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  • राहुल गांधी ने चुनावी व्यवस्था पर उठाए सवाल, कहा लोकतंत्र कमजोर होने पर एंटी-इन्कंबेंसी का असर भी खत्म होता है

    राहुल गांधी ने चुनावी व्यवस्था पर उठाए सवाल, कहा लोकतंत्र कमजोर होने पर एंटी-इन्कंबेंसी का असर भी खत्म होता है

    नई दिल्ली ।कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एंटी-इन्कंबेंसी, लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार तथा चुनाव आयोग पर कई सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि देश में चुनावी प्रक्रिया के दौरान गड़बड़ियां हो रही हैं और मतदाताओं के वोट की सुरक्षा को लेकर गंभीर स्थिति पैदा हुई है। राहुल गांधी ने कहा कि वोट की ताकत कमजोर होने का असर संविधान, कानून और लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर भी पड़ सकता है।

    राहुल गांधी ने एंटी-इन्कंबेंसी को भारतीय लोकतंत्र की महत्वपूर्ण विशेषता बताते हुए कहा कि आम तौर पर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार के खिलाफ समय के साथ विरोध की भावना विकसित होती है। उन्होंने पूर्व की सरकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि लोकप्रियता के चरम पर पहुंचने के बाद भी कुछ वर्षों में सत्ता विरोधी माहौल बना। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के मामले में ऐसा प्रभाव दिखाई क्यों नहीं देता।

    उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में सत्ता विरोधी भावना कमजोर होने को समझने के लिए चुनावी प्रक्रिया पर भी नजर डालनी होगी। राहुल गांधी ने कुछ देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत नहीं होती, वहां सत्ता विरोधी भावना का प्रभाव भी दिखाई नहीं देता। उन्होंने इसी संदर्भ में भारत में वोट के अधिकार और उसकी सुरक्षा को बेहद महत्वपूर्ण बताया।

    राहुल गांधी ने दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनाव सहित विभिन्न विधानसभा चुनावों में चुनावी गड़बड़ियां हुई हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर भी गंभीर आरोप लगाए और उनके इस्तीफे की मांग की। राहुल ने कहा कि चुनाव आयोग की मूल जिम्मेदारी नागरिकों के वोट की सुरक्षा करना है और इस जिम्मेदारी में किसी भी तरह की चूक लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है।

    उन्होंने अपने पहले के आरोपों का जिक्र करते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया में कथित वोट चोरी का असर केवल मतदान तक सीमित नहीं रहता। उनके अनुसार, यदि मताधिकार प्रभावित होता है तो उसके बाद कानून बनाने वाली व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं। राहुल गांधी ने कहा कि वह इस मुद्दे को केवल चुनावी गड़बड़ी के रूप में नहीं देखते, बल्कि इसे नागरिकों के प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से जुड़ा विषय मानते हैं।

    प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का भी उल्लेख किया। इन आपत्तियों में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने, नाम बहाल करने से जुड़े आदेशों तथा मतदाता डेटा की सुरक्षा जैसे विषय शामिल बताए गए हैं।

    फॉर्म-6 में किए गए बदलाव को लेकर भी आपत्ति सामने आने की बात कही गई। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म में SIR से जुड़ा सवाल जोड़े जाने पर नियमों में संशोधन की आवश्यकता को लेकर सवाल उठाया गया था। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से इस विषय पर आपत्ति दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।

    वहीं, चुनाव आयोग ने अपने भीतर होने वाली लिखित टिप्पणियों, सुझावों, तकनीकी राय और आंतरिक विचार-विमर्श को सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया है। आयोग का कहना है कि वह एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसकी कार्रवाई संविधान, कानून तथा निर्धारित निर्देशों के तहत होती है।

    राहुल गांधी ने कहा कि मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए जरूरी है। उन्होंने चुनावी गड़बड़ियों के आरोपों की जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग दोहराई।

  • TMC नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से अंतिम फैसले की समयसीमा बताने को कहा

    TMC नाम और चुनाव चिह्न विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, चुनाव आयोग से अंतिम फैसले की समयसीमा बताने को कहा

    नई दिल्ली ।तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने चुनाव आयोग से पूछा कि वह दोनों गुटों के बीच चल रहे विवाद पर अंतिम फैसला लेने में कितना समय लेगा। अदालत ने विवाद का जल्द निपटारा किए जाने की जरूरत पर जोर दिया है।

    यह मामला ममता बनर्जी की ओर से दाखिल याचिका से जुड़ा है। उन्होंने चुनाव आयोग के उस अंतरिम फैसले को चुनौती दी है, जिसके तहत तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और उसके पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न को फिलहाल फ्रीज कर दिया गया है।

    चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को अंतरिम व्यवस्था के तहत अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए हैं। ममता बनर्जी के गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव चिह्न दिया गया है। दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न मिला है।

    सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने चुनाव आयोग से यह बताने को कहा है कि विवाद पर अंतिम निर्णय लेने के लिए उसे कितना समय चाहिए। अदालत में यह भी चर्चा हुई कि मामले की सुनवाई को तेज तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है, ताकि दोनों पक्षों के दावों और उपलब्ध साक्ष्यों पर जल्द निर्णय लिया जा सके।

    ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल अदालत में पेश हुए। उन्होंने कहा कि उनकी ओर से पश्चिम बंगाल में होने वाले उपचुनाव को रोकने की मांग नहीं की जा रही है। उनका कहना है कि पार्टी को उसके मूल नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करने की अनुमति मिलनी चाहिए।

    सिब्बल ने इस विवाद को पार्टी की पहचान और अस्तित्व से जुड़ा विषय बताया। उनकी ओर से चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले पर भी सवाल उठाए गए और कहा गया कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान नाम और चिह्न फ्रीज किए जाने से संबंधित पक्ष के सामने प्रभावी कानूनी उपाय का सवाल पैदा होता है।

    विवाद की पृष्ठभूमि में तृणमूल कांग्रेस के भीतर दो गुटों के बीच पार्टी के नाम, संगठनात्मक नियंत्रण और चुनाव चिह्न को लेकर दावे शामिल हैं। चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फिलहाल मूल नाम और चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगाते हुए वैकल्पिक नाम और चिह्न दिए हैं।

    आगामी उपचुनावों को देखते हुए यह विवाद महत्वपूर्ण हो गया है। दोनों गुटों के उम्मीदवारों को फिलहाल अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के तहत चुनाव प्रक्रिया में आगे बढ़ना होगा। ऐसे में अंतिम फैसला कब आता है, इस पर दोनों पक्षों की नजर बनी हुई है।

    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से अंतिम निर्णय के लिए समयसीमा बताने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर को होगी। उस सुनवाई में आयोग की ओर से विवाद के निपटारे में लगने वाले संभावित समय के बारे में अदालत को जानकारी दी जाएगी।

    फिलहाल TMC का मूल नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न अंतरिम रूप से फ्रीज है। अंतिम फैसला आने तक दोनों गुटों के लिए आवंटित वैकल्पिक नाम और चिह्न ही चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जाएंगे।

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कार्रवाई की अनुमति मांगी

    CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की मांग, वकील ने अटॉर्नी जनरल को पत्र लिखकर कार्रवाई की अनुमति मांगी

    नई दिल्ली ।मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकील ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमनी को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने इस कार्रवाई के लिए आवश्यक अनुमति देने का अनुरोध किया है। यह मांग ऐसे समय सामने आई है, जब चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर दो चुनाव आयुक्तों की कथित असहमतियों पर चर्चा तेज है।

    ब्रजेश सिंह ने अपने पत्र में चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जुड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने मीडिया में सामने आई जानकारी का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में बहु-सदस्यीय चुनाव आयोग का संचालन इस तरह हुआ, मानो महत्वपूर्ण फैसले एक ही व्यक्ति द्वारा लिए जा रहे हों। पत्र में इसे सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में बताई गई चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से अलग बताया गया है।

    आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए अटॉर्नी जनरल या सॉलिसिटर जनरल की लिखित सहमति आवश्यक होती है। मौजूदा स्थिति में ब्रजेश सिंह का पत्र इसी अनुमति के लिए भेजा गया है। यानी अभी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कोई आपराधिक अवमानना मामला शुरू नहीं हुआ है और पत्र के आधार पर आगे की प्रक्रिया अटॉर्नी जनरल की अनुमति पर निर्भर करेगी।

    इस मांग की पृष्ठभूमि में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों से जुड़ी जानकारी भी है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा सामने आया है। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म 6 में बदलाव तथा मतदाता सूची से जुड़े दूसरे विषयों पर सवाल उठाए जाने की बात कही गई है।

    विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर भी दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की चर्चा हुई है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर उन्होंने सवाल उठाए तथा यह दावा किया कि कुछ निर्णय उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए। मतदाता सूची के डिजिटल डाटा और उसके प्रबंधन से जुड़े विषय भी इन आपत्तियों में शामिल बताए गए हैं।

    इन घटनाक्रमों के बाद विपक्षी दलों की ओर से भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सवाल उठाए गए हैं। कुछ विपक्षी दलों ने उनके इस्तीफे की मांग की है और एसआईआर की प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई है। पहले दिए गए महाभियोग नोटिस को लेकर भी राजनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इस नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण सहित कई आरोप लगाए गए थे।

    हालांकि, चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद या फैसलों में असहमति के दावों को अलग तरीके से प्रस्तुत किया है। आयोग का कहना है कि उसके सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जा रहे हैं और एसआईआर से जुड़े निर्णयों को भी सभी तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त है। आयोग ने यह भी कहा है कि वैचारिक मतभेद को टकराव नहीं माना जाना चाहिए।

    आयोग के अनुसार, व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सुझाव देना केवल चुनाव आयुक्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि आयोग का प्रत्येक अधिकारी अपने सुझाव देने के लिए अधिकृत है। इस तरह एक ओर कथित लिखित आपत्तियों और दूसरी ओर आयोग की सर्वसम्मति वाली सफाई के बीच विवाद बना हुआ है।

    अब ब्रजेश सिंह द्वारा अटॉर्नी जनरल को भेजे गए पत्र के बाद मामले का कानूनी पहलू भी चर्चा में आ गया है। पत्र में सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों और चुनाव आयोग की बहु-सदस्यीय व्यवस्था का हवाला देते हुए आपराधिक अवमानना की कार्यवाही की अनुमति मांगी गई है। आगे की स्थिति अटॉर्नी जनरल की ओर से लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगी।

  • अभिजीत दीपके अचानक दिल्ली रवाना, ज्ञानेश कुमार का लिया नाम; चुनाव आयोग पर नए विरोध के संकेत

    अभिजीत दीपके अचानक दिल्ली रवाना, ज्ञानेश कुमार का लिया नाम; चुनाव आयोग पर नए विरोध के संकेत

    नई दिल्ली ।कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके समेत संगठन के प्रमुख नेता अपने तय कार्यक्रम रद्द कर तत्काल दिल्ली रवाना हुए हैं। संगठन ने गुरुवार को राजधानी में एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की घोषणा की है। इस घटनाक्रम के बाद चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों पर संगठन की ओर से नए कदम या विरोध कार्यक्रम की घोषणा किए जाने की संभावना जताई जा रही है।

    अभिजीत दीपके के साथ आशुतोष रांका और सौरभ दास भी दिल्ली पहुंचने की तैयारी में जुटे हैं। नेताओं ने अपने पहले से तय कार्यक्रमों को रद्द करने की जानकारी दी है। दीपके ने एक पोस्ट में कहा कि वह महाराष्ट्र और गुजरात सीमा क्षेत्र में थे, लेकिन अब दिल्ली की उड़ान पकड़ने के लिए लौट रहे हैं। इसी संदेश में उन्होंने ज्ञानेश कुमार का भी उल्लेख किया।

    इससे पहले दीपके ने चुनाव आयोग में सुधार की मांग को लेकर दिल्ली में जरूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस की जानकारी दी थी। उन्होंने ज्ञानेश कुमार के नाम का उल्लेख करते हुए संकेत दिया था कि संगठन अब चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े मुद्दों को अपने अभियान का हिस्सा बना सकता है।

    आशुतोष रांका ने भी कहा था कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से जुड़ी हालिया घटनाओं को देखते हुए उन्होंने अपने पहले से तय कार्यक्रम रद्द कर दिए हैं। उनके मुताबिक, संगठन के प्रमुख नेता तत्काल दिल्ली के लिए रवाना हो रहे हैं और वहां अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए अपनी बात रखेंगे।

    पहले इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का समय दोपहर 12 बजे बताया गया था, लेकिन बाद में इसे दोपहर 2 बजे करने की जानकारी दी गई। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका और सौरभ दास के शामिल होने की बात कही गई है। संगठन ने इसके लिए लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को केंद्र में रखा है।

    यह घटनाक्रम चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच सामने आया है। चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची की समीक्षा को लेकर कई राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं। विपक्षी दलों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ भी अलग-अलग आपत्तियां और मांगें सामने आई हैं। इन मुद्दों को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप और चुनाव प्रक्रिया से संबंधित अन्य मांगों की चर्चा भी जारी है।

    वहीं, चुनाव आयोग की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि एसआईआर समेत उसके फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए जाते हैं। आयोग के अनुसार, मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा कोई नई प्रक्रिया नहीं है और पहले भी अलग-अलग समय पर ऐसी कवायद की जाती रही है। इस बार तकनीक के इस्तेमाल से प्रक्रिया को अधिक व्यापक और व्यवस्थित बनाने की बात कही गई है।

    चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि निर्णय प्रक्रिया में अधिकारियों के बीच मतभेद या अलग-अलग विचार होना अपने आप में संस्थागत टकराव का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। आयोग के अनुसार अंतिम निर्णय सभी संबंधित अधिकारियों की सहमति से लिए जा रहे हैं।

    ऐसे में अब दिल्ली में होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस पर नजर बनी हुई है। अभिजीत दीपके और संगठन के अन्य नेताओं के दिल्ली पहुंचने तथा ज्ञानेश कुमार का लगातार उल्लेख किए जाने से यह स्पष्ट है कि चुनाव आयोग से जुड़े मुद्दे उनके अगले सार्वजनिक अभियान में प्रमुखता से उठ सकते हैं। हालांकि प्रेस कॉन्फ्रेंस में संगठन की ओर से कौन से ठोस कदम या नए कार्यक्रम घोषित किए जाएंगे, इसकी जानकारी आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर दो जजों की राय अलग, बड़ी बेंच करेगी मामले पर फैसला

    नई दिल्ली । मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में 23 सितंबर को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। 2023 में बनाए गए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही दो सदस्यीय पीठ के दोनों न्यायाधीशों की राय अलग-अलग रही। इसके बाद मामले को बड़ी पीठ के सामने भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले में मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की मांग की गई है। याचिकाओं में 2023 के उस कानून को चुनौती दी गई है, जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नई चयन व्यवस्था निर्धारित की गई है।

    सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की राय में अंतर सामने आया। दोनों न्यायाधीशों के बीच मतभेद के कारण यह तय किया गया कि मामले से जुड़े महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी सवालों पर बड़ी पीठ विचार करेगी।

    कार्यवाही के दौरान सॉलिसिटर जनरल की ओर से नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर एक दलील दी गई, जिसमें इस व्यवस्था की तुलना जजों द्वारा जजों की नियुक्ति से की गई। इस तर्क पर न्यायमूर्ति दत्ता ने असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह की दलील को स्पष्ट रूप से खारिज किया जाना जरूरी है।

    न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि याचिकाओं पर पांच दिनों से अधिक समय तक सुनवाई हुई। उन्होंने यह भी कहा कि यदि दोनों न्यायाधीश एकमत होकर फैसला देते तो संस्थागत एकता को मजबूती मिलती, लेकिन इस मामले में दोनों की राय अलग रही। उन्होंने संवैधानिक व्यवस्था के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार शासन कानून के अधीन होता है और कानून से ऊपर नहीं।

    वहीं, न्यायमूर्ति शर्मा ने न्यायमूर्ति दत्ता की बातों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न मौजूद है और इसका निर्णय बड़ी पीठ द्वारा किया जाना चाहिए। दोनों न्यायाधीशों की अलग राय सामने आने के बाद मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजने का आदेश दिया गया।

    मामले की पृष्ठभूमि 2023 में बनाए गए चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी कानून से जुड़ी है। इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सिफारिश पर की जाती थी। अगस्त 2023 में नई व्यवस्था से संबंधित विधेयक पेश किया गया। इसमें नियुक्ति से जुड़ी समिति की संरचना में बदलाव किया गया और भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान किया गया।

    दिसंबर 2023 में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ और उसी महीने इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई। इसके बाद जनवरी 2024 में जया ठाकुर ने नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उस समय अदालत ने कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

    मार्च 2024 में चुनाव आयुक्तों की नई नियुक्तियों को रोकने की मांग भी अदालत के सामने रखी गई थी, लेकिन उस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसी प्रक्रिया के दौरान ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को नए चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था।

    अब दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय के बाद इस मामले का अगला चरण बड़ी पीठ के सामने होगा। बड़ी पीठ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े कानून और उसके संवैधानिक पहलुओं पर आगे विचार करेगी।

  • ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    ज्ञानेश कुमार पर सिंघवी के गंभीर आरोप, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर बढ़ा सियासी विवाद

    नई दिल्ली ।मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक विवाद बढ़ गया है। आयोग के भीतर निर्णय प्रक्रिया और SIR से जुड़े कुछ मुद्दों पर कथित मतभेद सामने आने के बाद कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

    कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उन्होंने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने सहयोगी चुनाव आयुक्तों को पर्याप्त जानकारी दिए बिना कई महत्वपूर्ण फैसले लिए।

    सिंघवी ने आरोप लगाया कि SIR और मतदाता सूची से जुड़े मामलों में पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल हैं। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पर देश को भ्रमित करने का आरोप लगाया और उनके इस्तीफे की मांग की। कांग्रेस ने दिल्ली और हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग भी उठाई।

    कांग्रेस नेता ने Form 6 में किए गए बदलाव का मुद्दा भी उठाया। Form 6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सामने आई जानकारी के अनुसार, इसमें नए आवेदकों से उनके या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पुराने SIR रिकॉर्ड में मौजूद होने से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।

    इस बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आपत्ति दर्ज की थी। दोनों चुनाव आयुक्तों ने SIR की प्रक्रिया, नए मतदाताओं के पंजीकरण और मतदाता सूची से नाम हटाने जैसे मुद्दों पर अपनी चिंताएं सामने रखीं।

    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में अलग-अलग मामलों को लेकर 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ अपील और चुनावी डेटा की सुरक्षा जैसे विषय शामिल थे।

    मतदाता सूची से संबंधित डिजिटल व्यवस्था और अधिकारियों की सिस्टम तक पहुंच को लेकर भी सवाल उठाए गए। आपत्तियों में यह चिंता सामने आई कि मतदाता डेटा और उससे जुड़े निर्णयों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और विकेंद्रीकृत है।

    पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों ने भी विवाद को और बढ़ाया है। वहां बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या बहाल करने से संबंधित मामलों में अपील की है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, ऐसे मामलों की संख्या 38 लाख से अधिक बताई गई है।

    सिंघवी ने चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है। उनके मुताबिक, महत्वपूर्ण निर्णयों में सभी चुनाव आयुक्तों की भूमिका और सहमति का महत्व है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ मामलों में अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

    दूसरी ओर, चुनाव आयोग की ओर से एक व्यक्ति के नियंत्रण में संस्था के काम करने के आरोपों को खारिज किया गया है। आयोग के पक्ष के अनुसार, महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की व्यवस्था के तहत लिए जाते हैं और SIR से संबंधित निर्णय सामूहिक प्रक्रिया के अनुसार किए गए हैं।

    इस पूरे विवाद का केंद्र मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया के साथ-साथ चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की व्यवस्था बनी हुई है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जोड़ रही है, जबकि आयोग की ओर से निर्णय प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप बताया गया है।

  • SIR विवाद में 14 आपत्तियों का दावा सामने आने के बाद बढ़ी हलचल, मतदाता सूची और आयोग की प्रक्रिया पर सवाल

    SIR विवाद में 14 आपत्तियों का दावा सामने आने के बाद बढ़ी हलचल, मतदाता सूची और आयोग की प्रक्रिया पर सवाल


    नई दिल्ली ।
    स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़ी इस प्रक्रिया में नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा शामिल करने के साथ चुनावी डेटा के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठे हैं। इसी बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है।

    इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और दोबारा जोड़ने, चुनावी डेटा तक पहुंच तथा डिजिटल सिस्टम से जुड़े फैसले शामिल हैं। दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में फैसलों और आदेशों की जानकारी उन्हें नहीं होने तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े सवाल भी उठाए।

    विवाद का एक प्रमुख मुद्दा फॉर्म-6 में किया गया बदलाव है। नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले इस फॉर्म में SIR से जुड़ी अतिरिक्त जानकारी शामिल की गई। आवेदकों से यह जानकारी मांगी गई कि उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में मौजूद था या नहीं।

    विवेक जोशी ने इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि वैधानिक फॉर्म में इस तरह का परिवर्तन करने के लिए नियमों में आवश्यक संशोधन किया जाना चाहिए। इसके बाद सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति से सहमति जताई। दोनों आयुक्तों की ओर से कुछ बदलावों और प्रक्रियाओं पर असहमति दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।

    मतदाता डेटा के केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए। आपत्तियों में चुनावी रोल से जुड़े डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच और रिकॉर्ड में बदलाव करने की व्यवस्था पर चिंता जताई गई। अधिकारियों की वैधानिक भूमिका और तकनीकी सिस्टम के बीच अधिकारों को लेकर भी सवाल सामने आए।

    पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मामलों में दाखिल अपीलों को लेकर भी आपत्ति दर्ज की गई। सुखबीर सिंह संधू ने सवाल उठाया कि मतदाता सूची से संबंधित मामलों में अपील दाखिल करने की अनुमति किसने दी और इस प्रक्रिया की जानकारी संबंधित अधिकारियों को क्यों नहीं थी।

    गोवा में तकनीकी समस्या से जुड़ा एक मामला भी सामने आया। सॉफ्टवेयर से संबंधित परेशानी के कारण 97 ऐसे मतदाताओं के नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए, जिन्हें संबंधित प्रक्रिया के तहत पात्र माना गया था। इस घटनाक्रम ने चुनावी प्रक्रिया में तकनीकी व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी चर्चा बढ़ाई।

    इसी बीच अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर निशाना साधते हुए SIR को लेकर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि बड़े स्तर पर मतदाता सूची से नाम हटाए गए हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव कराने के बजाय चुनाव की स्क्रिप्ट तैयार की जा रही है। इन दावों को राजनीतिक आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

    आशुतोष रांका ने भी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार को लेकर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, आयोग की ओर से कहा गया है कि SIR समेत सभी प्रमुख फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए और निर्णयों पर सहमति थी। आयोग ने अंदरूनी असहमति की उस तस्वीर को स्वीकार नहीं किया है जो आपत्तियों के आधार पर चर्चा में आई है।

    इस तरह SIR विवाद अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं है। फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी डेटा की व्यवस्था, अधिकारियों की पहुंच और निर्णय लेने की प्रक्रिया भी बहस के केंद्र में आ गई है। एक तरफ दो आयुक्तों की आपत्तियां चर्चा में हैं, जबकि दूसरी तरफ आयोग सभी प्रमुख फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बता रहा है।

  • SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    SIR को लेकर चुनाव आयोग में मतभेद के दावे, दो आयुक्तों की आपत्तियों पर विपक्ष का हमला..

    नई दिल्ली । मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों की खबरों ने राजनीतिक विवाद को तेज कर दिया है। सामने आई जानकारी के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर आपत्ति दर्ज की। इनमें Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और SIR से जुड़े फैसलों सहित कई मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

    विपक्षी दलों ने इन जानकारियों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने SIR और कथित वोट चोरी के मुद्दे पर भाजपा, आरएसएस और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि वोट चोरी भारतीय नागरिकों के खिलाफ अपराध और संविधान पर हमला है। उन्होंने इस मामले में न्याय मिलने की बात भी कही।

    तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए राज्यसभा में प्रस्ताव लाने की मांग की। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने आयोग में फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी संवैधानिक संस्था के फैसले अकेले कैसे लिए जा सकते हैं। वहीं कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही पर गंभीरता से विचार करने की मांग की।

    विवाद का एक प्रमुख मुद्दा Form-6 में किया गया बदलाव है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसमें SIR से संबंधित एक अतिरिक्त सवाल शामिल किया गया था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव करने के लिए संबंधित नियमों में संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

    मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस और उसके सॉफ्टवेयर के नियंत्रण को लेकर भी चिंता सामने आई है। दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज किए जाने की जानकारी है, जिनके बारे में कहा गया कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पूरी जानकारी या सहमति के बिना आगे बढ़ाया गया।

    SIR से जुड़ी अपील प्रक्रिया और कुछ राज्यों में मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इन घटनाक्रमों के बीच चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर सामने आए मतभेद के दावों को अलग तरीके से स्पष्ट किया है। आयोग का कहना है कि SIR समेत उसके सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से हुए हैं।

    चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। किसी मुद्दे पर सदस्यों के बीच मतभेद होने की स्थिति में बहुमत के आधार पर फैसला किए जाने का प्रावधान है। ऐसे में SIR को लेकर सामने आई आपत्तियों और आयोग के स्पष्टीकरण के बीच विवाद का केंद्र चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारदर्शिता बन गया है।

  • रूस के संसदीय चुनाव में पुतिन की पार्टी की बड़ी जीत, यूनाइटेड रशिया ने 450 में से 355 सीटों पर दर्ज किया कब्जा

    रूस के संसदीय चुनाव में पुतिन की पार्टी की बड़ी जीत, यूनाइटेड रशिया ने 450 में से 355 सीटों पर दर्ज किया कब्जा

    नई दिल्ली । रूस में 2026 के संसदीय चुनाव के शुरुआती नतीजों में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समर्थन वाली यूनाइटेड रशिया पार्टी ने बड़ी बढ़त हासिल की है। 450 सदस्यीय स्टेट ड्यूमा में पार्टी ने 355 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस परिणाम के साथ यूनाइटेड रशिया ने संसद में अपना मजबूत बहुमत बरकरार रखा है।

    यह चुनाव फरवरी 2022 में यूक्रेन के साथ शुरू हुए संघर्ष के बाद पहला संसदीय चुनाव था। ऐसे समय में हुए इस चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर रही। चुनाव के दौरान यूक्रेन में लड़ रहे रूसी सैनिकों के समर्थन का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया। यूनाइटेड रशिया ने पिछले चुनाव की तुलना में इस बार अधिक सीटें हासिल की हैं।

    रूस की 450 सदस्यीय संसद में 225 सीटों के लिए पार्टी-लिस्ट प्रणाली के तहत मतदान होता है, जबकि बाकी 225 सीटों पर सीधे उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है। उपलब्ध नतीजों के अनुसार यूनाइटेड रशिया के उम्मीदवार सिंगल-मेंबर सीटों में से 208 पर आगे रहे। पार्टी को पार्टी-लिस्ट मतदान में भी 58 प्रतिशत के आसपास वोट मिले हैं।

    2021 में हुए पिछले संसदीय चुनाव में यूनाइटेड रशिया ने स्टेट ड्यूमा की 450 में से 324 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार 355 सीटों का आंकड़ा पिछले चुनाव के मुकाबले काफी अधिक है। इससे संसद में पार्टी की स्थिति और मजबूत हुई है।

    चुनाव में मतदान प्रतिशत भी चर्चा में रहा। रूस में कुल मतदान करीब 57 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया। मॉस्को में भी मतदान को लेकर लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही। चुनाव के दौरान कई क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई थी।

    इस बार युद्ध-विरोधी याब्लोको पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी-लिस्ट चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। हालांकि उसके कुछ नेताओं को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का अवसर मिला। इसके अलावा कई सरकार विरोधी नेताओं और उम्मीदवारों के चुनाव में हिस्सा लेने पर भी रोक रही।

    रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूनाइटेड रशिया पार्टी के औपचारिक सदस्य नहीं हैं। हालांकि वह वर्ष 2008 से 2012 तक पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। उस समय भी पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए औपचारिक सदस्यता जरूरी नहीं थी। वर्ष 2012 में पुतिन ने पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। इसके बाद दिमित्री मेदवेदेव ने पार्टी की कमान संभाली।

    चुनाव के अंतिम चरण में रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का असर भी दिखाई दिया। मतदान के आखिरी दिन मॉस्को और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की जानकारी सामने आई। मॉस्को को निशाना बनाकर सैकड़ों ड्रोन भेजे जाने का दावा किया गया, जबकि राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में ड्रोन की कुल संख्या 1,600 से अधिक बताई गई।

    युद्ध के बीच हुए इस संसदीय चुनाव के नतीजों में यूनाइटेड रशिया की 355 सीटों की जीत ने रूस की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में पार्टी की मजबूत स्थिति को फिर सामने ला दिया है।

  • मोहम्मद शमी की जयंत चौधरी से मुलाकात के बाद सियासी चर्चा तेज, अमरोहा से खुद या भाई के चुनाव लड़ने की अटकलें

    मोहम्मद शमी की जयंत चौधरी से मुलाकात के बाद सियासी चर्चा तेज, अमरोहा से खुद या भाई के चुनाव लड़ने की अटकलें

    नई दिल्ली/उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी और राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी की मुलाकात के बाद राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। दोनों की मुलाकात रविवार को दिल्ली में हुई। इसके बाद शमी के राजनीति में आने और अमरोहा सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की संभावनाओं को लेकर कयास लगाए जाने लगे हैं। हालांकि, अभी तक शमी या राष्ट्रीय लोक दल की ओर से चुनाव लड़ने को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।

    मोहम्मद शमी अमरोहा सदर तहसील के सहसपुर अलीनगर के रहने वाले हैं। ऐसे में जयंत चौधरी से उनकी मुलाकात को उनके गृह जिले की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि शमी अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत अमरोहा से कर सकते हैं। इसी बीच उनके बड़े भाई मोहम्मद हसीब को भी चुनाव मैदान में उतारने की संभावना की चर्चा सामने आई है। हालांकि, इस बारे में भी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    अमरोहा सीट का सियासी इतिहास भी इस चर्चा को अहम बनाता है। इस विधानसभा सीट पर पहला चुनाव 1957 में हुआ था। वर्तमान में समाजवादी पार्टी के महबूब अली लंबे समय से यहां चुनाव जीतते आ रहे हैं। उन्होंने 2002 से लगातार इस सीट पर जीत दर्ज की है। पिछले चार चुनाव उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीते हैं। इससे पहले 2002 में वह राष्ट्रीय परिवर्तन दल के टिकट पर चुनाव जीते थे और बाद में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए थे।

    2022 के विधानसभा चुनाव में महबूब अली ने भाजपा के राम सिंह को 71,036 वोटों के अंतर से हराया था। महबूब अली को 1,28,735 वोट मिले थे, जबकि राम सिंह को 57,699 वोट हासिल हुए थे। अमरोहा विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 3.25 लाख मतदाताओं वाली इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या लगभग दो लाख बताई जाती है।

    मोहम्मद शमी की जयंत चौधरी से मुलाकात ऐसे समय हुई है, जब वह लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से बाहर हैं। उन्होंने भारत के लिए अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मुकाबला 9 मार्च 2025 को न्यूजीलैंड के खिलाफ खेला था। इसके बाद से भारतीय टीम में उनकी वापसी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। हाल में वेस्टइंडीज दौरे के लिए घोषित टीम में भी उनका नाम नहीं था।

    जयंत चौधरी के साथ मुलाकात की तस्वीर सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या शमी खुद चुनावी मैदान में उतरेंगे या परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में आगे बढ़ाएंगे। फिलहाल दोनों ही संभावनाएं चर्चा का हिस्सा हैं और किसी भी विकल्प पर आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है। ऐसे में अमरोहा से शमी या उनके भाई के चुनाव लड़ने की चर्चा को अभी राजनीतिक अटकलों के तौर पर ही देखा जा रहा है।