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  • भारत-उज्बेकिस्तान के बीच यूरेनियम को लेकर बड़ी डील, UPI- वीजा फ्री एंट्री समेत हुए 16 अहम समझौते

    भारत-उज्बेकिस्तान के बीच यूरेनियम को लेकर बड़ी डील, UPI- वीजा फ्री एंट्री समेत हुए 16 अहम समझौते


    ताशकंद।
    भारत (India) और उज्बेकिस्तान (Uzbekistan) ने रविवार को असैन्य परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाते हुए लंबे समय के लिए यूरेनियम आपूर्ति (Uranium supply) की व्यवस्था बनाने पर सहमति जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) और उज्बेकिस्तान (Uzbekistan) के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव (President Shavkat Mirziyoyev) के बीच रविवार को हुई वार्ता में यह अहम फैसला हुआ। दोनों देशों ने अपने संबंधों को ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक ले जाने की घोषणा भी की। साथ ही, वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को पांच अरब डॉलर सालाना तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया।


    2030 तक 5 अरब डॉलर करना है व्यापार

    मोदी और मिर्जियोयेव की वार्ता के बाद जारी संयुक्त बयान में यूरेनियम आपूर्ति की प्रस्तावित मात्रा और समयसीमा का खुलासा नहीं किया गया। प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों देशों के बीच मौजूदा व्यापार एक अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। अब इसे 2030 तक पांच अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि रणनीतिक साझेदारी की 15वीं वर्षगांठ के अवसर पर संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी के नए स्तर पर ले जाना महत्वपूर्ण उपलब्धि है।


    विदेश मंत्रियों की समन्वय परिषद बनेगी

    मोदी ने कहा कि द्विपक्षीय सहयोग के सभी पहलुओं को दिशा देने के लिए विदेश मंत्रियों के स्तर पर समन्वय परिषद स्थापित की जाएगी। संयुक्त आयोग का स्तर भी सचिवों से बढ़ाकर मंत्रिस्तरीय किया जाएगा। दोनों देश कारोबारी नेताओं की भागीदारी वाला संयुक्त व्यापार सम्मेलन आयोजित करेंगे। दोनों देशों ने आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर प्रतिबद्धता जताई। मोदी ने कहा कि ये चुनौतियां पूरे क्षेत्र की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं।


    बौद्ध स्थलों के संरक्षण पर सहमति

    भारत और उज्बेकिस्तान ने प्राचीन बौद्ध स्थलों फयाज तेपा और कारा तेपा के संरक्षण एवं पुनरुद्धार के लिए आशय पत्र पर सहमति जताई। दोनों स्थल सिल्क रोड के जरिए मध्य एशिया में बौद्ध धर्म के प्रसार के महत्वपूर्ण प्रमाण माने जाते हैं।


    52 योग साधकों का विशेष सत्र

    मोदी ने ताशकंद में 52 योग साधकों की भागीदारी वाला विशेष योग सत्र भी देखा। उन्होंने कहा, ‘उज्बेकिस्तान योग से प्यार करता है।’ दोनों देशों ने व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचा, महत्वपूर्ण खनिज, खनन, रक्षा एवं सुरक्षा, कृषि, फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य, सूचना प्रौद्योगिकी, यूपीआई और शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। रक्षा उद्योगों को सैन्य उपकरणों के सह-विकास और सह-उत्पादन की दिशा में काम करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा। व्यापार विस्तार पर जोर दिया जाएगा।


    भारतीयों के लिए 30 दिन तक वीजा फ्री एंट्री

    प्रधानमंत्री मोदी की उज्बेकिस्तान यात्रा के दौरान दोनों देशों के लोगों के बीच आवाजाही आसान करने की दिशा में बड़ा फैसला हुआ। उज्बेकिस्तान ने भारतीय नागरिकों के लिए 30 दिन की वीजा-मुक्त यात्रा व्यवस्था लागू करने की घोषणा की है। राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव ने कहा कि इससे दोनों देशों के बीच जन-जन के संपर्क, पर्यटन और कारोबारी आदान-प्रदान को बड़ा बढ़ावा मिलेगा।


    उज्बेकिस्तान में चलेगा यूपीआई

    डिजिटल सहयोग के तहत एनपीसीआई और उज्बेकिस्तान के नेशनल इंटरबैंक प्रोसेसिंग सेंटर के बीच वाणिज्यिक समझौता हुआ। इसके लागू होने के बाद भारतीय यात्री यूपीआई ऐप के जरिए उज्बेकिस्तान में कोड स्कैन कर दुकानों पर भुगतान कर सकेंगे।

    प्रधानमंत्री मोदी उज्बेकिस्तान की यात्रा के बाद रविवार को शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए किर्गिस्तान पहुंचे। किर्गिस्तान के मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष अदेलबेक कासिमालियेव ने हवाई अड्डे पर उनका स्वागत किया। इस दौरान पारंपरिक किर्गिज नृत्य की प्रस्तुति भी दी गई। होटल पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत ‘वंदे मातरम्’ के जयघोष से हुआ। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जैसवाल ने ‘एक्स’ पर कहा कि सम्मेलन में 10 सदस्य देश, 15 साझेदार देश और दो पर्यवेक्षक देश क्षेत्रीय एवं सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए एकत्र होंगे।

  • नेपाल ने भारत की रेस्क्यू टीम की पेशकश क्यों ठुकराई?

    नेपाल ने भारत की रेस्क्यू टीम की पेशकश क्यों ठुकराई?


    नई दिल्ली। नेपाल में भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। हादसे में सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1500 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। इस बीच भारत समेत कई देशों ने नेपाल को राहत और बचाव के लिए विशेषज्ञ टीमें भेजने की पेशकश की, लेकिन नेपाल सरकार ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को बुलाने से इनकार कर दिया है। नेपाल का कहना है कि उसके सुरक्षा बल राहत और बचाव अभियान चलाने में सक्षम हैं और फिलहाल उसे जमीनी टीमों के बजाय वित्तीय सहायता की जरूरत है।

    काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत, चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश ने अपनी विशेषज्ञ आपदा प्रबंधन टीमों को नेपाल भेजने का प्रस्ताव दिया था। भारत ने भी राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की टीम भेजने की पेशकश की थी। हालांकि, नेपाली सेना और पुलिस की सलाह के बाद सरकार ने इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।

    2015 के भूकंप से लिया सबक

    नेपाल सरकार के इस फैसले के पीछे 2015 का विनाशकारी भूकंप भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। उस समय बड़ी संख्या में विदेशी राहत और बचाव दल नेपाल पहुंचे थे। इससे राहत कार्यों के समन्वय और प्रबंधन में काफी दिक्कतें सामने आई थीं। इसी अनुभव को देखते हुए नेपाल इस बार विदेशी टीमों के बजाय अपने सुरक्षा बलों के जरिए अभियान चलाना चाहता है।

    नेपाल पुलिस और विभिन्न दूतावासों के आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ के बाद स्थिति अब भी गंभीर है। दूसरे देशों के नागरिकों को सहायता पहुंचाने और उनके परिवारों तक सही जानकारी पहुंचाने के लिए नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक आपातकालीन प्रतिक्रिया टीम बनाई है।

    विदेश मंत्रालय के एक उप-सचिव स्तर के अधिकारी को रसुवा के तिमुरे में ग्राउंड ऑपरेशन्स टीम के साथ भेजा गया है। यह टीम सुरक्षा बलों के साथ समन्वय कर दूसरे देशों के दूतावासों और परिजनों को लापता लोगों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराएगी। विदेश मंत्री शिसिर खनल ने भी संबंधित विभागों को विदेशी सरकारों के लगातार संपर्क में रहने के निर्देश दिए हैं।

    भारत से 47.5 टन राहत सामग्री पहुंची

    नेपाल ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को भले ही आने की अनुमति नहीं दी है, लेकिन मानवीय और आर्थिक सहायता लेने से इनकार नहीं किया है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, भारत अब तक नेपाल को 47.5 टन राहत सामग्री भेज चुका है।

    भारत ने नेपाल को बेली ब्रिज और प्रीफैब ट्रस ब्रिज उपलब्ध कराने की पेशकश भी की है, ताकि बाढ़ से क्षतिग्रस्त संपर्क व्यवस्था को बहाल करने में मदद मिल सके।

    कई देशों ने आर्थिक मदद का ऐलान किया

    भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन और विश्व बैंक भी नेपाल के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा कर चुके हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) के अध्यक्ष मासातो कांडा ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बातचीत की और पुनर्निर्माण के साथ-साथ पूर्व चेतावनी प्रणालियों (Early Warning Systems) को मजबूत करने में सहयोग का भरोसा दिया है।

    नेपाल सरकार ने अपने दूतावासों को भी निर्देश दिया है कि किसी भी तरह की वित्तीय सहायता केवल प्रधानमंत्री राहत कोष के माध्यम से ही स्वीकार की जाए।

  • नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपने पहले विदेश दौरे पर आएंगे भारत…

    नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह अपने पहले विदेश दौरे पर आएंगे भारत…


    नई दिल्ली।
    नेपाल (Nepal) के प्रधानमंत्री बालेन्द्र उर्फ बालेन शाह (Prime Minister Balen Shah) अपने पहले विदेश यात्रा (Foreign Travel) पर भारत (India) आ सकते हैं। नेपाल में आए भीषण बाढ़ के बीच नेपाली वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने गुरुवार को यह जानकारी दी है। उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा है कि प्रधानमंत्री शाह का यह भारत दौरा इस साल के अंत से पहले आयोजित होने की संभावना है।

    काठमांडू में आयोजित एनडीटीवी समिट को संबोधित करते हुए नेपाल के वित्त मंत्री वागले ने कहा कि यात्रा की तारीखों को अंतिम रूप दिया जा रहा है, लेकिन उन्हें पूरा भरोसा है कि पद संभालने के बाद प्रधानमंत्री शाह का पहला विदेशी दौरा भारत का ही होगा। वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने कहा, “हमने प्रधानमंत्री के विदेश दौरों की चर्चा शुरू कर दी है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनकी पहली विदेश यात्रा भारत की होगी। तारीख तय की जानी बाकी है, लेकिन मुझे पूरी उम्मीद है कि यह दौरा इसी साल के अंत से पहले होगा।”


    नेपाल में बाढ़ के बाद भारत बना संकटमोचक

    नेपाल के वित्त मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब नेपाल-तिब्बत सीमा पर आई भीषण बाढ़ और तबाही से देश जूझ रहा है। समाचार लिखे जाने तक इस त्रासदी में कम से कम 389 लोगों की मौत हो चुकी है। अब भी 1500 लोग लापता हैं। मलबे के तेज बहाव ने कई गांवों, सड़कों और पुलों को तबाह कर दिया है।

    संकट की इस घड़ी में भारत नेपाल की मदद के लिए सबसे पहले आगे आया। भारत ने सैन्य विमानोंके जरिए पहले 10 टन की मानवीय सहायता और आपदा राहत सामग्री भेजी। इसके बाद 37.5 टन की अतिरिक्त खेप एयरलिफ्ट की गई है। वहीं विदेश मंत्री ने गुरुवार को एक बयान में कहा है कि भारत नेपाल की जनता के साथ एकजुटता के साथ खड़ा है। उन्होंने भारत की ओर से हर संभव सहायता और मानवीय सहायता की पेशकश भी की।


    PM मोदी ने दिया था भरोसा

    इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने नेपाल के पीएम बालेन शाह से फोन पर बात कर इस आपदा पर गहरा शोक व्यक्त किया था। पीएम मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एक पोस्ट में कहा, “प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से बात की और नेपाल में बाढ़ के कारण हुई जनहानि पर संवेदना व्यक्त की। इस कठिन समय में भारत की जनता नेपाल में अपने बहनों और भाइयों के साथ एकजुटता से खड़ी है।” प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की टीमें बचाव और राहत प्रयासों के लिए समन्वय कर रही हैं। उन्होंने कहा, “भारत नेपाल को हर संभव मानवीय सहायता प्रदान करने के लिए तैयार है।”


    नेपाल ने जताया आभार

    वहीं भारत से मिली त्वरित मदद के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने पीएम मोदी का शुक्रिया अदा किया था। पीएम मोदी द्वारा फोन पर सद्भावनापूर्ण बातचीत और गहरी संवेदना व्यक्त करने के लिए उनका आभार जताते हुए बालेन्द्र शाह ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा, ”हम इस मुश्किल घड़ी में नेपाल के प्रति एकजुटता व्यक्त करने वाले आपके आत्मीय शब्दों और सहायता की उदार पेशकश की दिल से सराहना करते हैं।” उन्होंने कहा, ”सहयोग का यह भाव हमारे दोनों देशों के बीच दोस्ती के मजबूत रिश्तों को दिखाता है, जिन्हें हम बहुत महत्व देते हैं।”

  • नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट

    नेपाल-चीन सीमा पर बनी बैरियर लेक से बढ़ी चिंता, भारत से 120-140 किमी दूर झील को लेकर अलर्ट


    नई दिल्ली। नेपाल में भोटेकोशी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब नेपाल-चीन सीमा क्षेत्र में बनी एक विशाल बैरियर लेक (प्राकृतिक झील) को लेकर वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता बढ़ गई है। चीन के जल संसाधन मंत्रालय ने अगले 72 घंटों को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए इलाके में निगरानी और फ्लड सिमुलेशन शुरू कर दिया है। आशंका जताई जा रही है कि यदि झील को रोक रहा प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है या टूट जाता है तो बड़ी मात्रा में पानी तेजी से निचले इलाकों की ओर बह सकता है।

    यह झील छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो नदियों के संगम पर बनी है। प्रारंभिक आकलन के अनुसार यह क्षेत्र भारतीय सीमा से लगभग 120 से 140 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। वहीं नेपाल-चीन सीमा पर स्थित रसुवागढ़ी-ग्यिरोंग बॉर्डर क्रॉसिंग से इसकी दूरी करीब 18 किलोमीटर बताई जा रही है। भौगोलिक रूप से भारत से दूरी अधिक नहीं होने के बावजूद चिंता का कारण इसका नदी तंत्र से जुड़ाव है, क्योंकि यहां का पानी आगे चलकर नेपाल होते हुए गंडक नदी के जरिए भारत तक पहुंचता है।

    झील में करोड़ों लीटर पानी जमा
    चीन की ओर से जारी चेतावनी के मुताबिक बैरियर लेक का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। हाइड्रोजियोलॉजिस्ट के अनुमान के अनुसार झील में करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी पहले ही जमा हो चुका है, जबकि लगभग 30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी और जमा होने की संभावना जताई गई है। यानी कुल मिलाकर 50 लाख क्यूबिक मीटर तक पानी प्राकृतिक बांध के पीछे इकट्ठा हो सकता है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पानी का दबाव बढ़ने से प्राकृतिक अवरोध टूटता है तो यह ग्लेशियल या भूस्खलन से बनी झील के अचानक फटने (लेक आउटबर्स्ट फ्लड) जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी घटनाओं में पानी बेहद तेज गति से नीचे की ओर बढ़ता है और अपने साथ चट्टानें, मिट्टी, पेड़ तथा भारी मात्रा में मलबा भी बहाकर ले जाता है।

    अगले 72 घंटे क्यों अहम
    खतरे को देखते हुए चीन ने रियल-टाइम मॉनिटरिंग और फ्लड मॉडलिंग शुरू की है। वैज्ञानिक यह आकलन कर रहे हैं कि यदि प्राकृतिक बांध में दरार बढ़ती है या वह टूटता है तो पानी की दिशा, मात्रा और गति क्या होगी। 27 अगस्त को जारी चेतावनी के बाद से पूरे क्षेत्र पर लगातार नजर रखी जा रही है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि झील का पानी धीरे-धीरे बाहर निकलेगा या अचानक बांध टूटने जैसी स्थिति बनेगी। यदि जल निकासी नियंत्रित रहती है तो निचले इलाकों को तैयारी का पर्याप्त समय मिल सकता है, लेकिन अचानक बांध टूटने की स्थिति में बाढ़ की लहर बेहद कम समय में नीचे पहुंच सकती है।

    बिहार और उत्तर प्रदेश पर क्यों नजर
    छोछेन खोला और पुरेपू त्सांगपो का पानी आगे नेपाल की नदियों में मिलकर भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी तंत्र का हिस्सा बनता है। त्रिशूली आगे चलकर नारायणी नदी में समाहित होती है, जिसे भारत में गंडक नदी के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि ऊपरी क्षेत्र में किसी भी असामान्य जलप्रवाह का असर बिहार और उत्तर प्रदेश के गंडक बेसिन वाले इलाकों पर पड़ सकता है।

    हालांकि विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल भारत में बड़ी बाढ़ की कोई निश्चित आशंका नहीं है, लेकिन नदी तंत्र के आपसी जुड़ाव को देखते हुए निगरानी और सतर्कता बेहद जरूरी है।

    नेपाल में पहले ही मची है तबाही
    यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब नेपाल में हाल की बाढ़ ने भारी नुकसान पहुंचाया है। रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में सड़कें, पुल और मकान प्रभावित हुए हैं। कई क्षेत्रों में नदी के साथ बहकर आए मलबे ने जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है और अनेक लोगों के लापता होने की भी खबरें हैं।

    ऐसे में अब प्रशासन की नजर केवल बैरियर लेक पर नहीं, बल्कि पूरे नदी तंत्र पर है। आने वाले 72 घंटे यह तय करेंगे कि झील स्थिर रहती है या फिर उसके जलस्तर में बढ़ोतरी नई चुनौती खड़ी करती है।

  • नेपाल में अचानक बाढ़ की 3 थ्योरी, भारत तक पहुंच सकता है पानी, बिहार-UP में अलर्ट

    नेपाल में अचानक बाढ़ की 3 थ्योरी, भारत तक पहुंच सकता है पानी, बिहार-UP में अलर्ट


    नई दिल्ली। नेपाल में बुधवार सुबह अचानक आई बाढ़ ने रसुवा, नुवाकोट, धादिंग और चितवन में भारी तबाही मचाई। कई पुल टूट गए और बिजली ढांचे को नुकसान पहुंचा। शुरुआती जांच में बाढ़ की वजह को लेकर तीन संभावनाएं सामने आई हैं—पहाड़ से मलबा गिरने से नदी का रास्ता रुकना, भूकंपीय गतिविधि और ग्लेशियल झील का फटना। हालांकि, अभी इनमें से किसी एक कारण की पुष्टि नहीं हुई है।

    बाढ़ का पानी तिब्बत सीमा के पास ल्हेंदे नदी के ऊपरी हिस्से से आने की बात कही जा रही है। बुधवार सुबह करीब 9 बजे पानी नेपाल के रसुवा जिले में पहुंचा और इसके बाद तेज बहाव नुवाकोट और धादिंग तक फैल गया। रसुवागढ़ी, न्यू त्रिशूली ब्रिज और मालेखु ब्रिज के आसपास बाढ़ से भारी नुकसान की जानकारी सामने आई है।

    नदी में मलबा गिरने से बनी झील जैसी स्थिति?
    पहली आशंका यह है कि पहाड़ से बर्फ, चट्टानें और मलबा खिसककर नदी में गिर गया। इससे नदी का प्रवाह कुछ समय के लिए रुक गया और पीछे पानी जमा होता रहा। दबाव बढ़ने पर यह रुकावट टूट गई और जमा पानी तेज सैलाब के रूप में नीचे की ओर बह निकला।

    नेपाल के आपदा प्रबंधन प्राधिकरण को रसुवागढ़ी से करीब 20 किलोमीटर दूर बर्फ और चट्टानों के खिसकने के निशान मिले हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में भी नदी का फैलाव अचानक बढ़ता दिखाई दिया है। हालांकि, इन तस्वीरों से अभी यह साबित नहीं होता कि बाढ़ ग्लेशियर झील फटने से ही आई।

    भूकंप वाली थ्योरी कमजोर
    दूसरी आशंका भूकंप से जुड़ी थी। बाढ़ से कुछ समय पहले तिब्बत के इलाके में कंपन दर्ज किया गया था। शुरुआत में इसे भूकंप माना गया, लेकिन अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) के अपडेट के मुताबिक भूकंपीय गतिविधि लैंडस्लाइड की वजह से दर्ज हुई थी। इससे बाढ़ के पीछे भूकंप को मुख्य कारण मानने की संभावना कमजोर हुई है।

    क्या ग्लेशियल झील फटी?
    तीसरी संभावना GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की है। पहाड़ों पर बनी बर्फीली झील का पानी अचानक बाहर निकलने पर नीचे की ओर बेहद तेज बहाव बन सकता है।

    नेपाल के मौसम विभाग के वरिष्ठ मौसम विज्ञानी मिन कुमार आर्याल के अनुसार, भोटेकोशी में आई बाढ़ केवल बारिश की वजह से नहीं हुई। रसुवा में पिछले 24 घंटे में 7 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश नहीं हुई थी। ऐसे में ग्लेशियल झील के फटने की आशंका की भी जांच की जा रही है। फिलहाल बाढ़ की असली वजह स्पष्ट नहीं है और तीनों संभावनाओं की जांच जारी है।

    भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
    नेपाल से निकलने वाली नदियों के जरिए बाढ़ का पानी भारत तक पहुंच सकता है। त्रिशूली नदी देवघाट में काली गंडकी से मिलकर नारायणी बनती है। भारत में वाल्मीकिनगर के पास यही नदी गंडक कहलाती है। इसलिए गंडक के जलस्तर पर नजर रखी जा रही है। केंद्रीय जल आयोग ने बिहार और उत्तर प्रदेश में गंडक किनारे बसे इलाकों को सतर्क रहने की सलाह दी है।

    बिहार के 6 जिलों में निगरानी
    बिहार में पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली पर नजर रखी जा रही है। पश्चिम चंपारण नेपाल से आने वाले पानी के रास्ते में पड़ने वाला पहला बड़ा भारतीय जिला है। बेतिया, गोपालगंज और मुजफ्फरपुर में NDRF की टीमें तैनात की गई हैं, जबकि SDRF भी संवेदनशील क्षेत्रों में मौजूद है।

    यूपी के महराजगंज-कुशीनगर भी अलर्ट
    गंडक में पानी बढ़ने की आशंका को देखते हुए उत्तर प्रदेश के महराजगंज और कुशीनगर जिलों को भी सतर्क किया गया है। गंडक आगे हाजीपुर और सोनपुर के पास गंगा में मिलती है। हालांकि, मैदानी इलाकों में पहुंचने के बाद नदी फैलती है, जिससे पानी की रफ्तार कम होने की संभावना रहती है। वहीं कोसी, बागमती, बूढ़ी गंडक और घाघरा का रास्ता अलग है। नेपाल से आई इस बाढ़ का सीधा पानी इन नदियों में नहीं जाने की बात कही जा रही है।

    फिलहाल भारत में सबसे ज्यादा निगरानी नारायणी से वाल्मीकिनगर और फिर गंडक के रास्ते उत्तर बिहार तक के इलाकों में है। नेपाल में बाढ़ की वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन पानी के भारत पहुंचने का रास्ता तय है नेपाल से नारायणी, नारायणी से गंडक और फिर गंगा।

  • ईरान-US जंग का तेल पर असर: 170 में से 145 देशों में बढ़े पेट्रोल के दाम, भारत में भी महंगा

    ईरान-US जंग का तेल पर असर: 170 में से 145 देशों में बढ़े पेट्रोल के दाम, भारत में भी महंगा


    नई दिल्ली। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़े तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर दिखाई दे रहा है। जंग के बाद दुनिया के ज्यादातर देशों में पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हैं। अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट GlobalPetrolPrices के मुताबिक फरवरी के अंत से अगस्त के बीच 170 में से 145 देशों में पेट्रोल महंगा हुआ है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा, हालांकि यहां कीमतों में बढ़ोतरी कई देशों के मुकाबले सीमित रही।

    म्यांमार में 56%, भूटान में 55% तक बढ़े दाम
    GlobalPetrolPrices के आंकड़ों के अनुसार म्यांमार में पेट्रोल की कीमत 56%, भूटान में 55% और क्यूबा में 51% बढ़ी। UAE में करीब 50% और नाइजीरिया में 48% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अमेरिका में भी पेट्रोल महंगा हुआ है। यहां औसत कीमत 2.94 डॉलर से बढ़कर 4.09 डॉलर प्रति गैलन हो गई, यानी करीब 39% की वृद्धि। इसका सीधा असर वाहन चलाने की लागत पर पड़ा है।

    भारत में करीब 8% बढ़ी कीमत
    मध्य पूर्व में तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर भारत में भी देखने को मिला। दिल्ली में फरवरी के मुकाबले पेट्रोल और डीजल की कीमत करीब 7.5 रुपए प्रति लीटर बढ़ी। हालांकि, जहां कई देशों में पेट्रोल 40-50% तक महंगा हुआ, वहीं भारत में बढ़ोतरी करीब 8% रही। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेल महंगा रहने का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

    सिर्फ पेट्रोल नहीं, हर सेक्टर पर असर
    कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ वाहन चलाने तक सीमित नहीं रहता। खेती, फैक्ट्रियों, ट्रांसपोर्ट और सप्लाई चेन की लागत बढ़ने से सामान की कीमतों पर भी दबाव आता है। तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल फूड पैकेजिंग, प्लास्टिक बोतल, मेडिकल सिरिंज, पॉलिएस्टर, नायलॉन, कॉस्मेटिक्स, डिटर्जेंट और पेंट समेत कई उत्पादों में होता है। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी उत्पादन से लेकर बाजार तक पूरी लागत को प्रभावित कर सकती है।

    भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है चिंता?
    भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक बना रहता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहती हैं, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल, माल ढुलाई, खाद, पैकेजिंग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। यानी जंग भले ही पश्चिम एशिया में हो रही हो, लेकिन उसकी आर्थिक आंच दुनिया के दूसरे हिस्सों और भारत के घरेलू बाजार तक भी पहुंच सकती है।

  • India Hockey Team: अर्जेंटीना ने दूसरे राउंड में हराया, भारतीय टीम अब सातवें स्थान के लिए बेल्जियम से भिड़ेगी

    India Hockey Team: अर्जेंटीना ने दूसरे राउंड में हराया, भारतीय टीम अब सातवें स्थान के लिए बेल्जियम से भिड़ेगी

    नई दिल्ली ।भारतीय पुरुष हॉकी टीम का 2026 विश्व कप में खिताब जीतने का सपना अर्जेंटीना के खिलाफ 3-5 की हार के साथ समाप्त हो गया। दूसरे राउंड के इस महत्वपूर्ण मुकाबले में भारतीय टीम को सेमीफाइनल की उम्मीद बनाए रखने के लिए जीत की जरूरत थी, लेकिन अर्जेंटीना ने शुरुआत से ही आक्रामक खेल दिखाते हुए मुकाबले पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। भारत ने अंतिम चरण में वापसी की कोशिश की, लेकिन शुरुआती नुकसान की भरपाई नहीं कर सका।

    मुकाबले की शुरुआत भारतीय टीम के लिए अच्छी नहीं रही। अर्जेंटीना ने शुरुआती मिनटों में ही गोल करके भारत पर दबाव बना दिया। भारतीय खिलाड़ियों को अपनी रक्षापंक्ति संभालने और गेंद पर नियंत्रण बनाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा। अर्जेंटीना ने लगातार हमले किए और भारतीय सर्किल में कई बार प्रवेश करते हुए गोल करने के अवसर बनाए।

    अर्जेंटीना ने इसके बाद अपनी बढ़त को और मजबूत किया। भारतीय टीम को लगातार दो गोल का नुकसान झेलना पड़ा, जिससे मुकाबले में वापसी की चुनौती बढ़ गई। भारत ने जवाबी हमलों के जरिए दबाव बनाने का प्रयास किया और सुखजीत सिंह ने गोल कर टीम की उम्मीदों को कुछ हद तक जीवित रखा। हालांकि अर्जेंटीना ने अपनी आक्रामक रणनीति में कोई बड़ी कमी नहीं आने दी।

    दूसरे और तीसरे क्वार्टर में भी अर्जेंटीना का दबदबा बना रहा। भारतीय डिफेंस को लगातार हमलों का सामना करना पड़ा। अर्जेंटीना ने पेनल्टी कॉर्नर और तेज आक्रमण का प्रभावी इस्तेमाल करते हुए भारतीय गोलपोस्ट पर खतरा बनाए रखा। टॉमस डोमेन ने भी गोल कर अर्जेंटीना की बढ़त को मजबूत किया और भारत के लिए मुकाबला और कठिन हो गया।

    अंतिम क्वार्टर में भारतीय टीम ने आक्रामक रुख अपनाया। सुखजीत सिंह ने अपना दूसरा गोल किया, जबकि हार्दिक सिंह ने पेनल्टी स्ट्रोक को गोल में बदलकर भारत के स्कोर को तीन तक पहुंचाया। इन गोलों के बाद भारतीय टीम ने दबाव बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन अर्जेंटीना की बढ़त इतनी मजबूत थी कि मुकाबले का परिणाम बदलना संभव नहीं हो सका।

    अर्जेंटीना की ओर से जोआक्विन टोस्कानी ने दो गोल किए, जबकि निकोलस डेला टोरे और टॉमस डोमेन ने भी टीम के लिए महत्वपूर्ण गोल दागे। अर्जेंटीना ने पूरे मुकाबले में आक्रमण और रक्षात्मक संयोजन के बीच बेहतर संतुलन बनाए रखा। भारत को कई मौकों पर गोल करने के अवसर मिले, लेकिन उन्हें निर्णायक परिणाम में बदलने में टीम सफल नहीं रही।

    इस हार के साथ भारत की सेमीफाइनल में पहुंचने की उम्मीद पूरी तरह समाप्त हो गई। दूसरे राउंड में भारतीय टीम के लिए मुकाबले बेहद चुनौतीपूर्ण रहे और लगातार हार ने उसकी स्थिति कमजोर कर दी। अर्जेंटीना के खिलाफ मुकाबला भारत के लिए करो या मरो जैसा था, लेकिन टीम अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी।

    विश्व कप में खिताब की दौड़ से बाहर होने के बाद भारतीय टीम के सामने अब टूर्नामेंट का समापन बेहतर स्थिति में करने की चुनौती है। भारत सातवें और आठवें स्थान के लिए मुकाबला खेलेगा, जहां उसका सामना बेल्जियम से होना है। टीम की कोशिश इस मुकाबले में जीत दर्ज कर विश्व कप अभियान का सकारात्मक अंत करने की होगी।

  • जापान की पहली पसंद भारत…. लेकिन कारखाने थाईलैंड में ज्यादा

    जापान की पहली पसंद भारत…. लेकिन कारखाने थाईलैंड में ज्यादा


    टोक्यो।
    जापान (Japan) के लिए भारत (India) कागज पर पहली पसंद है, कारखाने के लिए थाईलैंड (Thailand)। जापानी कंपनियों (Japanese Companies) की पसंद में भारत भले 61.8% वोट के साथ पसंदीदा ठिकानों की सूची में लगातार चौथे साल शीर्ष पर है, पर जापानी कंपनियां (Japanese Companies) भारत में 1400 हैं जबकि थाईलैंड में छह हजार।

    11 साल में निवेश का लक्ष्य 3.5 लाख करोड़ येन (2.10 लाख करोड़ रुपये) से बढ़कर 10 लाख करोड़ येन (6 लाख करोड़ रुपये) हो गया, कंपनियों की गिनती नहीं बढ़ी। रकम के वादे काम नहीं आए, इसलिए इस बार सरकार 220 भारतीय उद्योगपतियों को सीधे जापानी कारखानों के दरवाजे पर ले जा रही है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल (Piyush Goyal Japan visit) के नेतृत्व वाला यह दल सोमवार से 27 अगस्त तक जापान में रहेगा। रणनीति दौरे के नक्शे से समझ आती है। पैसा टोक्यो में है, पर कारखाना लगाने वाली कंपनियां वहां नहीं हैं।

    जापान की असली विनिर्माण ताकत आइची और कंसाई की उन हजारों मझोली कंपनियों में है, जो बड़ी कंपनियों को कलपुर्जे देती हैं। कोई जापानी कंपनी जब कहीं जाती है, तो आपूर्तिकर्ताओं का पूरा झुंड साथ ले जाती है। इसीलिए भारत पहली बार इंतजार के बजाय खुद उनके पास गया है। भारतीय दल नागोया में चुकेइरेन व नागोया चैंबर के साथ रोड शो करेगा, ओसाका व क्योटो में क्षेत्रीय उद्योग से जुड़ेगा।

    सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स व एआई पर गोलमेज बैठक
    इस कार्यक्रम में मशीन को समझने या जानने पर जोर है। सेमीकंडक्टर, एआई और इलेक्ट्रॉनिक्स पर एक गोलमेज बैठक है, पूंजीगत वस्तुओं, मशीनरी और वाहन उद्योग पर दूसरी। दौरे का मकसद दोतरफा निवेश बढ़ाना है। इसी क्रम में भारतीय कंपनियों का जापान जाना भी अहम है, जहां अभी सिर्फ 100 भारतीय कंपनियां हैं।


    भारत सिर्फ खरीदार नहीं…

    दल में रिलायंस के औद्योगिक नगर मेट सिटी के प्रमुख हैं, जो जापानी कंपनियों को जमीन बेचते हैं। मारुति सुजुकी है, गुजरात राज्य उर्वरक एवं रसायन है, बीमा व संपत्ति प्रबंधन कंपनियां हैं, जो जापान की सस्ती पेंशन पूंजी की तलाश में हैं, और स्टार्टअप का पूरा जत्था है, जिसके लिए टोक्यो में अलग बैठक होगी।

    दल में कौन-कौन?
    आरपीजी समूह के उपाध्यक्ष अनंत गोयनका, एसोचैम से निर्मल कुमार मिंडा, टीसीआई के विनीत अग्रवाल, रिन्यू पावर के सुमंत सिन्हा, किर्लोस्कर सिस्टम्स की गीतांजलि विक्रम किर्लोस्कर, एडवर्ब टेक के जलज दानी, कार्स24 के विक्रम चोपड़ा, गुजरात राज्य उर्वरक एवं रसायन के राजेंद्र कुमार, मारुति सुजुकी के राहुल भारती, मोबिक्विक की उपासना टाकू, न्यूस्पेस रिसर्च के जूलियस अमृत, निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट के संदीप सिक्का, रिलायंस मेट सिटी के श्रीवल्लभ गोयल, स्नैबिट के आयुष अग्रवाल, स्टार यूनियन दाई-इची लाइफ के अभय तिवारी और एसपीएफ की श्वेता राजपाल कोहली। वाहन, वाहन कलपुर्जे, अभियांत्रिकी, रसायन, पेट्रो रसायन, तकनीक और स्टार्टअप, यानी हर क्षेत्र से नाम हैं।

  • भारत ने सितंबर डिलीवरी के लिए 23 डॉलर से अधिक में LNG खरीदी, यूरोप की मांग से बढ़ी बाजार चुनौती

    भारत ने सितंबर डिलीवरी के लिए 23 डॉलर से अधिक में LNG खरीदी, यूरोप की मांग से बढ़ी बाजार चुनौती

    नई दिल्ली । ईरान युद्ध के बीच वैश्विक गैस आपूर्ति व्यवस्था पर बढ़ते दबाव का असर अब भारत की LNG खरीद पर भी दिखाई देने लगा है। भारतीय कंपनियों को प्राकृतिक गैस की जरूरत पूरी करने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार से अपेक्षाकृत ऊंची कीमत पर LNG खरीदनी पड़ रही है। सितंबर में डिलीवरी के लिए किए गए कुछ सौदों में कीमत 23 डॉलर प्रति MMBtu से अधिक बताई गई है। यह स्तर वर्ष 2022 के बाद भारत की महंगी LNG खरीद में शामिल है।

    सरकारी गैस कंपनी GAIL India ने सितंबर में डिलीवरी के लिए LNG की एक खेप स्पॉट मार्केट से खरीदी है। इसके लिए कंपनी ने 23 डॉलर प्रति MMBtu से ज्यादा कीमत चुकाई है। गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन यानी GSPC ने भी सितंबर में मिलने वाली LNG के लिए करीब 23 डॉलर प्रति MMBtu की कीमत पर खरीदारी की है। इन सौदों से संकेत मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की उपलब्धता और कीमत दोनों ही भारत के लिए चुनौती बन रहे हैं।

    भारत में महंगी LNG खरीदने की जरूरत कई कारणों से बढ़ी है। देश की गैस और बिजली कंपनियां घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए स्पॉट मार्केट से अतिरिक्त LNG खरीद रही हैं। विशेष रूप से उर्वरक क्षेत्र में गैस की लगातार आपूर्ति बनाए रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्राकृतिक गैस उर्वरक उत्पादन की प्रमुख जरूरतों में शामिल है। ऐसे में कंपनियों को ऊंची कीमतों के बावजूद खरीदारी करनी पड़ रही है।

    भारत लंबे समय से LNG की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से पूरा करता रहा है। कतर भारत के प्रमुख LNG आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है। हालांकि पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ऊर्जा ढांचे पर असर पड़ने से समुद्री मार्गों और LNG आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली आवाजाही में बाधा की आशंका ने भी वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है।

    कतर के LNG निर्यात ढांचे पर संघर्ष से जुड़े प्रभावों ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई है। आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका के कारण एशियाई खरीदारों को वैकल्पिक स्रोतों से गैस जुटाने की कोशिश करनी पड़ रही है। इसका असर कीमतों पर पड़ रहा है और भारत जैसे आयात पर निर्भर बाजारों के लिए खरीद लागत बढ़ रही है।

    भारत को LNG खरीद के लिए यूरोपीय खरीदारों से भी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है। यूरोप में गैस की कीमतों में तेजी आने से वहां LNG की मांग बढ़ी है। ऐसे में उपलब्ध कार्गो के लिए एशियाई और यूरोपीय खरीदारों के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होने की स्थिति बनी हुई है। इसका सीधा असर स्पॉट मार्केट की कीमतों पर पड़ सकता है।

    सरकारी ऊर्जा कंपनी BPCL ने भी इस सप्ताह स्पॉट मार्केट से LNG की एक खेप खरीदने का समझौता किया है। हालांकि इस सौदे की कीमत सार्वजनिक नहीं हुई है। लगातार महंगी LNG खरीदने की स्थिति बनी रहती है तो गैस आधारित बिजली, उर्वरक और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।

    LPG की कीमतों पर इसका असर तुरंत और सीधे पड़ना तय नहीं माना जा सकता, क्योंकि घरेलू रसोई गैस की कीमतें कई नीतिगत और बाजार संबंधी कारकों पर निर्भर करती हैं। हालांकि आयातित गैस और ऊर्जा लागत में लंबे समय तक बढ़ोतरी रहने पर पेट्रोलियम क्षेत्र की लागत संरचना पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में आने वाले समय में LPG की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

    फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती वैश्विक LNG आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता है। पश्चिम एशिया में तनाव, समुद्री परिवहन की स्थिति और यूरोप की बढ़ती मांग के बीच भारत के लिए सस्ती गैस की उपलब्धता महत्वपूर्ण रहेगी। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो भारतीय कंपनियों की खरीद लागत और ऊर्जा क्षेत्र पर उसका प्रभाव आने वाले महीनों में और स्पष्ट हो सकता है।

  • भारत का डेटा सेंटर बाजार तेजी से बढ़ा, छह वर्षों में लाइव आईटी क्षमता चार गुना होकर 1.7 गीगावाट पहुंची

    भारत का डेटा सेंटर बाजार तेजी से बढ़ा, छह वर्षों में लाइव आईटी क्षमता चार गुना होकर 1.7 गीगावाट पहुंची

    नई दिल्ली ।भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बाद सबसे बड़े डेटा सेंटर बाजार के रूप में तेजी से अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। पिछले छह वर्षों में देश की लाइव आईटी क्षमता करीब चार गुना बढ़कर 1.7 गीगावाट हो गई है। डेटा सेंटर क्षेत्र में बढ़ती मांग, मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे और बड़े निवेश के कारण आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र के और विस्तार की उम्मीद है।

    भारत में डेटा सेंटर परियोजनाओं की एक बड़ी पाइपलाइन भी तैयार हो चुकी है। वर्तमान में करीब 1.3 गीगावाट क्षमता निर्माणाधीन है। इसके अलावा लगभग 3.2 गीगावाट क्षमता वाली ऐसी परियोजनाएं भी मौजूद हैं, जिनके लिए जमीन, बिजली और निर्माण से संबंधित जरूरी मंजूरियां हासिल की जा चुकी हैं। इससे संकेत मिलता है कि आने वाले वर्षों में देश की डेटा प्रोसेसिंग और स्टोरेज क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।

    डेटा सेंटर उद्योग के विस्तार में बिजली की उपलब्धता और फाइबर कनेक्टिविटी को महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। भारत में इंटरनेट उपयोग, क्लाउड सेवाओं, डिजिटल भुगतान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार के साथ डेटा स्टोरेज तथा प्रोसेसिंग की जरूरत लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि वैश्विक और घरेलू कंपनियां भारत में बड़े स्तर पर निवेश की योजनाएं बना रही हैं।

    महाराष्ट्र देश का सबसे प्रमुख डेटा सेंटर बाजार बना हुआ है। भारत की कुल लाइव आईटी क्षमता में राज्य की हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत है। निर्माण शुरू करने के लिए जरूरी मंजूरियां प्राप्त कर चुकी परियोजनाओं की सबसे बड़ी पाइपलाइन भी महाराष्ट्र में मौजूद है। मुंबई और आसपास के क्षेत्रों में पहले से विकसित डिजिटल और बिजली संबंधी बुनियादी ढांचा इस क्षेत्र के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    डेटा सेंटर विकास का अगला चरण केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहने वाला है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी कंपनियां बड़े निवेश और नई परियोजनाओं की घोषणाएं कर रही हैं। इन राज्यों में जमीन, बिजली, कनेक्टिविटी और औद्योगिक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता के कारण भविष्य में नई क्षमता विकसित होने की संभावना है।

    घरेलू कारोबारी समूहों ने देश में डेटा सेंटर विकास के लिए करीब 210 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। यह घोषित कुल निवेश का लगभग 45 प्रतिशत है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत में डेटा सेंटर क्षेत्र का विकास केवल विदेशी कंपनियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि घरेलू उद्योग भी इसमें बड़ी भूमिका निभा रहा है।

    वैश्विक हाइपरस्केलर कंपनियां भी भारत के डेटा सेंटर बाजार में बड़े निवेश की तैयारी कर रही हैं। गूगल, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने मिलकर करीब 84 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है। घोषित कुल निवेश का लगभग 95 प्रतिशत बड़े हाइपरस्केल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कैंपस से जुड़ा है।

    डेटा सेंटर के विस्तार का सीधा असर बिजली की मांग पर भी पड़ेगा। भारत में डेटा सेंटर क्षेत्र की बिजली खपत 2025 में करीब 11 टेरावाट-घंटे से बढ़कर 2035 तक 91 टेरावाट-घंटे पहुंचने का अनुमान है। यानी एक दशक में मांग आठ गुना से अधिक बढ़ सकती है।

    बढ़ती बिजली जरूरत के बीच अक्षय ऊर्जा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। कई बड़ी हाइपरस्केल कंपनियों ने वर्ष 2030 तक नेट-जीरो लक्ष्य निर्धारित किए हैं। ऐसे में डेटा सेंटर संचालन के लिए सौर और अन्य नवीकरणीय स्रोतों से बिजली की मांग बढ़ने की संभावना है। भारत की स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में 2021 से अब तक 7.1 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है, जो बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार करती है।