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  • चीन को साधने का प्रयास… US ने दिया AI से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव

    चीन को साधने का प्रयास… US ने दिया AI से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव


    न्यूयॉर्क।
    अमेरिका (America) ने चीन (China) के साथ बातचीत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) (Artificial Intelligence – AI) से जुड़ी घटनाओं के लिए नई सूचना व्यवस्था का प्रस्ताव रखा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट (American Treasury Secretary Scott Bessent) ने रविवार को कहा कि इस व्यवस्था के तहत एआई से जुड़ी ऐसी घटनाओं की जानकारी साझा की जा सकेगी, जिनसे राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    यह प्रस्ताव इस सप्ताह व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के बीच होने वाली बातचीत से पहले हुई चर्चा का हिस्सा है। न्यूयॉर्क में चीन के उपप्रधानमंत्री हे लिफेंग के साथ बातचीत के बाद बेसेंट ने कहा कि अमेरिका साझा लक्ष्यों और साझा खतरों को लेकर एक समान दृष्टिकोण चाहता है।


    एआई शक्तियों के बीच हो पारदर्शिता : स्कॉट बेसेंट

    स्कॉट बेसेंट ने कहा कि दुनिया की नंबर एक और नंबर दो एआई शक्तियों के बीच पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है। बेसेंट ने कहा, “हमारा मानना है कि किसी भी सीमा पार गतिविधि की तरह, दुनिया की नंबर एक और नंबर दो एआई शक्तियों के बीच अपारदर्शिता से अधिक पारदर्शिता की ओर बढ़ना बहुत महत्वपूर्ण है।” ट्रंप एआई विकास धीमा करने के सुझावों का विरोध कर चुके हैं। उनका कहना है कि ऐसा करने से चीन को अमेरिकी कंपनियों की बराबरी करने का मौका मिल सकता है।


    अमेरिका-चीन में व्यापार वार्ता को लेकर बनी सहमति

    रविवार देर रात जेपी मॉर्गन चेज के मुख्यालय की लॉबी में बेसेंट और अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमीसन ग्रीर ने कहा कि इस सप्ताह ट्रंप और शी के बीच होने वाली बातचीत के लिए आधार तैयार हो चुका है। दोनों नेताओं की बैठक आगामी गुरुवार को होने वाली है।

    बेसेंट और ग्रीर ने बताया कि दोनों देश एक नई ‘व्यापार परिषद’ को अमल में लाने पर सहमत हुए हैं। इस व्यवस्था पर ट्रंप और शी ने मई में बीजिंग में मुलाकात के दौरान चर्चा की थी। ग्रीर ने कहा, “आज वे विचार वास्तविकता बन गए हैं।”

    कम संवेदनशील वस्तुओं पर कम शुल्क की चर्चा
    ग्रीर ने कहा कि दोनों देश अभी भी इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि किन ‘गैर-संवेदनशील’ वस्तुओं को कम शुल्क की श्रेणी में रखा जा सकता है। संभावित सूची में उपभोक्ता वस्तुएं, कृषि उत्पाद, ऊर्जा उत्पाद और चिकित्सा उपकरण शामिल हो सकते हैं। दोनों देशों के बीच हुई ताजा चर्चा ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और चीन एआई, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने संबंधों को लेकर बातचीत कर रहे हैं।

  • ट्रंप बोले- चीन अमेरिका की जासूसी करता है तो हम भी करते हैं, जिनपिंग की यात्रा से पहले बड़ा बयान

    ट्रंप बोले- चीन अमेरिका की जासूसी करता है तो हम भी करते हैं, जिनपिंग की यात्रा से पहले बड़ा बयान


    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अगले सप्ताह होने वाली अमेरिका यात्रा से पहले दोनों देशों के रिश्तों और जासूसी को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि चीन अमेरिका की जासूसी करता है तो संभव है कि अमेरिका भी चीन की जासूसी करता हो। उन्होंने कहा कि शी जिनपिंग के साथ उनके अच्छे संबंध हैं और उनकी आगामी मुलाकात अच्छी रहने की उम्मीद है।

    ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शी जिनपिंग अगले सप्ताह अमेरिका आएंगे। उन्होंने चीन के साथ अमेरिका के संबंधों को भी अच्छा बताया। ट्रंप के मुताबिक, जिनपिंग के साथ उनकी अच्छी रिलेशनशिप है और उनकी यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कई अलग-अलग समझौते होने की संभावना है।

    टैरिफ से चीन को हो रहा नुकसान

    अमेरिकी राष्ट्रपति ने चीन से जुड़े व्यापारिक मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि चीन अमेरिका को काफी टैरिफ दे रहा है। ट्रंप के अनुसार, इन टैरिफ की वजह से चीन को काफी नुकसान हो रहा था और वह ऐसा नहीं करना चाहते थे।

    चीन की कथित जासूसी को लेकर सवाल पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा कि किसी ने उनसे कहा था कि चीन अमेरिका की जासूसी करता है। इस पर उन्होंने कहा कि शायद चीन ऐसा करता हो, लेकिन अमेरिका भी चीन की जासूसी करता है।

    एयरपोर्ट पर जिनपिंग का स्वागत कर सकते हैं ट्रंप

    रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने शुक्रवार को बताया कि ट्रंप अगले सप्ताह वॉशिंगटन डीसी के बाहर जॉइंट बेस एंड्रयूज पहुंचने पर शी जिनपिंग का एयरपोर्ट पर स्वागत करने की योजना बना रहे हैं। अधिकारी ने कहा कि किसी विदेशी नेता का अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा एयरपोर्ट पर स्वागत किया जाना दुर्लभ है।

    अधिकारियों के मुताबिक, शी जिनपिंग की अमेरिका यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में स्वागत समारोह आयोजित किया जाएगा। इसके बाद रोज गार्डन में सैन्य समीक्षा और शाम को स्टेट डिनर का कार्यक्रम भी शामिल होगा।

    डिनर में टेक कंपनियों के CEO भी होंगे शामिल

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, स्टेट डिनर में कई बड़ी टेक कंपनियों के CEO के शामिल होने की संभावना है। इनमें Amazon के जेफ बेजोस, Alphabet के सुंदर पिचाई, OpenAI के सैम ऑल्टमैन, Apple के टिम कुक, Tesla के एलन मस्क, Nvidia के जेनसन हुआंग और Dell Technologies के माइकल डेल शामिल हैं।

    अधिकारियों ने बताया कि जिनपिंग की यात्रा के दौरान अमेरिका और चीन के बीच व्यापार के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में रेयर अर्थ की आपूर्ति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है। यात्रा को दोनों देशों के बीच व्यापार और रणनीतिक संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • ट्रंप ने एआई को बताया भविष्य की ताकत, चीन की जासूसी, शी जिनपिंग और कनाडा के नेताओं पर भी खुलकर बोले

    ट्रंप ने एआई को बताया भविष्य की ताकत, चीन की जासूसी, शी जिनपिंग और कनाडा के नेताओं पर भी खुलकर बोले

    नई दिल्ली ।अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आयरलैंड से अमेरिका लौटते समय एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, चीन, कनाडा और व्यापार से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी प्रतिक्रिया दी। ट्रंप ने एआई को लेकर अमेरिका की स्थिति को मजबूत बताया, वहीं चीन और कनाडा के साथ संबंधों पर भी अपनी बात रखी।

    चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को लेकर ट्रंप ने कहा कि उनका रवैया अब तक ठीक रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने चीन के साथ सही व्यवहार किया है। चीन की ओर से अमेरिका की जासूसी किए जाने से जुड़े सवाल पर ट्रंप ने कहा कि चीन अमेरिका पर नजर रखता है, लेकिन अमेरिका भी चीन की जानकारी लेता है।

    ट्रंप ने अमेरिकी बाजार में चीनी कारों की स्थिति का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अभी तक उन्होंने चीनी कारों को अमेरिका में आने की अनुमति नहीं दी है। इसके पीछे उन्होंने चीन के सामान पर लगाए गए भारी टैक्स को प्रमुख कारण बताया। ट्रंप के अनुसार, इन उत्पादों पर टैक्स 100 से 150 प्रतिशत तक रहा है।

    उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां विदेशी कारों की वजह से परेशानी बढ़ रही है। इसके विपरीत अमेरिका में अभी ऐसी स्थिति नहीं बनी है। ट्रंप ने इस संदर्भ में अमेरिकी बाजार में चीनी वाहनों के प्रवेश को लेकर अपनी नीति का संकेत दिया।

    बोइंग के विमानों से जुड़े सौदे के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा कि वह इसे पूरा करेंगे। उन्होंने अपनी बातचीत और कारोबारी शैली का जिक्र करते हुए कहा कि वह हर डील पूरी कर लेते हैं। इस दौरान उन्होंने व्यापार से जुड़े अपने रुख को भी स्पष्ट किया।

    कनाडा के साथ संबंधों को लेकर ट्रंप ने कहा कि वहां की सरकार के साथ काम करना उनके लिए मुश्किल है। हालांकि उन्होंने कनाडा के आम लोगों और वहां के नेताओं के बीच अंतर करते हुए कहा कि उन्हें कनाडा के लोगों से कोई परेशानी नहीं है। उनके मुताबिक, कनाडा के लोग अच्छे हैं, लेकिन वहां के नेताओं के साथ काम करना आसान नहीं है।

    ट्रंप ने दावा किया कि कनाडा अब अमेरिका के साथ समझौता करना चाहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा ने लंबे समय तक अमेरिका से फायदा उठाया, लेकिन अब स्थिति बदल गई है और ऐसा नहीं हो रहा है।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर ट्रंप ने इसे भविष्य की महत्वपूर्ण ताकत के तौर पर पेश किया। उन्होंने कहा कि जिस देश का एआई सबसे आगे होगा, वही आगे रहेगा। ट्रंप ने दावा किया कि इस क्षेत्र में अमेरिका काफी आगे है।

    जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या वह खुद एआई का इस्तेमाल करते हैं, तो उन्होंने इसका जवाब हां में दिया। हालांकि, उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि वह एआई का इस्तेमाल किस काम के लिए करते हैं।

    ट्रंप की इस बातचीत में एआई के साथ-साथ चीन और कनाडा के साथ अमेरिका के संबंधों को लेकर उनका मौजूदा रुख भी सामने आया। चीन के साथ जासूसी और व्यापार, कनाडा के साथ बातचीत तथा एआई में अमेरिकी बढ़त जैसे मुद्दों पर उन्होंने पत्रकारों के सवालों का जवाब दिया।

  • मोदी-जिनपिंग मुलाकात के बाद LAC पर चीन ने घटाई PLA की तैनाती, गलवान झड़प के बाद पहली बार डि-एस्केलेशन

    मोदी-जिनपिंग मुलाकात के बाद LAC पर चीन ने घटाई PLA की तैनाती, गलवान झड़प के बाद पहली बार डि-एस्केलेशन

    नई दिल्ली ।भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर लंबे समय से जारी सैन्य तनाव के बीच चीनी सेना की तैनाती में कमी सामने आई है। रक्षा मंत्रालय की 2025-26 की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में उत्तरी सीमा के सामने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी PLA की तैनाती में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार पूर्वी लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारतीय सेना की स्थिति मजबूत है और वह किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।

    रिपोर्ट में भारत और चीन के बीच राजनीतिक, कूटनीतिक और सैन्य स्तर पर जारी संपर्क का सीमा की स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की बात कही गई है। इसमें वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोआर्डिनेशन और भारत-चीन सीमा से संबंधित स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव वार्ता का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इन प्रयासों से उत्तरी सीमा पर स्थिरता लाने में मदद मिली है।

    यह घटनाक्रम 2024 में दोनों देशों के बीच हुई डिसएंगेजमेंट प्रक्रिया के बाद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक चीन ने अब भारतीय पक्ष की डि-एस्केलेशन से जुड़ी शर्त को भी स्वीकार किया है। डि-एस्केलेशन के तहत सीमा पर तैनात सैनिकों की संख्या कम की जाती है। हालांकि सैनिकों को पूरी तरह पीछे स्थित बैरकों में भेजने की प्रक्रिया यानी डि-इंडक्शन अभी बाकी है। इसके बाद ही LAC पर 2020 की गलवान घाटी की झड़प से पहले जैसी स्थिति बहाल होने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा।

    रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन की कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड में करीब 14 से 15 हजार सैनिक हो सकते हैं। इसमें पैदल सेना के साथ मैकेनाइज्ड कॉलम, बख्तरबंद वाहन, तोपखाना, एयर डिफेंस सिस्टम और ड्रोन वॉरफेयर से जुड़ी इकाइयां शामिल होती हैं। रिपोर्ट में LAC पर चीन की करीब 10 कंबाइंड ब्रिगेड की तैनाती का उल्लेख किया गया है, जिससे वहां बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों की मौजूदगी का संकेत मिलता है।

    हालांकि सीमा पर तैनाती में कमी के बावजूद भारत के लिए चिंता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार PLA के करीब डेढ़ लाख सैनिक भारतीय सीमा के करीब ट्रेनिंग क्षेत्रों में भी तैनात हैं। इन क्षेत्रों से सैनिकों को जरूरत पड़ने पर LAC की ओर तेजी से भेजा जा सकता है। इसी वजह से भारतीय सेना चीन से डि-इंडक्शन की प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।

    गलवान घाटी में 2020 की झड़प के समय अकेले पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में चीन के करीब एक लाख सैनिक तैनात बताए गए थे। इसके बाद पिछले छह वर्षों में 3488 किलोमीटर लंबी LAC पर चीन की सैन्य तैनाती में कमी आई है।

    इसी बीच अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबानसिरी क्षेत्र में पिछले एक महीने से भारत और चीन की सेनाओं के बीच फेस-ऑफ की स्थिति बनी हुई है। गतिरोध दूर करने के लिए दोनों देशों के बीच कोर कमांडर स्तर की दो बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन क्षेत्र में तनाव अभी बरकरार है।

    रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सीमा पर स्थिरता के लिए जारी संवाद और उच्चस्तरीय संपर्क महत्वपूर्ण रहे हैं। भारत-चीन संबंधों में सैन्य स्तर की बातचीत के साथ राजनीतिक और कूटनीतिक संपर्कों को भी सीमा पर स्थिति सुधारने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।

  • भारत-चीन हवाई संपर्क बहाली की दिशा में कदम, 21 सितंबर से ग्वांगझू और नई दिल्ली के बीच रोजाना उड़ान चलेगी

    भारत-चीन हवाई संपर्क बहाली की दिशा में कदम, 21 सितंबर से ग्वांगझू और नई दिल्ली के बीच रोजाना उड़ान चलेगी


    नई दिल्ली । 
    भारत और चीन के बीच लंबे समय से प्रभावित हवाई संपर्क अब दोबारा बहाल होने जा रहा है। चाइना सदर्न एयरलाइंस ने 21 सितंबर से ग्वांगझू और नई दिल्ली के बीच नियमित सीधी यात्री उड़ान सेवा फिर शुरू करने का ऐलान किया है। करीब छह साल के अंतराल के बाद शुरू होने वाली यह सेवा दोनों देशों के बीच यात्रियों की आवाजाही के साथ व्यापार और पर्यटन संबंधों के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

    यह घोषणा ऐसे समय हुई है जब चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भारत दौरे और BRICS शिखर सम्मेलन को लेकर दोनों देशों के बीच गतिविधियां बढ़ी हैं। शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत पहुंचे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक प्रस्तावित है। ऐसे समय में दोनों देशों के बीच हवाई संपर्क बहाल करने का फैसला आपसी संबंधों में सुधार के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

    भारत और चीन के बीच सीधी हवाई सेवाएं वर्ष 2020 में कोरोना महामारी के बाद प्रभावित हुई थीं। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा तनाव के कारण भी हवाई संपर्क सामान्य नहीं हो सका। लंबे समय तक सीधी उड़ानें बंद रहने से यात्रियों को दोनों देशों के बीच यात्रा के लिए वैकल्पिक मार्गों पर निर्भर रहना पड़ा।

    चाइना सदर्न एयरलाइंस के मुताबिक, ग्वांगझू-नई दिल्ली मार्ग पर बोइंग 737 सीरीज के विमानों से रोजाना एक उड़ान संचालित की जाएगी। ग्वांगझू इंटरनेशनल एयरपोर्ट से विमान स्थानीय समय के अनुसार दोपहर 3:35 बजे रवाना होगा और शाम 7 बजे नई दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचेगा।

    नई दिल्ली से वापसी की उड़ान रात 8:20 बजे रवाना होगी। यह विमान अगले दिन तड़के 4:15 बजे ग्वांगझू एयरपोर्ट पर पहुंचेगा। इस तरह दोनों दिशाओं में नियमित सीधी सेवा उपलब्ध होने से भारत और चीन के बीच यात्रा करने वाले लोगों को सुविधा मिलने की संभावना है।

    हवाई संपर्क बहाल होने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियों को भी गति मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही पर्यटन और लोगों के आपसी संपर्क को बढ़ावा मिल सकता है। लंबे समय से बाधित सीधी उड़ान सेवा शुरू होने से यात्रियों के लिए दोनों देशों के प्रमुख शहरों के बीच यात्रा आसान होगी।

    चाइना सदर्न एयरलाइंस के इस ऐलान के साथ वह दोनों देशों के बीच उड़ान सेवाएं बहाल करने वाली प्रमुख चीनी एयरलाइनों में शामिल हो गई है। इससे पहले चाइना ईस्टर्न एयरलाइंस और एयर चाइना भी भारत और चीन के बीच अपनी सेवाएं बहाल कर चुकी हैं।

    भारत और चीन के बीच संबंधों में लंबे समय से चले आ रहे तनाव के बीच हवाई संपर्क की बहाली को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। ग्वांगझू और नई दिल्ली के बीच रोजाना सीधी उड़ान शुरू होने से दोनों देशों के नागरिकों, कारोबारियों और पर्यटकों के लिए सीधा संपर्क फिर मजबूत होने की दिशा में कदम बढ़ेगा।

  • BRICS Summit 2026 केदिल्ली पहुंचे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, प्रधानमंत्री मोदी से शाम को द्विपक्षीय बैठक में कई मुद्दों पर होगी चर्चा

    BRICS Summit 2026 केदिल्ली पहुंचे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, प्रधानमंत्री मोदी से शाम को द्विपक्षीय बैठक में कई मुद्दों पर होगी चर्चा

    नई दिल्ली ।18वें BRICS शिखर सम्मेलन 2026 में शामिल होने के लिए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शनिवार को दिल्ली पहुंच गए। उनके भारत आगमन पर केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। शी जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी प्रस्तावित द्विपक्षीय बैठक को लेकर भी गतिविधियां तेज हो गई हैं।

    जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच आज शाम करीब पौने छह बजे द्विपक्षीय बैठक होने वाली है। BRICS शिखर सम्मेलन से इतर होने वाली इस मुलाकात में दोनों देशों से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

    शी जिनपिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत पहुंचे हैं। उनके साथ चीन का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी दिल्ली आया है। इस प्रतिनिधिमंडल में चीन कम्युनिस्ट पार्टी के राजनीतिक ब्यूरो के सदस्य काई ची और चीन के विदेश मंत्री वांग यी शामिल हैं।

    काई ची चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के जनरल ऑफिस के निदेशक भी हैं। शी जिनपिंग के साथ उनकी मौजूदगी को दोनों देशों के बीच होने वाली महत्वपूर्ण बातचीत के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की द्विपक्षीय बैठक में सीमा विवाद और दोनों देशों के संबंधों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत होने की संभावना है। इसके अलावा व्यापार, कृषि क्षेत्र और बाजार में आपूर्ति श्रृंखला से संबंधित विषय भी चर्चा में शामिल हो सकते हैं।

    बैठक के दौरान आर्थिक और तकनीकी सहयोग से जुड़े मुद्दों पर भी बातचीत होने की उम्मीद है। इसके साथ ही वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर मजबूत सैन्य सुरक्षा व्यवस्था और आयात से जुड़े विषयों पर भी दोनों नेताओं के बीच चर्चा हो सकती है।

    BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए कई देशों के प्रमुख नेता पहले ही दिल्ली पहुंच चुके हैं। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 11 सितंबर को दिल्ली पहुंचे थे। भारत पहुंचने पर केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने उनका स्वागत किया था।

    ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान भी BRICS शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं। उनका स्वागत केंद्रीय राज्य मंत्री शंतनु ठाकुर ने किया था। इस तरह शिखर सम्मेलन के लिए कई प्रमुख देशों के नेताओं की दिल्ली में मौजूदगी हो चुकी है।

    शी जिनपिंग के भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के साथ होने वाली बैठक पर विशेष ध्यान रहेगा। दोनों नेताओं के बीच बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े विभिन्न मुद्दों के साथ व्यापार, आर्थिक और तकनीकी विषयों पर चर्चा की संभावना है।

    सीमा से जुड़े विषय और LAC पर सुरक्षा व्यवस्था भी प्रस्तावित बातचीत के महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा कृषि, आपूर्ति श्रृंखला और आयात से संबंधित विषयों पर भी चर्चा होने की उम्मीद है।

    फिलहाल शी जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने के बाद BRICS शिखर सम्मेलन की गतिविधियों के बीच प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी द्विपक्षीय बैठक अहम कार्यक्रमों में शामिल है। दोनों नेताओं की मुलाकात आज शाम करीब पौने छह बजे प्रस्तावित है, जिसके दौरान दोनों देशों से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत होने की उम्मीद है।

  • BRICS सम्मेलन के बीच अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप, जॉर्डन में सैन्य अड्डे पर हमले से सैटेलाइट तस्वीरों का जोड़ा संबंध

    BRICS सम्मेलन के बीच अमेरिका का चीन पर गंभीर आरोप, जॉर्डन में सैन्य अड्डे पर हमले से सैटेलाइट तस्वीरों का जोड़ा संबंध

    नई दिल्ली ।अमेरिका और चीन के बीच तनाव के बीच जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हुए मिसाइल हमले को लेकर एक नया आरोप सामने आया है। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि ईरान को चीन से जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की हाई-क्वालिटी सैटेलाइट तस्वीरें मिली थीं। अधिकारियों के अनुसार, इन तस्वीरों से ईरान को सैन्य अड्डे और वहां मौजूद अमेरिकी सैनिकों की स्थिति को समझने में मदद मिल सकती थी।

    अमेरिकी अधिकारियों ने जॉर्डन में मौजूद मुवफ्फक सलती एयर बेस पर हुए हमले और चीन से मिली तस्वीरों के बीच संबंध होने की बात कही है। उनके अनुसार, ईरान ने इस सैन्य अड्डे की साफ और विस्तृत सैटेलाइट तस्वीरें हासिल की थीं। माना जा रहा है कि ऐसी तस्वीरों से बेस की स्थिति और वहां की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाना आसान हो सकता था।

    यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जॉर्डन में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाकर किए गए हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई थी, जबकि चार अन्य सैनिक घायल हुए थे। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सैनिकों के रहने वाली जगह पर ईरानी बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया गया था। हमले के समय कई अमेरिकी सैनिक सो रहे थे।

    यह हमला 24 घंटे के भीतर सैन्य अड्डे पर हुए तीन मिसाइल हमलों में से एक था। अप्रैल में हुए सीजफायर के बाद यह पहली ऐसी घटना थी, जिसमें अमेरिकी सैनिकों की जान गई। इसी वजह से हमले से जुड़ी जानकारी के स्रोत और उससे संबंधित संभावित सहायता को लेकर अमेरिकी स्तर पर जांच और सवालों का सिलसिला जारी है।

    हालांकि, अमेरिका ने यह दावा नहीं किया है कि चीन की सरकार ने सीधे तौर पर ईरान को अमेरिकी सैनिकों पर हमला करने में मदद की थी। अमेरिकी अधिकारियों ने चीन के सामने सैटेलाइट तस्वीरों से संबंधित सवाल उठाए थे। इसके जवाब में चीन ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।

    चीन ने अमेरिका से अपने आरोपों के समर्थन में सबूत भी मांगे हैं। अमेरिका की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि चीन की कौन-सी कंपनी या संस्था ने कथित तौर पर ये सैटेलाइट तस्वीरें ईरान को उपलब्ध कराई थीं। इसलिए तस्वीरों की आपूर्ति से जुड़े संस्थानों की पहचान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    अमेरिका इससे पहले भी ईरान को सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध कराने के आरोप में चीन की तीन कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर चुका है। ऐसे में जॉर्डन के सैन्य अड्डे से जुड़ा नया आरोप दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव के बीच सामने आया है।

    पूरे मामले में मुख्य सवाल यह है कि जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डे की उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें ईरान तक किस माध्यम से पहुंचीं और उनका इस्तेमाल किस तरह किया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने तस्वीरों और हमले के बीच संबंध की संभावना जताई है, जबकि चीन ने सीधे तौर पर लगाए गए आरोपों से इनकार किया है।

    जॉर्डन में हुए हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत और चार सैनिकों के घायल होने के बाद यह मामला अमेरिका के लिए सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है। वहीं, चीन पर लगे आरोपों से अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ने की स्थिति भी बनी हुई है।

  • डॉलर पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी…. भारत-चीन-रूस ने बनाया नया पेमेंट प्लान!

    डॉलर पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी…. भारत-चीन-रूस ने बनाया नया पेमेंट प्लान!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) इस सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) की मेजबानी कर रहा है। नई दिल्ली में शनिवार से शुरू हो रहे इस सम्मेलन में 11 देशों के शीर्ष नेता जुटेंगे। इस बीच अब ब्रिक्स देशों (BRICS Nations) की डॉलर (Dollar) पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी वाली योजना पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। दरअसल भारत, चीन और रूस की अगुवाई वाला ब्रिक्स कई सालों से डॉलर का विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यह समूह अमेरिका से हमेशा खटकता रहा है। अब आगामी शिखर सम्मेलन से पहले भारत ने क्रॉस बॉर्डर भुगतान को आसान बनाने के लिए एक अहम प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इससे अमेरिका की बौखलाहट और बढ़ सकती है।

    दरअसल BRICS बीते कुछ समय से एक ऐसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहा है जिससे भारत, चीन और रूस जैसे देशों की डिजिटल करेंसियों को इंटीग्रेट किया जा सके। अब ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की वकालत करेगा।

    हालांकि भारत किसी ऐसे यूनिफाइड पेमेंट नेटवर्क का समर्थन नहीं कर रहा है जिसे अमेरिकी डॉलर या SWIFT के विकल्प के रूप में देखा जाए। इसकी वजह यह है कि भारत नहीं चाहता कि ब्रिक्स समूह को अमेरिका या पश्चिमी देशों के खिलाफ खड़े ब्लॉक के रूप में देखा जाए। यही कारण है कि भारत एक साझा ‘ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम’ बनाने के बजाय द्विपक्षीय डिजिटल करेंसी कनेक्टिविटी पर जोर दे रहा है।

    डिजिटल और स्थानीय करेंसी पर जोर
    रिपोर्ट के मुताबिक भारत का प्रस्ताव है कि ब्रिक्स देश अपनी-अपनी सेंट्रल बैंक की डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ें। इससे मध्यस्थ बैंकों पर निर्भरता कम होगी और लेनदेन की लागत में भारी गिरावट आएगी। आसान भाषा ने कहें तो भारत किसी तीसरे देश की करेंसी यानी डॉलर का उपयोग करने के बजाय सदस्य देशों की अपनी करेंसी में व्यापार करने की बात पर जोर दे रहा है।


    क्या है भारत का प्लान?

    जानकारी के मुताबिक इस सिस्टम में भारत के ई-रुपया, चीन की डिजिटल युआन और रूस की डिजिटल रूबल जैसी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। इसमें हर देश अपनी करेंसी पर पूरा कंट्रोल बनाए रखेगा। बदलाव सिर्फ इतना होगा कि इन करेंसी के जरिए आपसी लेनदेन आसान हो जाएगा। इस सिस्टम के जरिए ब्रिक्स देश आपस में होने वाले व्यापार का भुगतान सीधे अपनी डिजिटल करेंसी में कर सकेंगे। इसके लिए ना तो डॉलर की जरूरत होगी और न ही स्विफ्ट जैसे डॉलर आधारित सिस्टम से होकर भुगतान करना पड़ेगा।

    भारत इस पूरे मॉडल को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि करेंसी को मिलाने की बजाय सिस्टम को आपस में जोड़ना बेहतर रास्ता है। इसका आधार भारत का खुद का डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूपीआई है। UPI ने देश के अंदर डिजिटल पेमेंट को काफी आसान बनाया है और इसी मॉडल को अन्य देशों के साथ भी जोड़ा जा सकता है।


    काम कैसे करेगा ब्रिक्स का पेमेंट सिस्टम?

    ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सेटलमेंट साइकिल पर काम करेगा। इसका मतलब है कि हर लेनदेन का भुगतान तुरंत नहीं किया जाएगा। एक तय अवधि में आयात और निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा और आखिर में सिर्फ अंतर की रकम का भुगतान होगा। उदाहरण के लिए, अगर भारत एक महीने में चीन से 500 अरब रुपये का सामान खरीदता है और चीन भारत से 450 अरब रुपये का सामान लेता है, तो भारत को सिर्फ 50 अरब रुपये का ही भुगतान करना होगा। इससे ट्रांजेक्शन कॉस्ट भी कम होंगी।

  • BRICS Summit 2026 में शामिल होने भारत आएंगे शी जिनपिंग, पीएम मोदी के निमंत्रण पर 12-13 सितंबर को होगा दौरा

    BRICS Summit 2026 में शामिल होने भारत आएंगे शी जिनपिंग, पीएम मोदी के निमंत्रण पर 12-13 सितंबर को होगा दौरा

    नई दिल्ली ।चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर भारत दौरे पर आएंगे। चीन के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को उनके दौरे की जानकारी दी। शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को भारत में आयोजित होने वाले BRICS सम्मेलन में शामिल होंगे। करीब सात साल बाद उनका भारत दौरा होने जा रहा है।

    शी जिनपिंग का यह दौरा भारत और चीन के संबंधों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2020 में गलवान की घटना के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग की यह पहली आमने-सामने की द्विपक्षीय मुलाकात होगी। इससे पहले दोनों नेता किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान एक ही मंच पर नजर आए थे। उस दौरान दोनों ने एक-दूसरे से हाथ मिलाया था, लेकिन उनके बीच अलग से द्विपक्षीय बैठक नहीं हुई थी।

    शी जिनपिंग इससे पहले वर्ष 2019 में भारत आए थे। तब उन्होंने तमिलनाडु के मामल्लपुरम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। दोनों नेताओं के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत हुई थी। इससे पहले वर्ष 2016 में शी जिनपिंग गोवा में आयोजित BRICS सम्मेलन में शामिल होने भारत पहुंचे थे। सितंबर 2014 में उन्होंने पहली बार भारत का दौरा किया था। उस समय भी प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग के बीच कई अहम विषयों पर चर्चा हुई थी।

    शी जिनपिंग का आगामी दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब भारत और चीन अपने संबंधों में आई दूरी को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। सीमा विवाद के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय तक तनाव की स्थिति रही है। अब दोनों पक्षों के बीच बातचीत आगे बढ़ रही है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग की प्रस्तावित मुलाकात से भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर नई दिशा मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।

    नई दिल्ली में 11 से 13 सितंबर तक BRICS सम्मेलन आयोजित होगा। इस बैठक में कई देशों के प्रमुख नेता शामिल होंगे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के सम्मेलन में पहुंचने की पुष्टि हो चुकी है।

    BRICS बैठक में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार, निवेश, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। इसके अलावा रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया की स्थिति भी बैठक में चर्चा के प्रमुख विषयों में शामिल हो सकती है।

    सम्मेलन में विकासशील देशों की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बदलाव जैसे मुद्दों पर भी विचार-विमर्श होने की उम्मीद है। ऐसे में शी जिनपिंग की भारत यात्रा और BRICS बैठक में उनकी भागीदारी दोनों देशों के बीच संबंधों से जुड़े घटनाक्रम के लिहाज से महत्वपूर्ण होगी।

  • अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर

    अमिताभ कांत ने बताया, देश हित में चीन के साथ सहयोग क्यों जरूरी, क्लीन टेक और औद्योगिक क्षमता पर दिया जोर

    नई दिल्ली । इंडिया टुडे के BRICS Roundtable में नीति आयोग के पूर्व CEO अमिताभ कांत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था, क्लीन टेक्नोलॉजी और भारत की औद्योगिक क्षमता पर विस्तार से विचार रखे. उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भारत के राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अमेरिका और चीन दोनों पक्षों के साथ संतुलित रणनीति बनाकर काम करना अनिवार्य है.

    अमिताभ कांत के अनुसार, क्लीन टेक्नोलॉजी के लगभग सभी प्रमुख वर्टिकल्स में चीन का दबदबा है. दुनिया की करीब 95% क्लीन बैटरियां और 85% इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) चीन में बनते हैं. इसके अलावा, क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग तकनीक के साथ-साथ सोलर सेक्टर पर करीब 80% और विंड एनर्जी में 77% नियंत्रण चीन का ही है.

    दूसरी ओर, जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) के बाजार में अमेरिका का बड़ा प्रभाव है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का आयात करता है, जिस पर सालाना लगभग 180 अरब डॉलर का खर्च आता है. पश्चिम एशिया में तनाव या युद्ध की स्थिति बनते ही कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, जिससे भारत के आयात बिल, रुपये की स्थिरता और पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है.

    देश हित में चीन के साथ काम करना क्यों है जरूरी?

    ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को भविष्य में तेजी से क्लीन टेक्नोलॉजी की दिशा में आगे बढ़ना होगा. ऐसे में भारत के राष्ट्रीय हित में चीन के साथ तकनीकी स्तर पर सहभागिता बनाना जरूरी है, लेकिन चीन को इस तकनीक को ‘वेपनाइज’ बनाने से रोकना होगा. चीन को यह तकनीक BRICS देशों और ग्लोबल साउथ के साथ साझा करनी चाहिए.

    चीन के नॉन-टैरिफ बैरियर्स और बाजार की असमानता

    चीन की नीति मुख्य रूप से निर्यात पर केंद्रित है, जबकि वह दूसरे देशों के आयात के लिए अपना बाजार आसानी से नहीं खोलता. चीन में मौजूद नॉन-टैरिफ बैरियर्स के कारण भारत के फार्मास्यूटिकल और ड्रग मैन्युफैक्चरर्स वहां आसानी से प्रवेश नहीं कर पाते. आगामी BRICS शिखर सम्मेलन और द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत को चीन के सामने अपने बाजारों को खोलने और क्लीन टेक साझा करने का मुद्दा मजबूती से उठाना चाहिए.

    अमिताभ कांत ने कहा कि क्लीन टेक्नोलॉजी में किसी एक देश का अत्यधिक नियंत्रण वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। ग्लोबल साउथ के देशों के सतत विकास के लिए तकनीक, निवेश और बाजारों का आपस में साझा होना जरूरी है, ताकि एकाधिकार की स्थिति से बचा जा सके.

    भारत की आर्थिक वृद्धि पर बात करते हुए उन्होंने एक ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंक की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें भारत में नई औद्योगिक क्रांति की बात कही गई है. इसके पीछे स्पेस, सेमीकंडक्टर, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और एयरोस्पेस जैसे हाई-ग्रोथ सेक्टर्स की मुख्य भूमिका है.

    भारत में औद्योगिक वृद्धि को रफ्तार देने के लिए सरकार ने उन क्षेत्रों को निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स के लिए खोल दिया है, जिन पर पहले सरकारी नियंत्रण था. जियो-स्पेशियल, ड्रोन, स्पेस और डिफेंस सेक्टर्स में निजी भागीदारी और स्टार्टअप्स के आने से नई तकनीक, निवेश और प्रतिस्पर्धा को बड़ा प्रोत्साहन मिला है.

    डिजाइनिंग से आगे बढ़कर मैन्युफैक्चरिंग पर भारत का फोकस

    भारत अब केवल तकनीक और चिप डिजाइन करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता भी बढ़ा रहा है. सेमीकंडक्टर PLI योजना की सफलता और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में आई तेजी इसका प्रमाण हैं. भारत का लक्ष्य घरेलू मांग पूरी करने के साथ-साथ ग्लोबल सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनना है.

    BRICS देश दुनिया की कुल GDP का लगभग 40% हिस्सा संभालते हैं. अमिताभ कांत ने सुझाव दिया कि भारत को अपनी अध्यक्षता के दौरान संगठन का ध्यान राजनीतिक ध्रुवीकरण या ‘पश्चिम-विरोधी’ रुख पर ले जाने के बजाय व्यापार, निवेश, जलवायु और विकास जैसे व्यावहारिक मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए.

    पश्चिम एशिया के तनाव और विभिन्न सदस्य देशों की अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच भारत को ‘कंसेंसस बिल्डिंग’ की भूमिका निभानी होगी. जैसा कि भारत ने G20 सम्मेलन में संवेदनशील मुद्दों पर आम सहमति बनाकर दिखाया था, वैसा ही नेतृत्व BRICS में भी दिखाकर सभी देशों को एक न्यूनतम साझा एजेंडे पर साथ लाना होगा.