता नदी परियोजना पर चीन का दोटूक संदेश, भारत की आपत्तियों के बीच बोला- बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

    तीस्ता नदी परियोजना पर चीन का दोटूक संदेश, भारत की आपत्तियों के बीच बोला- बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं

    नई दिल्ली । बांग्लादेश की तीस्ता नदी से जुड़ी व्यापक प्रबंधन एवं पुनर्स्थापन परियोजना को लेकर भारत की रणनीतिक चिंताएं एक बार फिर चर्चा में हैं। चीन और बांग्लादेश के बीच इस परियोजना पर बढ़ते सहयोग ने भारत की सुरक्षा और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिलिगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामान्य तौर पर ‘चिकन-नेक’ कहा जाता है, के आसपास संभावित चीनी प्रभाव को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस बीच चीन ने स्पष्ट किया है कि उसका बांग्लादेश के साथ सहयोग किसी तीसरे देश के खिलाफ नहीं है और इसे बाहरी प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए।

    चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बीजिंग और ढाका के बीच सहयोग पूरी तरह विकास आधारित है। चीन का कहना है कि दोनों देश अपनी विकास रणनीतियों में बेहतर समन्वय स्थापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं और आर्थिक सहयोग, व्यापार, जल संरक्षण, बुनियादी ढांचा तथा आजीविका जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को और मजबूत बनाया जाएगा। चीन ने यह भी दोहराया कि उसके सभी सहयोगात्मक प्रयास किसी तीसरे पक्ष को निशाना बनाने के उद्देश्य से नहीं हैं।

    दूसरी ओर भारत इस परियोजना को केवल जल प्रबंधन के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि व्यापक रणनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रहा है। भारत की चिंता इस बात को लेकर है कि तीस्ता नदी का क्षेत्र देश के पूर्वोत्तर हिस्से से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील इलाका है। यदि इस क्षेत्र में चीन की तकनीकी, वित्तीय या बुनियादी ढांचा संबंधी उपस्थिति बढ़ती है तो इसका असर भारत की सुरक्षा रणनीति पर पड़ सकता है।

    तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर पहले सिक्किम और पश्चिम बंगाल से गुजरती है तथा इसके बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती है। नदी का भौगोलिक मार्ग भारत और बांग्लादेश के बीच साझा जल संसाधनों के साथ-साथ सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी कारण इस क्षेत्र में किसी बाहरी शक्ति की सक्रिय भूमिका पर भारत लगातार सतर्क नजर बनाए हुए है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशिया में अपनी आर्थिक और आधारभूत संरचना संबंधी परियोजनाओं के माध्यम से प्रभाव बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। बांग्लादेश के साथ परिवहन, ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क और जल संसाधन जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग भी उसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है। अब तीस्ता परियोजना के जरिए जल संसाधन प्रबंधन में भी चीन की भागीदारी भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।

    भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता जल बंटवारे का मुद्दा भी लंबे समय से लंबित है। ऐसे में इस नदी से जुड़ी किसी भी बड़ी अंतरराष्ट्रीय परियोजना पर भारत की विशेष नजर बनी रहती है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नदी प्रबंधन से जुड़े ढांचागत विकास का प्रभाव केवल जल संसाधनों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क, लॉजिस्टिक्स और सामरिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है।

    चीन की ओर से दिए गए ताजा बयान ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि उसका उद्देश्य केवल विकास सहयोग को आगे बढ़ाना है, लेकिन भारत के लिए इस परियोजना का महत्व कहीं अधिक व्यापक है। आने वाले समय में यह विषय भारत, बांग्लादेश और चीन के बीच कूटनीतिक संवाद तथा क्षेत्रीय रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना रह सकता है। भारत की प्राथमिकता इस पूरे घटनाक्रम पर सतत निगरानी रखते हुए अपनी सुरक्षा, सीमाई हितों और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंधों को बनाए रखने की होगी।