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  • इंदौर पानी विवाद: हाईकोर्ट ने MP सरकार को घेरा, मौतों के आंकड़ों पर उठाए सवाल

    इंदौर पानी विवाद: हाईकोर्ट ने MP सरकार को घेरा, मौतों के आंकड़ों पर उठाए सवाल

    नई दिल्ली। इंदौर में दूषित पेयजल से हो रही मौतों ने अब न्यायपालिका का ध्यान खींच लिया है। इस गंभीर मामले को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में अहम सुनवाई हुई, जहां कुल 5 जनहित याचिकाओं पर एक साथ विचार किया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाते हुए सख्त रुख अपनाया।

    मौतों के आंकड़ों पर HC की नाराजगी
    पिछली सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में एक स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई थी, जिसमें दूषित पानी से सिर्फ 4 मौतों की जानकारी दी गई। जबकि जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। कोर्ट के संज्ञान में आया कि इस मामले में अब तक 17 लोगों की मौत हो चुकी है। इस विरोधाभास को लेकर हाई कोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई और रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि इतने गंभीर मामले में गलत आंकड़े पेश करना बेहद चिंताजनक है।

    पूरे प्रदेश के पानी पर उठे सवाल
    हाई कोर्ट ने सिर्फ इंदौर ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य प्रदेश के पीने के पानी की गुणवत्ता पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि अगर लोगों को मिलने वाला पानी ही दूषित है, तो यह बेहद गंभीर स्थिति है। यह समस्या केवल एक इलाके तक सीमित नहीं मानी जा सकती।

    मुख्य सचिव को वर्चुअली पेश होने का आदेश
    मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को वर्चुअली पेश होने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई की तारीख 15 जनवरी तय की गई है। कोर्ट ने साफ किया कि वह इस मामले में किसी और अधिकारी की नहीं, बल्कि सीधे मुख्य सचिव की बात सुनना चाहता है।

    कोरोना की तरह मांगा मेडिकल बुलेटिन
    कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया कि जिस तरह कोरोना महामारी के दौरान रोजाना मेडिकल बुलेटिन जारी किया जाता था, उसी तरह दूषित पानी से फैली बीमारी और मौतों का भी नियमित अपडेट दिया जाए।

    अब तक 17 मौतें, 110 मरीज भर्ती
    स्वास्थ्य विभाग के अनुसार दूषित पानी से अब तक 421 लोग बीमार हुए, जिनमें से 311 मरीज डिस्चार्ज हो चुके हैं। फिलहाल 110 मरीज अस्पताल में भर्ती हैं, जबकि 15 मरीज आईसीयू में इलाजरत हैं।

    15 जनवरी की सुनवाई पर टिकी निगाहें
    अब पूरे प्रदेश की नजरें 15 जनवरी की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह साफ होगा कि सरकार इस गंभीर लापरवाही पर क्या जवाब देती है और आगे क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

  • वर्ल्ड चैंपियन बनीं MP की ब्लाइंड बेटियां, लेकिन सम्मान से वंचित: न नौकरी, न इनाम-क्यों हो रहा दिव्यांग खिलाड़ियों से भेदभाव?

    वर्ल्ड चैंपियन बनीं MP की ब्लाइंड बेटियां, लेकिन सम्मान से वंचित: न नौकरी, न इनाम-क्यों हो रहा दिव्यांग खिलाड़ियों से भेदभाव?


    मध्य प्रदेश।  भारत ने जब पहला ब्लाइंड विमेंस टी-20 वर्ल्ड कप जीता तो यह सिर्फ एक खेल जीत नहीं थी बल्कि जज़्बे संघर्ष औरआत्मनिर्भरता की ऐतिहासिक कहानी थी। इस जीत में मध्य प्रदेश की तीन बेटियों-सुनीता सराठे नर्मदापुरम सुषमापटेल दमोह और दुर्गा येवले बैतूल-ने अहम भूमिका निभाई। लेकिन विडंबना देखिए कि वर्ल्ड चैंपियन बनने के बावजूदइन बेटियों को अपने ही राज्य में अब तक न सम्मान मिला न पुरस्कार और न ही नौकरी की कोई घोषणा।इस ऐतिहासिक टूर्नामेंट में भारतीय टीम पूरे सफर में अजेय रही। फाइनल मुकाबले में भारत ने नेपाल को 7 विकेट सेहराकर ट्रॉफी पर कब्जा जमाया। खास बात यह रही कि जीत दिलाने वाले प्रदर्शन में MP की बेटियों का योगदान निर्णायक था। इसके बावजूद राज्य सरकार की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है।

    दूसरे राज्यों ने बढ़ाया मान MP पीछे क्यों?
    जहां ओडिशा सरकार ने अपनी खिलाड़ियों को 11 लाख रुपए और सरकारी नौकरी कर्नाटक ने 10 लाख रुपए और नौकरीऔर आंध्र प्रदेश ने 15 लाख रुपए देने की घोषणा की वहीं मध्य प्रदेश सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ। हैरानी की बात यह है कि इन तीनों खिलाड़ियों का आंध्र प्रदेश में भव्य सम्मान हुआ। वहां के डिप्टी सीएम पवन कल्याण ने प्रत्येक खिलाड़ी को 5-5 लाख रुपए की पुरस्कार राशि दी। यानी दूसरे राज्य ने MP की बेटियों को वह सम्मान दिया जो उनका अपना राज्य नहीं दे सका।

    क्रांति को फोन आया इन बेटियों को अपॉइंटमेंट भी नहीं
    क्रिकेट एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड मध्य प्रदेश के जनरल सेक्रेटरी और कोच सोनू गोलकर ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि जब महिला क्रिकेटर क्रांति गौड़ वर्ल्ड कप जीतकर लौटीं तो नेताओं के फोन आए घोषणाएं हुईं। लेकिन इन दिव्यांग बेटियों के लिए एक अपॉइंटमेंट तक नहीं मिल रहा।गोलकर ने सवाल उठाया- क्या ये बेटियां सिर्फ इसलिए नजरअंदाज की जा रही हैं क्योंकि ये दिव्यांग हैं? अगर सम्मान नहीं मिला तो यह सीधा भेदभाव है। खिलाड़ियों का दर्द: फोन पर बधाई मिली मिलने कोई नहीं आया वर्ल्ड कप में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाली ऑलराउंडर सुनीता सराठे कहती हैं मैंने दो विकेट लिए छह रन आउट किए लेकिन सरकार ने न बुलाया न सम्मानित किया। विधायक-सांसदों ने फोन पर बधाई दी पर मिलने कोई नहीं आया। दुर्गा येवले बताती हैं कि उन्होंने तीन रन आउट और दो स्टंपिंग की फिर भी सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। हम गांव से हैं परिवार हम पर निर्भर है। अगर नौकरी मिल जाए तो ज़िंदगी बदल सकती है।

    सुषमा पटेल का कहना है-
    यह हमारा पहला वर्ल्ड कप था और हम ट्रॉफी लेकर लौटे। सामान्य खिलाड़ियों को तुरंत सम्मान मिलता है लेकिन हमारे साथ भेदभाव क्यों? दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए अलग स्पोर्ट्स पॉलिसी की मांग कोच सोनू गोलकर का कहना है कि जब तक दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए अलग और ठोस स्पोर्ट्स पॉलिसी नहीं बनेगी तब तक ऐसी अनदेखी होती रहेगी। अगर क्रांति गौड़ के लिए खजाना खुल सकता है तो इन बेटियों के लिए क्यों नहीं? अब सवाल साफ है-क्या वर्ल्ड चैंपियन बनना भी दिव्यांग खिलाड़ियों के लिए काफी नहीं? क्या सम्मान सिर्फ कुछ चुनिंदा चेहरों तक सीमित है?