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  • चीनी के दाम आसमान पर… सरकार ने तय की लिमिट, 15 दिन का स्टॉक नहीं रख सकेंगे कारोबारी

    चीनी के दाम आसमान पर… सरकार ने तय की लिमिट, 15 दिन का स्टॉक नहीं रख सकेंगे कारोबारी


    नई दिल्ली।
    भारत सरकार (Government of India) ने 10 मीट्रिक टन से अधिक मासिक चीनी (Sugar Stock Limit) इस्तेमाल करने वाले डीलरों के लिए स्टॉक सीमा तय की है। सरकारी अधिसूचना के अनुसार ऐसे डीलर 15 दिनों से ज्यादा का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। यह आदेश 1 सितंबर से 30 नवंबर तक लागू रहेगा। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग बढ़ती (Rising Sugar Demand) है। इस दौरान बिस्कुट और कन्फेक्शनरी कंपनियां पहले से स्टॉक बढ़ाती हैं।


    चीनी स्टॉक पर किस कारण लिया गया फैसला?

    सरकार के मुताबिक रिकॉर्ड चीनी कीमतों पर लगाम लगाने के लिए नया आदेश जारी किया गयाहै। इस आदेश के तहत, 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का उपयोग करने वाले डीलर 15 दिन से ज्यादा स्टॉक नहीं रख पाएंगे। यह सरकारी आदेश बुधवार को सामने आया। नियम 1 सितंबर से लागू होगा और 30 नवंबर तक प्रभावी रहेगा।


    कीमतों में उछाल से चिंता, जुलाई में चीनी को लेकर क्या फैसला हुआ?

    दरअसल, पिछले महीने, भारत ने डीलरों को 30 दिन से अधिक स्टॉक न रखने का आदेश दिया था। इसके बावजूद, भारतीय चीनी की कीमतें पिछले महीने 10 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं। अगले तीन महीनों तक कीमतें ऊंची रहने की उम्मीद है। इससे पहले मंगलवार को आई रॉयटर्स की एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक भारत चीनी आपूर्ति बढ़ाने के उपायों पर विचार कर रहा है। खबर के मुताबिक सरकार सीमित शुल्क-मुक्त आयात और थोक व्यापारियों के लिए सख्त स्टॉक सीमा जैसे विकल्पों पर विचार कर रही है।


    चीनी की मांग और आपूर्ति की स्थिति कैसी?

    गौरतलब है कि भारत में अगस्त से नवंबर तक चीनी की मांग बढ़ जाती है। इस दौरान गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं। बिस्किट और कन्फेक्शनरी निर्माता जैसे थोक उपभोक्ता त्योहारों से पहले स्टॉक बनाते हैं। अनियमित बारिश और शुष्क मौसम ने गन्ने की फसल को प्रभावित किया है। चीनी भारत में राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, क्योंकि यह कई गरीब परिवारों के लिए कैलोरी का एक सस्ता स्रोत है।


    भारत से चीनी निर्यात पर प्रतिबंध क्यों?

    इससे पहले मई में चीनी निर्यात पर रोक लगाई गई थी। सरकार ने कहा था कि निर्यात पर यह रोक 30 सितंबर या अगले आदेश तक प्रभावी रहेगी। सरकार ने यह कदम देश में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और इसकी कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाया है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाले विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से इस संबंध में अधिसूचना जारी की गई है। इसके अनुसार, यह प्रतिबंध कच्ची, सफेद और परिष्कृत चीनी पर लागू होता है। सरकार ने नीति में बदलाव करते हुए चीनी को निषिद्ध श्रेणी में रख दिया है।

  • डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    डीपफेक पर मेटा से सरकार की दो टूक, कार्रवाई नहीं हुई तो भारतीय कानून के तहत तय हो सकती है कंपनी की जवाबदेही

    नई दिल्ली । डीपफेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार होने वाली भ्रामक सामग्री को लेकर केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया मंच मेटा के प्रति सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने कंपनी से डीपफेक सामग्री के खिलाफ ठोस और प्रभावी कदम उठाने को कहा है। साथ ही मेटा के साथ हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की प्रक्रिया शुरू करने की बात सामने आई है। सरकार यह भी जांच कर रही है कि भारतीय कानून के तहत मेटा और अन्य ऑनलाइन मंचों को मिलने वाले मध्यस्थ के दर्जे की शर्तों का सही तरीके से पालन किया जा रहा है या नहीं।

    सरकारी सूत्रों के अनुसार, मौजूदा समीक्षा का मुख्य सवाल यह है कि ऑनलाइन मंच भारतीय कानून में मध्यस्थों के लिए निर्धारित जिम्मेदारियों का पालन कर रहे हैं या नहीं। सरकार यह भी देख रही है कि यदि किसी मंच की तकनीकी प्रणाली यह तय करती है कि किसी यूजर को कौन-सी सामग्री दिखाई जाएगी, तो उस स्थिति में उसकी भूमिका केवल एक निष्क्रिय मध्यस्थ तक सीमित मानी जा सकती है या नहीं। इसी आधार पर संबंधित कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी पहलुओं की जांच की जा रही है।

    सरकार की नजर केवल मेटा तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले समय में अन्य प्रमुख ऑनलाइन मंचों को भी बातचीत के लिए बुलाया जा सकता है। इनके माध्यम से यह समझने की कोशिश होगी कि उनकी अनुशंसा प्रणाली किस तरह काम करती है और यूजर्स तक सामग्री पहुंचाने में उनकी तकनीकी भूमिका कितनी सक्रिय है। सरकार यह भी देख रही है कि भुगतान वाली सामग्री को बढ़ावा देने और यूजर के लिए सामग्री चुनने वाली प्रणालियों की भूमिका भारतीय कानून के मौजूदा प्रावधानों के तहत किस तरह निर्धारित होती है।

    डीपफेक को लेकर सरकार की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि एआई तकनीक के इस्तेमाल से वास्तविक व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो को बदलकर ऐसी सामग्री तैयार की जा सकती है, जो देखने में वास्तविक लगती है। ऐसी सामग्री का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, किसी व्यक्ति की छवि खराब करने और लोगों को भ्रमित करने के लिए किया जा सकता है। बिना स्पष्ट लेबल वाली एआई-जनित सामग्री भी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर यूजर्स के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर सकती है।

    सरकार और मेटा के बीच इस मुद्दे पर लगातार कई दौर की बैठकें हुई हैं। दो दिनों तक कंपनी की टीम से विस्तृत पूछताछ के बाद तीसरे दिन तकनीकी स्तर पर चर्चा की गई। इसमें डीपफेक, बाल यौन शोषण सामग्री और बिना लेबल वाली एआई-जनित सामग्री से निपटने के लिए कंपनी की कार्ययोजना पर विशेष रूप से चर्चा हुई। सरकार की ओर से प्लेटफॉर्म की तकनीकी व्यवस्था और कंटेंट मॉडरेशन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए।

    यह पूरा मामला उस घटनाक्रम के बाद और महत्वपूर्ण हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक सोशल मीडिया पोस्ट पर मेटा के एआई आधारित कंटेंट फिल्टर की वजह से अस्थायी रोक लग गई थी। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और पोस्ट बहाल करते हुए माफी मांगी थी। इसके बाद सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों में प्लेटफॉर्म की कंटेंट मॉडरेशन व्यवस्था और तकनीकी प्रणालियों की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया।

    अब सरकार बैठकों से मिले जवाबों और मेटा की कार्ययोजना की समीक्षा कर रही है। इसके बाद कानूनी राय के आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जा सकती है। यदि जांच में यह पाया जाता है कि प्लेटफॉर्म भारतीय कानून के तहत अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं कर रहे हैं, तो उनकी जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। इससे भारत में डीपफेक, एआई सामग्री और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी को लेकर नियामकीय व्यवस्था और सख्त होने के संकेत मिल रहे हैं।

  • FCRA बिल पर घिरी सरकार… परिसीमन विधेयक की राह में खतरा बनेगी सहयोगी दलों की नाराजगी!

    FCRA बिल पर घिरी सरकार… परिसीमन विधेयक की राह में खतरा बनेगी सहयोगी दलों की नाराजगी!


    नई दिल्ली।
    संसद (Parliament) के मौजूदा सत्र में केंद्र सरकार के सामने एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। चर्चा इस बात को लेकर तेज है कि क्या भाजपा (BJP) के नेतृत्व वाली सरकार विदेशी अंशदान विनियमन कानून (FCRA) में संशोधन से जुड़े विधेयक को इसी सप्ताह सदन में पेश करेगी या फिर इसे आगे के लिए टाल दिया जाएगा। इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक समीकरण बताया जा रहा है, जिसका सीधा संबंध प्रस्तावित परिसीमन विधेयक (Proposed Delimitation Bill) से जुड़ा हुआ है।

    FCRA संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार को संसद में साधारण बहुमत की जरूरत होगी, लेकिन परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को मंजूरी दिलाने के लिए व्यापक समर्थन जुटाना आवश्यक होगा। यही वजह है कि दोनों विधेयकों को लेकर सरकार की रणनीति को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं बढ़ गई हैं।

    सूत्रों के अनुसार, भाजपा अपने महत्वाकांक्षी परिसीमन विधेयक, जिसे 131वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किए जाने की संभावना है, को पारित कराने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से बाहर मौजूद दलों से भी संपर्क साध रही है। हालांकि दूसरी ओर विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कई विपक्षी और क्षेत्रीय दलों ने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं। तमिलनाडु की डीएमके और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) जैसे दल इसका विरोध करने के संकेत दे चुके हैं, जबकि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी जैसे दल अभी अपने रुख को लेकर सतर्कता बरत रहे हैं।

    एक समाचार चैनल द्वारा विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं और सूत्रों से बातचीत में यह सामने आया कि FCRA विधेयक को लेकर दलों के बीच मतभेद गहरे हैं। इसमें भाजपा के सहयोगी दलों की राय भी शामिल है। दक्षिण भारत की एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी ने मौजूदा स्वरूप में FCRA विधेयक को लेकर चिंता जताई है। पार्टी को आशंका है कि प्रस्तावित बदलावों का असर उन संस्थानों पर पड़ सकता है, जो उसके परंपरागत मतदाता वर्ग से जुड़े हुए हैं।

    पार्टी के एक वरिष्ठ सूत्र ने कहा, “सरकार के साथ बातचीत अभी जारी है। यदि हमारे सुझावों को स्वीकार किया जाता है तो हम सहयोग करने पर विचार कर सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो हमें विरोध करना पड़ेगा।” मतदान से दूरी बनाने के विकल्प पर उन्होंने कहा कि यह उनके लिए संभव नहीं है। पार्टी या तो विधेयक के समर्थन में मतदान करेगी या फिर विरोध में। उनका कहना था कि यह विषय उनके मुख्य मतदाता वर्ग से सीधे जुड़ा हुआ है और इसलिए इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    सूत्रों के अनुसार, इस क्षेत्रीय दल का बड़ा समर्थन आधार ईसाई और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों में है। पार्टी को डर है कि FCRA विधेयक का वर्तमान स्वरूप इन समुदायों के बीच असंतोष पैदा कर सकता है। राजनीतिक स्थिति यह है कि परिसीमन विधेयक पर यह दल सरकार के साथ खड़ा हो सकता है, लेकिन इसके लिए उसकी अपनी शर्तें हैं। वहीं FCRA संशोधन विधेयक पर समर्थन मिलने की संभावना काफी कम नजर आ रही है।

    इधर, एनसीपी (शरद पवार गुट) और डीएमके ने भी स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वे FCRA विधेयक के मौजूदा स्वरूप के पक्ष में नहीं हैं। दोनों दल चाहते हैं कि इस विधेयक को आगे विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए। एनसीपी (शरद पवार गुट) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि हर दानदाता और हर संस्था को संदेह की नजर से क्यों देखा जाए।

    एनसीपी सांसद ने कहा कि सामाजिक संस्थाओं और धर्मार्थ संगठनों के माध्यम से मिलने वाली सहायता का उपयोग बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और जनकल्याण के कार्यों में होता है। उनका कहना था कि कुछ संस्थाओं की गलतियों के आधार पर सभी संस्थानों और दानदाताओं पर संदेह करना उचित नहीं है।

    उन्होंने कहा कि मौजूदा स्वरूप में उनकी पार्टी इस विधेयक का समर्थन नहीं कर सकती और इसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने की मांग करेगी। वहीं परिसीमन विधेयक पर समर्थन के सवाल पर उन्होंने कहा कि जब तक राजनीतिक दलों को विधेयक का प्रारूप उपलब्ध नहीं कराया जाता, तब तक कोई अंतिम निर्णय लेना संभव नहीं है।

    डीएमके भी FCRA विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने की मांग कर रही है। सूत्रों के मुताबिक, तमिलनाडु में कांग्रेस से दूरी बढ़ने के बाद डीएमके इस मुद्दे पर अपनी अलग राजनीतिक लाइन तैयार कर रही है। डीएमके के एक वरिष्ठ नेता ने आरोप लगाया कि मौजूदा स्वरूप में यह विधेयक अल्पसंख्यक संस्थानों, शैक्षणिक संगठनों और गैर सरकारी संगठनों पर दबाव बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। उनका कहना था कि विधेयक में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे सरकार को FCRA के तहत धन प्राप्त करने वाले संस्थानों की संपत्तियों पर कार्रवाई करने का अधिकार मिल सकता है, जिसमें पहले से खरीदी गई संपत्तियां भी शामिल हो सकती हैं।

    डीएमके नेता ने सवाल उठाया कि वर्षों पहले खरीदी गई संपत्तियों पर बाद में कार्रवाई करने का अधिकार देना कितना उचित होगा। उन्होंने कहा कि गैर सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यदि सुधार की जरूरत है तो नियमों में बदलाव किए जा सकते हैं, लेकिन ऐसा प्रावधान नहीं होना चाहिए जिससे सभी संस्थानों को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया जाए।

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि डीएमके और वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियां FCRA विधेयक का विरोध करती हैं और दूसरी ओर परिसीमन विधेयक पर भाजपा का समर्थन करती हैं तो उनके सामने राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती होगी। सूत्रों के अनुसार, इन दलों में इस मुद्दे पर गंभीर मंथन चल रहा है। वहीं विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक ने संसद में FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा कि कांग्रेस कई कारणों से इस विधेयक का विरोध करेगी।

    केरल से जुड़े कांग्रेस नेताओं ने भी आशंका जताई है कि प्रस्तावित संशोधनों का असर राज्य के गैर सरकारी संगठनों और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ सकता है। विपक्ष का कहना है कि पिछली तारीख से संपत्तियों पर कार्रवाई करने की संभावित शक्ति और अधिकारियों को व्यापक अधिकार देना चिंता का विषय है। एक वरिष्ठ सीपीएम नेता ने दावा किया कि प्रस्तावित FCRA संशोधन के तहत अधिकारियों को मिलने वाली शक्तियां वक्फ संशोधन कानून में दिए गए अधिकारों से भी अधिक व्यापक हो सकती हैं।

    गौरतलब है कि इससे पहले महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को विपक्षी एकजुटता के कारण संसद में चुनौती का सामना करना पड़ा था। हालांकि पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी मतभेद सामने आए हैं। वहीं एनसीपी के नए राजनीतिक समीकरण और ‘ऑपरेशन टाइगर’ की सफलता के बाद NDA का संख्या बल मजबूत हुआ है।

    ऐसे में भाजपा आने वाले छह महीने से कम समय में परिसीमन विधेयक को आगे बढ़ाने की कोशिश कर सकती है। राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अब इस विधेयक के पारित होने की संभावना पहले की तुलना में अधिक दिखाई दे रही है, लेकिन FCRA संशोधन विधेयक पर सहयोगी दलों और विपक्ष की नाराजगी सरकार के लिए नई चुनौती बन सकती है।

  • परिसीमन बिल पर सरकार को एक विपक्षी दल का मिल सकता है साथ, द्रमुक का बदल रहा मूड

    परिसीमन बिल पर सरकार को एक विपक्षी दल का मिल सकता है साथ, द्रमुक का बदल रहा मूड


    नई दिल्ली।
    तमिलनाडु (Tamil Nadu) में बदली राजनीतिक परिस्थितियों के बाद केंद्र के परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) पर द्रमुक के रुख में भी बदलाव दिख रहा है। राज्य में चुनाव से पहले इस बिल का खुला विरोध कर रही द्रमुक अब कह रही है कि विधेयक के प्रावधानों को देखने के बाद इसके समर्थन करने या नहीं करने का फैसला लिया जाएगा।

    सूत्रों का कहना है उसके इस रुख का मतलब है कि यदि बिल में यह प्रावधान होता है कि राज्यों में विधानसभा की मौजूदा सीटों की संख्या में समान रूप से 50% की वृद्धि होगी तो द्रमुक समर्थन देने के लिए तैयार हो सकती है। अप्रैल में जो बिल सरकार ने पेश किया था, तब ऐसी बात कही गई थी लेकिन यह विधेयक में नहीं थी। वह विधेयक पारित नहीं हो पाया था।


    पहले विरोध में थी DMK

    सरकार पिछले सत्र में जब यह बिल लाई थी तो द्रमुक ने इसका खुलकर विरोध किया था और इसे तमिलनाडु के हितों के खिलाफ बताया था। तब विधेयक के प्रावधानों की बात पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। सूत्रों का कहना है कि द्रमुक के दबाव में ही तब इंडिया गठबंधन ने इस विधेयक का विरोध किया था। तब सरकार को भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण देने वाली कांग्रेस इस विधेयक का विरोध करेगी। द्रमुक के वरिष्ठ नेता त्रिरुचि शिवा ने कहा कि जो रुख पहले था, वह अब नहीं है। अब हम कह रहे हैं कि पहले विधेयक का प्रारूप सामने हो, उसके बाद निर्णय करेंगे।

    द्रमुक के लोकसभा में 22 सदस्य हैं जो सरकार को दो तिहाई बहुमत से इस विधेयक को पारित कराने में अहम साबित हो सकते हैं। इस बिल को पारित करने के लिए सरकार को लोकसभा में 360 सांसदों का समर्थन चाहिए। अभी तक एनडीए के पास 326 तक की संख्या हुई है। बता दें कि इससे पूर्व कांग्रेस के टीवीके सरकार को समर्थन देने के मुद्दे पर नाराज द्रमुक इंडिया गठबंधन से अलग हो चुका है। ऐसे में सत्ता पक्ष की उम्मीदें उससे बढ़ी हैं।


    विशेष सत्र बुलाने का प्रस्ताव नहीं

    संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने बुधवार रात कहा कि महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों को लेकर 16 से 18 अगस्त के बीच संसद का विशेष सत्र बुलाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। सरकार मौजूदा मॉनसून सत्र में संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने की नए सिरे से कोशिश कर रही है। इस विधेयक का मकसद 2029 में लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना और लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करना है।

    कुछ राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि स्वतंत्रता दिवस के बाद संसद का विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन विधेयक और महिला आरक्षण संशोधन विधेयक फिर से पेश किए जा सकते हैं। इस बारे में पूछे जाने पर रीजीजू ने विशेष सत्र के किसी भी प्रस्ताव से इनकार किया।

  • E20 पर सरकार का जवाब, इथेनॉल मिश्रण ने बचाए उपभोक्ताओं के हजारों करोड़, पेट्रोल 125 रुपये लीटर तक जाने से रुका

    E20 पर सरकार का जवाब, इथेनॉल मिश्रण ने बचाए उपभोक्ताओं के हजारों करोड़, पेट्रोल 125 रुपये लीटर तक जाने से रुका


    नई दिल्ली। इथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा दावा किया है। सरकार का कहना है कि यदि देश में इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम लागू नहीं किया गया होता तो पश्चिम एशिया में ईरान संकट के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ता और दिल्ली में पेट्रोल की कीमत करीब 125 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती थी। सरकार के अनुसार E20 नीति ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की महंगाई का प्रभाव काफी हद तक कम करने में मदद की है।

    पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाली E20 नीति का उद्देश्य केवल वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना नहीं है बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करना भी है। मंत्रालय का कहना है कि वैश्विक बाजार में जब कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं तब इथेनॉल मिश्रण की वजह से पेट्रोल की लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिली और उपभोक्ताओं को संभावित भारी मूल्य वृद्धि से राहत मिली।

    सरकार ने उन दावों को भी खारिज किया है जिनमें कहा जा रहा था कि E20 पेट्रोल पुराने वाहनों के लिए नुकसानदायक है या इससे बड़ी संख्या में वाहन अनुपयोगी हो जाएंगे। मंत्रालय के अनुसार E20 को लागू करने से पहले विभिन्न ऑटोमोबाइल कंपनियों और तकनीकी संस्थानों द्वारा व्यापक परीक्षण किए गए थे। सरकार का कहना है कि यह ईंधन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और कई देशों में लंबे समय से उपयोग किया जा रहा है।

    मंत्रालय के मुताबिक इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का एक बड़ा फायदा विदेशी मुद्रा की बचत भी है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार चढ़ाव का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में इथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोल में आयातित ईंधन की हिस्सेदारी कम होती है जिससे आयात बिल घटाने और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिलती है।

    हालांकि E20 को लेकर कुछ वाहन मालिकों और विशेषज्ञों ने माइलेज तथा पुराने इंजनों पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल भी उठाए हैं। सरकार का कहना है कि E20 अनुकूल वाहनों में माइलेज पर प्रभाव सीमित है और यह वाहन की तकनीक रखरखाव तथा ड्राइविंग परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। मंत्रालय ने लोगों से अपील की है कि अपुष्ट दावों और भ्रामक सूचनाओं के बजाय आधिकारिक तकनीकी जानकारी पर भरोसा करें।

    सरकार का मानना है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम केवल ईंधन लागत नियंत्रित करने तक सीमित नहीं है बल्कि इससे किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध होता है पर्यावरणीय दृष्टि से कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है और देश की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होती है। इसी कारण केंद्र सरकार आने वाले समय में भी इथेनॉल आधारित ईंधन नीति को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।

  • E20 पेट्रोल से खराब हो जाएंगे इन गाड़ियों के कल-पुर्जे…. सरकार ने संसद में दी बड़ी जानकारी

    E20 पेट्रोल से खराब हो जाएंगे इन गाड़ियों के कल-पुर्जे…. सरकार ने संसद में दी बड़ी जानकारी


    नई दिल्ली।
    E20 पर जारी बहस के बीच केंद्र ने इस मुद्दे पर संसद (Parliament) में बड़ी जानकारी दी है। सरकार ने बुधवार को कहा कि एक अप्रैल, 2005 से पेश की गई और वर्ष 2016 से पहले बनी बीएस-थ्री (BS-III) गाड़ियों को ई-20 ईंधन से चलाने पर उसके कुछ रबर पुर्जे बदलने की जरूरत पड़ सकती है।

    राज्यसभा (Rajya Sabha) में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने जवाब दिया। उन्होंने कहा कि ई-20 ईंधन (E-20 fuel) के इस्तेमाल से गाड़ियों के ‘माइलेज’ पर पड़ने वाले असर को लेकर जताई गई चिंता के बारे में ऑटोमोबाइल कंपनियों और गाड़ियों व इंजन की जांच करने वाली एजेंसियों ने साफ किया है कि गाड़ी का माइलेज सिर्फ ईंधन के प्रकार के अलावा कई अन्य कारकों से भी प्रभावित होता है।


    सरकार ने बताया- स्टडी की गई थी

    गडकरी ने कहा कि दो-पहिया और चार-पहिया गाड़ियों पर ई-20 के असर का पता लगाने के लिए इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (IIP) देहरादून, सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) ने मिलकर एक अध्ययन किया था।


    इंजन में बदलाव की जरूरत नहीं

    उन्होंने कहा कि अध्ययन में कार और दो-पहिया गाड़ियों के इंजन में कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं पाई गई। उनके अनुसार, इन अध्ययनों से पुष्टि हुई कि पुरानी गाड़ियों के प्रदर्शन में भी कोई खास अंतर नहीं आया और न ही ई-20 इंधन के साथ चलाने पर उनमें कोई असामान्य टूट-फूट देखी गई।

    मंत्री ने कहा कि गाड़ी चलाने में आसानी, स्टार्ट होने की क्षमता (स्टार्टबिलिटी), मेटल के साथ तालमेल (मेटल कम्पैटिबिलिटी) और प्लास्टिक के साथ तालमेल (प्लास्टिक कम्पैटिबिलिटी) जैसे पैमानों पर कोई समस्या नहीं देखी गई।


    इन गाड़ियों में बदलने पड़ सकते हैं रबर पार्ट्स

    उन्होंने कहा, ‘सिर्फ एक अप्रैल, 2005 से पेश की गई और वर्ष 2016 से पहले बनी बीएस-थ्री गाड़ियों के परीक्षण के मामले में, रबर के कुछ पुर्जे और गास्केट को बदलने की जरूरत पड़ सकती है, जिसे गाड़ी की नियमित होने वाली सर्विसिंग के दौरान आसानी से ठीक किया जा सकता है।’


    कंपनियां वारंटी क्लेम देती रहेंगी

    गाड़ी चलाने, स्टार्ट होने की क्षमता, मेटल और प्लास्टिक के साथ तालमेल जैसे पैमानों पर कोई समस्या नहीं देखी गई। साथ ही ऑटोमोबाइल कंपनियों ने कहा है कि वे ई-20 ईंधन का इस्तेमाल करने वाली गाड़ियों के लिए वारंटी क्लेम देती रहेंगी।

    खास बात है कि ये घटनाक्रम ऐसे समय पर हुआ है, जब आने वाले दिनों में करीब 3 बड़े आयोजन ई20 के खिलाफ होने जा रहे हैं। वहीं, आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ई-20 पेट्रोल 2023 से पहले बनी गाड़ियों के लिए सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने इसके लिए 1 अगस्त को संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया है। जबकि, 4 अगस्त को परिवहन यूनियन संसद तक मार्च की तैयारी में हैं।

  • MP सरकार का बड़ा फैसला: किसानों से 60% मूंग खरीदेगी सरकार, खाद की ई-टोकन व्यवस्था फिलहाल स्थगित

    MP सरकार का बड़ा फैसला: किसानों से 60% मूंग खरीदेगी सरकार, खाद की ई-टोकन व्यवस्था फिलहाल स्थगित


    भोपाल।
    मध्य प्रदेश सरकार ने किसानों के हित में ग्रीष्मकालीन मूंग उपार्जन और खाद वितरण व्यवस्था को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। किसान प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक के बाद सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी जाने वाली मूंग की मात्रा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का निर्णय लिया है। साथ ही, किसानों की सुविधा के लिए स्लॉट बुकिंग और उपार्जन की समय-सीमा भी बढ़ा दी गई है। वहीं, खाद वितरण के लिए लागू की गई ई-टोकन व्यवस्था को फिलहाल स्थगित कर उसकी समीक्षा कराने का फैसला लिया गया है।

    कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना ने बैठक के बाद बताया कि भारत सरकार की प्राइस सपोर्ट स्कीम (पीएसएस) के तहत कुल उत्पादन का अधिकतम 25 प्रतिशत उपार्जन किए जाने का प्रावधान है। इसी के अनुरूप पहले प्रत्येक पात्र किसान से उसकी उपज का 25 प्रतिशत खरीदने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, किसानों की मांग और व्यावहारिक परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार ने प्रत्येक पात्र किसान से उसकी मूंग उपज का 60 प्रतिशत तक न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदने का निर्णय लिया है।

    उन्होंने बताया कि नर्मदापुरम, हरदा और सीहोर जैसे प्रमुख मूंग उत्पादक जिलों में यह औसतन लगभग तीन क्विंटल प्रति एकड़ के बराबर उपार्जन होगा।

    सरकार ने उपार्जन प्रक्रिया में अधिक से अधिक किसानों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए स्लॉट बुकिंग की अंतिम तिथि 30 जुलाई से बढ़ाकर 10 अगस्त कर दी है। इसी प्रकार, मूंग खरीदी की अंतिम तिथि भी 10 अगस्त के बजाय अब 20 अगस्त निर्धारित की गई है।

    बैठक में किसानों ने खाद वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था से जुड़ी समस्याएं भी उठाईं। इस पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया गया है। समिति ई-टोकन प्रणाली की समीक्षा कर सरकार को अपनी अनुशंसाएं देगी, जिनके आधार पर आवश्यक सुधार किए जाएंगे।

    सरकार ने स्पष्ट किया है कि समिति की रिपोर्ट आने तक खाद वितरण की ई-टोकन व्यवस्था स्थगित रहेगी और किसानों को पूर्व की व्यवस्था के अनुसार खाद उपलब्ध कराया जाएगा।

    बैठक में सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग, पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री कृष्णा गौर सहित संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारी एवं किसान प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

    प्रमुख निर्णय

    • प्रत्येक पात्र किसान से मूंग उपज का 25 प्रतिशत के स्थान पर 60 प्रतिशत तक उपार्जन।
    • निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू।
    • स्लॉट बुकिंग की अंतिम तिथि 30 जुलाई से बढ़ाकर 10 अगस्त।
    • मूंग उपार्जन की अंतिम तिथि 10 अगस्त से बढ़ाकर 20 अगस्त।
    • खाद वितरण की ई-टोकन व्यवस्था फिलहाल स्थगित।
    • कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति करेगी ई-टोकन प्रणाली की समीक्षा।
    • समिति की अनुशंसा मिलने तक खाद का वितरण पुरानी व्यवस्था के अनुसार जारी रहेगा।

  • सरकारी अधिकारियों द्वारा वाहनों के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने लागू की 'वन ऑफिसर, वन कार' नीति

    सरकारी अधिकारियों द्वारा वाहनों के दुरुपयोग पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने लागू की 'वन ऑफिसर, वन कार' नीति

    नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने अपने मंत्रालयों और विभिन्न विभागों में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा सरकारी वाहनों के बेजा इस्तेमाल को रोकने के लिए नियमों को बेहद कड़ा कर दिया है। वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग की ओर से जारी नए दिशा-निर्देशों के तहत ‘वन ऑफिसर, वन कार’ यानी एक अधिकारी को केवल एक ही सरकारी वाहन आवंटित करने की नीति को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए गए हैं। इस नए कदम से सरकारी तंत्र में अतिरिक्त गाड़ियों के अनधिकृत उपयोग पर पूरी तरह विराम लगने की उम्मीद है।

    नवीनतम सर्कुलर के अनुसार, सरकारी वाहन की पात्रता रखने वाले किसी भी अधिकारी को एक से अधिक कार आवंटित नहीं की जाएगी। यदि किसी अफसर को अपने मूल पद के साथ किसी अन्य मंत्रालय, विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम या स्वायत्त निकाय का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा जाता है, तब भी वह केवल एक ही आधिकारिक वाहन का उपयोग करने का हकदार होगा। अतिरिक्त दायित्व के आधार पर दूसरी गाड़ी हासिल करने की व्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि केंद्र के अधीन कार्यरत अधिकारी सार्वजनिक उपक्रमों या स्वायत्त संस्थाओं के बेड़े में शामिल वाहनों को अपने दैनिक या नियमित इस्तेमाल के लिए अपने पास नहीं रख सकेंगे। इस तरह की कार्यप्रणाली पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी गई है। हालांकि, अंतर-राज्यीय या विभागीय आधिकारिक दौरों के दौरान आवश्यकता पड़ने पर अधिकारियों को इन संस्थाओं के वाहनों का उपयोग करने की विशेष छूट दी जाएगी, ताकि शासकीय कार्यों में कोई बाधा न आए।

    नए परिपत्र में सभी मंत्रालयों और विभागाध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि इस्तेमाल में न आ रहे या अधिशेष वाहनों को तुरंत सुरक्षित कस्टडी में लिया जाए। यह निर्देश पूर्व में जारी उन नियमों को और मजबूती प्रदान करता है, जिनमें अधिकारियों द्वारा तय शुल्क देकर सीमित दायरे में सरकारी गाड़ी के निजी उपयोग की अनुमति दी गई थी। सरकार के इस कड़े रुख से जहां एक तरफ वाहनों के दुरुपयोग पर अंकुश लगेगा, वहीं दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर पड़ने वाले अनावश्यक वित्तीय बोझ में भी बड़ी कमी आएगी।

  • राहुल गांधी का सरकार पर हमला, बोले- धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, घायल छात्र को दिखाकर उठाए पुलिस कार्रवाई पर सवाल

    राहुल गांधी का सरकार पर हमला, बोले- धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, घायल छात्र को दिखाकर उठाए पुलिस कार्रवाई पर सवाल


    नई दिल्ली । लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने शुक्रवार को अपने आवास 10 जनपथ पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नीट पेपर लीक मामले और छात्रों के आंदोलन को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। इस दौरान उन्होंने प्रदर्शन के दौरान घायल हुए एक छात्र को मीडिया के सामने पेश किया और उसकी चोटें दिखाते हुए पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए।

    राहुल गांधी ने कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था की स्थिति के लिए मंत्री जिम्मेदार हैं और इसी कारण हजारों छात्र सड़कों पर उतरने को मजबूर हुए हैं।

    घायल छात्र की चोटें दिखाईं
    प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने छात्र के हाथ, पीठ और छाती पर लगी चोटों की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह शांतिपूर्ण तरीके से तिरंगा लेकर प्रदर्शन कर रहा था, तभी पैलेट गन से घायल हो गया।

    20 जुलाई की झड़प का मामला
    गौरतलब है कि 20 जुलाई को नीट पेपर लीक के विरोध में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा निकाले गए संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हुई थी। इस घटना में 100 से अधिक छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए थे।

    छात्र की आंख की रोशनी पर संकट
    राहुल गांधी के साथ मौजूद छात्र की पहचान साहिल लोचाब (19) के रूप में हुई, जो दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के नजफगढ़ का निवासी है। परिवार के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पैलेट लगने से उसकी दाहिनी आंख गंभीर रूप से घायल हो गई। उसका उपचार एम्स के जयप्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में हुआ, जहां सर्जरी भी की गई। परिजनों का कहना है कि डॉक्टरों ने बताया है कि घायल आंख की रोशनी लौटने की संभावना करीब एक प्रतिशत ही है, क्योंकि आंख की पुतली को गंभीर क्षति पहुंची है।

    पुलिस अधिकारी बनने का था सपना
    साहिल दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) का छात्र है। उसकी मां ज्योति ने बताया कि वह पहले भी CJP के प्रदर्शनों में शामिल हो चुका था। 20 जुलाई को भी वह यह कहकर घर से निकला था कि यह उसकी पढ़ाई और भविष्य से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने बताया कि साहिल का सपना पुलिस अधिकारी बनने का था।

  • सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक

    सरकार और CJP के बीच नहीं बनी सहमति, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जारी, कल होगी अगली बैठक


    नई दिल्ली। नीट पेपर लीक मामले को लेकर पिछले तीन सप्ताह से आंदोलन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और केंद्र सरकार के बीच शुक्रवार को हुई दूसरे दौर की वार्ता किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। हालांकि CJP का दावा है कि सरकार ने उनकी तीन प्रमुख मांगों में से दो पर सकारात्मक रुख दिखाया है, लेकिन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर सहमति नहीं बन पाई। इस मुद्दे पर सरकार ने शनिवार तक का समय मांगा है। अब दोनों पक्षों के बीच अगली बैठक शनिवार दोपहर करीब 12 बजे होगी।

    करीब 50 मिनट चली बैठक
    दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में हुई बैठक लगभग 50 मिनट तक चली। CJP की ओर से प्रवक्ता सौरभ दास और आशुतोष रंका मौजूद रहे, जबकि सरकार का प्रतिनिधित्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने किया।

    इस्तीफे की मांग पर कायम CJP
    बैठक के बाद CJP प्रवक्ता सौरभ दास ने बताया कि मंत्रियों के साथ हुई चर्चा में सरकार उनकी तीन मांगों में से दो पर सकारात्मक नजर आई। उन्होंने कहा कि NEET की तैयारी के दौरान आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवजा देने और आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने के मुद्दे पर सरकार का रुख सकारात्मक रहा। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर संगठन किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।

    दो मांगों पर मिली सैद्धांतिक सहमति
    CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका ने कहा कि सरकार ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से जुड़े मुद्दे पर फैसला लेने के लिए शनिवार दोपहर तक का समय मांगा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सरकार जल्द इस पर निर्णय लेगी। रंका के मुताबिक, सरकार ने दो मांगों पर सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इनमें आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिजनों को मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर व अन्य कानूनी कार्रवाई वापस लेने का प्रस्ताव शामिल है।

    20 जुलाई को भी हुई थी बातचीत
    इससे पहले 20 जुलाई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री के सरकारी आवास पर CJP प्रतिनिधियों और सरकार के बीच दो दौर की बैठक हुई थी, जिसमें भी सौरभ दास और आशुतोष रंका शामिल हुए थे। इसी बीच सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सरकार की ओर से प्रमुख मांगों पर आश्वासन मिलने के बाद 26 दिनों से जारी अपना अनशन समाप्त कर दिया था। इसके बाद शुक्रवार को कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के विठ्ठलभाई पटेल हाउस में दोनों पक्षों के बीच यह नई बैठक आयोजित की गई।

    आंदोलन जारी रखने का ऐलान
    CJP ने पहले ही सरकार के मंत्रियों के आवास या कार्यालय में वार्ता करने से इनकार कर दिया था और किसी तटस्थ स्थान पर बातचीत की मांग की थी। संगठन का कहना है कि जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन तब तक जारी रहेगा, जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते।

    संगठन की प्रमुख मांगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जवाबदेही तय करना, शिक्षा व्यवस्था में सुधार, NEET पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवजा तथा आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर और कानूनी कार्रवाई वापस लेना शामिल है।