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  • इजरायल की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ 8 मुस्लिम देशों ने खोला मोर्चा… दी कड़ी चेतावनी

    इजरायल की विस्तारवादी नीतियों के खिलाफ 8 मुस्लिम देशों ने खोला मोर्चा… दी कड़ी चेतावनी


    इस्लामाबाद।
    पाकिस्तान (Pakistan) समेत आठ मुस्लिम देशों (Eight Muslim Countries) ने सोमवार (9 फरवरी) को एक संयुक्त बयान जारी कर कब्जे वाले पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) में इज़रायल (Israel) की “लगातार विस्तारवादी नीतियों” के खिलाफ कड़ी चेतावनी दी है। इन देशों ने इज़रायल पर अवैध तरीके से संप्रभुता थोपने, यहूदी बस्तियों के विस्तार और फ़िलिस्तीनी जनता को विस्थापित करने का आरोप लगाया है। इस संयुक्त बयान पर पाकिस्तान, मिस्र, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इंडोनेशिया, तुर्किये, सऊदी अरब और कतर के विदेश मंत्रियों के हस्ताक्षर हैं। बयान में कहा गया कि इज़रायल द्वारा लिए जा रहे फैसले पश्चिमी तट को अवैध रूप से अपने में मिलाने की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं।

    यह बयान ऐसे समय में आया है, जब इज़रायल की सुरक्षा कैबिनेट ने हाल ही में कुछ ऐसे कदमों को मंजूरी दी है, जिनसे पश्चिमी तट में यहूदी बसने वालों के लिए जमीन खरीदना आसान हो जाएगा और फ़िलिस्तीनियों पर इज़रायली प्रशासन के प्रवर्तन अधिकार बढ़ जाएंगे। इज़रायली मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दशकों पुराने उन नियमों को हटाने का भी फैसला किया गया है, जो यहूदी नागरिकों को निजी तौर पर पश्चिमी तट में जमीन खरीदने से रोकते थे।


    इजरायल को चेतावनी

    ऐसी स्थिति में आठों मुस्लिम देशों ने दो टूक कहा कि इजरायल का कब्जे वाले फिलस्तीनी इलाकों पर कोई संप्रभु अधिकार नहीं है। बयान में चेतावनी दी गई है कि पश्चिमी तट में अपनाई जा रही नीतियाँ क्षेत्र में हिंसा और संघर्ष को और भड़का रही हैं। इन देशों के विदेश मंत्रियों ने इजरायल की कार्रवाइयों को अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन बताते हुए कहा कि ये कदम दो-राष्ट्र समाधान को कमजोर करते हैं और फ़िलिस्तीनी जनता के स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के अधिकार पर सीधा हमला हैं।


    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव का भी हवाला

    बयान में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 का भी हवाला दिया गया है, जिसमें 1967 के बाद कब्जे वाले फ़िलिस्तीनी इलाक़ों की जनसांख्यिकी, स्वरूप और स्थिति बदलने के किसी भी प्रयास की निंदा की गई है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की 2024 की सलाहकारी राय का उल्लेख करते हुए कहा गया कि अदालत ने इजरायल की मौजूदगी और नीतियों को अवैध करार दिया है। विदेश मंत्रियों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की कि वह अपनी क़ानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारियाँ निभाए और इज़रायल को पश्चिमी तट में खतरनाक तनाव बढ़ाने और उसके नेताओं के भड़काऊ बयानों पर रोक लगाने के लिए मजबूर करे।


    दो-राष्ट्र समाधान के जरिये ही शांति संभव

    उन्होंने जोर देकर कहा कि फ़िलिस्तीनी जनता के आत्मनिर्णय और स्टेटहुड के अधिकार की पूर्ति ही स्थायी समाधान है, जो अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों और अरब शांति पहल के अनुरूप दो-राष्ट्र समाधान के जरिये ही संभव है। ग़ौरतलब है कि यही आठ देश पिछले वर्ष अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के साथ गाज़ा में युद्ध और कथित नरसंहार को समाप्त करने की योजना पर भी काम कर चुके हैं। इस महीने की शुरुआत में इन देशों ने गाज़ा में संघर्ष विराम के बार-बार उल्लंघन को लेकर भी इजरायल की निंदा की थी।

  • पाकिस्‍तान को इजरायल की दो टूक; गाजा पट्टी में मुनीर के मंसूबों पर फेरा पानी

    पाकिस्‍तान को इजरायल की दो टूक; गाजा पट्टी में मुनीर के मंसूबों पर फेरा पानी

    नई दिल्‍ली। इजरायल ने दो टूक कहा है कि गाजा में अमेरिका के प्रस्तावित इंटरनेशनल स्टेबलाइज़ेशन फोर्स (ISF) में पाकिस्तानी सेना को एंट्री नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही इजरायल ने कहा है कि हमास के साथ उसके संबंधों की वजह से उसकी गाजा में भागीदारी संदिग्ध है।
    भारत में इजरायल के राजदूत रूवेन अजार ने कहा कि इजरायल अमेरिका द्वारा प्रस्तावित किसी भी गाजा स्थिरीकरण बल में पाकिस्तानी सेना को शामिल करने का स्पष्ट रूप से विरोध करता है। उन्होंने कहा कि हमास और आतंकी संगठनों के रिश्तों के कारण पाकिस्तान पर भरोसा नहीं कर सकते।

    एक विशेष साक्षात्कार में अज़ार ने कहा कि हमास और पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों, खासकर लश्कर-ए-तैयबा, के बीच बढ़ते संपर्क को लेकर इज़रायल को गहरी चिंता है। इजरायल की तरफ से यह प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में आई है, जब पाकिस्तान गाजा में इंटरनेशनल फोर्स में शामिल होने पर अमेरिका की प्रतिक्रिया का अभी इंतजार ही कर रहा है।

    बता दें कि ट्रंप के गाजा में शांति बहाली और सत्ता हस्तांतरण के फार्मूले के तहत वहां एक अंतरराष्ट्रीय स्तिरिकरण बल की तैनाती की जानी है, जिसमें कई देश शामिल होंगे। पाकिस्तान ने भी इस बल में शामिल होने की इच्छा जताई थी लेकिन इजरायल ने उसे खारिज कर दिया है।

    हमास के खात्मे के बिना कोई व्यवस्था संभव नहीं
    इजरायली राजदूत अज़ार ने स्पष्ट तौर पर कहा कि हमास को एक आतंकवादी संगठन के रूप में पूरी तरह खत्म किए बिना गाज़ा के भविष्य को लेकर कोई भी व्यवस्था संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में एक स्थिरीकरण बल (Stabilisation Force) का विचार तब तक निरर्थक है, जब तक हमास को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं कर दिया जाता। यह पहली बार है जब इजरायल आधिकारिक तौर पर और खुले तौर पर पाकिस्तानी सेना की भूमिका के खिलाफ सामने आया है।

    यह आसिम मुनीर के लिए बड़ा झटका है, जो गाजा में अपनी सेना की तैनाती के बड़े ख्वाव देख रहे थे।
    पाक समेत कई देशों से अमेरिका ने किया था संपर्क
    हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने गाज़ा में सुरक्षा और पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तावित बल में योगदान देने को लेकर पाकिस्तान समेत कई देशों से संपर्क किया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अज़ार ने कहा, “कई देशों ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे हमास से लड़ने के लिए अपने सैनिक नहीं भेजना चाहते। ऐसे में यह योजना व्यावहारिक नहीं लगती।” जब उनसे सीधे पूछा गया कि क्या इज़रायल गाज़ा में पाकिस्तानी सेना की मौजूदगी को स्वीकार करेगा, तो उनका जवाब साफ था “नहीं।”
    “केवल उन्हीं के साथ काम करेंगे जो भरोसेमंद”
    पाकिस्तान की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए इज़रायली राजदूत ने कहा,“देश आमतौर पर उन्हीं के साथ सहयोग करते हैं जिनके साथ उनके भरोसेमंद राजनयिक संबंध हों। इस समय पाकिस्तान के साथ ऐसी स्थिति नहीं है।” इस बयान से इज़रायल की पाकिस्तान को लेकर गहरी अविश्वास की भावना साफ झलकती है।
    हमास–पाकिस्तान संपर्कों पर इजरायल की नजर
    राजदूत अज़ार के बयान ऐसे समय आए हैं जब हाल ही में यह बात सामने आई है कि हमास के वरिष्ठ कमांडर नाजी ज़हीर पिछले तीन वर्षों से लगातार पाकिस्तान की यात्राएं कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, नाजी ज़हीर ने लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों से कई बैठकें और मुलाकातें की थीं। ये बैठकें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK)में भी हुईं हैं। यह बात भी सामने आ चुकी है कि 7 अक्टूबर को इज़रायल पर हुए हमले के कुछ ही दिनों बाद ज़हीर पेशावर में मौजूद था।अज़ार ने पुष्टि की कि इज़रायली खुफिया एजेंसियां इन गतिविधियों पर करीबी नजर रखे हुए हैं।
  • निपटने की तैयारी में भारत, इजराइल से मिसाइल डिफेंस डील

    निपटने की तैयारी में भारत, इजराइल से मिसाइल डिफेंस डील


    नई दिल्‍ली। भारत का डिफेंस सेक्‍टर अभी भी मुख्‍य रूप से विदेशी खरीद पर निर्भर है. पिछले कुछ सालों में इसमें काफी बदलाव आया है. ‘आत्‍मनिर्भर भारत’ के सूत्र के साथ देश आगे बढ़ रहा है. यही वजह है कि अब भारत भी एक महत्‍वपूर्ण हथियार विक्रेता देश बनता जा रहा है. आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं.
    भारत के पश्चिमी बॉर्डर पर पाकिस्‍तान तो पूर्वी सीमा पर चीन स्थित है. इन दोनों देशों का रुख भारत के प्रति शत्रुतापूर्ण रहा है. अतीत में हुए युद्ध इसकी गवाही देते हैं. ऐसे में भारत के लिए एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध जैसी स्थिति से निपटने की तैयारी करना अनिवार्य है. ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोस्‍त और दुश्‍मन की पहचान और भी स्‍पष्‍ट हो चुकी है. बदले सामरिक माहौल को देखते हुए भारत अपने डिफेंस सिस्‍टम को मजबूत और अपडेट करना शुरू कर दिया है.
    आर्मी, एयरफोर्स और नेवी को महाबली बनाने की प्रक्रिया लगातार जारी है. नेवी में अब हर 6 सप्‍ताह के बाद एक युद्धपोत को शामिल करने की प्‍लानिंग है तो वहीं आर्मी ड्रोन फ्लीट बनाने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रही है. एयरफोर्स के लिए भी हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. फाइटर जेट से लेकर एयर टू एयर और एयर टू सर्फेस मिसाइल को बेड़े में शामिल किया जा रहा है. प्रिसीजन गाइडेड बम की खरीद भी चल रही है. इसके अलावा एयर डिफेंस सिस्‍टम प्रोजेक्‍ट के तहत देश को किसी भी तरह के एरियल थ्रेट से सुरक्षित करने पर लगातार काम चल रहा है. इन सबके बीच एक और बड़ी खबर सामने आई है. भारत मित्र देश इजरायल से कटिंग एज वेपन, मिसाइल और बम खरीदने के लिए बड़ी डील करने की तैयारी में है. इनमें से कुछ मिसाइल की रेंज 300 से 400 किलोमीटर तक है. मतलब घर बैठे बटन दबाते ही लाहौर में तबाही लाई जा सकती है. लाहौर भारतीय सीमा के करीब स्थित बड़ा शहर है.

    जानकारी के अनुसार, भारत और इज़राइल के बीच रक्षा सहयोग एक नए और अहम दौर में प्रवेश कर रहा है. ‘एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायुसेना (IAF) को और अधिक ताकतवर बनाने के लिए भारत इजरायल से लगभग 8.7 अरब डॉलर (₹78217 करोड़) की डिफेंस डील करने की तैयारी में है. इस पैकेज में अत्याधुनिक SPICE-1000 प्रिसिजन गाइडेड बम, रैम्पेज मिसाइल, एयर लोरा (Air LORA) और आइस ब्रेकर (Ice Breaker) जैसी आधुनिक मिसाइलें शामिल हैं. इस प्रस्ताव को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली डिफेंस एक्विज़िशन काउंसिल (DAC) से मंजूरी मिल चुकी है. यह सौदा ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत को अपनी सीमाओं पर कई तरह की सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. एक ओर वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की उन्नत एयर डिफेंस तैनाती है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की ओर से GPS जैमिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल देखा गया है, खासकर मई 2025 में हुए ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के दौरान.

    ऐसे में भारत की यह खरीद उसकी रणनीतिक जरूरतों को दर्शाती है. आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच इजरायल के कुल रक्षा निर्यात का 34 प्रतिशत भारत को गया, जिससे भारत इजरायल का सबसे बड़ा रक्षा खरीदार बन गया है. इस नए पैकेज में सिर्फ मिसाइलें ही नहीं, बल्कि एयर-टू-एयर मिसाइलें, लोइटरिंग म्यूनिशन, आधुनिक रडार, सिमुलेटर और नेटवर्क आधारित कमांड सिस्टम भी शामिल हैं.
    रैम्पेज मिसाइल: भरोसेमंद वेपन
    रैम्पेज मिसाइल, जिसे इज़राइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज (IAI) ने विकसित किया है, पहले से ही भारतीय वायुसेना और नौसेना के पास मौजूद है. यह मिसाइल Su-30MKI, MiG-29, Jaguar और MiG-29K जैसे विमानों से दागी जा सकती है. करीब 570 किलो वजनी यह मिसाइल GPS/INS गाइडेंस से लैस है और इसमें एंटी-जैमिंग क्षमता भी है. रैम्पेज का इस्तेमाल दुश्मन के एयरबेस, बंकर, कंट्रोल टावर और लॉजिस्टिक ठिकानों पर दूर से हमला करने के लिए किया जा सकता है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर इसकी प्रभावशीलता देखी गई थी.
  • ट्रंप को शांति पुरस्कार से सम्मानित करेगा इस्राइल …. नेतन्याहू बोले- इनके लिए हम तोड़ रहे परंपरा

    ट्रंप को शांति पुरस्कार से सम्मानित करेगा इस्राइल …. नेतन्याहू बोले- इनके लिए हम तोड़ रहे परंपरा


    वॉशिंगटन।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) को इस्राइल के सर्वोच्च नागरिक सम्मान (Israel’s highest civilian honor) इस्राइल शांति पुरस्कार (Israel Peace Prize) से सम्मानित किया जाएगा। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) ने सोमवार को फ्लोरिडा में राष्ट्रपति ट्रंप से मुलाकात के बाद एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये एलान किया। नेतन्याहू ने एलान करते हुए कहा कि इस्राइली सरकार ने फैसला किया है कि राष्ट्रपति ट्रंप को इस्राइल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जाए। 80 साल में यह पुरस्कार किसी भी गैर इस्राइली नागरिक को नहीं दिया गया है और पहली बार है कि शांति श्रेणी में यह पुरस्कार दिया जाएगा।

    अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस एलान पर खुशी जताई और कहा कि यह सम्मान उनके लिए अनापेक्षित था। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस्राइली प्रधानमंत्री ने कहा, ‘राष्ट्रपति ट्रंप ने लोगों को चौंकाने के लिए कई परंपराएं तोड़ी हैं, इसलिए हमने भी तय किया है कि हम भी एक परंपरा तोड़ेंगे और नई बनाएंगे। वो ये है कि इस्राइल सम्मान, जो 80 साल से किसी गैर इस्राइली नागरिक को नहीं दिया गया है, उससे राष्ट्रपति ट्रंप को सम्मानित किया जाएगा। भोजन के दौरान हमारे शिक्षा मंत्री ने इसका एलान किया था और यह पुरस्कार राष्ट्रपति ट्रंप के इस्राइली और यहूदी लोगों की भलाई में दिए गए योगदान के लिए दिया जाएगा।’

    इस्राइली प्रधानमंत्री ने कहा, ‘आपने इस्राइली लोगों के लिए जो किया, हमारी आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई में जो मदद की, उसके लिए हम लोग आपके शुक्रगुजार हैं।’


    इस्राइस के स्वतंत्रता दिवस समारोह में किया जाएगा सम्मानित

    इस्राइल पुरस्कार, इस्राइल का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है, जो पारंपरिक रूप से विज्ञान, कला और मानविकी जैसे क्षेत्रों में उत्कृष्ट काम करने के लिए इस्राइली नागरिकों को दिया जाता है। शांति श्रेणी में यह पुरस्कार पहले कभी नहीं दिया गया था। जुलाई 2025 में, इस्राइल ने पुरस्कार नियमों में संशोधन किया ताकि यह सम्मान किसी विदेशी नागरिक को भी दिया जा सके, जिससे ट्रंप के चयन का रास्ता साफ हो गया। ट्रंप पुरस्कार लेने के लिए इस्राइल के स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल हो सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी संकेत दिया कि वह समारोह में शामिल होने पर विचार करेंगे।

  • इजरायल ने सोमालिलैंड को दी स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता…अफ्रीकी संघ ने किया विरोध

    इजरायल ने सोमालिलैंड को दी स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता…अफ्रीकी संघ ने किया विरोध


    येरूशलम।
    इजरायल (Israel) ने शुक्रवार को औपचारिक रूप से सोमालिलैंड (Somaliland) को एक स्वतंत्र देश (Independent Country) के रूप में मान्यता दे दी है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Prime Minister Benjamin Netanyahu) ने सोमालिया से अलग हुए इस देश को मान्यता देने के का ऐलान करते हुए यहां के राष्ट्रपति अब्दिरहमान मोहम्मद अब्दुल्लाही (President Abdirahman Mohamed Abdullahi) को इजरायल के आधिकारिक दौरे का न्यौता भी दिया। गौरतलब है कि यह देश सोमालिया में चल रहे गृहयुद्ध के बाद अलग हुआ है, यह काफी समय से एक अलग देश के रूप में अपनी सत्ता चला रहा है। वहीं, दूसरी ओर अफ्रीकी संघ ने इजरायल के इस फैसले का विरोध किया है।

    टाइम्स ऑफ इजरायल की एक रिपोर्ट के अनुसार सोमालिया से अलग हुए इस क्षेत्र को 30 साल से अधिक समय के बाद किसी देश ने आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। इस ऐतिहासिक घोषणा पत्र पर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायली विदेश मंत्री गिदेओन साआर ने हस्ताक्षर किए, जबकि सोमालिलैंड की तरफ से राष्ट्रपति अब्दुल्लाही ने।

    दोनों ही नेताओं ने इस मान्यता पत्र को ऐतिहासिक पल बताया। नेतन्याहू ने कहा कि इस क्षण से दोनों देशों के बीच में ऐतिहासिक मित्रता की शुरुआत होती है। दोनों देश आर्थिक क्षेत्रों , कृषि और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में साथ मिलकर काम करेंगे। इजरायल का यह फैसला अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में हुए अब्राहम अकॉर्ड की भावनाओं के अनुरूप है। इजरालय से मान्यता मिलने के बाद सोमालिलैंड ने कहा है कि वह भी इस समझौते में शामिल होना चाहता है। राष्ट्रपति ने एक्स पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए लिखा कि यह दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत है। उन्होंने कहा, “यह एक ऐतिसाहिक क्षण है। हम इसका गर्मजोशी के साथ स्वागत करते हैं।” सोमालिलैंड की राजधानी हरगेसा में भी लोगों ने इजरायल के इस कदम का स्वागत किया और सड़कों पर आकर जश्न मनाया।


    अफ्रीकी संघ, सोमालिया समेत कई देशों ने जताई आपत्ति

    इजरायल की नेतन्याहू सरकार के इस फैसले की कई देशों ने निंदा की है। सोमालिया ने इसे उसकी संप्रभुता पर जानबूझकर किया गया हमला बताया। सोमालिया के विदेश मंत्री ने कहा कि इस फैसले की वजह से क्षेत्र की शांति कमजोर होगी। वहीं, अफ्रीकी संघ ने कड़े शब्दों में इसकी निंदा करते हुए इस कदम को पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सोमालिलैंड नामक क्षेत्र अफ्रीकी महासंघ के सदस्य सोमालिया का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने कहा, “सोमालिया की एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करने की कोई भी कोशिश एक खतरनाक मिसाल का काम कर सकती है, जिससे पूरे महाद्वीप की शांति और स्थिरता पर दूरगामी प्रभाव होगा।

    गृहयुद्ध से जूझ रहे सोमालिया के मुख्य सहयोगी तुर्किए ने इजरायल के इस फैसले का विरोध किया है। तुर्किए के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इजरायल की यह पहल उसकी विस्तारवादी नीति से मेल खाती है। यह सोमालिया के आंतरिक मामलों में खुला हस्तक्षेप है। तुर्किए सोमालिया की एकता, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।


    क्या है सोमालिलैंड की कहानी?

    अफ्रीकी महाद्वीप के हॉर्न पर बसे सोमालिया के अंतर्गत माने जाने वाले सोमालिलैंड को मान्यता देने वाला इजरायल पहला देश बना है। अभी तक इस क्षेत्र को किसी भी देश ने स्वतंत्र देश की मान्यता नहीं दी है। हालांकि, ब्रिटेन इथियोपिया, तुर्किए, यूएई,डेनमार्क, कीनिया और ताइवान जैसे देशों के साथ उसके अनौपचारिक राजनयिक संबंध हैं।

    ऐतिहासिक दृष्टि से 1960 के दशक में सोमालिलैंड को कुछ समय के लिए स्वतंत्रता मिली थी और उस समय इजरायल समेत कुल 35 देशों ने उसे मान्यता दी थी। लेकिन फिर बाद में वह स्वेच्छा से सोमालिया के साथ एकीकृत हो गया था। बाद में जब 1991 में सोमालिया गृहयुद्ध में उलझ गया तो सोमालिलैंड ने फिर से खुद को स्वतंत्र घोषित कर लिया। तब से लेकर अभी तक सोमालिलैंड एक अलग राज्य के रूप में ही काम कर रहा है। इसकी अपनी सरकार, अपनी मुद्रा और सुरक्षा बल है। सोमालिया के लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के विपरीत सोमालिलैंड में अपेक्षाकृत शांत और स्थिर शासन देखने को मिलता है।


    क्या हैं इसके मायने?

    इजरायल का यह फैसला एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। विश्लेषकों के अनुसार, सोमालिलैंड की भौगौलिक स्थिति महत्वपूर्ण है। रेड सी के पास इजरायल को साझेदारों की जरूरत है। इन साझेदारों की मदद से वह भविष्य में यमन के हूती विद्रोहियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इसके अलावा अब्राहम अकॉर्ड में एक और देश के शामिल होने से इजरायल को भी इसका लाभ होगा। हालांकि, इससे अन्य देश भड़क भी सकते हैं। वहीं,दूसरी ओर सोमालिलैंड पिछले 30 साल से अंतर्राष्ट्रीय मान्यता पाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इजरायल की तरफ से मिली यह मान्यता उसके लिए एक बड़ी संभावना की तरह है। मान्यता के बिना यह क्षेत्र गंभीर गरीबी से जूझ रहा है। क्योंकि इसे विदेशी लाभ भी लगभग न के बराबर मिलता है।