Tag: FIR

  • सोनिया गांधी के वोटर लिस्ट मामले में कोर्ट का बड़ा आदेश, पुराना फैसला रद्द; 29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई

    सोनिया गांधी के वोटर लिस्ट मामले में कोर्ट का बड़ा आदेश, पुराना फैसला रद्द; 29 सितंबर को फिर होगी सुनवाई

    नई दिल्ली । कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से जुड़े पुराने मतदाता सूची मामले में दिल्ली की विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के पहले के आदेश को रद्द कर दिया है। इस आदेश में पुलिस जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग को खारिज किया गया था। अब मामले को संबंधित एसीजेएम अदालत के पास वापस भेज दिया गया है, जहां शिकायत पर नए सिरे से सुनवाई होगी। अगली सुनवाई 29 सितंबर को निर्धारित की गई है।

    यह मामला सोनिया गांधी का नाम 1980 की नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज होने के आरोपों से जुड़ा है। शिकायत में कहा गया है कि सोनिया गांधी को भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी। ऐसे में नागरिकता हासिल करने से करीब तीन साल पहले 1980 की मतदाता सूची में उनका नाम दर्ज होने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

    शिकायतकर्ता विकास त्रिपाठी ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए कथित तौर पर जाली या फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया। शिकायत में 1980, 1982 और 1983 के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया गया है कि 1980 में नाम दर्ज होने के बाद 1982 में उसे क्यों हटाया गया और 1983 में नागरिकता मिलने के बाद नाम दोबारा किस आधार पर शामिल किया गया।

    इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस से जांच और एफआईआर दर्ज करने की मांग की गई थी। हालांकि, मजिस्ट्रेट अदालत ने पहले इस मांग को खारिज कर दिया था। इसके बाद शिकायतकर्ता ने उस आदेश को चुनौती देते हुए पुनरीक्षण याचिका दायर की।

    विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने ने अब निचली अदालत के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि उसमें मामले से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया था। अदालत ने पुराने आदेश को ऐसा आदेश माना जिसमें निष्कर्ष के पीछे पर्याप्त कारण स्पष्ट नहीं किए गए थे।

    अदालत ने यह भी कहा कि एफआईआर की मांग पर फैसला लेने से पहले संबंधित पुलिस अधिकारी की बात सुनी जानी चाहिए थी और पुलिस थाने से स्थिति रिपोर्ट मंगाई जानी चाहिए थी। सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि मजिस्ट्रेट को पहले यह देखना था कि शिकायत में किसी संज्ञेय अपराध के होने का आधार बनता है या नहीं।

    विशेष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह स्वयं मजिस्ट्रेट की भूमिका निभाकर सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती। इसी कारण मामले को वापस एसीजेएम अदालत भेजा गया है। अब संबंधित अदालत शिकायत में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध दस्तावेजों और पुलिस के पक्ष पर नए सिरे से विचार करेगी।

    एसीजेएम अदालत को दोनों पक्षों को सुनने के बाद कारणों सहित नया आदेश पारित करना होगा। पुलिस से स्थिति रिपोर्ट और संबंधित पक्षों की दलीलों पर भी विचार किया जाएगा। इसके बाद तय होगा कि मामले में एफआईआर दर्ज करने या आगे की जांच के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं या नहीं।

    महत्वपूर्ण रूप से, ताजा अदालत के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि सोनिया गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। अदालत ने फिलहाल पुराने आदेश को रद्द कर मामले की दोबारा सुनवाई का रास्ता खोला है। अब 29 सितंबर की सुनवाई में आगे की कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट होगी।

  • मणिपुर हिंसा के बाद राहत कैंपों में असामान्य मौतों की जांच पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, FIR और सुरक्षा पर जोर

    मणिपुर हिंसा के बाद राहत कैंपों में असामान्य मौतों की जांच पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश, FIR और सुरक्षा पर जोर

    नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हिंसा के दौरान विस्थापित लोगों के लिए बनाए गए राहत कैंपों में हुई मौतों के मामले पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य के मुख्य सचिव को इन मौतों की जांच, आपराधिक कार्रवाई और राहत कैंपों में रह रहे लोगों की सुरक्षा को लेकर उठाए गए कदमों की जानकारी हलफनामे के माध्यम से देने का निर्देश दिया है।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान मणिपुर सरकार से कई सवाल किए। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने जस्टिस गीता मित्तल की अध्यक्षता वाली कमेटी की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर राज्य सरकार से पूछा कि सामने आए मामलों पर अब तक कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण यानी MSLSA को भी मामले पर अलग स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि राहत कैंपों में हुई असामान्य मौतों के मामलों में तेजी से एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए। इसके साथ ही विस्थापित लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी भी सामने रखनी होगी।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देश जस्टिस गीता मित्तल कमेटी और एक आईएएस अधिकारी की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद आए। इन रिपोर्टों में मणिपुर के राहत कैंपों में 30 से अधिक मौतों का उल्लेख किया गया था। इनमें एक मौत कथित यौन उत्पीड़न के बाद होने की बात भी सामने आई थी।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने राहत कैंपों में हुई कुल 34 मौतों में से केवल 20 मामलों में पोस्टमार्टम कराए जाने पर भी सवाल उठाया। अदालत ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि सभी मामलों में पोस्टमार्टम क्यों नहीं कराया गया। मौतों की परिस्थितियों और उनके कारणों की जांच को लेकर भी राज्य से जवाब मांगा गया।

    पीठ ने राहत कैंपों में रहने वाले विस्थापित लोगों की असामान्य मौतों के बाद दिए गए मुआवजे पर भी सवाल उठाया। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि ऐसे मामलों में प्रभावित परिवारों को केवल 20 से 30 हजार रुपये का मुआवजा क्यों दिया गया। इस मुद्दे पर भी राज्य को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।

    अदालत ने यह भी कहा कि राहत कैंपों में रहने वाले विस्थापित लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। असामान्य मौतों के मामलों में कानूनी कार्रवाई और जांच की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। MSLSA को भी अपनी रिपोर्ट के जरिए संबंधित मामलों में की गई कार्रवाई और स्थिति की जानकारी देने को कहा गया है।

    सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में वर्ष 2023 की हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई को लेकर भी उम्मीद जताई कि केंद्रीय जांच एजेंसियों से जुड़े मामलों के लिए गठित दो विशेष अदालतें मुकदमों को तेजी से पूरा करेंगी। अदालत के निर्देशों के बाद अब मुख्य सचिव और MSLSA की स्टेटस रिपोर्ट में राहत कैंपों में हुई मौतों, जांच, एफआईआर, सुरक्षा और मुआवजे से जुड़े पहलुओं की जानकारी सामने आने की उम्मीद है।

  • नेहा पच्चीसिया मामले में एमपी हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, एफआईआर चुनौती याचिका पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा

    नेहा पच्चीसिया मामले में एमपी हाई कोर्ट में सुनवाई पूरी, एफआईआर चुनौती याचिका पर अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा

    मध्य प्रदेश /कटनी की निलंबित नगर पुलिस अधीक्षक यानी CSP नेहा पच्चीसिया से जुड़े मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई। नेहा पच्चीसिया ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती देते हुए अदालत का रुख किया है। उनका कहना है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सही नहीं हैं और उन्हें मामले में फंसाया गया है। मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

    नेहा पच्चीसिया के खिलाफ कटनी के कुठला थाने में मामला दर्ज किया गया है। यह प्रकरण जमीन के सौदे और पद के कथित दुरुपयोग से जुड़े आरोपों को लेकर है। मामले में नेहा पच्चीसिया के अलावा क्षितिज राज बारापात्रे और मारूफ अहमद हनफी भी आरोपी बनाए गए हैं। क्षितिज राज बारापात्रे को मामले में मुख्य फाइनेंसर और मारूफ अहमद हनफी को कागजी खरीदार बताया गया है।

    हाई कोर्ट में दाखिल याचिका के जरिए नेहा पच्चीसिया ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती दी है। उनकी ओर से आरोपों को गलत बताते हुए कानूनी कार्रवाई पर सवाल उठाए गए हैं। वहीं, सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि नेहा पच्चीसिया फिलहाल फरार हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी है।

    मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से नेहा पच्चीसिया के खिलाफ पर्याप्त भ्रष्टाचार संबंधी साक्ष्य होने का दावा किया गया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सुनवाई पूरी कर ली और फैसला सुरक्षित रख लिया। अब इस मामले में अदालत के फैसले का इंतजार है।

    इस मामले से पहले नेहा पच्चीसिया की अग्रिम जमानत याचिका भी जिला अदालत में खारिज हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने गिरफ्तारी और आगे की कानूनी कार्रवाई से राहत पाने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया। एफआईआर दर्ज होने के बाद से नेहा पच्चीसिया के साथ क्षितिज राज बारापात्रे और मारूफ अहमद हनफी के भी फरार होने की जानकारी दी गई है।

    तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। प्रत्येक आरोपी पर 10-10 हजार रुपये का इनाम घोषित किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। एफआईआर दर्ज होने के बाद से तीनों के मोबाइल फोन बंद बताए जा रहे हैं। उनकी तलाश के लिए एसआईटी, पुलिस की अलग-अलग टीमें और साइबर सेल संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं।

    नेहा पच्चीसिया का पुलिस सेवा में आने का सफर भी चर्चा में रहा है। उन्होंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में 20वीं रैंक हासिल कर पुलिस सेवा में प्रवेश किया था और बाद में कटनी में CSP के पद पर पदस्थ रहीं। वर्तमान मामले के सामने आने के बाद वह निलंबित हैं और उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर की वैधता को लेकर हाई कोर्ट में कानूनी लड़ाई चल रही है।

    मामले में आगे की दिशा अब हाई कोर्ट के फैसले पर निर्भर करेगी। अदालत ने बुधवार को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा है। इस बीच पुलिस की ओर से फरार आरोपियों की तलाश और मामले से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया जारी है। एफआईआर में लगाए गए आरोपों पर अंतिम स्थिति अदालत की प्रक्रिया और जांच के आगे बढ़ने के बाद ही स्पष्ट होगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच प्रदर्शन मामलों में कमेटी की शक्तियां तय कीं, कहा- FIR का आदेश देने का अधिकार सिर्फ अदालत को

    सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच प्रदर्शन मामलों में कमेटी की शक्तियां तय कीं, कहा- FIR का आदेश देने का अधिकार सिर्फ अदालत को

    नई दिल्ली ।कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी की शक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। अदालत ने कहा कि कमेटी आरोपों की जांच कर सकती है, पीड़ितों की पहचान कर सकती है और अपनी सिफारिशें दे सकती है, लेकिन किसी आपराधिक जांच के लिए FIR दर्ज कराने का आदेश देने का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट के पास रहेगा।

    भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह टिप्पणी की। पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल हैं। अदालत ने कहा कि कमेटी सीधे FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकती और उसे अदालत की निगरानी में काम करना होगा। कार्यवाही के दौरान आने वाली किसी समस्या के समाधान के लिए कमेटी सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है।

    अदालत ने कमेटी को अपनी सहायता के लिए अमिकस या वकील नियुक्त करने की भी अनुमति दी है। इसके अलावा कमेटी अपनी जांच से संबंधित जानकारी व्यापक स्तर पर सार्वजनिक कर सकती है और लोगों से सुझाव तथा आपत्तियां मांग सकती है। संवेदनशील और जरूरतमंद गवाहों तक पहुंच बनाने के लिए अलग व्यवस्था भी तैयार की जा सकती है।

    इसमें हेल्पलाइन जैसी व्यवस्था शामिल हो सकती है, ताकि वे लोग भी अपनी बात कमेटी तक पहुंचा सकें जो सीधे उसके सामने उपस्थित नहीं हो सकते। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र और दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत को बताया कि कमेटी की पहली बैठक 15 सितंबर को निर्धारित है।

    सुप्रीम कोर्ट ने एक सितंबर के अपने आदेश का भी उल्लेख किया। अदालत ने उस समय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए प्रदर्शन से जुड़े आपराधिक मामलों को खत्म करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि 20 से 25 जुलाई के बीच हुए प्रदर्शनों के संबंध में दर्ज FIR पर आगे कार्रवाई या जांच नहीं की जाएगी और उन्हें बंद माना जाएगा। साथ ही इन घटनाओं के संबंध में नई FIR दर्ज नहीं करने का निर्देश भी दिया गया था।

    पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में गठित HPEC को 20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन से जुड़े विभिन्न आरोपों की स्वतंत्र जांच करनी है। कमेटी पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों के साथ सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की भी जांच करेगी। उसे दस्तावेजी सबूत, लोगों के प्रतिवेदन और गुमनाम शिकायतें लेने की अनुमति है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी की संरचना बदलने की मांग भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि कमेटी का गठन स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने किया है और काम शुरू होने से पहले इसमें बदलाव नहीं किया जाएगा। हालांकि, किसी पक्ष को कमेटी के कामकाज को लेकर चिंता होने पर वह अदालत के सामने अपनी बात रख सकता है।

    सुनवाई के दौरान 14 वर्षीय लड़की को कथित तौर पर धमकाने और परेशान किए जाने का मामला भी सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को संसद मार्ग थाने में दर्ज FIR पर तत्काल कार्रवाई कर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया। लड़की फिलहाल उत्तर प्रदेश में रह रही है। अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को लड़की और उसके परिवार को पुलिस सुरक्षा तथा जरूरी सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने को भी कहा।

    अदालत ने कहा कि यदि किसी बच्चे या उसके परिवार को आपराधिक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाने के लिए डराया-धमकाया जा रहा है तो HPEC की जांच के नतीजे का इंतजार नहीं किया जा सकता। लड़की के बयान की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी बताते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोप सही पाए जाने पर जांच को उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाना चाहिए।

    सुनवाई में स्वातंत्र भारद्वाज से जुड़े आपराधिक मामलों का भी उल्लेख हुआ। उनके खिलाफ कथित हमले, आपराधिक धमकी और POCSO से जुड़े मामलों का जिक्र किया गया। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कमेटी की संरचना, संवेदनशील गवाहों की पहुंच, अंतरिम मुआवजा, पेलेट गन के इस्तेमाल और प्रदर्शनकारियों के डेटा के कथित संग्रह को लेकर चिंताएं रखीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित पक्ष अपनी सामग्री और सुझाव कमेटी के सामने रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अदालत भी इन मुद्दों को स्पष्ट करेगी।

  • बंगाल में बाबा बागेश्वर की तस्वीर जलाने पर FIR दर्ज, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस को दी कड़ी कार्रवाई की चेतावनी

    बंगाल में बाबा बागेश्वर की तस्वीर जलाने पर FIR दर्ज, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पुलिस को दी कड़ी कार्रवाई की चेतावनी

    नई दिल्ली ।दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर बागेश्वर पीठ के महंत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान के बाद पश्चिम बंगाल में विवाद बढ़ता जा रहा है। भवानीपुर पुलिस स्टेशन के सामने बाबा बागेश्वर की तस्वीर जलाने के मामले में पुलिस ने FIR दर्ज की है। इससे पहले विधानसभा में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने उनके बयान का बचाव करते हुए विरोध करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए थे।

    धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने बंगाल में हनुमंत कथा के दौरान दुर्गा पूजा और नवरात्रि के समय मांसाहारी भोजन को लेकर अपील की थी। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो के मुताबिक उन्होंने कहा था कि लोग नवरात्रि के दौरान मूर्ति रखें या नहीं रखें, लेकिन पूजा पंडालों के पास मांसाहारी भोजन नहीं बनाया जाना चाहिए।

    उन्होंने यह भी कहा था कि लोग चाहें तो अपने घरों में मांस खा सकते हैं। उनके मुताबिक दुर्गा पूजा के दौरान पंडालों के आसपास मांस और शराब की दुकानें बंद होनी चाहिए। उन्होंने मांसाहारी भोजन करने वाले हिंदुओं को लेकर भी टिप्पणी की थी। इन बयानों के बाद तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस की ओर से विरोध शुरू हुआ।

    कलकत्ता जिला कांग्रेस कमेटी के आठ सदस्य भवानीपुर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे थे। कमेटी के प्रमुख प्रदीप प्रसाद ने बताया कि वे बाबा बागेश्वर की तस्वीर लेकर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने थाने पहुंचे थे। उन्होंने दावा किया कि उनके साथ मौजूद किसी व्यक्ति ने तस्वीर नहीं जलाई। उनके अनुसार तस्वीर जलाने वाले लोग अलग थे।

    प्रदीप प्रसाद ने यह भी आरोप लगाया कि बंगालियों की छवि खराब करने के लिए बाहर से लोगों को बुलाया जाता है। दूसरी ओर आसनसोल के कांग्रेस नेता प्रसेनजित ने कहा कि उन्होंने बुधवार को बाबा बागेश्वर की तस्वीर जलाकर विरोध किया था। इसके बाद आसनसोल साउथ पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई।

    इस पूरे विवाद के बीच मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता पुलिस कमिश्नर को बाबा बागेश्वर की तस्वीर जलाने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने का निर्देश दिया। मुख्यमंत्री ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपनी धार्मिक परंपराओं के साथ देशभक्ति, राष्ट्रवाद और अखंड भारत के विचार पर भी बात की थी।

    मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने अपनी परंपरा और संस्कृति की बात की है और जिसे इसे स्वीकार करना है, वह करे, जबकि जिसे स्वीकार नहीं करना है, वह न करे। उनके मुताबिक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने किसी पर अपनी बात नहीं थोपी। इसके बावजूद भवानीपुर थाने के सामने उनकी तस्वीर जलाए जाने पर मुख्यमंत्री ने पुलिस आयुक्त को मामले में शामिल लोगों को तुरंत गिरफ्तार करने का निर्देश दिया।

    बाबा बागेश्वर के बयान के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब तस्वीर जलाने और उसके बाद दर्ज हुई FIR तक पहुंच गया है। एक तरफ उनके बयान को लेकर राजनीतिक विरोध सामने आया है, वहीं दूसरी ओर तस्वीर जलाने की घटना पर मुख्यमंत्री ने पुलिस कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन को लेकर दिया गया बयान अब राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बन गया है।

  • MP में कंप्यूटर खरीदी घोटाला…. टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल, EOW ने FIR दर्ज कर शुरू की जांच

    MP में कंप्यूटर खरीदी घोटाला…. टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल, EOW ने FIR दर्ज कर शुरू की जांच


    भोपाल।
    मध्यप्रदेश (Madhya Pradesh) में सरकारी खरीद (Public Procurement) की ऑनलाइन प्रक्रिया GeM (Government e-Marketplace) पर सवाल खड़े उठाने वाला मामला सामने आया है. EOW को करीब 10.99 करोड़ रुपए की कंप्यूटर खरीदी की जांच में ऐसी जानकारियां मिली हैं, जिनसे टेंडर प्रक्रिया में कथित तौर पर मिलीभगत की आशंका जताई गई है. जांच में टेंडर में शामिल चार कंपनियों के बीच कई ऐसी समानताएं सामने आईं, जो सामान्य तौर पर अलग-अलग प्रतिस्पर्धी कंपनियों के बीच नहीं दिखतीं. EOW के मुताबिक, इन कंपनियों का संबंध एक ही व्यक्ति से पाया गया है।

    EOW DG उपेंद्र जैन के अनुसार, जांच में चारों कंपनियों के मोबाइल नंबर, ईमेल आईडी और पते में समानता मिली. इसके अलावा एक ही GST अकाउंट के इस्तेमाल की बात भी सामने आई है।

    जैन का मानना है कि अलग-अलग कंपनियों के नाम से टेंडर में भाग लेकर वास्तविक प्रतिस्पर्धा का माहौल बनाया गया हो सकता है. कंपनियों ने पात्रता साबित करने के लिए कंप्यूटर निर्माताओं के ऑथराइजेशन लेटर भी प्रस्तुत किए थे।

    मामले की जांच में कंप्यूटरों की सप्लाई को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं. EOW का दावा है कि कुछ पुराने कंप्यूटरों को नया बताकर सप्लाई किए जाने के साक्ष्य मिले हैं. जांच में एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें 22 जुलाई 2024 को लगाए गए कंप्यूटरों को 23 सितंबर 2024 के टेंडर में नया उपकरण बताया गया. यानी जिस कंप्यूटर की स्थापना पहले ही हो चुकी थी, उसे करीब दो महीने बाद हुए टेंडर में नए उपकरण के तौर पर पेश किए जाने का आरोप है।

    स्पेसिफिकेशन भी बदले जाने का आरोप
    जांच के दौरान सप्लाई किए गए कंप्यूटरों के तकनीकी मानकों की भी पड़ताल की गई. इसमें निर्धारित स्पेसिफिकेशन और वास्तविक उपकरणों के बीच अंतर मिलने की बात सामने आई है. आरोप है कि कुछ कंप्यूटरों में स्थानीय स्तर पर खरीदे गए SSD और RAM लगाए गए, जो टेंडर में निर्धारित तकनीकी मानकों से मेल नहीं खाते थे।


    मल्टीनेशनल कंपनी के नाम पर फर्जी ऑथराइजेशन

    EOW जांच में एक और अहम बिंदु सामने आया. एक कंपनी ने टेंडर की पात्रता पूरी करने के लिए एक मल्टीनेशनल कंप्यूटर निर्माता कंपनी के नाम से कथित तौर पर ऑथराइजेशन लेटर जमा किया था. EOW के मुताबिक, इस दस्तावेज की सत्यता को लेकर भी जांच में गंभीर सवाल सामने आए हैं।


    UPS की कीमत ने भी चौंकाया

    कंप्यूटरों के अलावा UPS की खरीद में भी कीमत को लेकर बड़ा अंतर सामने आया है. EOW के अनुसार, जिस UPS की प्रिंटेड कीमत 6,086 रुपए थी, उसे 11,247 रुपए में खरीदा गया। वहीं GeM पर उसी UPS की कीमत करीब 3,754 रुपए बताई गई थी. इतना ही नहीं, एक निर्माता ने EOW को बताया कि टेंडर में जिस मॉडल के UPS का उल्लेख था, उसकी सप्लाई ही नहीं की गई।


    चार लोगों पर FIR, कंपनियों पर कार्रवाई की सिफारिश

    जांच के आधार पर EOW ने मामले में चार लोगों के खिलाफ BNS की संबंधित धाराओं में FIR दर्ज की है. साथ ही कथित अनियमितताओं से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई और उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की सिफारिश भी की गई है। अब जांच का बड़ा सवाल यही है कि 10.99 करोड़ रुपए की इस सरकारी खरीद में टेंडर प्रक्रिया किस तरह संचालित हुई, चार कंपनियों के बीच इतना गहरा कनेक्शन कैसे रहा और कथित तौर पर पुराने या अलग स्पेसिफिकेशन वाले उपकरणों की सप्लाई कैसे स्वीकार की गई?

  • मुरादाबाद सर्किट हाउस में नमाज पढ़ने के मामले में सपा विधायक के चाचा पर मुकदमा दर्ज, वीडियो वायरल

    मुरादाबाद सर्किट हाउस में नमाज पढ़ने के मामले में सपा विधायक के चाचा पर मुकदमा दर्ज, वीडियो वायरल

    नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में सर्किट हाउस परिसर में नमाज पढ़ने से जुड़े मामले में समाजवादी पार्टी के नेता मोहम्मद उस्मान के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। मोहम्मद उस्मान बिलारी से सपा विधायक मोहम्मद फहीम के चाचा बताए जा रहे हैं और पार्टी में जिला उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते हैं। मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो के सामने आने के बाद पुलिस तक पहुंचा।

    वायरल वीडियो में मोहम्मद उस्मान के सर्किट हाउस परिसर में सड़क पर नमाज पढ़ने का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि इस दौरान सड़क पर वाहन खड़ा किया गया था, जिससे वहां से आने-जाने वाले लोगों को परेशानी हुई। वीडियो सामने आने के बाद मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा शुरू हुई और पुलिस से कार्रवाई की मांग की गई।

    पुलिस के अनुसार, सर्किट हाउस के प्रभारी अवर अभियंता अनिल कुमार की ओर से दी गई शिकायत के आधार पर मझोला थाने में मुकदमा दर्ज किया गया है। अधिकारियों ने बताया कि शिकायत में सामने आए तथ्यों के आधार पर कार्रवाई शुरू की गई है। पुलिस अब पूरे मामले की जांच कर रही है और वायरल वीडियो से जुड़े तथ्यों की भी पड़ताल की जा रही है।

    मुरादाबाद के पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, कुछ हिंदू संगठन के लोगों ने भी इस मामले में पुलिस अधिकारियों से मुलाकात कर कार्रवाई की मांग की थी। इसके बाद शिकायत और उपलब्ध जानकारी के आधार पर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। पुलिस का कहना है कि मामले में जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    यह मामला उस समय सामने आया जब सर्किट हाउस में समाजवादी पार्टी के नेताओं की राजनीतिक गतिविधियां चल रही थीं। जानकारी के मुताबिक, विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष लाल बिहारी यादव गुरुवार को एमएलसी चुनाव से संबंधित कार्यक्रम के लिए सर्किट हाउस पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने सपा नेताओं के साथ चुनाव को लेकर बैठक भी की थी।

    बताया गया कि लाल बिहारी यादव शुक्रवार को सर्किट हाउस से रवाना हो गए थे। इसके बाद नमाज से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने लगा। वीडियो वायरल होने के बाद मामले ने राजनीतिक और स्थानीय स्तर पर ध्यान खींचा। हालांकि वीडियो में दिखाई दे रही घटना के सभी पहलुओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    पुलिस अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि घटना किस समय हुई, उस दौरान वहां यातायात और आवाजाही की वास्तविक स्थिति क्या थी तथा वीडियो में दिखाई दे रहे व्यक्ति और घटनास्थल से जुड़े अन्य तथ्यों की पुष्टि कैसे होती है। जांच में शिकायत, वीडियो और मौके से संबंधित जानकारी को आधार बनाया जा रहा है।

    सर्किट हाउस सरकारी उपयोग का महत्वपूर्ण परिसर होता है, जहां अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और अन्य विशिष्ट लोगों की आवाजाही रहती है। ऐसे स्थान पर किसी गतिविधि से यातायात या आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होने की शिकायत मिलने पर प्रशासन और पुलिस द्वारा संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जाती है।

    मामले में पुलिस की ओर से मुकदमा दर्ज किए जाने के बाद अब जांच आगे बढ़ रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आवश्यक कानूनी कदम उठाए जाएंगे। वहीं सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को लेकर भी लोगों से बिना पुष्टि के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचने की अपील की जा सकती है, क्योंकि वीडियो के आधार पर घटना के पूरे संदर्भ का निर्धारण हमेशा संभव नहीं होता।

    फिलहाल मोहम्मद उस्मान के खिलाफ मझोला थाने में दर्ज मामले को लेकर पुलिस जांच कर रही है। शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि और घटना की परिस्थितियों को स्पष्ट करने के लिए पुलिस उपलब्ध साक्ष्यों की जांच में जुटी है।

  • गरीब हितग्राहियों के राशन में हेराफेरी पर प्रशासन सख्त, जांच में सामने आई अनियमितता के बाद सात विक्रेताओं पर होगी कार्रवाई

    गरीब हितग्राहियों के राशन में हेराफेरी पर प्रशासन सख्त, जांच में सामने आई अनियमितता के बाद सात विक्रेताओं पर होगी कार्रवाई

    मध्य प्रदेश: के टीकमगढ़ जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीब हितग्राहियों को दिए जाने वाले राशन में कथित गड़बड़ी का बड़ा मामला सामने आया है। जिला प्रशासन की जांच में सात शासकीय उचित मूल्य दुकानों पर खाद्यान्न के रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक के बीच गंभीर अंतर पाया गया है। जांच के आधार पर संबंधित दुकान विक्रेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं।

    मामला जिले की छिपरी, बिजरावन, बजीतपुर, बड़ागांव, सुरजपुर, भेलसी और अजनौर स्थित शासकीय उचित मूल्य दुकानों से जुड़ा है। इन दुकानों को लेकर जिला प्रशासन को शिकायतें मिली थीं। शिकायतों में गरीब हितग्राहियों के लिए आवंटित गेहूं के वितरण में गड़बड़ी और खाद्यान्न की हेराफेरी किए जाने के आरोप लगाए गए थे।

    शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर विवेक श्रोतिय के निर्देश पर संबंधित राशन दुकानों की जांच कराई गई। जांच के दौरान दुकानों के दस्तावेजों, खाद्यान्न वितरण से जुड़े रिकॉर्ड और उपलब्ध वास्तविक स्टॉक का परीक्षण किया गया। इस प्रक्रिया में सरकारी रिकॉर्ड और मौके पर मौजूद खाद्यान्न की मात्रा में बड़ा अंतर सामने आया।

    जांच रिपोर्ट के अनुसार, सातों दुकानों से जुड़े मामले में करीब 62 लाख 78 हजार रुपये मूल्य के खाद्यान्न के गबन की बात सामने आई है। इसमें गरीब हितग्राहियों के लिए आवंटित गेहूं, चावल और नमक शामिल हैं। आरोप है कि इन खाद्य सामग्री के वितरण में अनियमितता बरती गई और निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप हितग्राहियों तक राशन नहीं पहुंचाया गया।

    सरकारी राशन व्यवस्था का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को निर्धारित मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध कराना है। ऐसे में राशन के रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक में अंतर पाए जाने के बाद प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लिया है। जांच में सामने आई अनियमितताओं को आधार बनाकर संबंधित दुकान संचालकों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है।

    प्रशासन ने जांच रिपोर्ट के आधार पर सात राशन दुकान विक्रेताओं के खिलाफ आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए हैं। इस कार्रवाई के बाद संबंधित विक्रेताओं की भूमिका की जांच पुलिस स्तर पर भी की जाएगी। मामले में आगे की कार्रवाई जांच और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर होगी।

    जिला प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को गंभीरता से लिया जाएगा। गरीब हितग्राहियों के लिए निर्धारित राशन में अनियमितता पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का कहना है कि पात्र परिवारों के हक का खाद्यान्न किसी भी स्तर पर प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।

    इस कार्रवाई से राशन दुकानों के संचालन और खाद्यान्न वितरण की व्यवस्था पर निगरानी बढ़ाए जाने के संकेत भी मिले हैं। सात दुकानों में सामने आई कथित अनियमितताओं के बाद संबंधित रिकॉर्ड और स्टॉक की जांच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब एफआईआर की प्रक्रिया के साथ मामले में आगे की जांच और कानूनी कार्रवाई पर नजर रहेगी।

  • प्रयागराज में अशरफ की कुर्क जमीन पर अवैध कब्जे और प्लाटिंग का खुलासा, तीन बिल्डरों पर एफआईआर दर्ज

    प्रयागराज में अशरफ की कुर्क जमीन पर अवैध कब्जे और प्लाटिंग का खुलासा, तीन बिल्डरों पर एफआईआर दर्ज


    नई दिल्ली ।
    उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में माफिया अतीक अहमद के भाई अशरफ की गैंगस्टर एक्ट के तहत कुर्क की गई जमीन पर कथित अवैध कब्जे और प्लाटिंग का मामला सामने आया है। प्रशासन की कार्रवाई के बाद इस मामले में तीन बिल्डरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। अधिकारियों के अनुसार, संबंधित जमीन को पहले ही कुर्क किया जा चुका था और उसकी निगरानी की जिम्मेदारी स्थानीय स्तर पर तय थी।

    मामला एयरपोर्ट थाना क्षेत्र के शाहा उर्फ पीपल गांव से जुड़ा है। दर्ज एफआईआर के मुताबिक, आराजी संख्या 1115 की करीब 0.4680 हेक्टेयर जमीन गैंगस्टर एक्ट के तहत कुर्क की गई थी। इस जमीन को सरकारी अभिरक्षा में रखा गया था और संबंधित थाना प्रभारी को इसका कस्टोडियन बनाया गया था।

    आरोप है कि मोहम्मद मुस्लिम, मोहम्मद नसरत और मोहम्मद आफताब अहमद ने इस जमीन पर कब्जा कर वहां अवैध तरीके से प्लाटिंग शुरू कर दी। आरोप यह भी है कि जमीन को प्लॉट के रूप में विकसित कर उसे बेचने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। तीनों को अतीक अहमद के कथित फाइनेंसर के तौर पर भी बताया गया है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही होगी।

    प्रशासन को जब जमीन पर कथित कब्जे और प्लाटिंग की जानकारी मिली तो अधिकारियों ने तत्काल कार्रवाई शुरू की। 22 अगस्त को एसडीएम सदर की मौजूदगी में बुलडोजर कार्रवाई की गई और जमीन पर की गई कथित अवैध प्लाटिंग को ध्वस्त कर दिया गया। इसके बाद मामले में कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाई गई।

    सोमवार को लेखपाल मनीष कुमार की ओर से तीनों आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया। अब जांच के दौरान यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि कुर्क जमीन पर कब्जा किस तरह किया गया और वहां प्लाटिंग की गतिविधियां कब से चल रही थीं।

    इस घटना ने कुर्क संपत्तियों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। जब जमीन गैंगस्टर एक्ट के तहत पहले से कुर्क थी और उसकी देखरेख के लिए जिम्मेदारी निर्धारित थी, तब कथित तौर पर वहां निर्माण और प्लाटिंग की गतिविधियां कैसे शुरू हुईं, यह जांच का अहम हिस्सा रहेगा। प्रशासन यह भी देखेगा कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों और बिक्री की प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही।

    मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं। जांच में यदि किसी अन्य व्यक्ति या अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके आधार पर आगे कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल पुलिस और प्रशासन का ध्यान जमीन की स्थिति, कथित कब्जे और प्लाटिंग से जुड़े रिकॉर्ड की जांच पर है।

    अतीक अहमद और अशरफ की हत्या 15 अप्रैल 2023 को प्रयागराज में उस समय हुई थी, जब दोनों को चिकित्सकीय जांच के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा था। दोनों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे और उनकी कई संपत्तियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई थी। ऐसे में कुर्क जमीन पर कथित कब्जे का यह मामला प्रशासनिक निगरानी के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    अब जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि कुर्क संपत्ति पर कब्जा और प्लाटिंग किस अवधि में हुई, इसमें किन लोगों की भूमिका रही और जमीन से संबंधित गतिविधियों को रोकने में प्रशासनिक स्तर पर कोई चूक हुई या नहीं। फिलहाल तीनों नामजद आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा रही है।

  • पैलेट गन मामले में राहुल गांधी का धरना, घायल छात्र साहिल के साथ थाने पहुंचे, कांग्रेस ने FIR दर्ज करने की मांग दोहराई

    पैलेट गन मामले में राहुल गांधी का धरना, घायल छात्र साहिल के साथ थाने पहुंचे, कांग्रेस ने FIR दर्ज करने की मांग दोहराई


    नई दिल्ली । 
    दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल का मामला शुक्रवार को उस समय और गरमा गया, जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी घायल छात्र साहिल लोचव के साथ संसद मार्ग पुलिस स्टेशन पहुंचे। कांग्रेस ने छात्र की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज करने और मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पुलिस स्टेशन पहुंचने के बाद राहुल गांधी वहीं धरने पर बैठ गए और कहा कि जब तक FIR दर्ज नहीं होती, वे वहां से नहीं हटेंगे।

    साहिल लोचव का दावा है कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान उस पर पैलेट गन से हमला हुआ था। उसके अनुसार, घटना के बाद उसे लेडी हार्डिंग अस्पताल ले जाया गया, जहां से आगे एम्स रेफर किया गया। एम्स में उसकी सर्जरी हुई, लेकिन उसकी आंख की रोशनी अब भी स्पष्ट नहीं है। साहिल ने बताया कि उसने 14 अगस्त को सात पन्नों की शिकायत पुलिस को दी थी, लेकिन FIR दर्ज नहीं की गई।

    राहुल गांधी ने पुलिस स्टेशन के बाहर कहा कि चिकित्सा रिपोर्ट में साहिल के शरीर में 200 से अधिक छर्रे होने की बात सामने आई है और कुछ छर्रे उसकी आंख में भी हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि दिल्ली पुलिस पैलेट गन चलाने से इनकार कर रही है तो फिर छात्र को चोट कैसे लगी। राहुल गांधी ने कहा कि मामले में अपराध हुआ है और इसकी जांच के लिए FIR दर्ज होना जरूरी है।

    कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि शिकायत दर्ज कराने के लिए साहिल और उसके वकील को अलग-अलग पुलिस अधिकारियों के पास भेजा गया। साहिल की वकील के मुताबिक, पहले कनॉट प्लेस और फिर संसद मार्ग थाने से संबंधित क्षेत्र को लेकर उन्हें भेजा गया। वकील ने यह भी दावा किया कि उन्हें बताया गया कि शिकायत पर कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि ऊपर से निर्देश मिले हैं। कांग्रेस का कहना है कि लिखित शिकायत मिलने के बावजूद अब तक प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है।

    राहुल गांधी के धरने के दौरान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई नेता और कार्यकर्ता भी पुलिस स्टेशन के बाहर पहुंच गए। कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी की और कुछ लोगों ने भजन गाते हुए तथा चरखे का इस्तेमाल करते हुए विरोध दर्ज कराया। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए इलाके में अतिरिक्त बल तैनात किया गया और संसद मार्ग के दोनों ओर यातायात प्रभावित रहा।

    कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने कहा कि पार्टी की मांग स्पष्ट है कि शिकायत पर FIR दर्ज की जाए और उसका नंबर दिया जाए। उन्होंने कहा कि साहिल की शिकायत को लेकर राहुल गांधी उसके साथ खड़े हैं और प्राथमिकी दर्ज होने तक धरना जारी रखने का निर्णय लिया गया है। कांग्रेस नेताओं ने इसे छात्रों के अधिकार और पुलिस की जवाबदेही से जुड़ा मामला बताया।

    वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी के विरोध प्रदर्शन पर सवाल उठाए। भाजपा नेताओं ने कहा कि 20 जुलाई की घटना को लेकर पहले से कानूनी प्रक्रिया चल रही है और सर्वोच्च न्यायालय ने भी मामले की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की है। भाजपा ने राहुल गांधी पर न्यायिक प्रक्रिया के समानांतर राजनीतिक प्रदर्शन करने का आरोप लगाया और कहा कि इस मुद्दे का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है।

    केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने राहुल गांधी के धरने को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधते हुए इसे राजनीतिक प्रदर्शन बताया। उन्होंने कहा कि जब सर्वोच्च न्यायालय मामले को देख रहा है, तब पुलिस स्टेशन के बाहर धरना देने का औचित्य क्या है। भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने भी कहा कि घटना की जांच चल रही है और कांग्रेस को कानून की प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए।

    इस बीच कांग्रेस का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी जांच को प्रभावित करना नहीं, बल्कि घायल छात्र की शिकायत पर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित कराना है। पैलेट गन के इस्तेमाल और साहिल की चोटों से जुड़े दावों की वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। फिलहाल विवाद का केंद्र यही है कि छात्र की शिकायत पर FIR दर्ज होती है या नहीं और इस मामले में आगे पुलिस तथा न्यायिक प्रक्रिया किस दिशा में बढ़ती है।