Tag: Cinema

  • अगस्त के बॉक्स ऑफिस पर बड़ा मुकाबला, आईएमडीबी की मोस्ट एंटिसिपेटेड लिस्ट में 'टॉक्सिक' ने मारी बाजी

    अगस्त के बॉक्स ऑफिस पर बड़ा मुकाबला, आईएमडीबी की मोस्ट एंटिसिपेटेड लिस्ट में 'टॉक्सिक' ने मारी बाजी

    नई दिल्ली । इस साल अगस्त के महीने में बॉक्स ऑफिस पर दो बड़ी एक्शन-थ्रिलर फिल्मों के बीच जोरदार टक्कर देखने को मिलने वाली है। सुपरस्टार यश की पैन-इंडिया एक्शन थ्रिलर ‘टॉक्सिक’ और इमरान हाशमी की बहुप्रतीक्षित डार्क रोमांटिक थ्रिलर ‘आवारापन 2’ दोनों ही इस महीने सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इन दोनों फिल्मों को लेकर दर्शकों के बीच काफी उत्साह बना हुआ है। हालांकि, फिल्म रेटिंग और रिव्यू प्लेटफॉर्म आईएमडीबी की मोस्ट एंटिसिपेटेड फिल्मों की ताजा सूची में यह स्पष्ट हो गया है कि फैंस किस फिल्म का ज्यादा बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

    आईएमडीबी की रियल-टाइम व्यूज के आधार पर तैयार की जाने वाली मोस्ट एंटिसिपेटेड फिल्मों की सूची में सुपरस्टार यश की ‘टॉक्सिक’ ने पहला स्थान हासिल किया है। वहीं, इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’ इस सूची में पांचवें नंबर पर काबिज है। ‘केजीएफ’ फ्रेंचाइजी की अपार सफलता के बाद सुपरस्टार यश की इस फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच जबरदस्त हाइप देखा जा रहा है। कई बार रिलीज डेट टलने की वजह से ‘टॉक्सिक’ को लेकर उत्सुकता और अधिक बढ़ गई है। गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी यह एक्शन क्राइम थ्रिलर फिल्म 26 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इस फिल्म में यश के साथ नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुकमणि वसंत जैसे बड़े कलाकार मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे।

    दूसरी ओर, इमरान हाशमी स्टारर ‘आवारापन 2’ 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तैयार है। नितिन कक्कड़ के निर्देशन में बन रही यह फिल्म साल 2007 में आई सुपरहिट कल्ट क्लासिक फिल्म ‘आवारापन’ का सीक्वल है। हालांकि, 2007 में रिलीज हुई मूल फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा सकी थी, लेकिन समय के साथ इसकी कहानी, संगीत और इमरान हाशमी के अभिनय ने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बना ली। 7.4 आईएमडीबी रेटिंग वाली इस फिल्म के सीक्वल का फैंस लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। ‘आवारापन 2’ में इमरान हाशमी के साथ दिशा पाटनी, शबाना आजमी, सलिल आचार्या, विजयंत कोहली और अतुल कुमार मुख्य किरदारों में दिखाई देंगे।

    अगस्त के महीने में इन दोनों फिल्मों की रिलीज से बॉक्स ऑफिस पर बड़े आंकड़े और जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है। एक तरफ जहां यश की ‘टॉक्सिक’ अपने बड़े कैनवास, अखिल भारतीय स्टारकास्ट और भारी-भरकम एक्शन के दम पर दर्शकों को आकर्षित कर रही है, वहीं ‘आवारापन 2’ अपने कल्ट सीक्वल स्टेटस, इमोशनल कनेक्ट और डार्क थ्रिलर कंटेंट के बल पर सिनेमाघरों में मजबूत पकड़ बनाने की तैयारी में है।

  • 'मेहर' के बाद नए सफर पर राज कुंद्रा, बोले- पंजाब की कई दमदार कहानियां अब भी पर्दे पर आना बाकी हैं

    'मेहर' के बाद नए सफर पर राज कुंद्रा, बोले- पंजाब की कई दमदार कहानियां अब भी पर्दे पर आना बाकी हैं

    नई दिल्ली । बिजनेसमैन और अभिनेता राज कुंद्रा अब पंजाबी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे हैं। अपनी पहली पंजाबी फिल्म ‘मेहर’ से अभिनय की शुरुआत करने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य केवल पर्दे पर दिखाई देना नहीं, बल्कि ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनना है जो समाज, संस्कृति और लोगों की भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से सामने ला सकें। उनका मानना है कि पंजाब की धरती में ऐसी अनेक प्रेरणादायक और वास्तविक कहानियां मौजूद हैं, जिन्हें अब तक बड़े पर्दे पर पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया है।

    राज कुंद्रा का कहना है कि किसी भी फिल्म की सफलता केवल उसके मनोरंजन मूल्य से नहीं आंकी जानी चाहिए, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वह दर्शकों तक किस तरह का संदेश पहुंचाती है। उनके अनुसार वे ऐसे विषयों को प्राथमिकता देना चाहते हैं जो वास्तविक परिस्थितियों, सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े हों। उनका मानना है कि मजबूत कहानी ही किसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत होती है और वही दर्शकों के साथ लंबे समय तक जुड़ाव बनाए रखती है।

    उन्होंने अपनी आगामी फिल्म ‘द ग्रेट पंजाब रॉबरी’ का जिक्र करते हुए बताया कि इस परियोजना का विचार काफी समय पहले तैयार हो गया था। यह फिल्म निर्देशक सौरभ वर्मा के साथ उनकी पहली फिल्म बनने वाली थी, लेकिन उस समय पर्याप्त आर्थिक सहयोग और निर्माता नहीं मिलने के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बावजूद उन्होंने इस कहानी पर भरोसा बनाए रखा और इसे छोड़ने के बजाय सही समय का इंतजार किया।

    राज कुंद्रा के अनुसार ‘मेहर’ के रिलीज होने के बाद परिस्थितियां बदलीं और कई निर्माता उनके साथ काम करने में रुचि दिखाने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक बार फिर ‘द ग्रेट पंजाब रॉबरी’ को लेकर बातचीत शुरू की। इस बार कई निर्माता इस प्रोजेक्ट से जुड़े और फिल्म को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया। उनका कहना है कि यदि कहानी दमदार हो तो उसे अपना मुकाम मिलने में देर हो सकती है, लेकिन वह अंततः दर्शकों तक जरूर पहुंचती है।

    उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनकी भविष्य की योजनाएं केवल पंजाबी सिनेमा तक सीमित नहीं रहेंगी। ‘द ग्रेट पंजाब रॉबरी’ के बाद वह अपने होम प्रोडक्शन के बैनर तले एक नई फिल्म लेकर आएंगे। इस फिल्म की योजना पूरे देश के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है और इसे पैन इंडिया स्तर पर रिलीज करने की तैयारी है। उनका उद्देश्य क्षेत्रीय विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करना है ताकि अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के दर्शक भी इन कहानियों से जुड़ सकें।

    राज कुंद्रा का मानना है कि भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय फिल्मों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। दर्शक अब नई कहानियों, स्थानीय संस्कृति और वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को अधिक पसंद कर रहे हैं। ऐसे में पंजाब की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित विषयों को बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने की काफी संभावनाएं हैं। उनका विश्वास है कि यदि इन कहानियों को ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा जाए तो वे न केवल मनोरंजन करेंगी, बल्कि समाज में सकारात्मक चर्चा का भी माध्यम बनेंगी।

  • भारतीय सिनेमा में छात्र राजनीति और सामाजिक क्रांति को दर्शाती प्रमुख फिल्में..

    भारतीय सिनेमा में छात्र राजनीति और सामाजिक क्रांति को दर्शाती प्रमुख फिल्में..


    नई दिल्ली ।
    देश भर में वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था, प्रवेश परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विमर्श छिड़ा हुआ है। इस माहौल के बीच भारतीय सिनेमा के उस दौर की चर्चा पुनः तेज हो गई है, जिसने छात्रों के आक्रोश, उनके सामाजिक संघर्ष और व्यवस्था विरोधी आंदोलनों को बड़े पर्दे पर अत्यंत यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया था। बॉलीवुड में निर्मित कई ऐसी फिल्में रही हैं, जिन्होंने केवल बॉक्स ऑफिस पर व्यावसायिक सफलता ही हासिल नहीं की, बल्कि समाज में राजनीतिक चेतना और छात्र राजनीति के प्रभाव को भी रेखांकित किया।

    छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों में वर्ष 2006 में आई ‘रंग दे बसंती’ को सबसे प्रभावशाली रचना माना जाता है। इस फिल्म में कॉलेज के बेफिक्र युवाओं द्वारा भ्रष्ट शासन तंत्र के खिलाफ उठाई गई आवाज और उसके एक बड़े जनआंदोलन में बदलने की प्रक्रिया को दिखाया गया है। इसी प्रकार, मणिरत्नम द्वारा निर्देशित फिल्म ‘युवा’ छात्र राजनीति के सकारात्मक पहलू और युवाओं की सीधे शासन प्रणाली में भागीदारी को प्रेरित करती है। वहीं, 1970 के दशक की राजनीतिक हलचलों और सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्रों के वैचारिक संघर्ष पर आधारित ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ ने युवा चेतना के गंभीर पक्षों को उजागर किया है।

    विश्वविद्यालयों के भीतर पनपने वाली चुनावी राजनीति, हिंसा और सत्ता के संघर्ष को अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ और तिग्मांशु धूलिया की ‘हासिल’ जैसी फिल्मों में बेहद यथार्थवादी तरीके से दर्शाया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर केंद्रित ‘हासिल’ यह स्पष्ट करती है कि किस तरह शैक्षणिक संस्थानों में छात्र संघ चुनाव बाहुबल और अपराध से प्रभावित होकर युवाओं के भविष्य को दिशाहीन कर देते हैं। ये फिल्में दिखाती हैं कि छात्र आंदोलन केवल आदर्शवाद तक सीमित न रहकर कई बार जटिल राजनीतिक ताने-बाने में भी उलझ जाते हैं।

    सामाजिक न्याय और नीतिगत निर्णयों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक छात्र आंदोलनों को भी सिनेमा ने अपनी विषय-वस्तु बनाया है। प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ जहां शिक्षा प्रणाली और आरक्षण नीति के सामाजिक प्रभाव पर प्रकाश डालती है, वहीं फिल्म ‘हुड़दंग’ 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के विरोध में हुए देशव्यापी छात्र प्रदर्शनों को दर्शाती है। आज के दौर में जब युवा वर्ग अपनी मांगों को लेकर मुखर है, तब ये फिल्में यह साबित करती हैं कि सिनेमा ने हमेशा से समाज और युवाओं के वास्तविक संघर्षों को एक सशक्त माध्यम प्रदान किया है।

  • भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार स्मिता पाटिल के असमय निधन की कहानी आज भी कला जगत को झकझोर देती है। समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा दोनों में अपनी सशक्त अदाकारी की छाप छोड़ने वाली इस महान अभिनेत्री की जीवन यात्रा बेहद दर्दनाक परिस्थितियों में समाप्त हुई थी। वर्ष 1986 में अपने पहले बच्चे के जन्म के ठीक दो सप्ताह बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका निधन हो गया था। प्रसव के बाद शरीर में फैले घातक संक्रमण और सही समय पर चिकित्सीय सलाह न लेने की वजह से उनकी स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी।

    पुत्र के जन्म के बाद परिवार में खुशियों का माहौल था, लेकिन प्रसवोत्तर संक्रमण ने अभिनेत्री को अपनी चपेट में ले लिया था। शुरुआती दौर में स्वास्थ्य में आ रही गिरावट को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज किया गया, जिससे संक्रमण धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलता चला गया। स्थानीय चिकित्सकों द्वारा प्राथमिक उपचार और ड्रिप दिए जाने के बावजूद उनके शरीर का तापमान लगातार बढ़ता रहा। अपने नवजात शिशु के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वे अस्पताल जाने से बचती रहीं, जिससे स्थिति लगातार नियंत्रण से बाहर होती चली गई।

    निधन वाले दिन अभिनेत्री की स्थिति में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई। शाम के समय उनका चेहरा पीला पड़ने लगा और उन्हें लगातार खून की उल्टियां होने लगीं। गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल मुंबई के जसलोक अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक वे कोमा की स्थिति में जा चुकी थीं। विशेषज्ञों की टीम ने उन्हें बचाने के भरसक प्रयास किए और स्थिति को संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के डॉक्टरों से भी संपर्क साधने की कोशिशें की गईं, परंतु संक्रमण मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका था।

    अस्पताल में भर्ती कराए जाने के कुछ ही घंटों भीतर आंतरिक रक्तस्राव और अंगों के काम न करने की वजह से स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। अंततः देर रात चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। केवल इकत्तीस वर्ष की आयु में स्मिता पाटिल का इस तरह अचानक चले जाना संपूर्ण भारतीय फिल्म उद्योग के लिए एक कभी न पूरा होने वाला घाटा था। उनके निधन के बाद उनके नवजात शिशु का पालन-पोषण उनके माता-पिता द्वारा किया गया, जबकि भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को आज भी अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है।

  • भारतीय सिनेमा के इतिहास में चेतन आनंद का अनूठा प्रयोग: कान्स फिल्म फेस्टिवल से लेकर काव्यात्मक संवादों तक दर्ज की अमिट छाप

    भारतीय सिनेमा के इतिहास में चेतन आनंद का अनूठा प्रयोग: कान्स फिल्म फेस्टिवल से लेकर काव्यात्मक संवादों तक दर्ज की अमिट छाप

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में प्रयोगधर्मिता और रचनात्मकता के कई दौर आए हैं, लेकिन सत्तर के दशक में किया गया एक अनोखा प्रयोग आज भी फिल्म समीक्षकों और दर्शकों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। उस दौर में जब बॉलीवुड के निर्देशक पारंपरिक ढर्रे से अलग हटकर कुछ नया करने का प्रयास कर रहे थे, तब एक ऐसी फिल्म का निर्माण हुआ जिसके सभी संवाद पूरी तरह से काव्यात्मक थे। आज के दौर में जहां दर्शक यथार्थवादी और प्रामाणिक सिनेमा की मांग करते हैं, वहीं वर्ष 1970 में रिलीज हुई इस फिल्म में किरदारों का आपस में केवल शायरी और कविता के माध्यम से बात करना उस समय एक बड़ा जोखिम माना जा रहा था। इसके बावजूद, इस अनूठे प्रयोग ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़े, बल्कि एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसे आज तक कोई दूसरा फिल्मकार दोहरा नहीं सका है।

    इस ऐतिहासिक और अनूठी फिल्म के निर्माण के पीछे भारतीय सिनेमा के दिग्गज निर्देशक चेतन आनंद का विजन था। चेतन आनंद को अक्सर लोग केवल प्रसिद्ध अभिनेता देव आनंद के भाई के रूप में याद करते हैं, जबकि हकीकत यह है कि वह स्वयं वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले एक महान फिल्मकार थे। उनकी निर्देशकीय क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे भी उन्हें अपनी प्रेरणा मानते थे। चेतन आनंद ने वर्ष 1946 में अपनी फिल्म नीचा नगर के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर वह ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी, जिसे आज तक कोई दूसरी हिंदी फिल्म हासिल नहीं कर सकी है। उनकी इस कलात्मक प्रस्तुति को प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल में सर्वोच्च सम्मान यानी ग्रैंड प्राइज से नवाजा गया था, जिसने वैश्विक स्तर पर भारतीय सिनेमा की पहचान बनाई थी।

    कान्स फिल्म फेस्टिवल में मिली इस अभूतपूर्व कामयाबी के बाद सत्यजीत रे ने स्वयं चेतन आनंद को पत्र लिखकर यह स्वीकार किया था कि इस वैश्विक सम्मान ने ही उन्हें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरने का हौसला दिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाने के बाद चेतन आनंद ने सिनेमाई दुनिया में एक और नया मील का पत्थर स्थापित करने का संकल्प लिया। उन्होंने एक ऐसी प्रेम कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया, जिसका पूरा स्क्रीनप्ले और हर एक संवाद साधारण बोलचाल के बजाय कविता की शक्ल में हो। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए उन्होंने फिल्म उद्योग के सबसे दिग्गज और गंभीर अभिनेताओं को अनुबंधित किया, जिनमें राज कुमार, पृथ्वीराज कपूर और प्राण जैसे दिग्गज नाम शामिल थे। इन दिग्गज कलाकारों के अभिनय और काव्यात्मक संवादों के अनूठे संगम ने पर्दे पर एक जादुई माहौल तैयार कर दिया था।

    चेतन आनंद अपनी फिल्मों में वास्तविकता और दृश्यों की प्रामाणिकता को लेकर बेहद गंभीर रहते थे। इस फिल्म के एक खास दृश्य के लिए उन्हें सरसों के खेतों की प्राकृतिक लाइटिंग और पीले रंग के बैकग्राउंड की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने स्थानीय किसानों को अतिरिक्त धन राशि देकर समय से पहले सरसों की फसल उगाने का आग्रह किया था, ताकि फिल्म की शूटिंग के दौरान प्राकृतिक दृश्य बिल्कुल सटीक मिल सकें। मूल रूप से यह फिल्म लगभग तीन घंटे से अधिक लंबी तैयार हुई थी, लेकिन संपादन की मेज पर इसे दर्शकों के अनुकूल चुस्त रखते हुए दो घंटे बीस मिनट का किया गया। जब यह फिल्म हीर रांझा के नाम से सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इसके अनोखे प्रारूप को देखकर शुरुआत में लोग चौंक गए, लेकिन देखते ही देखते इसने कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और आज भी यह भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और लीक से हटकर बनी फिल्मों में शीर्ष पर गिनी जाती है।

  • 44 साल के अभिनय सफर के बाद भी नई कहानियों की तलाश में अनु कपूर, 'उत्तर का पुत्तर' से फिर दिखेगा दिल्ली और संवेदनाओं का अनोखा संगम

    44 साल के अभिनय सफर के बाद भी नई कहानियों की तलाश में अनु कपूर, 'उत्तर का पुत्तर' से फिर दिखेगा दिल्ली और संवेदनाओं का अनोखा संगम

    नई दिल्ली । वरिष्ठ अभिनेता अनु कपूर अपनी आगामी फिल्म ‘उत्तर का पुत्तर’ के माध्यम से एक बार फिर ऐसे किरदार में दिखाई देंगे, जो मनोरंजन के साथ जीवन का सार्थक संदेश भी प्रस्तुत करता है। इस फिल्म में वह एक अनुभवी भौतिकी शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं, जो विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराता है, लेकिन निजी जीवन में वास्तु सिद्धांतों पर गहरा विश्वास रखता है। कहानी इसी विश्वास और वास्तविक जीवन के बीच पैदा होने वाली परिस्थितियों को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत करती है।

    अनु कपूर का कहना है कि फिल्म की कहानी पढ़ते ही उन्हें महसूस हुआ कि यह आम लोगों की सोच और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हुई है। उनके अनुसार कई लोग जीवन की समस्याओं का समाधान बाहरी परिस्थितियों, दिशाओं या मान्यताओं में खोजते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन व्यक्ति के विचार, निर्णय और कर्म से आता है। यही संदेश फिल्म को अलग पहचान देता है और इसी कारण उन्होंने इस परियोजना का हिस्सा बनने का निर्णय लिया।

    उन्होंने बताया कि उनका किरदार विज्ञान का शिक्षक होने के बावजूद वास्तु में विश्वास रखता है। यह विरोधाभास ही कहानी को रोचक बनाता है। फिल्म किसी की आस्था का उपहास नहीं उड़ाती, बल्कि यह दिखाने का प्रयास करती है कि विश्वास अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन सफलता और संतुलित जीवन का आधार ईमानदार प्रयास, सकारात्मक सोच और सही निर्णय ही होते हैं।

    लगभग चार दशक से अधिक लंबे अभिनय करियर में अनु कपूर ने अनेक यादगार फिल्मों में विविध भूमिकाएं निभाई हैं। उनका मानना है कि दर्शकों तक वही कहानियां सबसे अधिक पहुंचती हैं जिनमें मनोरंजन के साथ विचार करने की प्रेरणा भी हो। उनके अनुसार ‘उत्तर का पुत्तर’ भी हास्य के माध्यम से एक गंभीर सामाजिक संदेश देने का प्रयास करती है, जिससे हर वर्ग का दर्शक स्वयं को जोड़ सकेगा।

    फिल्म का बड़ा हिस्सा दिल्ली के प्रमुख स्थलों पर फिल्माया गया है। शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को कहानी के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़ा गया है। करोल बाग, कनॉट प्लेस, इंडिया गेट, कुतुब मीनार और अन्य प्रसिद्ध स्थानों की झलक फिल्म को वास्तविक वातावरण प्रदान करती है। निर्माताओं का मानना है कि दिल्ली की जीवंत ऊर्जा और स्थानीय परिवेश कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।

    अनु कपूर के लिए दिल्ली केवल एक शहर नहीं बल्कि उनके अभिनय जीवन की महत्वपूर्ण शुरुआत का केंद्र भी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बिताए गए वर्षों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वहीं से उन्हें अभिनय की बारीकियां, अनुशासन और जीवन को गहराई से समझने की सीख मिली। मंडी हाउस, बंगाली मार्केट और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी अनेक यादें आज भी उनके मन में ताजा हैं और हर बार दिल्ली लौटने पर वे फिर जीवंत हो उठती हैं।

    उन्होंने कहा कि रंगमंच के दिनों में लोगों के व्यवहार, भावनाओं और समाज को करीब से देखने का अवसर मिला, जिसने उनके अभिनय को नई दिशा दी। यही अनुभव आज भी हर नए किरदार को निभाने में उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बनते हैं। उनका मानना है कि एक कलाकार के लिए निरंतर सीखना और स्वयं को नए विषयों के अनुरूप ढालना सबसे महत्वपूर्ण होता है।

    फिल्म ‘उत्तर का पुत्तर’ 24 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। निर्माताओं को उम्मीद है कि पारिवारिक मनोरंजन, हल्के हास्य और सकारात्मक संदेश का यह मिश्रण दर्शकों को पसंद आएगा। साथ ही दिल्ली की खूबसूरत लोकेशन और अनु कपूर का अनुभवी अभिनय फिल्म को एक अलग पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

  • आगामी फिल्म 'टॉक्सिक' की रिलीज से पहले सुपरस्टार यश का पुराना पारिवारिक बयान इंटरनेट पर वायरल, सोशल मीडिया पर सिनेमाई मर्यादा और लैंगिक भेदभाव को लेकर छिड़ी बड़ी बहस

    आगामी फिल्म 'टॉक्सिक' की रिलीज से पहले सुपरस्टार यश का पुराना पारिवारिक बयान इंटरनेट पर वायरल, सोशल मीडिया पर सिनेमाई मर्यादा और लैंगिक भेदभाव को लेकर छिड़ी बड़ी बहस

    नई दिल्ली । कन्नड़ सिनेमा से निकलकर देशव्यापी पहचान बनाने वाले सुपरस्टार यश इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘टॉक्सिक’ को लेकर लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं। हाल ही में इस बहुप्रतीक्षित फिल्म का टीजर रिलीज होने के बाद से ही अभिनेता को लेकर सोशल मीडिया पर प्रशंसकों और सिनेमा प्रेमियों के बीच जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है। हालांकि, फिल्म की चर्चाओं के बीच अभिनेता का एक दशक पुराना बयान इंटरनेट पर अचानक दोबारा वायरल हो गया है, जिसने फिल्म जगत और दर्शकों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

    यह पूरा मामला साल 2014 का है, जब अभिनेता यश ने मशहूर टॉक शो ‘वीकेंड विद रमेश’ में शिरकत की थी। इस बातचीत के दौरान उन्होंने फिल्मों में अपनी सीमाओं, ऑन-स्क्रीन रोमांटिक दृश्यों और अपने पारिवारिक मूल्यों को लेकर खुलकर बात की थी। उस समय दिए गए अपने इंटरव्यू में यश ने स्वीकार किया था कि सेट पर रोमांटिक सीन फिल्माते समय वह काफी असहज और नर्वस हो जाते थे। उन्होंने मजाकिया लहजे में यह भी बताया था कि उनके इन दृश्यों को देखकर उनकी पत्नी राधिका और खुद उनकी मां भी उन पर हंसती थीं और कहती थीं कि उन्हें ठीक से रोमांस करना नहीं आता।

    इसी टॉक शो के दौरान यश ने एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत का जिक्र किया था, जिसे वह अपने अभिनय करियर में हमेशा लागू करते हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि वह आज भी जीवन में एक कड़ा नियम फॉलो करते हैं कि अगर वह किसी दृश्य को अपने माता-पिता के साथ बैठकर आराम से नहीं देख सकते, तो वह वैसा सीन स्क्रीन पर कभी नहीं करेंगे। उनका मानना था कि जिन दृश्यों को देखकर अभिनेता स्वयं या उसका परिवार असहज हो, उससे आम दर्शकों को भी परदे पर देखते समय निश्चित रूप से असहजता महसूस होती है।

    अब जबकि फिल्म ‘टॉक्सिक’ का टीजर दर्शकों के सामने आ चुका है, तो यश के इसी पुराने बयान के स्क्रीनशॉट और वीडियो क्लिप सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से प्रसारित हो रहे हैं। इंटरनेट यूजर्स इस बयान को उनकी नई फिल्म के संदर्भ से जोड़कर देख रहे हैं। कुछ प्रशंसकों का कहना है कि यश हमेशा से अपनी फिल्मों की पारिवारिक मर्यादा को लेकर बेहद सतर्क रहे हैं और वे ‘टॉक्सिक’ में भी अपने इसी पुराने वादे और मूल्यों पर कायम रहेंगे।

    दूसरी तरफ, इस पुराने बयान के दोबारा सामने आने से इंटरनेट पर एक अलग सामाजिक और लैंगिक बहस भी शुरू हो गई है। सोशल मीडिया पर यूजर्स का एक धड़ा इस फिल्म से जुड़ी उनकी सह-कलाकार कियारा आडवाणी को लेकर की जा रही टिप्पणियों और आलोचनाओं पर सवाल उठा रहा है। कई यूजर्स ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि जब यश खुद किसी फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रहे हैं और बोल्ड या एक्शन दृश्यों का हिस्सा बनते हैं, तो समाज उनके पारिवारिक जीवन, उनकी शादी या उनके बच्चों को लेकर कोई सवाल नहीं उठाता।

    इस पूरे घटनाक्रम पर टिप्पणी करते हुए कई सोशल मीडिया यूजर्स ने मनोरंजन उद्योग में आज भी मौजूद दोहरे मापदंडों को रेखांकित किया है। लोगों का कहना है कि यश के शादीशुदा और दो बच्चों के पिता होने के बावजूद समाज पुरुषों से उनके ऑन-स्क्रीन किरदारों को लेकर कम सवाल पूछता है, जबकि महिला अभिनेत्रियों को उनके दृश्यों के लिए आज भी अधिक जज किया जाता है। फिलहाल, ‘टॉक्सिक’ की रिलीज से पहले वायरल हुआ यह बयान फिल्म के प्रचार के साथ-साथ सिनेमा में कलाकारों की व्यक्तिगत सीमाओं और सामाजिक दृष्टिकोण पर विचार करने का एक नया जरिया बन गया है।

  • अजय देवगन की आगामी फिल्म 'चौहान' के टीज़र पर बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद, श्रीनगर के सांसद और क्षत्रिय संगठन ने जताई कड़ी आपत्ति

    अजय देवगन की आगामी फिल्म 'चौहान' के टीज़र पर बढ़ा राजनीतिक और सामाजिक विवाद, श्रीनगर के सांसद और क्षत्रिय संगठन ने जताई कड़ी आपत्ति

    नई दिल्ली । बॉलीवुड अभिनेता अजय देवगन की आगामी एक्शन फिल्म ‘चौहान’ अपने आधिकारिक घोषणा वीडियो के रिलीज होते ही बड़े विवादों के केंद्र में आ गई है। फिल्म के शुरुआती टीज़र में अजय देवगन को एक सैन्य अधिकारी के रूप में दिखाया गया है, जो कश्मीर में कानून-व्यवस्था और पत्थरबाजी की घटनाओं से निपटता नजर आ रहा है। इस वीडियो में दिखाए गए कुछ दृश्यों और संवादों ने राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों में भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है। विशेष रूप से कश्मीर की संवेदनशीलता और राजपूत समुदाय की ऐतिहासिक विरासत को लेकर फिल्म के निर्माताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुख्यधारा के सिनेमा में संवेदनशील मुद्दों के प्रस्तुतीकरण को लेकर यह विवाद अब गहराता जा रहा है।

    फिल्म के टीज़र में कश्मीरी युवाओं द्वारा की जाने वाली पत्थरबाजी और उसके जवाब में सुरक्षा बलों की कार्रवाई को जिस अंदाज में प्रस्तुत किया गया है, उसने स्थानीय जनप्रतिनिधियों को नाराज कर दिया है। श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि फिल्म में दिखाए गए पैलेट गन और सैन्य बल के दृश्य कश्मीर के लोगों के पुराने जख्मों और दर्दनाक अतीत को हरा करने वाले हैं। उन्होंने मुख्यधारा के सिनेमा की आलोचना करते हुए कहा कि कश्मीर के दर्द और वहां की त्रासदी का इस्तेमाल केवल व्यावसायिक और मनोरंजन के उद्देश्यों के लिए एक एक्शन बैकग्राउंड के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसके लिए संवेदनशीलता और गरिमा की आवश्यकता है।

    इस फिल्म को लेकर विवाद केवल कश्मीर की छवि तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया है। ‘क्षत्रिय परिषद’ नामक एक प्रमुख संगठन ने फिल्म के शीर्षक और उसमें क्षत्रिय पहचान के इस्तेमाल पर आधिकारिक तौर पर आपत्ति दर्ज कराई है। संगठन का आरोप है कि फिल्म निर्माता नीरज यादव और अभिनेता अजय देवगन राजनीतिक व वैचारिक हितों के लिए चौहान वंश के ऐतिहासिक गौरव का अनुचित उपयोग कर रहे हैं। क्षत्रिय परिषद ने अपने बयान में स्पष्ट किया है कि राजपूत इतिहास संपूर्ण देश की धरोहर है और इसे किसी सांप्रदायिक विमर्श, चुनावी लाभ या व्यावसायिक फिल्म का हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

    यह विवाद इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि इसने अजय देवगन की ही पूर्व में आई फिल्म ‘सिंघम अगेन’ की यादें ताजा कर दी हैं, जिसमें कश्मीर की एक बिलकुल अलग और सकारात्मक तस्वीर पेश की थी। उस फिल्म में कश्मीर के युवाओं को विकास, शांति और देश के साथ चलते हुए दिखाया गया था, जिसकी दर्शकों और समीक्षकों ने काफी सराहना की थी। वहीं, दूसरी ओर ‘चौहान’ में फिर से उसी पुरानी और नकारात्मक छवि को उभारा गया है, जिसे लेकर कश्मीरी समाज लंबे समय से असहज रहा है। एक ही अभिनेता द्वारा कश्मीर की दो विपरीत छवियों को पर्दे पर उतारने के इस विरोधाभास ने भी विश्लेषकों का ध्यान खींचा है।

    वर्तमान में फिल्म ‘चौहान’ का केवल शुरुआती प्रचार वीडियो ही सामने आया है और इसकी पूरी शूटिंग तथा निर्माण कार्य होना अभी बाकी है। ऐसे में फिल्म उद्योग के जानकारों का मानना है कि निर्माताओं को व्यावसायिक सफलता और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच एक बारीक संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी। राष्ट्रवाद और वीरता के नाम पर बनने वाली फिल्मों में ऐतिहासिक तथ्यों और क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान करना बेहद जरूरी माना जाता है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस बढ़ते देशव्यापी विवाद के बाद फिल्म के निर्माता-निर्देशक अपनी कहानी और दृश्यों की प्रस्तुतीकरण शैली में किसी प्रकार का बदलाव करते हैं या नहीं।

  • भारतीय सिनेमा का गौरव: पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्रियां, कला के क्षेत्र में अमूल्य योगदान की पूरी सूची

    भारतीय सिनेमा का गौरव: पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्रियां, कला के क्षेत्र में अमूल्य योगदान की पूरी सूची

    नई दिल्ली। भारतीय फिल्म जगत यानी बॉलीवुड में ऐसे कई प्रतिभावान कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपने बेहतरीन अभिनय और कला के प्रति समर्पण से न केवल दर्शकों के दिलों में जगह बनाई, बल्कि देश का नाम भी रोशन किया है। सिनेमा के क्षेत्र में उत्कृष्ट और अमूल्य योगदान देने वाले इन सितारों को भारत सरकार द्वारा समय-समय पर देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से अलंकृत किया गया है। इस प्रतिष्ठित सूची में फिल्म उद्योग की कई ऐसी दिग्गज अभिनेत्रियों के नाम शामिल हैं, जिन्होंने अपनी कलात्मक यात्रा से भारतीय सिनेमा को एक नया आयाम दिया है। इनमें से कुछ अभिनेत्रियां आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत हमेशा अमर रहेगी।

    इस प्रतिष्ठित सम्मान को पाने वाली अभिनेत्रियों में बॉलीवुड की ‘ड्रीम गर्ल’ कही जाने वाली हेमा मालिनी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अपनी बेहतरीन अदाकारी और नृत्य कला के लिए प्रसिद्ध हेमा मालिनी को भारत सरकार द्वारा साल 2000 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। वहीं, हिंदी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार मानी जाने वाली दिवंगत अभिनेत्री श्रीदेवी को कला के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए साल 2013 में इस गौरवपूर्ण नागरिक सम्मान से नवाजा गया था। भले ही वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी ब्लॉकबस्टर फिल्में आज भी सिनेप्रेमियों के दिलों में जिंदा हैं।

    समीक्षकों द्वारा सराहे गए अभिनय और अपनी बेबाक शैली के लिए जानी जाने वाली अभिनेत्री और निर्माता कंगना रनौत को साल 2020 में पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किया गया था। सत्तर और अस्सी के दशक की अपनी संजीदा अदाकारी से समां बांधने वाली सदाबहार अभिनेत्री रेखा को साल 2010 में इस सम्मान से विभूषित किया गया था। उन्होंने ‘उमराव जान’ और ‘खूबसूरत’ जैसी यादगार फिल्मों में दमदार भूमिकाएं निभाई हैं। नब्बे के दशक की लोकप्रिय और सफल अभिनेत्रियों में शामिल रवीना टंडन को हाल ही में वर्ष 2023 में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा इस राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

    अपनी खूबसूरती और बेहतरीन अभिनय क्षमता के बल पर वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने वाली पूर्व विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय बच्चन को साल 2009 में पद्म श्री की उपाधि दी गई थी। वहीं, लीक से हटकर किरदारों को पर्दे पर जीवंत करने वाली सशक्त अभिनेत्री विद्या बालन को साल 2014 में इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त, बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक अपनी कला का परचम लहराने वाली ग्लोबल आइकन प्रियंका चोपड़ा को साल 2016 में भारत सरकार द्वारा पद्म श्री पुरस्कार से अलंकृत किया गया था।

    गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं को सहजता से निभाने वाली उत्कृष्ट अभिनेत्री तब्बू और अपनी चुलबुली अदाकारी से करोड़ों फैंस के दिलों पर राज करने वाली अभिनेत्री काजोल को साल 2011 में एक साथ इस सर्वोच्च सम्मान के लिए चुना गया था। अपने जमाने की बेहद खूबसूरत और बोल्ड अभिनेत्री मानी जाने वाली शर्मिला टैगोर को सिनेमाई दुनिया में उनके विशेष योगदान हेतु साल 2005 में इस उपाधि से विभूषित किया गया था। इस सूची में भारतीय समानांतर सिनेमा की मजबूत स्तंभ रहीं दिवंगत अभिनेत्री स्मिता पाटिल का नाम भी शामिल है, जिन्हें बहुत कम उम्र में, साल 1985 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। कला जगत में इन सभी महिलाओं का योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा स्रोत बना रहेगा।

  • अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की ब्लॉकबस्टर जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर रचा था इतिहास, इन ९ फिल्मों में साथ आकर दर्शकों को बनाया दीवाना

    अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की ब्लॉकबस्टर जोड़ी ने बॉक्स ऑफिस पर रचा था इतिहास, इन ९ फिल्मों में साथ आकर दर्शकों को बनाया दीवाना


    नई दिल्ली ।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे प्रतिष्ठित और स्क्रीन पर तहलका मचाने वाली जोड़ियों का जिक्र होता है, तो अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र का नाम सबसे पहले जेहन में आता है। सत्तर और अस्सी के दशक में इन दोनों दिग्गज कलाकारों ने बॉक्स ऑफिस पर ऐसा चमत्कारी तालमेल दिखाया कि डिस्ट्रीब्यूटर्स और दर्शकों के बीच यह माना जाने लगा था कि जिस फिल्म में ये दोनों साथ हैं, उसका सुपरहिट होना तय है। इस ब्लॉकबस्टर जोड़ी की लोकप्रियता का आलम यह था कि इनकी एक कल्ट क्लासिक फिल्म रिलीज के बाद लगातार पांच सालों तक सिनेमाघरों से नहीं उतरी थी, जो अपने आप में एक अटूट कीर्तिमान है। इन दोनों महानायकों ने मुख्य भूमिकाओं से लेकर खास कैमियो रोल्स तक, कुल ९ फिल्मों में एक साथ स्क्रीन शेयर कर सिल्वर स्क्रीन पर अपनी दोस्ती और अभिनय का लोहा मनवाया।

    इस बेमिसाल जोड़ी के करियर और हिंदी सिनेमा के इतिहास में साल १९७५ में आई फिल्म ‘शोले’ एक मील का पत्थर साबित हुई। निर्देशक रमेश सिप्पी की इस एक्शन-ड्रामा फिल्म में जय और वीरू के किरदारों में अमिताभ और धर्मेंद्र ने जिगरी दोस्ती की ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, जो आज आधी सदी बीत जाने के बाद भी मुहावरा बनी हुई है। यह फिल्म न केवल उस दौर की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी, बल्कि मुंबई के मिनर्वा थिएटर में लगातार पांच सालों तक चलकर इसने इतिहास रच दिया। इसी साल इस सुपरहिट जोड़ी की एक और क्लासिक फिल्म ‘चुपके चुपके’ रिलीज हुई थी। ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी यह बेहतरीन कॉमेडी फिल्म बंगाली सिनेमा की रीमेक थी। फिल्म में दोनों की कॉमिक टाइमिंग कमाल की थी और एसडी बर्मन के संगीत से सजे इसके गाने आज भी चाव से सुने जाते हैं।

    एक्शन और कॉमेडी के बाद इस जोड़ी ने साल १९८० में आई फिल्म ‘राम बलराम’ के जरिए थ्रिलर जॉनर में अपनी धाक जमाई। विजय आनंद द्वारा निर्देशित इस एक्शन थ्रिलर फिल्म में दोनों ने ऐसे दो भाइयों का किरदार निभाया था, जिनका पालन-पोषण धोखे से उनके माता-पिता के हत्यारे चाचा ने किया था। इसके अलावा यह जोड़ी ऋषिकेश मुखर्जी की ही एक और कल्ट फिल्म ‘गुड्डी’ में भी एक साथ नजर आई थी। हालांकि इस फिल्म में मुख्य भूमिका अभिनेत्री जया बच्चन की थी, लेकिन धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने फिल्म इंडस्ट्री की असलियत दिखाते हुए इसमें बेहद प्रभावी कैमियो रोल किए थे, जिसने फिल्म की कहानी को एक नया आयाम दिया था।

    सिल्वर स्क्रीन पर नए प्रयोग करने के मामले में भी यह जोड़ी पीछे नहीं रही। साल १९७७ में रिलीज हुई फिल्म ‘चरणदास’ एकमात्र ऐसी अनूठी फिल्म है, जिसमें अमिताभ और धर्मेंद्र दोनों ने कव्वाली गायकों के रूप में एक विशेष और बेहद दिलचस्प भूमिका निभाई थी। आशा भोसले और मुकेश की आवाज में सजे इस फिल्म के कव्वाली गीत आज भी दर्शकों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इसके बाद निर्देशक दुलल गुहा की फिल्म ‘दोस्त’ में भी अमिताभ बच्चन ने ‘आनंद’ नाम के किरदार में एक बेहद प्रभावशाली कैमियो किया था, जहां मुख्य भूमिका में धर्मेंद्र मौजूद थे। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत से सजी इस फिल्म में दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री को दर्शकों ने खूब सराहा था।

    इन दोनों सितारों की जुगलबंदी का सिलसिला आगे भी जारी रहा, जिसमें एक हॉरर-थ्रिलर फिल्म ‘जादूगर’ शामिल है। इस रहस्यमयी कहानी में धर्मेंद्र और अमिताभ बच्चन ने क्रमशः वीरेंद्र और फ्रैंक जेम्स की भूमिकाएं निभाकर दर्शकों को चौंका दिया था, जिसकी पृष्ठभूमि एक सुनसान हवेली से जुड़ी थी। इसके बाद फिल्म ‘दिल्लगी’ में भी दोनों का जादू देखने को मिला, जहां अमिताभ बच्चन का रोल भले ही छोटा था, लेकिन एक गंभीर और सीधे-सादे प्रोफेसर की भूमिका निभा रहे धर्मेंद्र के साथ उनकी ऑनस्क्रीन मौजूदगी ने फिल्म की रौनक बढ़ा दी थी। इसके अतिरिक्त इस लिस्ट में एक अन्य फिल्म ‘हम कौन हैं’ का नाम भी प्रमुखता से शामिल है, जिसमें इस महान जोड़ी ने अपने अभिनय से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।