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  • कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर मानसून.. भारत के सामने दोहरी चुनौती.. आम आदमी पर महंगाई की मार!

    कच्चे तेल के बढ़ते दाम और कमजोर मानसून.. भारत के सामने दोहरी चुनौती.. आम आदमी पर महंगाई की मार!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) के सामने इस समय दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। पहली अंतरराष्ट्रीय बाजार (International Market) में कच्चे तेल (Crude oil) की बढ़ती कीमतें (Rising Prices) और दूसरी मानसून के कमजोर रहने से पैदा हुआ सूखे का खतरा। ये दोनों समस्याएं अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन जब एक साथ सामने आती हैं, तो इनका असर देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम आदमी की रसोई तक दिखाई दे सकता है। महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल को बढ़ाता है और परिवहन से लेकर खेती तक की लागत पर दबाव डालता है। वहीं, बारिश की कमी से फसलों की पैदावार प्रभावित होने, किसानों की आमदनी घटने और खाने-पीने की चीजों के महंगे होने का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि भारत के लिए चिंता की बात ज्यादा क्या है? महंगा कच्चा तेल, सूखा या फिर इन दोनों का एक साथ असर? आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ होता है कि असली चुनौती इन दोनों समस्याओं के एक साथ बढ़ने से पैदा हो रही है।


    महंगे तेल ने बढ़ाया भारत का आयात बिल

    भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भारत का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। एक साल पहले इसी अवधि में यह 61.9 अरब डॉलर था। खास बात यह है कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा में एक प्रतिशत से भी कम की बढ़ोतरी हुई।

    इसका मतलब है कि आयात बिल में तेज उछाल के पीछे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की बड़ी भूमिका रही। आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में अब तक भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि जुलाई में यह लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल थी। इससे भारत को पहले के मुकाबले तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। इसका असर देश के व्यापार संतुलन और रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है।


    महंगे कच्चे तेल का आम आदमी पर क्या असर होगा?

    – कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।
    – परिवहन महंगा होने का खतरा:- ट्रक, बस और दूसरे मालवाहक वाहनों के ऑपरेशन की लागत बढ़ सकती है।
    – खाने-पीने की चीजों पर दबाव:- खेतों से मंडियों और मंडियों से दुकानों तक सामान पहुंचाने का खर्च बढ़ सकता है।
    – खेती की लागत में बढ़ोतरी:- डीजल से चलने वाले पंप, ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों का इस्तेमाल महंगा पड़ सकता है।
    – कंपनियों की लागत बढ़ेगी:- फैक्ट्रियों और अन्य उद्योगों को उत्पादन और माल की ढुलाई पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम तुरंत उसी अनुपात में बढ़ जाएंगे। सरकार के टैक्स, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है। अगर पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहते हैं, तब भी महंगे तेल का आर्थिक बोझ कहीं और पड़ सकता है। कंपनियां अपने मुनाफे में कटौती कर सकती हैं या धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल सकती हैं।


    कमजोर मानसून से खेती पर मंडराया संकट

    एक तरफ महंगा तेल भारत के खर्च को बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ कमजोर मानसून कृषि क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ा सकता है। भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अब भी बारिश पर निर्भर है। समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी में नमी कम हो सकती है, जलाशयों में पानी घट सकता है और फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।

    भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक, जून से सितंबर 2026 के मानसून सीजन में देश में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कम बारिश का असर केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहता। अगर जलाशयों और जमीन के नीचे मौजूद पानी का स्तर गिरता है, तो किसानों के लिए अगली रबी फसल की बुवाई और सिंचाई करना भी मुश्किल हो सकता है। गेहूं, सरसों, चना और दूसरी रबी फसलों की बुवाई के समय पर्याप्त नमी और सिंचाई का पानी उपलब्ध होना जरूरी है। पानी की कमी होने पर किसानों को अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है या उन्हें कम क्षेत्र में खेती करनी पड़ सकती है।


    जलाशयों में पानी की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही

    केंद्रीय जल आयोग (CWC) के 22 अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 निगरानी वाले प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का 66.7 प्रतिशत था। लेकिन, दक्षिण भारत के 50 निगरानी वाले जलाशयों की स्थिति अधिक चिंताजनक रही। इनमें जल भंडारण 42.34 प्रतिशत था, जबकि पिछले 10 सालों का इसी अवधि का औसत 77.94 प्रतिशत रहा है। यह अंतर बताता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी की उपलब्धता एक जैसी नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर जलाशयों में पर्याप्त पानी दिखाई देने के बावजूद कुछ क्षेत्रों के किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलाशयों के ये आंकड़े देश के सभी कुओं, नदियों और सिंचाई स्रोतों की स्थिति नहीं बताते। फिर भी जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है और जलाशयों में पानी घटा है, वहां खेती पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।


    महंगा तेल और सूखा एक साथ आए तो क्या होगा?

    भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इन दोनों समस्याओं का एक साथ सामने आना है। अगर फसल की पैदावार घटती है और उसी समय डीजल महंगा होता है, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है और बाजार तक कृषि उत्पाद पहुंचाने का खर्च भी अधिक हो सकता है। इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

    पहला असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा। कम बारिश के कारण अगर फसल खराब होती है, तो किसानों के पास बेचने के लिए कम उपज होगी। ऐसे में बाजार में कुछ फसलों की कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों की कुल कमाई घट सकती है।

    वहीं, दूसरा असर आम परिवारों के बजट पर होगा। अगर सब्जियों, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवारों को रोजमर्रा के खर्च के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। इसके साथ ही परिवहन और दूसरी सेवाओं की लागत बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    तीसरा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हो सकता है। खेती से आमदनी कम होने पर ग्रामीण परिवार कपड़े, वाहन, घरेलू उपकरण और अन्य सामानों पर खर्च घटा सकते हैं। इससे उन कारोबारों पर भी असर पड़ सकता है, जो ग्रामीण मांग पर निर्भर हैं। हालांकि, महंगाई पर इन दोनों कारकों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं, फसल उत्पादन कितना प्रभावित होता है और सरकार आपूर्ति को बेहतर बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती है।


    महंगाई के आंकड़े क्या बता रहे हैं?

    महंगे तेल और कमजोर मानसून की चिंता ऐसे समय बढ़ रही है, जब खुदरा महंगाई में भी तेजी दर्ज की गई है। दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। खाद्य महंगाई दर भी अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत पहुंच गई। खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी का मतलब है कि आम लोगों को खाने-पीने की वस्तुओं के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि खाद्य महंगाई में हुई पूरी बढ़ोतरी सिर्फ कमजोर मानसून के कारण है। मौसमी बदलाव, बाजार में आपूर्ति और पिछले साल की कीमतें भी इसमें भूमिका निभाती हैं। फिर भी अगर बारिश की कमी के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है और महंगे ईंधन से परिवहन लागत बढ़ती है, तो खाद्य महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।


    RBI के सामने क्यों बढ़ेगी चुनौती?

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने की होगी। जब तेल महंगा होता है, तो कंपनियों की लागत बढ़ती है। वहीं, खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने पर आम लोगों की खरीदने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों से जुड़े फैसले लेना आसान नहीं रहता। RBI ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। उसकी मौद्रिक नीति में कमजोर बारिश, अल नीनो और ऊर्जा की ऊंची कीमतों को महंगाई के लिए जोखिम के रूप में रेखांकित किया गया था।

    रेपो रेट वह दर है, जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें बदलाव का असर समय के साथ होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है। लेकिन यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। ब्याज दर बढ़ाने से बारिश नहीं बढ़ सकती और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सीधे कम हो सकती है। इसका उद्देश्य महंगाई के व्यापक और लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभाव को सीमित करना है। दूसरी तरफ ब्याज दरें अधिक रहने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे घर खरीदने, वाहन खरीदने और कारोबार में निवेश करने की गति प्रभावित हो सकती है। यानी RBI को महंगाई और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।

  • वैश्विक तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच RBI MPC का फैसला आज, रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना

    वैश्विक तनाव और महंगे कच्चे तेल के बीच RBI MPC का फैसला आज, रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना


    नई दिल्ली:
    भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति बुधवार को अपनी द्विमासिक समीक्षा बैठक के फैसलों की घोषणा करेगी। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति ऐसे समय में अपना निर्णय सुनाने जा रही है, जब देश और दुनिया में महंगाई तथा ऊर्जा कीमतों को लेकर चिंताएं बढ़ी हुई हैं। इस बैठक पर निवेशकों, उद्योग जगत, कर्ज लेने वालों और वित्तीय बाजारों की नजर बनी हुई है। समिति के सामने महंगाई पर नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है।

    एमपीसी की बैठक बढ़ती खुदरा महंगाई, 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव की पृष्ठभूमि में हो रही है। इन परिस्थितियों का असर वित्तीय बाजारों और नीति निर्माताओं की चिंताओं पर भी पड़ा है। आरबीआई ने पिछली समीक्षा में रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखा था। हालांकि, इस बार कई अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ ब्याज दर में बढ़ोतरी की संभावना जता रहे हैं। ऐसा होने पर फरवरी 2023 के बाद यह पहली दर बढ़ोतरी हो सकती है।

    बैंक ऑफ अमेरिका का अनुमान है कि आरबीआई दिसंबर तक इंतजार करने के बजाय अक्टूबर की बैठक में ही रेपो रेट में 25 आधार अंक यानी 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है। उसके मुताबिक, करीब दो वर्षों की मौद्रिक सहजता के बाद केंद्रीय बैंक अब नीतिगत समर्थन को धीरे-धीरे वापस लेने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। वहीं, एसबीआई रिसर्च ने भी 25 आधार अंकों की दर वृद्धि की संभावना को मजबूत बताया है। इसके पीछे बढ़ता मुद्रास्फीति दबाव, कमजोर होती वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, बदलती तरलता स्थिति और वैश्विक जोखिमों का दोबारा आकलन प्रमुख कारण बताए गए हैं।

    एसबीआई रिसर्च के अर्थशास्त्रियों के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में बाद में कार्रवाई करने के बजाय पहले से कदम उठाना अधिक विवेकपूर्ण हो सकता है। महंगाई के आंकड़े भी आरबीआई के सामने चुनौती बढ़ा रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इसके अलावा मजबूत अल नीनो प्रभाव और अक्टूबर में सामान्य से कम बारिश की आशंका से रबी फसलों के उत्पादन पर असर पड़ने की चिंता है। इससे आने वाले समय में खाद्य महंगाई का जोखिम बढ़ सकता है।

    वैश्विक स्तर पर बढ़ती बॉन्ड यील्ड और ऊंची ऊर्जा कीमतें भी ब्याज दरों को लंबे समय तक मौजूदा स्तर पर बनाए रखने की चुनौती बढ़ा रही हैं। ऐसे में आरबीआई के फैसले में महंगाई के साथ आर्थिक गतिविधियों और वित्तीय परिस्थितियों को भी महत्व मिलने की उम्मीद है। बाजार की नजर सिर्फ रेपो रेट पर नहीं, बल्कि महंगाई अनुमान, आर्थिक वृद्धि के आकलन और भविष्य की मौद्रिक नीति के रुख पर भी रहेगी। एमपीसी के ये संकेत आने वाले महीनों में बाजार और ब्याज दरों की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।

  • कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार: OPEC+ के 7 देशों ने नवंबर में उत्पादन न बढ़ाने का फैसला किया

    कच्चा तेल फिर 100 डॉलर के पार: OPEC+ के 7 देशों ने नवंबर में उत्पादन न बढ़ाने का फैसला किया


    नई दिल्ली। ईरान से जुड़े संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। बढ़ती कीमतों और सप्लाई पर दबाव के बावजूद OPEC+ के सात प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने नवंबर में उत्पादन मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने का फैसला किया है।

    रविवार को हुई बैठक में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाखस्तान, अल्जीरिया और ओमान ने उत्पादन में न तो बढ़ोतरी करने और न ही कटौती करने पर सहमति जताई। यानी नवंबर में इन देशों से बाजार में तेल की सप्लाई फिलहाल मौजूदा स्तर के आसपास ही रहेगी। अब समूह की अगली बैठक 1 नवंबर को होगी, जिसमें बाजार की स्थिति की समीक्षा की जाएगी।

    100 डॉलर के पार क्यों पहुंचा कच्चा तेल?

    कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा तेजी को ईरान से जुड़े संघर्ष और उससे पैदा हुए सप्लाई जोखिम से जोड़ा जा रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद शुरू हुए संघर्ष ने तेल की वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाई है।

    ब्रेंट क्रूड को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों का प्रमुख बेंचमार्क माना जाता है। ऐसे में इसका 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जाना वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। सप्लाई में संभावित रुकावट की आशंका बढ़ने पर बाजार में कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

    OPEC+ के 7 देशों का फैसला क्या है?

    रविवार की बैठक में OPEC+ के इस उपसमूह ने नवंबर के लिए उत्पादन नीति में कोई बदलाव नहीं करने का निर्णय लिया। इसका मतलब है कि फिलहाल इन सात देशों की ओर से बाजार में अतिरिक्त कच्चा तेल लाने की योजना नहीं है।

    सऊदी अरब और रूस जैसे प्रमुख उत्पादकों के साथ इराक, कुवैत, कजाखस्तान, अल्जीरिया और ओमान भी इस समूह में शामिल हैं। अगली बैठक 1 नवंबर को होगी। तब तेल की कीमतों, वैश्विक मांग और सप्लाई की स्थिति को देखते हुए आगे का फैसला लिया जाएगा।

    G7 बाजार में उतारेगा 100 मिलियन बैरल तेल-ईंधन

    दूसरी ओर, बढ़ती कीमतों के बीच G7 देशों ने बाजार में अतिरिक्त तेल और ईंधन उपलब्ध कराने की तैयारी की है। शुक्रवार को G7 ने आने वाले हफ्तों में करीब 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन उत्पाद जारी करने की योजना की घोषणा की।

    इसकी शुरुआत बड़ी मात्रा में डीजल की सप्लाई से होगी। योजना के मुताबिक अगले 20 दिनों के भीतर डीजल की शुरुआती बड़ी खेप बाजार में उतारी जाएगी। इसके बाद शेष मात्रा को करीब चार महीनों में बाजार में लाने की तैयारी है।

    अमेरिका में डीजल की कीमतें भी बढ़ीं

    कच्चे तेल की तेजी का असर पेट्रोलियम उत्पादों पर भी दिखाई दे रहा है। अमेरिका में डीजल की कीमतें हाल में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं। इसका सीधा असर किसानों, ट्रक ऑपरेटरों और उन उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है, जो परिवहन और दूसरे कामों के लिए डीजल पर निर्भर हैं।

    डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी से माल ढुलाई और कृषि क्षेत्र की लागत बढ़ने की आशंका भी रहती है, जिसका असर आगे चलकर अन्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है।

    अब 1 नवंबर की बैठक पर नजर

    फिलहाल वैश्विक तेल बाजार में दो अलग-अलग कदम दिखाई दे रहे हैं। एक ओर OPEC+ के सात प्रमुख देश नवंबर में उत्पादन बढ़ाकर अतिरिक्त सप्लाई देने के पक्ष में नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर G7 बाजार में 100 मिलियन बैरल तेल और ईंधन उत्पाद लाने की तैयारी कर रहा है।

    ऐसे में आने वाले दिनों में ईरान से जुड़े संघर्ष, वैश्विक सप्लाई और तेल की मांग के साथ-साथ 1 नवंबर की OPEC+ बैठक पर बाजार की नजर रहेगी। इस बैठक में उत्पादन नीति में किसी बदलाव को लेकर फैसला हो सकता है।

  • जी7 देश जारी करेंगे 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल, अगले चार महीनों में होगी आपूर्ति

    जी7 देश जारी करेंगे 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल, अगले चार महीनों में होगी आपूर्ति


    नई दिल्ली:
    जी7 और उसके साझेदार देश अपने इमरजेंसी भंडार से करीब 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल और डीजल जारी करेंगे। यह फैसला बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच लिया गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति और जी7 के मौजूदा चेयरमैन इमैनुएल मैक्रों ने बताया कि जी7 ईंधन की कीमतों में कमी लाना चाहता है। इसके तहत अगले चार महीनों में इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी की देखरेख में रणनीतिक भंडार से आपूर्ति जारी की जाएगी।

    यह फैसला ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका ने संकेत दिया है कि अगर यूरोपीय देशों ने अपने भंडार से और आपूर्ति जारी नहीं की, तो डीजल निर्यात पर भारी असर डालने वाला प्रतिबंध लगाया जा सकता है। ऐसा कदम यूरोप के लिए आपूर्ति के एक महत्वपूर्ण स्रोत को प्रभावित कर सकता है। यूरोपीय महाद्वीप डीजल उत्पादन में कमी को पूरा करने के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है। जी7 देशों का यह कदम बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति उपलब्ध कराने की दिशा में उठाया गया है।

    ईरान युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद आईईए ने मार्च में 400 मिलियन बैरल तेल जारी करने की योजना बनाई थी। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यूरोपीय देशों की आलोचना करते हुए कहा था कि उन्होंने इन बैरल को अपेक्षित तेजी से उपलब्ध नहीं कराया। जी7 के एक बयान से संकेत मिला है कि अब जारी किए जाने वाले 100 मिलियन बैरल में वे बैरल भी शामिल हो सकते हैं, जो मार्च में जारी किए गए स्टॉक के तहत अभी तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।

    मैक्रों ने कहा कि सभी देशों ने मिलकर उन अनुपातों के अनुसार रणनीतिक भंडार जारी करने का संकल्प लिया है जिनका उन्होंने उल्लेख किया है। उन्होंने बताया कि इसमें डीजल पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही, सभी देश यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं कि निर्यात पर कोई रोक न लगे। इस कदम का उद्देश्य ईंधन की उपलब्धता बनाए रखने और कीमतों में कमी लाने की कोशिश करना है। अगले चार महीनों के दौरान होने वाली आपूर्ति की निगरानी आईईए करेगा।

    हालांकि, जी7 और उसके साझेदार देशों की ओर से इमरजेंसी भंडार से तेल और डीजल जारी करने के फैसले के बाद भी कच्चे तेल की कीमत में कोई खास कमी नहीं आई। बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 102 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बंद हुआ। इस तरह करीब 100 मिलियन बैरल की प्रस्तावित आपूर्ति के बावजूद बाजार में कच्चे तेल की कीमत ऊंचे स्तर पर बनी रही। फैसला बढ़ती ईंधन कीमतों और डीजल की आपूर्ति को लेकर बने दबाव के बीच लिया गया है।

  • सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा टूटा, निफ्टी 22,700 के नीचे, कच्चा तेल और FII बिकवाली से दबाव

    सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा टूटा, निफ्टी 22,700 के नीचे, कच्चा तेल और FII बिकवाली से दबाव


    नई दिल्ली: भारतीय शेयर बाजार में सप्ताह की शुरुआत दबाव के साथ हुई। सोमवार के शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स 400 अंक से ज्यादा टूट गया, जबकि निफ्टी 22,700 के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे फिसल गया। सुबह 9:26 बजे सेंसेक्स 72,371.25 अंक पर कारोबार कर रहा था और इसमें 400.47 अंकों की गिरावट दर्ज की गई। वहीं निफ्टी 22,658.75 अंक पर था और 121.50 अंक नीचे कारोबार कर रहा था। कारोबार के दौरान निफ्टी 22,800 के स्तर से भी नीचे चला गया। बाजार में निवेशकों की धारणा कमजोर रही और कई बड़े शेयरों में बिकवाली देखने को मिली। एचडीएफसी बैंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे प्रमुख शेयरों की कमजोरी का भी बाजार पर असर पड़ा। तकनीकी विश्लेषण के मुताबिक, निफ्टी का 22,700 के नीचे टिकना बिकवाली के दबाव को बढ़ा सकता है।

    बाजार में गिरावट के बीच निफ्टी के 22,400 के स्तर की ओर बढ़ने की संभावना पर भी नजर रखी जा रही है, यदि कमजोरी आगे जारी रहती है। यह स्तर तकनीकी रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है और पिछले दो वर्षों की प्रमुख निचली ट्रेंडलाइन तथा 200 सप्ताह के एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज से जुड़ा हुआ है। निफ्टी के लिए 22,650 से 22,700 का क्षेत्र तत्काल सपोर्ट जोन के तौर पर महत्वपूर्ण बताया गया है। इस क्षेत्र के नीचे निर्णायक गिरावट आने पर शॉर्ट टर्म करेक्शन और गहरा हो सकता है। ऐसे में आने वाले कारोबार में इस स्तर के आसपास बाजार की चाल महत्वपूर्ण रहेगी।

    भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ाने वाली प्रमुख वजहों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी शामिल है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते विवाद के बीच कच्चे तेल की कीमत करीब 106 से 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी तेल जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से देश की अर्थव्यवस्था और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ने की चिंता रहती है। इसके अलावा अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और विदेशी निवेशकों यानी FII की भारतीय शेयर बाजार से लगातार निकासी ने भी घरेलू बाजार में बिकवाली के दबाव को बढ़ाया है।

    भारतीय बाजार की कमजोरी के बीच एशियाई और अन्य वैश्विक बाजारों में भी कारोबार का रुख मिला-जुला रहा। टोक्यो समय के अनुसार सुबह 11:51 बजे S&P 500 फ्यूचर्स 0.2 फीसदी नीचे था, जबकि निक्केई 225 फ्यूचर्स में 0.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। जापान का टॉपिक्स 1.5 फीसदी नीचे रहा। हांगकांग का हैंग सेंग 0.6 फीसदी और शंघाई कंपोजिट 0.1 फीसदी गिरावट के साथ कारोबार कर रहे थे। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया का S&P/ASX 200 0.1 फीसदी और Euro Stoxx 50 फ्यूचर्स 0.4 फीसदी की बढ़त के साथ कारोबार कर रहा था। इस तरह वैश्विक बाजारों में एक समान रुख नहीं रहा।

    बाजार की तकनीकी स्थिति को लेकर एलकेपी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ तकनीकी विश्लेषक रूपक डे के मुताबिक, निफ्टी के लिए 22,650 से 22,700 का क्षेत्र तत्काल सपोर्ट जोन है। उनके अनुसार, यदि इस क्षेत्र के नीचे निर्णायक गिरावट आती है तो शॉर्ट टर्म करेक्शन और गहरा हो सकता है। फिलहाल सेंसेक्स की 400 अंक से अधिक की गिरावट, निफ्टी का 22,700 से नीचे जाना, कच्चे तेल की ऊंची कीमत, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और FII की लगातार बिकवाली बाजार के लिए प्रमुख दबाव वाले कारक बने हुए हैं।

  • Crude $100 पार: पेट्रोल-डीजल महंगे होने का बढ़ा खतरा, तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटे का बोझ

    Crude $100 पार: पेट्रोल-डीजल महंगे होने का बढ़ा खतरा, तेल कंपनियों पर बढ़ रहा घाटे का बोझ


    नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। बेंचमार्क Brent Crude 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। भारतीय बास्केट में भी बुधवार को कच्चे तेल की कीमत 108 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रही। सितंबर का औसत भाव भी 100 डॉलर के पार निकल गया है। हालांकि इसका तत्काल असर घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर नहीं दिखा है, लेकिन सरकारी तेल कंपनियों पर लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है।

    पेट्रोल-डीजल बेचने में कंपनियों को घाटा

    महंगे अंतरराष्ट्रीय क्रूड के बावजूद सरकारी तेल कंपनियां यानी OMCs घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई जारी रखे हुए हैं। ICRA के मुताबिक सितंबर में अब तक के औसत क्रूड भाव के आधार पर कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹5 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹23 प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है।

    यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की लागत बढ़ने के बावजूद घरेलू बाजार में ईंधन अपेक्षाकृत कम कीमत पर बिक रहा है। इससे कंपनियों के मार्जिन पर सीधा दबाव पड़ रहा है।

    LPG पर भी करीब ₹200 की अंडर रिकवरी

    OMCs के लिए सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही चुनौती नहीं हैं। घरेलू LPG पर भी कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। ICRA के अनुसार एक LPG सिलिंडर पर करीब ₹200 की अंडर रिकवरी हो रही है।

    अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो कंपनियों की कमाई और प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव और बढ़ सकता है। ऐसे में भविष्य में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का रास्ता खुल सकता है।

    अभी तुरंत दाम बढ़ने की गारंटी नहीं

    फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम तुरंत बढ़ेंगे, यह कहना जल्दबाजी होगी। घरेलू ईंधन की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय क्रूड के भाव से तय नहीं होतीं। सरकार की प्राइसिंग पॉलिसी, टैक्स और तेल कंपनियों के मार्केटिंग मार्जिन की भी इसमें अहम भूमिका होती है।

    मई में सरकार ने चार किस्तों में पेट्रोल की कीमत कुल ₹7.35 प्रति लीटर और डीजल की कीमत ₹7.53 प्रति लीटर बढ़ाई थी। इसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव रहा है और कंपनियों ने तत्काल उसी अनुपात में घरेलू कीमतों में बदलाव नहीं किया।

    हालांकि, अगर कच्चा तेल लंबे समय तक 100 डॉलर के ऊपर रहता है और OMCs का घाटा लगातार बढ़ता है, तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने का दबाव बन सकता है।

    भारत पर क्यों बढ़ेगा दबाव?

    भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90% हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है।

    आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत का क्रूड आयात बिल 56.5% बढ़कर 63.4 अरब डॉलर पहुंच गया। खास बात यह रही कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा लगभग स्थिर रही। यानी आयात बिल में हुई बड़ी बढ़ोतरी का प्रमुख कारण तेल की ऊंची कीमतें रहीं।

    अगर क्रूड की कीमतें आगे भी ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का ट्रेड डेफिसिट बढ़ सकता है। इससे रुपए पर दबाव आने की आशंका रहेगी और आगे चलकर महंगाई का जोखिम भी बढ़ सकता है।

  • ईरान-अमेरिका जंग में तेजी के बीच कच्चे तेल के दामों में भारी इजाफा

    ईरान-अमेरिका जंग में तेजी के बीच कच्चे तेल के दामों में भारी इजाफा


    तेहरान।
    पेट्रोल-डीजल (Petrol and Diesel) के सस्ता होने की उम्मीद कर रहे लोगों के लिए बुरी खबर है। ईरान और अमेरिका में जंग (Iran -America War) तेज हो गई है। मिसाइलों की बारिश ने क्रूड की कीमतों (Crude oil Prices) में आग लगा दी है। अब इंटरनेशन बेंचमार्क (International benchmark) ब्रेंट क्रूड तेजी से 100 डॉलर प्रति बैरल की ओर भाग रहा है। ऐसे में दुनिया भर में एक बार फिर ऊर्जा संकट के और बढ़ने के खतरे बढ़ गए हैं।

    बुधवार सुबह कारोबार शुरू होते ही कच्चे तेल की कीमतों में करीब 1.5% से अधिक की बढ़ोतरी हुई। यह उछाल मंगलवार के तेज उछाल के बाद आया है, जब दोनों तरह के तेल 4 डॉलर से ज्यादा महंगे हो गए थे। ब्लूमबर्ग के अनुसार वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड का दाम सुबह 7 बजे के 1.61 डॉलर प्रति बैरल चढ़कर 91.83 डॉलर पर कारोबार कर रहा था और अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1.91 डॉलर प्रति बैरल चढ़कर 96.56 डॉलर पर था।


    अमेरिका-ईरान के बीच रातभर मिसाइलों की बारिश

    अमेरिका ने ईरान के ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिसके जवाब में ईरान ने पलटवार किया। दोनों देशों के बीच हफ्तों में यह सबसे गंभीर झड़प है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, ये हमले ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) की उन हालिया हरकतों के जवाब में किए गए, जिसमें उन्होंने होर्मुज स्ट्रेट में व्यापारिक जहाजों और अमेरिकी सैनिकों पर हमले की कोशिश की थी।


    होर्मुज पर संकट गहरा

    ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने चेतावनी दी है कि अमेरिकी हमलों से होर्मुज के रास्ते और भी ज्यादा बंद हो जाएंगे। गौरतलब है कि इसी रास्ते से दुनिया की कुल पांचवीं तेल खपत गुजरती थी, लेकिन अब ईरान ने इसे व्यावसायिक जहाजों के लिए प्रभावी रूप से बंद कर दिया है।


    ईरान की जवाबी कार्रवाई और नए हमले

    IRGC ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और दावा किया कि बड़ी संख्या में अमेरिकी सैनिक मारे गए। ईरानी मीडिया के मुताबिक, बहरीन में अमेरिकी बेस पर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला किया गया। जॉर्डन की सेना ने 13 में से 10 मिसाइलें हवा में ही नष्ट कर दीं। अमेरिकी अधिकारियों ने अभी तक किसी भी नुकसान की पुष्टि नहीं की है। कुवैत ने भी दुश्मन ड्रोन गतिविधि के खिलाफ अपनी सेना तैनात कर दी है।


    टैंकरों पर हमले

    पिछले सप्ताहांत (जुलाई के बाद पहली बार) झड़पें तेज हुईं। सोमवार को होर्मुज से निकलते दो टैंकरों पर भी हमले हुए, जिससे तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है और कारोबारी वैकल्पिक रास्ते तलाशने पर मजबूर हैं।

  • क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    क्रूड ऑयल में 2 फीसदी से ज्यादा तेजी ने बढ़ाई टेंशन, आने वाले दिनों में महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

    नई दिल्ली । पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर आम लोगों की चिंता एक बार फिर बढ़ सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज उछाल देखने को मिला है। 20 अगस्त को ब्रेंट क्रूड करीब 2.4 फीसदी की तेजी के साथ 93.78 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 24 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर बताया जा रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी WTI क्रूड की कीमत में भी करीब 2.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई। कच्चे तेल की इस तेजी ने भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए ईंधन की कीमतों को लेकर दबाव बढ़ा दिया है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत बढ़ने वाले हैं लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड लंबे समय तक महंगा बना रहा तो घरेलू कीमतों पर असर पड़ने की संभावना जरूर बढ़ सकती है।

    कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में तनाव बढ़ने के साथ बाजार में तेल की आपूर्ति को लेकर आशंकाएं मजबूत हुई हैं। अमेरिका की ओर से ईरान के समर्थन वाले देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की चेतावनी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। तेल बाजार में किसी बड़े उत्पादक क्षेत्र से सप्लाई बाधित होने की आशंका पैदा होते ही कीमतों में तेजी देखने को मिलती है। यही स्थिति अभी दिखाई दे रही है।

    इस पूरे मामले में हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व बेहद ज्यादा है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की आवाजाही होती है। अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है और इस मार्ग से तेल की आवाजाही प्रभावित होती है तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर दबाव और बढ़ सकता है। इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड कीमतों पर पड़ सकता है।

    भारत के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होता है तो भारतीय तेल कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमत केवल कच्चे तेल के भाव से तय नहीं होती। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स डीलर कमीशन तेल कंपनियों की लागत और मार्जिन तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए क्रूड में तेजी आने के साथ ही अगले दिन पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाए ऐसा जरूरी नहीं है।

    सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कच्चे तेल की कीमत लंबे समय तक 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती है तो क्या होगा। ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों को मौजूदा स्तर पर बनाए रखना तेल कंपनियों और नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। अगर क्रूड की कीमतें और ऊपर जाती हैं तथा रुपया भी डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो आयात लागत पर दोहरा दबाव पड़ सकता है। इसका असर पेट्रोल और डीजल के साथ परिवहन लागत पर भी दिखाई दे सकता है।

    ईंधन महंगा होने का असर केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। डीजल की कीमत बढ़ने पर माल ढुलाई और परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सब्जियों खाद्य सामग्री और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर भी अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है। उद्योगों की लागत बढ़ने से महंगाई पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि क्रूड की कीमतें कितने समय तक ऊंचे स्तर पर रहती हैं और सरकार तथा तेल कंपनियां घरेलू कीमतों को लेकर क्या फैसला करती हैं।

    फिलहाल सबसे बड़ी निगाह अमेरिका और ईरान के बीच तनाव तथा मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति पर बनी हुई है। अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आ सकती है। लेकिन अगर आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ता है तो क्रूड में और तेजी संभव है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि ईंधन की कीमत निश्चित रूप से बढ़ने वाली है लेकिन महंगे क्रूड ने सस्ते पेट्रोल-डीजल की उम्मीदों के सामने जरूर एक नई चुनौती खड़ी कर दी है।

  • मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल

    मिडिल ईस्ट तनाव का असर….कच्चे तेल ने बिगाड़ा खेल, गेहूं-प्याज की कीमतों में भारी उछाल


    नई दिल्ली।
    मिडिल ईस्ट तनाव (Middle East tensions) के बाद तेल कंपनियों ने मई में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे. जून के बाद अमेरिका और ईरान में तनाव घटने से कच्चे तेल की कीमतों में जब कमी आई तो फ्यूल प्राइस कम होने का भरोसा बढ़ गया था. लेकिन खाड़ी में तनाव फिर बढ़ने से ईंधन की कीमतों में कमी की उम्मीद टूटने लगी है. दरअसल, इस वक्त दुनियाभर में चल रहे तनाव का असर भारत के ईंधन और खाने-पीने के सामानों पर सबसे ज्यादा नजर आ रहा है.


    कच्चा तेल में फिर तेजी
    अमेरिका-ईरान के बीच नए समझौते की उम्मीदें कमजोर पड़ने से कच्चे तेल में तेजी आ रही है. इससे ब्रेंट क्रूड 92 डॉलर प्रति बैरल के करीब और WTI क्रूड करीब 85 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया है. आशंका है कि क्रूड जल्द ही 100 डॉलर प्रति बैरल के पास पहुंच सकता है. तेल की कीमतों में ये तेजी ऐसे समय आई है, जब भारत में पेट्रोल और डीजल सस्ता होने की उम्मीद लगाई जा रही थी. लेकिन हालात फिलहाल राहत वाले नहीं दिख रहे क्योंकि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ी दूरी ने एनर्जी मार्केट की बेचैनी बढ़ा दी है।


    भारत पर ज्यादा असर

    भारत के लिए हालात ज्यादा गंभीर हैं, क्योंकि देश अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. महंगे कच्चे तेल से ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ सकती है. लंबे समय तक ऊंचे दाम रहने पर ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।

    तेल के साथ-साथ खाने की थाली से जुड़ी एक और चिंता भी सिर उठाने लगी है. गेहूं की कीमतों में तेजी ने आटा और ब्रेड जैसे जरूरी सामान को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. दुनिया के बड़े गेहूं निर्यातक रूस और यूक्रेन के बीच जारी तनाव ने काला सागर क्षेत्र में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ा दी है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजार से लेकर भारतीय मंडियों तक दिखाई देने लगा है. वैश्विक बाजार में गेहूं करीब 6.7 डॉलर प्रति बुशेल के स्तर पर पहुंच गया है. देश की प्रमुख मंडियों में एक महीने में गेहूं के भाव करीब 4 फीसदी तक बढ़ गए हैं. जाहिर है कि गेहूं की बढ़ती कीमतें आटा, ब्रेड और दूसरे खाद्य उत्पादों की लागत बढ़ा सकती हैं।


    प्याज भी महंगा
    रसोई की चिंता यहीं खत्म नहीं होती, प्याज भी लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाने लगा है. प्याज का औसत खुदरा भाव 37 रुपये 20 पैसे प्रति किलो पर पहुंच गया है जबकि एक महीने पहले कीमत 34 रुपये 53 पैसे प्रति किलो थी. एक साल पहले प्याज का भाव 26 रुपये 86 पैसे प्रति किलो था. इस तेजी की वजह खरीफ प्याज की आवक में देरी है जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया है।

    तेल से लेकर गेहूं और प्याज तक, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पैदा हुआ तनाव भारतीय ग्राहकों की जेब तक पहुंच रहा है. ऐसे में सबकी नजर दो मोर्चों पर टिकी हैं. पहला है कि मिडिल ईस्ट में तेल की दिशा क्या रहती है और दूसरा ये कि काला सागर क्षेत्र में सप्लाई का संकट कितना गहराता है क्योंकि इन दोनों का असर सीधे आपकी गाड़ी के खर्च और रसोई के बजट पर पड़ सकता है।

  • भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म

    भारत की तेल खरीद पर दोहरी मार: कच्चा तेल 10 डॉलर महंगा, रूसी क्रूड की छूट भी लगभग खत्म


    नई दिल्ली। भारतीय तेल रिफाइनरियों के लिए कच्चा तेल खरीदना लगातार महंगा होता जा रहा है। ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमत पिछले दो हफ्तों में करीब 10 डॉलर बढ़कर 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। वहीं, खाड़ी और पश्चिम अफ्रीकी तेल की कीमतों पर भी सप्लाई की कमी के चलते प्रीमियम बढ़ गया है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि रूसी तेल पर मिलने वाली छूट लगभग खत्म हो चुकी है, जबकि वेनेजुएला के क्रूड पर भी डिस्काउंट काफी कम हो गया है।

    अगर खाड़ी क्षेत्र में तेल की सप्लाई सामान्य नहीं होती और रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट वापस नहीं आती, तो भारतीय रिफाइनरियों की लागत और बढ़ सकती है। इसका असर तेल कंपनियों के मार्जिन के साथ आगे चलकर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी पड़ सकता है। एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से कंपनियों को करीब 6 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो सकता है।

    खाड़ी का तेल ब्रेंट से करीब 10 डॉलर महंगा

    ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, बाजार में कच्चे तेल की कमी का फायदा ट्रेडर्स उठा रहे हैं। भारतीय रिफाइनरियों को खाड़ी देशों से तेल खरीदने के लिए स्पॉट मार्केट का सहारा लेना पड़ रहा है, जहां अतिरिक्त प्रीमियम वसूला जा रहा है।

    खाड़ी के सप्लायर दुबई-ओमान बेंचमार्क पर करीब 3 से 4 डॉलर प्रति बैरल अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। वहीं, दुबई-ओमान बेंचमार्क खुद ब्रेंट से करीब 6 से 7 डॉलर महंगा है। इस तरह भारतीय रिफाइनरों के लिए खाड़ी का कच्चा तेल ब्रेंट की तुलना में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल तक महंगा पड़ रहा है।

    सऊदी अरामको की आधिकारिक सेल प्राइस दुबई-ओमान बेंचमार्क से 1.5 से 3 डॉलर नीचे जरूर हैं, लेकिन लाल सागर और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण टर्म डील के तहत मिलने वाली सप्लाई प्रभावित हुई है। इससे भारतीय रिफाइनरियों की स्पॉट मार्केट पर निर्भरता बढ़ गई है।

    जहाजों की कमी ने बढ़ाई लागत

    संघर्ष वाले क्षेत्रों से कच्चा तेल लाने में जहाजों की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती बन गई है। जोखिम वाले समुद्री रास्तों से तेल पहुंचाने के लिए ट्रेडर्स अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। टर्म कॉन्ट्रैक्ट में तेल सस्ता होने के बावजूद भारत तक उसे पहुंचाने के लिए पर्याप्त जहाज नहीं मिलना रिफाइनरों की लागत बढ़ा रहा है।

    पश्चिम अफ्रीकी क्रूड भी महंगा

    खाड़ी के बाद पश्चिम अफ्रीका से मिलने वाला कच्चा तेल भी भारतीय रिफाइनरियों के लिए महंगा हो गया है। इसके चलते कंपनियां अब वैकल्पिक स्रोतों पर नजर डाल रही हैं। अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से कच्चा तेल खरीदने के विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है।

    रूसी तेल की सबसे बड़ी बढ़त खत्म

    कुछ समय पहले तक रूसी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरों के लिए सबसे आकर्षक विकल्पों में था। इसकी बड़ी वजह उस पर मिलने वाली भारी छूट थी। अब यह डिस्काउंट लगभग खत्म हो चुका है। वेनेजुएला के तेल पर मिलने वाली छूट भी काफी कम हो गई है।

    इससे भारतीय रिफाइनरियों के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है—एक तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ रही है और दूसरी तरफ सस्ता रूसी तेल भी पहले जैसा उपलब्ध नहीं है।

    अमेरिकी प्रतिबंध बढ़े तो मुश्किल और बढ़ेगी

    भारतीय तेल कंपनियों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध भी बड़ा जोखिम हैं। अगर अमेरिका रूसी तेल खरीदने वाले देशों और कंपनियों पर प्रतिबंध और कड़े करता है, तो भारत के लिए रूसी क्रूड खरीदना और मुश्किल हो सकता है। ऐसे में रिफाइनरियों को दूसरे देशों से महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है।