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  • उद्धव ठाकरे ने पार्टी नेताओं को लगाई फटकार, अभिजीत दीपके का उदाहरण देकर गुटबाजी पर जताई नाराजगी

    उद्धव ठाकरे ने पार्टी नेताओं को लगाई फटकार, अभिजीत दीपके का उदाहरण देकर गुटबाजी पर जताई नाराजगी

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना (यूबीटी) की एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक बैठक के दौरान पार्टी प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का बेहद सख्त रुख चर्चा का विषय बना हुआ है। ठाणे-कल्याण क्षेत्र के प्रमुख पदाधिकारियों की समीक्षा बैठक के दौरान उन्होंने स्थानीय नेताओं के बीच जारी आपसी खींचतान और पद-प्रतिष्ठा को लेकर चल रहे विवादों पर खुलकर अपनी तीव्र नाराजगी व्यक्त की। इस दौरान उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके के हालिया आंदोलन का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए पार्टी पदाधिकारियों से बड़े राजनीतिक लक्ष्यों और संगठनात्मक मजबूती पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह समीक्षा बैठक कल्याण लोकसभा क्षेत्र में कई निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं को सांगठनिक जिम्मेदारियों से अलग किए जाने के बाद पनपे असंतोष की पृष्ठभूमि में बुलाई गई थी। बैठक के दौरान वरिष्ठ कार्यकर्ताओं और नए मनोनीत पदाधिकारियों के बीच वर्चस्व की जंग और नेतृत्व के मसले को लेकर तीखी नोकझोंक देखने को मिली। वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में आयोजित इस बैठक में संगठनात्मक स्थिति की गहन समीक्षा की जा रही थी, जहां आंतरिक गुटबाजी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई।

    अपने आक्रामक संबोधन में उद्धव ठाकरे ने पदाधिकारियों को स्पष्ट ताकीद दी कि राज्य के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में सभी को निजी महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर बड़े जनहित के मुद्दों के लिए एकजुट होना होगा। उन्होंने कहा कि एक तरफ जब देश और राज्य में जनसमस्याओं को लेकर विभिन्न स्तरों पर संघर्ष किए जा रहे हैं, तब दल के भीतर आंतरिक पदों के लिए खींचतान होना संगठन की नींव को कमजोर करता है। इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने अभिजीत दीपके द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख करते हुए नेताओं से राजनीतिक सक्रियता और अनुशासन की सीख लेने को कहा।

    सूत्रों का कहना है कि पार्टी प्रमुख का यह कड़ा रुख केवल मौखिक चेतावनी तक सीमित नहीं रहने वाला है। उन्होंने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि संगठन में किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। नेतृत्व का मानना है कि यदि इस गुटबाजी को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो इसका सीधा नकारात्मक असर धरातल पर कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा। मध्य प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों के राजनीतिक विश्लेषक भी महाराष्ट्र के इस तेजी से बदलते सियासी घटनाक्रम और शिवसेना (यूबीटी) की अंदरूनी हलचलों पर पैनी नजर रखे हुए हैं।

    इसके अतिरिक्त, हालिया खबरों में यह बात भी सामने आई है कि उद्धव ठाकरे और अभिजीत दीपके के मध्य टेलीफोन के माध्यम से सीधी बातचीत हुई थी। इस संवाद के दौरान ठाकरे ने उनके द्वारा चलाए जा रहे अभियानों की प्रगति जानी और उन्हें मुंबई स्थित अपने निजी निवास मातोश्री आने का न्योता भी दिया। यद्यपि, इस मुलाकात और बातचीत के विस्तृत एजेंडे को लेकर दोनों ही खेमों की ओर से कोई आधिकारिक विस्तृत बयान जारी नहीं किया गया है।

    ठाणे और उसके समीपवर्ती इलाके ऐतिहासिक रूप से शिवसेना के सबसे मजबूत गढ़ माने जाते रहे हैं। ऐसे में आगामी स्थानीय निकायों और अन्य चुनावों को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में किसी भी तरह की दरार पार्टी के लिए बड़ा नुकसान साबित हो सकती है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, उद्धव ठाकरे की यह सख्त नसीहत पार्टी के भीतर अनुशासन, एकजुटता और कैडर को पुनः सक्रिय करने का एक रणनीतिक प्रयास है। अब देखना यह होगा कि शीर्ष नेतृत्व की इस चेतावनी के बाद संगठन में क्या जमीनी बदलाव आते हैं।

  • सिद्धिविनायक मंदिर के चढ़ावे को लेकर राज ठाकरे के आरोप से महाराष्ट्र की राजनीति गरमाई, जांच की मांग तेज

    सिद्धिविनायक मंदिर के चढ़ावे को लेकर राज ठाकरे के आरोप से महाराष्ट्र की राजनीति गरमाई, जांच की मांग तेज

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर मंदिरों के चढ़ावे और ट्रस्टों की कार्यप्रणाली को लेकर बहस तेज हो गई है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे ने मुंबई स्थित प्रसिद्ध सिद्धिविनायक मंदिर के दान को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि मंदिर में आने वाले दान में हर वर्ष लगभग 18 करोड़ रुपये की कथित चोरी होती है। इस बयान के बाद राज्य की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है और विभिन्न दलों की ओर से इस पर प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

    राज ठाकरे ने अपनी पार्टी की छात्र इकाई के स्थापना दिवस कार्यक्रम के दौरान यह मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा दिए जाने वाले दान की पारदर्शिता सुनिश्चित होना आवश्यक है। उनका आरोप है कि सिद्धिविनायक मंदिर के दान प्रबंधन में गंभीर अनियमितताएं हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक संस्थानों में आने वाले धन का सही उपयोग और उसका पारदर्शी लेखा-जोखा सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए जरूरी है।

    एमएनएस प्रमुख ने दावा किया कि सिद्धिविनायक मंदिर ट्रस्ट के कुछ ट्रस्टियों ने राज्य के उपमुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। उनके अनुसार, पत्र में यह आशंका जताई गई है कि मंदिर के दान से जुड़े वित्तीय मामलों में अनियमितताएं हुई हैं और कुछ कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जानी चाहिए। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    अपने संबोधन के दौरान राज ठाकरे ने अयोध्या के राम मंदिर के दान से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं का भी उल्लेख किया और कहा कि धार्मिक संस्थानों से जुड़े ऐसे मामलों पर व्यापक स्तर पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से भी इस प्रकार के आरोपों पर स्पष्ट रुख अपनाने और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने की मांग की। उनका कहना था कि श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े किसी भी संस्थान में वित्तीय पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

    राज ठाकरे के आरोपों के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया। भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक ने उनके बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि प्रसिद्ध गणेश मंदिर के बारे में इस तरह के आरोप लगाने से पहले ठोस प्रमाण सामने आने चाहिए। उनका कहना था कि धार्मिक संस्थानों की प्रतिष्ठा से जुड़े मामलों में जिम्मेदारी और संयम के साथ बयान दिए जाने चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत न हों।

    सिद्धिविनायक मंदिर देश के सबसे प्रसिद्ध और समृद्ध धार्मिक स्थलों में गिना जाता है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर में हर वर्ष करोड़ों रुपये का दान प्राप्त होता है, जिसके प्रबंधन की जिम्मेदारी ट्रस्ट के पास होती है। ऐसे में मंदिर के वित्तीय संचालन को लेकर लगाए गए आरोप स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा का विषय बन गए हैं।

    फिलहाल इन आरोपों को लेकर संबंधित अधिकारियों की ओर से विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। यदि जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो उससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है। तब तक यह मामला महाराष्ट्र की राजनीति के साथ-साथ धार्मिक संस्थानों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर चल रही बहस का महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है।

  • अभिजीत दीपके से मिलने पहुंचे शिंदे सेना के नेता, आंदोलन की सराहना की, सुरक्षा देने की भी उठाई मांग

    अभिजीत दीपके से मिलने पहुंचे शिंदे सेना के नेता, आंदोलन की सराहना की, सुरक्षा देने की भी उठाई मांग


    नई दिल्ली। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके से मिलने नेताओं का सिलसिला जारी है। गुरुवार को शिवसेना (शिंदे गुट) के विधान परिषद सदस्य (MLC) बच्चू कडू ने छत्रपति संभाजीनगर पहुंचकर उनसे मुलाकात की और उनके आंदोलन की सराहना की। इससे पहले राज्य सरकार में मंत्री संजय शिरसाट भी दीपके और उनके परिवार से मिल चुके हैं।

    बच्चू कडू ने स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक दल या सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी के तौर पर अभिजीत दीपके से मिलने पहुंचे हैं। उन्होंने कहा, “मैं यहां एक आंदोलनकारी के रूप में दूसरे आंदोलनकारी से मिलने आया हूं।” उन्होंने जंतर-मंतर पर किए गए प्रदर्शन के लिए दीपके को बधाई भी दी।

    धमकियों पर जताई चिंता
    अभिजीत दीपके को कथित तौर पर मिल रही धमकियों के सवाल पर बच्चू कडू ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं को उन लोगों से बात करनी चाहिए जो ऐसी धमकियां दे रहे हैं और अनुचित व्यवहार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना हर नागरिक का अधिकार है और इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए।

    संजय शिरसाट ने भी की थी मुलाकात
    इससे पहले महाराष्ट्र सरकार में मंत्री संजय शिरसाट ने भी दीपके के परिवार से मुलाकात की थी। उन्होंने कहा था कि उन्हें अपने क्षेत्र के निवासी अभिजीत दीपके पर गर्व है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। शिरसाट ने कहा कि वह इस संबंध में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से बात करेंगे।

    आंदोलन की खुलकर की तारीफ
    संजय शिरसाट ने बताया कि अभिजीत दीपके को अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय में पढ़ाई के बाद नौकरी का अवसर मिला था, लेकिन उन्होंने छात्रों के हितों के लिए काम करने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि दीपके ने किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि छात्रों की समस्याओं को लेकर आंदोलन किया और उनकी सफलता में समाज के व्यापक समर्थन की बड़ी भूमिका रही। मंत्री ने यह भी कहा कि आंदोलन के बाद छात्रों की प्रमुख मांगों पर कार्रवाई हुई और इस पहल ने राज्य ही नहीं, देशभर में चर्चा बटोरी।

  • शिक्षा मंत्री की नियुक्ति पर संजय राउत का तंज, बोले- देवेंद्र फडणवीस इस जिम्मेदारी के लिए बेहतर विकल्प

    शिक्षा मंत्री की नियुक्ति पर संजय राउत का तंज, बोले- देवेंद्र फडणवीस इस जिम्मेदारी के लिए बेहतर विकल्प

    नई दिल्ली । शिवसेना (यूबीटी) के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने केंद्र सरकार में शिक्षा मंत्री की नियुक्ति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने नए शिक्षा मंत्री के चयन पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी ऐसे व्यक्ति को दी जानी चाहिए, जिसका इस क्षेत्र से गहरा जुड़ाव और समझ हो। इसी दौरान उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का नाम लेते हुए तंज भरे अंदाज में उन्हें इस पद के लिए बेहतर विकल्प बताया।

    संजय राउत ने कहा कि उनके अनुसार देवेंद्र फडणवीस शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि फडणवीस शिक्षित और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले नेता हैं तथा उन्हें शिक्षा मंत्री बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि वर्तमान व्यवस्था में जिस तरह मंत्रालयों का बंटवारा किया जा रहा है, उस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

    राउत ने नए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि शिक्षा क्षेत्र से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े अनुभव वाले व्यक्ति को यह जिम्मेदारी मिलनी चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि प्रह्लाद जोशी को उनके पहले के मंत्रालय में ही रहने दिया जाता तो अधिक उचित होता। हालांकि यह उनका राजनीतिक मत है और इसे लेकर सरकार की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।

    राज्यसभा सांसद ने यह भी दावा किया कि इससे पहले भी वह कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि देवेंद्र फडणवीस शिक्षा मंत्री की भूमिका निभाने में सक्षम हैं। उन्होंने अपने पुराने बयान का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा मंत्रालय जैसे अहम विभाग में ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है, जो नीति निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सके।

    केंद्र सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर निशाना साधते हुए संजय राउत ने आरोप लगाया कि देश में शिक्षा क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में सरकारी स्कूलों की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं। उनके अनुसार समय-समय पर सामने आने वाले पेपर लीक जैसे मामलों ने विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंता बढ़ाई है।

    राउत ने अपने बयान में केंद्र सरकार की नीतियों की भी आलोचना की और कहा कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए केवल मंत्रालय में बदलाव पर्याप्त नहीं होगा। उन्होंने दावा किया कि सरकार को शिक्षा की गुणवत्ता, संस्थानों की मजबूती और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली जैसे मुद्दों पर अधिक गंभीरता से काम करना चाहिए। साथ ही उन्होंने कुछ राजनीतिक टिप्पणियां भी कीं, जिनमें उन्होंने सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाए।

    राजनीतिक हलकों में संजय राउत का यह बयान चर्चा का विषय बन गया है। शिक्षा मंत्री की नियुक्ति और शिक्षा व्यवस्था को लेकर दिए गए उनके बयान को विपक्ष की ओर से केंद्र सरकार पर एक और राजनीतिक हमला माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

  • राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के परिणामों से उपजे तनाव के कारण छात्रा ने उठाया खौफनाक आत्मघाती कदम

    राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के परिणामों से उपजे तनाव के कारण छात्रा ने उठाया खौफनाक आत्मघाती कदम

    नई दिल्ली । चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा से जुड़ी अनिश्चितता और मानसिक दबाव का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश की राजधानी में बीते एक महीने से चल रहा विरोध प्रदर्शन और अनशन भले ही सरकार द्वारा दिए गए आश्वासन के बाद समाप्त हो गया हो, लेकिन परीक्षा के नतीजों और प्रक्रिया को लेकर अभ्यर्थियों में उपजा मानसिक तनाव अब भी चिंता का विषय बना हुआ है। इस बीच महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के कर्जत तालुका से एक दुखद घटना सामने आई है, जहां मेडिकल की पढ़ाई का सपना देख रही उन्नीस वर्षीय छात्रा ने परीक्षा में कम अंक आने से निराश होकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली।

    घटना के संदर्भ में मिली जानकारी के अनुसार, उक्त छात्रा राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के नतीजों को लेकर पिछले कुछ समय से अत्यधिक मानसिक दबाव का सामना कर रही थी। शनिवार को जब परिवार के सदस्य किसी कार्यवश घर से बाहर गए हुए थे, तब छात्रा ने घर पर अकेले रहते हुए यह अतिवादी कदम उठाया। जब परिजन वापस लौटे, तो उन्होंने स्थिति देखकर तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचित किया। पुलिस दल ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया और आवश्यक कानूनी प्रक्रिया शुरू करते हुए शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।

    प्राथमिक जांच में यह बात सामने आई है कि छात्रा ने परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाई थी, लेकिन घोषित नतीजों में उसे बेहद कम अंक प्राप्त हुए। डॉक्टर बनने के अपने सपने के टूटने और भविष्य की अनिश्चितता के डर से वह गहरे अवसाद में चली गई थी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि वे इस मामले के सभी पहलुओं की बारीकी से जांच कर रहे हैं और परिजनों व आसपास के लोगों से पूछताछ कर घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने में जुटे हैं।

    गौरतलब है कि हाल के दिनों में राष्ट्रीय स्तर की इस प्रवेश परीक्षा में कथित अनियमितताओं, प्रश्नपत्र लीक और पुनरीक्षा से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण देशभर में लाखों छात्र और उनके अभिभावक भारी मानसिक दबाव से गुजर रहे थे। परीक्षा प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों के कारण देश के विभिन्न हिस्सों से विद्यार्थियों द्वारा तनाव में आकर ऐसे खौफनाक कदम उठाने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। छात्र संगठनों और शिक्षाविदों द्वारा लगातार यह मांग उठाई जा रही थी कि प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

    राजधानी नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों द्वारा पिछले एक महीने से लगातार विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था। इस आंदोलन के दौरान अभ्यर्थियों ने परीक्षा प्रणाली में सुधार, गड़बड़ियों की उच्च स्तरीय जांच और छात्रों के लिए बेहतर व्यवस्था की मांग उठाई थी। सरकार की ओर से उच्च स्तरीय समिति के गठन और सुधार संबंधी आश्वासन मिलने के बाद यह धरना-प्रदर्शन समाप्त किया गया था, लेकिन इस प्रशासनिक घटनाक्रम के बीच छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य की सुरक्षा का मुद्दा अब भी गंभीर बना हुआ है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं का अत्यधिक दबाव और असफलता का डर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। शैक्षणिक संस्थानों, परिवारों और समाज को एक साथ मिलकर युवाओं को यह समझाने की आवश्यकता है कि कोई भी परीक्षा जीवन का अंतिम विकल्प नहीं होती। प्रशासनिक स्तर पर परीक्षाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के साथ-साथ अभ्यर्थियों के लिए नियमित परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली स्थापित करना बेहद जरूरी हो गया है ताकि इस प्रकार की दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।

  • नई दिल्ली में चल रहे छात्र आंदोलन के समर्थन में आज बंद रहेगा महाराष्ट्र

    नई दिल्ली में चल रहे छात्र आंदोलन के समर्थन में आज बंद रहेगा महाराष्ट्र


    मुंबई।
    वंचित बहुजन आघाड़ी (Vanchit Bahujan Aghadi) ने नई दिल्ली (New Delhi) के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन (Student movement) के पक्ष में गुरुवार को ‘महाराष्ट्र बंद’ का आह्वान किया है। वीबीए अध्यक्ष और डॉ बाबासाहेब आंबेडकर (Dr. Babasaheb Ambedkar) के पोते प्रकाश आंबेडकर (Prakash Ambedkar) ने यहां प्रेस वार्ता में बताया कि वामपंथी राजनीतिक दलों, शैक्षणिक संस्थानों और कोचिंग सेंटरों ने बंद का समर्थन किया है।


    क्या खुला रहेगा, क्या बंद

    बंद के समर्थन में कुछ क्षेत्रों ऐच्छिक रूप से कुछ दुकानें और बाजार बंद रह सकते हैं। हालांकि, इस दौरान जरूरी सेवाएं जारी रहेंगी। खबर है कि इस दौरान पब्लिक ट्रांसपोर्ट सामान्य रूप से चल सकता है। हालांकि, अगर प्रदर्शन होता है तो यातायात व्यवस्था, रोड ब्लॉक जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।


    क्यों बुलाया बंद

    उन्होंने कहा, ‘केंद्र सरकार छात्र आंदोलनों से इतनी डरी हुई है कि उसने प्रादेशिक सेना तक को तैनात कर दिया है। वामपंथी दलों और शैक्षणिक संस्थानों ने हमारे बंद का समर्थन किया है, वहीं राज्य के कोचिंग संस्थान भी हमारे संपर्क में हैं।’


    राहुल गांधी से कर दी डिमांड

    उन्होंने कहा, ‘हम नई पीढ़ी खड़ी करने का प्रयास कर रहे हैं। मेरा मानना है कि सरकार को जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। छात्रों के आंदोलन पर सरकार ने अब तक कोई फैसला नहीं लिया है, इसलिए 23 जुलाई का महाराष्ट्र बंद होकर रहेगा। मेरी यह भी राय है कि राहुल गांधी को जंतर-मंतर जाकर विरोध प्रदर्शन करना चाहिए।’

    उन्होंने यह भी कहा कि यह छात्र आंदोलन हालांकि उनका नहीं है, फिर भी वह इसका पूरा समर्थन करते हैं। इसके साथ ही उन्होंने भाजपा के छात्र संगठन से भी इस इस बंद में हिस्सा लेने की अपील की।


    चर्चाएं जारी

    वीबीए प्रमुख ने कहा, ‘इस बंद को सफल बनाने के लिए हम मजदूर यूनियनों, बेस्ट यूनियनों, बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) की यूनियनों और अन्य श्रमिक संगठनों से चर्चा कर रहे हैं। दिल्ली में छात्रों पर अमानवीय अत्याचार हुए हैं, जिससे लोगों में भारी आक्रोश है। कई संगठन इस बंद में शामिल होने को उत्सुक हैं।’


    रिजर्व पुलिस फोर्स बुलाने पर आपत्ति

    उन्होंने कहा ‘दिल्ली में छात्र आंदोलन को कुचलने के लिए कश्मीर से रिजर्व पुलिस बल बुलाये गए हैं, जिसका हम कड़ा विरोध करते हैं। हमारी कोशिश है कि सरकार छात्रों पर आंसू गैस या बल प्रयोग न करे। हमने भाजपा को छोड़कर सभी दलों से बंद में शामिल होने की अपील की है, ताकि आंदोलनकारी छात्रों के प्रति एकजुट होकर हम समर्थन दिखा सकें।’


    दादर में पुलिस कार्रवाई

    इससे पहले मुंबई पुलिस ने आज दादर वेस्ट में समुद्र तट पर स्थित ऐतिहासिक चैत्यभूमि पर वामपंथी दलों की ओर से आयोजित शांतिपूर्ण सभा को तितर-बितर कर दिया। यह स्थान डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का समाधि स्थल होने के साथ-साथ दलित समुदाय के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल भी है।

    पुलिस सूत्रों के अनुसार एहतियाती तौर पर चैत्यभूमि से हिरासत में लिए गये भाकपा के कॉमरेड मिलिंद रानाडे और अन्य कार्यकर्ताओं को नजरबंद कर दिया गया है। वहीं माकपा के कॉमरेड शैलेंद्र कांबले और शेतकारी कामगार पार्टी (पीडब्ल्यूपी) के राजू कोरडे के आवासों पर चौबीसों घंटे निगरानी रखी जा रही है।

    उन्होंने बताया कि एहतियाती कार्रवाई के तहत भाकपा से जुड़े अखिल भारतीय छात्र संघ (एआईएसएफ) के युवा नेता कॉमरेड आमिर काजी और पीडब्ल्यूपी के साम्य कोरडे को चेतावनी दी गई है कि यदि वे अपने घरों से बाहर निकले तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जायेगा।

    इस बीच मुंबई पुलिस ने चैत्यभूमि को भारी बैरिकेड्स और नाकेबंदी लगाकर पूरी तरह से सील कर दिया है, जहां पहले से ही एक स्थायी पुलिस चौकी मौजूद है। प्रदर्शनकारी जहां तक संभव हो छोटे समूहों में जुटने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ प्रदर्शनकारी तंग गलियों से होते हुए चैत्यभूमि पहुंचे, तो कुछ ने शहर के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए।

    कांग्रेस भी साथ
    महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल कहा कि कांग्रेस ने गुरुवार को वीबीए के बुलाए गए महाराष्ट्र बंद का समर्थन किया, जो राष्ट्रीय राजधानी में छात्रों पर पुलिस की कार्रवाई के विरोध में है।

  • राम मंदिर दान विवाद के बीच शिंदे-उद्धव में बढ़ी सियासी तल्खी, हिंदुत्व की विरासत और ‘राम रक्षा’ अभियान पर छिड़ा नया संग्राम

    राम मंदिर दान विवाद के बीच शिंदे-उद्धव में बढ़ी सियासी तल्खी, हिंदुत्व की विरासत और ‘राम रक्षा’ अभियान पर छिड़ा नया संग्राम

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति में हिंदुत्व और राम मंदिर का मुद्दा एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। राज्य के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि उनकी राजनीति अब सिद्धांतों के बजाय राजनीतिक सुविधा पर आधारित हो गई है। उन्होंने कहा कि जिन नेताओं ने पहले हिंदुत्व की विचारधारा से दूरी बना ली थी, वे अब राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने पर भगवान राम का नाम लेकर अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश कर रहे हैं।

    एकनाथ शिंदे ने कहा कि हिंदुत्व किसी अवसर के अनुसार अपनाई या छोड़ी जाने वाली विचारधारा नहीं है। उनके अनुसार यह एक स्थायी आस्था और जीवन मूल्यों से जुड़ा विषय है, जिसे राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदला नहीं जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद शिवसेना (यूबीटी) ने अपनी मूल विचारधारा से समझौता किया और अब जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने के लिए राम और हिंदुत्व का सहारा लिया जा रहा है।

    राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के मुद्दे पर महाराष्ट्र में राजनीतिक माहौल पहले से ही गर्म है। इसी विषय को लेकर शिवसेना (यूबीटी) ने राज्यभर में ‘राम रक्षा आंदोलन’ शुरू करने की घोषणा की है। पार्टी का कहना है कि धार्मिक आस्था से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए तथा कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

    इसी घटनाक्रम के बीच नागपुर में एक धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद उद्धव ठाकरे ने भी राज्य सरकार और अपने राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधा। उन्होंने हिंदुत्व और भगवान राम के नाम पर राजनीति करने वालों की आलोचना करते हुए कहा कि धार्मिक आस्था को राजनीतिक लाभ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। उनके बयान के बाद दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए।

    उद्धव ठाकरे की टिप्पणियों का जवाब देते हुए एकनाथ शिंदे ने कहा कि जब राजनीतिक आधार कमजोर पड़ने लगा तो भगवान राम का नाम लिया जाने लगा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “जब भगवा लगा घटने तब राम का नाम लगे रटने।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जो व्यक्ति भगवान राम के आदर्शों से दूर है, वह जनता के विश्वास पर भी खरा नहीं उतर सकता। उनके इस बयान ने महाराष्ट्र की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में हिंदुत्व, राम मंदिर और धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दे राज्य की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। विभिन्न दल इन विषयों पर अपनी-अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत जनता के बीच संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में बयानबाजी और वैचारिक टकराव का दौर आगे भी जारी रहने की संभावना है।

    महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में यह विवाद केवल नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदुत्व की विरासत, राजनीतिक पहचान और जनसमर्थन की प्रतिस्पर्धा का भी प्रतीक बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति और जनता की प्रतिक्रिया राज्य की राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

  • महाराष्ट्र: उल्हास नदी पर बन रहे बुलेट ट्रेन पुल के बहने की खबर वायरल, NHSRCL ने बताया क्या है सच्‍चाई

    महाराष्ट्र: उल्हास नदी पर बन रहे बुलेट ट्रेन पुल के बहने की खबर वायरल, NHSRCL ने बताया क्या है सच्‍चाई


    मुंबई। महाराष्ट्र के ठाणे जिले में भारी बारिश के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हुई उस खबर का नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (NHSRCL) ने खंडन किया है, जिसमें दावा किया गया था कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना के तहत उल्हास नदी पर बन रहा पुल बह गया है। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि कोई भी स्थायी पुल क्षतिग्रस्त या बहा नहीं है।

    NHSRCL ने बुधवार को जारी बयान में बताया कि भारी बारिश और उल्हास नदी के जलस्तर में बढ़ोतरी के कारण केवल निर्माण कार्य के लिए बनाया गया अस्थायी एक्सेस मार्ग प्रभावित हुआ है। यह मार्ग मजदूरों, मशीनरी और निर्माण सामग्री के आवागमन के लिए तैयार किया गया था और इसका मुख्य पुल की संरचना से कोई संबंध नहीं था।

    निर्माण कार्य पर नहीं पड़ा कोई असर
    अधिकारियों के अनुसार, इस घटना का पुल के डिजाइन, सुरक्षा या निर्माण कार्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। परियोजना का निर्माण कार्य तय योजना के अनुसार जारी है और सभी गतिविधियां सामान्य रूप से संचालित हो रही हैं।

    भारी बारिश के बाद फैली थी भ्रम की स्थिति
    हाल ही में ठाणे जिले में हुई तेज बारिश के कारण उल्हास नदी उफान पर आ गई थी, जिससे आसपास के कई इलाकों में जलभराव की स्थिति बन गई। इसी दौरान कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया कि निर्माणाधीन पुल बह गया है। हालांकि, NHSRCL ने स्पष्ट किया कि प्रभावित हिस्सा केवल अस्थायी निर्माण मार्ग था, स्थायी पुल नहीं।

    1.08 लाख करोड़ रुपये की है परियोजना
    मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर की कुल लंबाई 508 किलोमीटर है और इसे करीब 1.08 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से विकसित किया जा रहा है।

    NHSRCL ने लोगों से अपील की है कि परियोजना से जुड़ी किसी भी जानकारी के लिए केवल आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करें और सोशल मीडिया पर प्रसारित भ्रामक या अपुष्ट खबरों से बचें। निगम के अनुसार, ठाणे सहित सभी निर्माण स्थलों पर परियोजना का कार्य पारदर्शिता के साथ लगातार जारी है।

  • शिवसेना यूबीटी के पूर्व सांसद विवादों में बहू ने लगाए काला जादू और मानसिक प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोप

    शिवसेना यूबीटी के पूर्व सांसद विवादों में बहू ने लगाए काला जादू और मानसिक प्रताड़ना जैसे गंभीर आरोप


    नई दिल्ली । महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़ा एक मामला इन दिनों सुर्खियों में है जहां शिवसेना यूबीटी के पूर्व सांसद विनायक राउत और उनके परिवार के खिलाफ उनकी बहू ने गंभीर आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में शारीरिक मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना के साथ काला जादू कराने तथा अंधविश्वास से जुड़ी कथित गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है जबकि पूर्व सांसद ने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए उन्हें परिवार पर दबाव बनाने की कोशिश करार दिया है।

    पुलिस के अनुसार शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2017 में उसकी शादी विनायक राउत के बेटे जितेश से कराई गई जबकि परिवार को पहले से यह जानकारी थी कि वह वैवाहिक संबंध निभाने में सक्षम नहीं है। महिला का दावा है कि जब उसने इस विषय पर सवाल उठाए तो उसकी समस्याओं का समाधान करने के बजाय उसे मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उसने आरोप लगाया कि उसे यह कहकर बहलाया गया कि उसके वैवाहिक जीवन में किसी बाहरी बाधा का असर है और उसे दूर करने के लिए कथित धार्मिक अनुष्ठानों का सहारा लिया गया।

    महिला का यह भी आरोप है कि इन कथित अनुष्ठानों के दौरान कुछ लोगों ने उसके साथ अशोभनीय और आपत्तिजनक व्यवहार किया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि उसे विभिन्न देशों की यात्राओं के दौरान भी मानसिक दबाव और दुर्व्यवहार झेलना पड़ा। इसके अलावा उसने अपनी सास पर आरोप लगाया कि उसे मासिक धर्म रोकने वाली दवाएं लेने के लिए मजबूर किया गया जिससे उसकी सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ा। महिला का यह भी कहना है कि उचित चिकित्सकीय उपचार उपलब्ध कराने के बजाय वैकल्पिक तरीकों से गर्भधारण कराने की सलाह दी गई।

    पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के साथ महाराष्ट्र मानव बलि और अन्य अमानवीय बुरी एवं अघोरी प्रथाओं तथा काला जादू निवारण कानून के तहत भी प्रकरण दर्ज किया है। अधिकारियों का कहना है कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    दूसरी ओर पूर्व सांसद विनायक राउत ने सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके बेटे और शिकायतकर्ता के बीच तलाक की प्रक्रिया पहले से चल रही है। उन्होंने दावा किया कि समझौते के दौरान महिला की ओर से करोड़ों रुपये की आर्थिक मांग की गई थी जिसे स्वीकार नहीं किया गया। राउत का आरोप है कि इसके बाद परिवार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से यह शिकायत दर्ज कराई गई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका परिवार तंत्र मंत्र या काले जादू जैसी किसी भी गतिविधि में विश्वास नहीं करता और लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह झूठे हैं।

    यह मामला अब कानूनी प्रक्रिया के अधीन है और पुलिस जांच के बाद ही आरोपों की सच्चाई स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल दोनों पक्ष अपने अपने दावे कर रहे हैं लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।

  • शरद पवार की शिंदे के केबिन में मौजूदगी से तेज हुई सियासी चर्चाएं, दोनों पक्षों ने बताया महज शिष्टाचार और सुविधाजनक मुलाकात

    शरद पवार की शिंदे के केबिन में मौजूदगी से तेज हुई सियासी चर्चाएं, दोनों पक्षों ने बताया महज शिष्टाचार और सुविधाजनक मुलाकात

    नई दिल्ली । महाराष्ट्र विधानसभा के मानसून सत्र के बीच वरिष्ठ नेता शरद पवार की उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के कार्यालय में मौजूदगी ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया। विधानसभा परिसर में हुई इस मुलाकात की तस्वीरें सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में संभावित नए समीकरणों को लेकर अटकलें तेज हो गईं। हालांकि कुछ ही समय बाद दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया कि यह मुलाकात किसी राजनीतिक बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप हुई एक सामान्य और शिष्टाचार आधारित बैठक थी।

    जानकारी के अनुसार शरद पवार महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद से संबंधित उच्चस्तरीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए विधानसभा पहुंचे थे। समिति की बैठक समाप्त होने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी एनसीपी (एसपी) के विधायकों से मुलाकात की। यह बैठक उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के केबिन में आयोजित हुई, जिसके बाद राजनीतिक चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया। बाद में एकनाथ शिंदे भी वहां पहुंचे और उन्होंने शरद पवार का स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच संक्षिप्त बातचीत भी हुई, लेकिन उसकी आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।

    एनसीपी (एसपी) के नेताओं ने इस घटनाक्रम को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि बैठक के पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं था। पार्टी नेताओं के अनुसार शरद पवार को लंबी दूरी तक पैदल चलने में असुविधा होती है। इसी कारण निकास द्वार के निकट स्थित उपमुख्यमंत्री के कार्यालय को बैठक के लिए उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया। उनका कहना है कि जब शरद पवार वहां पहुंचे, उस समय एकनाथ शिंदे अपने कार्यालय में मौजूद नहीं थे और बाद में उन्हें जानकारी मिलने पर उन्होंने शिष्टाचारवश मुलाकात की।

    उधर, एकनाथ शिंदे खेमे ने भी इस मुलाकात को सामान्य राजनीतिक शिष्टाचार का हिस्सा बताया। सरकार की ओर से कहा गया कि महाराष्ट्र की राजनीतिक परंपरा में वरिष्ठ नेताओं का सम्मान किया जाता है और इसी भावना के तहत उनका स्वागत किया गया। इस मुलाकात का किसी संभावित राजनीतिक गठबंधन, दल परिवर्तन या नए समीकरण से कोई संबंध नहीं है।

    मुलाकात के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या राज्य की राजनीति में कोई नया मोड़ आने वाला है। हालांकि एनसीपी (एसपी) ने इन सभी अटकलों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। पार्टी नेतृत्व ने कहा कि उनका महा विकास अघाड़ी के प्रति रुख पहले जैसा ही है और किसी अन्य राजनीतिक गठबंधन में शामिल होने या किसी प्रकार के विलय की चर्चाओं में कोई तथ्य नहीं है।

    राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र की राजनीति में वरिष्ठ नेताओं की हर मुलाकात स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन जाती है। विशेष रूप से विधानसभा सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच होने वाली मुलाकातों को अक्सर राजनीतिक संकेतों के रूप में देखा जाता है। हालांकि कई बार ऐसी मुलाकातें केवल प्रशासनिक, औपचारिक या व्यक्तिगत शिष्टाचार तक ही सीमित होती हैं।

    फिलहाल दोनों पक्षों के आधिकारिक बयानों के बाद यह स्पष्ट किया गया है कि इस मुलाकात को किसी नए राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बावजूद राज्य की राजनीति में इस घटनाक्रम को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है और आने वाले दिनों में राजनीतिक गतिविधियों पर सभी की नजर बनी रहेगी।