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  • इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    इजरायली खुफिया दावे से बढ़ी वैश्विक हलचल, डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित साजिश पर अमेरिका सतर्क

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच इजरायल की एक खुफिया रिपोर्ट ने नई अंतरराष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल ने अमेरिका के साथ साझा की गई एक खुफिया जानकारी में दावा किया है कि ईरान ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को निशाना बनाने की कथित योजना बनाई थी। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है और ईरान की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसके बावजूद इस रिपोर्ट ने सुरक्षा और कूटनीतिक स्तर पर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

    रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली खुफिया एजेंसियां लंबे समय से ईरान की गतिविधियों पर नजर रख रही हैं। इसी निगरानी के दौरान जुटाई गई जानकारी अमेरिका के साथ साझा की गई, जिसके बाद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के बीच इस मामले को लेकर सतर्कता बढ़ गई है। माना जा रहा है कि इस तरह की खुफिया सूचनाएं क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य की रणनीतिक नीतियों को प्रभावित कर सकती हैं।

    विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस प्रकार के दावों को विश्वसनीय माना जाता है तो इसका असर अमेरिका और ईरान के बीच भविष्य में होने वाली किसी भी संभावित कूटनीतिक पहल पर पड़ सकता है। हालांकि अब तक किसी भी संबंधित एजेंसी ने सार्वजनिक रूप से इन दावों की पुष्टि नहीं की है। इसलिए इस पूरे घटनाक्रम को अभी खुफिया इनपुट के रूप में ही देखा जा रहा है।

    अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है। जनवरी 2020 में अमेरिकी ड्रोन हमले में ईरान के वरिष्ठ सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत के बाद दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। उस घटना के बाद कई बार दोनों देशों के बीच तीखे बयान, प्रतिबंध और सैन्य गतिविधियां देखने को मिली हैं। डोनाल्ड ट्रंप भी पहले सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि उन्हें ईरान से खतरा हो सकता है, हालांकि उन्होंने ऐसे खतरों को लेकर चिंता व्यक्त नहीं की थी।

    हाल के सप्ताहों में क्षेत्र में संघर्षविराम की कोशिशों के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं। विभिन्न सैन्य गतिविधियों और जवाबी कार्रवाइयों के कारण क्षेत्रीय तनाव लगातार बना हुआ है। इससे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है। कई देशों ने संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान पर जोर देने की आवश्यकता भी दोहराई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका प्रभाव केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार भी प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य जैसी रणनीतिक समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिम एशिया की परिस्थितियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।

    फिलहाल इजरायल के इस दावे की आधिकारिक पुष्टि या स्वतंत्र सत्यापन सामने नहीं आया है। ऐसे में आने वाले दिनों में संबंधित देशों की प्रतिक्रियाओं और आधिकारिक जांच के बाद ही स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में कूटनीतिक संवाद और संयम ही क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का सबसे प्रभावी माध्यम साबित हो सकता है।

  • अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा

    अमेरिका-ईरान तनाव के बीच इजरायल की बढ़ी सैन्य तैयारी, ट्रंप के फैसले पर टिकी नजर, पश्चिम एशिया में फिर गहराया युद्ध का खतरा


    नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर बढ़ते सैन्य तनाव ने पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को बेहद संवेदनशील बना दिया है। इसी बीच इजरायल की ओर से यह संकेत मिला है कि आवश्यकता पड़ने पर वह ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई करने के लिए तैयार है। हालांकि इजरायली सैन्य अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल देश की ओर से अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे प्रत्यक्ष सैन्य टकराव में शामिल होने का कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है। इसके बावजूद सुरक्षा एजेंसियों और सेना को हर संभावित परिस्थिति से निपटने के लिए पूरी तरह सतर्क रखा गया है।

    बढ़ते तनाव के बीच इजरायल के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच मौजूदा सैन्य टकराव आने वाले दिनों में और गंभीर रूप ले सकता है। ऐसे परिदृश्य में यदि अमेरिका अपने सहयोगी देशों से समर्थन चाहता है तो इजरायल भी संभावित सैन्य अभियान का हिस्सा बन सकता है। अधिकारियों का कहना है कि देश पहले भी अपने रणनीतिक सहयोगियों के साथ सुरक्षा अभियानों में भाग ले चुका है और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर आवश्यक कदम उठाने के लिए तैयार रहेगा।

    इजरायल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया कि यदि हालात की मांग हुई तो देश दोबारा कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी पक्ष क्षेत्र में नए युद्ध की स्थिति नहीं चाहता, लेकिन ईरान की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। सुरक्षा से जुड़े निर्णय क्षेत्रीय हालात और सहयोगी देशों के साथ समन्वय को ध्यान में रखकर लिए जाएंगे।

    दूसरी ओर इजरायली रक्षा बलों का आकलन है कि वर्तमान समय में ईरान भी सीधे इजरायल को इस संघर्ष में शामिल करने की कोशिश नहीं कर रहा है। सेना का मानना है कि निकट भविष्य में इजरायल पर किसी बड़े हमले की आशंका सीमित है। इसके बावजूद सीमाओं की निगरानी बढ़ा दी गई है और सभी सैन्य इकाइयों को उच्च स्तर की तैयारियों में रखा गया है ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का तुरंत जवाब दिया जा सके।

    इस पूरे घटनाक्रम के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। अमेरिका ने हालिया सैन्य कार्रवाई को इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों पर हुए हमलों की प्रतिक्रिया बताया है। होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है और यहां किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति तथा वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि कई देशों की नजर इस क्षेत्र की बदलती परिस्थितियों पर बनी हुई है।

    अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी हाल के दिनों में ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए गए हैं। अमेरिका ने यह स्पष्ट किया है कि मौजूदा परिस्थितियों में उसकी प्राथमिकता क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही यह भी संकेत मिले हैं कि कूटनीतिक विकल्पों के साथ-साथ सैन्य तैयारियों को भी बनाए रखा जाएगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका प्रभाव केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसके व्यापक असर पड़ सकते हैं। ऐसे में दुनिया की प्रमुख शक्तियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और उम्मीद की जा रही है कि तनाव को नियंत्रित रखने के लिए कूटनीतिक प्रयास भी समानांतर रूप से जारी रहेंगे।

  • भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    भारत को इजरायल का मजबूत मित्र बता बोले नेतन्याहू, '140 करोड़ लोगों का समर्थन हमारे साथ'

    नई दिल्ली । इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत को अपने सबसे मजबूत और भरोसेमंद मित्र देशों में शामिल बताते हुए कहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने यह टिप्पणी ऐसे समय की है जब अमेरिका और इजरायल के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज है और अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी अलग-अलग बयान सामने आए हैं।

    एक साक्षात्कार में नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका निश्चित रूप से इजरायल का महत्वपूर्ण सहयोगी है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में इजरायल के पक्ष में कई अहम फैसले लिए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दुनिया में इजरायल के मित्र केवल अमेरिका तक सीमित नहीं हैं। उनके अनुसार भारत उन प्रमुख देशों में शामिल है, जहां से इजरायल को मजबूत समर्थन प्राप्त होता है।

    नेतन्याहू ने भारत का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि 140 करोड़ आबादी वाले देश से उन्हें व्यापक समर्थन मिलता है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय नागरिकों की सक्रियता का भी जिक्र किया और कहा कि उनके आधिकारिक फेसबुक पेज पर भारत से बड़ी संख्या में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं और समर्थन देखने को मिलता है। उनके अनुसार यह दोनों देशों के बीच मजबूत जनसंपर्क और सकारात्मक भावनाओं का संकेत है।

    इजरायली प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत के अलावा कई अन्य देशों के नेता भी निजी स्तर पर इजरायल के साथ सहयोग की इच्छा रखते हैं। उन्होंने दावा किया कि रक्षा, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में अनेक देश इजरायल के साथ साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं। उनके अनुसार सुरक्षा और तकनीकी सहयोग भविष्य में अंतरराष्ट्रीय संबंधों का महत्वपूर्ण आधार बनता जा रहा है।

    नेतन्याहू की यह टिप्पणी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के उस बयान के बाद आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि मौजूदा समय में डोनाल्ड ट्रंप ही ऐसे प्रमुख नेता हैं जो इजरायल के प्रति सबसे अधिक सहानुभूति रखते हैं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नेतन्याहू ने कहा कि ट्रंप निश्चित रूप से व्हाइट हाउस में इजरायल के सबसे बड़े मित्र रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी की राय समान होना जरूरी नहीं है। उन्होंने संकेत दिया कि इजरायल के कई अन्य अंतरराष्ट्रीय सहयोगी भी हैं, जिनमें भारत प्रमुख स्थान रखता है।

    साक्षात्कार के दौरान नेतन्याहू ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी अपनी सरकार का रुख दोहराया। उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उनका कहना था कि इस मुद्दे पर उनकी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सोच समान है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में अमेरिका और ईरान के बीच किसी परमाणु समझौते पर सहमति नहीं बनती है, तब भी इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।

    विशेषज्ञों का मानना है कि नेतन्याहू का भारत का उल्लेख करना दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते रणनीतिक संबंधों की ओर भी संकेत देता है। हाल के वर्षों में रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, साइबर सुरक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत और इजरायल के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मंच से भारत को सार्वजनिक रूप से मजबूत मित्र बताना दोनों देशों के संबंधों के महत्व को रेखांकित करने वाला बयान माना जा रहा है।

  • इजरायल में संवैधानिक संकट: नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठुकराया, विपक्ष ने बताया ‘लोकतंत्र पर खतरा’

    इजरायल में संवैधानिक संकट: नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठुकराया, विपक्ष ने बताया ‘लोकतंत्र पर खतरा’


    नई दिल्ली। इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और देश की सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव अब गंभीर संवैधानिक संकट का रूप लेता दिख रहा है। रविवार को इजरायली कैबिनेट ने सर्वसम्मति से निर्णय लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया, जिसमें कमर्शियल मीडिया रेगुलेटर सेकेंड अथॉरिटी फॉर टेलीविजन एंड रेडियो को अपना काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इस घटनाक्रम को ‘जंगल राज की आहट’ बताया है।

    पहली बार सरकार ने कोर्ट आदेश को नकारा
    इजरायल के इतिहास में यह पहली बार है जब किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को औपचारिक रूप से अस्वीकार किया है। विवाद की शुरुआत तब हुई जब पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उन फैसलों पर रोक लगा दी थी, जिनके तहत मीडिया रेगुलेटर की नई परिषद के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

    अदालत ने निर्देश दिया था कि मौजूदा परिषद ही अपना काम जारी रखे, क्योंकि कुछ सदस्यों के इस्तीफे पर राजनीतिक दबाव की आशंका जताई गई थी।

    सरकार का कड़ा रुख
    प्रधानमंत्री नेतन्याहू सरकार ने अदालत के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि उसे कानून को बदलने या रद्द करने का अधिकार नहीं है। संचार मंत्री श्लोमो कारही और न्याय मंत्री यारिव लेविन ने संयुक्त बयान में कहा कि सरकार उन आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी जो उनके अनुसार कानून के विरुद्ध हैं, और ऐसे आदेशों के आधार पर लिए गए निर्णय अमान्य माने जाएंगे।

    सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि मीडिया रेगुलेटर परिषद के भविष्य के किसी भी फैसले को वह मान्यता नहीं देगी, क्योंकि उसके अनुसार परिषद के पास आवश्यक कानूनी सदस्य संख्या नहीं है।

    विपक्ष और विशेषज्ञों की चेतावनी
    सरकार के इस कदम की विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों ने कड़ी आलोचना की है। डिप्टी अटॉर्नी जनरल गिल लिमोन ने चेतावनी दी कि यदि सरकार चयनात्मक रूप से अदालत के आदेशों का पालन करेगी तो यह कानून के शासन को कमजोर करने की दिशा में गंभीर कदम होगा।

    पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने कहा कि अदालत के आदेशों की अवहेलना से देश में अराजकता फैल सकती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।

    डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव से पहले न्यायपालिका की शक्ति को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, ताकि भविष्य में राजनीतिक फैसलों को प्रभावित किया जा सके।

    मीडिया और लोकतंत्र पर बहस तेज
    पत्रकार संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों ने भी सरकार के फैसले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक मीडिया रेगुलेटर का नहीं, बल्कि इजरायल में प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और कानून के शासन पर सीधा प्रभाव डालने वाला मुद्दा बन चुका है।

  • ईरानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की साजिश के दावे पर बढ़ा विवाद, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट को इजरायल ने बताया पूरी तरह निराधार

    ईरानी प्रतिनिधिमंडल को निशाना बनाने की साजिश के दावे पर बढ़ा विवाद, न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट को इजरायल ने बताया पूरी तरह निराधार


    नई दिल्ली ।
    इजरायल और अमेरिकी समाचार पत्र के बीच एक रिपोर्ट को लेकर नया विवाद सामने आया है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को उन संभावित खतरों के बारे में आगाह किया था, जिनमें परमाणु वार्ता में शामिल ईरानी प्रतिनिधियों को इजरायल द्वारा निशाना बनाए जाने की आशंका जताई गई थी। हालांकि इजरायल ने इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए उन्हें तथ्यहीन और मनगढ़ंत करार दिया है।

    रिपोर्ट में दावा किया गया कि अप्रैल के दौरान अमेरिकी अधिकारियों ने तेहरान को चेतावनी दी थी कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ संभावित सुरक्षा खतरे का सामना कर सकते हैं। दोनों नेता उस समय परमाणु वार्ता से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बताए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन को आशंका थी कि क्षेत्रीय तनाव के बीच इन नेताओं की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।

    इजरायल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन दावों का तत्काल खंडन किया। आधिकारिक बयान में कहा गया कि प्रकाशित रिपोर्ट वास्तविक तथ्यों पर आधारित नहीं है और इसमें लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह निराधार हैं। सरकार का कहना है कि इस प्रकार की खबरें तथ्यों से परे हैं और इन्हें बिना पर्याप्त आधार के प्रकाशित किया गया है।

    दूसरी ओर संबंधित अमेरिकी समाचार संस्थान ने अपनी रिपोर्ट का बचाव किया है। संस्थान का कहना है कि रिपोर्ट वर्तमान और पूर्व अमेरिकी अधिकारियों से प्राप्त जानकारी पर आधारित है तथा प्रकाशन से पहले संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया लेने का प्रयास भी किया गया था। समाचार पत्र ने यह भी कहा कि रिपोर्ट प्रकाशित होने से पहले इजरायल की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी उपलब्ध नहीं कराई गई थी।

    रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया कि कुछ अमेरिकी अधिकारियों का मानना था कि संघर्षविराम के बाद इजरायल कथित रूप से ईरानी नेतृत्व के कुछ प्रमुख चेहरों को संभावित लक्ष्य के रूप में देख रहा था। इसी संदर्भ में संसद अध्यक्ष गालिबाफ के यात्रा कार्यक्रम को लेकर भी सुरक्षा संबंधी चिंताओं का उल्लेख किया गया। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही किसी आधिकारिक एजेंसी ने इन्हें प्रमाणित किया है।

    रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि गालिबाफ की वापसी यात्रा के दौरान संभावित खतरे की सूचना मिलने के बाद उनके विमान ने मार्ग में आपात स्थिति के तहत लैंडिंग की थी। हालांकि इस घटनाक्रम के संबंध में भी संबंधित पक्षों की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इन दावों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

    इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव तथा परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गतिविधियों के बीच इस तरह की रिपोर्टों ने नई बहस को जन्म दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में आधिकारिक पुष्टि और विश्वसनीय तथ्यों का विशेष महत्व होता है। फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम हैं। एक ओर इजरायल ने रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज किया है, वहीं अमेरिकी समाचार संस्थान अपनी रिपोर्टिंग को तथ्य-आधारित बताते हुए उस पर कायम रहने की बात कह रहा है।

  • ईरान-इजरायल तनाव के बीच गालिबाफ और अराघची कथित तौर पर थे निशाने पर, अमेरिकी दखल से टली कार्रवाई, शांति वार्ता बचाने की कोशिश तेज

    ईरान-इजरायल तनाव के बीच गालिबाफ और अराघची कथित तौर पर थे निशाने पर, अमेरिकी दखल से टली कार्रवाई, शांति वार्ता बचाने की कोशिश तेज

    नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में हालिया तनाव के बीच ईरान और इजरायल से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक जानकारी सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, युद्धविराम और बातचीत की प्रक्रिया के दौरान ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची पर संभावित हमले की आशंका जताई गई थी। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद यह कार्रवाई टल गई, जिससे शांति वार्ता प्रभावित होने से बच गई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्टों के मुताबिक उस समय अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम को स्थायी रूप देने तथा आगे की बातचीत को लेकर प्रयास जारी थे। इसी दौरान आशंका जताई गई कि यदि वार्ता में शामिल शीर्ष ईरानी नेताओं को निशाना बनाया जाता, तो दोनों देशों के बीच तनाव फिर से चरम पर पहुंच सकता था। ऐसी स्थिति में कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को गंभीर झटका लगने का खतरा था।

    बताया जा रहा है कि अमेरिकी प्रशासन ने क्षेत्रीय सहयोगी देशों के माध्यम से संभावित सुरक्षा जोखिम की जानकारी ईरानी पक्ष तक पहुंचाई। इसके बाद संबंधित नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत कर दी गई। रिपोर्टों के अनुसार इस कदम का उद्देश्य बातचीत की प्रक्रिया को बाधित होने से बचाना और क्षेत्र में व्यापक सैन्य टकराव की आशंका को कम करना था।

    अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ईरान और इजरायल के बीच लंबे समय से जारी तनाव में दोनों देशों की रणनीतियां अलग-अलग प्राथमिकताओं पर आधारित रही हैं। एक ओर सुरक्षा और सैन्य दबाव की नीति अपनाई जाती रही है, वहीं दूसरी ओर परमाणु कार्यक्रम, समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर कूटनीतिक संवाद भी समानांतर रूप से चलता रहा है। ऐसे में वार्ता से जुड़े वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा अत्यंत संवेदनशील विषय मानी जाती है।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि संबंधित ईरानी नेताओं की सुरक्षा को लेकर पहले भी कई बार अतिरिक्त सतर्कता बरती गई थी। बीते वर्षों में ईरान के कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों पर हमलों की घटनाओं के बाद सुरक्षा एजेंसियां पहले से अधिक सतर्क हैं। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय दौरों और महत्वपूर्ण बैठकों के दौरान विशेष सुरक्षा प्रबंध किए जाते रहे हैं।

    एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में आयोजित वार्ता के दौरान भी ईरानी प्रतिनिधिमंडल की सुरक्षा को लेकर व्यापक इंतजाम किए गए थे। वापसी यात्रा के दौरान संभावित खतरे की सूचना मिलने पर विमान की उड़ान योजना में बदलाव किया गया और प्रतिनिधिमंडल को वैकल्पिक मार्ग से सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाया गया। हालांकि इस संबंध में संबंधित देशों की ओर से विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया की मौजूदा परिस्थितियों में सैन्य गतिविधियों और कूटनीतिक प्रयासों के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। किसी भी शीर्ष राजनीतिक या कूटनीतिक नेतृत्व पर संभावित हमला न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है, बल्कि शांति प्रक्रिया को भी गंभीर रूप से बाधित कर सकता है। ऐसे में सभी पक्षों के लिए संवाद बनाए रखना और तनाव कम करने की दिशा में निरंतर प्रयास करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

  • ईरान-इजरायल तनाव फिर चरम पर, नेतन्याहू ने दोहराई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, तेहरान बोला- बातचीत विफल हुई तो युद्ध के लिए तैयार

    ईरान-इजरायल तनाव फिर चरम पर, नेतन्याहू ने दोहराई सैन्य कार्रवाई की चेतावनी, तेहरान बोला- बातचीत विफल हुई तो युद्ध के लिए तैयार


    नई दिल्ली ।
    मध्य पूर्व में एक बार फिर तनाव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी कूटनीतिक प्रयासों के समानांतर इजरायल की ओर से आए सख्त बयानों ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। इजरायल के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा महसूस हुआ तो ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की जा सकती है। इसके जवाब में ईरान ने भी साफ कर दिया है कि वह बातचीत को प्राथमिकता देता है, लेकिन वार्ता विफल होने की स्थिति में हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है।

    इजरायल के प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके देश ने पहले भी अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक कदम उठाए हैं और भविष्य में भी आवश्यकता पड़ने पर ऐसा करने से पीछे नहीं हटेगा। उनका कहना था कि ईरान की परमाणु गतिविधियों को लेकर इजरायल किसी भी संभावित खतरे को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि यदि सुरक्षा संबंधी चिंताएं दूर नहीं हुईं तो आगे भी सैन्य विकल्प खुले रहेंगे।

    इजरायल लंबे समय से यह रुख अपनाता रहा है कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसी कारण वह अपने सुरक्षा हितों के अनुरूप स्वतंत्र कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित मानता है। हालिया बयान को भी इसी नीति का विस्तार माना जा रहा है, जिसने क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है।

    इस बीच अमेरिका लगातार दोनों पक्षों के बीच तनाव कम करने की कोशिशों में जुटा हुआ है। वॉशिंगटन का मानना है कि बढ़ते सैन्य तनाव से क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है और कूटनीतिक प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं। इसी वजह से सभी पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के रास्ते को प्राथमिकता देने की अपील की जा रही है।

    दूसरी ओर ईरान ने भी अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि वह मौजूदा वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि कूटनीतिक समाधान ही सबसे बेहतर विकल्प है और इसी दिशा में प्रयास जारी हैं। हालांकि, साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि बातचीत किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचती या देश की सुरक्षा को चुनौती मिलती है तो ईरान आवश्यक जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार रहेगा।

    ईरानी संसद के शीर्ष नेतृत्व ने कहा कि देश अपनी रक्षा क्षमता और राष्ट्रीय हितों से किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं करेगा। उनका कहना था कि परमाणु कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप संचालित किया जा रहा है और शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक विकसित करना ईरान का वैध अधिकार है। उन्होंने दोहराया कि देश अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन करता रहेगा, लेकिन अपने अधिकारों की रक्षा भी करेगा।

    विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात बेहद संवेदनशील हैं। एक ओर कूटनीतिक वार्ता जारी है, वहीं दूसरी ओर दोनों देशों की सख्त बयानबाजी से तनाव बढ़ने की आशंका भी बनी हुई है। यदि संवाद सफल रहता है तो क्षेत्र में स्थिरता की संभावना मजबूत हो सकती है, लेकिन बातचीत विफल होने पर हालात फिर से सैन्य टकराव की ओर बढ़ सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयासों की सफलता पूरे क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

  • युद्धविराम के बीच फिर दहला गाजा इस्राइली हवाई हमलों में दो मासूम समेत आठ की मौत कई घायल

    युद्धविराम के बीच फिर दहला गाजा इस्राइली हवाई हमलों में दो मासूम समेत आठ की मौत कई घायल


    नई दिल्ली। गाजा पट्टी में युद्धविराम लागू होने के बावजूद हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सोमवार को इस्राइल ने दक्षिणी और मध्य गाजा के कई इलाकों में हवाई हमले किए जिनमें दो बच्चों समेत कम से कम आठ लोगों की मौत हो गई जबकि 20 से अधिक लोग घायल हो गए। स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों और राहत एजेंसियों के अनुसार घायलों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज जारी है।

    सबसे बड़ा हमला दक्षिणी गाजा के खान यूनिस स्थित अल मवासी इलाके में हुआ जहां विस्थापित लोगों के तंबू को निशाना बनाया गया। इस हमले में 23 वर्षीय महिला और उसकी एक साल की बेटी की मौत हो गई। अस्पताल प्रशासन के मुताबिक हमले से पहले इलाके में चेतावनी जारी की गई थी। इसी क्षेत्र के करारा कस्बे में हुए एक अन्य हवाई हमले में 31 वर्षीय व्यक्ति की जान चली गई जिसकी कुछ महीने पहले ही शादी हुई थी और उसकी पत्नी गर्भवती है।

    खान यूनिस के तटीय क्षेत्र में विस्थापित लोगों के तंबुओं पर हुए एक अन्य हमले में दो लोगों की मौत हो गई जबकि 13 अन्य घायल हो गए। घायलों को फलस्तीनी रेड क्रिसेंट द्वारा संचालित फील्ड अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उनका उपचार चल रहा है।

    मध्य गाजा के दीर अल बलाह में ड्रोन हमले में तीन फलस्तीनियों की मौत हुई। मृतकों में आठ वर्षीय एक बच्चा उसका दादा और एक अन्य व्यक्ति शामिल हैं। अस्पताल अधिकारियों के अनुसार बच्चा अपनी घायल मां से मिलने आया था और हमले में उसकी मां भी घायल हो गई। इस्राइली सेना ने कहा कि यह हमला एक उग्रवादी को निशाना बनाकर किया गया था लेकिन उसने न तो उस व्यक्ति की पहचान बताई और न ही उसके मारे जाने की पुष्टि की।

    युद्धविराम लागू होने के बाद बड़े स्तर पर लड़ाई भले कम हुई हो लेकिन गाजा में लगभग रोजाना हवाई हमले जारी हैं। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि युद्धविराम लागू होने के बाद से अब तक 1045 फलस्तीनियों की मौत हो चुकी है जिनमें 360 से अधिक महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। वहीं इस्राइल का कहना है कि उसकी सैन्य कार्रवाई केवल उन उग्रवादियों के खिलाफ है जो उसके सैनिकों पर हमले की तैयारी कर रहे थे। इस्राइली सेना के अनुसार युद्धविराम के बाद उग्रवादी हमलों में उसके पांच सैनिक भी मारे गए हैं।

    गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक अक्टूबर 2023 में शुरू हुए युद्ध के बाद अब तक 73 हजार से अधिक फलस्तीनियों की मौत हो चुकी है। दूसरी ओर इस्राइल का कहना है कि सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले में करीब 1200 लोगों की जान गई थी और 251 लोगों को बंधक बनाया गया था।

    उधर वेस्ट बैंक में भी तनाव बना हुआ है। रामल्लाह के पास इस्राइली सेना की छापेमारी के दौरान 15 वर्षीय एक फलस्तीनी किशोर के सिर में गोली लगने से मौत हो गई। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के समन्वय कार्यालय के अनुसार इस वर्ष वेस्ट बैंक में इस्राइली सैनिकों और बसने वालों की कार्रवाई में कम से कम 59 फलस्तीनियों की जान जा चुकी है।

  • तनाव के बीच इजरायल ने रोकी सैन्य कार्रवाई, नेतन्याहू की चेतावनी- किसी भी हमले का जवाब होगा पहले से ज्यादा सख्त

    तनाव के बीच इजरायल ने रोकी सैन्य कार्रवाई, नेतन्याहू की चेतावनी- किसी भी हमले का जवाब होगा पहले से ज्यादा सख्त

    नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में हाल के दिनों में बढ़े सैन्य तनाव के बीच इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ चल रही सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोकने की घोषणा की है। हालांकि इस घोषणा के साथ उन्होंने स्पष्ट चेतावनी भी दी कि यदि भविष्य में इजरायल की सुरक्षा को किसी प्रकार का खतरा पैदा किया गया या फिर से हमला किया गया, तो उसका जवाब पहले की तुलना में अधिक कठोर और व्यापक होगा।

    देश के नाम अपने संबोधन में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। उन्होंने दावा किया कि हाल की सैन्य कार्रवाइयों का उद्देश्य उन खतरों को समाप्त करना था, जिन्हें इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानता रहा है। उनके अनुसार, सरकार ने ऐसे कदम उठाए जिनका लक्ष्य संभावित खतरों को समय रहते नियंत्रित करना था।

    प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि इजरायल किसी भी ऐसे प्रयास को स्वीकार नहीं करेगा जो उसकी संप्रभुता या नागरिकों की सुरक्षा को प्रभावित करे। उन्होंने कहा कि सैन्य कार्रवाई रोकने का निर्णय मौजूदा परिस्थितियों और सुरक्षा आकलन के आधार पर लिया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इजरायल अपनी सतर्कता कम करेगा।

    नेतन्याहू ने यह भी संकेत दिया कि पिछले कुछ समय में हुए घटनाक्रमों ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि इजरायल ने अपनी रक्षा नीति के तहत उन सभी गतिविधियों पर नजर बनाए रखी है, जिन्हें वह अपने हितों के लिए खतरा मानता है। उनके अनुसार, सुरक्षा एजेंसियां और रक्षा बल भविष्य की किसी भी चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

    इस दौरान उन्होंने क्षेत्र में सक्रिय विभिन्न संगठनों और समूहों का भी उल्लेख किया तथा कहा कि इजरायल किसी भी प्रकार की आक्रामक गतिविधि का जवाब देने का अधिकार सुरक्षित रखता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि देश की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है और इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए जाते रहेंगे।

    विश्लेषकों का मानना है कि सैन्य कार्रवाई रोकने की घोषणा क्षेत्रीय तनाव को अस्थायी रूप से कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत हो सकती है। हालांकि दोनों पक्षों की ओर से दी गई चेतावनियां यह भी दर्शाती हैं कि स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है और भविष्य में घटनाक्रम किस दिशा में जाएंगे, इस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।

    पश्चिम एशिया लंबे समय से भू-राजनीतिक तनाव और सुरक्षा चुनौतियों का केंद्र रहा है। ऐसे में किसी भी सैन्य गतिविधि का प्रभाव केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा बाजार और वैश्विक कूटनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति और संवाद की अपील लगातार की जाती रही है।

    राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, आने वाले दिनों में दोनों देशों के कदम और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के प्रयास यह तय करेंगे कि क्षेत्र में तनाव कम होता है या फिर नई चुनौतियां सामने आती हैं। फिलहाल इजरायल की ओर से सैन्य कार्रवाई रोकने की घोषणा को तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है, जबकि सुरक्षा संबंधी चेतावनी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि स्थिति पर सतर्क निगरानी जारी रहेगी।

  • इजरायल अब युद्ध से इतर AI और सेमीकंडक्टर तकनीक बढ़ाने पर दे रहा जोर, जानें क्या है प्लान?

    इजरायल अब युद्ध से इतर AI और सेमीकंडक्टर तकनीक बढ़ाने पर दे रहा जोर, जानें क्या है प्लान?


    तेलअवीव।
    इजरायल (Israel) अब मिडिल ईस्ट (Middle East.) के युद्ध मोर्चों पर पारंपरिक सैन्य रणनीति के बजाय बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), संचार प्रणालियों और अत्याधुनिक सेमीकंडक्टर तकनीक (Cutting-edge Semiconductors Technology) पर निर्भर रहने की तैयारी कर रहा है। इजरायली सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने खुलासा किया है कि आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय रणनीतिक श्रेष्ठता बंदरगाहों या रेलवे गलियारों पर नहीं, बल्कि उन्नत प्रौद्योगिकी पर आधारित होगी। अधिकारियों ने कहा है कि भविष्य के युद्ध मैदान पर सैनिकों के बजाय बड़ी टेक कंपनियां निर्णायक भूमिका निभाएंगी। इजरायल मध्य पूर्व में विकसित हो रहे रणनीतिक आर्थिक गलियारों की ‘वास्तविक रीढ़’ के रूप में प्रौद्योगिकी और संचार अवसंरचना ( Communication Infrastructure ) को देख रहा है।


    IMEC और I2U2 को नया नजरिया

    वहीं, इस नई सोच के तहत इजराइल भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) और I2U2 समूह जैसी पहलों को पूरी तरह नए नजरिए से देख रहा है। इजरायली अधिकारी अमेरिकी चिप दिग्गज एनवीडिया समेत वैश्विक टेक कंपनियों के साथ बढ़ते सहयोग पर जोर दे रहे हैं। इजरायल खुद को भारत, खाड़ी देशों और पश्चिमी देशों के बीच नवाचार और प्रौद्योगिकी का प्रवेश द्वार बनाने की दिशा में काम कर रहा है, जहां ये कंपनियां अपने अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्थापित कर रही हैं।


    ईरान पर इजरायल की स्पष्ट रणनीति

    ईरान के साथ चल रहे तनाव पर इजरायली अधिकारियों ने साफ किया कि इजरायल का लक्ष्य तेहरान में सत्ता परिवर्तन नहीं है। उनका उद्देश्य ईरान की सैन्य क्षमता को ‘पीढ़ीगत रूप से कमजोर’ करना है। अधिकारियों ने बताया कि लंबी दूरी की मिसाइल प्रणालियों के विकास के लिए विशाल औद्योगिक आधार जरूरी होता है। इजरायल इसी आधार को निशाना बना रहा है ताकि ईरान इजरायल की हवाई सुरक्षा को भेद सकने वाली मिसाइलें विकसित न कर सके।

    इसके अलावा ईरानी सैन्य नेतृत्व और प्रॉक्सी समूहों के कमांडरों को लक्ष्य बनाना भी ऑपरेशनल क्षमता को बाधित करने की रणनीति का हिस्सा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जब नेतृत्व लगातार छिपने, जगह बदलने और नई कम्युनिकेशन लाइनें बनाने में लगा रहता है, तो उसकी परिचालन क्षमता तेजी से घट जाती है।


    भारत से IRGC पर कार्रवाई की अपील

    इजरायली पक्ष ने भारत से बड़े राजनयिक प्रयास के तहत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की है। अधिकारियों ने कहा कि इजरायल इस मुद्दे को भारतीय अधिकारियों के समक्ष कई बार उठा चुका है और उम्मीद करता है कि भारत आधिकारिक तौर पर IRGC को आतंकवादी संगठन घोषित करे। उन्होंने बताया कि अब तक 44 देश IRGC के खिलाफ कार्रवाई कर चुके हैं। इसमें ऑस्ट्रेलिया के फैसले और यूरोपीय संघ की पहल का जिक्र किया।


    हमास पर भी भारत से उम्मीद

    7 अक्टूबर के हमले के बाद इजराइल ने भारत से हमास को भी आतंकवादी संगठन घोषित करने की अपील दोहराई है। भारत ने हमले की कड़ी निंदा की थी, लेकिन अब तक हमास को आतंकवादी संगठन के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है। इसी दौरान ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरघची का हालिया नई दिल्ली दौरा इजरायली पक्ष की चिंता का विषय बना हुआ है, जहां उन्होंने भारत को ‘भरोसेमंद दोस्त’ बताया था।

    दूसरी ओर इजरायली अधिकारी पूरे टकराव को क्षेत्रीय रणनीतिक और ऊर्जा प्रतिस्पर्धा के नजरिए से देख रहे हैं। उनके अनुसार, ईरान की मिसाइल क्षमता को कम करने और उसके क्षेत्रीय सैन्य प्रभाव को सीमित करने के इजरायली लक्ष्य काफी हद तक हासिल हो चुके हैं।