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  • ईरान-अमेरिका जंग में तेजी के बीच कच्चे तेल के दामों में भारी इजाफा

    ईरान-अमेरिका जंग में तेजी के बीच कच्चे तेल के दामों में भारी इजाफा


    तेहरान।
    पेट्रोल-डीजल (Petrol and Diesel) के सस्ता होने की उम्मीद कर रहे लोगों के लिए बुरी खबर है। ईरान और अमेरिका में जंग (Iran -America War) तेज हो गई है। मिसाइलों की बारिश ने क्रूड की कीमतों (Crude oil Prices) में आग लगा दी है। अब इंटरनेशन बेंचमार्क (International benchmark) ब्रेंट क्रूड तेजी से 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर भाग रहा है। ऐसे में दुनिया भर में एक बार फिर ऊर्जा संकट के और बढ़ने के खतरे बढ़ गए हैं।

    बुधवार सुबह कारोबार शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमतों में करीब 1.5% से अधिक की बढ़ोतरी हुई। यह उछाल मंगलवार के तेज उछाल के बाद आया है, जब दोनों तरह के तेल 4 डॉलर से ज्यादा महंगे हो गए थे। ब्लूमबर्ग के अनुसार वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड का दाम सुबह 7 बजे के 1.61 डॉलर प्रति बैरल चढ़कर 91.83 डॉलर पर कारोबार कर रहा था और अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1.91 डॉलर प्रति बैरल चढ़कर 96.56 डॉलर पर था।


    अमेरिका-ईरान के बीच रातभर मिसाइलों की बारिश

    अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसके जवाब में ईरान ने पलटवार किया। दोनों देशों के बीच हफ्तों में यह सबसे गंभीर झड़प है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, ये हमले ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की उन हालिया हरकतों के जवाब में किए गए, जिसमें उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों और अमेरिकी सैनिकों पर हमले की कोशिश की थी।


    होर्मुज पर संकट गहरा

    ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी हमलों से होर्मुज के रास्ते और भी ज्यादा बंद हो जाएंगे। गौरतलब है कि इसी रास्ते से दुनिया की कुल पांचवीं तेल खपत गुजरती थी, लेकिन अब ईरान ने इसे व्यावसायिक जहाजों के लिए प्रभावी रूप से बंद कर दिया है।


    ईरान की जवाबी कार्रवाई और नए हमले

    IRGC ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और दावा किया कि बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए। ईरानी मीडिया के मुताबिक, बहरीन में अमेरिकी बेस पर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला किया गया। जॉर्डन की सेना ने 13 में से 10 मिसाइलें हवा में ही नष्ट कर दीं। अमेरिकी अधिकारियों ने अभी तक किसी भी नुकसान की पुष्टि नहीं की है। कुवैत ने भी दुश्मन ड्रोन गतिविधि के खिलाफ अपनी सेना तैनात कर दी है।


    टैंकरों पर हमले

    पिछले सप्ताहांत (जुलाई के बाद पहली बार) झड़पें तेज हुईं। सोमवार को होर्मुज से निकलते दो टैंकरों पर भी हमले हुए, जिससे तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है और कारोबारी वैकल्पिक रास्ते तलाशने पर मजबूर हैं।

  • क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    नई दिल्ली । पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता एक बार फिर बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिला है। 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 2.4 फीसदी की तेजी के साथ 93.78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 24 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत में भी करीब 2.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। कच्चे तेल की इस तेजी ने भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए ईंधन की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ने वाले हैं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड लंबे समय तक महंगा बना रहा तो घरेलू कीमतों पर असर पड़ने की संभावना जरूर बढ़ सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं मजबूत हुई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के समर्थन वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। तेल बाजार में किसी बड़े उत्पादक क्षेत्र से सप्लाई बाधित होने की आशंका पैदा होते ही कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। यही स्थिति अभी दिखाई दे रही है।

    इस पूरे मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद ज्यादा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही होती है। अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और इस मार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों पर पड़ सकता है।

    भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स डीलर कमीशन तेल कंपनियों की लागत और मार्जिन तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए क्रूड में तेजी आने के साथ ही अगले दिन पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो क्या होगा। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर क्रूड की कीमतें और ऊपर जाती हैं तथा रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात लागत पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। इसका असर पेट्रोल और डीजल के साथ परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है।

    ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सब्जियों खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। उद्योगों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्रूड की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू कीमतों को लेकर क्या फैसला करती हैं।

    फिलहाल सबसे बड़ी निगाह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति पर बनी हुई है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन अगर आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ता है तो क्रूड में और तेजी संभव है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईंधन की कीमत निश्चित रूप से बढ़ने वाली है लेकिन महंगे क्रूड ने सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों के सामने जरूर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

  • मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल

    मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट तनाव (Middle East tensions) के बाद तेल कंपनियों ने मई में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे. जून के बाद अमेरिका और ईरान में तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में जब कमी आई तो फ्यूल प्राइस कम होने का भरोसा बढ़ गया था. लेकिन खाड़ी में तनाव फिर बढ़ने से ईंधन की कीमतों में कमी की उम्मीद टूटने लगी है. दरअसल, इस वक्त दुनियाभर में चल रहे तनाव का असर भारत के ईंधन और खाने-पीने के सामानों पर सबसे ज्यादा नजर आ रहा है.


    कच्चा तेल में फिर तेजी
    अमेरिका-ईरान के बीच नए समझौते की उम्मीदें कमजोर पड़ने से कच्चे तेल में तेजी आ रही है. इससे ब्रेंट क्रूड 92 डॉलर प्रति बैरल के करीब और WTI क्रूड करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. आशंका है कि क्रूड जल्द ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुंच सकता है. तेल की कीमतों में ये तेजी ऐसे समय आई है, जब भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता होने की उम्मीद लगाई जा रही थी. लेकिन हालात फिलहाल राहत वाले नहीं दिख रहे क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ी दूरी ने एनर्जी मार्केट की बेचैनी बढ़ा दी है।


    भारत पर ज्यादा असर

    भारत के लिए हालात ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. महंगे कच्चे तेल से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है. लंबे समय तक ऊंचे दाम रहने पर ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    तेल के साथ-साथ खाने की थाली से जुड़ी एक और चिंता भी सिर उठाने लगी है. गेहूं की कीमतों में तेजी ने आटा और ब्रेड जैसे जरूरी सामान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. दुनिया के बड़े गेहूं निर्यातक रूस और यूक्रेन के बीच जारी तनाव ने काला सागर क्षेत्र में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारतीय मंडियों तक दिखाई देने लगा है. वैश्विक बाजार में गेहूं करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के स्तर पर पहुंच गया है. देश की प्रमुख मंडियों में एक महीने में गेहूं के भाव करीब 4 फीसदी तक बढ़ गए हैं. जाहिर है कि गेहूं की बढ़ती कीमतें आटा, ब्रेड और दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत बढ़ा सकती हैं।


    प्याज भी महंगा
    रसोई की चिंता यहीं खत्म नहीं होती, प्याज भी लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाने लगा है. प्याज का औसत खुदरा भाव 37 रुपये 20 पैसे प्रति किलो पर पहुंच गया है जबकि एक महीने पहले कीमत 34 रुपये 53 पैसे प्रति किलो थी. एक साल पहले प्याज का भाव 26 रुपये 86 पैसे प्रति किलो था. इस तेजी की वजह खरीफ प्याज की आवक में देरी है जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया है।

    तेल से लेकर गेहूं और प्याज तक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पैदा हुआ तनाव भारतीय ग्राहकों की जेब तक पहुंच रहा है. ऐसे में सबकी नजर दो मोर्चों पर टिकी हैं. पहला है कि मिडिल ईस्ट में तेल की दिशा क्या रहती है और दूसरा ये कि काला सागर क्षेत्र में सप्लाई का संकट कितना गहराता है क्योंकि इन दोनों का असर सीधे आपकी गाड़ी के खर्च और रसोई के बजट पर पड़ सकता है।

  • भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म

    भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म


    नई दिल्ली। भारतीय तेल रिफाइनरियों के लिए कच्चा तेल खरीदना लगातार महंगा होता जा रहा है। ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत पिछले दो हफ्तों में करीब 10 डॉलर बढ़कर 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। वहीं, खाड़ी और पश्चिम अफ्रीकी तेल की कीमतों पर भी सप्लाई की कमी के चलते प्रीमियम बढ़ गया है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि रूसी तेल पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो चुकी है, जबकि वेनेजुएला के क्रूड पर भी डिस्काउंट काफी कम हो गया है।

    अगर खाड़ी क्षेत्र में तेल की सप्लाई सामान्य नहीं होती और रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट वापस नहीं आती, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत और बढ़ सकती है। इसका असर तेल कंपनियों के मार्जिन के साथ आगे चलकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो सकता है।

    खाड़ी का तेल ब्रेंट से करीब 10 डॉलर महंगा

    ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, बाजार में कच्चे तेल की कमी का फायदा ट्रेडर्स उठा रहे हैं। भारतीय रिफाइनरियों को खाड़ी देशों से तेल खरीदने के लिए स्पॉट मार्केट का सहारा लेना पड़ रहा है, जहां अतिरिक्त प्रीमियम वसूला जा रहा है।

    खाड़ी के सप्लायर दुबई-ओमान बेंचमार्क पर करीब 3 से 4 डॉलर प्रति बैरल अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। वहीं, दुबई-ओमान बेंचमार्क खुद ब्रेंट से करीब 6 से 7 डॉलर महंगा है। इस तरह भारतीय रिफाइनरों के लिए खाड़ी का कच्चा तेल ब्रेंट की तुलना में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा पड़ रहा है।

    सऊदी अरामको की आधिकारिक सेल प्राइस दुबई-ओमान बेंचमार्क से 1.5 से 3 डॉलर नीचे जरूर हैं, लेकिन लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण टर्म डील के तहत मिलने वाली सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे भारतीय रिफाइनरियों की स्पॉट मार्केट पर निर्भरता बढ़ गई है।

    जहाजों की कमी ने बढ़ाई लागत

    संघर्ष वाले क्षेत्रों से कच्चा तेल लाने में जहाजों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बन गई है। जोखिम वाले समुद्री रास्तों से तेल पहुंचाने के लिए ट्रेडर्स अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। टर्म कॉन्ट्रैक्ट में तेल सस्ता होने के बावजूद भारत तक उसे पहुंचाने के लिए पर्याप्त जहाज नहीं मिलना रिफाइनरों की लागत बढ़ा रहा है।

    पश्चिम अफ्रीकी क्रूड भी महंगा

    खाड़ी के बाद पश्चिम अफ्रीका से मिलने वाला कच्चा तेल भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महंगा हो गया है। इसके चलते कंपनियां अब वैकल्पिक स्रोतों पर नजर डाल रही हैं। अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है।

    रूसी तेल की सबसे बड़ी बढ़त खत्म

    कुछ समय पहले तक रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए सबसे आकर्षक विकल्पों में था। इसकी बड़ी वजह उस पर मिलने वाली भारी छूट थी। अब यह डिस्काउंट लगभग खत्म हो चुका है। वेनेजुएला के तेल पर मिलने वाली छूट भी काफी कम हो गई है।

    इससे भारतीय रिफाइनरियों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है और दूसरी तरफ सस्ता रूसी तेल भी पहले जैसा उपलब्ध नहीं है।

    अमेरिकी प्रतिबंध बढ़े तो मुश्किल और बढ़ेगी

    भारतीय तेल कंपनियों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध भी बड़ा जोखिम हैं। अगर अमेरिका रूसी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर प्रतिबंध और कड़े करता है, तो भारत के लिए रूसी क्रूड खरीदना और मुश्किल हो सकता है। ऐसे में रिफाइनरियों को दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है।

  • कच्चे तेल के उछाल और महंगाई की चिंता से बाजार में बिकवाली, सेंसेक्स 78,154 पर बंद; निफ्टी भी फिसला

    कच्चे तेल के उछाल और महंगाई की चिंता से बाजार में बिकवाली, सेंसेक्स 78,154 पर बंद; निफ्टी भी फिसला


    नई दिल्ली। भारतीय शेयर बाजार मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में आए तेज उछाल और बढ़ती महंगाई की चिंता के बीच दबाव में नजर आया। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 388.19 अंक यानी 0.49 प्रतिशत की गिरावट के साथ 78,154.25 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 112.10 अंक यानी 0.46 प्रतिशत फिसलकर 24,471.70 के स्तर पर पहुंच गया। दिनभर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहा लेकिन कारोबारी सत्र के आखिरी हिस्से में बिकवाली का दबाव बढ़ गया। निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों के साथ ही वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों और आने वाले महंगाई के आंकड़ों पर रही। कच्चे तेल में तेजी को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। तेल महंगा होने पर कंपनियों की लागत बढ़ने के साथ महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है और यही चिंता बाजार के सेंटीमेंट पर हावी रही।

    सेक्टोरल इंडेक्स की बात करें तो एफएमसीजी और रियल्टी शेयरों में सबसे ज्यादा कमजोरी देखने को मिली। निफ्टी एफएमसीजी इंडेक्स 1.17 प्रतिशत और निफ्टी रियल्टी इंडेक्स 0.99 प्रतिशत की गिरावट के साथ दिन के प्रमुख कमजोर सेक्टर रहे। इसके अलावा निफ्टी मेटल में 0.95 प्रतिशत निफ्टी इन्फ्रा में 0.86 प्रतिशत निफ्टी कमोडिटीज में 0.84 प्रतिशत निफ्टी कंजप्शन में 0.63 प्रतिशत निफ्टी प्राइवेट बैंक में 0.56 प्रतिशत और निफ्टी ऑटो में 0.55 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। निफ्टी इंडिया डिफेंस इंडेक्स भी 0.44 प्रतिशत कमजोर रहा। इन सेक्टरों में बिकवाली ने बाजार की कुल कमजोरी को और बढ़ाया।

    हालांकि बाजार में कुछ ऐसे सेक्टर भी रहे जिन्होंने गिरावट को सीमित करने का काम किया। निफ्टी फार्मा 1.02 प्रतिशत की मजबूती के साथ सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले प्रमुख इंडेक्स में रहा। निफ्टी आईटी में 0.61 प्रतिशत निफ्टी हेल्थकेयर में 0.32 प्रतिशत और निफ्टी ऑयल एंड गैस में 0.08 प्रतिशत की बढ़त रही। इससे संकेत मिला कि निवेशकों ने बाजार में जोखिम बढ़ने के बावजूद चुनिंदा रक्षात्मक और मजबूत कंपनियों में खरीदारी बनाए रखी।

    लार्जकैप शेयरों के मुकाबले मिडकैप और स्मॉलकैप में भी कारोबार मिला-जुला रहा। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 11.85 अंक यानी 0.02 प्रतिशत की मामूली गिरावट के साथ 63,843.85 पर बंद हुआ जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 43.20 अंक यानी 0.22 प्रतिशत की बढ़त के साथ 19,857.15 पर पहुंच गया। सेंसेक्स में इटरनल इन्फोसिस टाइटन एचसीएल टेक और टीसीएस बढ़त के साथ बंद होने वाले प्रमुख शेयरों में रहे। इसके विपरीत अल्ट्राटेक सीमेंट एक्सिस बैंक इंडिगो भारती एयरटेल बजाज फाइनेंस पावर ग्रिड आईटीसी एमएंडएम टाटा स्टील एचयूएल एशियन पेंट्स बजाज फिनसर्व एलएंडटी सन फार्मा मारुति सुजुकी एसबीआई ट्रेंट एचडीएफसी बैंक टेक महिंद्रा एनटीपीसी आईसीआईसीआई बैंक कोटक महिंद्रा बैंक और बीईएल समेत कई दिग्गज शेयरों में गिरावट रही।

    बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने निवेशकों को एक बार फिर महंगाई और ब्याज दरों के संभावित जोखिमों को लेकर सतर्क कर दिया है। होर्मुज स्ट्रेट में संभावित व्यवधान और अमेरिका ईरान बातचीत को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी बाजार की धारणा को प्रभावित किया। निवेशकों की नजर अब भारत और अमेरिका में आने वाले महंगाई के आंकड़ों पर है क्योंकि इनके आधार पर आगे की मौद्रिक नीति को लेकर बाजार नई दिशा तय कर सकता है। हालांकि विदेशी निवेश की मजबूत आवक और कंपनियों की बेहतर कमाई बाजार के लिए राहत देने वाले संकेत बने हुए हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि निकट अवधि में वैश्विक घटनाक्रम कच्चे तेल की कीमतें और महंगाई के आंकड़े भारतीय शेयर बाजार की चाल तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

  • कच्चे तेल की खोज….. समुद्र मंथन योजना पर 84084 करोड़ खर्च करेगा भारत

    कच्चे तेल की खोज….. समुद्र मंथन योजना पर 84084 करोड़ खर्च करेगा भारत


    नई दिल्‍ली।
    भारत (India) एनर्जी निर्भरता (Energy Dependence) को कम करने के लिए कई बड़े कदम उठा रहा है. अब भारत ने समुद्र से कच्‍चे तेल (Crude Oil) को निकालने के लिए एक योजना शुरू किया है. इस योजना के तहत समुद्र के नीचे अधिक तेल और प्राकृतिक गैस की खोज की जाएगी. यह एक लॉन्‍गटर्म स्‍कीम है. इस प्रोग्राम का नाम ‘समुद्र मंथन’ रखा गया है.

    नेशनल आफसोर एक्‍सप्‍लोरेशन योजना (समुद्र मंथन) के तहत 84,084 करोड़ रुपये के खर्च को मंजूरी दी गई है. यह खर्च वित्त वर्ष 2030-31 तक चलेगा, जिसका लक्ष्य गहरे जल क्षेत्रों में घरेलू तेल और गैस की खोज को बढ़ावा देकर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है. समुद्र में उन जगहों पर तेल और गैस की खोज की जाएगी, जहां पर विशाल संसाधन मौजूद हैं और अभी तक किसी ने खोज नहीं की है।

    सरकार के अनुसार, यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नजरिए को दर्शाती है, जिसे उन्होंने पहली बार 2025 के स्वतंत्रता दिवस भाषण में चर्चा की थी, जिसमें भारत की ऊर्जा क्षमता को उजागर करने के लिए आधुनिक युग के समुद्र मंथन का संचालन करने की बात कही गई थी।

    यह कार्यक्रम ऐसे समय में शुरू किया गया है जब भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 88-89% और प्राकृतिक गैस का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है. यानी देश की ऊर्जा की बढ़ती मांग विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है और जियो-पॉलिटिक तनाव के कारण भारत के लिए एनर्जी सप्‍लाई प्रभावित हुई है।


    इस योजना के तहत क्‍या होगा?

    भारत में कई आफशोर सेमीडेंट्र्री बेसिन हैं, जिनमें तेल और प्राकृतिक गैस मौजूद हो सकती है, लेकिन इनमें से कई अभी भी बड़े पैमाने पर अनछुए हैं क्योंकि वहां से तेल निकालना कठिन और महंगा है. इस योजना के तहत, सरकार बड़े पैमाने पर सर्वे, भूवैज्ञानिक अध्ययन, ड्रिलिंग और बुनियादी ढांचे के विकास जैसे प्रमुख प्रारंभिक चरण के कार्यों के लिए धन उपलब्ध कराएगी।

    इसका उद्देश्य उच्च गुणवत्ता वाले भूवैज्ञानिक डेटा का उत्पादन करना है जो आशाजनक हाइड्रोकार्बन संसाधनों की पहचान कर सके और तेल-गैस निकालने में मदद कर सके. भारत के इस कदम से घरेलू स्‍तर पर तेल और गैस में बड़ा निवेश आ सकता है. साथ ही भारत का एनर्जी क्षमता मजबूत हो सकती है।


    समुद्र मंथन आखिर करेगा क्या?

    इस योजना के तहत आधुनिक टेक्‍नोलॉजी का उपयोग करते हुए उन जगहों की पहचानल की जाएगी, जहां पर तेल और गैस के होने की संभावना है. इसके बाद आशाजनक गहरे पानी और अति-गहरे पानी के क्षेत्रों में ड्रिलिंग की जाएगी. इस योजना के तहत सीमावर्ती जगहों में वैज्ञानिक ड्रिलिंग, सामान्य उत्पादन और निकासी, तेल और गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्र, आधुनिक टेक, डिजिटल प्रोगाम मैनेजमेंट और क्षमता निर्माण भी शामिल हैं।

    इससे क्‍या लाभ हो सकता है?
    सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से समय के साथ तेल और गैस भंडार में 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तेल के बराबर मात्रा जुड़ जाएगी. हालांकि व्यावसायिक उत्पादन में अभी कई साल लगेंगे, लेकिन सफल खोजों से भारत की ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम हो सकती है, लॉन्‍गटर्म ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है, निवेश आकर्षित हो सकता है, रोजगार पैदा हो सकते हैं और देश की ऊर्जा क्षमताओं को बढ़ावा मिल सकता है।

  • अब समुद्र से निकलेगी ऊर्जा की नई ताकत, 'समुद्र मंथन' योजना से आयात बिल घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैया

    अब समुद्र से निकलेगी ऊर्जा की नई ताकत, 'समुद्र मंथन' योजना से आयात बिल घटाने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की तैया


    नई दिल्ली। भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और दूरगामी कदम उठाया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की नई समुद्र मंथन योजना का उद्देश्य देश में गहरे समुद्री क्षेत्रों में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खोज को नई रफ्तार देना है। सरकार का मानना है कि इस महत्वाकांक्षी योजना से आने वाले वर्षों में भारत की विदेशी तेल और गैस पर निर्भरता कम होगी और ऊर्जा सुरक्षा पहले से कहीं अधिक मजबूत बनेगी।

    भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। हर साल देश को कच्चे तेल के आयात पर करीब 144 अरब डॉलर यानी लगभग 13 लाख करोड़ रुपए खर्च करने पड़ते हैं। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उतार चढ़ाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल आयात आधारित व्यवस्था पर लंबे समय तक निर्भर रहना देश के लिए सुरक्षित विकल्प नहीं हो सकता। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए सरकार ने घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने पर फोकस किया है।

    केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 84084 करोड़ रुपए की लागत वाली राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना समुद्र मंथन को मंजूरी दी है। यह योजना वित्त वर्ष 2030-31 तक लागू रहेगी और इसे भारत के इतिहास का सबसे बड़ा ऑफशोर तेल एवं गैस अन्वेषण अभियान माना जा रहा है। सरकार का लक्ष्य केवल नए भंडार तलाशना नहीं बल्कि ऐसा मजबूत तंत्र तैयार करना है जो भविष्य में ऊर्जा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की नींव रख सके।

    योजना के तहत बेहतर भू वैज्ञानिक आंकड़ों का उपयोग किया जाएगा ताकि संभावित तेल और गैस क्षेत्रों की सटीक पहचान हो सके। साथ ही जोखिम साझा करने की व्यवस्था विकसित की जाएगी जिससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां अधिक निवेश के लिए आगे आएं। साझा बुनियादी ढांचे और घरेलू विनिर्माण क्षमता को भी बढ़ावा दिया जाएगा ताकि अन्वेषण और उत्पादन की लागत कम हो तथा परियोजनाओं का क्रियान्वयन तेज हो सके।

    सरकार का कहना है कि वर्ष 2014 के बाद से हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में कई बड़े सुधार किए गए हैं। पहले जिन क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज की अनुमति नहीं थी उनमें से 99 प्रतिशत से अधिक क्षेत्रों को खोल दिया गया है। इससे भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के 10 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक हिस्से में पहली बार अन्वेषण का रास्ता साफ हुआ है। इसके अलावा प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट की जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट लागू कर प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और सरल बनाया गया है।

    सरकार ने ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन अधिनियम 2025 और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियम 2025 जैसे सुधारों के जरिए कानूनी और नियामकीय ढांचे को भी आधुनिक बनाया है। कारोबार करने में आसानी बढ़ाने विवाद समाधान को मजबूत करने और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने के लिए कई नई व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। वहीं ओएनजीसी और ऑयल इंडिया जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के प्रदर्शन मूल्यांकन में भी अब तेल और गैस खोज गतिविधियों को अधिक महत्व दिया जाएगा।

    सरकार का विश्वास है कि समुद्र मंथन योजना केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि इससे भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी विदेशी मुद्रा की बचत होगी आयात बिल में कमी आएगी और देश आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की ओर अधिक तेजी से आगे बढ़ सकेगा। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में यह योजना भारत के ऊर्जा भविष्य को मजबूत बनाने वाली एक महत्वपूर्ण रणनीतिक पहल साबित हो सकती है।

  • हूती नाकेबंदी के बीच भारत के लिए राहत, सऊदी तेल लेकर लाल सागर से सुरक्षित निकले दो टैंकर

    हूती नाकेबंदी के बीच भारत के लिए राहत, सऊदी तेल लेकर लाल सागर से सुरक्षित निकले दो टैंकर


    नई दिल्ली । यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब की तेल आपूर्ति पर नाकेबंदी की घोषणा के बीच भारत के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। सऊदी अरब से कच्चा तेल लेकर भारत आ रहे दो बड़े तेल टैंकर लाल सागर के संवेदनशील क्षेत्र से सुरक्षित बाहर निकल गए हैं। इससे फिलहाल भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर तत्काल किसी बड़े असर की आशंका कम हो गई है, हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार को लेकर चिंता जरूर बढ़ा दी है।

    सूत्रों के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) द्वारा किराए पर लिया गया सुएजमैक्स श्रेणी का टैंकर अमेजन सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह से करीब 10 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर रवाना हुआ था। वहीं मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) के लिए अफ्रामैक्स श्रेणी का टैंकर रोडोस लगभग 7 लाख बैरल कच्चा तेल लेकर भारत की ओर बढ़ रहा है। दोनों जहाज 20 जुलाई के आसपास यनबू बंदरगाह से निकले थे और शुरुआत में स्वेज नहर की दिशा में आगे बढ़े।

    हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी तेल आपूर्ति को निशाना बनाने की चेतावनी के बाद दोनों टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपनी लोकेशन बताने वाला ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर दिया और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के रास्ते लाल सागर से बाहर निकल गए। यह कदम समुद्री सुरक्षा के लिहाज से एहतियात के तौर पर उठाया गया, क्योंकि हाल के महीनों में इस क्षेत्र में कई व्यापारिक जहाजों पर हमलों की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

    लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माने जाते हैं। एशिया और यूरोप के बीच बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और अन्य सामान इसी रास्ते से भेजा जाता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह का सैन्य तनाव या नाकेबंदी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर सीधा असर डाल सकती है।

    भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है और सऊदी अरब उसके प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। इसलिए इस मार्ग में किसी भी तरह की बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था, ईंधन कीमतों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बन सकती है। फिलहाल दोनों टैंकरों के सुरक्षित आगे बढ़ने से तत्काल आपूर्ति बाधित होने का खतरा टल गया है।

    हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या लाल सागर के समुद्री मार्ग पर लंबे समय तक खतरा बना रहता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी आ सकती है। इससे भारत जैसे आयातक देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ सकता है। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक आपूर्ति और समुद्री मार्गों का उपयोग किया जा सके।

  • अमेरिका-ईरान तनाव नरम पड़ते ही फिसले कच्चे तेल के दाम, एक हफ्ते की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज

    अमेरिका-ईरान तनाव नरम पड़ते ही फिसले कच्चे तेल के दाम, एक हफ्ते की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज


    वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के संकेत मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। ब्रेंट क्रूड और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) दोनों की कीमतें करीब एक सप्ताह के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं। अमेरिकी प्रशासन द्वारा ईरान के खिलाफ प्रस्तावित हवाई कार्रवाई फिलहाल टालने से कूटनीतिक समाधान की उम्मीद बढ़ी है, जिससे तेल आपूर्ति को लेकर बाजार की चिंताएं कुछ कम हुई हैं।

    सोमवार को ब्रेंट क्रूड 8.42 डॉलर यानी 8.7 फीसदी टूटकर 88.36 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जो 17 जुलाई के बाद का सबसे निचला स्तर है। वहीं WTI क्रूड 6.70 डॉलर यानी 7.5 फीसदी गिरकर 82.61 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जो 16 जुलाई के बाद का न्यूनतम स्तर माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई फिलहाल रोकने के फैसले से बाजार में राहत का माहौल बना है। इसके साथ ही होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति सामान्य होने की उम्मीद भी मजबूत हुई है, जिसका सीधा असर कीमतों पर देखने को मिला।

    ट्रंप ने कूटनीति को दी प्राथमिकता

    संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वाल्ट्ज के अनुसार, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत को और समय देने के उद्देश्य से सैन्य कार्रवाई स्थगित करने का फैसला किया है। ट्रंप ने भी कहा कि दोनों देशों के बीच वार्ता सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है और समझौते की संभावना बनी हुई है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कूटनीतिक प्रयास विफल रहे तो अमेरिका कड़ी सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा।

    सऊदी और रूस से जुड़ी घटनाओं पर भी नजर

    इस बीच सऊदी अरब की वायु रक्षा प्रणाली ने इराक की ओर से भेजे गए ड्रोन को मार गिराया। वहीं यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के यनबू तेल निर्यात केंद्र से जुड़ी आपूर्ति लाइनों को निशाना बनाने का दावा किया है। दूसरी ओर, रूस के ब्लैक सी स्थित प्रमुख तेल निर्यात टर्मिनल पर ड्रोन हमलों से कजाकिस्तान के तेल उत्पादन पर भी असर पड़ा, हालांकि बाद में कैस्पियन पाइपलाइन कंसोर्टियम ने टर्मिनल से तेल लोडिंग फिर शुरू होने की पुष्टि की।

    बाजार में बनी रह सकती है अस्थिरता

    बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भले ही फिलहाल तनाव कम होता दिखाई दे रहा हो, लेकिन जब तक कोई औपचारिक समझौता नहीं हो जाता, तब तक अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। भू-राजनीतिक घटनाक्रम और तेल आपूर्ति की स्थिति आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेंगे।

  • पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका से और महंगा हुआ कच्चा तेल, बेंट क्रूड 101 डॉलर के पार

    पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका से और महंगा हुआ कच्चा तेल, बेंट क्रूड 101 डॉलर के पार


    नई दिल्ली।
    अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग और खाड़ी के देशों से क्रूड ऑयल की ग्लोबल सप्लाई बाधित होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड दो महीने के ऊपरी स्तर पर पहुंच गया। आज ब्रेंट क्रूड तेजी दिखाते हुए 101 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी पार कर गया। इसी तरह वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड भी आज 92 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया।

    अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड ने आज 1.16 डॉलर प्रति बैरल की उछाल के साथ 95.23 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से कारोबार की शुरुआत की। ट्रेडिंग शुरू होने के बाद इसकी कीमत उछल कर 101.01 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले दो महीने के दौरान ब्रेंट क्रूड का ये सबसे ऊंचा स्तर है। हालांकि बाद में इसकी कीमत में मामूली गिरावट भी आई। भारतीय समय के मुताबिक रात 8:30 बजे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 6.59 डॉलर प्रति बैरल यानी 7.01 प्रतिशत की तेजी के साथ 100.66 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

    उल्लेखनीय है कि दो महीने पहले 24 मई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 94.92 डॉलर प्रति बैरल से लेकर 96.30 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था। इसके बाद अमेरिका और ईरान के बीच शांति होने की उम्मीद की वजह से क्रूड ऑयल की कीमत में गिरावट का रुख बन गया था, जिसकी वजह से एक जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंड क्रड 71.44 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक आ गया था। हालांकि छह जुलाई के बाद इसकी कीमत में एक बार फिर तेजी का रुख बन गया।

    ब्रेंट क्रूड की तरह वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) क्रूड ने आज 0.90 डॉलर प्रति बैरल की बढ़त के साथ 87.73 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से आज के कारोबार की शुरुआत की। दिन के कारोबार में डब्ल्यूटीआई क्रूड उछल कर 92.15 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया। हालांकि बाद में इसकी कीमत में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई। भारतीय समय के मुताबिक शाम 8:30 बजे अंतरराष्ट्रीय बाजार में डब्ल्यूटीआई क्रूड 5.20 डॉलर प्रति बैरल यानी 5.99 प्रतिशत की तेजी के साथ 92.03 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहा था।

    आपको बता दें कि अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता विफल हो जाने, सीजफायर खत्म होने और दोनों देशों द्वारा एक दूसरे के ठिकानों पर लगातार हमला करने की वजह से कच्चे तेल की कीमत में लगातार तेजी का रुख बना हुआ है। पिछले सप्ताह अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 87 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर एक महीने के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया था। इसी तरह डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 81 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के ऊपर चला गया था। इसके बाद तीन दिन तक सुस्ती का माहौल बना रहा, लेकिन पिछले पांच ट्रेडिंग सेशन से कच्चे तेल की कीमत में एक बार फिर तेजी का रुख बन गया है, जिसकी वजह से आज इसने पिछले दो महीने के सबसे ऊंचे स्तर को पार कर लिया है।

    जानकारों का कहना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ रहे तनाव की वजह से एक बार फिर कच्चे तेल की सौ डॉलर के स्तर के ऊपर जा सकती है। कच्चे तेल की कीमत मे होने वाली बढ़ोतरी भारत जैसे कच्चे तेल के आयातक देश की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती है। फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के एक्जेक्यूटिव डायरेक्टर अनिल भंसाली का कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक तेज बनी रही तो भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट काफी बढ़ सकता है। इसके साथ ही देश का इंपोर्ट बिल भी लक्ष्य से काफी अधिक हो सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमत के कारण फॉरेन कैपिटल आउटफ्लो (विदेशी पूंजी की निकासी) भी तेज हो सकता है, जिसके कारण भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो सकती है।