Tag: economy

  • भारत का मजबूत बॉन्ड बाजार बना भरोसे का आधार, आर्थिक मजबूती से शेयरों में लौट सकती है तेजी

    भारत का मजबूत बॉन्ड बाजार बना भरोसे का आधार, आर्थिक मजबूती से शेयरों में लौट सकती है तेजी


    नई दिल्ली ।
    भारतीय बॉन्ड बाजार ने हाल के वर्षों में घरेलू परिस्थितियों के साथ-साथ वैश्विक वित्तीय दबावों के बीच भी मजबूत प्रदर्शन किया है। भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता के अनुसार, देश के बॉन्ड बाजार की मजबूती केवल पिछले प्रदर्शन की तुलना में ही बेहतर नहीं रही है, बल्कि दुनिया के कई प्रमुख बाजारों की तुलना में भी इसका प्रदर्शन मजबूत रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती का असर आगे चलकर शेयर बाजार में भी दिखाई दे सकता है।

    उन्होंने बताया कि अमेरिका में बॉन्ड यील्ड लंबे समय के ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार ने अपेक्षाकृत मजबूती बनाए रखी। इसके पीछे केंद्र सरकार की राजकोषीय अनुशासन के प्रति प्रतिबद्धता और आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाओं को महत्वपूर्ण आधार माना गया है। वित्तीय स्थिति में सुधार और भविष्य में राजकोषीय परिणामों के बेहतर रहने की उम्मीद ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।

    मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता और महंगाई से जुड़े संरचनात्मक दबावों में कमी को भी बॉन्ड बाजार के लिए सकारात्मक माना गया है। इन परिस्थितियों ने भारतीय ऋण बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के बॉन्ड बाजार की मजबूती और सार्वजनिक वित्त को संतुलित रखने की नीति को महत्वपूर्ण माना गया है।

    हालांकि, शेयर बाजार में बॉन्ड बाजार जैसी मजबूती अभी पूरी तरह दिखाई नहीं दी है। इसके पीछे वैश्विक स्तर पर निवेशकों की बदलती प्राथमिकताओं को एक वजह माना जा रहा है। खासतौर पर कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कंपनियों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़ी विकास संभावनाएं निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

    पूनम गुप्ता के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार ने जून 2022 से सितंबर 2024 के बीच उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। इसके बाद कुछ दूसरे देशों के बाजारों में तेजी का दौर देखने को मिला। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती लंबे समय में शेयर बाजार के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है और भारतीय इक्विटी दोबारा निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बन सकती है।

    उन्होंने भारत के भुगतान संतुलन और रुपये की स्थिति पर भी चर्चा की। उनके अनुसार, भारत लंबे समय से सीमित चालू खाता घाटे और अपेक्षाकृत मजबूत पूंजी प्रवाह की स्थिति में रहा है। समय के साथ सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले चालू खाता घाटे में कमी आई है, जिससे देश के बाहरी क्षेत्र की मजबूती बढ़ी है।

    उन्होंने कहा कि भारत का चालू खाता घाटा उन स्तरों से काफी नीचे है, जिन्हें आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए सुरक्षित माना जाता है। देश के लिए शुद्ध सेवा निर्यात और विदेशों में रहने वाले भारतीयों से मिलने वाला रेमिटेंस महत्वपूर्ण संरचनात्मक ताकत बने हुए हैं।

    सेवा क्षेत्र से होने वाली आय और रेमिटेंस लगातार मजबूत रहने के कारण वस्तुओं के व्यापार में होने वाले घाटे की भरपाई करने में मदद मिलती है। इसी वजह से भारत का चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से नीचे नियंत्रित रहने में सफल रहा है। यह स्थिति देश की बाहरी आर्थिक स्थिरता और भविष्य की विकास संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार मानी जा रही है।

  • पीयूष गोयल बोले- PPP के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 20 ट्रिलियन डॉलर, 30 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य की ओर बढ़ता भारत

    पीयूष गोयल बोले- PPP के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था करीब 20 ट्रिलियन डॉलर, 30 ट्रिलियन डॉलर लक्ष्य की ओर बढ़ता भारत

    नई दिल्ली ।वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि क्रय शक्ति समता यानी PPP के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार करीब 20 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि इस आधार पर भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। मंत्री ने यह बात राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित 13वें पीएएफआई एनुअल फोरम 2026 में कही।

    गोयल ने कहा कि भारत अब 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। उनके अनुसार, जैसे-जैसे देश इस लक्ष्य की ओर बढ़ेगा, अलग-अलग आर्थिक मापदंडों के बीच मौजूद अंतर भी कम होता जाएगा। उन्होंने भारत की बदलती आर्थिक स्थिति और वैश्विक बाजारों के साथ बढ़ते जुड़ाव को व्यापार वार्ताओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया।

    क्रय शक्ति समता ऐसी विनिमय दरों को दर्शाती है, जिनका उद्देश्य अलग-अलग देशों में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के स्तर में अंतर को ध्यान में रखते हुए मुद्राओं की वास्तविक खरीद क्षमता की तुलना करना है। इसी आधार पर विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं के आकार की तुलना की जाती है।

    गोयल ने कहा कि भारत व्यापार और आर्थिक साझेदारी को लेकर ऐसी अर्थव्यवस्था के रूप में बातचीत कर रहा है, जिसके 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की उम्मीद है। उन्होंने व्यापक आर्थिक साझेदारी की संभावनाओं पर भी जोर दिया। इसमें सामान, सेवाओं, पर्यटकों, शिक्षण संस्थानों और खेलों से जुड़े लोगों के आसान आवागमन को बढ़ावा देने की बात शामिल है।

    उन्होंने बताया कि भारत की कई देशों और क्षेत्रों के साथ व्यापार वार्ताएं चल रही हैं। इनमें कनाडा, चिली, पेरू, सदर्न अफ्रीकन कस्टम्स यूनियन, मेक्सिको, मालदीव, यूरेशिया, मध्य एशिया, रूस, गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल और इजरायल शामिल हैं।

    इन वार्ताओं का प्रमुख उद्देश्य भारत के लिए वैश्विक वैल्यू चेन और सप्लाई चेन में भागीदारी के अवसर बढ़ाना है। इसके साथ ही सामान और सेवाओं के आवागमन को आसान बनाने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। मंत्री ने कहा कि वैश्विक बाजारों से जुड़ाव बढ़ाने के लिए आर्थिक साझेदारी महत्वपूर्ण है।

    सेमीकंडक्टर क्षेत्र का उल्लेख करते हुए गोयल ने कहा कि अगले पांच वर्षों में भारत में सेमीकंडक्टर की सालाना खपत की मांग 150 अरब डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है। उन्होंने इस क्षेत्र में बढ़ती जरूरतों के अनुरूप क्षमताओं के विकास पर जोर दिया।

    मंत्री ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में भी क्षमता विकसित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने बड़े लैंग्वेज मॉडल और एजेंटिक मॉडल सहित एआई इकोसिस्टम को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही भारतीय स्टार्टअप्स के लिए इनोवेशन और डीप-टेक इकोसिस्टम को बढ़ावा देने की दिशा में काम करने की बात कही।

    गोयल ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत निजी क्षेत्र द्वारा अंतरिक्ष में रॉकेट लॉन्च करने वाला तीसरा देश बन गया है। इसके अलावा उन्होंने भारत की युवा आबादी के वैश्विक घटनाक्रमों और अवसरों को लेकर बढ़ती जागरूकता का जिक्र किया। उन्होंने युवाओं की अपने भविष्य से जुड़े फैसले लेने की क्षमता पर भरोसा जताया और देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम की वृद्धि का भी उल्लेख किया।

  • सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    सितंबर में भारत की निजी अर्थव्यवस्था ने पकड़ी रफ्तार, कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंचा

    नई दिल्ली ।भारत के निजी क्षेत्र में सितंबर के दौरान आर्थिक गतिविधियों में मजबूती देखने को मिली है। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर में बेहतर प्रदर्शन के चलते कंपोजिट पीएमआई बढ़कर 56.5 पर पहुंच गया। अगस्त में यह आंकड़ा 54.3 था। सितंबर का स्तर जून के बाद निजी क्षेत्र की गतिविधियों में सबसे तेज विस्तार को दर्शाता है।

    एचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट पीएमआई में देश के मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों को शामिल किया जाता है। सितंबर के आंकड़ों के अनुसार, दोनों क्षेत्रों की कंपनियों ने कारोबार में विस्तार दर्ज किया। नए ऑर्डर और रोजगार में भी बढ़ोतरी हुई, जबकि महंगाई का दबाव कम होने और कारोबारी भरोसे में सुधार के संकेत मिले।

    आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियां अपने दीर्घकालिक औसत से ऊपर पहुंच गईं। मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र की मजबूती ने संयुक्त गतिविधियों की रफ्तार बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उत्पादन और घरेलू नए ऑर्डर में तेज वृद्धि दर्ज की गई।

    सितंबर में कंपनियों के कुल नए कारोबार में भी मजबूत बढ़ोतरी हुई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में मांग बढ़ी, लेकिन सामान बनाने वाली कंपनियों में इसका असर ज्यादा स्पष्ट रहा। मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों की बिक्री में वृद्धि सात महीनों के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई।

    सर्विस सेक्टर की कंपनियों ने नए ऑर्डर हासिल करने में मार्केटिंग गतिविधियों को उपयोगी बताया। सर्वेक्षण के गुणात्मक हिस्से में प्रॉपर्टी सेवाओं, परिवहन सेवाओं और नई यात्रा बुकिंग से जुड़ी मांग में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया।

    मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में भी कई उत्पादों की मांग बढ़ने की जानकारी सामने आई। कंपनियों ने एल्युमीनियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक सामान, खाद्य एवं पेय पदार्थों और फार्मास्युटिकल उत्पादों के साथ नए मॉडलों की मांग में बढ़ोतरी दर्ज की।

    सितंबर के दौरान रोजगार के मोर्चे पर भी सकारात्मक गतिविधि देखने को मिली। कंपनियों ने उत्पादन और नए ऑर्डर में लगातार वृद्धि के बीच अपनी स्टाफिंग क्षमता बढ़ाई। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों में नई नौकरियां पैदा हुईं। दोनों क्षेत्रों में रोजगार विस्तार की दर लगभग समान रही।

    आर्थिक गतिविधियों में तेजी के साथ कंपनियों ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए इनपुट खरीद भी बढ़ाई। तैयार माल के स्टॉक से जुड़े सूचकांक में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह सूचकांक करीब साढ़े 11 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया।

    हालांकि, मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए लागत से जुड़ा दबाव बढ़ने के संकेत भी मिले। इनपुट कीमतों में बढ़ोतरी के बीच कंपनियों ने अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए आउटपुट की कीमतों में भी वृद्धि की। इससे उत्पादों की कीमतों पर महंगाई का दबाव बढ़ने की स्थिति बनी।

    आर्थिक गतिविधियों के मजबूत रहने के बावजूद कंपनियों ने वैश्विक स्तर पर मौजूद अनिश्चितताओं को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां बढ़ाईं। मध्य पूर्व में बढ़े तनाव के बीच कंपनियों ने संभावित परिस्थितियों से निपटने के लिए बफर तैयार करने पर ध्यान दिया।

    सितंबर के पीएमआई आंकड़ों से निजी क्षेत्र में उत्पादन, नए कारोबार और रोजगार के स्तर पर व्यापक सुधार के संकेत मिले हैं। मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस दोनों क्षेत्रों की गतिविधियों में विस्तार के चलते संयुक्त पीएमआई अगस्त के मुकाबले काफी ऊपर रहा और जून के बाद सबसे मजबूत स्तर दर्ज किया गया।

  • भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत

    भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत


    नई दिल्ली ।भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.7 प्रतिशत की अनुमानित GDP वृद्धि के साथ दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत विकास संभावनाओं वाले देशों में बना हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सितंबर 2026 की चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे घरेलू मांग को प्रमुख आधार बताया गया है।

    रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, भारत समेत दुनिया के 10 प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति का आकलन किया गया है। इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े 92 मुख्य अर्थशास्त्रियों की राय ली गई।

    भारत को लेकर विशेषज्ञों का भरोसा मई की तुलना में बढ़ा है। सितंबर की रिपोर्ट में 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद जताई है। मई में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था। वहीं 98 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि कम से कम मध्यम स्तर या उससे बेहतर रह सकती है।

    रिपोर्ट में रोजगार की स्थिति को लेकर अपेक्षाकृत स्थिर तस्वीर सामने आई है। करीब 70 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को अगले एक वर्ष में बेरोजगारी दर में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। हालांकि 17 प्रतिशत विशेषज्ञ बेरोजगारी बढ़ने और 13 प्रतिशत इसमें कमी आने का अनुमान लगा रहे हैं।

    आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत से बढ़कर 55.6 प्रतिशत हो गई।

    रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े मजबूत आर्थिक गतिविधियों के बीच श्रम बाजार के अपेक्षाकृत स्थिर रहने का संकेत देते हैं। हालांकि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की गति बनाए रखना अभी भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी विशेषज्ञों की चिंता मई के मुकाबले कम हुई है। अगले 12 महीनों को लेकर 55 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मध्यम महंगाई की संभावना जताई है, जबकि 45 प्रतिशत ने उच्च महंगाई की आशंका व्यक्त की है। मई में 61 प्रतिशत विशेषज्ञ उच्च या बहुत उच्च महंगाई को लेकर चिंतित थे।

    अगस्त में CPI आधारित खुदरा महंगाई 4.8 प्रतिशत रही। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है, लेकिन 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित दायरे में बनी हुई है।

    मौद्रिक नीति को लेकर 67 प्रतिशत विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। वहीं 24 प्रतिशत विशेषज्ञों ने नीति के और सख्त होने की संभावना जताई है। अगस्त में RBI ने नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखते हुए तटस्थ रुख कायम रखा था।

    राजकोषीय नीति को लेकर भी 72 प्रतिशत विशेषज्ञों ने बड़े बदलाव की संभावना नहीं जताई। करीब 22 प्रतिशत ने कुछ नरम रुख अपनाए जाने की संभावना व्यक्त की।

    रिपोर्ट का सर्वेक्षण 20 अगस्त को पूरा हुआ था। इसके बाद 31 अगस्त को जारी पहली तिमाही के GDP आंकड़ों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इस प्रदर्शन के बाद कई वैश्विक संस्थानों ने भारत के विकास अनुमान में बदलाव किया है।

    मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है।

  • भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    भारत की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र और तकनीकी क्षमता वैश्विक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है: आईएमएफ

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के उप-प्रबंध निदेशक नाइजेल क्लार्क ने कहा है कि भारत के पास दुनिया की आर्थिक वृद्धि की अगली बड़ी लहर का नेतृत्व करने की क्षमता है। पांच दिवसीय भारत यात्रा पूरी करने के बाद जारी उनके बयान में देश की मजबूत आर्थिक नींव, निजी क्षेत्र की प्रगति और बढ़ती तकनीकी क्षमताओं को इसकी प्रमुख वजह बताया गया।

    क्लार्क ने अपनी यात्रा के दौरान नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में कई महत्वपूर्ण बैठकें कीं। आईएमएफ में उप-प्रबंध निदेशक का पद संभालने के बाद यह उनकी भारत की पहली यात्रा थी। इस दौरान उन्होंने वित्त और कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी से मुलाकात की।

    क्लार्क ने कहा कि भारत दुनिया की अगली आर्थिक वृद्धि को गति देने की क्षमता रखता है और आईएमएफ इस यात्रा में देश का करीबी साझेदार बना रहेगा। उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताया और वैश्विक आर्थिक विकास में देश की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया।

    उन्होंने कहा कि मजबूत आर्थिक आधार और अच्छी नीतियों के कारण भारत वैश्विक विकास के प्रमुख इंजनों में बना हुआ है। भारतीय नीति-निर्माताओं के साथ हुई बातचीत में देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति, वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव और टिकाऊ तथा समावेशी आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक कदमों पर चर्चा हुई।

    क्लार्क के मुताबिक, दुनिया में बढ़ती अनिश्चितताओं और बदलते जोखिमों के बीच आर्थिक स्थिरता और मजबूती बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि नीतियों को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप लचीला बनाए रखने, महंगाई को नियंत्रण में रखने तथा ऐसे सुधार आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई, जो उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को मजबूत कर सकें।

    उन्होंने मध्यम अवधि में तेज आर्थिक विकास को बनाए रखने के लिए सुधारों की जरूरत पर भी जोर दिया। साथ ही क्लार्क ने भारत सरकार को बहुपक्षीय सहयोग का समर्थन करने और क्षेत्र के अन्य देशों की मदद करने के लिए धन्यवाद दिया।

    भारत यात्रा के दौरान आईएमएफ के उप-प्रबंध निदेशक ने उद्योग जगत के कई नेताओं और कारोबारियों से भी मुलाकात की। इन बैठकों का उद्देश्य यह समझना था कि देश का निजी क्षेत्र आर्थिक प्रगति में किस तरह योगदान दे रहा है।

    क्लार्क ने भारतीय निजी क्षेत्र की ऊर्जा और देश में मौजूद प्रतिभाओं की सराहना की। उन्होंने तेजी से विकसित हो रही तकनीकी और विनिर्माण क्षमताओं को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, भारत में निजी क्षेत्र की गतिविधियां आर्थिक विकास की दिशा में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

    उन्होंने नवाचार, डिजिटल बदलाव, उन्नत विनिर्माण और नई तकनीकों को अपनाने को उत्पादकता बढ़ाने वाले प्रमुख कारकों के रूप में रेखांकित किया। क्लार्क के मुताबिक इन क्षेत्रों में प्रगति से प्रतिस्पर्धा मजबूत हो सकती है और अधिक मूल्य वाले आर्थिक कार्यों को बढ़ावा मिल सकता है।

    उनकी यात्रा के दौरान हुई चर्चाओं में भारत की आर्थिक मजबूती के साथ-साथ वैश्विक परिस्थितियों के बीच विकास को टिकाऊ बनाए रखने के उपायों पर भी ध्यान दिया गया। क्लार्क ने कहा कि आईएमएफ भारत के साथ साझेदारी जारी रखेगा और देश की आर्थिक वृद्धि से जुड़े प्रयासों में करीबी सहयोगी बना रहेगा।

  • ब्रिक्स सम्मेलन में अफ्रीकी कारोबारी बोले, पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य समय से पहले हासिल करेगा

    ब्रिक्स सम्मेलन में अफ्रीकी कारोबारी बोले, पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य समय से पहले हासिल करेगा

    नई दिल्ली ।भारत में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच अफ्रीकी कारोबारियों ने देश की आर्थिक प्रगति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सराहना की है। नाइजीरिया के डिप्लोमैटिक कॉरेस्पोंडेंट्स एसोसिएशन के चेयरमैन इदेहाई फ्रेडरिक ने कहा कि भारत जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसे देखते हुए देश ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य निर्धारित समय से पहले हासिल कर सकता है।

    इदेहाई फ्रेडरिक के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक शानदार नेता हैं और उनके पास देश के विकास को लेकर बड़ा विजन है। उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में हो रही तेज प्रगति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में उठाए जा रहे कदमों, नीतियों और साझेदारी में दिखाई देती है। उनके मुताबिक ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान भी भारत के नेतृत्व और दृष्टिकोण का प्रभाव स्पष्ट नजर आ रहा है।

    फ्रेडरिक ने भारत और नाइजीरिया के संबंधों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देश दशकों से मित्र रहे हैं और दोनों के बीच कारोबार का भी बड़ा आधार है। उन्होंने भारत को नाइजीरिया के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार बताते हुए दोनों देशों के बीच व्यापार में आगे और बढ़ोतरी की उम्मीद जताई।

    उन्होंने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। इसी आर्थिक प्रगति के आधार पर उनका मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ के विजन को भारत लक्ष्य से पहले प्राप्त कर सकता है।

    ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत और अफ्रीकी देशों के बीच संबंधों को लेकर भी चर्चा सामने आई। अबिसीनिया बिजनेस नेटवर्क के प्रबंध निदेशक डैनियल तिरुनेह ने भारत और इथियोपिया के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों देश व्यापार, निवेश, नवाचार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में मिलकर काम कर रहे हैं।

    डैनियल तिरुनेह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इथियोपिया यात्रा का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार कुछ महीने पहले हुई इस यात्रा से भारत और इथियोपिया के संबंधों को नई ऊर्जा मिली। उन्होंने कहा कि इसका प्रभाव ब्रिक्स के मंच पर भी दिखाई दे रहा है और इथियोपिया के लिए यह एक महत्वपूर्ण मंच है।

    भारत इस वर्ष 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। ब्रिक्स में वर्तमान में 11 सदस्य देश और 10 साझेदार देश हैं। सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और प्रतिनिधि नई दिल्ली पहुंच रहे हैं। सम्मेलन के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बीच भारत की भूमिका और उसकी साझेदारियों पर भी ध्यान केंद्रित है।

    ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को देखते हुए राजधानी नई दिल्ली में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं। सुरक्षा व्यवस्था के लिए 15,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है। इसके अलावा पैरामिलिट्री फोर्स की 200 कंपनियां भी सुरक्षा व्यवस्था में लगाई गई हैं।

    अफ्रीकी कारोबारियों की टिप्पणियों में भारत की आर्थिक प्रगति, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और ब्रिक्स के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को प्रमुखता दी गई। नाइजीरिया और इथियोपिया से जुड़े प्रतिनिधियों ने भारत के साथ व्यापार, निवेश, नवाचार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को महत्वपूर्ण बताया।

    इस बीच नई दिल्ली में हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत की मेजबानी में आयोजित हो रहा है। सदस्य और साझेदार देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के कारण राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है।

  • प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों का बड़ा फैसला, मध्यरात्रि से सस्ते मिलेंगे पेट्रोल के दाम

    नई दिल्ली ।अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में आई मजबूती को देखते हुए प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल की खुदरा कीमतों में कटौती करने का निर्णय लिया है। कंपनियों द्वारा की गई इस कटौती के तहत पेट्रोल के दामों में औसतन 56 पैसे प्रति लीटर की कमी दर्ज की गई है। नई दरें मध्यरात्रि से देश भर में प्रभावी हो जाएंगी, जिससे वाहन चालकों और आम जनता को कुछ हद तक आर्थिक राहत मिलने की उम्मीद है।

    कीमतों में संशोधन के बाद देश की राजधानी दिल्ली में इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंपों पर पेट्रोल की नई दरें 67.90 रुपये प्रति लीटर तय की गई हैं, जो इससे पहले 68.46 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर दर्ज की जा रही थीं। देश की अन्य प्रमुख तेल विपणन कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन द्वारा भी इसी तर्ज पर अपने खुदरा मूल्यों में संशोधन किया जाता है। स्थानीय करों और भिन्न व्यवस्थाओं के कारण अलग-अलग कंपनियों के आउटलेट पर कीमतों में एक से दो पैसे का मामूली अंतर देखा जा सकता है।

    तेल कंपनियों द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, विभिन्न राज्यों में स्थानीय करों और वैट की दरों के आधार पर अलग-अलग शहरों में कटौती की राशि भिन्न रखी गई है। वित्तीय राजधानी मुंबई में पेट्रोल के दामों में 71 पैसे प्रति लीटर की कमी की गई है, जिसके बाद वहां नया मूल्य 74.43 रुपये प्रति लीटर हो जाएगा। इसी प्रकार कोलकाता में 70 पैसे प्रति लीटर की कटौती के साथ नई दर 75.44 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में 71 पैसे की कमी के साथ नया दाम 71.48 रुपये प्रति लीटर तय किया गया है।

    उल्लेखनीय है कि प्रशासनिक सुधारों के तहत पेट्रोल के मूल्य निर्धारण को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था, जिससे तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लागत और विनिमय दर के अनुरूप कीमतें तय करने का अधिकार मिला है। इससे पहले जून माह के अंत में पेट्रोल की दरों में 70 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी।

    तेल विपणन कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि हाल के दिनों में डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर में सुधार दर्ज किया गया है, जिसके कारण आयात लागत पर आंशिक राहत मिली है। हालांकि, वैश्विक बाजार में अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। कंपनियों का कहना है कि पूर्ण स्वतंत्रता मिलने के बावजूद बाजार की अनिश्चितताओं के कारण लागत के अनुपात में दरें नहीं बढ़ाई जा सकी थीं, जिससे चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में कंपनियों को संभावित राजस्व में काफी घाटे का सामना करना पड़ा है।

  • बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत

    बाजार में बढ़ी खरीदारी का असर, जुलाई में रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन से सरकार को बड़ी राहत


    नई दिल्ली। देश की अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती और उपभोग में बढ़ोतरी का असर अब सरकार के राजस्व पर भी साफ दिखाई देने लगा है। जुलाई 2026 में वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी संग्रह 15.4 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी के साथ 2.11 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच गया। यह पिछले 14 महीनों की सबसे तेज वृद्धि है और चालू वित्त वर्ष 2026-27 में दूसरी बार ऐसा हुआ है जब मासिक जीएसटी कलेक्शन दो लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा पार करने में सफल रहा है। यह आंकड़ा देश में बढ़ती आर्थिक गतिविधियों मजबूत खपत और बेहतर टैक्स अनुपालन का संकेत माना जा रहा है।

    सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार जुलाई के दौरान घरेलू जीएसटी राजस्व 10.1 प्रतिशत बढ़कर 1.45 लाख करोड़ रुपए हो गया जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 1.31 लाख करोड़ रुपए था। वहीं आयात पर मिलने वाले जीएसटी राजस्व में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई और इसमें 28.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। आयात से प्राप्त जीएसटी संग्रह बढ़कर 66 हजार 511 करोड़ रुपए पहुंच गया। घरेलू और आयात दोनों स्रोतों से मजबूत राजस्व मिलने के कारण कुल सकल जीएसटी संग्रह 2.11 लाख करोड़ रुपए के ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गया।

    सरकार ने बताया कि जुलाई के दौरान जीएसटी रिफंड में भी वृद्धि दर्ज की गई। इस अवधि में रिफंड 13.1 प्रतिशत बढ़कर 29 हजार 968 करोड़ रुपए रहा। रिफंड समायोजित करने के बाद सरकार का शुद्ध जीएसटी राजस्व 1.81 लाख करोड़ रुपए रहा जो पिछले वर्ष की तुलना में 15.8 प्रतिशत अधिक है। घरेलू शुद्ध राजस्व 10.5 प्रतिशत बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि सीमा शुल्क से प्राप्त शुद्ध जीएसटी राजस्व में 30.3 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई और यह 54 हजार 223 करोड़ रुपए हो गया।

    चालू वित्त वर्ष के पहले चार महीनों अप्रैल से जुलाई के दौरान भी सरकार का कर संग्रह लगातार मजबूत बना हुआ है। इस अवधि में कुल सकल जीएसटी संग्रह 10.1 प्रतिशत बढ़कर 8.43 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 7.66 लाख करोड़ रुपए था। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार लगातार बनी हुई है और कर संग्रह में भी इसका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है।

    इससे पहले जून 2026 में भी जीएसटी संग्रह 13.9 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 1.94 लाख करोड़ रुपए दर्ज किया गया था। उस समय भी आयात से मिलने वाले राजस्व ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लगातार दो महीनों से मजबूत कर संग्रह यह संकेत देता है कि देश में उत्पादन व्यापार और उपभोग की गतिविधियां गति पकड़ रही हैं।

    एसबीआई रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार यदि जीएसटी संग्रह और बेसिक एक्साइज ड्यूटी में राज्यों की हिस्सेदारी को एक साथ देखा जाए तो वित्त वर्ष 2026-27 में राज्यों को पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 1.43 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। रिपोर्ट में यह भी अनुमान लगाया गया है कि आने वाले महीनों में जीएसटी संग्रह और मजबूत हो सकता है तथा पूरे वित्त वर्ष के दौरान इसमें 8 से 9 प्रतिशत की वृद्धि बनी रहने की संभावना है।

    रिपोर्ट के मुताबिक हाल के महीनों में जीएसटी संग्रह की रफ्तार में जो हल्की नरमी देखने को मिली थी उसका प्रमुख कारण जीएसटी दरों का युक्तिकरण था जिसकी पहले से संभावना जताई जा रही थी। अब आर्थिक गतिविधियों में तेजी और कर संग्रह में लगातार सुधार से यह उम्मीद बढ़ गई है कि वित्त वर्ष के शेष महीनों में भी सरकार का राजस्व मजबूत रहेगा और इससे केंद्र तथा राज्यों दोनों की वित्तीय स्थिति को मजबूती मिलेगी।

  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार फिर मजबूत, 682.23 अरब डॉलर पर पहुंचा; गोल्ड रिजर्व में भी दर्ज हुई बड़ी बढ़ोतरी

    नई दिल्ली । भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार मजबूत होता जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 24 जुलाई 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 6.118 अरब डॉलर की बढ़ोतरी के साथ 682.2354 अरब डॉलर पर पहुंच गया। लगातार दूसरे सप्ताह दर्ज हुई इस वृद्धि को देश की बाहरी आर्थिक स्थिति के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इससे पहले 17 जुलाई को समाप्त सप्ताह में भी विदेशी मुद्रा भंडार में 1.08 अरब डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। लगातार दो सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में हुई वृद्धि से यह संकेत मिल रहा है कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बीच भी भारत की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है और विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार का क्रम जारी है।

    केंद्रीय बैंक के अनुसार, इस दौरान स्वर्ण भंडार के मूल्य में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई। समीक्षा अवधि में गोल्ड रिजर्व 1.308 अरब डॉलर बढ़कर 103.058 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा मानी जाने वाली विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां भी 4.873 अरब डॉलर बढ़कर 555.929 अरब डॉलर हो गईं। यह बढ़ोतरी देश की समग्र वित्तीय मजबूती का संकेत देती है।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया कि विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों के मूल्यांकन में केवल अमेरिकी डॉलर ही नहीं बल्कि यूरो, ब्रिटिश पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मूल्य में होने वाले उतार-चढ़ाव का भी प्रभाव शामिल होता है। इसलिए विदेशी मुद्रा भंडार में होने वाले बदलाव वैश्विक मुद्रा बाजार की गतिविधियों से भी प्रभावित होते हैं।

    हालांकि इस अवधि में स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (एसडीआर) में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यह 5.3 करोड़ डॉलर घटकर 18.617 अरब डॉलर रह गया। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य प्रमुख घटकों में हुई वृद्धि के कारण कुल भंडार में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली।

    वर्ष 2026 की शुरुआत में वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बना था। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते रुपये पर भी दबाव देखा गया, जिसके बाद बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया था। इसके कारण कुछ सप्ताह तक विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दर्ज की गई थी।

    उल्लेखनीय है कि फरवरी 2026 के अंतिम सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.494 अरब डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया था। उसके बाद आई गिरावट से अब धीरे-धीरे उबरने का क्रम जारी है और हाल के सप्ताहों में लगातार सुधार देखने को मिल रहा है।

    आरबीआई का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी विशेष विनिमय दर को बनाए रखना नहीं है, बल्कि केवल बाजार में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करना और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना है। आवश्यकता पड़ने पर केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होता है। इससे आयात भुगतान, बाहरी ऋण दायित्वों का निर्वहन और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के दौरान वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलती है। हालिया बढ़ोतरी को भारत की मजबूत व्यापक आर्थिक स्थिति और वैश्विक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के रूप में देखा जा रहा है।

  • कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    कीमती धातुओं के बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच सोने की कीमतों में बड़ी गिरावट, निवेशकों के लिए नए अवसर और चुनौतियां

    नई दिल्ली । भारतीय बुलियन और सर्राफा बाजार में सोने की कीमतों में लगातार आ रही गिरावट ने निवेशकों और खरीदारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष की शुरुआत में सर्वकालिक उच्च स्तर को छूने के बाद अब सोने के दामों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। रिकॉर्ड स्तर से करीब 37 हजार रुपये प्रति दस ग्राम की गिरावट के बाद बाजार में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या यह नए निवेश का सही समय है या अभी कीमतों में और सुधार देखने को मिल सकता है।

    वैश्विक बाजार के रुझानों का सीधा असर घरेलू सर्राफा बाजार पर देखने को मिल रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनावों, कच्चे तेल की अनिश्चित कीमतों और अमेरिकी केंद्रीय बैंक की सख्त मौद्रिक नीतियों के कारण सोने की वैश्विक दरों पर लगातार दबाव बना हुआ है। जनवरी महीने में अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,602 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने वाला सोना अब घटकर करीब 4,040 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। इसी के प्रभाव से भारतीय बाजार में भी कीमतें एक लाख अस्सी हजार रुपये के पीक स्तर से गिरकर एक लाख तैंतालीस हजार रुपये प्रति दस ग्राम के स्तर पर आ गई हैं।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार सोने की कीमतों में इस नरमी का मुख्य कारण केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियां हैं। अमेरिका में महंगाई पर नियंत्रण के लिए अपनाई जा रही कड़ी मौद्रिक नीतियों और ब्याज दरों में कटौती की संभावना न के बराबर होने के कारण निवेशक फिक्स्ड रिटर्न देने वाले अन्य वित्तीय साधनों की ओर रुख कर रहे हैं। चूंकि सोना कोई प्रत्यक्ष ब्याज या लाभांश प्रदान नहीं करता, इसलिए उच्च ब्याज दर के दौर में इसकी मांग पर नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलता है।

    बाजार के दीर्घकालिक आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि सोने ने ऐतिहासिक रूप से निवेशकों को सुरक्षित और आकर्षक रिटर्न दिया है। पिछले तीन दशकों के दौरान इस पीली धातु के मूल्यों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। यद्यपि अल्पकालिक अवधि में भू-राजनीतिक बदलावों और आर्थिक नीतियों के कारण इसमें बड़े उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, लेकिन दीर्घकालिक नजरिए से इसे हमेशा से एक मजबूत परिसंपत्ति माना जाता रहा है।

    बाजार विश्लेषकों का सुझाव है कि जो निवेशक अपने पोर्टफोलियो में सोने को शामिल करना चाहते हैं, उनके लिए एकमुश्त निवेश के बजाय व्यवस्थित तरीके से किस्तों में खरीदारी करना अधिक जोखिम-रहित रणनीति हो सकती है। आने वाले समय में वैश्विक बाजार के रुझानों और नीतिगत निर्णयों के आधार पर कीमतों में सीमित दायरे का उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।