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  • Israel: बदू महिलाओं ने पलटा नेतन्याहू का चुनावी पासा…! विपक्ष ला सकता है PM चुनने का विधेयक

    Israel: बदू महिलाओं ने पलटा नेतन्याहू का चुनावी पासा…! विपक्ष ला सकता है PM चुनने का विधेयक


    यरूशलम।
    उम्म खालिद फतून (Umm Khalid Fatoun) पिछले साल युद्ध पीड़ितों के लिए बने एक यहूदी-अरब सहायता केंद्र (Jewish-Arab Aid Center) में स्वयंसेवा करके लौटीं तो उन्होंने देखा कि बुलडोजर अजारनुग गांव (Ajarnug Village) में उनके बेटे के घर को ढहा रहे थे। पुलिस की निगरानी में आई टीम ने घर पर बुलडोजर चलाने से पहले फर्नीचर या सोलर पैनल तक हटाने का मौका नहीं दिया।

    अब, इस हफ्ते जब फतून को मौका मिला तो उन्होंने अपनी नाराजगी का जवाब इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) के सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ मतदान करके दिया। उनका सीधा निशाना राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन-ग्विर थे जिन्होंने फलस्तीनी और अरब समुदाय के लोगों के घरों को व्यापक स्तर पर ढहाने का आदेश दिया था। फतून कहती हैं, बेन-ग्विर को सत्ता से बाहर करना ही मेरा एकमात्र मकसद था। बदू समुदाय में ऐसा एक भी परिवार नहीं है जो हमारे खिलाफ उसके अभियानों से पीड़ित न हुआ हो। चुनाव से कुछ हफ्ते पहले फतून ने बदू महिलाओं को उनके अधिकारों और राजनीतिक ताकत के प्रति जागरूक करने के लिए जमीनी स्तर पर बाकायादा अभियान शुरू किया। इसके शानदार नतीजे भी दिखे, और चुनाव में दक्षिणी नेगेव इलाके के कुछ बदू गांवों में मतदान प्रतिशत तीन गुना तक बढ़ गया।


    हमें अपने हर वोट की ताकत झोंकनी होगी

    अल-नश्मियात अभियान का नेतृत्व करने वाली वकील हनान अलसनाह ने कहा, वर्षों के हिंसक शासन ने इस रूढ़िवादी समुदाय में बदलाव का दरवाजा खोल दिया है। हमने महिलाओं से कहा कि भले सभी पुरुष वोट दें फिर भी समुदाय का आधा हिस्सा ही होंगे। आपको अपने हर वोट की ताकत चाहिए, क्योंकि बेन-ग्विर के पास बहुत ताकत है।


    62% से 93% तक दर्ज की गई वोटिंग

    बदू समुदाय इस्राइली संसद नेसेट में अरब पार्टियों को 19 सीटें दिलाकर किंगमेकर की भूमिका में ला दिया। बदू समुदाय में सबसे कम मतदान 62% रहा, जबकि सबसे ज्यादा मतदान 93% दर्ज किया गया। उनके उत्साह से ही रआम पार्टी को चुनावी अनुमानों से काफी अधिक सफलता मिली।


    विपक्षी दल सीधे पीएम चुनने का ला सकता है विधेयक

    इस्राइल में सरकार गठन में राजनीतिक गतिरोध को तोड़ने के लिए विपक्षी गुट अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर रहे बिना अल्पमत सरकार बनाने के लिए सीधे प्रधानमंत्री चुनने से संबंधित विधेयक लाने पर विचार कर रहा है। टाइम्स ऑफ इस्राइल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रस्ताव लागू होने पर मतदाता सरकार से अलग सीधे पीएम पद के लिए वोट डाल सकेंगे।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की अग्निपरीक्षा, गाजा और ईरान युद्ध के बीच विपक्ष ने बढ़ाई सत्ता की चुनौती..

    नई दिल्ली ।इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान कराया गया। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। वर्ष 2023 में हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य अभियान के साथ ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार की आलोचना होती रही है। ऐसे में चुनाव के परिणाम देश की राजनीति और आने वाली सरकार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र थे। नेतन्याहू के सामने पूर्व सैन्य प्रमुख और मध्यमार्गी नेता गादी आइजेनकोट प्रमुख चुनौती के रूप में मैदान में हैं। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी उनके राजनीतिक गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। चुनाव से पहले हुए सर्वेक्षणों में दोनों पक्षों के बीच कड़ी टक्कर के संकेत मिले थे। हालांकि, इजरायल की गठबंधन आधारित राजनीतिक व्यवस्था के कारण किसी एक दल या गठबंधन के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

    77 वर्षीय बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव में इन मुद्दों का असर राजनीतिक दलों के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी विपक्षी खेमे में सक्रिय हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। इस तरह नेतन्याहू के सामने अलग-अलग राजनीतिक दलों और नेताओं का संयुक्त मुकाबला है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू के समर्थन में बयान दिया था। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर ट्रंप की प्रशंसा की थी। उन्होंने दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता होने की बात कही। चुनाव के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति का यह समर्थन भी राजनीतिक चर्चा का विषय रहा।

    इजरायल में संसदीय चुनाव की प्रक्रिया भारत से अलग है। यहां आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर मतदान होता है। पूरे देश को एक ही चुनाव क्षेत्र माना जाता है। मतदाता किसी व्यक्तिगत उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल की सूची के पक्ष में वोट डालते हैं। इसी प्रक्रिया के जरिए संसद यानी नेसेट के 120 सदस्यों का चयन किया जाता है।

    संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए किसी राजनीतिक दल को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत प्राप्त करना जरूरी है। इस व्यवस्था के कारण कई छोटे दल भी चुनाव में हिस्सा लेते हैं और संसद में उनकी मौजूदगी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इजरायल में सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है। सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना सकता। चुनाव के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की संभावना होती है।

    इसके बाद राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन बनाने को लेकर बातचीत होती है। यदि कोई दल या गठबंधन 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है। ऐसी स्थिति में छोटे दलों और गठबंधन सहयोगियों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।

    इस चुनाव के परिणामों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रहेगी। नई सरकार की संरचना का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, गाजा और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय संघर्षों तथा अमेरिका सहित अन्य देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। अंतिम राजनीतिक तस्वीर मतदान के परिणाम और उसके बाद होने वाली गठबंधन वार्ताओं से स्पष्ट होगी।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू को झटका, 53 सीटों पर सिमटा गठबंधन, बहुमत के लिए 8 सीटें कम

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू को झटका, 53 सीटों पर सिमटा गठबंधन, बहुमत के लिए 8 सीटें कम


    नई दिल्ली। इजरायल के संसदीय चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन सबसे आगे रहने के बावजूद बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर सका है। सभी वोटों की गिनती के बाद नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं, जबकि विपक्षी गठबंधन के खाते में 48 और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिली हैं। 120 सदस्यीय संसद नेसेट में सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है। ऐसे में किसी भी गठबंधन के बहुमत तक नहीं पहुंचने से नई सरकार के गठन को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है।

    लिकुड सबसे बड़ी पार्टी, फिर भी सरकार बनाना चुनौती
    चुनाव में प्रधानमंत्री नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हालांकि, गठबंधन के पास बहुमत से आठ सीटें कम हैं। इजरायल की केंद्रीय चुनाव समिति ने विशेष मतपत्रों की गिनती भी पूरी कर ली है। इन्हें डबल-एनवेलप वोट कहा जाता है। इसमें सैनिकों, कैदियों, विदेशों में तैनात राजनयिकों और अस्पतालों में भर्ती उन मतदाताओं के वोट शामिल होते हैं, जो अपने निर्धारित मतदान केंद्रों पर वोट नहीं डाल सके थे।

    अन्य दलों में गादी आइजनकोट की याशार पार्टी को 21 सीटें मिली हैं। बी’याचाद ने 12 और जॉइंट लिस्ट ने 11 सीटें हासिल की हैं। डेमोक्रेट्स और राअम को आठ-आठ सीटें मिली हैं। यूनाइटेड तोराह जूडाइज्म, इजरायल बेइतेनु और ओत्जमा येहुदित के खाते में सात-सात सीटें आई हैं। वहीं, शास और रिलिजियस जियोनिज्म ने छह-छह सीटें जीती हैं।

    केंद्रीय चुनाव समिति के मुताबिक, विशेष मतपत्रों की गिनती पूरी हो चुकी है, लेकिन अंतिम आधिकारिक नतीजे बाद में जारी किए जाएंगे। मतगणना के बाद भी प्रमुख राजनीतिक गठबंधनों की सीटों के वितरण में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

    चुनाव में विदेशी दखल और वोट खरीदने के आरोप
    चुनाव नतीजों के बाद इजरायल में विदेशी हस्तक्षेप और अरब मतदाताओं की भागीदारी को लेकर विवाद शुरू हो गया है। नेतन्याहू की लिकुड पार्टी ने आरोप लगाया है कि अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को कथित वोट खरीदने और अवैध तरीके से मतदाताओं को मतदान के लिए प्रेरित करने का फायदा मिला। पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया को ‘चोरी’ तक करार दिया है।

    इजरायल की घरेलू सुरक्षा एजेंसी शिन बेट उन आशंकाओं की जांच कर रही है, जिनमें कतर और तुर्की से कथित तौर पर जुड़े विदेशी फंड के जरिए अरब मतदाताओं की भागीदारी को प्रभावित करने की बात कही गई है। वहीं, इजरायल पुलिस की लाहव 433 यूनिट चुनाव में कथित रिश्वतखोरी के मामलों की अलग से जांच कर रही है।

    आरोप साबित नहीं, कतर ने भी किया इनकार
    विदेशी हस्तक्षेप और चुनावी गड़बड़ी से जुड़े आरोपों की अभी पुष्टि नहीं हुई है। केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष नोआम सोलबर्ग ने शिन बेट से संभावित विदेशी हस्तक्षेप की जांच करने को कहा है। हालांकि, चुनाव समिति के कार्यवाहक महानिदेशक ने कहा है कि चुनाव की निष्पक्षता को व्यवस्थित तरीके से प्रभावित किए जाने के आरोपों का कोई आधार नहीं है। कतर ने भी इजरायली चुनाव में किसी तरह के हस्तक्षेप से इनकार किया है।

    इस विवाद के बीच अरब पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। इन दलों ने कुल 19 सीटें हासिल की हैं और सरकार गठन की प्रक्रिया में उनका समर्थन निर्णायक साबित हो सकता है। हालांकि, अरब पार्टियों के सहयोग से सरकार बनाने का विकल्प कई यहूदी नेतृत्व वाली पार्टियों के लिए राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। विपक्षी नेताओं ने भी चेतावनी दी है कि बिना पुष्टि वाले आरोपों के आधार पर चुनाव नतीजों या अरब मतदाताओं की भागीदारी पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए।

    अब कैसे बनेगी इजरायल में सरकार?
    चुनाव के बाद नेतन्याहू के गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती बहुमत के लिए जरूरी आठ सीटें जुटाने की है। विपक्षी गठबंधन के पास भी केवल 48 सीटें हैं। ऐसे में उसे सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों के समर्थन या सहयोग की जरूरत पड़ सकती है।

    अंतिम नतीजों को आधिकारिक रूप से प्रमाणित किए जाने के बाद इजरायल के राष्ट्रपति सरकार गठन की प्रक्रिया की निगरानी करेंगे। इस दौरान किसी सांसद को गठबंधन तैयार कर सरकार बनाने का प्रयास करने की जिम्मेदारी दी जाएगी। यदि कोई भी पक्ष 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल नहीं होता है, तो देश में एक बार फिर चुनाव कराने की नौबत आ सकती है।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू और गादी आइजनकोट के बीच मुकाबला, बहुमत के लिए 61 सीटों का आंकड़ा अहम

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट की चुनौती है। चुनाव से पहले सामने आए ओपिनियन पोल में दोनों पक्षों के बीच कड़े मुकाबले के संकेत मिले हैं। कुछ सर्वेक्षणों में आइजनकोट की यशार पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया है, लेकिन किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान नहीं है। ऐसे में चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए छोटे दलों का समर्थन महत्वपूर्ण हो सकता है।

    इजरायल की संसद में 120 सीटें, बहुमत के लिए 61 जरूरी

    इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए किसी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। देश की चुनाव व्यवस्था में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों को वोट देते हैं। पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर संसद में सीटें आवंटित होती हैं।

    नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके सहयोगी दलों का मुकाबला विपक्षी खेमे से है। विपक्ष में गादी आइजनकोट की यशार पार्टी के साथ नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाला टुगेदर गठबंधन तथा अन्य दल भी शामिल हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए इन दलों के बीच समर्थन जुटाने और गठबंधन तैयार करने की प्रक्रिया अहम होगी।

    ओपिनियन पोल में क्या संकेत मिले?

    चुनाव से पहले जारी सर्वेक्षणों में अलग-अलग दलों और गठबंधनों की स्थिति को लेकर अंतर दिखाई दिया है। 23 अक्टूबर तक के एक सर्वे औसत में नेतन्याहू के गठबंधन को लगभग 52 सीटें और उनके विरोधी जियोनिस्ट दलों को करीब 50 सीटें मिलने का अनुमान था। दूसरी ओर, कुछ अन्य सर्वेक्षणों में आइजनकोट की पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बनने की स्थिति में दिखाया गया।

    हालांकि, किसी पार्टी को सबसे ज्यादा सीटें मिलना और उसके गठबंधन को सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत मिलना अलग-अलग बातें हैं। चुनाव के बाद छोटे दलों का समर्थन और राजनीतिक गठबंधन की बातचीत निर्णायक हो सकती है। इसलिए केवल ओपिनियन पोल के आधार पर नेतन्याहू की विदाई या आइजनकोट के प्रधानमंत्री बनने को तय नहीं माना जा सकता।

    चुनाव के चार प्रमुख मुद्दे

    पहला मुद्दा 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से जुड़ी सुरक्षा चूक है। उस हमले के बाद इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया एजेंसियों की तैयारियों पर सवाल उठे थे। विपक्षी नेताओं ने सरकार से जवाबदेही की मांग की है। इस चुनाव में मतदाताओं के लिए यह अहम सवाल है कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोकने के लिए किस तरह की सुरक्षा नीति अपनाई जाएगी।

    दूसरा बड़ा मुद्दा अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों को सैन्य सेवा से मिलने वाली छूट है। इजरायल में अधिकांश यहूदी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा अनिवार्य है, लेकिन धार्मिक अध्ययन करने वाले हरेदी समुदाय के कई लोगों को इससे छूट मिलती रही है। इस व्यवस्था को लेकर देश में विवाद है। आइजनकोट सहित विपक्ष के कई नेता सैन्य सेवा की जिम्मेदारी अधिक व्यापक रूप से लागू करने के पक्ष में हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को हरेदी दलों का समर्थन मिलता रहा है।

    तीसरा मुद्दा सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों और न्यायपालिका में सुधार का है। नेतन्याहू सरकार के न्यायिक बदलावों के प्रस्तावों के विरोध में देश में बड़े प्रदर्शन हुए थे। विरोधियों ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई, जबकि सरकार के समर्थकों ने बदलावों को सुधार की जरूरत से जोड़ा।

    चौथा प्रमुख विषय युद्ध, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों का भविष्य है। मतदाताओं के सामने सुरक्षा सुनिश्चित करने, लंबे संघर्ष की कीमत और भविष्य की सैन्य रणनीति से जुड़े सवाल हैं। नेतन्याहू ने सुरक्षा को प्राथमिकता दी है, जबकि विपक्ष ने सरकार के फैसलों और युद्ध प्रबंधन पर सवाल उठाए हैं।

    नेतन्याहू और आइजनकोट की सैन्य पृष्ठभूमि

    बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायली सेना की विशेष इकाई सायरेट मटकल में सेवा दी थी। उनके बड़े भाई योनातन नेतन्याहू की 1976 में युगांडा के एंटेबे में बंधकों को छुड़ाने के अभियान के दौरान मौत हो गई थी।

    गादी आइजनकोट ने 1978 में गोलानी ब्रिगेड में सैनिक के रूप में अपना सैन्य करियर शुरू किया। करीब चार दशक की सेवा के बाद वह 2015 में इजरायली सेना के प्रमुख बने और 2019 तक इस पद पर रहे। दिसंबर 2023 में गाजा में युद्ध के दौरान उनके बेटे गैल की मौत हो गई थी। अगले दिन उनके भतीजे माओर कोहेन आइजनकोट भी दक्षिणी गाजा में लड़ाई के दौरान मारे गए थे।

    चुनाव के बाद सरकार बनाने की चुनौती

    मतदान के बाद तस्वीर इस बात से स्पष्ट होगी कि कौन-से दल कितनी सीटें हासिल करते हैं और कौन बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटा पाता है। यदि कोई गठबंधन 61 सीटों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया कठिन हो सकती है। छोटे दलों और अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है, हालांकि अलग-अलग दलों के बीच राजनीतिक मतभेद गठबंधन की राह में बाधा बन सकते हैं।

    इसलिए इजरायल के चुनाव का परिणाम केवल सबसे बड़ी पार्टी तय नहीं करेगा। सरकार किसकी बनेगी, यह संसद में बहुमत जुटाने और चुनाव के बाद होने वाली राजनीतिक बातचीत पर निर्भर करेगा।

  • इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर नजर, गाजा युद्ध और ईरान संघर्ष के बीच विपक्ष से कड़ी चुनौती

    इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की सत्ता पर नजर, गाजा युद्ध और ईरान संघर्ष के बीच विपक्ष से कड़ी चुनौती

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हमास के 7 अक्टूबर 2023 के हमले और उसके बाद गाजा में सैन्य कार्रवाई तथा ईरान के साथ संघर्ष को संभालने के तरीके को लेकर नेतन्याहू की सरकार आलोचनाओं का सामना करती रही है। चुनाव में मतदाताओं का रुख यह तय करने में अहम होगा कि देश की सत्ता मौजूदा नेतृत्व के पास रहती है या विपक्ष को सरकार बनाने का अवसर मिलता है।

    इस चुनाव में करीब 73 लाख मतदाता मतदान के पात्र हैं। नेतन्याहू को पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट और पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट से चुनौती मिल रही है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में मुकाबला कड़ा रहने के संकेत दिए गए हैं। हालांकि, इजरायल की चुनाव प्रणाली में किसी एक दल के लिए स्पष्ट बहुमत हासिल करना आसान नहीं होता। इसलिए चुनावी नतीजों के साथ-साथ अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन की बातचीत भी अगली सरकार का स्वरूप तय करेगी।

    77 वर्षीय नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं। उनके समर्थक सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर उनके नेतृत्व को महत्वपूर्ण बताते हैं। वहीं, आलोचक 7 अक्टूबर 2023 के हमले को रोकने में हुई विफलताओं, युद्ध से जुड़े फैसलों और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उनकी जवाबदेही पर सवाल उठाते हैं। चुनाव के दौरान इन मुद्दों का राजनीतिक बहस में महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है।

    गादी आइजेनकोट इजरायल डिफेंस फोर्सेज के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह याशर पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और खुद को नेतन्याहू के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, नफ्ताली बेनेट भी मौजूदा प्रधानमंत्री के गठबंधन को चुनौती दे रहे हैं। उनके नेतृत्व वाले बी’याचद गठबंधन में पूर्व प्रधानमंत्री यायर लैपिड की येश अतीद पार्टी भी शामिल है। विपक्षी दलों के बीच सहयोग सरकार बनाने की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

    चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू का समर्थन किया। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि नेतन्याहू ने कठिन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री के रूप में अच्छा काम किया है। नेतन्याहू ने भी ट्रंप की तारीफ करते हुए दोनों देशों के नेताओं के बीच असाधारण मित्रता का उल्लेख किया। अमेरिका और इजरायल के संबंध चुनावी चर्चा के महत्वपूर्ण पहलुओं में शामिल हैं।

    इजरायल में संसदीय चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत होते हैं। पूरे देश को एक ही चुनावी क्षेत्र माना जाता है और मतदाता संसद यानी नेसेट की 120 सीटों के लिए राजनीतिक दलों की सूची पर वोट डालते हैं। मतदाता सीधे किसी व्यक्तिगत सांसद का चुनाव नहीं करते। संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत वैध मत हासिल करना जरूरी है। इस व्यवस्था में छोटी पार्टियां भी सरकार गठन के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

    सरकार बनाने के लिए संसद में कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जुटाना आवश्यक है। सबसे अधिक सीटें हासिल करने वाला दल अपने आप सरकार नहीं बना लेता। मतदान के बाद राष्ट्रपति राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से विचार-विमर्श करते हैं और उस सांसद को सरकार बनाने का अवसर देते हैं, जिसके बहुमत जुटाने की संभावना हो। इसके बाद गठबंधन बनाने के लिए बातचीत होती है। यदि कोई नेता 61 सांसदों का समर्थन हासिल नहीं कर पाता, तो सरकार गठन की प्रक्रिया लंबी हो सकती है।

    इस चुनाव के नतीजों का असर इजरायल की सुरक्षा नीति, क्षेत्रीय संघर्षों और दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों पर पड़ सकता है। गाजा में युद्ध और ईरान के साथ टकराव के बीच नई सरकार के सामने सुरक्षा तथा कूटनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दे रहेंगे। चुनाव परिणामों के बाद गठबंधन का स्वरूप तय करेगा कि आने वाले समय में देश की नीतियों को किस दिशा में आगे बढ़ाया जाएगा।

  • इजरायल चुनाव पर भारत की नजर, IMEC कॉरिडोर से रक्षा साझेदारी तक दांव पर कई अहम हित….

    इजरायल चुनाव पर भारत की नजर, IMEC कॉरिडोर से रक्षा साझेदारी तक दांव पर कई अहम हित….

    नई दिल्ली । इजरायल में 27 अक्टूबर को होने वाले आम चुनाव पर भारत की नजरें टिकी हैं। इस चुनाव को प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के साथ-साथ भारत और इजरायल के द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, साइबर सुरक्षा, कृषि, नवाचार और व्यापार जैसे क्षेत्रों में सहयोग है। ऐसे में इजरायल में सत्ता परिवर्तन या मौजूदा सरकार की वापसी से इन साझेदारियों की प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है।

    यह चुनाव 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान तथा सीरिया में इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों के बाद पहला आम चुनाव है। नेतन्याहू को बंधकों की रिहाई के मामले को संभालने और गाजा युद्ध की रणनीति को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी हैं। हालांकि, उनके समर्थन में धुर राष्ट्रवादी और धार्मिक राजनीतिक दलों का गठबंधन है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन भी नेतन्याहू के राजनीतिक पक्ष के लिए अहम माना जा रहा है।

    चुनाव में नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख गादी आइजेनकोट की याशर पार्टी के बीच मुकाबले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नेतन्याहू इजरायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले नेता हैं और सातवें कार्यकाल के लिए दावेदारी कर रहे हैं। दूसरी ओर, आइजेनकोट 7 अक्टूबर के हमले, गाजा युद्ध और बंधकों की रिहाई के मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं। हाल के सर्वेक्षणों में उनके आगे रहने की बात कही गई है, हालांकि चुनाव का अंतिम परिणाम मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा।

    गादी आइजेनकोट इजरायली सेना के पूर्व प्रमुख रह चुके हैं। वह 2022 में राजनीति में आए और हमास के हमले के बाद नेतन्याहू की युद्ध कैबिनेट का हिस्सा बने। जून 2024 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। उनका आरोप रहा है कि सरकार के पास गाजा युद्ध को लेकर स्पष्ट रणनीति नहीं है। वह भ्रष्टाचार, राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी नेतन्याहू की आलोचना करते रहे हैं। दिसंबर 2023 में उनके सबसे छोटे बेटे की गाजा में लड़ाई के दौरान मौत हो गई थी। युद्ध में उनके दो भतीजे भी मारे गए।

    भारत के लिए चुनाव का एक बड़ा पहलू इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी IMEC है। इस प्रस्तावित आर्थिक गलियारे में इजरायल को महत्वपूर्ण भागीदार माना गया है। परियोजना का उद्देश्य भारत, मध्य पूर्व और यूरोप के बीच संपर्क तथा व्यापार को बढ़ावा देना है। यदि नई सरकार की प्राथमिकताओं में इस परियोजना को पर्याप्त महत्व नहीं मिला, तो इसके क्रियान्वयन में देरी की आशंका हो सकती है। इसलिए भारत के लिए इजरायल की नई सरकार की क्षेत्रीय नीति और आर्थिक सहयोग को लेकर रुख महत्वपूर्ण रहेगा।

    व्यापार के मोर्चे पर वित्त वर्ष 2025-26 में भारत और इजरायल के बीच वस्तुओं का कुल व्यापार लगभग 3.93 अरब अमेरिकी डॉलर रहा। दोनों देश मुक्त व्यापार समझौते पर भी बातचीत कर रहे हैं। भारत इजरायल को रत्न और आभूषण, रिफाइंड पेट्रोलियम, इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू लिनेन का निर्यात करता है। वहीं, भारत इजरायल से इंटीग्रेटेड सर्किट, हीरे, उर्वरक, पेट्रोलियम उत्पाद और रक्षा उपकरण आयात करता है। दोनों देशों के बीच रुपये में व्यापार को बढ़ावा देने पर भी बातचीत जारी है।

    भारत ने 17 सितंबर 1950 को इजरायल को मान्यता दी थी। वर्ष 1992 में दोनों देशों के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए और नियमित दूतावास खोले गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती मिली है। मोदी 2017 में इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने फरवरी 2026 में भी इजरायल का राजकीय दौरा किया और इजरायली संसद नेसेट को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। इजरायल में एक लाख से अधिक भारतीय मूल के यहूदी रहते हैं, जबकि भारत में भी इजरायली नागरिक मौजूद हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम दोनों देशों के रणनीतिक और आर्थिक सहयोग की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

  • मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर

    मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर हमले की तैयारी में अमेरिका-इजरायल! परमाणु ठिकाने और मिसाइल भंडार निशाने पर


    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में एक बार फिर बड़े सैन्य टकराव का खतरा मंडराने लगा है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के बाद अमेरिका और इजरायल ईरान के खिलाफ नई सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, संभावित हमलों के निशाने पर ईरान के परमाणु केंद्र, मिसाइल और ड्रोन भंडार के साथ ऊर्जा ढांचा भी हो सकता है। हालांकि, अब तक किसी भी हमले की योजना को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है।

    रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित सैन्य अभियान छोटा, लेकिन बेहद तीव्र हो सकता है। अमेरिका और इजरायल की योजना कथित तौर पर तीन दिनों तक हमले कर ईरान की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने और उसे परमाणु कार्यक्रम पर समझौते के लिए मजबूर करने की है। संभावित लक्ष्यों में परमाणु ठिकानों के अलावा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के कमांड सेंटर भी शामिल हैं।

    पिकैक्स माउंटेन पर हमले की भी चर्चा
    ईरान के पहाड़ों के नीचे स्थित परमाणु केंद्र ‘पिकैक्स माउंटेन’ भी संभावित निशाने पर हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह इस ठिकाने के खिलाफ 22,000 पाउंड वजनी GBU-43/B बम के इस्तेमाल पर विचार करने की बात कही थी। इसे MOAB यानी ‘मदर ऑफ ऑल बम्स’ भी कहा जाता है।

    हालांकि, ऊर्जा ढांचे पर हमले को लेकर अमेरिकी अधिकारियों के बीच मतभेद की स्थिति बताई जा रही है। कुछ अधिकारियों का मानना है कि तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने से बचना चाहिए। ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार प्रभावित हो सकता है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसी वजह से ऊर्जा प्रतिष्ठानों को संभावित लक्ष्यों में शामिल करने को लेकर असमंजस बना हुआ है।

    ईरान की चेतावनी- जवाब सीमित नहीं रहेगा
    दूसरी ओर, ईरान ने चेतावनी दी है कि उस पर नया हमला हुआ तो उसकी जवाबी कार्रवाई सीमित नहीं रहेगी। तेहरान ने संकेत दिया है कि संभावित जवाबी हमलों में सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, डेटा सेंटरों और समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

    ईरानी अधिकारियों के रुख से संकेत मिलता है कि किसी नए संघर्ष की स्थिति में युद्ध को सीमित रखना आसान नहीं होगा। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ने और संघर्ष के दूसरे देशों तक फैलने की आशंका भी गहरा सकती है।

    ईरान की सीमा के पास इजरायल का बड़ा हवाई अभ्यास
    इस बीच, इजरायल ने सोमवार को ईरान की सीमा के नजदीक एक बड़ा वायुसेना अभ्यास किया। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायली वायुसेना के दर्जनों लड़ाकू और हवा में ईंधन भरने वाले विमान इजरायल से 800 मील से अधिक दूर तक गए। विमानों ने सीरिया और इराक के हवाई क्षेत्र से गुजरते हुए ईरान की सीमा के पास उड़ान भरी और फिर लौट आए।

    अधिकारियों के अनुसार, विमानों का यह मार्ग ईरान पर संभावित हमले के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले रास्ते जैसा था। हालांकि, इजरायल ने इसे प्रशिक्षण अभ्यास बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य ईरान को कड़ा संदेश देना था। इजरायल ने इस अभियान की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अमेरिकी अधिकारियों को आशंका थी कि यदि ईरान ने अभ्यास में शामिल इजरायली विमानों पर हमला किया तो इजरायल को बड़े सैन्य अभियान का बहाना मिल सकता है। इससे अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से पहले ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ सकती थीं।

    ट्रंप के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
    पिछले अनुभवों को देखते हुए ट्रंप फिलहाल ईरान पर नए हमले का आदेश देने से बचते नजर आ रहे हैं। हालांकि, जब तक ईरान परमाणु वार्ता की मेज पर लौटकर समझौते की दिशा में आगे नहीं बढ़ता, तब तक सैन्य कार्रवाई की आशंका बनी रह सकती है।

    अमेरिका के सामने नई जंग शुरू करने के रास्ते में तीन बड़ी चुनौतियां हैं। पहली, हमले की स्थिति में तेल की कीमतों में तेज उछाल का खतरा। दूसरी, संघर्ष का पूरे मिडिल ईस्ट में फैल जाना। तीसरी, अमेरिकी सेना के पास मिसाइलों को रोकने वाले इंटरसेप्टर की संभावित कमी।

    ऐसे में सैन्य योजनाएं तैयार होने की खबरों के बावजूद यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप प्रशासन हमले को मंजूरी देगा या कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देगा। फिलहाल, ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के बीच पूरे क्षेत्र की निगाहें वॉशिंगटन के अगले कदम पर टिकी हैं।

  • इस्राइल में चुनाव से पहले युवाओं की सोच में दिख रहा बदलाव… बढ़ रहा दक्षिणपंथ का आकर्षण?

    इस्राइल में चुनाव से पहले युवाओं की सोच में दिख रहा बदलाव… बढ़ रहा दक्षिणपंथ का आकर्षण?


    तेलअबीव।
    इस्राइल (Israel) में नई पीढ़ी के बीच दक्षिणपंथी राजनीति का आकर्षण बढ़ता दिखाई दे रहा है। कभी अपने कट्टर विचारों के कारण राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रहे नेता इतामार बेन-ग्विर (Leader Itamar Ben-Gvir) आज सरकार के शक्तिशाली मंत्रियों में शामिल हैं। चुनाव प्रचार के दौरान उनके आसपास बड़ी संख्या में युवा समर्थक नजर आ रहे हैं। यह बदलाव केवल किसी एक नेता की लोकप्रियता की कहानी नहीं है, बल्कि उस पीढ़ी की सोच को भी सामने लाता है, जिसने युद्ध, हिंसा और सुरक्षा के सवालों के बीच आंखें खोली हैं। सवाल है कि इस्राइल के युवा मतदाता (Young Voters) दक्षिणपंथ की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं और इसका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ सकता है?


    पहले सेना ने ठुकराया, अब युवाओं के बीच लोकप्रिय

    एक संवाददाता लूसी विलियमसन की रिपोर्ट के मुताबिक बेन-ग्विर को युवावस्था में उनके राजनीतिक विचारों के अत्यधिक कट्टर होने के कारण इस्राइली सेना में शामिल होने के लिए अनुपयुक्त माना गया था। करीब तीन दशक बाद वही नेता राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री के पद पर हैं और चुनावी राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं।रामले शहर के एक बाजार में चुनाव प्रचार के दौरान उनके समर्थकों में बड़ी संख्या में युवा शामिल थे। 20 वर्षीय मोर्दखाई का मानना है कि बेन-ग्विर उन्हें सुरक्षा का भरोसा देते हैं। वहीं, 18 वर्षीय नदाव का कहना है कि यह नेता दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि इस्राइल एक मजबूत देश है और उसे अपनी विचारधारा व्यक्त करने में संकोच नहीं करना चाहिए।इन बयानों से युवाओं की प्राथमिकताओं का संकेत मिलता है। उनके लिए केवल आर्थिक मुद्दे या रोजगार ही चुनावी पसंद तय नहीं कर रहे, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की ताकत और भविष्य को लेकर भरोसा भी महत्वपूर्ण बन गया है।


    पहली बार वोट डालने वाले युवा बन सकते हैं निर्णायक

    रिपोर्ट के अनुसार आगामी चुनाव में पांच लाख से अधिक मतदाता पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। ये युवा ऐसे समय में मतदान करने जा रहे हैं, जब इस्राइल की सुरक्षा, राष्ट्रीय पहचान और भविष्य की दिशा पर बहस तेज है।रिपोर्ट में उद्धृत एक सर्वेक्षण के मुताबिक, पहली बार मतदान करने वाले 16 प्रतिशत से अधिक युवा बेन-ग्विर की यहूदी शक्ति पार्टी या उनके सहयोगी बेजालेल स्मोट्रिच की धार्मिक जायनिज्म पार्टी का समर्थन करने की योजना बना रहे हैं। एक अन्य सर्वेक्षण में करीब तीन-चौथाई युवा मतदाताओं ने खुद को दक्षिणपंथी या मध्य-दक्षिणपंथी विचारधारा के करीब बताया।हालांकि, इन आंकड़ों का अर्थ यह नहीं है कि सभी युवा दक्षिणपंथी हो गए हैं। ये सर्वेक्षणों में सामने आए रुझान हैं। फिर भी, चुनावी मुकाबले में इन नए मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर तब, जब सरकार समर्थक और विपक्षी खेमों के बीच मुकाबला कड़ा हो।


    7 अक्तूबर के हमलों ने बदली सोच

    युवाओं की राजनीतिक पसंद को समझने के लिए 7 अक्तूबर 2023 के हमलों और उसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमास के नेतृत्व में हुए हमलों ने इस्राइल में सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा की। युद्ध और हिंसा के अनुभवों ने कई युवाओं के लिए राजनीति को व्यक्तिगत सवाल बना दिया है।23 वर्षीय अति-रूढ़िवादी यहूदी युवक मेइर श्राइबर, जो लंदन में पले-बढ़े हैं, कहते हैं कि 7 अक्तूबर की घटनाओं ने उन्हें इस नतीजे पर पहुंचाया कि शांति हासिल करना आसान नहीं है। उनके अनुसार कम उम्र में देखी गई घटनाएं व्यक्ति की सोच और व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करती हैं।हालांकि, इस सोच से सभी इस्राइली युवा सहमत नहीं हैं। कुछ लोग मौजूदा सरकार की नीतियों और सुरक्षा संबंधी फैसलों पर सवाल भी उठाते हैं। इसलिए युवाओं में दक्षिणपंथ की ओर झुकाव को एक समान विचारधारा का परिणाम मानने के बजाय युद्ध के अनुभवों और भविष्य को लेकर अलग-अलग आशंकाओं के संदर्भ में देखना जरूरी है।


    कठोर नीतियां भी बन रहीं बहस का विषय

    बेन-ग्विर की राजनीति विवादों से घिरी रही है। वे कब्जे वाले पश्चिमी तट के विलय, गाजा में यहूदी बस्तियां बसाने और फलस्तीनियों के तथाकथित स्वैच्छिक पलायन जैसे विचारों का समर्थन करते रहे हैं। उदारवादी इस्राइली इन नीतियों और उनके बयानों की आलोचना करते हैं। कई पश्चिमी देशों ने बेन-ग्विर और स्मोट्रिच के खिलाफ फलस्तीनियों के प्रति भड़काऊ बयानों के मामले में प्रतिबंध या यात्रा संबंधी पाबंदियां भी लगाई हैं।राजनीतिक विश्लेषक डाहलिया शाइनडलिन के अनुसार, इस्राइल के युवा यहूदी मतदाता लगभग दो दशक से औसतन पुरानी पीढ़ी की तुलना में अधिक दक्षिणपंथी रुझान दिखाते रहे हैं। उनके मुताबिक इन युवाओं ने कई युद्धों के बीच जीवन बिताया है और शांति की कोशिशों का उन्हें व्यक्तिगत अनुभव कम मिला है। इससे राजनीतिक बहस में कठोर विचारों को स्वीकार्यता मिलने की पृष्ठभूमि बनी है।


    टिकटॉक और इंस्टाग्राम भी बन रहे चुनावी हथियार

    इस बदलाव में सोशल मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। युवा मतदाता पारंपरिक समाचार चैनलों और अखबारों के बजाय टिकटॉक और इंस्टाग्राम से अधिक जानकारी हासिल कर रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक नेताओं के छोटे वीडियो, सीधे संवाद और आकर्षक प्रचार सामग्री मतदाताओं तक पहुंचने का प्रभावी माध्यम बन गए हैं।

    विपक्षी दल भी अब इस चुनौती को समझ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट (Former Prime Minister Naftali Bennett) के नेतृत्व वाले विपक्षी दल के युवा उम्मीदवार योनातन शालेव का कहना है कि बेन-ग्विर ने दूसरे नेताओं की तुलना में सोशल मीडिया की ताकत को पहले पहचान लिया। अब विपक्ष भी युवा मतदाताओं तक पहुंचने के लिए डिजिटल प्रचार का सहारा ले रहा है। इस्राइल की राजनीति में नई पीढ़ी का यह रुझान बताता है कि चुनाव केवल पुराने राजनीतिक समीकरणों से तय नहीं होंगे। सुरक्षा की चिंता, युद्ध की स्मृतियां और डिजिटल माध्यमों से बनने वाली राजनीतिक छवि युवा मतदाताओं के फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन इस्राइल के युवा पूरी तरह एक खेमे में बंटे नहीं हैं। असली सवाल यही है कि मतदान के दिन सुरक्षा और कठोर नेतृत्व का संदेश अधिक प्रभावी होगा या बदलाव और जवाबदेही की मांग।

  • इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार को भेजा प्रशंसा पत्र, स्वस्थ होने के बाद यरुशलम आने का दिया न्योता

    इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार को भेजा प्रशंसा पत्र, स्वस्थ होने के बाद यरुशलम आने का दिया न्योता

    नई दिल्ली: इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार को प्रशंसा पत्र भेजकर उनकी बहादुरी और सूझबूझ के लिए आभार व्यक्त किया है। राष्ट्रपति ने 30 सितंबर 2026 को फ्लाईदुबई के विमान को सुरक्षित उतारने और उसमें सवार यात्रियों को बड़े खतरे से बचाने के लिए कैप्टन मच्छार की सराहना की। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि गंभीर खतरे के बीच कैप्टन ने जिस साहस और दृढ़ संकल्प का परिचय दिया, वह प्रशंसनीय है। राष्ट्रपति ने उनके शीघ्र और पूर्ण स्वस्थ होने की कामना भी की। कैप्टन मच्छार को यह पत्र अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ के दौरान मिला। राष्ट्रपति हर्जोग ने उन्हें पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद यरुशलम आने का निमंत्रण दिया है। इस पत्र के जरिए उन्होंने कैप्टन के प्रति इजरायल की कृतज्ञता व्यक्त की और उनकी बहादुरी को भारत तथा इजरायल के बीच ऐतिहासिक संबंधों से भी जोड़ा।

    अपने पत्र में राष्ट्रपति हर्जोग ने गंभीर खतरे के समय कैप्टन मच्छार द्वारा बनाए रखे गए संयम की विशेष रूप से प्रशंसा की। उन्होंने लिखा कि दर्द के बावजूद परिस्थितियों का सामना करने, अपने जीवन पर मंडरा रहे तत्काल खतरे से लड़ने और सही निर्णय लेने की क्षमता कैप्टन के मजबूत चरित्र और असाधारण साहस को दर्शाती है। राष्ट्रपति के अनुसार, इस घटना में कैप्टन ने जिस तरह चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में जिम्मेदारी निभाई, वह उनके व्यक्तित्व की मजबूती का प्रमाण है। पत्र में उन्होंने कैप्टन के जल्द स्वस्थ होने की कामना करते हुए भरोसा जताया कि वह धीरे-धीरे अपनी रिकवरी पूरी करेंगे। राष्ट्रपति ने कहा कि वह उनके पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद यरुशलम में स्वागत करने और इजरायल के लोगों की ओर से आभार तथा सम्मान व्यक्त करने के लिए उत्सुक हैं।

    इस सप्ताह की शुरुआत में राष्ट्रपति हर्जोग ने एक समारोह के दौरान कैप्टन मच्छार को राष्ट्रपति पुरस्कार देने का इरादा भी जाहिर किया था। यह समारोह उड़ान में सवार छह इजरायली नागरिकों की वीरता को सम्मानित करने के लिए आयोजित किया गया था। इन नागरिकों को असैन्य वीरता के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर हर्जोग ने घोषणा की कि कैप्टन मच्छार के चोटों से उबरने के बाद उन्हें भी राष्ट्रपति पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। कैप्टन को यह सम्मान देने का निर्णय विमान को सुरक्षित उतारने और यात्रियों को गंभीर खतरे से बचाने में उनकी भूमिका के संदर्भ में लिया गया है। फिलहाल वह अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं। राष्ट्रपति का पत्र उन्हें इसी दौरान मिला, जिसमें उनकी बहादुरी की सराहना के साथ जल्द स्वस्थ होने की शुभकामनाएं दी गई हैं।

    राष्ट्रपति हर्जोग ने कैप्टन मच्छार की वीरता को भारत और इजरायल के पुराने संबंधों का हिस्सा बताते हुए एक सदी से अधिक समय पहले पवित्र भूमि में लड़ने वाले भारतीय सैनिकों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कैप्टन की बहादुरी उन्हें उन भारतीय सैनिकों की प्रतिष्ठित पंक्ति में शामिल करती है, जिन्होंने एक सौ साल से अधिक समय पहले पवित्र भूमि के शहरों को मुक्त कराने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली थी। राष्ट्रपति के मुताबिक, उन सैनिकों ने इजरायल के इतिहास में स्थायी स्थान बनाया और कैप्टन मच्छार भी अब दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक जुड़ाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गए हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि यह घटना भारत गणराज्य और इजरायल के बीच आपसी गर्मजोशी तथा संबंधों को और मजबूत करेगी।

    पत्र के अंतिम हिस्से में राष्ट्रपति हर्जोग ने कहा कि कैप्टन मच्छार संयुक्त अरब अमीरात में अपने मित्रों और साझेदारों की देखरेख में हैं। उन्होंने उनके शीघ्र और पूर्ण स्वस्थ होने की कामना करते हुए कहा कि वह कैप्टन के स्वस्थ होकर ताकत हासिल करने के बाद यरुशलम में उनका स्वागत करना चाहते हैं। राष्ट्रपति ने इसे इजरायल की ओर से आभार और सम्मान व्यक्त करने का अवसर बताया। कैप्टन मच्छार को भेजे गए पत्र और उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार देने की घोषणा के जरिए इजरायल ने विमान को सुरक्षित उतारने में उनके साहस तथा यात्रियों की सुरक्षा के लिए किए गए प्रयासों को सम्मान दिया है।

  • 172 लोगों की जान बचाने वाले भारतीय पायलट स्मित मच्छार को इजरायल का सर्वोच्च नागरिक वीरता सम्मान, अमेरिका भी करेगा सम्मानित

    172 लोगों की जान बचाने वाले भारतीय पायलट स्मित मच्छार को इजरायल का सर्वोच्च नागरिक वीरता सम्मान, अमेरिका भी करेगा सम्मानित

    नई दिल्ली ।फ्लाईदुबई की उड़ान में गंभीर संकट के दौरान 172 यात्रियों और चालक दल की सुरक्षा के लिए साहस दिखाने वाले भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार को इजरायल के सर्वोच्च नागरिक वीरता सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। इजरायल के राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने उन्हें ‘प्रेसिडेंशियल अवॉर्ड फॉर सिविलियन हीरोइज्म’ देने की घोषणा की है। इसके अलावा, अमेरिका में भी कैप्टन मच्छार के साहस को सम्मान दिया जाएगा। भारतीय मूल के अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति उनके योगदान की सराहना करते हुए अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में बयान दर्ज कराएंगे।

    इजरायल के राष्ट्रपति की ओर से सम्मान देने की घोषणा कैप्टन मच्छार के स्वस्थ होने के बाद की जाएगी। भारत में इजरायली दूतावास ने इस फैसले की जानकारी साझा करते हुए कहा कि कैप्टन की बहादुरी और साहस ने एक बड़ी त्रासदी को टालने में मदद की। उनके पूरी तरह स्वस्थ होने की कामना करते हुए इजरायल ने उनके योगदान के लिए आभार जताया है। यह सम्मान विमान में पैदा हुए गंभीर संकट के दौरान यात्रियों और चालक दल की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों के मद्देनजर दिया जा रहा है।

    यह घटना 30 सितंबर को दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड 1073 में हुई थी। आरोप है कि उड़ान के दौरान सह-पायलट ने कैप्टन स्मित मच्छार पर कुल्हाड़ी से हमला कर दिया और विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की कोशिश की। इस दौरान विमान की स्थिति बेहद गंभीर हो गई थी। राजा कृष्णमूर्ति के बयान के मुताबिक, विमान महज 30 सेकंड में लगभग 16,000 फीट नीचे आ गया था। ऐसे हालात में कैप्टन मच्छार गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद विमान और उसमें सवार लोगों की सुरक्षा के लिए प्रयास करते रहे।

    गंभीर चोटों के बावजूद कैप्टन मच्छार किसी तरह कॉकपिट के दरवाजे तक पहुंचे और उसे खोलने में सफल रहे। इससे विमान में मौजूद यात्रियों और चालक दल के अन्य सदस्यों को कॉकपिट के भीतर पहुंचने तथा कथित हमलावर को काबू करने का अवसर मिला। इस कार्रवाई ने संकट के दौरान स्थिति संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कैप्टन की कोशिशों के बाद विमान में मौजूद फ्लाईदुबई के दो रिजर्व पायलटों ने नियंत्रण संभाला और उड़ान को सुरक्षित रूप से सऊदी अरब के तबूक में उतारा।

    विमान में कुल 172 यात्री सवार थे। इनमें चार अमेरिकी नागरिक और 27 बच्चे भी शामिल थे। घटना के दौरान यात्रियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर खतरा पैदा हो गया था। इसके बावजूद विमान को सुरक्षित उतारने में सफलता मिली। कैप्टन मच्छार के साहस और संकट के समय लिए गए फैसलों को इसी वजह से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस घटना में उनकी भूमिका को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है।

    भारतीय नागरिक कैप्टन स्मित मच्छार के पास विमान संचालन का 17 वर्षों का अनुभव है। इसमें 11 वर्ष कप्तान के रूप में काम करने का अनुभव शामिल है। राजा कृष्णमूर्ति ने कहा कि जानलेवा हमले का सामना करने के बावजूद कैप्टन ने विमान में सवार लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उनके मुताबिक, गंभीर रूप से घायल होने की स्थिति में भी कैप्टन को यह अहसास था कि विमान में मौजूद लोगों की जिंदगी उनके अगले कदम पर निर्भर हो सकती है। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने खतरे को समझा और कॉकपिट के दरवाजे तक पहुंचने का साहसिक फैसला किया।

    कृष्णमूर्ति ने अमेरिकी कांग्रेस के आधिकारिक रिकॉर्ड में कैप्टन मच्छार के साहस की सराहना दर्ज कराने की घोषणा की है। उन्होंने अन्य सांसदों से भी इस बहादुरी को सम्मानित करने की अपील की। उनका कहना है कि कैप्टन की सूझबूझ, दृढ़ निश्चय और साहस ने यात्रियों तथा चालक दल को हमले को रोकने और संभावित बड़े हादसे से बचने का अवसर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि विमान में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति के पीछे एक परिवार है और कैप्टन के प्रयासों से अनेक परिवारों को अपूरणीय दुख से बचने का अवसर मिला।