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  • वैश्विक तनाव के बीच सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से 393 अंक फिसला, निफ्टी भी बढ़त गंवाकर बंद

    वैश्विक तनाव के बीच सपाट बंद हुआ शेयर बाजार, सेंसेक्स दिन के उच्चतम स्तर से 393 अंक फिसला, निफ्टी भी बढ़त गंवाकर बंद

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कमजोर वैश्विक संकेतों के बीच गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार उतार-चढ़ाव भरे कारोबार के बाद लगभग सपाट स्तर पर बंद हुआ। शुरुआती कारोबार में निवेशकों की खरीदारी से बाजार में अच्छी तेजी देखने को मिली, लेकिन दिन के दूसरे हिस्से में मुनाफावसूली हावी होने से अधिकांश बढ़त खत्म हो गई। कारोबार समाप्त होने पर बीएसई सेंसेक्स 1.44 अंक की मामूली बढ़त के साथ 77,186.87 अंक पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50 सूचकांक 5.75 अंक की गिरावट के साथ 24,072.75 अंक पर बंद हुआ।

    कारोबार की शुरुआत सकारात्मक रही। सेंसेक्स करीब 203 अंकों की बढ़त के साथ खुला और दिन के दौरान 77,579.69 अंक के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया। हालांकि बाद में बिकवाली बढ़ने से यह अपने इंट्रा-डे हाई से करीब 393 अंक नीचे फिसलकर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी भी शुरुआती मजबूती के साथ 24,186.50 अंक तक पहुंचा, लेकिन अंतिम घंटों में मुनाफावसूली के चलते अपनी अधिकांश बढ़त गंवा बैठा।

    बाजार की व्यापक तस्वीर मिश्रित रही। कारोबार के दौरान लगभग 1,947 शेयरों में तेजी दर्ज की गई, जबकि 2,119 शेयर गिरावट के साथ बंद हुए और 194 शेयरों में कोई बदलाव नहीं हुआ। मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी दबाव देखने को मिला। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स में 0.41 प्रतिशत और स्मॉलकैप 100 इंडेक्स में 0.10 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे यह संकेत मिला कि निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी।

    सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला सेक्टर रहा, जिसमें 1.48 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। इसके अलावा मीडिया, आईटी, ऑटो, एफएमसीजी और फार्मा शेयरों में भी खरीदारी देखने को मिली। दूसरी ओर रियल्टी, पीएसयू बैंक, मेटल, प्राइवेट बैंक और बैंकिंग शेयरों पर दबाव बना रहा। रियल्टी इंडेक्स में सबसे अधिक करीब एक प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

    निफ्टी 50 के प्रमुख बढ़त वाले शेयरों में एचसीएल टेक, इंटरग्लोब एविएशन (इंडिगो), विप्रो, मारुति सुजुकी, बजाज फाइनेंस और महिंद्रा एंड महिंद्रा शामिल रहे। वहीं इटरनल, एसबीआई लाइफ, बजाज फिनसर्व, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और एचडीएफसी बैंक के शेयरों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई।

    बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और एशियाई बाजारों से मिले कमजोर संकेतों के कारण निवेशक पूरे सत्र के दौरान सतर्क बने रहे। महंगाई से जुड़ी चिंताओं का असर विशेष रूप से बैंकिंग और रियल्टी शेयरों पर देखने को मिला। हालांकि कुछ पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर आयात शुल्क दोबारा लागू होने और चुनिंदा कंपनियों के बेहतर तिमाही नतीजों के चलते केमिकल सेक्टर में मजबूती बनी रही।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर कंपनियों के तिमाही परिणाम, प्रबंधन की भविष्य की रणनीति, मानसून की प्रगति, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक आर्थिक घटनाक्रम पर रहेगी। यही कारक निकट भविष्य में भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • PAK की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट .. बलूचिस्तान ने किया आजादी का ऐलान, संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी

    PAK की अर्थव्यवस्था पर बड़ा संकट .. बलूचिस्तान ने किया आजादी का ऐलान, संसाधनों की आपूर्ति भी रोकी


    इस्लामाबाद।
    बलूचिस्तान (Balochistan) की प्राकृतिक गैस, कोयला, खनिज और रेयर अर्थ पर निर्भर पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था (Pakistan Economy) इस वक्त अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। जिस इलाके को पाकिस्तान लंबे समय से अपना आर्थिक इंजन मानता रहा, उसी बलूचिस्तान ने अब न सिर्फ आजादी का ऐलान (Declaration of Independence) कर दिया है, बल्कि अपनी संसाधनों की आपूर्ति भी पूरी तरह रोक दी है। दरअसल, बलूचिस्तान प्रांत में मंगलवार को स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन कट गई है। क्षेत्र में लगे पूर्ण शटडाउन और ट्रांसपोर्ट ब्लॉकेड ने पंजाब की औद्योगिक इकाइयों को घुटनों पर ला दिया है। अगर यही हालात रहे तो संभव है कि पाकिस्तान कटोरा लेकर घूमने के लायक भी नहीं बचेगा।

    पंजाब के प्रमुख बिजनेस लीडर्स ने चेतावनी दी है कि अगर यह संकट लंबा खिंचा तो इसका असर किसी सक्रिय युद्ध से भी कहीं ज्यादा विनाशकारी साबित हो सकता है। पंजाब चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और अन्य प्रमुख बिजनेस संगठनों के प्रतिनिधियों ने लाहौर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने बलूचिस्तान पर निर्भरता को लेकर गंभीर चिंता जताई। बिजनेस लीडर्स के अनुसार, पाकिस्तान की अधिकांश भारी उद्योगों की ऊर्जा आपूर्ति, कच्चा माल और खनिज बलूचिस्तान के रास्ते ही आते हैं। शटडाउन के कारण यह पूरी सप्लाई चेन थम गई है।


    LNG और कोयला आपूर्ति पूरी तरह बंद

    प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्योगपतियों ने विस्तार से बताया कि लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) और कोयला मुख्य रूप से बलूचिस्तान के बंदरगाहों और खदानों से पंजाब भेजा जाता है। अब दोनों क्षेत्रों के बीच सभी तरह के एक्सपोर्ट और ट्रांसपोर्ट रुक गए हैं। एक प्रमुख इंडस्ट्री लीडर ने कहा कि हमारी फैक्टरियां अब ईंधन के बिना चल नहीं सकतीं। कई प्लांट्स पहले ही बंद हो चुके हैं या उत्पादन आधा कर दिया गया है। अगर यह स्थिति 10-15 दिन और चली तो पूरे पंजाब में बड़े पैमाने पर छंटनी शुरू हो जाएगी। उन्होंने शहबाज शरीफ सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि लंबे समय तक रुकावट बनी रही तो न सिर्फ औद्योगिक उत्पादन ठप होगा, बल्कि बेरोजगारी बढ़ने से सामाजिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है।


    खनिज और कच्चे माल की कमी

    बिजनेस प्रतिनिधियों ने बताया कि डुकी, चागई और अन्य खनिज क्षेत्रों से कोयला, क्रोमाइट, कॉपर और अन्य जरूरी इंडस्ट्रियल इनपुट्स की आपूर्ति रोक दी गई है। ट्रांसपोटर्स हड़ताल पर हैं क्योंकि राज्य उच्च मार्गों पर उनकी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दी जा रही। नतीजतन, फैक्टरियों तक कच्चा माल नहीं पहुंच पा रहा। टेक्सटाइल, सीमेंट, फर्टिलाइजर, स्टील और पावर सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया गया कि कई यूनिट्स में उत्पादन 40-60 प्रतिशत तक कम हो गया है।


    बलूचिस्तान पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की रीढ़

    बलूच नेता मीर यार बलूच द्वारा शेयर किए गए वीडियो और उनके बयानों में कहा गया है कि बलूचिस्तान सोना, प्राकृतिक गैस, तांबा, क्रोमाइट और रेयर अर्थ का विशाल भंडार है। अगर बलूचिस्तान इन संसाधनों पर अपना पूर्ण नियंत्रण वापस ले लेता है तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लगेगा। मीर यार बलूच ने कहा कि हम जिसे ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ कह रहे हैं, वहां स्थिति धीरे-धीरे बलूच मुक्ति सेनाओं के नियंत्रण में आ रही है। हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का फायदा अपने लोगों को देना चाहते हैं, न कि पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार को।

    दूसरी ओर एक आर्थिक विशेषज्ञ ने कहा कि बलूचिस्तान पाकिस्तान की जीडीपी में सीधे-सीधे योगदान नहीं देता दिखता, लेकिन उसकी सप्लाई चेन पूरे देश की रीढ़ है। इन संसाधनों के बिना पाकिस्तानी सरकार दिवालिया होकर टूट जाएगी। यही कारण है कि पंजाब के बिजनेसमैनों ने सरकार से तुरंत बातचीत शुरू करने और बलूचिस्तान में शांति बहाल करने की मांग की है। उन्होंने कहा है कि यह अब सिर्फ सुरक्षा मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का संकट बन चुका है।

  • अब घरों में रखा सोना आएगा अर्थव्यवस्था के काम, सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन 2.0' प्रस्ताव पर कर रही विचार

    अब घरों में रखा सोना आएगा अर्थव्यवस्था के काम, सरकार 'गोल्ड मोनेटाइजेशन 2.0' प्रस्ताव पर कर रही विचार


    नई दिल्ली। भारतीय परिवारों के घरों और लॉकरों में वर्षों से सुरक्षित रखे सोने को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने की दिशा में केंद्र सरकार एक नए प्रस्ताव पर विचार कर रही है। सराफा कारोबारियों की ओर से तैयार किए गए इस प्रस्ताव को ‘गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम 2.0’ नाम दिया गया है। यदि इसे मंजूरी मिलती है, तो घरेलू स्तर पर मौजूद सोने का बड़ा हिस्सा बाजार में वापस आ सकता है, जिससे सोने के आयात पर निर्भरता कम होने के साथ अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है।

    शुरुआती लक्ष्य 200 टन सोना बाजार में लाने का
    सराफा संगठनों द्वारा सरकार को सौंपे गए प्रस्ताव के अनुसार, योजना के पहले चरण में देशभर के घरों में रखा करीब 200 टन सोना औपचारिक व्यवस्था में लाने का लक्ष्य रखा गया है। इससे घरेलू मांग का कुछ हिस्सा देश के भीतर उपलब्ध सोने से पूरा किया जा सकेगा और विदेशों से सोना आयात करने की आवश्यकता कम हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप विदेशी मुद्रा की बचत होने की संभावना भी जताई गई है।

    पुरानी योजना से कैसे होगी अलग?
    इससे पहले लागू की गई गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई थी, क्योंकि लोग सीधे बैंकों के माध्यम से प्रक्रिया अपनाने में सहज महसूस नहीं करते थे।

    नए प्रस्ताव में व्यवस्था को अधिक आसान बनाने की बात कही गई है। इसके तहत ग्राहक अपने पुराने या अनुपयोगी आभूषण लेकर सीधे बैंक जाने के बजाय पंजीकृत ज्वेलर्स के पास पहुंच सकेंगे। ज्वेलर गहनों को गलाकर उनकी शुद्धता का आकलन करेगा और निर्धारित प्रक्रिया के तहत उन्हें बैंक में जमा कराया जाएगा।

    ग्राहकों को मिल सकती हैं गोल्ड यूनिट्स
    प्रस्ताव के मुताबिक, जमा किए गए सोने के बदले ग्राहक के बैंक खाते में उसी मूल्य के बराबर गोल्ड यूनिट्स क्रेडिट की जा सकती हैं। इससे लोग पुराने डिजाइनों के गहनों का बेहतर उपयोग कर सकेंगे और अपनी पसंद के नए आभूषण खरीदने का विकल्प भी मिलेगा। वहीं ज्वेलरी उद्योग को अपेक्षाकृत कम लागत पर कच्चे माल के रूप में सोना उपलब्ध होने की संभावना है।

    टैक्स नियमों को लेकर भी राहत की उम्मीद
    योजना के मसौदे में प्रक्रिया को पारदर्शी रखने और लोगों की टैक्स संबंधी आशंकाओं को कम करने पर भी जोर दिया गया है। मौजूदा आयकर नियमों के अनुसार, विवाहित महिला के पास 500 ग्राम, अविवाहित महिला के पास 250 ग्राम और पुरुष के पास 100 ग्राम तक सोना रखने पर सामान्य परिस्थितियों में राहत का प्रावधान है। हालांकि, अंतिम स्थिति संबंधित नियमों और प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करती है।

    सरकार की मंजूरी का इंतजार
    फिलहाल केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को लेकर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। हालांकि, सराफा बाजार इस पहल को सकारात्मक मान रहा है। कारोबारियों का मानना है कि यदि यह योजना लागू होती है तो घरों में निष्क्रिय पड़े सोने को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा जा सकेगा। इससे न केवल गोल्ड मार्केट को नई गति मिल सकती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलने की संभावना है।

  • फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…

    फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर संकट, बढ़ा कर्ज का दबाव, विशेषज्ञों की चेतावनी- समय रहते कदम नहीं उठाए तो…


    नई दिल्ली। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल फ्रांस पर बढ़ता सार्वजनिक कर्ज चिंता का विषय बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते प्रभावी वित्तीय सुधार नहीं किए, तो आने वाले वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था गंभीर दबाव में आ सकती है। बढ़ती उधारी लागत और राजनीतिक अनिश्चितता को लेकर निवेशकों और अर्थशास्त्रियों ने भी चिंता जताई है।

    फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज फिलहाल करीब 3.5 ट्रिलियन यूरो तक पहुंच चुका है और विशेषज्ञों का मानना है कि अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले राजनीतिक परिस्थितियों के कारण राजकोषीय सुधारों की संभावना कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में कर्ज का बोझ और बढ़ने का जोखिम बना हुआ है।

    ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ से बढ़ सकती है मुश्किल
    अर्थशास्त्रियों ने फ्रांस के सामने ‘स्नोबॉल इफेक्ट’ का खतरा बताया है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जब सरकारी बॉन्ड पर चुकाई जाने वाली ब्याज दर आर्थिक विकास की गति से अधिक हो जाती है। इससे सरकार का कर्ज लगातार बढ़ता जाता है और अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में उसका बोझ तेजी से बढ़ने लगता है। यदि सरकार लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष (प्राइमरी सरप्लस) हासिल नहीं कर पाती, तो इस स्थिति से बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है।

    2050 तक GDP के 203% तक पहुंच सकता है कर्ज
    विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मौजूदा हालात में कोई बड़ा सुधार नहीं हुआ तो फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज वर्ष 2050 तक उसकी सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 203 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यह चेतावनी आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के महासचिव मैथियास कोरमैन के हालिया बयान के आधार पर दी गई है। अनुमान है कि वर्ष 2029 तक केवल ब्याज भुगतान का खर्च ही लगभग 100 अरब यूरो तक पहुंच सकता है।

    निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों की बढ़ी चिंता
    क्रेडिट रेटिंग एजेंसी मूडीज की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट सारा कार्लसन ने भी कहा है कि सार्वजनिक कर्ज पर बढ़ता ब्याज भुगतान फ्रांस के लिए सबसे बड़ी आर्थिक चुनौतियों में से एक बन सकता है। वहीं निवेश बैंक मॉर्गन स्टेनली ने वित्तीय जोखिमों का हवाला देते हुए अपने ग्राहकों को फ्रांसीसी सरकारी कर्ज में निवेश कम करने की सलाह दी है।

    कोविड के बाद भी कम नहीं हुआ कर्ज
    आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष की पहली तिमाही में फ्रांस का सार्वजनिक कर्ज 3.5 ट्रिलियन यूरो (करीब 4 ट्रिलियन डॉलर) से अधिक हो गया, जो देश की GDP का 117.5 प्रतिशत है। फ्रांस की ऑडिट संस्था कोर्ट डेस कॉम्प्टेस के मुताबिक यह स्तर कोविड-19 महामारी के दौरान बने रिकॉर्ड के करीब पहुंच चुका है। संस्था का कहना है कि यूरोजोन में फ्रांस ऐसा प्रमुख देश है, जिसने महामारी के बाद अपने कर्ज के बोझ को उल्लेखनीय रूप से कम नहीं किया।

    ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ा खर्च
    वर्ष 2025 में फ्रांस ने अपने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए करीब 66 अरब यूरो खर्च किए, जो शिक्षा और रक्षा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के बजट से भी अधिक माना जा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2029 तक यह राशि बढ़कर 100 अरब यूरो तक पहुंच सकती है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि तेज आर्थिक विकास या लगातार प्राथमिक बजट अधिशेष के जरिए इस संकट से बाहर निकला जा सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसे संकेत नहीं दिखाई दे रहे हैं। कोर्ट डेस कॉम्प्टेस की वरिष्ठ अधिकारी कैरिन कैम्बी ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए तो फ्रांस कर्ज के ब्याज के बढ़ते बोझ तले दब सकता है और इस स्थिति से बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं।

    चुनाव से पहले बना बड़ा राजनीतिक मुद्दा
    बढ़ता सार्वजनिक कर्ज अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले फ्रांस की राजनीति का भी अहम मुद्दा बन गया है। प्रमुख सेंट्रिस्ट नेता एडुआर्ड फिलिप और गैब्रियल अट्टल ने इसे अपने चुनावी एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बनाया है। वहीं सांसद केविन मौविएक्स का कहना है कि कर्ज का बढ़ता स्तर गंभीर चेतावनी है और यदि सुधार में देर की गई तो इसके परिणाम और अधिक गंभीर हो सकते हैं।

  • देश की अथर्व्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास….2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च में होगा 93% हिस्सा

    देश की अथर्व्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा मिडिल क्लास….2036 तक कुल उपभोक्ता खर्च में होगा 93% हिस्सा


    नई दिल्ली।
    भारत (India) की अर्थव्यवस्था (Economy) आने वाले सालों में किसके दम पर आगे बढ़ेगी? इसका जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Finance Minister Nirmala Sitharaman) ने कहा है कि भारत का मिडिल क्लास (मध्यम वर्ग) ही देश की आर्थिक वृद्धि का सबसे बड़ा इंजन बनने जा रहा है। उन्होंने बताया कि 2036 तक भारत के मिडिल क्लास और उच्च-मध्यम वर्ग (Slightly Affluent Population) का देश के कुल उपभोक्ता खर्च (Consumer Spending) में 93% हिस्सा होगा, यानी अगले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा ताकत इसी वर्ग की बढ़ती खरीदारी और खर्च से मिलेगी।

    फ्रांस के Aix-Marseille यूनिवर्सिटी में आयोजित प्रतिष्ठित आर्थिक सम्मेलन Rencontres Économiques d’Aix-en-Provence को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बाद भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। इसकी सबसे बड़ी वजह देश का मजबूत घरेलू उपभोग (Domestic Consumption) है, जिसे मिडिल क्लास लगातार आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि जब लोग ज्यादा खर्च करते हैं, तो उद्योगों का उत्पादन बढ़ता है, रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था को नई गति मिलती है।

    निर्मला सीतारमण के अनुसार, वर्तमान में भारत की लगभग 31% आबादी मिडिल क्लास में आती है। OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) के अनुमान का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 2030 से 2035 के बीच भारत दुनिया में मिडिल क्लास आबादी के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ सकता है। उन्होंने बताया कि साल 1995 से 2021 के बीच भारत का मिडिल क्लास औसतन 6.3% सालाना की दर से बढ़ा है और आने वाले सालों में यह रफ्तार और तेज होने की उम्मीद है।

    वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार की वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion), जनकल्याण योजनाओं और आर्थिक सुधारों ने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालकर मिडिल क्लास तक पहुंचने में मदद की है। उनके मुताबिक, अब तक 24.8 करोड़ (248 मिलियन) लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) से बाहर आए हैं। इसके अलावा डिजिटल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और आसान लोन सिस्टम ने लोगों की आर्थिक क्षमता को मजबूत किया है। वहीं, कई वस्तुओं पर GST दरों में कमी से भी घरेलू खर्च बढ़ाने में मदद मिली है।

    निर्मला सीतारमण ने यह भी कहा कि अब आर्थिक विकास केवल दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या चेन्नई जैसे महानगरों तक सीमित नहीं है। टियर-2 और टियर-3 शहर भी तेजी से आर्थिक गतिविधियों के नए केंद्र बन रहे हैं। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अनुमान के अनुसार, आने वाले सालों में 500 से अधिक भारतीय शहर नए आर्थिक हब के रूप में उभर सकते हैं। इससे देशभर में रोजगार, निवेश और उपभोग के नए अवसर पैदा होंगे।

    वित्त मंत्री ने भारत की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) क्षमता का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत का कुशल युवा वर्ग तेजी से AI तकनीक अपना रहा है और उद्योगों को भी AI आधारित समाधान उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने बताया कि देश के MSME (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) सेक्टर का लगभग 40% निर्यात होता है और इनमें से कई कंपनियां अब AI आधारित बिजनेस मॉडल अपना रही हैं। इससे नए रोजगार और तकनीकी विकास को भी बढ़ावा मिल रहा है।

    उन्होंने यह भी कहा कि भारत आज दुनिया में सबसे अधिक AI ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स और डेटा सेंटर्स वाले प्रमुख देशों में शामिल हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण देश की बड़ी और कुशल तकनीकी कार्यबल है, जो वैश्विक कंपनियों की जरूरतों को पूरा कर रही है।

    वित्त मंत्री का मानना है कि आने वाले सालों में भारत की आर्थिक तरक्की का सबसे बड़ा आधार उसका तेजी से बढ़ता मिडिल क्लास होगा। अगर मौजूदा रफ्तार बनी रहती है, तो 2036 तक देश की लगभग 93% उपभोक्ता खरीदारी इसी वर्ग से आएगी, जिससे भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभेगी।

  • भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    भारत की विकास यात्रा मजबूत लेकिन चुनौतियां बरकरार, निर्मला सीतारमण बोलीं- सतत प्रगति के लिए सुधार, नवाचार और तैयारी जरूरी

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है, लेकिन दीर्घकालिक और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता बनी हुई है। केंद्रीय वित्त एवं कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण ने सोमवार को कहा कि देश ने आर्थिक मोर्चे पर उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, फिर भी विकास की इस गति को स्थायी बनाए रखने के लिए आत्मसंतोष की बजाय निरंतर सुधार, नवाचार और संस्थागत मजबूती पर ध्यान देना होगा।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी बड़ी और जटिल अर्थव्यवस्था के लिए केवल विकास दर हासिल करना पर्याप्त नहीं होता। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब आर्थिक प्रगति का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचे और विकास समावेशी तथा टिकाऊ स्वरूप ग्रहण करे। उन्होंने कहा कि मजबूत संस्थानों, प्रभावी नीतियों और सक्षम प्रशासनिक व्यवस्थाओं के बिना दीर्घकालिक आर्थिक विकास को बनाए रखना कठिन हो सकता है।

    सीतारमण ने कहा कि भारत वर्तमान में कई आर्थिक संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन यह स्थिति स्थायी रूप से सुनिश्चित नहीं मानी जा सकती। उनके अनुसार समय-समय पर नीतियों का मूल्यांकन करना और उन क्षेत्रों की पहचान करना आवश्यक है जहां सुधार की गुंजाइश अभी भी मौजूद है। उन्होंने कहा कि बदलती घरेलू और वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप नीतिगत ढांचे को लगातार अद्यतन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    वित्त मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि विकास को गति देने के लिए देश की उत्पादन क्षमता, कार्यकुशलता और प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है, लेकिन कुछ सेक्टर ऐसे भी हैं जिन्हें अतिरिक्त नीति समर्थन और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। विशेष रूप से जटिल विनिर्माण, मध्यवर्ती उत्पादों और विशिष्ट सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों में नई रणनीतियों की जरूरत महसूस की जा रही है।

    उन्होंने कहा कि लंबे समय से जिन चुनौतियों पर चर्चा होती रही है, अब उनके व्यावहारिक समाधान तलाशने का समय है। इसके लिए बेहतर क्रियान्वयन, संस्थागत क्षमता निर्माण और आवश्यकतानुसार नई नीतियों का निर्माण महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सरकार लगातार इस दिशा में काम कर रही है ताकि भविष्य की आर्थिक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सके।

    वैश्विक आर्थिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए सीतारमण ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। ऐसे में भारत को भी अपनी नीतियों को लचीला और परिस्थितियों के अनुरूप बनाए रखना होगा। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया स्वतः संचालित नहीं होती, बल्कि इसके लिए निरंतर निगरानी, सुधार और दूरदर्शी योजना की आवश्यकता होती है।

    कोविड-19 महामारी के प्रभावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महामारी से जुड़े कुछ असर अब भी आर्थिक योजना और अपेक्षाओं को प्रभावित करते हैं। हालांकि वर्तमान समय में किसी बड़े व्यवधान की आशंका नहीं है, फिर भी सरकार संभावित जोखिमों पर नजर बनाए हुए है और आवश्यक तैयारियां कर रही है।

    वित्त मंत्री ने मौसम संबंधी चुनौतियों पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि एल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कमजोर मानसून की संभावना को ध्यान में रखते हुए सरकार पहले से तैयारी कर रही है। कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति और कुछ इलाकों में अत्यधिक वर्षा की आशंका को देखते हुए संबंधित विभागों को सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं।

    उन्होंने विश्वास जताया कि उचित नीतियों, मजबूत संस्थागत ढांचे और निरंतर सुधारों के माध्यम से भारत अपनी दीर्घकालिक विकास संभावनाओं को और अधिक सशक्त बना सकेगा तथा वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा।

  • RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन सीएस शेट्टी ने ब्याज दरों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में ब्याज दरों में किसी प्रकार का बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए अधिक लाभदायक रहेगा। उनके अनुसार इस समय नीतिगत दरों में स्थिरता बनाए रखने से आर्थिक गतिविधियों को संतुलित समर्थन मिलेगा और विकास की रफ्तार भी बनी रहेगी। बाजार की सामान्य धारणा भी यही संकेत देती है कि आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना केंद्रीय बैंक की प्रमुख जिम्मेदारी होती है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर रखना एक व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरें उद्योग, कारोबार और उपभोक्ताओं को स्पष्ट संकेत देती हैं, जिससे निवेश और ऋण गतिविधियों को निरंतरता मिलती है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था इस समय सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और इसे स्थिर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।

    एसबीआई चेयरमैन ने निवेशकों को सलाह देते हुए कहा कि शेयर बाजार में होने वाले रोजाना उतार-चढ़ाव को लेकर अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक ताकत उसकी दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता में निहित है। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, डिजिटल क्रांति, वित्तीय समावेशन और तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि निवेशकों को अल्पकालिक बाजार गतिविधियों के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं पर ध्यान देना चाहिए।

    सीएस शेट्टी ने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याएं और तकनीकी परिवर्तन जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत एक स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में आर्थिक सुधारों और निवेश के अनुकूल वातावरण ने भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

    डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने भारत की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आज देश की सबसे बड़ी तकनीकी सफलताओं में शामिल है। हर महीने अरबों डिजिटल लेनदेन यूपीआई के माध्यम से किए जा रहे हैं, जिससे नकदी पर निर्भरता कम हुई है और भुगतान प्रणाली अधिक तेज, सुरक्षित तथा पारदर्शी बनी है। उन्होंने बताया कि एसबीआई की डिजिटल सेवाओं की सफलता उसकी मजबूत तकनीकी संरचना और ग्राहकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।

    उन्होंने वित्तीय समावेशन में जनधन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार ‘जेएएम ट्रिनिटी’ ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में अहम योगदान दिया है। इसके साथ ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) प्रणाली ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद की है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और विभिन्न योजनाओं में होने वाली संभावित अनियमितताओं में कमी आई है।

    भारत की भविष्य की विकास यात्रा पर बात करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि आने वाले वर्षों में देश को बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी। उन्होंने बताया कि बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा परिवर्तन, शहरी विकास, एमएसएमई और नवाचार जैसे क्षेत्रों में विशाल निवेश अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बनेंगे।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर भी उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उनका मानना है कि भारत एआई तकनीक के उपयोग और विस्तार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन सकता है। उन्होंने बताया कि एसबीआई पहले से कई बैंकिंग सेवाओं में एआई आधारित प्रणालियों का उपयोग कर रहा है और इसके लिए जिम्मेदार तथा सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने हेतु विशेष ढांचा भी विकसित किया गया है।

    कर्ज की मांग के संबंध में उन्होंने कहा कि छोटे और मध्यम उद्योगों सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऋण की मांग मजबूत बनी हुई है। बैंक लगातार उद्यमियों और व्यवसायों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही बैंक विलय एवं अधिग्रहण से जुड़े वित्तपोषण के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत की मजबूत आर्थिक नींव, डिजिटल प्रगति और निवेश क्षमता देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में मदद करेगी।

  • मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    मई में जीएसटी कलेक्शन में 3.2% की बढ़ोतरी, आयात और सेवा क्षेत्र की मजबूती से राजस्व को मिला सहारा

    नई दिल्ली । मई माह में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में स्थिर वृद्धि दर्ज की गई है, जो अर्थव्यवस्था में मांग और कर अनुपालन की मजबूती को दर्शाती है। सरकार की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया में अस्थिरता के बावजूद भारत का सकल जीएसटी संग्रह लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के स्तर के करीब पहुंच गया है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब कई वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं धीमी विकास दर और अनिश्चितता का सामना कर रही हैं।
    आंकड़ों के अनुसार मई 2026 में सकल जीएसटी संग्रह 1,94,184 करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 1,88,172 करोड़ रुपये की तुलना में 3.2 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाता है। वहीं शुद्ध जीएसटी राजस्व 1,66,904 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जिसमें 3.3 प्रतिशत की सालाना वृद्धि हुई है। रिफंड को समायोजित करने के बाद राजस्व वृद्धि लगभग 9 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो कर संग्रह प्रणाली की मजबूती का संकेत है।

    महीने के दौरान रिफंड की राशि भी बढ़कर 27,281 करोड़ रुपये रही, हालांकि इसके बावजूद कुल राजस्व में सकारात्मक रुझान देखने को मिला। घरेलू कर संग्रह में हल्की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन आयात से प्राप्त कर राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि ने कुल आंकड़ों को संतुलित बनाए रखा। आयात आधारित जीएसटी संग्रह 19.1 प्रतिशत बढ़कर 59,654 करोड़ रुपये पहुंच गया, जो वैश्विक व्यापार गतिविधियों में मजबूती और आयात मांग में सुधार का संकेत देता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति घरेलू खपत और औद्योगिक गतिविधियों में निरंतरता को दर्शाती है।

    वहीं दूसरी ओर घरेलू जीएसटी संग्रह 1,34,530 करोड़ रुपये रहा, जिसमें 2.6 प्रतिशत की कमी देखी गई, लेकिन सेवा क्षेत्र और वस्तु श्रेणियों में व्यापक वृद्धि दर्ज की गई है। सेवा क्षेत्र में 22.2 प्रतिशत की मजबूत वृद्धि और वस्तु श्रेणियों में सकारात्मक रुझान यह दर्शाते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत आधारित विकास मॉडल मजबूत स्थिति में है। सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों में वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक गतिविधियों की व्यापकता को दर्शाता है।

    राज्यों के स्तर पर भी जीएसटी संग्रह में विविध प्रदर्शन देखने को मिला। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, गुजरात, तेलंगाना और हरियाणा जैसे राज्यों में कर संग्रह में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से केरल और हरियाणा जैसे राज्यों ने दोहरे अंकों में वृद्धि के साथ बेहतर प्रदर्शन किया है। यह संकेत देता है कि राज्यों की अर्थव्यवस्थाओं में भी गतिविधियां तेज हो रही हैं और कर आधार का विस्तार हो रहा है।

    वित्तीय वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों में कुल सकल जीएसटी संग्रह 4.37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 6.2 प्रतिशत अधिक है। इसी अवधि में शुद्ध राजस्व में भी 5.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। अप्रैल माह में भी रिकॉर्ड संग्रह देखने को मिला था, जो यह दर्शाता है कि लगातार दो महीनों से राजस्व वृद्धि का रुझान मजबूत बना हुआ है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रदर्शन वित्त वर्ष के निर्धारित कर लक्ष्यों को हासिल करने में मददगार साबित होगा और देश की आर्थिक स्थिरता को और मजबूत करेगा।

  • भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।

    वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है।

    महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है।

    विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।

  • पेट्रोल-डीजल पर ड्यूटी कटौती से सरकार पर बढ़ा आर्थिक दबाव: जनता को राहत देने की कीमत ₹1 लाख करोड़, वित्त मंत्री ने रखी बड़ी तस्वीर

    पेट्रोल-डीजल पर ड्यूटी कटौती से सरकार पर बढ़ा आर्थिक दबाव: जनता को राहत देने की कीमत ₹1 लाख करोड़, वित्त मंत्री ने रखी बड़ी तस्वीर


    नई दिल्ली। देश में बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच आम जनता को राहत देने के उद्देश्य से उठाए गए कदम का अब आर्थिक असर भी सामने आने लगा है। पेट्रोल और डीजल पर करों में कटौती के बाद जहां उपभोक्ताओं को कुछ राहत महसूस हुई है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर इसका बड़ा प्रभाव पड़ने की बात कही जा रही है। आर्थिक मोर्चे पर यह फैसला एक संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें जनता को तत्काल राहत और राजस्व पर पड़ने वाले असर के बीच सरकार को संतुलन साधना पड़ रहा है।

    हाल के समय में वैश्विक हालातों ने ऊर्जा बाजारों पर गहरा असर डाला है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए ऐसी परिस्थितियां अतिरिक्त चुनौती पैदा करती हैं। ऐसे समय में ईंधन की बढ़ती कीमतें सीधे आम आदमी और व्यापारिक गतिविधियों दोनों को प्रभावित करती हैं। इसी कारण सरकार ने कीमतों के दबाव को कम करने के लिए ईंधन पर लगने वाले करों में राहत देने का रास्ता चुना।

    सरकार के इस फैसले से देशभर में ईंधन की कीमतों पर कुछ हद तक नियंत्रण दिखाई दिया, जिससे परिवहन लागत और दैनिक खर्चों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने की कोशिश की गई। हालांकि आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस प्रकार की राहत का सीधा असर सरकारी आय पर भी पड़ता है। राजस्व में कमी का प्रभाव भविष्य की आर्थिक योजनाओं और विकास परियोजनाओं पर भी दिखाई दे सकता है। इसलिए ऐसे फैसले केवल उपभोक्ताओं को राहत देने तक सीमित नहीं होते बल्कि उनके दीर्घकालिक आर्थिक परिणाम भी होते हैं।

    वित्तीय मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की मौजूदा आर्थिक चुनौतियां केवल घरेलू कारणों से नहीं बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से भी प्रभावित हैं। विदेशी बाजारों में लगातार हो रहे बदलाव, कमोडिटी कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक मुद्रा बाजार की अस्थिरता जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहे हैं। ऐसे माहौल में नीति निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे आम लोगों को राहत देने के साथ आर्थिक स्थिरता भी बनाए रखें।

    इसके अलावा उद्योग और व्यापार से जुड़े क्षेत्रों में भी समय पर भुगतान और वित्तीय अनुशासन पर जोर दिया जा रहा है। छोटे और मध्यम उद्योगों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, ताकि आर्थिक गतिविधियों की गति प्रभावित न हो। विशेषज्ञ मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की मजबूती केवल बड़े फैसलों से नहीं बल्कि छोटे स्तर पर वित्तीय अनुशासन बनाए रखने से भी तय होती है।

    इस बीच ईंधन कीमतों में लगातार हो रहे बदलाव ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले समय में वैश्विक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं, इसका सीधा असर भारत के ऊर्जा बाजार और आर्थिक स्थिति पर देखने को मिल सकता है। फिलहाल सरकार राहत और आर्थिक संतुलन के बीच रास्ता निकालने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।