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  • माइकल वॉन ने टी20 वर्ल्ड कप 2026 की सबसे बड़ी चूक का किया खुलासा, कहा- साउथ अफ्रीका ने भारत को बाहर करने का मौका गंवाया

    माइकल वॉन ने टी20 वर्ल्ड कप 2026 की सबसे बड़ी चूक का किया खुलासा, कहा- साउथ अफ्रीका ने भारत को बाहर करने का मौका गंवाया


    नई दिल्ली। टी20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत ने इतिहास रचते हुए लगातार तीसरी बार खिताब अपने नाम किया। सूर्यकुमार यादव की कप्तानी में टीम इंडिया ने फाइनल में न्यूजीलैंड को 96 रनों से हराकर ट्रॉफी पर कब्जा जमाया। इस जीत के साथ भारत बैक-टू-बैक दो और कुल तीन टी20 वर्ल्ड कप जीतने वाला पहला देश बन गया। हालांकि टूर्नामेंट में भारत को एकमात्र हार सुपर-8 में साउथ अफ्रीका के खिलाफ झेलनी पड़ी थी।

    इंग्लैंड के पूर्व कप्तान और मौजूदा क्रिकेट एक्सपर्ट माइकल वॉन ने इस हार और टूर्नामेंट के दौरान साउथ अफ्रीका की रणनीति पर अपनी राय रखी। वॉन ने साउथ अफ्रीका को टी20 वर्ल्ड कप 2026 की “सबसे बेवकूफ टीम” करार दिया। उनका कहना है कि सुपर-8 में भारत को हराने के बाद साउथ अफ्रीका के पास भारत को टूर्नामेंट से बाहर करने का सुनहरा मौका था, लेकिन उन्होंने इसे गंवा दिया।

    माइकल वॉन ने ‘Stick to Cricket’ पॉडकास्ट में बताया कि साउथ अफ्रीका ने वेस्टइंडीज को सुपर-8 में हराने नहीं दिया, जबकि अगर ऐसा होता तो भारत की सेमीफाइनल की राह मुश्किल हो जाती। वॉन ने कहा, “अगर साउथ अफ्रीका ने वेस्टइंडीज को रास्ता दे दिया होता, तो भारत बाहर हो जाता और उनका विजय रथ रुक जाता। उन्होंने अपने कुछ खिलाड़ियों को आराम भी दिया, जिससे भारत का रास्ता आसान हो गया।”

    साउथ अफ्रीका की यह चूक भारत के लिए सौभाग्य साबित हुई। भारत ने इसके बाद लगातार जीत दर्ज की और जिम्बाब्वे, वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड को हराकर फाइनल में पहुंचा। इस प्रदर्शन के दम पर टीम इंडिया ने टी20 वर्ल्ड कप 2026 की ट्रॉफी जीतकर अपने अभियान को यादगार बना दिया।

    वॉन की टिप्पणी ने यह स्पष्ट कर दिया कि क्रिकेट में मौके गंवाना भारी पड़ सकता है, और किसी भी मजबूत टीम को शुरुआती दौर में कमजोर करना रणनीतिक तौर पर कितना अहम हो सकता है। इस बार भारत के लिए साउथ अफ्रीका की चूक ही जीत का बड़ा कारण रही।

  • देश की खुदरा महंगाई दर फरवरी में बढ़कर 3.2 फीसदी के स्तर पर आई

    देश की खुदरा महंगाई दर फरवरी में बढ़कर 3.2 फीसदी के स्तर पर आई


    नई दिल्ली।
    फरवरी महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.21 फीसदी पर पहुंच गई है, जबकि जनवरी महीने में यह 2.74 फीसदी के स्तर पर रही थी। महंगाई के यह आंकड़े आधार वर्ष 2024 वाली नई श्रृंखला पर आधारित हैं।फरवरी महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.21 फीसदी पर पहुंच गई है, जबकि जनवरी महीने में यह 2.74 फीसदी के स्तर पर रही थी। महंगाई के यह आंकड़े आधार वर्ष 2024 वाली नई श्रृंखला पर आधारित हैं।

    सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने गुरुवार को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की ओर से जारी आंकड़ों में बताया कि खुदरा महंगाई दर में यह वृद्धि मुख्य रूप से खाद्य, पेय पदार्थ, और ईंधन की कीमतों में तेजी के कारण आई है, जो 2024 आधार वर्ष वाली नई श्रृंखला के तहत दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार फरवरी में ग्रामीण इलाकों में खुदरा महंगाई दर 3.37 फीसदी रही है, जो कि जनवरी महीने में 2.73 फीसदी थी। शहरी इलाकों में फरवरी में खुदरा महंगाई दर 3.02 फीसदी रही, जो कि शहरी इलाकों में 2.75 फीसदी रही थी।

    एनएसओ के मुताबिक खाद्य महंगाई दर फरवरी में 3.47 फीसदी रही है। इस दौरान ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई दर 3.46 फीसदी और शहरी इलाकों में 3.48 फीसदी रही है। मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों (सब्जियों, मांस, मछली, अंडे) की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण महंगाई में यह उछाल आया है। यह दर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की 2-6 फीसदी की लक्षित सीमा के भीतर है।

  • सरकार ने एलपीजी सप्लाई पर दी अपडेट: 60% आयात, 90% होर्मुज स्ट्रेट से रोजाना 50 लाख सिलेंडर डिलीवर, पैनिक बुकिंग से बचें

    सरकार ने एलपीजी सप्लाई पर दी अपडेट: 60% आयात, 90% होर्मुज स्ट्रेट से रोजाना 50 लाख सिलेंडर डिलीवर, पैनिक बुकिंग से बचें



    नई दिल्ली। भारत सरकार ने गुरुवार को देश में गैस और कच्चे तेल की स्थिति को लेकर जॉइंट प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरी जानकारी दी। सरकार ने कहा कि देश अपनी जरूरत का लगभग 60% एलपीजी आयात करता है, जिसमें से लगभग 90% सप्लाई स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आती है। मंत्रालयों ने जोर देकर कहा कि हालात चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन रोजाना करीब 50 लाख एलपीजी सिलेंडर की डिलीवरी हो रही है और पैनिक बुकिंग की वजह से सिलेंडर बुकिंग में असामान्य बढ़ोतरी देखी गई है।

    पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा ने बताया कि देश में पेट्रोल-डीजल और एलपीजी की उपलब्धता संतोषजनक है। भारत रोजाना करीब 55 लाख बैरल कच्चे तेल का उपयोग करता है और दुनिया के चौथे सबसे बड़े रिफाइनर होने के कारण ईंधन की आपूर्ति स्थिर है। 9 मार्च को जारी आदेश के तहत सभी रिफाइनरियों ने एलपीजी उत्पादन बढ़ाया है, घरेलू उत्पादन 25% से बढ़कर 28% हो गया है। देशभर में लगभग 1 लाख रिटेल आउटलेट काम कर रहे हैं, जहां कहीं भी ईंधन की कमी नहीं है।

    शिपिंग मंत्रालय ने बताया कि फारस की खाड़ी में भारत के 28 जहाज मौजूद हैं, जिनमें 778 भारतीय नाविक सवार हैं। इनमें से 677 पश्चिमी होर्मुज स्ट्रेट में और 101 पूर्वी हिस्से में तैनात हैं। हाल ही में विदेशी झंडे वाले कुछ जहाजों पर हादसे हुए, जिसमें तीन भारतीय नाविकों की मौत हुई, चार घायल और एक लापता है। सरकार सभी जहाजों और क्रू की सुरक्षा पर निगरानी रख रही है।

    विदेश मंत्रालय ने कहा कि ईरान में फंसे भारतीय नागरिकों की मदद के लिए भारतीय दूतावास सक्रिय है। भारतीयों को आर्मेनिया और अजरबैजान के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाला जा रहा है। दूतावास वीजा सुविधा के साथ अंतरराष्ट्रीय भूमि सीमा पार करने में भी मदद कर रहा है।

    सरकार ने सप्लाई संकट के दो मुख्य कारण बताए हैं। पहला, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का असुरक्षित होना, जो 167 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है और ईरान-जंग के कारण बंद हो गया। दुनिया के कुल पेट्रोलियम का लगभग 20% इसी रूट से गुजरता है। भारत अपनी जरूरत का 50% कच्चा तेल और 54% LNG इसी रास्ते से आयात करता है। दूसरा, कतर में LNG प्लांट पर ड्रोन हमले के बाद प्रोडक्शन रुका, जिससे भारत को गैस की सप्लाई घट गई। भारत अपनी जरूरत का करीब 40% LNG कतर से आयात करता है।

    इंडियन ऑयल के मुख्य महाप्रबंधक (LPG) के.एम. ठाकुर ने कहा कि ग्राहकों को घबराने की जरूरत नहीं है और पैनिक बुकिंग न करें। सरकार वैकल्पिक कार्गो आयात पर विचार कर रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर G7 देश इमरजेंसी तेल भंडार से सप्लाई जारी करने की योजना बना रहे हैं। रूस और अल्जीरिया से भी अतिरिक्त कच्चा तेल आने की उम्मीद है।

    सरकार ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि घरेलू और कमर्शियल सिलेंडर की प्राथमिकता के आधार पर जरूरतमंदों को सप्लाई सुनिश्चित करें।

    मुख्य बातें:

    भारत अपनी जरूरत का 60% LPG आयात करता है, 90% होर्मुज स्ट्रेट से आता है।

    रोजाना 50 लाख सिलेंडर डिलीवरी, पैनिक बुकिंग से बचें।

    एलपीजी उत्पादन बढ़कर 28% हुआ।

    ईंधन सप्लाई सुरक्षित, देशभर के पेट्रोल पंप सामान्य काम कर रहे हैं।

    ईरान में भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए दूतावास मदद कर रहा है।

    सप्लाई संकट: होर्मुज स्ट्रेट असुरक्षित, कतर में LNG प्रोडक्शन रुका।

    वैकल्पिक आयात और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संकट कम करने की कोशिशें।

  • हार्दिक पंड्या पर तिरंगे के अपमान का आरोप, टी-20 वर्ल्ड कप जश्न में वायरल वीडियो के आधार पर शिकायत दर्ज

    हार्दिक पंड्या पर तिरंगे के अपमान का आरोप, टी-20 वर्ल्ड कप जश्न में वायरल वीडियो के आधार पर शिकायत दर्ज



    नई दिल्ली। टी-20 वर्ल्ड कप 2026 में भारत की जीत के जश्न के दौरान क्रिकेटर हार्दिक पंड्या पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का आरोप लगाते हुए बेंगलुरु में शिकायत दर्ज कराई गई है। पुणे के वकील वाजिद खान बिडकर ने यह शिकायत शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन में दी। शिकायत में कहा गया है कि अहमदाबाद में भारत की जीत के मौके पर पंड्या ने अपनी गर्लफ्रेंड के साथ मंच पर लेटते हुए तिरंगा ओढ़ा था, जो राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा के खिलाफ है।

    शिकायतकर्ता के अनुसार, मैदान पर जश्न मनाते हुए वायरल हुए वीडियो में पंड्या अपने कंधे पर तिरंगा ओढ़कर दौड़ते और नाचते दिखाई दे रहे हैं। वाजिद खान का आरोप है कि जश्न के दौरान पंड्या ने तिरंगे का सम्मान नहीं किया और इस कारण यह ‘द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971’ की धारा 2 के तहत अपराध बनता है। इस कानून के तहत राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा बनाए रखना अनिवार्य है और तिरंगे को जमीन पर गिराने या अनुचित तरीके से पहनने पर दंडनीय कार्रवाई की जा सकती है।

    प्रारंभ में पुलिस ने कहा कि घटना अहमदाबाद में हुई थी, इसलिए मामला वहीं दर्ज होना चाहिए, लेकिन वकील ने तर्क दिया कि तिरंगा पूरे देश का राष्ट्रीय प्रतीक है, इसलिए शिकायत कहीं भी दर्ज की जा सकती है। बाद में पुलिस ने उनकी शिकायत स्वीकार कर ली और उसकी कॉपी उन्हें प्रदान की।

    टी-20 वर्ल्ड कप फाइनल में भारत ने न्यूजीलैंड को 96 रन से हराकर ट्रॉफी अपने नाम की। यह भारत का तीसरा टी-20 वर्ल्ड कप खिताब है। इससे पहले भारत ने 2007 और 2024 में भी यह खिताब जीता था। खास बात यह है कि यह पहली बार है जब किसी टीम ने अपने ही देश में टी-20 वर्ल्ड कप जीतकर लगातार दो खिताब अपने नाम किए।

    इस बीच सोशल मीडिया पर पंड्या के वीडियो ने खूब सुर्खियां बटोरीं। खेल प्रेमियों और आलोचकों ने पंड्या की आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान हर भारतीय की जिम्मेदारी है। वहीं, कई समर्थकों ने यह भी कहा कि जश्न के दौरान भावनाओं में गलती हो सकती है, लेकिन कानून का पालन करना सभी के लिए जरूरी है।

    पंड्या और उनके एजेंट की तरफ से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। पुलिस ने कहा कि शिकायत दर्ज हो गई है और मामले की जांच की जाएगी। जांच में यह देखा जाएगा कि क्या पंड्या के द्वारा तिरंगे की गरिमा के साथ किसी प्रकार का उल्लंघन हुआ है या नहीं।

    विशेषज्ञों के अनुसार, ‘द प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971’ का उद्देश्य केवल दिखावे या अनजाने में किए गए उल्लंघन को नहीं, बल्कि जानबूझकर राष्ट्रीय प्रतीक का अपमान करने वाले कार्यों को रोकना है।

    इस पूरे मामले ने एक बार फिर खेल और राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संवेदनशीलता पर बहस छेड़ दी है। इस घटना के बाद यह सवाल उठ रहा है कि खेल के जश्न और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

  • ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच भारत-ईरान बातचीत: जहाजों की अनुमति पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं, ऊर्जा और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे

    ईरान-इजराइल संघर्ष के बीच भारत-ईरान बातचीत: जहाजों की अनुमति पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं, ऊर्जा और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे

    नई दिल्ली। अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष का आज 13वां दिन है। मध्य-पूर्व में युद्ध और तनाव के बीच भारत और ईरान के विदेश मंत्रियों ने पिछले कुछ दिनों में तीन बार बातचीत की है। यह जानकारी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी।

    जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान ने भारत जाने वाले जहाजों को अनुमति दी है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि फिलहाल इस विषय पर अधिक जानकारी देना जल्दबाजी होगी। हाल की बातचीत में समुद्री शिपिंग की सुरक्षा और भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।

    विदेश मंत्रालय ने यह भी बताया कि भारत ने ईरान के दिवंगत नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को औपचारिक श्रद्धांजलि दी थी। विदेश सचिव ने 5 मार्च को ईरानी दूतावास में जाकर शोक-पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए। मंत्रालय ने कहा कि यह औपचारिकता पहले दिन पूरी कर दी गई और बिना तथ्यात्मक जानकारी के टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।

    उधर, रूस ने अमेरिका और इजराइल से ईरान पर हमले रोकने और बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने कहा कि पूरे क्षेत्र में मानवीय स्थिति बेहद कठिन होती जा रही है और लगातार बढ़ता तनाव गंभीर चिंता का विषय है। रूस की अपील है कि दोनों पक्ष वार्ता के रास्ते पर लौटें और संघर्ष को रोकें।

    संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी UNHCR ने भी चेताया है कि इस संघर्ष के कारण अब तक करीब 32 लाख लोग ईरान में विस्थापित हो चुके हैं। यह आंकड़ा देशभर में शुरुआती आकलन पर आधारित है। एजेंसी ने कहा कि अगर संघर्ष जारी रहा, तो विस्थापित लोगों की संख्या और बढ़ सकती है, जिससे मानवीय संकट और गहरा जाएगा।

    ईरान ने भी स्पष्ट चेतावनी दी है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ ने कहा कि यदि ईरान के किसी भी द्वीप पर हमला किया गया, तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि फारस की खाड़ी में हमलावरों के खिलाफ पूरी ताकत से जवाब देने में किसी प्रकार की सीमा नहीं मानी जाएगी।

    इस बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत ने GCC (गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल) के प्रस्ताव का समर्थन किया। इस प्रस्ताव का मकसद खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव और हमलों को रोकना, जहाजों की आवाजाही सुरक्षित बनाना और ऊर्जा सप्लाई में बाधा से बचाना है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि ईरान के हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं और इससे वैश्विक शांति को गंभीर खतरा है। प्रस्ताव को 135 देशों ने समर्थन दिया। सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से 13 ने पक्ष में वोट किया, जबकि रूस और चीन ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।

    विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत लगातार ईरान के साथ संपर्क बनाए हुए है। युद्ध का असर केवल एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर के कई देशों और उनके नागरिकों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की प्राथमिकता है कि भारतीय नागरिकों और ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो।

    जायसवाल ने बताया कि बातचीत के दौरान समुद्री शिपिंग सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति जैसे प्रमुख मुद्दों पर फोकस किया गया। हालांकि, अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ कि ईरान ने भारतीय जहाजों को आवाजाही की अनुमति दी है या नहीं। मंत्रालय ने कहा कि इस विषय पर जल्दबाजी में कोई घोषणा करना सही नहीं होगा।

    विदेश मंत्रालय का यह भी कहना है कि युद्ध और तनाव के बीच सभी पक्षों को शांति बनाए रखने और कूटनीतिक बातचीत के रास्ते अपनाने की आवश्यकता है। भारत ने इस संघर्ष के दौरान हर कदम पर सावधानी और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा है और आगे भी स्थिति पर करीबी नजर रखेगा।

  • अमेरिका भारत पर फिर से टैरिफ लगाने की तैयारी में, 16 ट्रेडिंग पार्टनर्स की सेक्शन 301 जांच शुरू

    अमेरिका भारत पर फिर से टैरिफ लगाने की तैयारी में, 16 ट्रेडिंग पार्टनर्स की सेक्शन 301 जांच शुरू


    नई दिल्ली। अमेरिकी ट्रम्प प्रशासन ने भारत और चीन सहित 16 प्रमुख ट्रेडिंग पार्टनर्स के खिलाफ नई जांच शुरू कर दी है। यह कार्रवाई ‘सेक्शन 301’ के तहत की जा रही है, जो अमेरिकी ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 का हिस्सा है और अमेरिका को उन देशों पर एकतरफा टैरिफ या प्रतिबंध लगाने की शक्ति देती है, जो अमेरिकी कंपनियों और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नुकसान पहुंचा रहे हों।

    इस कदम के पीछे पिछली घटनाओं का संदर्भ है। फरवरी में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को अवैध करार दिया था। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने 150 दिनों के लिए 10% का अस्थायी टैरिफ लागू किया। अब नई जांच के माध्यम से प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि टैरिफ का दबाव जारी रहे और ट्रेडिंग पार्टनर्स को बातचीत की मेज पर लाया जा सके।

    यूएस ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने बताया कि यह जांच भारत, चीन, यूरोपीय संघ (EU), जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, वियतनाम, ताइवान, थाईलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे पर केंद्रित है। अगर जांच में इन देशों की नीतियां अनुचित व्यापार व्यवहार के तहत पाई गईं, तो उन पर भारी टैरिफ लगाया जा सकता है।

    जांच का मुख्य फोकस उन देशों पर है, जो जरूरत से अधिक उत्पादन कर अमेरिकी बाजार में सस्ते दाम पर माल बेचते हैं, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी देश में जूतों की फैक्ट्री सालाना 100 जूते बना सकती है, लेकिन घरेलू मांग केवल 20 जूते की है, तो शेष 80 जूते सस्ते दाम पर अमेरिका में भेज दिए जाते हैं। अमेरिका इसे मार्केट डंपिंग और अनुचित व्यापार व्यवहार मानता है।

    भारत के लिए यह चिंता का विषय है। 2024 में भारत का अमेरिका के साथ गुड्स ट्रेड सरप्लस 58,216 मिलियन डॉलर था, जो 2025 में घटकर 45,801 मिलियन डॉलर रह गया। इस कमी के बावजूद भारत इस जांच की सूची में शामिल है। यदि भारत की नीतियां ‘अनुचित’ पाई गईं, तो भारतीय सामानों पर भारी टैरिफ या प्रतिबंध लग सकते हैं।

    इसके अलावा, अमेरिका फोर्स्ड लेबर पर भी अलग जांच कर रहा है। इसका उद्देश्य है बंधुआ मजदूरी से बने सामानों के आयात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाना। पहले ही उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट के तहत चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सोलर पैनल और अन्य सामानों पर कार्रवाई की जा चुकी है। अब यह कार्रवाई अन्य देशों पर भी लागू हो सकती है।

    जांच की टाइमलाइन भी निर्धारित कर दी गई है। 15 अप्रैल तक आम जनता और कंपनियों से सुझाव मांगे गए हैं, इसके बाद 5 मई के आसपास सार्वजनिक सुनवाई होगी। लक्ष्य है कि जुलाई में अस्थायी टैरिफ खत्म होने से पहले नए टैरिफ प्रस्ताव और जांच के नतीजे तैयार हो जाएं।

    जेमिसन ग्रीर ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रम्प टैरिफ लगाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनका उद्देश्य अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार को बचाना है। साथ ही ट्रेडिंग पार्टनर्स को चेतावनी दी गई है कि वे मौजूदा व्यापार समझौतों का पालन करें, अन्यथा भारी टैक्स या प्रतिबंध झेलना पड़ेगा।

    विशेषज्ञों का कहना है कि इस जांच का असर टेक्सटाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग गुड्स और कृषि उत्पादों की कीमतों पर पड़ेगा। व्यवसायियों, निर्यातकों और आयातकों को अमेरिकी पॉलिसी पर लगातार नजर रखनी होगी, क्योंकि जुलाई के बाद अमेरिकी बाजार में कीमतों और टैरिफ में बड़े बदलाव संभव हैं।

    यह कदम व्यापार के वैश्विक परिदृश्य में भारत और अन्य देशों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी है। यदि व्यापारिक नीतियों में सुधार नहीं हुआ, तो अमेरिकी टैरिफ की मार व्यापार घाटे और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति पर गहरा असर डाल सकती है।

  • क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून

    क्या है इच्छामृत्यु? भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने दी मंजूरी, जानिए दुनिया में इसका इतिहास और कानून


    नई दिल्ली। भारत में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को मंजूरी देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह फैसला Harish Rana vs Union of India मामले में आया, जिसमें 32 वर्षीय हरीश राणा की निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अपील स्वीकार कर ली गई।

    Supreme Court of India की जस्टिस J. B. Pardiwala और जस्टिस K. V. Viswanathan की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक इमारत से गिरने के बाद पिछले 13 साल से अचेत अवस्था में हैं। बेटे की लगातार बिगड़ती हालत को देखते हुए उनके माता-पिता ने अदालत से जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति मांगी थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

    इस फैसले के बाद इच्छामृत्यु को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

    आइए जानते हैं कि इच्छामृत्यु क्या है और दुनिया में इसका इतिहास क्या रहा है।

    क्या होती है इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु (Euthanasia) का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर समाप्त करना, जो असाध्य या लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो और असहनीय दर्द झेल रहा हो। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को कष्ट से मुक्ति दिलाना होता है।

    इच्छामृत्यु मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है।

    1. सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia)

    इसमें मरीज की मृत्यु लाने के लिए डॉक्टर या कोई व्यक्ति सक्रिय कदम उठाता है, जैसे घातक दवा या इंजेक्शन देना। उदाहरण के तौर पर मरीज को ऐसा इंजेक्शन देना जिससे वह गहरी नींद में चला जाए और उसकी दर्दरहित मृत्यु हो जाए।

    2. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia)

    इसमें मरीज को जिंदा रखने वाले इलाज या जीवन रक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि उपचार बंद कर देते हैं, जिससे मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त होता है।

    प्राचीन काल में इच्छामृत्यु

    इच्छामृत्यु का विचार बहुत पुराना है। लगभग 8वीं सदी ईसा पूर्व के महाकाव्य Iliad में घायल योद्धाओं के दर्द से मुक्ति के लिए दया मृत्यु का उल्लेख मिलता है।

    भारतीय परंपरा में भी तपस्वियों द्वारा प्रायोपवेश (आमरण अनशन के माध्यम से प्राण त्यागना) की परंपरा रही है, जिसका उल्लेख Mahabharata में मिलता है।

    प्राचीन यूनान में दार्शनिक Plato ने अपनी पुस्तक Republic में असाध्य रोगियों के लिए इच्छामृत्यु का समर्थन किया था।

    हालांकि करीब 400 ईसा पूर्व में ली जाने वाली Hippocratic Oath ने सक्रिय इच्छामृत्यु का विरोध किया और कहा कि डॉक्टर किसी मरीज को घातक दवा नहीं देंगे।

    मध्यकाल में धार्मिक प्रतिबंध

    ईसाई धर्म के प्रसार के बाद इच्छामृत्यु को पाप और हत्या के समान माना गया। धार्मिक विचारक Augustine of Hippo और Thomas Aquinas ने इसे ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध बताया।

    इस्लाम और यहूदी धर्म में भी सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित किया गया, हालांकि कुछ परिस्थितियों में जीवन रक्षक उपचार रोकने की अनुमति दी गई।

    19वीं और 20वीं सदी में बहस

    19वीं सदी में आधुनिक चिकित्सा के विकास के साथ इच्छामृत्यु पर फिर से बहस शुरू हुई। 1870 में डॉक्टर Samuel D. Williams ने अंतिम अवस्था के मरीजों को क्लोरोफॉर्म देने का सुझाव दिया था।

    20वीं सदी में नाजी जर्मनी के कुख्यात Aktion T4 program के कारण इच्छामृत्यु की अवधारणा विवादित हो गई। 1939-1945 के बीच नाजी शासन ने इस कार्यक्रम के नाम पर हजारों लोगों की हत्या कर दी थी।

    आज किन देशों में मान्य है इच्छामृत्यु

    समय के साथ कई देशों ने सख्त नियमों के तहत इच्छामृत्यु या सहायता प्राप्त मृत्यु को कानूनी मान्यता दी है।

    Netherlands (2001) और Belgium (2002) ने सक्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया।

    Canada ने 2016 में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) कार्यक्रम शुरू किया।

    Switzerland में 1942 से सहायता प्राप्त आत्महत्या कानूनी है।

    United States के कुछ राज्यों में “Death with Dignity” कानून लागू है, जिसकी शुरुआत Oregon में 1997 में हुई।

    Spain, Austria, Australia, New Zealand, Colombia और Ecuador में भी विभिन्न रूपों में इसे अनुमति मिली है।

    किन देशों में सख्त प्रतिबंध

    कई इस्लामिक देशों में शरिया कानून के तहत इच्छामृत्यु के किसी भी रूप पर प्रतिबंध है। वहीं France और United Kingdom जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं है, बल्कि मरीजों को दर्द से राहत देने के लिए पालीएटिव केयर और सिडेशन पर जोर दिया जाता है।

    भारत में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इच्छामृत्यु के मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को नई दिशा देता है। हालांकि यह केवल निष्क्रिय इच्छामृत्यु तक सीमित है, लेकिन इससे भविष्य में चिकित्सा नैतिकता और मरीज के अधिकारों पर व्यापक चर्चा की संभावना बढ़ गई है।

  • भारत पर नया टैरिफ लगा सकता है, अमेरिका…कई देशों की व्यापारिक नीतियों की जांच शुरू

    भारत पर नया टैरिफ लगा सकता है, अमेरिका…कई देशों की व्यापारिक नीतियों की जांच शुरू


    वाशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) की सरकार ने 16 प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की उन व्यापारिक नीतियों और प्रथाओं के खिलाफ नई जांच शुरू की है, जिन्हें अमेरिका (America) ‘अनुचित’ मानता है। इस कदम से भारत (India) सहित कई देशों पर अतिरिक्त टैरिफ (Additional Tariff.) और अन्य जुर्माने लगने का रास्ता साफ हो सकता है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा ट्रंप की ओर से पहले लगाए गए टैरिफ को खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद वह अब नए विकल्पों की तलाश कर रहे हैं।


    जांच के दायरे में भारत और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं

    औद्योगिक क्षमता से अधिक उत्पादन को लेकर की जा रही इस जांच के निशाने पर मुख्य रूप से भारत के साथ-साथ यूरोपीय संघ (EU), चीन, जापान और कई अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। अमेरिका के इस कड़े कदम से इन प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ उसके संबंधों में तनाव बढ़ने की पूरी संभावना है।


    अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि का कड़ा रुख

    न्यूज एजेंसी एएफपी (AFP) के हवाले से, अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) जैमीसन ग्रीर ने बताया कि ट्रंप प्रशासन दो अलग-अलग जांचें शुरू कर रहा है। पहली जांच जरूरत से ज्यादा उत्पादन पर केंद्रित है, जबकि दूसरी जांच जबरन मजदूरी से बने सामानों के आयात को लेकर है। उन्होंने कहा कि इस गर्मियों तक चीन, यूरोपीय संघ, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और मैक्सिको के खिलाफ नए टैरिफ लगाए जा सकते हैं। इस सूची में ताइवान, वियतनाम, थाइलैंड, मलेशिया, कंबोडिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड और नॉर्वे भी शामिल हैं। अमेरिका के दूसरे सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार कनाडा को इस जांच से बाहर रखा गया है।

    अपने रुख को स्पष्ट करते हुए ग्रीर ने कहा- हमें अमेरिकी नौकरियों की रक्षा करनी है और हमें यह सुनिश्चित करने की सख्त जरूरत है कि हमारे व्यापारिक साझेदारों के साथ हमारा व्यापार पूरी तरह से निष्पक्ष हो। उन्होंने सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा- अगर इस समस्या को हल करने के लिए हमें टैरिफ लगाने की जरूरत पड़ी, तो हम ऐसा जरूर करेंगे। हालांकि, ग्रीर ने अभी यह स्पष्ट नहीं किया है कि भविष्य में लगाए जाने वाले संभावित जुर्माने या टैरिफ अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग होंगे या एक समान।

    ग्रीर के अनुसार, चीन की इलेक्ट्रिक वाहन (EV) उत्पादन क्षमता उसकी घरेलू मांग से कहीं अधिक है। फिर भी, वहां की शीर्ष ईवी निर्माता कंपनी BYD आक्रामक रूप से उज्बेकिस्तान, थाइलैंड, ब्राजील, हंगरी और तुर्की में अपने कारखाने स्थापित कर रही है और यूरोप में भी विस्तार करने की योजना बना रही है।

    जर्मनी और आयरलैंड के बड़े व्यापार अधिशेष को यूरोपीय संघ की अतिरिक्त क्षमता का सबूत माना गया है। इसके अलावा, अमेरिका के साथ व्यापार घाटे के बावजूद सिंगापुर में सेमीकंडक्टर की अतिरिक्त वैश्विक क्षमता है, और नॉर्वे में ईंधन व समुद्री भोजन के भारी निर्यात को इसका सबूत माना गया है।


    60 देशों पर पड़ेगा असर

    जबरन मजदूरी को लेकर जो दूसरी जांच की जा रही है, उसके बारे में ग्रीर ने बताया कि यह जांच कल दोपहर के बाद किसी भी समय शुरू हो सकती है। इस जांच की जद में लगभग 60 व्यापारिक साझेदार देश आएंगे, जिससे ग्लोबल सप्लाई चैन पर व्यापक असर पड़ सकता है।

    अमेरिका ने पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा हस्ताक्षरित ‘उइगर फोर्स्ड लेबर प्रोटेक्शन एक्ट’ के तहत पहले ही चीन के शिनजियांग क्षेत्र से आने वाले सोलर पैनल और अन्य सामानों पर कार्रवाई की है। अमेरिका का आरोप है कि चीन ने उइगर और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए लेबर कैंप बनाए हैं (हालांकि चीन इन आरोपों से इनकार करता है)। अब इस जांच का दायरा अन्य देशों तक भी बढ़ाया जा सकता है।


    ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात से ठीक पहले उठाया गया कदम

    ट्रंप प्रशासन का यह ताजा व्यापारिक कदम रणनीतिक रूप से भी काफी अहम है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है, जब अप्रैल महीने में बीजिंग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक प्रस्तावित है। इस नई जांच का असर दोनों नेताओं की आगामी बातचीत पर भी देखने को मिल सकता है।

  • अमेरिका ने बताई भारत को रूस से तेल खरीदने की छूट देने की वजह, कही ये बात

    अमेरिका ने बताई भारत को रूस से तेल खरीदने की छूट देने की वजह, कही ये बात


    नई दिल्ली।
    भारत (India) से समुद्री मार्ग में पहले से मौजूद रूसी कच्चे तेल (Russian Crude Oil) को खरीदकर उसे भारतीय रिफाइनरियों (Indian Refineries) की ओर मोड़ने का अनुरोध करने के बाद अब अमेरिका (America) की तरफ से भारत को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। अमेरिका ने बताया है कि आखिर उन्होंने भारत को यह रूसी तेल खरीदने की यह तथाकथित ‘छूट’ क्यों दी है। बुधवार को वाइट हाउस (White House) ने एक बयान में कहा है कि भारत को इसकी ‘इजाजत’ इसीलिए दी गई क्योंकि भारत के लोग अच्छे हैं। इस दौरान यह भी दावा किया गया कि भारत ने पूर्व में रूसी तेल ना खरीदने की उनकी शर्तों को माना है, इसीलिए अमेरिका ने भारत को यह विशेष ‘छूट’ दी।

    वाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट ने कहा कि यह फैसला इसलिए किया गया क्योंकि भारत में हमारे साथी अच्छे लोग रहे हैं। लेविट ने कहा, “हम इस फैसले पर इसलिए पहुंचे क्योंकि भारत में हमारे साथी अच्छे साथी रहे हैं और उन्होंने पहले ही रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया था, जिस पर रोक लगी है। इसलिए, जब हम ईरानियों की वजह से दुनिया में तेल सप्लाई में इस अस्थायी कमी को पूरा करने के लिए काम कर रहे हैं, तो हमने भारत को रूसी तेल लेने की इजाजत दी है।”


    अमेरिका ने की थी घोषणा

    उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका ने इस फैसले को इसलिए मंजूरी दी क्योंकि भारत आने वाला यह रूसी तेल पहले से ही समुद्र मार्ग में था और रूस को इससे कोई खास वित्तीय फायदा नहीं होगा।” बता दें कि इससे पहले अमरीका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पिछले सप्ताह घोषणा की थी पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति आसान बनाने के मकसद से भारत को उन पोत पर लदे रूसी तेल की खरीद की ‘अनुमति” दी गई है, जो पहले से समुद्री मार्गों पर हैं। इस फैसले को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने मंजूरी दी है।


    क्या बोले थे अमेरिकी वित्त मंत्री

    स्कॉट बेसेंट ने एक इंटरव्यू में भारत को अमेरिका का अच्छा साझेदार बताया था। उन्होंने कहा था, ”दुनिया में तेल की पर्याप्त आपूर्ति है। वित्त मंत्रालय ने भारत में हमारे सहयोगियों को उस रूसी तेल की खरीद शुरू करने की कल सहमति दे दी जो पहले से समुद्र में है। भारतीयों ने बहुत अच्छा सहयोग दिया है। हमने उनसे कहा था कि वे प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीद बंद कर दें। उन्होंने ऐसा किया। वे इसकी जगह अमेरिकी तेल लेने वाले थे लेकिन दुनिया भर में तेल की अस्थायी कमी को दूर करने के लिए हमने उन्हें रूसी तेल स्वीकार करने की अनुमति दे दी है। हम रूसी तेल के अन्य प्रकारों से भी प्रतिबंध हटा सकते हैं।”


    अमेरिका ने लगाया था जुर्माना

    इससे पहले अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीद कर यूक्रेन युद्ध की फंडिंग करने का आरोप लगाते हुए कई महीनों तक मोटा जुर्माना वसूला था। अमेरिका ने भारत पर पहले 25 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ के अलावा 25 फीसदी जुर्माना लगा दिया था, जिसके बाद अमेरिका भारत से आयातित उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ वसूल रहा था। हालांकि अमेरिका के साथ हुई हालिया ट्रेड डील और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा ट्रंप के टैरिफ को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद अब इस टैरिफ को हटा दिया गया है।


    भारत ने स्पष्ट किया है अपना रुख

    वहीं भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत ने कहा है कि ऊर्जा बाजार के उतार-चढ़ाव वाले माहौल में, नई दिल्ली अपनी 1.4 बिलियन की आबादी को प्राथमिकता देना जारी रखेगा।” बता दें कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है।

  • भारत की आर्थिक वृद्धि पर हो सकता है ईरान-युद्ध का असर… ICRA ने बढ़ाई टेंशन

    भारत की आर्थिक वृद्धि पर हो सकता है ईरान-युद्ध का असर… ICRA ने बढ़ाई टेंशन


    नई दिल्ली।
    पश्चिम एशिया (West Asia) में अगर संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है तो भारत की आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (Rating agency ICRA) ने एक रिपोर्ट में यह कहा। रेटिंग एजेंसी ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि लगभग 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह वित्त वर्ष 2025-26 के अनुमान 7.6 प्रतिशत से थोड़ा कम है। हालांकि, पश्चिम एशिया में लंबे समय तक जारी तनाव से कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और मुद्रास्फीति के दबाव के कारण वृद्धि प्रभावित हो सकती है।


    वैश्विक स्तर पर तनाव

    बता दें कि इजराइल-अमेरिका के ईरान पर हमले के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास के समुद्री मार्गों में जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। यह एक अहम वैश्विक ऊर्जा गलियारा है। इससे आपूर्ति प्रभावित होने और माल ढुलाई लागत में वृद्धि को लेकर चिंता बढ़ी है। पश्चिम एशिया भारत का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। भारत के निर्यात में इसकी लगभग 14 प्रतिशत और आयात में लगभग 21 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ऐसे में, यदि तनाव और बढ़ता है तो व्यापार के साथ ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होगी।


    भारत के लिए जोखिम हैं ये फैक्टर

    इक्रा की रिपोर्ट में कहा गया- यह संघर्ष विशेष रूप से माल ढुलाई लागत में वृद्धि, आपूर्ति में देरी और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता के रूप में भारत के व्यापार प्रवाह के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करता है। इक्रा के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत का चालू खाते का घाटा 0.30-0.40 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। साथ ही थोक और खुदरा मुद्रास्फीति भी बढ़ सकती है। ईंधन की बढ़ती लागत से उपभोग मांग कम हो सकती है और समग्र आर्थिक गतिविधि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

    एजेंसी के अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 में कच्चे तेल की कीमतें औसतन 70 से 75 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं तो इससे चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग एक प्रतिशत के आसपास बना रह सकता है। हालांकि, यदि कीमतें बढ़कर 100-105 डॉलर प्रति बैरल हो जाती हैं, तो घाटा सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1.9-2.2 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जिससे वृहद आर्थिक दबाव बढ़ेगा।

    इक्रा ने कहा कि इस स्थिति का असर बाहर से भेजे जाने वाली राशि पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत में आने वाले रेमिंटन्स का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है, जिनमें संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब शामिल हैं।