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  • चीन बना रहा पाताल में परमाणु मिसाइलें, भारत से करीब 1100 किमी दूर तक फैला जखीरा

    चीन बना रहा पाताल में परमाणु मिसाइलें, भारत से करीब 1100 किमी दूर तक फैला जखीरा


    नई दिल्ली।
    चीन ने पहली बार आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसने हाल के वर्षों में परमाणु मिसाइलों की तैनाती के लिए बड़ी संख्या में भूमिगत साइलो तैयार किए हैं। चीन के सरकारी टीवी नेटवर्क सीसीटीवी पर प्रसारित एक डॉक्यूमेंट्री में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) रॉकेट फोर्स के अधिकारियों ने इस निर्माण कार्यक्रम से जुड़ी जानकारी साझा की। चीन का यह कबूलनामा ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थान लंबे समय से सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर उसके परमाणु हथियारों के विस्तार का दावा करते रहे हैं।

    अमेरिका के दावे की हुई पुष्टि

    पीएलए की 99वीं वर्षगांठ के मौके पर प्रसारित ‘Securing Victory’ नाम की डॉक्यूमेंट्री में रॉकेट फोर्स के इंजीनियरिंग अधिकारी कुई दाओहू ने भूमिगत मिसाइल ठिकानों के निर्माण का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने मिसाइलों के लिए ऐसे ठिकाने तैयार किए हैं, जिन्हें चीन की रणनीतिक क्षमता का अहम हिस्सा माना जा रहा है।

    कुई के मुताबिक, इन साइलो को इस तरह तैयार किया गया है कि निर्माण पूरा होते ही वहां मिसाइलों की तैनाती की जा सके। उन्होंने कहा कि उनकी टीम ने परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया और कई इंजीनियर तथा सैनिक लंबे समय तक निर्माण स्थलों पर तैनात रहे।

    300 से ज्यादा साइलो बनाने का दावा

    अमेरिका और कई अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक वर्ष 2021 से ही सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर चीन के परमाणु मिसाइल साइलो निर्माण का दावा करते रहे हैं। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन की 2025 की रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ने 300 से अधिक मिसाइल साइलो तैयार किए हैं।

    इन ठिकानों को चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में शिनजियांग के हामी, गांसू के यूमेन और इनर मंगोलिया के यूलिन में बनाए जाने की बात कही गई थी।

    चीन ने इससे पहले इन दावों की न तो पुष्टि की थी और न ही स्पष्ट रूप से खंडन किया था। बीजिंग लगातार यह कहता रहा है कि उसकी परमाणु नीति रक्षात्मक है और उसके परमाणु खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।

    भारत से कितनी दूर हैं चीन के ये परमाणु ठिकाने?

    चीन के इन परमाणु मिसाइल साइलो की लोकेशन भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, चीन का गांसू क्षेत्र अरुणाचल प्रदेश के सबसे करीब पड़ता है और दोनों के बीच दूरी करीब 1100 किलोमीटर बताई गई है।

    वहीं, लद्दाख के लेह से शिनजियांग के हामी क्षेत्र की दूरी करीब 1600 किलोमीटर बताई जाती है। ऐसे में चीन के परमाणु हथियारों और मिसाइल साइलो का विस्तार भारत की सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    साइलो बनाने में आईं बड़ी चुनौतियां

    चीनी अधिकारी के मुताबिक, भूमिगत मिसाइल साइलो का निर्माण बेहद चुनौतीपूर्ण था। भारी-भरकम उपकरणों और हिस्सों को सही तरीके से जोड़ना और उन्हें निर्धारित समय में स्थापित करना मुश्किल काम था। इसके बावजूद इंजीनियरों और सैनिकों ने तय समयसीमा के भीतर निर्माण पूरा किया।

    हालांकि चीन ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि इन नए साइलो में कौन-कौन सी मिसाइलें तैनात की जाएंगी। लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि इनमें DF-5 सीरीज की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) को रखा जा सकता है।

    दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंच सकती है DF-5C

    DF-5C को चीन की सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली परमाणु मिसाइलों में शामिल किया जाता है। चीन के मुताबिक, इसकी क्षमता दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंचने की है। इस तरह की मिसाइलों को भूमिगत साइलो से लॉन्च करने के लिए तैयार किया जाता है।

    नए साइलो को लेकर चीनी अधिकारी ने दावा किया कि इन्हें दुश्मन के हमले को झेलने और जरूरत पड़ने पर जवाबी कार्रवाई करने के लिहाज से डिजाइन किया गया है।

    चीन की ‘नो फर्स्ट यूज’ नीति के बीच बढ़ता परमाणु जखीरा

    चीन आधिकारिक तौर पर ‘नो फर्स्ट यूज’ परमाणु नीति की बात करता है। यानी उसका दावा है कि वह किसी देश के खिलाफ पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा। हालांकि, परमाणु हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता बनाए रखने की बात वह लगातार कहता रहा है।

    नए भूमिगत साइलो का निर्माण इसी रणनीतिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। चीन का यह आधिकारिक खुलासा इसलिए भी अहम है क्योंकि इससे उसके परमाणु हथियारों के विस्तार को लेकर अमेरिका के वर्षों पुराने दावों को पहली बार चीन की ओर से सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किए जाने का संकेत मिलता है।

  • चीन में भारतीयों की बढ़ी चिंता: सोशल मीडिया पर भारत-विरोधी कंटेंट, वीजा और रोजगार प्रतिबंध के मुद्दे उठे

    चीन में भारतीयों की बढ़ी चिंता: सोशल मीडिया पर भारत-विरोधी कंटेंट, वीजा और रोजगार प्रतिबंध के मुद्दे उठे


    नई दिल्ली। चीन में रह रहे भारतीय समुदाय ने बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास के ‘ओपन हाउस’ कार्यक्रम में सोशल मीडिया पर भारत-विरोधी सामग्री, कार्य वीजा में कमी और भारतीयों के जीवनसाथियों के रोजगार पर प्रतिबंध जैसे कई अहम मुद्दे उठाए। भारतीय राजदूत विक्रम दुरईस्वामी ने इन चिंताओं पर चर्चा करते हुए समाधान के लिए लगातार प्रयास किए जाने का भरोसा दिलाया।

    सोशल मीडिया और वीजा से जुड़े मुद्दे प्रमुख
    शुक्रवार को आयोजित इस कार्यक्रम में बीजिंग में विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत भारतीय पेशेवरों ने भाग लिया। उन्होंने चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीयों, उनके खान-पान और संस्कृति के खिलाफ बढ़ती आपत्तिजनक सामग्री पर चिंता जताई।

    इसके अलावा भारतीय पेशेवरों को कार्य वीजा मिलने में कमी, उनके जीवनसाथियों के रोजगार पर लगी पाबंदियों और दूतावास संबंधी सेवाओं में आने वाली दिक्कतों को भी प्रमुख मुद्दों के रूप में उठाया गया।

    चीनी अधिकारियों से लगातार संवाद
    मई में चीन में भारत के राजदूत का कार्यभार संभालने वाले विक्रम दुरईस्वामी ने बताया कि उन्होंने इन मुद्दों पर चीनी अधिकारियों के साथ संवाद बढ़ाया है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि अगले सप्ताह से भारतीय वीजा के लिए आवेदन करने वाले चीनी नागरिकों के दस्तावेजों की प्रक्रिया को और सरल बनाया जाएगा, ताकि दोनों देशों के बीच यात्रा और संपर्क को बढ़ावा मिल सके।

    भ्रामक प्रचार का तथ्यात्मक जवाब
    भारत-विरोधी और भ्रामक सामग्री के मुद्दे पर राजदूत ने कहा कि चीनी सरकार भी इस तरह की सामग्री को लेकर चिंतित है और उस पर नियंत्रण के लिए कदम उठा रही है। उन्होंने बताया कि भारतीय दूतावास भी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया मंचों के जरिए तथ्यात्मक जानकारी साझा कर गलत सूचनाओं का जवाब दे रहा है।

    भारतीय संस्कृति के प्रचार की तैयारी
    दुरईस्वामी ने कहा कि भारतीय संस्कृति और व्यंजनों की विविधता को बढ़ावा देने के लिए दूतावास भविष्य में और अधिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करेगा। उन्होंने बताया कि वसंत मेला जैसे आयोजनों को मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया के बाद इस दिशा में प्रयास बढ़ाए जाएंगे।

    कानूनी सहायता और नियमित संवाद
    राजदूत ने बताया कि कार्यस्थल से जुड़े विवादों या अन्य समस्याओं का सामना कर रहे भारतीयों की मदद के लिए दूतावास कानूनी विशेषज्ञों के साथ एक सहयोग तंत्र विकसित कर रहा है। साथ ही भारतीय समुदाय की समस्याओं के समाधान और बेहतर दूतावास सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए समय-समय पर ‘ओपन हाउस’ कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहेंगे।

  • अमेरिकी चुनावों पर विदेशी दखल का दावा तेज, व्हाइट हाउस ने चीन पर वोटर डेटा चोरी का लगाया गंभीर आरोप

    अमेरिकी चुनावों पर विदेशी दखल का दावा तेज, व्हाइट हाउस ने चीन पर वोटर डेटा चोरी का लगाया गंभीर आरोप

    नई दिल्ली । अमेरिकी चुनावी सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। व्हाइट हाउस ने दावा किया है कि चीन और उससे जुड़े साइबर नेटवर्क ने अमेरिका के करीब 22 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण डेटा हासिल किया है। अमेरिकी प्रशासन के अनुसार, यह मामला विदेशी हस्तक्षेप और साइबर सुरक्षा से जुड़ा है, जिसने चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    व्हाइट हाउस की ओर से जारी एक दस्तावेज में दावा किया गया कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट में ऐसे संकेत मिले हैं कि चीन से जुड़े साइबर समूहों ने वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़ी ऐसी जानकारियां हासिल कीं, जो पूरी तरह सार्वजनिक नहीं थीं। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि विदेशी ताकतें चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर सकती हैं।

    अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, विदेशी हस्तक्षेप केवल चुनाव के दिन मतदान प्रक्रिया को प्रभावित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों, मतदाताओं और चुनावी ढांचे से जुड़ी सूचनाओं को निशाना बनाना भी शामिल हो सकता है। प्रशासन ने कहा कि वोटर रजिस्ट्रेशन सिस्टम और उससे जुड़े डेटा पर हमला चुनावी प्रक्रिया में बाधा पैदा करने का एक तरीका हो सकता है।

    व्हाइट हाउस के दस्तावेज में बताया गया कि वर्ष 2022 की खुफिया रिपोर्ट में एक चीनी साइबर नेटवर्क से जुड़े समूह की पहचान की गई थी, जिसने व्यावसायिक वेबसाइटों पर मौजूद मतदाता पंजीकरण डेटा तक पहुंच बनाई थी। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि ऐसे साइबर समूह अक्सर ऐसी सूचनाएं जुटाने की कोशिश करते हैं, जो सामान्य रूप से उपलब्ध नहीं होती हैं।

    अमेरिकी सरकार ने साइबर हमलों से जुड़े संभावित खतरों का भी उल्लेख किया है। प्रशासन के अनुसार, यदि किसी विदेशी ताकत को मतदाता डेटा तक पहुंच मिल जाती है, तो वह उसमें बदलाव करने, मतदाताओं को मतदान में परेशानी पहुंचाने या चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने जैसी गतिविधियों की कोशिश कर सकती है। हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित डेटा हासिल करने की घटना से किसी चुनाव परिणाम पर कोई सीधा प्रभाव पड़ा है।

    यह मामला अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विदेशी चुनावी गतिविधियों से जुड़े कुछ खुफिया दस्तावेजों को सार्वजनिक करने के फैसले के बाद सामने आया है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का उद्देश्य चुनावी सुरक्षा से जुड़े आकलनों में पारदर्शिता बढ़ाना और विदेशी साइबर गतिविधियों के प्रति लोगों को जागरूक करना है।

    व्हाइट हाउस ने बताया कि कई प्रमुख अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति के बयान और इससे जुड़े दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया में सहयोग किया। प्रशासन के अनुसार, इन एजेंसियों ने उपलब्ध खुफिया जानकारी के आधार पर तथ्यों की समीक्षा की।

    चीन की ओर से इस आरोप पर तत्काल कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, अमेरिका और चीन के बीच पहले भी साइबर सुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और डेटा सुरक्षा को लेकर तनाव रहा है। दोनों देशों के बीच डिजिटल क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण मुद्दा बन चुकी है।

    अमेरिका में चुनावी सुरक्षा को लेकर यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है, जब दुनिया भर में साइबर हमलों और डिजिटल हस्तक्षेप के खतरे बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक चुनाव प्रणालियों की सुरक्षा के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे और लगातार निगरानी की आवश्यकता है।

  • अमेरिका की नई रणनीति में भारत अहम केंद्र, चीन के सूचना अभियान का मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया डिप्लोमेसी पर बढ़ेगा जोर

    अमेरिका की नई रणनीति में भारत अहम केंद्र, चीन के सूचना अभियान का मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया डिप्लोमेसी पर बढ़ेगा जोर

    नई दिल्ली । अमेरिका ने चीन के बढ़ते सूचना प्रभाव और डिजिटल अभियानों का मुकाबला करने के लिए अपनी पब्लिक डिप्लोमेसी रणनीति में बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। इस नई रणनीति में भारत को एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, वाशिंगटन अब पारंपरिक मीडिया माध्यमों के साथ-साथ सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए विदेशी नागरिकों तक अपनी पहुंच मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।

    अमेरिकी एजेंसी फॉर ग्लोबल मीडिया (यूएसएजीएम) का नेतृत्व करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से नामित सारा रोजर्स ने सीनेट फॉरेन रिलेशंस कमेटी के सामने अपनी रणनीति को लेकर जानकारी दी। उन्होंने कहा कि एशिया अमेरिका की प्राथमिकताओं में प्रमुख क्षेत्र होगा, क्योंकि चीन समेत कई देशों द्वारा चलाए जा रहे सूचना अभियानों का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

    रोजर्स ने कहा कि अमेरिका को बदलते मीडिया इस्तेमाल के तरीकों के अनुसार अपनी अंतरराष्ट्रीय संचार नीति को आधुनिक बनाना होगा। उन्होंने संकेत दिया कि अब केवल रेडियो और टेलीविजन प्रसारण पर निर्भर रहने के बजाय सोशल मीडिया, छोटे वीडियो, पॉडकास्ट और डिजिटल कम्युनिटी के माध्यम से लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने की जरूरत है।

    उन्होंने भारत और जापान जैसे देशों का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों के बीच संवाद का एक बड़ा माध्यम बन चुके हैं। इसी वजह से अमेरिका अपनी डिजिटल रणनीति के तहत इन क्षेत्रों में अधिक सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की योजना बना रहा है।

    अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि सूचना का क्षेत्र अब वैश्विक प्रतिस्पर्धा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। चीन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि मजबूत करने और अपने विचारों को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल करता रहा है। ऐसे में अमेरिका भी अपनी पहुंच और प्रभाव को बढ़ाने के लिए नई तकनीकों और डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लेना चाहता है।

    रोजर्स ने कहा कि यूएसएजीएम की प्राथमिकताओं में एजेंसी को अधिक प्रभावी बनाना, नेतृत्व को मजबूत करना और उसकी कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाना शामिल होगा। इसके अलावा उन्होंने रिसर्च क्षमता को बेहतर करने पर भी जोर दिया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि अमेरिकी संदेश कितने लोगों तक पहुंच रहे हैं और उनका प्रभाव कितना है।

    नई रणनीति के तहत अमेरिका उन देशों और क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहता है जहां स्वतंत्र जानकारी तक लोगों की पहुंच सीमित है। एशिया के अलावा मध्य पूर्व, ईरान, अफगानिस्तान और क्यूबा जैसे क्षेत्रों को भी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय प्रसारण रणनीति में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    भारत का महत्व अमेरिका के लिए केवल आर्थिक और रक्षा संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब सूचना और डिजिटल प्रभाव के क्षेत्र में भी बढ़ रहा है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी मजबूत होने के साथ ही डिजिटल संवाद और सार्वजनिक कूटनीति के नए रास्ते तलाशे जा रहे हैं।

    यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा व्यापार, तकनीक और सुरक्षा के साथ-साथ वैश्विक सूचना व्यवस्था के क्षेत्र में भी बढ़ रही है। अमेरिका की नई रणनीति का उद्देश्य डिजिटल माध्यमों के जरिए अपनी पहुंच को मजबूत करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने प्रभाव को बनाए रखना है।

  • चीन पर ईरान को पाकिस्तान के रास्ते हथियार भेजने के आरोप, ट्रंप बोले- ऐसा हुआ तो होगी निराशा

    चीन पर ईरान को पाकिस्तान के रास्ते हथियार भेजने के आरोप, ट्रंप बोले- ऐसा हुआ तो होगी निराशा

    नई दिल्ली । अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच हाल के महीनों में बढ़े तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा छेड़ दी है। दावा किया गया है कि चीन, पाकिस्तान के रास्ते ईरान को 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम (MANPADS) या रॉकेट लॉन्चर उपलब्ध कराने की तैयारी में है। इन दावों के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हैरानी जताते हुए कहा कि यदि चीन वास्तव में ईरान को हथियार उपलब्ध करा रहा है तो यह बेहद निराशाजनक होगा। दूसरी ओर चीन ने ऐसे सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।

    हालिया संघर्ष के बाद ईरान अपनी हवाई सुरक्षा प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहा है। इसी संदर्भ में यह दावा सामने आया कि ईरान ने चीन से 400 मैन-पोर्टेबल एयर डिफेंस सिस्टम खरीदने का समझौता किया है। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि इन हथियारों की आपूर्ति पाकिस्तान के माध्यम से गुप्त तरीके से की जा रही है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और चीन ने आधिकारिक तौर पर किसी भी प्रकार की सैन्य आपूर्ति से इनकार किया है।

    बताया जा रहा है कि इस कथित रक्षा सौदे का मूल्य लगभग 6 से 7 करोड़ डॉलर के बीच हो सकता है। यदि ऐसी कोई डील होती है तो इससे ईरान की कम दूरी की हवाई सुरक्षा क्षमता को मजबूती मिल सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि MANPADS जैसे सिस्टम कम ऊंचाई पर उड़ने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों और ड्रोन के खिलाफ प्रभावी माने जाते हैं। हालांकि इस पूरे मामले को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक दस्तावेज या सार्वजनिक प्रमाण सामने नहीं आया है।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन्हें पहले भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार उपलब्ध नहीं कराएगा। ट्रंप ने कहा कि यदि इन रिपोर्टों में सच्चाई है तो यह उनके लिए निराशाजनक होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई अप्रत्याशित घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन देशों के बीच किए गए भरोसे का सम्मान किया जाना चाहिए।

    चीन ने इन आरोपों का स्पष्ट रूप से खंडन करते हुए कहा है कि वह किसी भी अवैध हथियार आपूर्ति में शामिल नहीं है। चीन का कहना है कि उसकी विदेश नीति जिम्मेदार और संतुलित सिद्धांतों पर आधारित है तथा वह क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का पक्षधर है। ऐसे में सामने आए दावों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

    इस घटनाक्रम के बीच अमेरिका और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी चर्चा में बनी हुई है। ट्रंप ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिका इस तकनीकी दौड़ में चीन से आगे है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देशों के बीच तकनीकी, आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है।

    फिलहाल ईरान को कथित हथियार आपूर्ति से जुड़े दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। चीन इन आरोपों को नकार चुका है, जबकि अमेरिका ने इस मामले पर चिंता व्यक्त की है। आने वाले दिनों में यदि इस संबंध में कोई आधिकारिक जानकारी या अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसका प्रभाव क्षेत्रीय सुरक्षा और वैश्विक कूटनीतिक संबंधों पर भी पड़ सकता है।

  • भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    भारत-चीन रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने शीर्ष चीनी अधिकारियों से की कई महत्वपूर्ण बैठकें

    नई दिल्ली। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने के उद्देश्य से विदेश सचिव विक्रम मिस्री इन दिनों चीन की आधिकारिक यात्रा पर हैं। यात्रा के दौरान उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल (नेशनल एकेडमी ऑफ गवर्नेंस) के उपाध्यक्ष ली वेनतांग सहित कई वरिष्ठ अधिकारियों से महत्वपूर्ण मुलाकातें कीं। इन बैठकों में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने, शैक्षणिक आदान-प्रदान, राजनीतिक संवाद, आर्थिक संबंधों और सीमा क्षेत्रों में शांति एवं स्थिरता बनाए रखने जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।

    भारतीय दूतावास की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने मंगलवार को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सेंट्रल पार्टी स्कूल के उपाध्यक्ष ली वेनतांग से मुलाकात की। इस दौरान उन्हें संस्थान के ऐतिहासिक महत्व, बौद्धिक योगदान और विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। दोनों पक्षों ने भविष्य में अकादमिक सहयोग, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और संस्थागत आदान-प्रदान की संभावनाओं पर भी विचार-विमर्श किया। इस बैठक को दोनों देशों के बीच ज्ञान, प्रशासनिक अनुभव और संस्थागत सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इससे पहले विदेश सचिव ने चीन की विदेश उप मंत्री हुआ चुनयिंग के साथ भी विस्तृत वार्ता की। दोनों पक्षों ने भारत-चीन संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा करते हुए इस बात पर सहमति जताई कि सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखना द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। बैठक में दोनों देशों के नेताओं की उस साझा सोच को आगे बढ़ाने पर भी चर्चा हुई, जिसके तहत भारत और चीन को एक-दूसरे के विकास में सहयोगी और साझेदार के रूप में देखा गया है।

    वार्ता के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग को मजबूत बनाने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के उपायों पर भी विचार किया गया। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि पारस्परिक हितों के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाकर द्विपक्षीय संबंधों को और मजबूत किया जा सकता है। साथ ही संवाद और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए नियमित संपर्क बनाए रखने की आवश्यकता पर भी सहमति व्यक्त की गई।

    सोमवार को विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने चीन की 14वीं राष्ट्रीय जन राजनीतिक सलाहकार सम्मेलन (सीपीपीसीसी) की समिति के उप महासचिव होंग लियांग से भी मुलाकात की। इस बैठक में राजनीतिक स्तर पर संवाद को मजबूत करने और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के विभिन्न उपायों पर चर्चा हुई। दोनों पक्षों ने माना कि जनसंपर्क, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से आपसी समझ और विश्वास को और बेहतर बनाया जा सकता है।

    चीन यात्रा के पहले दिन विदेश सचिव ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सन हैयान से भी मुलाकात की। इस बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देने, राजनीतिक संवाद को आगे बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के नए अवसरों पर विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों के बीच हुई इन लगातार बैठकों को भारत और चीन के बीच संवाद प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि हाल के समय में दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने की कोशिशें क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और आपसी विश्वास को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। विदेश सचिव विक्रम मिस्री की यह यात्रा दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संपर्क बनाए रखने, मतभेदों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने और सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल मानी जा रही है।

  • समुद्र और आसमान दोनों मोर्चों पर सक्रिय हुआ चीन, दक्षिण चीन सागर में बढ़ी रणनीतिक हलचल..

    समुद्र और आसमान दोनों मोर्चों पर सक्रिय हुआ चीन, दक्षिण चीन सागर में बढ़ी रणनीतिक हलचल..

    नई दिल्ली । दक्षिण चीन सागर में एक बार फिर सैन्य गतिविधियां तेज होने से क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया है। चीन ने विवादित समुद्री क्षेत्र में अपनी नौसेना और वायुसेना की नियमित गश्त बढ़ाने की घोषणा की है। इस कदम को ऐसे समय में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब दुनिया के कई हिस्सों में समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से ही चर्चा का विषय बनी हुई है। चीन की इस कार्रवाई के बाद फिलीपींस सहित क्षेत्र के अन्य देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।

    चीनी सेना के दक्षिणी थिएटर कमांड ने बताया कि नौसेना और वायुसेना ने दक्षिण चीन सागर के विभिन्न हिस्सों में नियमित संयुक्त गश्त की है। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इन अभियानों का उद्देश्य समुद्री सीमाओं, क्षेत्रीय संप्रभुता और समुद्री अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। चीन ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी सैन्य गतिविधियां नियमित सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हैं और वह अपने दावों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाता रहेगा।

    चीन ने इस दौरान फिलीपींस पर भी आरोप लगाए हैं। उसका कहना है कि फिलीपींस बाहरी देशों के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य गश्त और सहयोग बढ़ा रहा है, जिससे क्षेत्र में तनाव और अस्थिरता पैदा हो रही है। चीनी अधिकारियों के अनुसार, ऐसे कदम दक्षिण चीन सागर में शांति बनाए रखने के प्रयासों के विपरीत हैं और इससे क्षेत्रीय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    दूसरी ओर, दक्षिण चीन सागर लंबे समय से कई देशों के बीच विवाद का केंद्र बना हुआ है। चीन लगभग पूरे समुद्री क्षेत्र पर अपना दावा करता है, जबकि फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान भी इसके विभिन्न हिस्सों पर अपने अधिकार का दावा करते हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र में समय-समय पर सैन्य गतिविधियां, गश्त और कूटनीतिक बयानबाजी तेज होती रहती है, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर भी इस इलाके पर बनी रहती है।

    इस विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2016 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने दक्षिण चीन सागर पर चीन के व्यापक दावों को कानूनी आधारहीन माना था। हालांकि चीन ने उस फैसले को स्वीकार नहीं किया और लगातार अपने दावे पर कायम रहा। इसके बाद से इस समुद्री क्षेत्र में कई बार दोनों पक्षों के जहाजों और विमानों के आमने-सामने आने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण चीन सागर वैश्विक व्यापार और समुद्री परिवहन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। दुनिया के बड़े हिस्से का समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां बढ़ने वाला कोई भी तनाव केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन पर भी पड़ सकता है।

    चीन की ताजा सैन्य गश्त ने यह संकेत दिया है कि वह विवादित समुद्री क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बनाए रखने की रणनीति पर कायम है। वहीं, क्षेत्रीय देशों की गतिविधियों और बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच दक्षिण चीन सागर एक बार फिर वैश्विक कूटनीति और सामरिक चर्चाओं का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। आने वाले समय में संबंधित देशों के बीच संवाद, सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक प्रयासों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।

  • भारत की दो टूक…. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भारतीय क्षेत्रों पर चीन ने कर रखा है अवैध कब्जा

    भारत की दो टूक…. जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भारतीय क्षेत्रों पर चीन ने कर रखा है अवैध कब्जा


    नई दिल्ली।
    भारत (India) ने दो टूक शब्दों में कहा है कि उसने कभी भी चीन (China) की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं किया है, उलटा चीन जम्मू और कश्मीर (Jammu and Kashmir) तथा लद्दाख (Ladakh) में भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्जा किए हुए है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल (Randhir Jaiswal) से शुक्रवार को मीडिया ब्रीफिंग में यह सवाल पूछा गया कि हाल ही में मनीला में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों की वार्ता के बाद चीन ने कहा है कि भारतीय विदेश मंत्री ने वार्ता के दौरान कहा कि ताइवान को लेकर भारत के रुख में बदलाव नहीं आया है और वह चीन की संप्रभुता का सम्मान करता है।

    प्रवक्ता जायसवाल ने स्पष्ट किया कि विदेश मंत्री ने साथ ही यह भी कहा कि भारत किसी भी प्रकार से चीन की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं करता है और वह चीन से भी इसी तरह के सम्मान की अपेक्षा करता है लेकिन चीन ने 1963 से भारतीय क्षेत्रों पर अवैध कब्जा कर रखा है।

    प्रवक्ता ने आगे कहा , “विदेश मंत्री ने कहा कि जब संप्रभुता के मुद्दों की बात आती है, तो वास्तव में भारत को ही उन्हें उठाना चाहिए और भारत उन्हें उठाता भी है। भारत किसी भी प्रकार से चीन की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं करता और इस मामले में लगातार एक समान रुख पर कायम रहा है। लेकिन चीन 1963 से जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख में भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्ज़ा किए हुए है, जहां भारत का अधिकार स्वयं चीन द्वारा भी आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है। इसके अतिरिक्त, जम्मू कश्मीर के उन क्षेत्रों में, जो भारत के हैं, चीन की परियोजनाएं चल रही हैं, और हम इसका विरोध करते हैं।” उल्लेखनीय है कि जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री के बीच मनीला में आसियान क्षेत्रीय मंच की बैठक से इतर द्विपक्षीय वार्ता हुई थी।


    ‘भारत जानबूझकर नहीं छोड़ रहा पानी’

    वहीं, भारत ने पाकिस्तान के मीडिया में आ रही इन रिपोर्टों को पूरी तरह से निराधार बताया है जिनमें, आरोप लगाया गया है कि भारत जानबूझकर पानी छोड़ कर पाकिस्तान में बाढ की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। भारत का कहना है कि चेनाब नदी में पानी की वृद्धि जम्मू और आसपास के क्षेत्रों में भारी मॉनसूनी बारिश का नतीजा है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को यहां मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि पाकिस्तानी मीडिया का यह आरोप कि भारत जानबूझकर पानी छोड़ कर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर रहा है , पूरी तरह से निराधार है। उन्होंने कहा कि 20 से 23 जुलाई के दौरान चेनाब नदी के बहाव में हाल ही में हुई वृद्धि, जम्मू और उसके आसपास केक्षेत्रों में हुई भारी मानसूनी बारिश का सीधा नतीजा है।

    बाढ़ पर विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?
    प्रवक्ता ने कहा कि गौर करने वाली बात यह है कि पाकिस्तान के लाहौर स्थित बाढ़ पूर्वानुमान विभाग ने 22 जुलाई को जारी अपनी बाढ़ चेतावनी में, चेनाब नदी में बाढ़ के ऊंचे स्तर का कारण ऊपरी जल क्षेत्र में हुई भारी बारिश को ही बताया था। इसमें यह भी कहा गया था कि मराला में पानी का तेज बहाव बना रहेगा और बारिश कम होने पर यह धीरे-धीरे घटेगा। जायसवाल ने कहा कि इसलिए, नदी के बहाव में यह वृद्धि भारी मानसूनी बारिश की एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया है न कि भारत द्वारा जानबूझकर उठाए गए कदम का नतीजा। मौसम की वजह से आई बाढ़ की इस घटना को ऊपरी क्षेत्र से की गई छेड़छाड़ के रूप में पेश करने की कोशिशें गलत और तकनीकी रूप से आधारहीन हैं। उन्होंने कहा कि यह पाकिस्तान की अपनी आधिकारिक बाढ़ चेतावनियों के भी विपरीत है।

  • ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी

    ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच संघर्ष जारी है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि चीन और रूस इस संघर्ष में ईरान की मदद नहीं करेंगे. हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर दोनों देश इसमें शामिल होते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

    डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि बीजिंग में हाल ही में हुई मुलाकात के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार नहीं देगा या बेचेगा, और न ही चीनी कंपनियों के जरिए ऐसा किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने भी उनसे कहा था कि रूस तेहरान को हथियार नहीं बेचेगा।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि मैं उन पर भरोसा करता हूं.’ उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि दोनों में से कोई भी देश इस टकराव में ईरान की मदद कर रहा है।

    रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप की यह टिप्पणी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के सांसदों को यह बताने के कुछ दिनों बाद आई है कि रूस और चीन ऐसे मामलों में शामिल थे, जो ईरान की कुछ गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे. हालांकि उन्होंने इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी।

    बताया जा रहा है कि गल्फ में CIA के ठिकानों पर हुए ईरानी हमलों के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही हैं कि क्या रूस ने टारगेटिंग इंफॉर्मेशन या ड्रोन तकनीक के जरिए ईरान की मदद की है. हालांकि, क्रेमलिन ने इस रिपोर्ट पर कोई भी कमेंट करने से इनकार कर दिया है।

  • चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह

    चीन में मकॉक बंदरों की कीमतों में उछाल, एक बंदर के लिए देने पड़ रहे ₹25 लाख से ज्यादा, जाने वजह


    नई दिल्ली। चीन में इन दिनों बंदरों की कीमतों में ऐसी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है कि वे सोने से भी ज्यादा महंगे साबित हो रहे हैं। खासतौर पर मकॉक बंदरों की मांग इतनी बढ़ गई है कि एक-एक बंदर की कीमत करीब 24 से 25 लाख रुपये तक पहुंच गई है। भारी कीमत चुकाने के बाद भी कई वैज्ञानिकों को ये बंदर आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

    इन बंदरों का इस्तेमाल नई दवाओं की खोज और मेडिकल रिसर्च में किया जाता है। हालांकि, कीमतों में अचानक आए इस उछाल के कारण कुछ शोधकर्ताओं को अपनी स्टडी तक रोकनी पड़ रही है।

    क्यों बढ़ी मकॉक बंदरों की कीमत?
    रिपोर्ट के अनुसार, गुआंगझोउ की जिनान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक गुओ शियांगयू दिमाग से जुड़ी गंभीर बीमारियों के लिए नॉन-ह्यूमन प्राइमेट मॉडल विकसित करने पर शोध कर रहे हैं। इसके लिए उनकी लैब में मकॉक बंदरों की जरूरत होती है, लेकिन अब इनकी बढ़ती कीमत और कमी के कारण शोध कार्य प्रभावित हो रहा है।

    चीनी नव वर्ष के बाद से लैब में इस्तेमाल होने वाले मकॉक बंदरों की कीमत लगातार बढ़ी है। वर्तमान में सप्लायर एक मकॉक बंदर के लिए करीब 1 लाख 80 हजार युआन, यानी लगभग 25 लाख 58 हजार 772 रुपये तक मांग रहे हैं।

    गुओ शियांगयू के मुताबिक, समस्या सिर्फ कीमत की नहीं है। कई बार इतनी अधिक रकम देने के बावजूद भी बंदर उपलब्ध नहीं हो पाते, क्योंकि मांग बहुत ज्यादा है और सप्लाई सीमित है। गुओ ग्वांगडोंग प्रोविंशियल की-लैबोरेटरी ऑफ नॉन-ह्यूमन प्राइमेट रिसर्च से जुड़े हैं।

    रिसर्च के लिए मकॉक बंदर ही क्यों जरूरी?
    वैज्ञानिकों के अनुसार, मकॉक बंदर इंसानों के सबसे करीब माने जाने वाले जीवों में शामिल हैं। इनके डीएनए और शरीर की जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती-जुलती है। इसी वजह से नई दवाओं और उपचारों की जांच के लिए इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है।

    गुओ ने बताया कि उनकी लैब को हर साल वैज्ञानिक अध्ययन के लिए करीब 30 से 50 बंदरों की जरूरत होती है। इनमें पैथोलॉजिकल और मॉलिक्यूलर बायोलॉजिकल एनालिसिस जैसे शोध शामिल हैं।

    चीन में दवा और बायोटेक उद्योग तेजी से विस्तार कर रहा है। चीनी सरकार नई दवाओं और बायोलॉजिकल मेडिसिन के विकास को बढ़ावा दे रही है। इसका उद्देश्य पश्चिमी देशों की दवा क्षेत्र में पकड़ को चुनौती देकर चीन को दुनिया का प्रमुख मेडिसिन हब बनाना है।

    दवा बनाने की प्रक्रिया में बंदरों की भूमिका
    किसी भी नई दवा को सीधे बाजार में लॉन्च नहीं किया जाता। पहले उसे प्रयोगशालाओं में जांचा जाता है और इसके बाद जानवरों पर परीक्षण किए जाते हैं, ताकि दवा के प्रभाव और सुरक्षा का आकलन किया जा सके। इन चरणों में सफल होने के बाद ही संबंधित अधिकारियों की अनुमति और सर्टिफिकेशन के बाद दवा बाजार में लाई जाती है।

    घटती संख्या बनी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती
    चीन ने पिछले कुछ वर्षों में बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है। देश में कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, हार्ट अटैक और ऑटोइम्यून जैसी बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं पर तेजी से काम हो रहा है।

    लेकिन मकॉक बंदरों की कमी अब वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। बढ़ती मांग के कारण जंगलों में इनकी संख्या पर भी असर पड़ रहा है। अनुमान है कि चीन में वर्ष 2025 से 2027 के बीच हर साल लैब रिसर्च के लिए करीब 49 हजार से 52 हजार बंदर ही उपलब्ध हो पाएंगे।