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  • मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे से जुड़ी है मधुबाला की अनकही कहानी, जानिए हर साल उनके नाम पर क्यों होती है विशेष अरदास

    मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे से जुड़ी है मधुबाला की अनकही कहानी, जानिए हर साल उनके नाम पर क्यों होती है विशेष अरदास

    नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा जगत की सबसे खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार दिवंगत मधुबाला का जीवन आज भी कई अनसुने किस्सों से भरा हुआ है। अपने अभिनय से करोड़ों दिलों पर राज करने वाली इस अदाकारा की व्यक्तिगत जिंदगी भले ही तमाम उतार-चढ़ावों से भरी रही, लेकिन उनकी आध्यात्मिक आस्था से जुड़ा एक ऐसा दिलचस्प पहलू सामने आया है जो बहुत कम लोग जानते हैं। मुंबई के अंधेरी स्थित एक प्रसिद्ध गुरुद्वारे में आज भी हर साल गुरु नानक देव जी के जन्मोत्सव पर मधुबाला के नाम से विशेष अरदास की जाती है।

    एक मुस्लिम परिवार में जन्मी मुमताज जहां देहलवी यानी मधुबाला की गुरु नानक देव जी के प्रति अटूट और अगाध श्रद्धा थी। यह आस्था उनके जीवन के उस दौर में शुरू हुई जब वे व्यक्तिगत जीवन की परेशानियों से काफी विचलित थीं। एक परिचित के सुझाव पर जब वे अंधेरी गुरुद्वारे पहुंचीं, तो वहां के ग्रंथि ने उन्हें नियमित रूप से जपजी साहिब का पाठ करने की सलाह दी। गुरमुखी लिपि न आने के कारण उन्होंने फारसी भाषा में छपी जपजी साहिब की प्रति मंगवाई और जीवन के अंतिम समय तक उसका नित्य पाठ करती रहीं।

    संगीत जगत के पुराने दिग्गजों के अनुसार, मधुबाला शूटिंग के दौरान भी खाली समय मिलते ही अपना सिर ढककर इस पवित्र पाठ का अध्ययन किया करती थीं। उनका मानना था कि इस पाठ को करने से उन्हें आंतरिक शांति और संबल मिलता है। गुरु नानक देव जी के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह था कि वे किसी भी फिल्म को साइन करने से पहले निर्माताओं के साथ होने वाले अनुबंध में यह शर्त स्पष्ट रूप से शामिल करवाती थीं कि गुरुपर्व के दिन वे मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे में उपस्थित रहेंगी।

    वर्ष 1969 में अपने निधन से कुछ वर्ष पूर्व मधुबाला ने गुरु पर्व पर लंगर सेवा का संपूर्ण खर्च उठाने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने गुरुद्वारा समिति को इसके लिए आवश्यक सहयोग राशि प्रदान की थी। उनके निधन के बाद भी कई वर्षों तक उनके परिवार ने इस परंपरा को जारी रखा। बाद में गुरुद्वारा प्रबंध समिति और श्रद्धालुओं ने फैसला किया कि भले ही अभिनेत्री अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अटूट श्रद्धा का सम्मान करते हुए हर साल गुरुपर्व पर लंगर सेवा के दौरान उनके नाम की अरदास की जाएगी।

    मध्य प्रदेश और देश भर के सिनेमा प्रेमी मधुबाला को न केवल उनकी अमर फिल्मों और अभिनय के लिए याद करते हैं, बल्कि उनकी इस अनूठी भक्ति भावना की भी सराहना करते हैं। अंधेरी गुरुद्वारे में आज भी हर गुरुपर्व पर अरदास के दौरान यह पंक्तियां दोहराई जाती हैं कि ईश्वर अपनी इस समर्पित बेटी की ओर से लंगर-प्रसाद की सेवा स्वीकार करे और उसे अपने चरणों में स्थान दे।

  • सस्पेंस थ्रिलर से लेकर देशभक्ति के जज्बे तक, जानें इस हफ्ते आपके पसंदीदा प्लेटफॉर्म पर क्या रहेगा खास

    सस्पेंस थ्रिलर से लेकर देशभक्ति के जज्बे तक, जानें इस हफ्ते आपके पसंदीदा प्लेटफॉर्म पर क्या रहेगा खास

    नई दिल्ली । अगस्त महीने के पहले सप्ताह में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर दर्शकों के लिए मनोरंजन का बड़ा खजाना खुलने जा रहा है। सिनेमाघरों के बजाय घर पर ही अपने स्मार्ट टीवी और उपकरणों पर फिल्में तथा सीरीज देखने के शौकीन दर्शकों के लिए यह हफ्ता बेहद रोमांचक रहने वाला है। विभिन्न प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर हर उम्र और वर्ग की पसंद को ध्यान में रखते हुए सस्पेंस थ्रिलर, स्पोर्ट्स कॉमेडी, रोमांटिक ड्रामा और एक्शन से भरपूर सामग्री प्रस्तुत की जा रही है।

    सप्ताह की शुरुआत में रहस्य और रोमांच से भरपूर एक चर्चित दक्षिण भारतीय फिल्म डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दस्तक देने जा रही है। इस फिल्म का कथानक एक प्रोबेशनरी पुलिस अधिकारी के इर्द-गिर्द घूमता है, जिसे एक अज्ञात महिला की रहस्यमयी मौत का मामला सौंपा जाता है। शुरुआत में बेहद साधारण लगने वाली यह जांच धीरे-धीरे कई उलझे हुए और अप्रत्याशित मोड़ों से गुजरती है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखने का वादा करती है।

    खेल और हास्य के अनोखे संगम को पसंद करने वाले दर्शकों के लिए एक प्रसिद्ध स्पोर्ट्स कॉमेडी सीरीज का अगला संस्करण भी इस सप्ताह स्ट्रीम होने जा रहा है। इस नए सीजन में मुख्य किरदार के सामने एक बिल्कुल नई और कठिन चुनौती होगी, जहां उसे निचले स्तर की महिला फुटबॉल टीम को प्रशिक्षित करना होगा। मजेदार घटनाक्रमों और जीवन से जुड़ी सीख के साथ यह शो मनोरंजन की पूरी खुराक देने वाला है।

    रिश्तों की उलझन और भावनात्मक ताने-बाने पर आधारित एक लोकप्रिय ड्रामा शो का नया सीजन भी इस हफ्ते डिजिटल दर्शकों के बीच आ रहा है। दस किस्तों में पेश की जाने वाली यह कहानी युवाओं के बीच खासी लोकप्रिय रही है और इसके नए भाग से भी काफी उम्मीदें जताई जा रही हैं। इसके अलावा, इतिहास और पराक्रम में रुचि रखने वालों के लिए 1999 के कारगिल युद्ध की वास्तविक घटना पर आधारित एक बहुप्रतीक्षित फिल्म मुख्य आकर्षण रहेगी। भारतीय वायु सेना के साहसिक मिशन को दर्शाती यह कहानी देशभक्ति का जज्बा जगाने का काम करेगी।

    मध्य प्रदेश सहित देशभर के सिनेमा प्रेमी जो घर बैठे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की सामग्री देखना पसंद करते हैं, उनके लिए यह सप्ताह बेहद व्यस्त रहने वाला है। भारत-पाकिस्तान बंटवारे की पृष्ठभूमि पर बनी एक भावुक प्रेम कहानी, जिसने पहले सिनेमाघरों में सफलता हासिल की थी, अब डिजिटल दर्शकों के लिए उपलब्ध होगी। साथ ही जासूसी और एक्शन शोज के शौकीनों के लिए एक प्रसिद्ध हॉलीवुड सीरीज का तीसरा भाग भी इसी हफ्ते स्ट्रीम होने जा रहा है।

  • बंटवारा 1947 के भावुक ट्रेलर लॉन्च पर शबाना आजमी ने कठिन सीन के दौरान सनी देओल की संवेदनशीलता को सराहा

    बंटवारा 1947 के भावुक ट्रेलर लॉन्च पर शबाना आजमी ने कठिन सीन के दौरान सनी देओल की संवेदनशीलता को सराहा

    नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा के इतिहास में विभाजन की विभीषिका पर कई फिल्में बनी हैं, लेकिन कुछ फिल्में अपनी कहानी के साथ-साथ सेट पर बने मानवीय संबंधों के कारण विशेष चर्चा में आ जाती हैं। निर्देशक राजकुमार संतोषी की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘बंटवारा 1947’ के ट्रेलर रिलीज के दौरान कुछ ऐसा ही भावनात्मक नजारा देखने को मिला, जब फिल्म के मुख्य कलाकारों ने शूटिंग के दौरान के अपने अनुभव साझा किए।

    इस खास मौके पर अनुभवी अभिनेत्री शबाना आजमी और अभिनेता सनी देओल बेहद भावुक नजर आए। फिल्म के एक बेहद कठिन और संवेदनशील दृश्य की शूटिंग को याद करते हुए शबाना आजमी ने बताया कि एक कलाकार के तौर पर उस पल को जीना उनके लिए काफी चुनौतीपूर्ण और असहज करने वाला था। दृश्य की मांग के अनुसार जब खलनायक द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा था, तब वे खुद को बेहद असहाय महसूस कर रही थीं।

    शबाना आजमी ने भावुक होकर बताया कि उस कठिन परिस्थिति में सनी देओल ने जिस तरह आगे बढ़कर उन्हें सहारा दिया, उसने अभिनय के दायरे को लांघकर वास्तविक जीवन की संवेदनशीलता को दर्शाया। सीन पूरा होते ही सनी देओल ने उन्हें दुपट्टे से ढका और एक रक्षक की भूमिका निभाई। इस पल ने पर्दे के पीछे के कलात्मक रिश्ते को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया, जिसे अभिनेत्री ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया।

    सनी देओल ने भी इस सहयोग पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि शबाना आजमी के साथ काम करना एक अद्भुत अनुभव रहा। उन्होंने बताया कि शूटिंग के दौरान दोनों के बीच किसी पेशेवर अदाकारी से इतर एक वास्तविक और प्रगाढ़ रिश्ता महसूस हुआ। अभिनेता ने इस फिल्म को दुनिया की सभी माताओं को समर्पित करते हुए सिनेमा के माध्यम से रिश्तों की गहराई को उजागर करने की बात कही।

    वहीं, इस महत्वाकांक्षी सिनेमाई परियोजना के पीछे के लंबे संघर्ष पर बात करते हुए निर्देशक राजकुमार संतोषी ने बताया कि इस कहानी को बड़े पर्दे तक लाने में दो दशक से भी अधिक समय लग गया। साल 2009 में एक नाटक से प्रेरित इस विषय पर फिल्म बनाने का प्रयास 2010 से लगातार जारी था, लेकिन वित्तीय और संरचनात्मक सहयोग न मिल पाने के कारण इसमें लगातार विलंब होता रहा।

    फिल्म निर्माण की इस लंबी यात्रा में अंततः आमिर खान के सहयोग से इस परियोजना को गति मिली। कहानी की गहराई और ऐतिहासिक संदर्भ को समझते हुए निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, जिससे यह वर्षों पुरानी परिकल्पना साकार हो सकी। राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी ने अतीत में भी कई यादगार फिल्में दी हैं और इस नई फिल्म के जरिए उन्होंने एक बार फिर अपनी रचनात्मक साझेदारी को साबित किया है।

    ट्रेलर लॉन्च के इस अवसर पर फिल्म की पूरी स्टारकास्ट उपस्थित रही, जहां ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित इस थ्रिलर और ड्रामा फिल्म की मेकिंग से जुड़े कई अनदेखे पहलुओं पर चर्चा की गई। दर्शकों के बीच इस फिल्म को लेकर उत्सुकता बनी हुई है, क्योंकि इसमें इतिहास के एक दर्दनाक दौर को भावनात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।

  • प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय अभिनेता जूनियर एनटीआर कंधे में चोट के कारण चिकित्सकों की देखरेख में, टीम ने जारी किया आधिकारिक विवरण

    प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय अभिनेता जूनियर एनटीआर कंधे में चोट के कारण चिकित्सकों की देखरेख में, टीम ने जारी किया आधिकारिक विवरण

    नई दिल्ली । दक्षिण भारतीय फिल्मों के लोकप्रिय अभिनेता जूनियर एनटीआर एक गतिविधि के दौरान कंधे में चोट लगने के कारण स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। घटना के तत्काल बाद उन्हें चिकित्सा जांच के लिए ले जाया गया, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम ने स्थिति का आकलन करने के बाद उन्हें अगले छह से आठ हफ्तों तक पूर्ण विश्राम की सलाह दी है। अभिनेता की टीम ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इस घटनाक्रम की जानकारी साझा की है और प्रशंसकों को आश्वस्त किया है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है तथा चिंता की कोई बात नहीं है।

    चिकित्सकीय टीम के अनुसार चोट से पूरी तरह उबरने और कंधे की मांसपेशियों को सामान्य स्थिति में लाने के लिए निर्धारित अवधि तक विश्राम करना अनिवार्य है। अभिनेता के स्वास्थ्य से जुड़े इस घटनाक्रम के बाद उनके आगामी कार्यक्रमों और शूटिंग शेड्यूल में बदलाव किए जाने की संभावना है। उनकी टीम ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुधार प्रक्रिया के दौरान स्वास्थ्य से जुड़ी आधिकारिक जानकारी समय-समय पर साझा की जाती रहेगी। इस सूचना के सामने आने के बाद फिल्म जगत और प्रशंसकों की ओर से उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की जा रही है।

    अभिनेता के करियर की बात करें तो वे पिछले कुछ समय से कई बड़े बजट की फिल्मों और बहुभाषी परियोजनाओं में व्यस्त रहे हैं। मुख्य भूमिकाओं के साथ-साथ हाल के वर्षों में उन्होंने कई बड़े अभिनेताओं के साथ सहयोग करते हुए अखिल भारतीय स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है। वर्तमान में वे आने वाली एक बहुचर्चित फिल्म की तैयारियों और निर्माण प्रक्रिया से जुड़े हुए थे, जिसकी रिलीज अगले कुछ वर्षों में प्रस्तावित है। इस अचानक आई चोट के कारण फिलहाल उनकी सभी पेशेवर गतिविधियां कुछ समय के लिए स्थगित रहेंगी।

    फिल्म उद्योग में अभिनेताओं के घायल होने की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, विशेष रूप से एक्शन दृश्यों और कठिन गतिविधियों के दौरान सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद जोखिम बना रहता है। इससे पूर्व भी कई प्रमुख कलाकारों को शूटिंग के दौरान चोटों का सामना करना पड़ा है। डॉक्टरों का मानना है कि सही समय पर लिया गया विश्राम और फिजियोथेरेपी अभिनेता को जल्द ही पूरी तरह स्वस्थ होकर काम पर लौटने में मदद करेगी। फिलहाल उनके प्रशंसक उनके पूर्ण पुनर्वास और अगली फिल्म की शूटिंग शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

  • अगस्त के बॉक्स ऑफिस पर बड़ा मुकाबला, आईएमडीबी की मोस्ट एंटिसिपेटेड लिस्ट में 'टॉक्सिक' ने मारी बाजी

    अगस्त के बॉक्स ऑफिस पर बड़ा मुकाबला, आईएमडीबी की मोस्ट एंटिसिपेटेड लिस्ट में 'टॉक्सिक' ने मारी बाजी

    नई दिल्ली । इस साल अगस्त के महीने में बॉक्स ऑफिस पर दो बड़ी एक्शन-थ्रिलर फिल्मों के बीच जोरदार टक्कर देखने को मिलने वाली है। सुपरस्टार यश की पैन-इंडिया एक्शन थ्रिलर ‘टॉक्सिक’ और इमरान हाशमी की बहुप्रतीक्षित डार्क रोमांटिक थ्रिलर ‘आवारापन 2’ दोनों ही इस महीने सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। इन दोनों फिल्मों को लेकर दर्शकों के बीच काफी उत्साह बना हुआ है। हालांकि, फिल्म रेटिंग और रिव्यू प्लेटफॉर्म आईएमडीबी की मोस्ट एंटिसिपेटेड फिल्मों की ताजा सूची में यह स्पष्ट हो गया है कि फैंस किस फिल्म का ज्यादा बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।

    आईएमडीबी की रियल-टाइम व्यूज के आधार पर तैयार की जाने वाली मोस्ट एंटिसिपेटेड फिल्मों की सूची में सुपरस्टार यश की ‘टॉक्सिक’ ने पहला स्थान हासिल किया है। वहीं, इमरान हाशमी की ‘आवारापन 2’ इस सूची में पांचवें नंबर पर काबिज है। ‘केजीएफ’ फ्रेंचाइजी की अपार सफलता के बाद सुपरस्टार यश की इस फिल्म को लेकर दर्शकों के बीच जबरदस्त हाइप देखा जा रहा है। कई बार रिलीज डेट टलने की वजह से ‘टॉक्सिक’ को लेकर उत्सुकता और अधिक बढ़ गई है। गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी यह एक्शन क्राइम थ्रिलर फिल्म 26 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इस फिल्म में यश के साथ नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया और रुकमणि वसंत जैसे बड़े कलाकार मुख्य भूमिकाओं में नजर आएंगे।

    दूसरी ओर, इमरान हाशमी स्टारर ‘आवारापन 2’ 14 अगस्त को सिनेमाघरों में रिलीज होने के लिए तैयार है। नितिन कक्कड़ के निर्देशन में बन रही यह फिल्म साल 2007 में आई सुपरहिट कल्ट क्लासिक फिल्म ‘आवारापन’ का सीक्वल है। हालांकि, 2007 में रिलीज हुई मूल फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा सकी थी, लेकिन समय के साथ इसकी कहानी, संगीत और इमरान हाशमी के अभिनय ने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बना ली। 7.4 आईएमडीबी रेटिंग वाली इस फिल्म के सीक्वल का फैंस लंबे समय से इंतजार कर रहे थे। ‘आवारापन 2’ में इमरान हाशमी के साथ दिशा पाटनी, शबाना आजमी, सलिल आचार्या, विजयंत कोहली और अतुल कुमार मुख्य किरदारों में दिखाई देंगे।

    अगस्त के महीने में इन दोनों फिल्मों की रिलीज से बॉक्स ऑफिस पर बड़े आंकड़े और जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिल सकती है। एक तरफ जहां यश की ‘टॉक्सिक’ अपने बड़े कैनवास, अखिल भारतीय स्टारकास्ट और भारी-भरकम एक्शन के दम पर दर्शकों को आकर्षित कर रही है, वहीं ‘आवारापन 2’ अपने कल्ट सीक्वल स्टेटस, इमोशनल कनेक्ट और डार्क थ्रिलर कंटेंट के बल पर सिनेमाघरों में मजबूत पकड़ बनाने की तैयारी में है।

  • 'मेहर' के बाद नए सफर पर राज कुंद्रा, बोले- पंजाब की कई दमदार कहानियां अब भी पर्दे पर आना बाकी हैं

    'मेहर' के बाद नए सफर पर राज कुंद्रा, बोले- पंजाब की कई दमदार कहानियां अब भी पर्दे पर आना बाकी हैं

    नई दिल्ली । बिजनेसमैन और अभिनेता राज कुंद्रा अब पंजाबी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहे हैं। अपनी पहली पंजाबी फिल्म ‘मेहर’ से अभिनय की शुरुआत करने के बाद उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य केवल पर्दे पर दिखाई देना नहीं, बल्कि ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनना है जो समाज, संस्कृति और लोगों की भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से सामने ला सकें। उनका मानना है कि पंजाब की धरती में ऐसी अनेक प्रेरणादायक और वास्तविक कहानियां मौजूद हैं, जिन्हें अब तक बड़े पर्दे पर पर्याप्त स्थान नहीं मिल पाया है।

    राज कुंद्रा का कहना है कि किसी भी फिल्म की सफलता केवल उसके मनोरंजन मूल्य से नहीं आंकी जानी चाहिए, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि वह दर्शकों तक किस तरह का संदेश पहुंचाती है। उनके अनुसार वे ऐसे विषयों को प्राथमिकता देना चाहते हैं जो वास्तविक परिस्थितियों, सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े हों। उनका मानना है कि मजबूत कहानी ही किसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत होती है और वही दर्शकों के साथ लंबे समय तक जुड़ाव बनाए रखती है।

    उन्होंने अपनी आगामी फिल्म ‘द ग्रेट पंजाब रॉबरी’ का जिक्र करते हुए बताया कि इस परियोजना का विचार काफी समय पहले तैयार हो गया था। यह फिल्म निर्देशक सौरभ वर्मा के साथ उनकी पहली फिल्म बनने वाली थी, लेकिन उस समय पर्याप्त आर्थिक सहयोग और निर्माता नहीं मिलने के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। इसके बावजूद उन्होंने इस कहानी पर भरोसा बनाए रखा और इसे छोड़ने के बजाय सही समय का इंतजार किया।

    राज कुंद्रा के अनुसार ‘मेहर’ के रिलीज होने के बाद परिस्थितियां बदलीं और कई निर्माता उनके साथ काम करने में रुचि दिखाने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक बार फिर ‘द ग्रेट पंजाब रॉबरी’ को लेकर बातचीत शुरू की। इस बार कई निर्माता इस प्रोजेक्ट से जुड़े और फिल्म को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया। उनका कहना है कि यदि कहानी दमदार हो तो उसे अपना मुकाम मिलने में देर हो सकती है, लेकिन वह अंततः दर्शकों तक जरूर पहुंचती है।

    उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनकी भविष्य की योजनाएं केवल पंजाबी सिनेमा तक सीमित नहीं रहेंगी। ‘द ग्रेट पंजाब रॉबरी’ के बाद वह अपने होम प्रोडक्शन के बैनर तले एक नई फिल्म लेकर आएंगे। इस फिल्म की योजना पूरे देश के दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जा रही है और इसे पैन इंडिया स्तर पर रिलीज करने की तैयारी है। उनका उद्देश्य क्षेत्रीय विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करना है ताकि अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों के दर्शक भी इन कहानियों से जुड़ सकें।

    राज कुंद्रा का मानना है कि भारतीय सिनेमा में क्षेत्रीय फिल्मों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। दर्शक अब नई कहानियों, स्थानीय संस्कृति और वास्तविक घटनाओं पर आधारित फिल्मों को अधिक पसंद कर रहे हैं। ऐसे में पंजाब की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित विषयों को बड़े स्तर पर प्रस्तुत करने की काफी संभावनाएं हैं। उनका विश्वास है कि यदि इन कहानियों को ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ पर्दे पर उतारा जाए तो वे न केवल मनोरंजन करेंगी, बल्कि समाज में सकारात्मक चर्चा का भी माध्यम बनेंगी।

  • भारतीय सिनेमा में छात्र राजनीति और सामाजिक क्रांति को दर्शाती प्रमुख फिल्में..

    भारतीय सिनेमा में छात्र राजनीति और सामाजिक क्रांति को दर्शाती प्रमुख फिल्में..


    नई दिल्ली ।
    देश भर में वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था, प्रवेश परीक्षाओं और युवाओं के भविष्य से जुड़े मुद्दों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विमर्श छिड़ा हुआ है। इस माहौल के बीच भारतीय सिनेमा के उस दौर की चर्चा पुनः तेज हो गई है, जिसने छात्रों के आक्रोश, उनके सामाजिक संघर्ष और व्यवस्था विरोधी आंदोलनों को बड़े पर्दे पर अत्यंत यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत किया था। बॉलीवुड में निर्मित कई ऐसी फिल्में रही हैं, जिन्होंने केवल बॉक्स ऑफिस पर व्यावसायिक सफलता ही हासिल नहीं की, बल्कि समाज में राजनीतिक चेतना और छात्र राजनीति के प्रभाव को भी रेखांकित किया।

    छात्र आंदोलनों की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्मों में वर्ष 2006 में आई ‘रंग दे बसंती’ को सबसे प्रभावशाली रचना माना जाता है। इस फिल्म में कॉलेज के बेफिक्र युवाओं द्वारा भ्रष्ट शासन तंत्र के खिलाफ उठाई गई आवाज और उसके एक बड़े जनआंदोलन में बदलने की प्रक्रिया को दिखाया गया है। इसी प्रकार, मणिरत्नम द्वारा निर्देशित फिल्म ‘युवा’ छात्र राजनीति के सकारात्मक पहलू और युवाओं की सीधे शासन प्रणाली में भागीदारी को प्रेरित करती है। वहीं, 1970 के दशक की राजनीतिक हलचलों और सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्रों के वैचारिक संघर्ष पर आधारित ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ ने युवा चेतना के गंभीर पक्षों को उजागर किया है।

    विश्वविद्यालयों के भीतर पनपने वाली चुनावी राजनीति, हिंसा और सत्ता के संघर्ष को अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ और तिग्मांशु धूलिया की ‘हासिल’ जैसी फिल्मों में बेहद यथार्थवादी तरीके से दर्शाया गया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर केंद्रित ‘हासिल’ यह स्पष्ट करती है कि किस तरह शैक्षणिक संस्थानों में छात्र संघ चुनाव बाहुबल और अपराध से प्रभावित होकर युवाओं के भविष्य को दिशाहीन कर देते हैं। ये फिल्में दिखाती हैं कि छात्र आंदोलन केवल आदर्शवाद तक सीमित न रहकर कई बार जटिल राजनीतिक ताने-बाने में भी उलझ जाते हैं।

    सामाजिक न्याय और नीतिगत निर्णयों के खिलाफ हुए ऐतिहासिक छात्र आंदोलनों को भी सिनेमा ने अपनी विषय-वस्तु बनाया है। प्रकाश झा की ‘आरक्षण’ जहां शिक्षा प्रणाली और आरक्षण नीति के सामाजिक प्रभाव पर प्रकाश डालती है, वहीं फिल्म ‘हुड़दंग’ 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के विरोध में हुए देशव्यापी छात्र प्रदर्शनों को दर्शाती है। आज के दौर में जब युवा वर्ग अपनी मांगों को लेकर मुखर है, तब ये फिल्में यह साबित करती हैं कि सिनेमा ने हमेशा से समाज और युवाओं के वास्तविक संघर्षों को एक सशक्त माध्यम प्रदान किया है।

  • भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    भारतीय सिनेमा की प्रतिभावान अभिनेत्री स्मिता पाटिल की अंतिम घड़ियों का दर्दनाक सच: गंभीर संक्रमण और असमय चिकित्सा ने छीना दिग्गज कलाकार

    नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा की सबसे प्रभावशाली और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में शुमार स्मिता पाटिल के असमय निधन की कहानी आज भी कला जगत को झकझोर देती है। समानांतर और व्यावसायिक सिनेमा दोनों में अपनी सशक्त अदाकारी की छाप छोड़ने वाली इस महान अभिनेत्री की जीवन यात्रा बेहद दर्दनाक परिस्थितियों में समाप्त हुई थी। वर्ष 1986 में अपने पहले बच्चे के जन्म के ठीक दो सप्ताह बाद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उनका निधन हो गया था। प्रसव के बाद शरीर में फैले घातक संक्रमण और सही समय पर चिकित्सीय सलाह न लेने की वजह से उनकी स्थिति बेहद नाजुक हो गई थी।

    पुत्र के जन्म के बाद परिवार में खुशियों का माहौल था, लेकिन प्रसवोत्तर संक्रमण ने अभिनेत्री को अपनी चपेट में ले लिया था। शुरुआती दौर में स्वास्थ्य में आ रही गिरावट को सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज किया गया, जिससे संक्रमण धीरे-धीरे पूरे शरीर में फैलता चला गया। स्थानीय चिकित्सकों द्वारा प्राथमिक उपचार और ड्रिप दिए जाने के बावजूद उनके शरीर का तापमान लगातार बढ़ता रहा। अपने नवजात शिशु के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वे अस्पताल जाने से बचती रहीं, जिससे स्थिति लगातार नियंत्रण से बाहर होती चली गई।

    निधन वाले दिन अभिनेत्री की स्थिति में अचानक भारी गिरावट दर्ज की गई। शाम के समय उनका चेहरा पीला पड़ने लगा और उन्हें लगातार खून की उल्टियां होने लगीं। गंभीर स्थिति को देखते हुए उन्हें तत्काल मुंबई के जसलोक अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक वे कोमा की स्थिति में जा चुकी थीं। विशेषज्ञों की टीम ने उन्हें बचाने के भरसक प्रयास किए और स्थिति को संभालने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के डॉक्टरों से भी संपर्क साधने की कोशिशें की गईं, परंतु संक्रमण मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों तक फैल चुका था।

    अस्पताल में भर्ती कराए जाने के कुछ ही घंटों भीतर आंतरिक रक्तस्राव और अंगों के काम न करने की वजह से स्थिति पूरी तरह से बिगड़ गई। अंततः देर रात चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। केवल इकत्तीस वर्ष की आयु में स्मिता पाटिल का इस तरह अचानक चले जाना संपूर्ण भारतीय फिल्म उद्योग के लिए एक कभी न पूरा होने वाला घाटा था। उनके निधन के बाद उनके नवजात शिशु का पालन-पोषण उनके माता-पिता द्वारा किया गया, जबकि भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को आज भी अत्यंत सम्मान के साथ याद किया जाता है।

  • भारतीय सिनेमा के इतिहास में चेतन आनंद का अनूठा प्रयोग: कान्स फिल्म फेस्टिवल से लेकर काव्यात्मक संवादों तक दर्ज की अमिट छाप

    भारतीय सिनेमा के इतिहास में चेतन आनंद का अनूठा प्रयोग: कान्स फिल्म फेस्टिवल से लेकर काव्यात्मक संवादों तक दर्ज की अमिट छाप

    नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में प्रयोगधर्मिता और रचनात्मकता के कई दौर आए हैं, लेकिन सत्तर के दशक में किया गया एक अनोखा प्रयोग आज भी फिल्म समीक्षकों और दर्शकों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है। उस दौर में जब बॉलीवुड के निर्देशक पारंपरिक ढर्रे से अलग हटकर कुछ नया करने का प्रयास कर रहे थे, तब एक ऐसी फिल्म का निर्माण हुआ जिसके सभी संवाद पूरी तरह से काव्यात्मक थे। आज के दौर में जहां दर्शक यथार्थवादी और प्रामाणिक सिनेमा की मांग करते हैं, वहीं वर्ष 1970 में रिलीज हुई इस फिल्म में किरदारों का आपस में केवल शायरी और कविता के माध्यम से बात करना उस समय एक बड़ा जोखिम माना जा रहा था। इसके बावजूद, इस अनूठे प्रयोग ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़े, बल्कि एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जिसे आज तक कोई दूसरा फिल्मकार दोहरा नहीं सका है।

    इस ऐतिहासिक और अनूठी फिल्म के निर्माण के पीछे भारतीय सिनेमा के दिग्गज निर्देशक चेतन आनंद का विजन था। चेतन आनंद को अक्सर लोग केवल प्रसिद्ध अभिनेता देव आनंद के भाई के रूप में याद करते हैं, जबकि हकीकत यह है कि वह स्वयं वैश्विक स्तर पर देश का नाम रोशन करने वाले एक महान फिल्मकार थे। उनकी निर्देशकीय क्षमता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महान फिल्म निर्देशक सत्यजीत रे भी उन्हें अपनी प्रेरणा मानते थे। चेतन आनंद ने वर्ष 1946 में अपनी फिल्म नीचा नगर के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर वह ऐतिहासिक सफलता हासिल की थी, जिसे आज तक कोई दूसरी हिंदी फिल्म हासिल नहीं कर सकी है। उनकी इस कलात्मक प्रस्तुति को प्रतिष्ठित कान्स फिल्म फेस्टिवल में सर्वोच्च सम्मान यानी ग्रैंड प्राइज से नवाजा गया था, जिसने वैश्विक स्तर पर भारतीय सिनेमा की पहचान बनाई थी।

    कान्स फिल्म फेस्टिवल में मिली इस अभूतपूर्व कामयाबी के बाद सत्यजीत रे ने स्वयं चेतन आनंद को पत्र लिखकर यह स्वीकार किया था कि इस वैश्विक सम्मान ने ही उन्हें फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरने का हौसला दिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमाने के बाद चेतन आनंद ने सिनेमाई दुनिया में एक और नया मील का पत्थर स्थापित करने का संकल्प लिया। उन्होंने एक ऐसी प्रेम कहानी पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया, जिसका पूरा स्क्रीनप्ले और हर एक संवाद साधारण बोलचाल के बजाय कविता की शक्ल में हो। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए उन्होंने फिल्म उद्योग के सबसे दिग्गज और गंभीर अभिनेताओं को अनुबंधित किया, जिनमें राज कुमार, पृथ्वीराज कपूर और प्राण जैसे दिग्गज नाम शामिल थे। इन दिग्गज कलाकारों के अभिनय और काव्यात्मक संवादों के अनूठे संगम ने पर्दे पर एक जादुई माहौल तैयार कर दिया था।

    चेतन आनंद अपनी फिल्मों में वास्तविकता और दृश्यों की प्रामाणिकता को लेकर बेहद गंभीर रहते थे। इस फिल्म के एक खास दृश्य के लिए उन्हें सरसों के खेतों की प्राकृतिक लाइटिंग और पीले रंग के बैकग्राउंड की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने स्थानीय किसानों को अतिरिक्त धन राशि देकर समय से पहले सरसों की फसल उगाने का आग्रह किया था, ताकि फिल्म की शूटिंग के दौरान प्राकृतिक दृश्य बिल्कुल सटीक मिल सकें। मूल रूप से यह फिल्म लगभग तीन घंटे से अधिक लंबी तैयार हुई थी, लेकिन संपादन की मेज पर इसे दर्शकों के अनुकूल चुस्त रखते हुए दो घंटे बीस मिनट का किया गया। जब यह फिल्म हीर रांझा के नाम से सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो इसके अनोखे प्रारूप को देखकर शुरुआत में लोग चौंक गए, लेकिन देखते ही देखते इसने कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और आज भी यह भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और लीक से हटकर बनी फिल्मों में शीर्ष पर गिनी जाती है।

  • 44 साल के अभिनय सफर के बाद भी नई कहानियों की तलाश में अनु कपूर, 'उत्तर का पुत्तर' से फिर दिखेगा दिल्ली और संवेदनाओं का अनोखा संगम

    44 साल के अभिनय सफर के बाद भी नई कहानियों की तलाश में अनु कपूर, 'उत्तर का पुत्तर' से फिर दिखेगा दिल्ली और संवेदनाओं का अनोखा संगम

    नई दिल्ली । वरिष्ठ अभिनेता अनु कपूर अपनी आगामी फिल्म ‘उत्तर का पुत्तर’ के माध्यम से एक बार फिर ऐसे किरदार में दिखाई देंगे, जो मनोरंजन के साथ जीवन का सार्थक संदेश भी प्रस्तुत करता है। इस फिल्म में वह एक अनुभवी भौतिकी शिक्षक की भूमिका निभा रहे हैं, जो विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराता है, लेकिन निजी जीवन में वास्तु सिद्धांतों पर गहरा विश्वास रखता है। कहानी इसी विश्वास और वास्तविक जीवन के बीच पैदा होने वाली परिस्थितियों को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत करती है।

    अनु कपूर का कहना है कि फिल्म की कहानी पढ़ते ही उन्हें महसूस हुआ कि यह आम लोगों की सोच और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी हुई है। उनके अनुसार कई लोग जीवन की समस्याओं का समाधान बाहरी परिस्थितियों, दिशाओं या मान्यताओं में खोजते हैं, जबकि वास्तविक परिवर्तन व्यक्ति के विचार, निर्णय और कर्म से आता है। यही संदेश फिल्म को अलग पहचान देता है और इसी कारण उन्होंने इस परियोजना का हिस्सा बनने का निर्णय लिया।

    उन्होंने बताया कि उनका किरदार विज्ञान का शिक्षक होने के बावजूद वास्तु में विश्वास रखता है। यह विरोधाभास ही कहानी को रोचक बनाता है। फिल्म किसी की आस्था का उपहास नहीं उड़ाती, बल्कि यह दिखाने का प्रयास करती है कि विश्वास अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन सफलता और संतुलित जीवन का आधार ईमानदार प्रयास, सकारात्मक सोच और सही निर्णय ही होते हैं।

    लगभग चार दशक से अधिक लंबे अभिनय करियर में अनु कपूर ने अनेक यादगार फिल्मों में विविध भूमिकाएं निभाई हैं। उनका मानना है कि दर्शकों तक वही कहानियां सबसे अधिक पहुंचती हैं जिनमें मनोरंजन के साथ विचार करने की प्रेरणा भी हो। उनके अनुसार ‘उत्तर का पुत्तर’ भी हास्य के माध्यम से एक गंभीर सामाजिक संदेश देने का प्रयास करती है, जिससे हर वर्ग का दर्शक स्वयं को जोड़ सकेगा।

    फिल्म का बड़ा हिस्सा दिल्ली के प्रमुख स्थलों पर फिल्माया गया है। शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को कहानी के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़ा गया है। करोल बाग, कनॉट प्लेस, इंडिया गेट, कुतुब मीनार और अन्य प्रसिद्ध स्थानों की झलक फिल्म को वास्तविक वातावरण प्रदान करती है। निर्माताओं का मानना है कि दिल्ली की जीवंत ऊर्जा और स्थानीय परिवेश कहानी को और अधिक प्रभावशाली बनाते हैं।

    अनु कपूर के लिए दिल्ली केवल एक शहर नहीं बल्कि उनके अभिनय जीवन की महत्वपूर्ण शुरुआत का केंद्र भी है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में बिताए गए वर्षों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वहीं से उन्हें अभिनय की बारीकियां, अनुशासन और जीवन को गहराई से समझने की सीख मिली। मंडी हाउस, बंगाली मार्केट और आसपास के क्षेत्रों से जुड़ी अनेक यादें आज भी उनके मन में ताजा हैं और हर बार दिल्ली लौटने पर वे फिर जीवंत हो उठती हैं।

    उन्होंने कहा कि रंगमंच के दिनों में लोगों के व्यवहार, भावनाओं और समाज को करीब से देखने का अवसर मिला, जिसने उनके अभिनय को नई दिशा दी। यही अनुभव आज भी हर नए किरदार को निभाने में उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बनते हैं। उनका मानना है कि एक कलाकार के लिए निरंतर सीखना और स्वयं को नए विषयों के अनुरूप ढालना सबसे महत्वपूर्ण होता है।

    फिल्म ‘उत्तर का पुत्तर’ 24 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। निर्माताओं को उम्मीद है कि पारिवारिक मनोरंजन, हल्के हास्य और सकारात्मक संदेश का यह मिश्रण दर्शकों को पसंद आएगा। साथ ही दिल्ली की खूबसूरत लोकेशन और अनु कपूर का अनुभवी अभिनय फिल्म को एक अलग पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।