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  • महाराष्ट्र MLC चुनाव में महायुति और MVA में बगावत, आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ उतरे असंतुष्ट नेता

    महाराष्ट्र MLC चुनाव में महायुति और MVA में बगावत, आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ उतरे असंतुष्ट नेता


    नई दिल्ली
    : महाराष्ट्र में 23 अक्टूबर को होने वाले विधान परिषद चुनाव के लिए नामांकन की समयसीमा खत्म होते ही सत्ताधारी महायुति और विपक्षी महाविकास आघाड़ी (एमवीए) के भीतर खींचतान खुलकर सामने आ गई है। दोनों गठबंधनों के असंतुष्ट दावेदारों ने अपने ही दलों के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ नामांकन दाखिल किया है। इसके साथ ही गठबंधन में शामिल दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर भी मतभेद दिखाई दिए हैं। कुछ जगहों पर सहयोगी दलों ने एक-दूसरे की सीट पर दावा करते हुए अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं।

    78 सदस्यीय महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों के लिए यह द्विवार्षिक चुनाव हो रहा है। इनमें पुणे संभाग स्नातक, नागपुर संभाग स्नातक, पुणे संभाग शिक्षक, छत्रपति संभाजीनगर संभाग स्नातक और अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। महायुति में भाजपा, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शामिल हैं। वहीं, एमवीए में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) शामिल हैं।

    नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस ने मौजूदा विधान परिषद सदस्य अभिजीत वंजारी को उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने सुधाकर कोहले को मैदान में उतारा है। हालांकि, भाजपा के भीतर भी असंतोष सामने आया है। पार्टी के पूर्व विधान परिषद सदस्य अनिल सोले ने टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल कर दिया। इससे इस सीट पर मुकाबला गठबंधन के अंदरूनी समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण हो गया है।

    अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस ने अदिति पोहरे को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, महायुति की ओर से शिवसेना के मौजूदा विधान परिषद सदस्य किरण सरनाइक चुनाव मैदान में हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस के उम्मीदवार के बावजूद शिवसेना (यूबीटी) ने दत्तात्रेय लहाने को भी उम्मीदवार बनाया है। शिवसेना (यूबीटी) की ओर से छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीट पर दिलीप घुगे को भी उम्मीदवार बनाया गया है।

    पुणे स्नातक सीट से भाजपा की स्मिता जाधव ने नामांकन दाखिल किया है। वह ‘पुधारी’ समूह के अध्यक्ष एवं संपादक योगेश जाधव की पत्नी हैं। इसी तरह पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के कौस्तुभ गावड़े ने नामांकन दाखिल किया है। उनकी सहयोगी शिवसेना के मंगेश चिवटे ने भी इसी सीट से नामांकन दाखिल किया है। इससे महायुति के भीतर भी सीट को लेकर टकराव की स्थिति बन गई है।

    राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील तटकरे ने कहा कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में सीट बंटवारे का मुद्दा गठबंधन सहयोगियों के बीच बातचीत से सुलझाया जाएगा। उन्होंने कहा कि राकांपा के पास छत्रपति संभाजीनगर स्नातक और पुणे स्नातक, दो सीटें थीं और पार्टी को उम्मीद थी कि पुणे सीट उसे मिलेगी। तटकरे के मुताबिक इस मुद्दे पर पहले पार्टी के भीतर चर्चा होगी और जरूरत पड़ने पर मुख्यमंत्री तथा भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस से भी बातचीत की जाएगी। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों का समाधान बातचीत और आपसी सौहार्द से निकाला जा सकता है।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का लंबा आंदोलन, मतदाता सूची विवाद पर देशभर में अभियान की तैयारी

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष का लंबा आंदोलन, मतदाता सूची विवाद पर देशभर में अभियान की तैयारी


    नई दिल्ली ।
    मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों ने आंदोलन को आगे बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर विपक्ष का कहना है कि यह अभियान केवल एक-दो दिन का नहीं होगा, बल्कि लंबे समय तक जारी रहेगा। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कांग्रेस के महासचिवों और प्रदेश अध्यक्षों से इस मुद्दे को लगातार उठाने और आंदोलन को व्यापक स्तर तक ले जाने को कहा है। मंगलवार को संसद भवन से चुनाव आयोग तक मार्च और आकाशवाणी भवन में धरने के बाद विपक्ष ने अपने आंदोलन को और तेज करने का संकेत दिया।

    इंडिया गठबंधन के कई दल करीब एक सप्ताह पहले हुई बैठक में मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे पर कई महीने तक अभियान चलाने का ऐलान कर चुके हैं। इसके बाद कांग्रेस ने सोमवार को एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को फिर से जुड़वाने के लिए एक महीने का अभियान शुरू करने की घोषणा की। विपक्षी दलों की ओर से इसे घर-घर तक पहुंचाने की तैयारी है। मंगलवार के मार्च में इंडिया गठबंधन के कई दलों की मौजूदगी के साथ बीजू जनता दल की भागीदारी भी दिखाई दी। विपक्ष इसे अपने अभियान के लिए व्यापक समर्थन के तौर पर देख रहा है।

    इस मुद्दे को राहुल गांधी पिछले एक साल से उठाते रहे हैं। विपक्ष ने पहली बार 7 अगस्त 2025 को इसे प्रमुखता से सामने रखा था। उस समय राहुल गांधी ने महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक का उदाहरण देते हुए मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठाए थे। इसके बाद विपक्षी दल लगातार इस विषय को अलग-अलग मंचों पर उठाते रहे। बाद में पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की खबरों और चुनाव परिणामों के बाद विपक्ष ने इस मुद्दे पर और ज्यादा जोर दिया।

    विपक्षी रणनीतिकारों के मुताबिक, इस पूरे अभियान में एकजुटता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। संसद के मानसून सत्र के दौरान भी विपक्षी दलों ने एक साथ कई मुद्दे उठाए थे। अब मतदाता सूची के मुद्दे पर भी अलग-अलग दलों के एक मंच पर आने से आंदोलन को आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। विपक्ष का रुख है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो शीतकालीन सत्र के दौरान भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठाया जाएगा और संसद के भीतर विरोध और अधिक तीखा हो सकता है।

    विपक्षी दलों ने केवल संसद और चुनाव आयोग तक सीमित रहने के बजाय आंदोलन को देश के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाने की योजना बनाई है। इंडिया गठबंधन की ओर से पांच बड़ी रैलियों का भी ऐलान किया गया है। इसके साथ ही कांग्रेस का एक महीने का अभियान मतदाता सूची से हटाए गए नामों को लेकर लोगों तक पहुंचने पर केंद्रित रहेगा। विपक्षी नेताओं का मानना है कि इस मुद्दे को स्थानीय स्तर तक ले जाने से मतदाताओं की शिकायतों और आपत्तियों को सामने लाने में मदद मिलेगी।

    विपक्ष एसआईआर को लेकर आम मतदाताओं में पैदा हुई कथित असहजता को भी अपने अभियान का आधार बना रहा है। विपक्षी रणनीतिकारों का दावा है कि मतदाता सूची में नाम हटने और जुड़ने से जुड़े सवालों के कारण चुनाव प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच चिंता बनी हुई है। इसी वजह से आंदोलन को लंबे समय तक चलाने की तैयारी की जा रही है। फिलहाल विपक्ष का अभियान संसद, चुनाव आयोग, देशव्यापी कार्यक्रमों और घर-घर संपर्क के जरिए आगे बढ़ाने की योजना पर केंद्रित है।

  • CEC विवाद पर विपक्ष का चुनाव आयोग तक मार्च, राहुल-प्रियंका ने पेड़ के नीचे दिया धरना, अखिलेश यादव समेत कई नेता हिरासत में

    CEC विवाद पर विपक्ष का चुनाव आयोग तक मार्च, राहुल-प्रियंका ने पेड़ के नीचे दिया धरना, अखिलेश यादव समेत कई नेता हिरासत में

    नई दिल्ली ।लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक के सांसदों ने चुनाव आयोग तक विरोध मार्च निकाला। मार्च के दौरान विपक्षी सांसदों ने “वोट चोर, गद्दी छोड़” के नारे लगाए। प्रदर्शन के दौरान चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी नेताओं ने कई आरोप लगाए। मार्च शुरू होने से पहले विपक्षी सांसद संसद के मकर द्वार पर एकत्र हुए थे।

    कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मार्च के दौरान कहा कि विपक्ष का यह प्रदर्शन अन्याय के खिलाफ लड़ाई है। उन्होंने सरकार, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार आजादी के बाद मिले वयस्क मताधिकार को खत्म करने की कोशिश कर रही है। खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को सरकार की कठपुतली बताया और आरोप लगाया कि वह वही करते हैं जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह कहते हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष अपनी लड़ाई जारी रखेगा।

    मार्च के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी, NCP-SP सांसद सुप्रिया सुले और INDIA ब्लॉक के कई अन्य सांसद भी मौजूद रहे। विपक्षी सांसद चुनाव आयोग तक पहुंचकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराना चाहते थे। हालांकि पुलिस ने मार्च को रोक दिया। इसके बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सड़क पर एक पेड़ के नीचे ही धरना शुरू कर दिया।

    प्रदर्शन के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि 2017, 2019, 2022 और 2024 में बेईमानी की गई और पश्चिम बंगाल में “पूरा का पूरा खुला खेल” हुआ। उन्होंने चंडीगढ़ की घटना का भी जिक्र करते हुए कहा कि उसे कौन भूल सकता है। उनके इस बयान में चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों को दोहराया गया।

    इस बीच पुलिस ने अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया। समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने भी प्रदर्शन के दौरान भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 150 सांसदों को निलंबित किया जाता है और कई कानून पारित किए जाते हैं, तो भाजपा संविधान की बात कैसे कर सकती है। उन्होंने चुनाव आयोग का बचाव करने को लेकर भी सवाल उठाया।

    कांग्रेस सांसद राजीव राय ने कहा कि भाजपा के खिलाफ लोगों में सड़कों पर आक्रोश है। उन्होंने आरोप लगाया कि संवैधानिक संस्थाओं और लोकतंत्र का गला घोंटा गया है तथा लोकतंत्र को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए हैं। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भरोसे के लायक नहीं बताया।

    कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिया जाना तय है और चुनाव आयोग से लोगों का भरोसा खत्म हो गया है। कांग्रेस नेता इमरान प्रतापगढ़ी ने कहा कि जब तक ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देंगे, तब तक विपक्ष पीछे नहीं हटेगा।

    कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि यदि लोगों का मताधिकार छीना जाएगा तो विपक्ष मूकदर्शक बनकर नहीं रहेगा। इस तरह चुनाव प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों के आरोपों और विरोध के बीच चुनाव आयोग तक मार्च करने की कोशिश की गई, जिसे पुलिस ने रोक दिया और कई नेताओं को हिरासत में लिया गया।

  • सीएम मोहन यादव ने SIR को बताया जरूरी, मतदाता सूची को विश्वसनीय बनाने नागरिकों से प्रक्रिया में भाग लेने की अपील

    सीएम मोहन यादव ने SIR को बताया जरूरी, मतदाता सूची को विश्वसनीय बनाने नागरिकों से प्रक्रिया में भाग लेने की अपील

    मध्यप्रदेश। के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भारत निर्वाचन आयोग की ओर से संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को जरूरी प्रक्रिया बताया है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने में प्रत्येक जागरूक मतदाता की भूमिका महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री के अनुसार, लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची का अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय होना आवश्यक है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे मतदाता सूची के सत्यापन की इस प्रक्रिया में अपनी जिम्मेदारी निभाएं और विश्वसनीय मतदाता सूची के निर्माण में सहभागी बनें।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत मतदाता सूची का सत्यापन किया जा रहा है। उन्होंने नागरिकों से इस प्रक्रिया को समझने और निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी जानकारी उपलब्ध कराने की अपील की। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता की भागीदारी केवल मतदान तक सीमित नहीं है, बल्कि सही और विश्वसनीय मतदाता सूची के निर्माण में भी नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने विशेष रूप से युवाओं से इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल होने का आग्रह किया।

    SIR को लेकर मुख्यमंत्री ने नागरिकों से किसी भी तरह के भ्रम या अफवाह पर ध्यान नहीं देने को कहा है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार संचालित की जा रही है। फॉर्म 6 और घोषणा पत्र सहित प्रक्रिया से जुड़े प्रावधान निर्धारित हैं। मुख्यमंत्री ने लोगों से कहा कि वे इस संबंध में केवल निर्वाचन आयोग की आधिकारिक जानकारी और तय प्रक्रिया पर ही भरोसा करें। उनका कहना है कि सही जानकारी के आधार पर प्रक्रिया में भाग लेना आवश्यक है।

    मुख्यमंत्री ने 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके युवाओं से अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जिन युवाओं की उम्र 18 वर्ष पूरी हो चुकी है, उन्हें मतदाता सूची में अपना नाम अवश्य दर्ज कराना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने प्रत्येक नागरिक से अपनी जानकारी और मतदाता सूची में दर्ज नाम की पुष्टि करने की अपील की। मुख्यमंत्री के अनुसार, मतदाता सूची में नाम की जांच और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करना नागरिक की जिम्मेदारी का हिस्सा है।

    डॉ. मोहन यादव ने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए हर जागरूक मतदाता की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मतदाता सूची के सत्यापन की प्रक्रिया में सहयोग करें। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण को ऐसी प्रक्रिया बताया, जिसके माध्यम से मतदाता सूची को अद्यतन, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने नागरिकों से आग्रह किया कि वे भ्रम या अफवाहों से प्रभावित हुए बिना निर्धारित प्रक्रिया का पालन करें और अपनी मतदाता संबंधी जानकारी की पुष्टि करें। साथ ही, उन्होंने युवाओं से भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने की अपील की।

  • SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस, निलंबन से इनकार; कानून टूटा तो फैसलों पर रोक संभव

    SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस, निलंबन से इनकार; कानून टूटा तो फैसलों पर रोक संभव

    नई दिल्ली ।स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR से जुड़े फैसलों में कथित एकतरफा कार्रवाई के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी किया है। हालांकि, अदालत ने उन्हें निलंबित करने की मांग पर फिलहाल तत्काल अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने चुनाव आयोग से यह स्पष्ट करने को कहा है कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसले संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सर्वसम्मति या बहुमत से लिए गए थे या नहीं।

    मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि केवल किसी समाचार रिपोर्ट के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि चुनाव आयोग में फैसले एकतरफा तरीके से लिए गए। अदालत ने कहा कि इस मामले में उसे चुनाव आयोग से प्रमाणित जानकारी और संबंधित रिकॉर्ड की आवश्यकता है। पीठ ने चुनाव आयोग के फैसलों की प्रक्रिया को लेकर उसके जवाब को महत्वपूर्ण माना।

    मामला चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से कथित तौर पर उठाई गई आपत्तियों से जुड़ा है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि पिछले 10 महीनों में मतदाता सूची, मतदाता पंजीकरण और आयोग की तकनीकी प्रणालियों से संबंधित मामलों में कम से कम 14 मौकों पर आपत्तियां दर्ज की गईं। हालांकि, चुनाव आयोग ने कहा है कि मसौदा चरण में सवाल, सुझाव और आपत्तियां उठना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, SIR की समय-सारणी से जुड़े अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग के फैसले पूरी संस्था की संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार लिए गए या मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल किया, जो आयोग के सामूहिक निर्णय से संबंधित हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर होने चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि रिकॉर्ड से पता चलता है कि संबंधित फैसले न तो सर्वसम्मति से और न ही बहुमत से लिए गए, तो वह उन फैसलों पर रोक लगाने या उन्हें प्रभावित करने वाला आदेश दे सकती है।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता से यह भी पूछा कि क्या वह अपनी मांग के समर्थन में समाचार रिपोर्ट पर निर्भर कर रहा है। पीठ ने कहा कि किसी रिपोर्ट के सही, आंशिक रूप से सही या गलत होने की संभावना हो सकती है। इसलिए केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर तत्काल आदेश जारी नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि वह चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहेगी। यदि रिकॉर्ड से कानून या निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो अदालत उचित कार्रवाई पर विचार कर सकती है।

    यह मामला पटना निवासी राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका के बाद सामने आया। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या CEC ज्ञानेश कुमार व्यक्तिगत रूप से उन शक्तियों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कानून और संविधान के तहत पूरे चुनाव आयोग से संबंधित हैं। इसमें Form 6 में कथित तौर पर बिना अनुमति बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस को केंद्रीकृत करने और ECINet सिस्टम के जरिए नाम बहाल नहीं किए जाने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। इन आरोपों पर अंतिम स्थिति चुनाव आयोग के जवाब और अदालत के सामने पेश किए जाने वाले रिकॉर्ड के बाद स्पष्ट होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने CEC के निलंबन की मांग पर अंतरिम राहत नहीं दी है।

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  • ट्रंप ने ब्राजील चुनाव पर पोस्ट में भारत का नाम लिखा, 125 मिलियन वोट का दावा कर अमेरिकी चुनाव प्रणाली पर साधा निशाना

    ट्रंप ने ब्राजील चुनाव पर पोस्ट में भारत का नाम लिखा, 125 मिलियन वोट का दावा कर अमेरिकी चुनाव प्रणाली पर साधा निशाना

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव को लेकर सोशल मीडिया पर की गई एक पोस्ट में ब्राजील की जगह भारत का नाम लिख दिया। ट्रंप ने दावा किया कि भारत के राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में 125 मिलियन लोगों ने मतदान किया और मतदान खत्म होने के उसी दिन परिणाम भी सामने आ गए। हालांकि, उनकी पोस्ट में जिस चुनाव का जिक्र किया गया, वह वास्तव में ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव का पहला दौर था। इस गलती के बाद उनकी पोस्ट चर्चा में आ गई और सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे लेकर प्रतिक्रिया दी।

    ट्रंप ने अपनी पोस्ट में ब्राजील के चुनाव में मतदान और नतीजों की तेजी की तुलना अमेरिका की चुनाव प्रक्रिया से की। उन्होंने कहा कि डेट्रॉयट, फिलाडेल्फिया, कैलिफोर्निया और अमेरिका के कई अन्य शहरों तथा राज्यों में कम संख्या में वोटों की गिनती में भी अक्सर हफ्तों लग जाते हैं। उन्होंने इसी संदर्भ में अमेरिकी वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे भ्रष्ट बताया। पोस्ट के अंत में उन्होंने अपने नाम के साथ इसे प्रकाशित किया।

    ट्रंप की पोस्ट में 125 मिलियन लोगों के मतदान का आंकड़ा भी ब्राजील के चुनाव से जुड़ा हुआ था। ब्राजील में 4 अक्टूबर को राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर की वोटिंग हुई थी। भारत में उस दिन इस तरह का कोई प्रत्यक्ष राष्ट्रपति चुनाव नहीं हुआ था। भारत में राष्ट्रपति का चुनाव देशभर में सीधे मतदाताओं के मतदान से नहीं होता है। ट्रंप की पोस्ट में भारत का उल्लेख होने के कारण ब्राजील और भारत के चुनावी सिस्टम को लेकर उनका यह बयान विशेष रूप से चर्चा में रहा।

    ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव के पहले दौर में फ्लावियो बोल्सोनारो और मौजूदा राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा सबसे आगे रहे। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 98.81 प्रतिशत वोटों की गिनती पूरी होने तक बोल्सोनारो को 47.24 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि लूला को 44.91 प्रतिशत वोट हासिल हुए। हालांकि, पहले दौर में किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले, इसलिए सीधे तौर पर चुनाव का फैसला नहीं हो सका।

    अब दोनों उम्मीदवारों के बीच 25 अक्टूबर को राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे दौर में मुकाबला होगा। पहले दौर में जीत के लिए 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करना जरूरी था, लेकिन दोनों उम्मीदवार इस आंकड़े तक नहीं पहुंच सके। इसी वजह से चुनाव दूसरे दौर में पहुंच गया। ट्रंप की पोस्ट ब्राजील के पहले दौर के चुनाव परिणाम आने के बाद सामने आई, जिसमें उन्होंने तेजी से नतीजे आने का उल्लेख करते हुए अमेरिका की चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाया था। उनकी पोस्ट में ब्राजील की जगह भारत का नाम लिखे जाने को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई।

  • यूपी चुनाव से पहले दिल्ली पहुंचे योगी आदित्यनाथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में चुनाव और राज्य के मुद्दों पर चर्चा

    यूपी चुनाव से पहले दिल्ली पहुंचे योगी आदित्यनाथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात में चुनाव और राज्य के मुद्दों पर चर्चा

    नई दिल्ली ।उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार, 26 सितंबर को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच यह बैठक उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हुई है। मुलाकात के कारण राज्य की राजनीति में चुनावी तैयारियों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच इससे पहले भी इस साल मुलाकातें हो चुकी हैं।

    मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिल्ली दौरे को उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में बैठक के दौरान हुई चर्चाओं का विस्तृत आधिकारिक ब्योरा सामने नहीं आया है। ऐसे में मुलाकात के एजेंडे को लेकर सामने आई अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याओं को तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता।

    उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बीच हुई बैठक ने राज्य के राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर स्वाभाविक रूप से ध्यान आकर्षित किया है। मुख्यमंत्री के दिल्ली दौरे और प्रधानमंत्री से मुलाकात के बीच चुनावी तैयारियों से जुड़े विषयों पर चर्चा की अटकलें लगाई जा रही हैं।

    मुलाकात से एक दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ग्रेटर नोएडा में आयोजित उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो 2026 में शामिल हुए थे। इस दौरान उत्तर प्रदेश में निवेश से जुड़े विभिन्न क्षेत्रों पर भी चर्चा हुई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री ने रूस, वियतनाम, बेलारूस, जापान और सिंगापुर सहित भागीदार देशों की कंपनियों के साथ बैठक की थी और प्रदेश में रक्षा, फार्मास्यूटिकल्स, विमानन, मेडिकल डिवाइस, कृषि तथा विनिर्माण क्षेत्र में निवेश का आमंत्रण दिया था।

    दिल्ली दौरे के दौरान मुख्यमंत्री की केंद्रीय नेतृत्व के साथ अन्य बैठकों की भी जानकारी सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद उनकी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से भी मुलाकात प्रस्तावित थी।

    योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री मोदी के बीच उत्तर प्रदेश को लेकर संवाद पहले भी होता रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, मुख्यमंत्री ने 11 जून 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। इससे पहले 8 अगस्त 2026 को भी दोनों नेताओं की मुलाकात हुई थी। इन मुलाकातों की आधिकारिक जानकारी में मुख्य रूप से दोनों नेताओं के मिलने की पुष्टि की गई थी।

    वर्तमान दिल्ली दौरा ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां बढ़ रही हैं। राज्य सरकार और केंद्रीय नेतृत्व के बीच होने वाली बैठकों को इसी व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक संदर्भ में देखा जा रहा है।

    फिलहाल 26 सितंबर की मुलाकात में किन-किन विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई, इसे लेकर आधिकारिक स्तर पर विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। इसलिए बैठक को लेकर सामने आ रही चुनावी रणनीति संबंधी चर्चाओं को अटकलों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। इतना स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की और यह मुलाकात उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हुई है।

  • 30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की संभावित बैठक, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर चर्चा

    30 सितंबर को दिल्ली में INDIA ब्लॉक की संभावित बैठक, SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर चर्चा

    नई दिल्ली । विपक्षी दलों का INDIA ब्लॉक 30 सितंबर को नई दिल्ली में बैठक कर सकता है। इस संभावित बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल इन विषयों पर आगे की संयुक्त रणनीति तैयार करने के लिए आपसी समन्वय बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

    बैठक का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली हो सकता है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया को लेकर अपनी आपत्तियां उठा रहे हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संयुक्त कार्रवाई की रणनीति पर विचार कर रहे हैं।

    इस घटनाक्रम में पश्चिम बंगाल की राजनीति से जुड़े तृणमूल कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का एक मुद्दे पर साथ आना भी महत्वपूर्ण है। दोनों दल राज्य में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, लेकिन चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर समन्वित कार्रवाई की जरूरत जता रहे हैं।

    मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एमए बेबी ने विपक्षी दलों को पत्र लिखकर बैठक बुलाने का अनुरोध किया था। इसके बाद उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी बातचीत की। ममता बनर्जी ने इस मामले से निपटने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता जताई है।

    विपक्षी दलों में कांग्रेस और वामपंथी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने तथा SIR प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर विपक्ष संसद के दोनों सदनों में नया प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है। इसके कानूनी पहलुओं पर विशेषज्ञों से राय ली जा रही है।

    कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक 29 सितंबर को प्रस्तावित है। इस बैठक में पार्टी चुनाव आयोग और मतदाता सूची पुनरीक्षण से जुड़े विवाद पर अपना रुख स्पष्ट कर सकती है। इसके बाद 30 सितंबर को होने वाली संभावित विपक्षी बैठक में आगे की रणनीति पर चर्चा हो सकती है।

    विपक्ष की मौजूदा लामबंदी के पीछे चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों पर कथित मतभेद की खबर भी एक वजह बताई जा रही है। सामने आई जानकारी में दावा किया गया था कि आयोग के अन्य आयुक्तों ने पुनरीक्षण से संबंधित कुछ फैसलों पर आपत्तियां जताई थीं।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार सामने आना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग ने अपने आदेशों को वैधानिक बताया है। इस मुद्दे पर विपक्ष और चुनाव आयोग के रुख में अंतर बना हुआ है।

    इससे पहले 23 विपक्षी दलों और एक सांसद ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग की थी। विपक्षी दल अब संसद में प्रस्ताव लाने और आपसी समन्वय के जरिए आगे की कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं।

    30 सितंबर की संभावित बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रस्ताव से जुड़े मुद्दे चर्चा के केंद्र में रह सकते हैं। बैठक में शामिल होने वाले दलों और अंतिम एजेंडे को लेकर आगे की जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

  • अनुप्रिया पटेल ने CEC पर विपक्ष के आरोपों का किया बचाव, बोलीं- संवैधानिक पदों पर व्यक्तिगत हमला आदत

    अनुप्रिया पटेल ने CEC पर विपक्ष के आरोपों का किया बचाव, बोलीं- संवैधानिक पदों पर व्यक्तिगत हमला आदत

    नई दिल्ली । केंद्रीय मंत्री और अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष की ओर से लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों पर व्यक्तिगत हमला करना विपक्ष की आदत बन गई है। अनुप्रिया पटेल की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है।

    अनुप्रिया पटेल ने विपक्ष के आरोपों को लेकर कहा कि आने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में विपक्ष को अपनी हार का अंदाजा पहले से ही हो गया है। उनके अनुसार, इसी वजह से विपक्ष चुनाव से पहले ही हार के लिए कारण तलाश रहा है और भविष्य में अपनी हार का ठीकरा चुनाव आयोग के सिर पर डालने की तैयारी कर रहा है।

    उन्होंने कहा कि संवैधानिक संस्थाओं और उनके पदाधिकारियों पर व्यक्तिगत टिप्पणियां करना उचित नहीं है। उनके मुताबिक, चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनाने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया पर चर्चा होनी चाहिए।

    केंद्रीय मंत्री ने एनडीए और विपक्ष के बीच चुनावी मुकाबले का भी जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि पिछले चुनावों में एनडीए गठबंधन के सामने विपक्ष को लगातार पराजय का सामना करना पड़ा है। उनका कहना था कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भी विपक्ष की ओर से अभी से अलग-अलग मुद्दे उठाए जा रहे हैं।

    उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों ने संगठनात्मक और चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं। अनुप्रिया पटेल ने अपनी पार्टी की तैयारियों को लेकर कहा कि अपना दल आगामी चुनाव के लिए पूरी मुस्तैदी के साथ तैयार है।

    उन्होंने कहा कि वर्ष 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन की जीत सुनिश्चित करने में अपना दल ने योगदान दिया था। पार्टी ने दोनों चुनावों में गठबंधन के साथ मिलकर राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी की थी। अनुप्रिया पटेल ने कहा कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में भी उनकी पार्टी पूरी ताकत के साथ गठबंधन के साथ मैदान में उतरेगी।

    अनुप्रिया पटेल ने यह भी दावा किया कि आगामी चुनाव में एनडीए गठबंधन रिकॉर्ड जीत दर्ज करेगा। हालांकि, चुनाव अभी दूर है और राजनीतिक दलों की तैयारियां जारी हैं। ऐसे में उनके बयान को आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन की रणनीति और राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

    उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग को लेकर विपक्ष की ओर से उठाए जा रहे सवालों के बीच अनुप्रिया पटेल का बयान राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। विपक्ष जहां चुनाव प्रक्रिया और आयोग की भूमिका को लेकर अपनी आपत्तियां सामने रख रहा है, वहीं अनुप्रिया पटेल ने इन आरोपों का बचाव करते हुए विपक्ष की मंशा पर सवाल उठाया है। उन्होंने संवैधानिक पदों पर व्यक्तिगत हमलों को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई और आगामी चुनाव में एनडीए की तैयारियों को लेकर विश्वास जताया।

  • महाराष्ट्र में SIR को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा मामला, ज्ञानेश कुमार के 14 फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाएं दाखिल

    महाराष्ट्र में SIR को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचा मामला, ज्ञानेश कुमार के 14 फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाएं दाखिल

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट में दो याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इनमें से एक याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के पिछले करीब दस महीनों के दौरान लिए गए 14 प्रशासनिक फैसलों और कार्रवाइयों को चुनौती दी गई है। याचिका में इन फैसलों को रद्द करने के साथ ही SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने की मांग की गई है।

    याचिका में दावा किया गया है कि इन 14 मामलों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, मतदाता सूची के डेटाबेस, चुनाव पंजीकरण अधिकारियों तथा तकनीकी व्यवस्था से जुड़े कई फैसलों पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोपों पर अदालत की ओर से अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

    याचिका में मतदाता सूची तैयार करने और उसके प्रबंधन से जुड़े विभिन्न प्रशासनिक फैसलों को चुनौती दी गई है। इसमें फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, मतदाताओं के नाम हटाने और फिर बहाल करने तथा चुनावी डेटाबेस के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि कुछ फैसले दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए थे।

    महाराष्ट्र में चल रही SIR प्रक्रिया को लेकर भी याचिका में कई मांगें रखी गई हैं। इसमें प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने और SIR पर रोक लगाने की मांग शामिल है। इसके अलावा उन राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव स्थगित करने की मांग की गई है, जहां SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। यह मांग तब तक के लिए की गई है, जब तक नई और कानूनी प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची तैयार नहीं हो जाती।

    याचिकाकर्ताओं ने पूरे मामले की जांच के लिए स्वतंत्र न्यायिक समिति गठित करने की मांग भी की है। इसके साथ ही संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 326 से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। याचिका में मतदाता सूची में पात्र नागरिकों के नाम सुरक्षित रखने और गलत तरीके से नाम हटाए जाने से बचाने के लिए आवश्यक कदम उठाने की मांग की गई है।

    दूसरी याचिका महाराष्ट्र में SIR के क्रियान्वयन से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। इसमें SIR कराने के आदेश, उसके आधार और अपनाई जा रही प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग मतदाता की चुनावी पात्रता का आकलन कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की नागरिकता पर अंतिम निर्णय करने का अधिकार उसके पास नहीं है।

    याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि SIR के दौरान कुछ बूथ लेवल अधिकारी लोगों से फॉर्म लेते समय सहायक दस्तावेज मांग रहे हैं। याचिकाकर्ताओं ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जाने से बचाने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और सुरक्षा उपायों की मांग की है।

    मामले की सुनवाई 28 सितंबर को होने की संभावना है। दोनों याचिकाएं अलग-अलग पीठों के समक्ष सूचीबद्ध हो सकती हैं। फिलहाल अदालत ने याचिकाओं में लगाए गए आरोपों और मांगों पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। आगे की सुनवाई में संबंधित पक्षों के तर्क और अदालत की कार्यवाही के बाद मामले की स्थिति स्पष्ट होगी।