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  • त्योहारों पर महंगाई का तड़का…. कीमतें बढ़ाने की जगह छोटे पैक… सामान की मात्रा भी घटी

    त्योहारों पर महंगाई का तड़का…. कीमतें बढ़ाने की जगह छोटे पैक… सामान की मात्रा भी घटी


    नई दिल्ली।
    दशहरा (Dussehra) और दिवाली (Diwali) से पहले रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान की बढ़ती कीमतों (Rising Prices) का असर अब अलग तरीके से दिखाई दे रहा है। कच्चे माल और उत्पादन से जुड़ी लागत बढ़ने के बीच कंपनियां हर पैकेट की कीमत सीधे बढ़ाने (Directly Increasing Price) से बच रही हैं। इसके बजाय छोटे पैक में सामान की मात्रा घटाई (Reduced Quantity Small packs) जा रही है। कई मामलों में मात्रा में 2 से 7 फीसदी तक की कमी की जा रही है। वहीं बड़े पैक की कीमत सीधे 5 से 6 फीसदी तक बढ़ाई जा रही है। इसका मतलब है कि ग्राहक को कई सामान पहले जितने ही रुपये में मिलेंगे, लेकिन पैकेट में सामान कुछ कम होगा।


    कंपनियां पैकेट में सामान कम क्यों कर रही हैं?

    एफएमसीजी कंपनियों के सामने इस समय लागत बढ़ने और ग्राहकों को कीमत का झटका देने से बचने की दोहरी चुनौती है। पाम ऑयल, पैकेजिंग, कच्चे तेल से जुड़े उत्पादों और दूसरी जिंसों की कीमत बढ़ने से कंपनियों की लागत बढ़ रही है। दूसरी ओर ग्राहक रोजमर्रा की चीजों की कीमत को लेकर काफी सतर्क हैं। ऐसे में कंपनियां ऐसी कीमत बनाए रखना चाहती हैं, जिससे बिक्री की मात्रा पर ज्यादा असर न पड़े। इसलिए छोटे पैक में कीमत बढ़ाने के बजाय सामान की मात्रा कम करना आसान विकल्प माना जा रहा है। ग्राहक को पैकेट की कीमत पहले जैसी दिखाई देती है, लेकिन उसमें मिलने वाला सामान कम हो जाता है।


    किन रोजमर्रा के सामान पर इसका असर दिख रहा है?

    यह बदलाव बिस्कुट, नमकीन, स्नैक्स, नूडल्स, हेयर ऑयल, साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, चीनी और चाय जैसी रोजमर्रा की चीजों में देखने को मिल रहा है। बिस्कुट, नमकीन और स्नैक्स बनाने वाली कई कंपनियों ने बढ़ी लागत से निपटने के लिए कुछ उत्पादों की कीमतें बढ़ाई हैं। बीकाजी फूड्स के मनोज वर्मा के मुताबिक, पिछले छह-सात महीनों में औसत कच्चे माल की लागत करीब 7 फीसदी बढ़ी है। पाम ऑयल, पैकेजिंग और दूसरी जिंसों की कीमतों में बढ़ोतरी इसका प्रमुख कारण है। यानी कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है और उसका असर किसी न किसी रूप में ग्राहकों तक पहुंच रहा है।


    दूध और घी की कीमतों पर कितना दबाव है?

    त्योहारी सीजन में डेयरी उत्पादों की लागत पर भी दबाव बढ़ रहा है। पारस डेयरी के विपणन अधिकारी वीपीएस मलिक के मुताबिक, त्योहारी सीजन में दूध की कीमत 3 रुपये प्रति लीटर तक और बढ़ सकती है। घी की कीमत पहले ही 25 से 30 रुपये प्रति किलो बढ़ चुकी है। इसके अलावा इतनी ही और बढ़ोतरी की संभावना जताई गई है। इसका सीधा असर उन परिवारों के बजट पर पड़ सकता है, जिनके घर में दूध और घी की नियमित खपत होती है। त्योहारों के दौरान मिठाइयों और दूसरे खाद्य पदार्थों में डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल बढ़ने से भी कीमतों पर नजर बनी हुई है।


    10, 20 और 50 रुपये के पैक पर कंपनियों की नजर क्यों है?

    डाटा रिसर्च फर्म नीलसन इंडिया के प्रीतम भादुड़ी के मुताबिक, कंपनियों के लिए 10, 20 और 50 रुपये कीमत वाले छोटे पैक काफी महत्वपूर्ण हैं। इन पैकों की कीमत बढ़ने पर ग्राहक को सामान तुरंत महंगा महसूस हो सकता है। इसलिए इन पैकों में मात्रा घटाना कंपनियों के लिए आसान रास्ता बन जाता है। दूसरी तरफ बड़े पैक में कीमत बढ़ाने की गुंजाइश ज्यादा होती है। आधुनिक रिटेल और ई-कॉमर्स में बिकने वाले बड़े पैक पर कंपनियां बढ़ी लागत का कुछ हिस्सा सीधे ग्राहक पर डाल सकती हैं। इस तरह कंपनियां छोटे पैक में कीमत को नियंत्रित रखने और बड़े पैक में दाम बढ़ाने की रणनीति अपना रही हैं। इसका असर ग्राहक की जेब पर सिर्फ कीमत बढ़ने से नहीं, बल्कि कम सामान मिलने के रूप में भी पड़ सकता है।

  • आरबीआई नीति, तिमाही नतीजे और पश्चिम एशिया तनाव से अगले सप्ताह शेयर बाजार की दिशा पर निवेशकों की नजर रहेगी

    आरबीआई नीति, तिमाही नतीजे और पश्चिम एशिया तनाव से अगले सप्ताह शेयर बाजार की दिशा पर निवेशकों की नजर रहेगी

    नई दिल्ली । छोटे कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार पर वैश्विक दबाव हावी रहा और प्रमुख सूचकांक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तरों से नीचे फिसल गए। अब अगले सप्ताह बाजार की दिशा पर आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही के कॉरपोरेट नतीजे और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का प्रभाव देखने को मिल सकता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के संकेत मिलने पर भारतीय बाजार में राहतभरी तेजी देखने को मिल सकती है। इसके विपरीत आरबीआई की नीति, महंगाई को लेकर उसका रुख और आर्थिक वृद्धि के अनुमान घरेलू ब्याज दरों तथा वित्तीय बाजारों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देंगे।

    पिछले सप्ताह बाजार में कमजोरी की शुरुआत पहले कारोबारी दिन से ही हो गई थी। सोमवार को सेंसेक्स में 1.52 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और अगले दो कारोबारी सत्रों में भी कमजोरी बनी रही। गुरुवार को सेंसेक्स 0.79 प्रतिशत और गिर गया। साप्ताहिक आधार पर सेंसेक्स 1,670.84 अंक टूटकर 71,909.70 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 3 प्रतिशत से अधिक गिरकर 22,421.95 पर आ गया। विश्लेषकों के अनुसार, बाजार में यह गिरावट जारी करेक्शन के दौर को दर्शाती है।

    तकनीकी संकेतकों के स्तर पर भी बाजार में कमजोरी बनी हुई है। निफ्टी लगातार आठवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ है। इसका साप्ताहिक आरएसआई करीब 31.06 पर है, जो 50 के तटस्थ स्तर से काफी नीचे है और कमजोर मोमेंटम का संकेत देता है। हालांकि आरएसआई अब ओवरसोल्ड जोन के करीब पहुंच रहा है, जिससे निचले स्तरों पर बीच-बीच में तकनीकी रिकवरी की संभावना बन सकती है। तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, 22,800 और 23,000 के स्तर निफ्टी के लिए निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध रहेंगे। इन स्तरों के ऊपर टिकाऊ बढ़त मिलने पर बिकवाली का दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर 22,350 और 22,180 के स्तर प्रमुख सपोर्ट माने जा रहे हैं।

    बाजार की धारणा पर फिलहाल वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव अधिक है। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड्स में बढ़ोतरी, महंगाई को लेकर चिंता और ऊंची ऊर्जा कीमतों ने निवेशकों को सतर्क रखा है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स बढ़ने से उभरते बाजारों में निवेश का आकर्षण भी प्रभावित हो रहा है। हालांकि घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेतक अपेक्षाकृत मजबूत बने हुए हैं। अगस्त में भारत की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि बढ़कर 8 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में संशोधित आंकड़ा 7.4 प्रतिशत था। विनिर्माण क्षेत्र में 9 प्रतिशत तथा बिजली और गैस आपूर्ति में 12.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    ऊर्जा बाजार का रुख भी अगले सप्ताह महत्वपूर्ण रहेगा। हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड अपने ऊंचे स्तरों से नीचे आया है, क्योंकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति युद्ध-पूर्व स्तरों के करीब पहुंचने लगी है। इससे ऊर्जा कीमतों को कुछ राहत मिली है। इसके साथ ही अमेरिका से आने वाले महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़ों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। नॉन-फार्म पेरोल्स और आईएसएम मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई जैसे आंकड़े वैश्विक बाजारों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं और इसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। कुल मिलाकर आरबीआई नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही के नतीजे, पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी आर्थिक आंकड़े अगले सप्ताह बाजार के प्रमुख ट्रिगर रहेंगे।

  • अक्टूबर की शुरुआत में महंगाई का असर, गैस सिलेंडर से लेकर हवाई सफर तक बढ़ा खर्च

    अक्टूबर की शुरुआत में महंगाई का असर, गैस सिलेंडर से लेकर हवाई सफर तक बढ़ा खर्च

    नई दिल्ली: अक्टूबर महीने की शुरुआत आम लोगों के लिए महंगाई का असर बढ़ाने वाले कई बदलाव लेकर आई है। त्योहारों के सीजन में जहां लोग खरीदारी, यात्रा और अन्य जरूरी खर्चों की तैयारी कर रहे हैं, वहीं कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर, एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ), घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और पासपोर्ट सेवाओं की लागत बढ़ गई है। इन बदलावों का असर होटल, रेस्तरां, कैटरिंग, हवाई यात्रा और घरेलू खरीदारी के बजट पर पड़ सकता है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों ने 19 किलोग्राम वाले कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 62.50 रुपए तक की बढ़ोतरी की है। इसके बाद दिल्ली में इसकी कीमत 2,810 रुपए और मुंबई में 2,764 रुपए हो गई है। पटना में कीमत में सबसे अधिक 71.50 रुपए की वृद्धि दर्ज की गई है।

    कमर्शियल गैस की कीमत बढ़ने से होटल, रेस्तरां, ढाबा और कैटरिंग उद्योग की लागत बढ़ सकती है। अक्टूबर और नवंबर में त्योहारों तथा शादी-विवाह के कारण खाद्य सेवाओं की मांग बढ़ने के बीच कारोबारियों पर अतिरिक्त खर्च का दबाव पड़ सकता है। इसका असर आगे उपभोक्ताओं तक भी पहुंचने की संभावना है। इसी तरह अक्टूबर से एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी एटीएफ की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई है। तेल कंपनियों ने हवाई ईंधन की कीमत में प्रति लीटर 16 रुपए तक का इजाफा किया है। विमानन उद्योग में ईंधन कुल परिचालन लागत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा होता है, इसलिए एटीएफ महंगा होने से एयरलाइंस की लागत बढ़ेगी। दशहरा, दीपावली और छठ पूजा के दौरान यात्रियों की मांग बढ़ने पर एयरलाइंस किराए में बढ़ोतरी कर सकती हैं।

    त्योहारी खरीदारी के बीच घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की कीमतों में बढ़ोतरी भी उपभोक्ताओं के बजट को प्रभावित कर सकती है। वैश्विक बाजार में कॉपर, स्टील और एल्युमिनियम जैसे कच्चे माल की कीमतें बढ़ने के कारण कंपनियों ने कई उत्पादों के दाम बढ़ाए हैं। उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, स्मार्ट टीवी, स्प्लिट एसी, रेफ्रिजरेटर और वॉशिंग मशीन जैसी वस्तुओं की कीमतों में 5 से 8 प्रतिशत तक की वृद्धि देखी जा सकती है। इससे उत्पाद के अनुसार ग्राहकों को करीब 1,200 रुपए से 3,500 रुपए तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ सकता है। त्योहारी ऑफर्स और डिस्काउंट उपलब्ध होने के बावजूद कीमतों में हुई यह वृद्धि खरीदारी के कुल बजट पर असर डाल सकती है।

    पासपोर्ट से जुड़ी सेवाओं की लागत बढ़ना भी उन लोगों के लिए अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकता है, जो नया पासपोर्ट बनवाने या पुराने पासपोर्ट का नवीनीकरण कराने की योजना बना रहे हैं। सामान्य श्रेणी के पासपोर्ट आवेदन शुल्क में वृद्धि की गई है। नई व्यवस्था के तहत पासपोर्ट बनवाने की लागत में 1,000 रुपए तक की बढ़ोतरी हुई है। इसका असर विदेश यात्रा, शिक्षा या रोजगार के लिए पासपोर्ट बनवाने वाले लोगों की कुल लागत पर पड़ सकता है। अक्टूबर और नवंबर का समय त्योहारों, शादी-विवाह और यात्रा के लिहाज से व्यस्त माना जाता है, इसलिए इस दौरान बढ़ी हुई लागत का प्रभाव अधिक दिखाई दे सकता है।

    कुल मिलाकर, अक्टूबर की शुरुआत में गैस सिलेंडर, हवाई ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और पासपोर्ट सेवाओं से जुड़े खर्च बढ़े हैं। कच्चे माल और ऊर्जा की लागत ऊंची बनी रहने पर आने वाले समय में अन्य उत्पादों और सेवाओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने की बात विशेषज्ञों ने कही है। ऐसे में त्योहारों के दौरान खरीदारी और यात्रा की योजना बना रहे लोगों को बढ़ी हुई लागत को ध्यान में रखना होगा। कारोबारियों के लिए भी ईंधन और अन्य परिचालन खर्च में बढ़ोतरी अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकती है।

  • सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, शुरुआती कारोबार में चांदी 2.34 प्रतिशत और सोना 1.80 प्रतिशत तक टूटा

    सोने और चांदी की कीमतों में बड़ी गिरावट, शुरुआती कारोबार में चांदी 2.34 प्रतिशत और सोना 1.80 प्रतिशत तक टूटा

    नई दिल्ली । सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार, 28 सितंबर को गिरावट देखने को मिली। घरेलू वायदा बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान दोनों कीमती धातुओं के भाव में कमजोरी दर्ज की गई। कारोबार के शुरुआती दौर में सोना करीब 1.80 प्रतिशत और चांदी 2.34 प्रतिशत तक टूट गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी दोनों धातुओं की कीमतों में गिरावट रही।

    मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने का 5 अक्टूबर 2026 का वायदा कॉन्ट्रैक्ट पिछले कारोबारी सत्र में 1,50,881 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 1,50,100 रुपये प्रति 10 ग्राम पर खुला। इसके बाद कीमत में और गिरावट दर्ज की गई।

    सुबह 9:50 बजे सोने का वायदा भाव 2,721 रुपये यानी 1.80 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 1,48,160 रुपये प्रति 10 ग्राम पर कारोबार कर रहा था। कारोबारी सत्र के दौरान सोने ने 1,47,667 रुपये प्रति 10 ग्राम का न्यूनतम स्तर छुआ। वहीं, इसका उच्चतम स्तर 1,50,100 रुपये प्रति 10 ग्राम दर्ज किया गया।

    सोने की तरह चांदी के भाव में भी गिरावट दर्ज की गई। एमसीएक्स पर चांदी का 4 दिसंबर 2026 का वायदा कॉन्ट्रैक्ट पिछले कारोबारी सत्र में 2,34,696 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुआ था। सोमवार को यह 2,32,300 रुपये प्रति किलोग्राम पर खुला।

    सुबह 9:50 बजे चांदी 5,490 रुपये यानी 2.34 प्रतिशत की गिरावट के साथ 2,29,206 रुपये प्रति किलोग्राम पर कारोबार कर रही थी। कारोबार के दौरान चांदी का न्यूनतम भाव 2,28,035 रुपये प्रति किलोग्राम और उच्चतम भाव 2,32,300 रुपये प्रति किलोग्राम रहा।

    घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोने और चांदी की कीमतों में कमजोरी देखी गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 2.09 प्रतिशत गिरकर 4,230 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था। वहीं, चांदी की कीमत 3.67 प्रतिशत की गिरावट के साथ 62.43 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गई।

    बाजार के जानकारों के मुताबिक, कीमती धातुओं की कीमतों में गिरावट के पीछे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरें बढ़ाए जाने की आशंका और डॉलर इंडेक्स में लगातार तेजी को प्रमुख वजह माना जा रहा है। डॉलर इंडेक्स बढ़कर 100.83 पर पहुंच गया है। डॉलर में मजबूती का असर सोने और चांदी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी देखने को मिल रहा है।

    डॉलर इंडेक्स के जरिए दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की स्थिति को मापा जाता है। इसमें यूरो, जापानी येन, पाउंड स्टर्लिंग, कनाडाई डॉलर, स्वीडिश क्रोना और स्विस फ्रैंक शामिल हैं। इन मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती या कमजोरी को दर्शाने वाला यह सूचकांक वैश्विक बाजार में डॉलर की स्थिति का संकेत देता है।

    सोमवार के शुरुआती कारोबार में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों में सोने तथा चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, दिए गए कारोबारी आंकड़े सुबह 9:50 बजे तक के हैं और पूरे दिन के अंतिम भाव इनमें शामिल नहीं हैं।

  • भारत का मजबूत बॉन्ड बाजार बना भरोसे का आधार, आर्थिक मजबूती से शेयरों में लौट सकती है तेजी

    भारत का मजबूत बॉन्ड बाजार बना भरोसे का आधार, आर्थिक मजबूती से शेयरों में लौट सकती है तेजी


    नई दिल्ली ।
    भारतीय बॉन्ड बाजार ने हाल के वर्षों में घरेलू परिस्थितियों के साथ-साथ वैश्विक वित्तीय दबावों के बीच भी मजबूत प्रदर्शन किया है। भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता के अनुसार, देश के बॉन्ड बाजार की मजबूती केवल पिछले प्रदर्शन की तुलना में ही बेहतर नहीं रही है, बल्कि दुनिया के कई प्रमुख बाजारों की तुलना में भी इसका प्रदर्शन मजबूत रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती का असर आगे चलकर शेयर बाजार में भी दिखाई दे सकता है।

    उन्होंने बताया कि अमेरिका में बॉन्ड यील्ड लंबे समय के ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बावजूद भारतीय बॉन्ड बाजार ने अपेक्षाकृत मजबूती बनाए रखी। इसके पीछे केंद्र सरकार की राजकोषीय अनुशासन के प्रति प्रतिबद्धता और आने वाले वर्षों में आर्थिक विकास की बेहतर संभावनाओं को महत्वपूर्ण आधार माना गया है। वित्तीय स्थिति में सुधार और भविष्य में राजकोषीय परिणामों के बेहतर रहने की उम्मीद ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।

    मौद्रिक नीति की विश्वसनीयता और महंगाई से जुड़े संरचनात्मक दबावों में कमी को भी बॉन्ड बाजार के लिए सकारात्मक माना गया है। इन परिस्थितियों ने भारतीय ऋण बाजार में स्थिरता बनाए रखने में मदद की है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत के बॉन्ड बाजार की मजबूती और सार्वजनिक वित्त को संतुलित रखने की नीति को महत्वपूर्ण माना गया है।

    हालांकि, शेयर बाजार में बॉन्ड बाजार जैसी मजबूती अभी पूरी तरह दिखाई नहीं दी है। इसके पीछे वैश्विक स्तर पर निवेशकों की बदलती प्राथमिकताओं को एक वजह माना जा रहा है। खासतौर पर कुछ विकसित अर्थव्यवस्थाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कंपनियों और तकनीकी क्षेत्र से जुड़ी विकास संभावनाएं निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।

    पूनम गुप्ता के मुताबिक, भारतीय शेयर बाजार ने जून 2022 से सितंबर 2024 के बीच उल्लेखनीय प्रदर्शन किया था। इसके बाद कुछ दूसरे देशों के बाजारों में तेजी का दौर देखने को मिला। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती लंबे समय में शेयर बाजार के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है और भारतीय इक्विटी दोबारा निवेशकों के लिए अधिक आकर्षक बन सकती है।

    उन्होंने भारत के भुगतान संतुलन और रुपये की स्थिति पर भी चर्चा की। उनके अनुसार, भारत लंबे समय से सीमित चालू खाता घाटे और अपेक्षाकृत मजबूत पूंजी प्रवाह की स्थिति में रहा है। समय के साथ सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले चालू खाता घाटे में कमी आई है, जिससे देश के बाहरी क्षेत्र की मजबूती बढ़ी है।

    उन्होंने कहा कि भारत का चालू खाता घाटा उन स्तरों से काफी नीचे है, जिन्हें आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए सुरक्षित माना जाता है। देश के लिए शुद्ध सेवा निर्यात और विदेशों में रहने वाले भारतीयों से मिलने वाला रेमिटेंस महत्वपूर्ण संरचनात्मक ताकत बने हुए हैं।

    सेवा क्षेत्र से होने वाली आय और रेमिटेंस लगातार मजबूत रहने के कारण वस्तुओं के व्यापार में होने वाले घाटे की भरपाई करने में मदद मिलती है। इसी वजह से भारत का चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से नीचे नियंत्रित रहने में सफल रहा है। यह स्थिति देश की बाहरी आर्थिक स्थिरता और भविष्य की विकास संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार मानी जा रही है।

  • छठ-दिवाली से पहले बढ़ सकती है रसोई की महंगाई, खाने के तेल के दाम 7-8% तक बढ़ने की आशंका

    छठ-दिवाली से पहले बढ़ सकती है रसोई की महंगाई, खाने के तेल के दाम 7-8% तक बढ़ने की आशंका

    नई दिल्ली ।त्योहारी सीजन शुरू होने से पहले आम लोगों की रसोई का बजट एक बार फिर प्रभावित हो सकता है। खाने पकाने में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेल की कीमतों में 7 से 8 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। वैश्विक बाजार में कच्चे खाद्य तेल की बढ़ती कीमतों और आयात लागत में इजाफे के कारण कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ा है।

    आने वाले महीनों में दशहरा, छठ पूजा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार हैं। इस दौरान खाद्य तेल की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे समय में कीमतों में संभावित बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ सकता है। भारत अपनी खाद्य तेल की जरूरत का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले बदलाव का घरेलू कीमतों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

    अगर त्योहारों से पहले खाद्य तेल के दाम बढ़ते हैं, तो मार्च के बाद यह कीमतों में बढ़ोतरी का तीसरा दौर होगा। मार्च से शुरू हुए पिछले दो दौर में कंपनियों ने खाद्य तेल की कीमतों में करीब 5 से 6 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की थी। इसके बाद मार्च से जून के बीच कुल कीमतों में लगभग 10 से 12 प्रतिशत तक इजाफा हुआ।

    अब वैश्विक परिस्थितियों और कच्चे माल की आपूर्ति में कमी के कारण एक बार फिर 7 से 8 प्रतिशत तक कीमत बढ़ने की आशंका है। यदि यह बढ़ोतरी होती है, तो मार्च से अब तक खाद्य तेल की कुल कीमतों में करीब 18 से 20 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है।

    कीमतों पर बढ़ते दबाव की प्रमुख वजह कच्चे खाद्य तेल की बढ़ी हुई आयात लागत है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 18 सितंबर को मुंबई बंदरगाहों पर कच्चे पाम तेल की कीमत 1,265 डॉलर प्रति टन, सोयाबीन तेल की 1,314 डॉलर प्रति टन और सूरजमुखी तेल की कीमत 1,380 डॉलर प्रति टन थी।

    पाम और सोयाबीन तेल की लागत एक साल पहले की तुलना में करीब 11 प्रतिशत अधिक रही। वहीं, सूरजमुखी तेल की लागत में लगभग 7 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इससे घरेलू स्तर पर तेल को रिफाइन और प्रोसेस करने वाली कंपनियों की लागत बढ़ गई है।

    इसके अलावा रुपये की कमजोरी, परिवहन लागत में बढ़ोतरी और बीमा प्रीमियम बढ़ने से भी आयातित तेल महंगा हुआ है। इन सभी कारकों का असर दुनिया भर में वनस्पति तेल की कीमतों पर पड़ा है और इसका दबाव भारतीय रिफाइनरों तथा प्रोसेसर्स पर भी बढ़ा है।

    उद्योग से जुड़े आदित्य अग्रवाल के अनुसार, कच्चे खाद्य तेल की लैंडेड कॉस्ट में करीब 8 से 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। लागत में इस वृद्धि को देखते हुए कंपनियों के सामने इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डालने का विकल्प बच सकता है।

    खाद्य तेल रोजमर्रा की जरूरत की प्रमुख वस्तुओं में शामिल है। इसलिए कीमतों में संभावित वृद्धि का असर घरेलू खर्च के साथ-साथ त्योहारों के दौरान होने वाली खरीदारी पर भी पड़ सकता है। हालांकि, वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी, यह वैश्विक बाजार, आयात लागत और कंपनियों के मूल्य निर्धारण पर निर्भर करेगा।

    ऐसे में छठ और दिवाली से पहले खाद्य तेल की कीमतों पर नजर बनी हुई है। यदि लागत का मौजूदा दबाव आगे भी कायम रहता है, तो आने वाले समय में उपभोक्ताओं को रसोई के बजट में अतिरिक्त खर्च का सामना करना पड़ सकता है।

  • भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत

    भारत की आर्थिक रफ्तार पर वैश्विक भरोसा बढ़ा, WEF ने 6.7 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताकर दिया बड़ा संकेत


    नई दिल्ली ।भारत वित्त वर्ष 2026-27 में 6.7 प्रतिशत की अनुमानित GDP वृद्धि के साथ दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे मजबूत विकास संभावनाओं वाले देशों में बना हुआ है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सितंबर 2026 की चीफ इकोनॉमिस्ट्स आउटलुक रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती के पीछे घरेलू मांग को प्रमुख आधार बताया गया है।

    रिपोर्ट में अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान, भारत समेत दुनिया के 10 प्रमुख क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति का आकलन किया गया है। इसके लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े 92 मुख्य अर्थशास्त्रियों की राय ली गई।

    भारत को लेकर विशेषज्ञों का भरोसा मई की तुलना में बढ़ा है। सितंबर की रिपोर्ट में 74 प्रतिशत मुख्य अर्थशास्त्रियों ने भारत में मजबूत या बहुत मजबूत आर्थिक वृद्धि की उम्मीद जताई है। मई में यह आंकड़ा 52 प्रतिशत था। वहीं 98 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि कम से कम मध्यम स्तर या उससे बेहतर रह सकती है।

    रिपोर्ट में रोजगार की स्थिति को लेकर अपेक्षाकृत स्थिर तस्वीर सामने आई है। करीब 70 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को अगले एक वर्ष में बेरोजगारी दर में कोई बड़ा बदलाव होने की उम्मीद नहीं है। हालांकि 17 प्रतिशत विशेषज्ञ बेरोजगारी बढ़ने और 13 प्रतिशत इसमें कमी आने का अनुमान लगा रहे हैं।

    आंकड़ों के मुताबिक, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की बेरोजगारी दर जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 5 प्रतिशत रह गई। इसी दौरान श्रम बल भागीदारी दर 55.4 प्रतिशत से बढ़कर 55.6 प्रतिशत हो गई।

    रिपोर्ट के अनुसार, ये आंकड़े मजबूत आर्थिक गतिविधियों के बीच श्रम बाजार के अपेक्षाकृत स्थिर रहने का संकेत देते हैं। हालांकि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की गति बनाए रखना अभी भी महत्वपूर्ण माना गया है।

    महंगाई के मोर्चे पर भी विशेषज्ञों की चिंता मई के मुकाबले कम हुई है। अगले 12 महीनों को लेकर 55 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मध्यम महंगाई की संभावना जताई है, जबकि 45 प्रतिशत ने उच्च महंगाई की आशंका व्यक्त की है। मई में 61 प्रतिशत विशेषज्ञ उच्च या बहुत उच्च महंगाई को लेकर चिंतित थे।

    अगस्त में CPI आधारित खुदरा महंगाई 4.8 प्रतिशत रही। यह भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि लक्ष्य से ऊपर है, लेकिन 2 से 6 प्रतिशत के निर्धारित दायरे में बनी हुई है।

    मौद्रिक नीति को लेकर 67 प्रतिशत विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 12 महीनों में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा। वहीं 24 प्रतिशत विशेषज्ञों ने नीति के और सख्त होने की संभावना जताई है। अगस्त में RBI ने नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखते हुए तटस्थ रुख कायम रखा था।

    राजकोषीय नीति को लेकर भी 72 प्रतिशत विशेषज्ञों ने बड़े बदलाव की संभावना नहीं जताई। करीब 22 प्रतिशत ने कुछ नरम रुख अपनाए जाने की संभावना व्यक्त की।

    रिपोर्ट का सर्वेक्षण 20 अगस्त को पूरा हुआ था। इसके बाद 31 अगस्त को जारी पहली तिमाही के GDP आंकड़ों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई। इस प्रदर्शन के बाद कई वैश्विक संस्थानों ने भारत के विकास अनुमान में बदलाव किया है।

    मूडीज ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की GDP वृद्धि का अनुमान 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया है। एजेंसी के मुताबिक, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष जैसी वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने मजबूती दिखाई है।

  • US: महंगाई को काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व का बड़ा फैसला…. ब्याज दरों में किया इजाफा

    US: महंगाई को काबू में करने के लिए फेडरल रिजर्व का बड़ा फैसला…. ब्याज दरों में किया इजाफा


    वाशिंगटन।
    अमेरिका (America) में जिद्दी बनी महंगाई (Inflation) पर लगाम कसने के लिए केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ (Central Bank ‘Federal Reserve’) ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। व्हाइट हाउस (White House) के लगातार दबाव को दरकिनार करते हुए फेडरल रिजर्व ने बुधवार को बेंचमार्क ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है। वर्ष 2023 के बाद से यह पहला मौका है जब अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में इजाफा किया है। इस फैसले से न केवल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (President Donald Trump) की कम ब्याज दरों की मांग को झटका लगा है, बल्कि इसका असर वैश्विक बाजारों पर भी देखने को मिल सकता है।


    महंगाई पर लगाम लगाने के लिए उठाया सख्त कदम

    फेडरल रिजर्व ने मुख्य ब्याज दर (बेंचमार्क रेट) में 25 बेसिस प्वाइंट (0.25 फीसदी) की बढ़ोतरी की है। इस फैसले के बाद अमरीका में मुख्य ब्याज दर बढ़कर लगभग 3.9 फीसदी हो गई है। बैंक के इस कदम का सीधा असर आम जनता पर पड़ेगा, जिससे समय के साथ होम लोन, ऑटो लोन और क्रेडिट कार्ड पर ब्याज दरें महंगी हो जाएंगी। त्रैमासिक अनुमानों को जारी करते हुए फेड की दर-निर्धारण समिति (एफओएमसी) ने संकेत दिया है कि महंगाई को नियंत्रित करने के लिए इस साल के अंत तक ब्याज दरों को एक बार फिर बढ़ाकर 4.1 फीसदी तक किया जा सकता है।

    केंद्रीय बैंक ने अपने आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया, ‘आज की नीतिगत कार्रवाई मुद्रास्फीति (महंगाई) को केंद्रीय बैंक के दो प्रतिशत के लक्ष्य पर समयबद्ध तरीके से वापस लाने में मदद करेगी।’


    चुनाव से ठीक पहले आम जनता पर दोहरा बोझ?

    फेड का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी जनता पहले से ही खाद्य पदार्थों, पेट्रोल-डीजल और आवास की बढ़ती कीमतों से जूझ रही है। अमेरिका में महज सात हफ्ते बाद मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं, और ऐसे में बढ़ती महंगाई चुनावी अभियानों का सबसे मुख्य मुद्दा बन चुका है। ब्याज दरों के बढ़ने से आम उपभोक्ताओं के लिए कर्ज लेना और महंगा हो जाएगा।


    चेयरपर्सन केविन वॉश का क्या रुख?

    यह फैसला फेडरल रिजर्व के नए चेयरपर्सन केविन वॉश के रुख में आए एक बड़े मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से नियुक्त किए गए केविन वॉश ने इसी साल मई में फेड अध्यक्ष का पद संभाला था। पिछले साल जब ट्रंप इस पद के लिए उनके नाम पर विचार कर रहे थे, तब वॉश ने कई बार संकेत दिए थे कि फेड ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। उन्होंने कम ब्याज दरों की राष्ट्रपति ट्रंप की मांग का समर्थन भी किया था। हालांकि, पद संभालने और लगातार ऊंची बनी महंगाई के आंकड़ों के बीच वॉश ने राजनीतिक दबाव के बजाय केंद्रीय बैंक की नीतिगत स्वायत्तता और महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी है।

    अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने जनवरी 2026 से यूएस फेड रेट्स को स्थिर रखा है। बैंक ने एनर्जी की कीमतों में अचानक आए उछाल के असर को समझने और कीमतों पर टैरिफ के असर को पूरी इकॉनमी में फैलने देने के लिए इंतजार करने का फैसला किया था। हालांकि, पिछली यूएस फेड मीटिंग में वोटिंग करने वाले सदस्यों में से एक-चौथाई ने तुरंत यूएस फेड रेट बढ़ाने की मांग की, जो बाकी नौ वोटिंग सदस्यों की राय से अलग थी।

    अमरीका के केंद्रीय बैंक ‘फेडरल रिजर्व’ ने लगातार बनी हुई महंगाई पर रोक लगाने के उद्देश्य से 2023 के बाद पहली बार अपनी बेंचमार्क ब्याज दर में 0.25% की बढ़ोतरी की है। इससे ब्याज दरें बढ़कर 3.9% हो गई हैं, जिससे होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड महंगे होंगे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दरें घटाने के दबाव को दरकिनार करते हुए फेड ने इस साल के अंत तक दरों को 4.1% तक ले जाने का संकेत दिया है।

  • अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92 प्रतिशत पहुंची, ईंधन और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव

    अगस्त में थोक महंगाई बढ़कर 9.92 प्रतिशत पहुंची, ईंधन और खाद्य कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव

    नई दिल्ली ।देश में थोक महंगाई का दबाव अगस्त 2026 में एक बार फिर बढ़ा है। थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI पर आधारित महंगाई दर अगस्त में बढ़कर 9.92 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई 2026 में यह 9.78 प्रतिशत दर्ज की गई थी। महंगाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईंधन और ऊर्जा तथा खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आए उछाल से जुड़ी रही। इसके अलावा विनिर्माण क्षेत्र की महंगाई में भी मामूली वृद्धि दर्ज की गई।

    अगस्त में सभी वस्तुओं का समग्र थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 110.8 पर पहुंच गया। इससे पहले जुलाई में यह स्तर अलग था। थोक कीमतों में बढ़ोतरी का असर अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर दिखाई दिया, खासकर ईंधन और ऊर्जा तथा रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली खाद्य वस्तुओं पर।

    ईंधन और ऊर्जा श्रेणी में महंगाई सबसे ज्यादा बढ़ी। जुलाई में इस श्रेणी की महंगाई दर 20.05 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 22.93 प्रतिशत हो गई। इसी अवधि में इस श्रेणी का सूचकांक भी 105.4 से बढ़कर 108.3 पर पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर घरेलू थोक कीमतों पर भी दिखाई दिया।

    खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई। जुलाई में खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर 6.65 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 7.05 प्रतिशत हो गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि का असर घरेलू बजट पर पड़ने वाली लागत के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विनिर्माण क्षेत्र में भी थोक महंगाई दर में मामूली बढ़ोतरी हुई। जुलाई में यह 8.29 प्रतिशत थी, जो अगस्त में बढ़कर 8.37 प्रतिशत हो गई। इस दौरान विनिर्मित उत्पादों का सूचकांक 108.4 से बढ़कर 108.8 पर पहुंच गया।

    हालांकि प्राथमिक वस्तुओं की श्रेणी में महंगाई दर में कमी दर्ज की गई। जुलाई में यह 8.52 प्रतिशत थी, जो अगस्त में घटकर 7.76 प्रतिशत रह गई। इसके बावजूद इस श्रेणी का सूचकांक 117.2 से बढ़कर 118.1 पर पहुंच गया। यानी महंगाई दर में कमी के बावजूद सूचकांक में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    अगस्त में थोक महंगाई को प्रभावित करने वाली प्रमुख वस्तुओं में खनिज तेल, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य वस्तुएं, मूल धातु, गैर-खाद्य कृषि उत्पाद और रासायनिक उत्पाद शामिल रहे। इन क्षेत्रों में कीमतों में बदलाव का असर कुल WPI आंकड़े पर पड़ा।

    जून 2026 के थोक महंगाई के आंकड़ों में भी संशोधन किया गया है। जून की अंतिम थोक महंगाई दर को पहले जारी किए गए 9.87 प्रतिशत के अनुमान से बढ़ाकर 9.97 प्रतिशत कर दिया गया है। इसके साथ ही जून का अंतिम सूचकांक भी संशोधित किया गया। पहले यह 110.2 था, जिसे संशोधित कर 110.3 कर दिया गया।

    जुलाई के मुकाबले अगस्त में थोक महंगाई बढ़ने के आंकड़े ऐसे समय आए हैं जब ईंधन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी ने कुल महंगाई दर को प्रभावित किया है। खास तौर पर ईंधन एवं ऊर्जा श्रेणी में हुई बढ़ोतरी ने अगस्त के आंकड़ों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    इस तरह अगस्त में WPI आधारित महंगाई दर 9.92 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो जुलाई के 9.78 प्रतिशत से अधिक है। ईंधन और ऊर्जा तथा खाद्य वस्तुओं की महंगाई में बढ़ोतरी के साथ विनिर्माण क्षेत्र में मामूली तेजी दर्ज हुई, जबकि प्राथमिक वस्तुओं की महंगाई दर में कमी आई। जून के आंकड़ों में संशोधन के बाद अब अंतिम दर 9.97 प्रतिशत दर्ज की गई है।

  • थोक महंगाई अगस्त में बढ़कर 9.92% पहुंची, पेट्रोलियम उत्पादों और खाद्य कीमतों ने बढ़ाया थोक बाजार का दबाव

    थोक महंगाई अगस्त में बढ़कर 9.92% पहुंची, पेट्रोलियम उत्पादों और खाद्य कीमतों ने बढ़ाया थोक बाजार का दबाव


    नई दिल्ली ।
    वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 14 सितंबर को अगस्त 2026 के थोक मूल्य सूचकांक यानी WPI के आंकड़े जारी किए। आंकड़ों के मुताबिक अगस्त में थोक महंगाई दर बढ़कर 9.92 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई 2026 में यह 9.78 प्रतिशत थी। इस तरह थोक महंगाई लगातार चौथे महीने करीब 10 प्रतिशत के स्तर पर बनी हुई है। हालांकि WPI का 9.92 प्रतिशत होना यह नहीं बताता कि बाजार में हर सामान की कीमत इतनी ही बढ़ गई है।

    WPI यानी थोक मूल्य सूचकांक उस कीमत में बदलाव को मापता है, जिस पर सामान थोक बाजार में कारोबार करता है। यह मुख्य रूप से वस्तुओं की कीमतों पर आधारित होता है। इसके विपरीत खुदरा स्तर पर उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली कीमतों का आकलन CPI के जरिए किया जाता है। WPI में सेवाओं को शामिल नहीं किया जाता। स्कूल फीस, डॉक्टर की फीस, किराया और मोबाइल रिचार्ज जैसी सेवाएं इसके दायरे में नहीं आतीं।

    अगस्त में WPI महंगाई 9.92 प्रतिशत रही। इसका अर्थ यह है कि अगस्त 2025 की तुलना में अगस्त 2026 में WPI में शामिल वस्तुओं की कीमतों में औसतन 9.92 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसका मतलब यह नहीं है कि हर वस्तु की कीमत 9.92 प्रतिशत बढ़ी है। अलग-अलग वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि अलग-अलग रही है और कुछ श्रेणियों में कीमतें कम भी हुई हैं।

    अगस्त की थोक महंगाई बढ़ाने में पेट्रोलियम से जुड़ी कीमतों की बड़ी भूमिका रही। पावर पेट्रोल श्रेणी में महंगाई जुलाई के 20.05 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 22.93 प्रतिशत हो गई। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में पिछले साल की तुलना में 38.48 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में 34.41 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

    खाद्य वस्तुओं ने भी थोक महंगाई पर दबाव बढ़ाया। अगस्त में फूड इंडेक्स की महंगाई 7.05 प्रतिशत रही, जबकि जुलाई में यह 6.65 प्रतिशत थी। तैयार खाद्य उत्पादों की महंगाई भी अगस्त में 9.65 प्रतिशत रही। इससे खाद्य वस्तुओं के साथ-साथ पैक्ड और प्रोसेस्ड उत्पादों की कीमतों पर भी दबाव दिखाई दिया।

    हालांकि सभी श्रेणियों में कीमतें नहीं बढ़ीं। प्राइमरी आर्टिकल्स की महंगाई जुलाई के 8.52 प्रतिशत से घटकर अगस्त में 7.76 प्रतिशत हो गई। नॉन-फूड आर्टिकल की महंगाई 17.66 प्रतिशत से घटकर 14.79 प्रतिशत और खनिजों की महंगाई 13.28 प्रतिशत से घटकर 8.24 प्रतिशत रही। बिजली की महंगाई -1.73 प्रतिशत और कंप्यूटर एवं इलेक्ट्रॉनिक सामान की महंगाई -0.47 प्रतिशत रही।

    मार्च 2026 में WPI महंगाई 3.98 प्रतिशत थी। इसके बाद अप्रैल में 8.36 प्रतिशत, मई में 9.88 प्रतिशत, जून में 9.97 प्रतिशत और अगस्त में 9.92 प्रतिशत रही। इस बढ़ोतरी में बेस इफेक्ट की भी भूमिका बताई गई है। पिछले साल अप्रैल से अगस्त के बीच WPI महंगाई औसतन -0.20 प्रतिशत थी, जबकि इस साल इसी अवधि में औसत महंगाई करीब 9.56 प्रतिशत रही।

    WPI का असर उपभोक्ता की जेब पर सीधे नहीं पड़ता, लेकिन थोक लागत बढ़ने से कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ सकता है। पेट्रोल, स्टील, केमिकल और अन्य कच्चे माल की कीमतें बढ़ने पर कंपनियां कुछ समय तक लागत खुद वहन कर सकती हैं। लगातार दबाव रहने पर कुछ उत्पादों की खुदरा कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है।

    अगस्त का WPI आंकड़ा अभी अस्थायी है और 84.4 प्रतिशत महत्व-आधारित उत्तर के आधार पर तैयार हुआ है। आगे मिलने वाले आंकड़ों के साथ इसमें बदलाव हो सकता है। सितंबर के WPI आंकड़े 14 अक्टूबर 2026 को जारी होंगे, जिससे पता चलेगा कि पेट्रोलियम और अन्य कच्चे माल से बना कीमतों का दबाव आगे भी बना रहता है या इसमें कमी आती है।