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  • मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

    मोहनजोदड़ो की 'डांसिंग गर्ल' प्रतिमा के चित्रण पर छिड़ा विवाद, चौतरफा आलोचना के बाद अब मूल तस्वीर ही छापेगा NCERT

    नई दिल्ली । राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की नौवीं कक्षा की नई पाठ्यपुस्तक में सिंधु घाटी सभ्यता की ऐतिहासिक कलाकृति ‘डांसिंग गर्ल’ (नृत्य करती युवती) के चित्रण को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल, परिषद द्वारा कला शिक्षा की नई पुस्तक ‘मधुरिमा’ के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में मोहनजोदड़ो से प्राप्त इस सुप्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा के वास्तविक रूप में बदलाव करते हुए उसके बिना कपड़ों वाले धड़ को छायांकन (शेडिंग) के जरिए ढका हुआ दिखाया गया था। ऐतिहासिक धरोहर के इस बदले हुए रूप की शिक्षाविदों, पुरातत्वविदों और इतिहासकारों ने तीखी आलोचना की थी। चौतरफा दबाव और विरोध के बीच अब एनसीईआरटी ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए पाठ्यपुस्तक में इस मूर्ति की मूल और वास्तविक तस्वीर को ही प्रकाशित करने का अंतिम फैसला लिया है।

    इस पूरे मामले पर एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी ने एक साक्षात्कार के दौरान आधिकारिक पुष्टि की है। जब उनसे यह सवाल पूछा गया कि क्या परिषद कक्षा नौ की कला विषय की पुस्तक में संशोधित और विवादित तस्वीर को हटाकर मूल कांस्य प्रतिमा का चित्र शामिल करेगी, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘हां’ में जवाब दिया। उल्लेखनीय है कि इस नई पुस्तक में प्रतिमा के ऊपरी हिस्से के मूल स्वरूप को इस तरह बदला गया था कि शरीर के वे हिस्से साफ दिखाई नहीं दे रहे थे जो वास्तविक पुरातात्विक खोज में नजर आते हैं। इसके विपरीत, परिषद द्वारा ही तैयार की गई कक्षा छठी की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में इसी ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर को उसके मूल और वास्तविक ऐतिहासिक स्वरूप के बेहद करीब दिखाया गया है, जिसने इस विसंगति को और उजागर कर दिया।

    कक्षा छठी की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक समिति के पूर्व प्रमुख रहे माइकल डैनिनो ने इस बदलाव पर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने खुलासा किया कि इससे पहले उन्हें यह तर्क दिया गया था कि इस प्राचीन प्रतिमा का नग्न स्वरूप छोटे बच्चों की ‘उम्र के अनुसार उपयुक्त नहीं’ है। डैनिनो के अनुसार, उनकी पूरी टीम इस तर्क से असहमत थी और जब उन्होंने कक्षा छठी के शिक्षकों से इस संबंध में बात की, तो उन सभी का कहना था कि क्लासरूम में इस ऐतिहासिक कलाकृति को लेकर कभी कोई समस्या या असहजता नहीं रही। डैनिनो ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि कलाकृति की नग्नता को अनुपयुक्त मानना वास्तव में विक्टोरियन युग की पुरानी और संकीर्ण औपनिवेशिक सोच का हिस्सा है, जबकि वर्तमान में भारतीय शिक्षा व्यवस्था को इन्हीं औपनिवेशिक प्रभावों से मुक्त करने की बातें की जा रही हैं।

    जानकारों का मानना है कि यदि भारतीय कला पर आधारित किसी गंभीर अध्याय में भी किसी ऐतिहासिक कलाकृति को उसके वास्तविक रूप और सही शारीरिक अनुपात में नहीं दिखाया जा सकता, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गंभीर समस्या है। इतिहासकारों ने इस बदलाव की तुलना मध्य युग की उस घटना से की है जब चर्च ने अपनी संकीर्ण सोच के कारण ‘डेविड’ की विश्वप्रसिद्ध सुंदर प्रतिमा पर अंजीर का पत्ता जोड़कर उसे गलत रूप में प्रस्तुत किया था। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी ऐतिहासिक साक्ष्य या कलाकृति की तस्वीरों में इस तरह का मनमाना बदलाव करना एक तरह से ‘नकली कलाकृति’ बनाने जैसा है, जो यह साबित करता है कि जिम्मेदार संस्थाओं में इतिहास और पुरातत्व को प्रस्तुत करने की समझ बेहद कम है।

    ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, यह ‘डांसिंग गर्ल’ मोहनजोदड़ो से प्राप्त लगभग २६०० ईसा पूर्व की एक अत्यंत महत्वपूर्ण कांस्य प्रतिमा है। सिंधु घाटी सभ्यता की इस अद्भुत कलाकृति को ‘लॉस्ट-वैक्स तकनीक’ (मोम पिघलाकर धातु ढालने की विधि) से बनाया गया था, जो तकनीक आज भी भारत के पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से प्रचलित है। पुरातत्वविदों के अनुसार, कमर पर हाथ रखकर खड़े होने की यह विशिष्ट मुद्रा राजस्थान के हड़प्पा कालीन स्थल ‘भिरड़ाना’ से मिले मिट्टी के बर्तनों के टुकड़ों पर भी अंकित मिली है, जो यह दर्शाती है कि इस मुद्रा का प्राचीन काल में कोई गहरा सांस्कृतिक और कलात्मक महत्व था।

  • NEET-UG पेपर लीक मामला गरमाया: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर राहुल के बयान से सियासी घमासान, BJP ने साधा निशाना

    NEET-UG पेपर लीक मामला गरमाया: सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर राहुल के बयान से सियासी घमासान, BJP ने साधा निशाना

    नई दिल्ली । NEET-UG पेपर लीक मामले को लेकर देश की सियासत एक बार फिर गरमा गई है और इस बार विवाद की जड़ सुप्रीम कोर्ट में दिए गए एक बयान के बाद सामने आया है, जिसके बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। राहुल गांधी के बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे गैर-जिम्मेदाराना और तथ्यहीन बताते हुए विपक्ष पर गंभीर मुद्दों को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली को लेकर चल रही बहस को केंद्र में ला दिया है।

    दरअसल मामला उस समय चर्चा में आया जब NEET-UG पेपर लीक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने यह टिप्पणी की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे मामले की प्रगति पर व्यक्तिगत रूप से नजर रख रहे हैं। इसी बयान को आधार बनाते हुए राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर तंज कसा और कहा कि अगर प्रधानमंत्री जांच की निगरानी कर रहे हैं, तो क्या उन्होंने पेपर लीक की भी व्यक्तिगत निगरानी की थी। राहुल गांधी का यह बयान तेजी से राजनीतिक बहस का विषय बन गया और कुछ ही समय में विभिन्न दलों के नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।

    भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी के इस बयान को गंभीरता से लेते हुए कड़ी आपत्ति जताई है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष के नेता को जिम्मेदारी के साथ बयान देना चाहिए, खासकर तब जब मामला लाखों छात्रों और उनके भविष्य से जुड़ा हो। बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि राहुल गांधी तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं और संवेदनशील मुद्दों पर अनावश्यक विवाद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी का यह भी कहना है कि इस तरह की टिप्पणी न केवल राजनीतिक स्तर पर अनावश्यक तनाव पैदा करती है, बल्कि छात्रों और उनके अभिभावकों की चिंताओं को भी कमजोर करती है।

    केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी राहुल गांधी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे पूरी तरह से गैर-जिम्मेदाराना बताया। उन्होंने कहा कि एक जिम्मेदार नेता से अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों के आधार पर बात करे और समाधान की दिशा में सुझाव दे, न कि केवल सुर्खियां बटोरने के लिए बयानबाजी करे। वहीं बीजेपी प्रवक्ता अमित मालवीय ने भी राहुल गांधी के बयान को तर्क से परे बताते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियां उनकी गंभीर मुद्दों को समझने की क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं।

    दूसरी ओर, बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी राहुल गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि विपक्ष के नेता मुद्दों की गंभीरता को समझे बिना प्रतिक्रिया देते हैं, जिससे राजनीतिक बहस का स्तर गिरता है।

    गौरतलब है कि NEET-UG परीक्षा, जो मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए आयोजित की जाती है, इस वर्ष पेपर लीक के आरोपों के बाद विवादों में आ गई थी। इसके बाद परीक्षा प्रक्रिया और उसकी पारदर्शिता को लेकर सवाल उठे और मामला न्यायालय तक पहुंच गया, जहां फिलहाल इसकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो द्वारा की जा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।

    इस पूरे विवाद ने एक बार फिर परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां विपक्ष सरकार से जवाब मांग रहा है, वहीं सत्ता पक्ष का कहना है कि इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। फिलहाल मामला अदालत की निगरानी में है और जांच प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, लेकिन राजनीतिक बयानबाजी ने इसे और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

  • सख्त कानून, बड़ी सजा और बुलडोजर की चेतावनी… फिर भी क्यों नहीं टूट रहा पेपर लीक माफियाओं का नेटवर्क?

    सख्त कानून, बड़ी सजा और बुलडोजर की चेतावनी… फिर भी क्यों नहीं टूट रहा पेपर लीक माफियाओं का नेटवर्क?

    नई दिल्ली।देश में भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं लंबे समय से युवाओं के भविष्य के सामने बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। हर बार किसी बड़े परीक्षा विवाद के बाद सख्त कानून और कठोर कार्रवाई की बातें सामने आती हैं, लेकिन इसके बावजूद हालात में बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। युवाओं की मेहनत, वर्षों की तैयारी और उम्मीदें बार-बार ऐसे मामलों की भेंट चढ़ती रही हैं। इसी समस्या पर रोक लगाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम लागू किया था। उस समय यह दावा किया गया था कि इस कानून के बाद पेपर लीक माफियाओं के लिए बच निकलना लगभग असंभव हो जाएगा और दोषियों को किसी भी स्थिति में छोड़ा नहीं जाएगा। लेकिन समय बीतने के साथ तस्वीर कुछ अलग दिखाई देने लगी है।

    कानून में बेहद सख्त प्रावधान किए गए थे। इसमें दोषियों के लिए 10 साल तक की जेल, एक करोड़ रुपये तक जुर्माना और संपत्ति कुर्क करने जैसे कदम शामिल किए गए थे। परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले संगठित गिरोहों, सॉल्वर गैंग और एजेंसियों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था। उम्मीद थी कि इतने कड़े नियमों के बाद पेपर लीक जैसी घटनाओं में भारी कमी आएगी। लेकिन हाल ही में सामने आए नए विवादों ने इस उम्मीद पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन सबसे ज्यादा जरूरी होता है। अब तक सामने आए कई मामलों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई निचले स्तर के लोगों तक ही सीमित दिखाई दी है। छोटे कर्मचारी, परीक्षा केंद्र से जुड़े लोग या डमी उम्मीदवार गिरफ्त में आते हैं, लेकिन असली मास्टरमाइंड और बड़े नेटवर्क कानून की पकड़ से दूर नजर आते हैं। इससे अपराधियों में डर की बजाय व्यवस्था की कमजोरियों का भरोसा बढ़ता दिखाई देता है।

    एक और बड़ी चिंता जांच और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी रफ्तार को लेकर सामने आ रही है। कई मामलों में अदालतों तक मामला पहुंचने और अंतिम फैसला आने में लंबा समय लग जाता है। जब सजा में देरी होती है तो कानून का प्रभाव भी कमजोर पड़ने लगता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अपराधियों के मन में डर पैदा करने के लिए त्वरित कार्रवाई और समयबद्ध फैसले बेहद जरूरी हैं।

    इसके अलावा कुछ कानूनी प्रावधानों पर भी सवाल उठ रहे हैं। व्यवस्था में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं जिनके जरिए कई बार तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक त्रुटियों को आधार बनाकर बड़ी जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश की जाती है। ऐसे मामलों में जवाबदेही तय करना कठिन हो जाता है और जांच लंबी खिंचती चली जाती है।

    लगातार सामने आ रही पेपर लीक घटनाओं ने युवाओं का भरोसा भी प्रभावित किया है। लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षाओं में बैठते हैं और जब ऐसे विवाद सामने आते हैं तो केवल परीक्षा नहीं, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी टूटता है। अब छात्र केवल सख्त कानून की घोषणा नहीं, बल्कि जमीन पर उसके असर को देखना चाहते हैं। क्योंकि जब तक बड़े नेटवर्क और असली दोषियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पेपर लीक की यह समस्या खत्म होने की उम्मीद अधूरी ही रहेगी।

  • स्कूलों के बाद अब मदरसों पर भी लागू हुआ राष्ट्रगीत नियम, बंगाल सरकार के फैसले से राजनीतिक हलचल

    स्कूलों के बाद अब मदरसों पर भी लागू हुआ राष्ट्रगीत नियम, बंगाल सरकार के फैसले से राजनीतिक हलचल


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा और संवेदनशील नीतिगत फैसला सामने आया है, जिसने राज्य के राजनीतिक और सामाजिक माहौल में नई बहस को जन्म दे दिया है। राज्य सरकार ने आदेश जारी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि अब सभी सरकारी, सहायता प्राप्त और मान्यता प्राप्त मदरसों में कक्षाएं शुरू होने से पहले प्रार्थना सभा के दौरान राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य रूप से किया जाएगा। इस निर्णय को शिक्षा और राष्ट्रीय एकता से जुड़ा एक अहम कदम बताया जा रहा है, जबकि दूसरी ओर इसे लेकर अलग-अलग स्तर पर चर्चा और प्रतिक्रिया भी देखने को मिल रही है।

    सरकारी आदेश के अनुसार यह नियम केवल सामान्य सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मदरसा शिक्षा व्यवस्था के सभी स्तरों पर लागू होगा। इसमें सरकारी मॉडल मदरसे, सहायता प्राप्त संस्थान, स्वीकृत मदरसा शिक्षा केंद्र, शिशु शिक्षा केंद्र और मान्यता प्राप्त गैर-सहायता प्राप्त मदरसे सभी शामिल किए गए हैं। इस आदेश के बाद पुराने सभी संबंधित नियम और पूर्व प्रथाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त मानी जाएंगी। प्रशासन का मानना है कि शिक्षा संस्थानों में एक समान सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अभ्यास को लागू करने से एकरूपता और राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलेगी।

    इस फैसले के पीछे सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि जब राज्य के अन्य सभी सरकारी स्कूलों और विशेष भाषा आधारित विद्यालयों में प्रार्थना सभा के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का गायन पहले से ही लागू है, तो फिर मदरसों को इससे अलग रखना उचित नहीं है। सरकार के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान देना नहीं है, बल्कि छात्रों में राष्ट्र के प्रतीकों के प्रति सम्मान और एकता की भावना विकसित करना भी है। इसी सोच के तहत इस निर्णय को लागू किया गया है।

    शिक्षा विभाग की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि यह निर्णय किसी एक वर्ग या संस्था को लक्षित नहीं करता, बल्कि इसका उद्देश्य राज्य के सभी शैक्षणिक संस्थानों में समान नियम लागू करना है। प्रशासन का मानना है कि इससे छात्रों के बीच सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को और अधिक मजबूती मिलेगी। वहीं इस फैसले के बाद शिक्षा जगत में इस बात पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इस तरह के निर्देश विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की विविध परंपराओं और व्यवस्थाओं के साथ संतुलन बना पाएंगे या नहीं।

    इससे पहले राज्य सरकार ने कुछ दिन पूर्व ही सामान्य सरकारी स्कूलों में भी यही नियम लागू किया था, जिसके बाद अब इसे मदरसों तक विस्तारित कर दिया गया है। इस विस्तार को सरकार की एक व्यापक नीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य सभी शिक्षा संस्थानों में एक समान सांस्कृतिक अभ्यास सुनिश्चित करना बताया जा रहा है।

    राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस निर्णय को लेकर बहस तेज हो गई है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय एकता और शिक्षा में समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मान रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे शैक्षणिक स्वतंत्रता और परंपराओं से जुड़ा मुद्दा बता रहा है। हालांकि सरकार अपने रुख पर कायम है और इस नीति को राज्य के सभी संबंधित संस्थानों में लागू करने के लिए प्रतिबद्ध नजर आ रही है। कुल मिलाकर यह निर्णय पश्चिम बंगाल की शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जिसका प्रभाव आने वाले समय में राज्य के शैक्षणिक और सामाजिक ढांचे पर भी पड़ सकता है।

  • तेलंगाना ने केंद्र से मांगी 5,000 करोड़ की विशेष वित्तीय सहायता, यंग इंडिया स्कूल परियोजना के लिए दी मांग

    तेलंगाना ने केंद्र से मांगी 5,000 करोड़ की विशेष वित्तीय सहायता, यंग इंडिया स्कूल परियोजना के लिए दी मांग


    नई दिल्ली।
    तेलंगाना सरकार ने केंद्र से विशेष सहायता योजना (एसएएससीआई) के तहत अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपए की मांग की है, ताकि राज्य में पूंजीगत निवेश और विकास परियोजनाओं को गति दी जा सके। उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने इस संबंध में केंद्रीय वित्त मंत्री से नई दिल्ली में मुलाकात की और राज्य की आर्थिक, शैक्षणिक और मानव संसाधन विकास संबंधी जरूरतों पर विस्तार से चर्चा की। इस बैठक में वित्तीय सहायता की आवश्यकता, विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के क्षेत्रों में किए जा रहे बड़े निवेशों की व्याख्या की गई।

    उपमुख्यमंत्री ने केंद्रीय वित्त मंत्री को बताया कि तेलंगाना में शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे निवेश, विशेषकर यंग इंडिया इंटीग्रेटेड रेजिडेंशियल स्कूल्स (वाईआईआईआरएस) परियोजना, राज्य की सामाजिक और शैक्षणिक संरचना में क्रांतिकारी बदलाव लाएंगे। इस परियोजना का कुल बजट 30,000 करोड़ रुपए है और यह लाखों बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पोषण संबंधी सुविधाएं सुनिश्चित करेगी। उन्होंने आर्थिक मामलों के विभाग से इस परियोजना को एफआरबीएम सीमा से छूट देने की अपील भी की, ताकि दीर्घकालिक मानव पूंजी निवेश पर वित्तीय प्रतिबंध न आए।

    विक्रमार्क ने कहा कि इस पहल से राज्य के वंचित और पिछड़े वर्गों के बच्चों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा और पौष्टिक भोजन मिलेगा, जो उन्हें सशक्त बनाएगा और राज्य की जनसांख्यिकीय क्षमता को मजबूत करेगा। प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय वित्त मंत्री को ज्ञापन सौंपकर एसएएससीआई योजना के तहत अतिरिक्त वित्तीय सहायता की आवश्यकता और इसके महत्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। उन्होंने यह भी बताया कि तेलंगाना की आबादी में पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग बहुसंख्यक हैं, और उनके सशक्तिकरण के लिए यह योजना निर्णायक साबित होगी।

    केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ हुई इस बैठक में राज्य के कृषि और मानव संसाधन विकास से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा हुई। कृषि मंत्री तुम्माला नागेश्वर राव और अन्य प्रतिनिधियों ने राज्य में कृषि, ग्रामीण विकास और शिक्षा से जुड़े बड़े निवेशों के महत्व को रेखांकित करते हुए वित्तीय जिम्मेदारी और बजट प्रबंधन अधिनियम के तहत छूट की मांग की। उन्होंने कहा कि इस अतिरिक्त वित्तीय सहायता के बिना राज्य की दीर्घकालिक विकास योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं और मानव पूंजी में निवेश की गति धीमी पड़ सकती है।

    पिछले वर्ष भी इसी प्रकार की बैठक में मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने यंग इंडिया प्रोजेक्ट के लिए विशेष वित्तीय सहायता और एफआरबीएम छूट की मांग की थी, और अब इस मांग को दोबारा केंद्र के समक्ष रखा गया है। अधिकारियों का मानना है कि इस योजना के कार्यान्वयन से तेलंगाना के पिछड़े और वंचित वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में स्थायी लाभ मिलेगा। इसके साथ ही राज्य की आर्थिक क्षमता बढ़ेगी और दीर्घकालिक मानव संसाधन विकास में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

    इस बैठक में केंद्रीय वित्त मंत्री को यह स्पष्ट किया गया कि तेलंगाना की अधिकांश आबादी सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों से आती है। इस आंकड़े के अनुसार, राज्य की आबादी का 56.33 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग, 17.43 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 10.45 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति से संबंधित है। इस सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकार ने एसएएससीआई योजना के तहत अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपए की मांग की है, ताकि शैक्षणिक और सामाजिक सुधारों को समय पर लागू किया जा सके और राज्य में समग्र विकास को बढ़ावा दिया जा सके।

  • राजनीति में नया चेहरा, सबसे ज्यादा दौलत थलपति विजय के पास, लेकिन पढ़ाई में पीछे रह गए सभी सीएम

    राजनीति में नया चेहरा, सबसे ज्यादा दौलत थलपति विजय के पास, लेकिन पढ़ाई में पीछे रह गए सभी सीएम


    नई दिल्ली ।भारतीय राजनीति में हाल ही में हुए चुनावों के बाद पांच अलग-अलग राज्यों में नए नेतृत्व की तस्वीर सामने आई है, जिसमें फिल्मी दुनिया से राजनीति में आए Thalapathy Vijay सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने थलपति विजय ने न केवल अपनी राजनीतिक जीत से सबको चौंकाया है, बल्कि संपत्ति के मामले में भी वह इन पांचों मुख्यमंत्रियों में सबसे आगे निकल गए हैं। उनके साथ पश्चिम बंगाल के नेता Shubhendu Adhikari, असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma, केरल के नेता वीडी सतीशन और पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी की तुलना ने एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर पेश की है, जिसमें संपत्ति, शिक्षा और आपराधिक मामलों के आधार पर स्पष्ट अंतर देखने को मिला है।

    थलपति विजय की सबसे बड़ी पहचान उनकी लोकप्रियता और फिल्मी करियर रही है, लेकिन अब राजनीति में भी उन्होंने मजबूत पकड़ बना ली है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार उनके पास करीब 648.85 करोड़ रुपये की संपत्ति बताई जाती है, जो इस सूची में शामिल सभी मुख्यमंत्रियों में सबसे अधिक है। शिक्षा के मामले में वह 12वीं पास हैं, जो इस तुलना में उन्हें सबसे कम शैक्षणिक योग्यता वाले नेता के रूप में दर्शाता है। हालांकि उनके खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या सीमित बताई जाती है, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा ने उन्हें बेहद तेज़ी से एक बड़े नेता के रूप में स्थापित कर दिया है।

    पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर भी काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। कांग्रेस और तृणमूल जैसे दलों से होते हुए उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और बाद में सत्ता की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी संपत्ति अन्य नेताओं की तुलना में काफी कम बताई जाती है, लेकिन उनके खिलाफ सबसे अधिक आपराधिक मामले दर्ज होने की चर्चा है, जो उन्हें विवादों के घेरे में भी रखता है।

    असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इस सूची में सबसे अधिक शिक्षित नेता के रूप में सामने आते हैं। डॉक्टरेट की डिग्री रखने वाले हिमंत का राजनीतिक अनुभव भी लंबा रहा है, जिसमें उन्होंने कांग्रेस से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक का सफर तय किया है। उनकी संपत्ति मध्यम स्तर पर बताई जाती है और उनके खिलाफ किसी प्रकार के आपराधिक मामलों की अनुपस्थिति उन्हें एक अलग छवि प्रदान करती है।

    केरल के नेता वीडी सतीशन का पेशेवर पृष्ठभूमि वकालत से जुड़ा रहा है। उनकी संपत्ति इन सभी नेताओं में सबसे कम मानी जाती है, जबकि उनके खिलाफ कई कानूनी मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आती है। इसके बावजूद वे लंबे समय से राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं और कांग्रेस संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है।

    पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी इस सूची में सबसे अनुभवी नेता के रूप में देखे जाते हैं। कई बार मुख्यमंत्री रह चुके रंगास्वामी की छवि एक स्थिर और अनुभवी नेतृत्व की रही है। उनकी संपत्ति मध्यम स्तर की बताई जाती है और उनके खिलाफ किसी प्रकार के आपराधिक मामलों का उल्लेख नहीं मिलता, जो उन्हें एक साफ छवि वाला नेता बनाता है।

    इन पांचों नेताओं की तुलना से यह साफ होता है कि भारतीय राजनीति में नेतृत्व केवल लोकप्रियता या अनुभव पर ही नहीं, बल्कि संपत्ति, शिक्षा और छवि जैसे कई पहलुओं पर भी निर्भर करता है। थलपति विजय का सबसे अमीर होना, हिमंत बिस्वा सरमा का सबसे शिक्षित होना और अन्य नेताओं की अलग-अलग विशेषताएं मिलकर यह दिखाती हैं कि राजनीतिक नेतृत्व की तस्वीर कितनी विविध और जटिल हो चुकी है।

  • चित्रकूट विश्वविद्यालय में भव्य दीक्षा समारोह, 2377 विद्यार्थियों को मिली उपाधियां, रामभद्राचार्य ने दिया प्रेरक संदेश

    चित्रकूट विश्वविद्यालय में भव्य दीक्षा समारोह, 2377 विद्यार्थियों को मिली उपाधियां, रामभद्राचार्य ने दिया प्रेरक संदेश


    नई दिल्ली। चित्रकूट स्थित जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय में नवम दीक्षा समारोह का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें कुल 2377 विद्यार्थियों को उपाधियां प्रदान की गईं। इस अवसर पर दिव्यांग विद्यार्थियों की उपलब्धियों की विशेष सराहना की गई और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को प्रेरणादायक बताया गया।

    समारोह में 140 विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक, 6 विद्यार्थियों को कुलाधिपति पदक तथा 50 शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के आजीवन कुलाधिपति जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने की।

    मुख्य अतिथि नरेंद्र कश्यप ने दिव्यांग विद्यार्थियों की मेहनत और सफलता की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह विश्वविद्यालय समाज में प्रेरणा का केंद्र बन रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय के विकास और वैश्विक पहचान दिलाने के लिए हर संभव सहयोग का आश्वासन भी दिया।

    इस अवसर पर सुहास एलवाई और अजीत कुमार को मानद उपाधि से सम्मानित किया गया। समारोह में विद्यार्थियों, शिक्षकों और अतिथियों की बड़ी संख्या मौजूद रही।

    अपने संबोधन में रामभद्राचार्य ने कहा कि सच्ची दीक्षा वही है, जो व्यक्ति को केवल ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उसे राष्ट्र और समाज के उत्थान के लिए प्रेरित भी करती है। उन्होंने विद्यार्थियों से जीवन में अनुशासन, सेवा और समर्पण को अपनाने का आह्वान किया।

  • अदाणी पब्लिक स्कूल के 25 वर्ष पूरे, हजारों छात्रों के भविष्य को मिली नई दिशा..

    अदाणी पब्लिक स्कूल के 25 वर्ष पूरे, हजारों छात्रों के भविष्य को मिली नई दिशा..

    नई दिल्ली। मुंद्रा स्थित अदाणी पब्लिक स्कूल ने अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस खास मौके पर स्कूल में सिल्वर जुबली समारोह का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें छात्र-छात्राएं, शिक्षक, पूर्व विद्यार्थी और अभिभावक बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूरे कार्यक्रम में उत्साह और भावनाओं का माहौल देखने को मिला, जहां स्कूल की 25 साल की यात्रा और उपलब्धियों को याद किया गया।

    इस अवसर पर डॉ. प्रीति अदाणी ने स्कूल के सफर को बेहद भावुक अंदाज़ में साझा किया। उन्होंने कहा कि यह संस्थान एक छोटे से विचार से शुरू होकर आज एक मजबूत शैक्षणिक परिवार बन चुका है, जिसने हजारों छात्रों के भविष्य को दिशा दी है। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी सपना छोटा नहीं होता, जरूरत सिर्फ उसे पूरा करने के लिए साहस और लगातार मेहनत की होती है।

    समारोह के दौरान छात्रों के लिए नए इनडोर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और आधुनिक ऑडिटोरियम का उद्घाटन भी किया गया। इन सुविधाओं को शिक्षा के साथ-साथ खेल और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    अपने संबोधन में उन्होंने स्कूल के शुरुआती दौर की चुनौतियों को भी याद किया। उन्होंने बताया कि निर्माण के समय कई कठिन परिस्थितियां सामने आईं, लेकिन टीम ने हिम्मत नहीं हारी और हर चुनौती का सामना करते हुए काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी सफलता के पीछे धैर्य, मेहनत और सामूहिक प्रयास सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    आज यह स्कूल केवल एक शिक्षा संस्थान नहीं, बल्कि एक ऐसी विरासत बन चुका है जो लगातार आगे बढ़ रही है और नई पीढ़ियों को प्रेरित कर रही है। समारोह ने इस बात को और मजबूत किया कि सही दृष्टि और निरंतर प्रयास से बड़े से बड़ा सपना भी हकीकत बन सकता है।

  • कोर्स के दौरान शादी पर रोक ,नर्सिंग स्कूल का सख्त; फरमान छात्राओं में मचा हड़कंप

    कोर्स के दौरान शादी पर रोक ,नर्सिंग स्कूल का सख्त; फरमान छात्राओं में मचा हड़कंप


    नई दिल्ली । बिहार के गोपालगंज जिले के हथुआ स्थित जीएनएम नर्सिंग स्कूल से एक ऐसा आदेश सामने आया है जिसने शिक्षा व्यवस्था और छात्राओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर बहस छेड़ दी है। स्कूल प्रशासन की ओर से जारी इस निर्देश के अनुसार वहां पढ़ने वाली किसी भी छात्रा को कोर्स की अवधि के दौरान शादी करने की अनुमति नहीं होगी। यह अवधि लगभग तीन साल की बताई जा रही है। आदेश में साफ कहा गया है कि अगर इस दौरान किसी छात्रा के विवाह करने की जानकारी मिलती है तो उसका नामांकन तुरंत प्रभाव से रद्द कर दिया जाएगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित छात्रा की होगी।

    यह आदेश 16 अप्रैल 2026 को जारी किया गया बताया जा रहा है। आधिकारिक लेटर पर संस्थान की मुहर और प्राचार्या के हस्ताक्षर होने के कारण इसे गंभीरता से लिया जा रहा है। आदेश में छात्राओं को सीधे तौर पर चेतावनी दी गई है कि वे शैक्षणिक सत्र के दौरान विवाह जैसे किसी भी व्यक्तिगत निर्णय से बचें अन्यथा उन्हें अपनी पढ़ाई से हाथ धोना पड़ सकता है।

    इस फरमान के सामने आने के बाद छात्राओं के बीच असमंजस और तनाव की स्थिति बन गई है। कई छात्राएं इसे अपनी निजी जिंदगी में हस्तक्षेप मान रही हैं तो कुछ इसे अनुशासन के नाम पर थोपे गए नियम के रूप में देख रही हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या किसी शैक्षणिक संस्थान को इस तरह का अधिकार है कि वह छात्राओं के निजी फैसलों पर रोक लगा सके।

    स्थानीय स्तर पर भी यह मुद्दा तेजी से चर्चा में आ गया है। शिक्षा और महिला अधिकारों से जुड़े लोग इसे असंवैधानिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ बता रहे हैं। उनका कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य छात्राओं को सशक्त बनाना होना चाहिए न कि उनके निजी जीवन पर नियंत्रण स्थापित करना।

    हालांकि इस पूरे मामले में स्कूल प्रशासन की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्राचार्या से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। ऐसे में यह भी साफ नहीं हो पाया है कि यह आदेश किस आधार पर जारी किया गया और इसके पीछे प्रशासन की मंशा क्या है।

    इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज के समय में भी शिक्षा संस्थानों में इस तरह के नियम लागू किए जा सकते हैं। जहां एक ओर देश में महिलाओं को बराबरी और स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है वहीं दूसरी ओर इस तरह के आदेश उन अधिकारों पर सवाल खड़े करते नजर आते हैं। आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है और संभव है कि उच्च स्तर पर इसकी जांच या हस्तक्षेप भी देखने को मिले।

  • कितनी पढ़ाई की डॉ. अंबेडकर ने? जानिए उनके जीवन के ऐतिहासिक योगदान

    कितनी पढ़ाई की डॉ. अंबेडकर ने? जानिए उनके जीवन के ऐतिहासिक योगदान


    नई दिल्ली। Dr. BR Ambedkar भारतीय इतिहास के सबसे शिक्षित और प्रभावशाली नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्होंने न सिर्फ उच्च शिक्षा हासिल की, बल्कि अपने ज्ञान और संघर्ष से देश के सामाजिक और संवैधानिक ढांचे को मजबूत किया।

    डॉ. अंबेडकर ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी पढ़ाई की। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया और इसके बाद अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके अलावा उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भी डॉक्टरेट और कानून की पढ़ाई (Barrister-at-Law) पूरी की। उस दौर में इतनी उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।

    डॉ. अंबेडकर जयंती के मौके पर पीएम मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

    Dr. BR Ambedkar ने कितनी पढ़ाई की और क्यों माने जाते हैं सबसे शिक्षित नेता
    डॉ. अंबेडकर ने कुल मिलाकर कई उच्च डिग्रियां हासिल की थीं, जिनमें अर्थशास्त्र, कानून और राजनीति जैसे विषय शामिल थे। वे पहले भारतीयों में से थे जिन्होंने विदेश जाकर इतनी ऊंची शिक्षा प्राप्त की।

    उनकी पढ़ाई सिर्फ डिग्री तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने समाज को समझने और सुधारने के लिए अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया। शिक्षा को वे सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार मानते थे और उन्होंने दलितों व पिछड़े वर्गों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

    संविधान निर्माण से लेकर सामाजिक सुधार तक योगदान
    डॉ. अंबेडकर का सबसे बड़ा योगदान भारतीय संविधान के निर्माण में रहा। उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था और उन्होंने देश को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा दिया।

    इसके अलावा उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। उन्होंने छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और समाज में समानता की नींव रखी।

    उन्होंने श्रम कानूनों, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किए। रिजर्वेशन नीति और सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने में उनका योगदान बेहद अहम रहा।

    कुल मिलाकर, डॉ. भीमराव अंबेडकर न सिर्फ एक महान विद्वान थे, बल्कि ऐसे समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने अपने ज्ञान और संघर्ष से भारत को नई दिशा दी।