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  • तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    तमिलनाडु विधानसभा में सीएम विजय ने परिसीमन के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया, 543 लोकसभा सीटें बनाए रखने और महिला आरक्षण की मांग

    नई दिल्ली ।तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय ने बुधवार को विधानसभा में परिसीमन के मुद्दे पर प्रस्ताव पेश करते हुए लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या और राज्यों के बीच सीटों के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने की मांग की। प्रस्ताव में केंद्र से लोकसभा की कुल 543 सीटों को बरकरार रखने और इनके आधार पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की अपील की गई है।

    मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया के कारण राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव की आशंका को देखते हुए मौजूदा सीट व्यवस्था को बनाए रखना जरूरी है। उन्होंने प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र से मांग की कि लोकसभा की 543 सीटों की वर्तमान संख्या को स्थायी रूप से बरकरार रखा जाए और राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात भी सुरक्षित रखा जाए।

    विजय ने महिला आरक्षण को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने में अब और देरी नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार महिला आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने पर इसके लागू होने में अतिरिक्त समय लग सकता है। इसलिए मौजूदा 543 लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाना चाहिए।

    मुख्यमंत्री ने महिला आरक्षण को किसी प्रकार की रियायत मानने के बजाय संवैधानिक अधिकार बताया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण को जल्द लागू किया जाना आवश्यक है। विजय ने तमिलनाडु में महिलाओं की चुनावी भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य में पुरुषों की तुलना में अधिक महिलाओं ने मतदान किया है।

    विधानसभा में पेश प्रस्ताव का एक प्रमुख हिस्सा परिसीमन के संभावित प्रभावों से जुड़ा है। तमिलनाडु की ओर से यह मांग रखी गई है कि राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का वर्तमान अनुपात प्रभावित नहीं होना चाहिए। प्रस्ताव में कहा गया है कि 543 सीटों की मौजूदा व्यवस्था को बरकरार रखते हुए ही भविष्य में प्रतिनिधित्व से जुड़े बदलावों पर विचार किया जाना चाहिए।

    विजय की इस मांग के बीच विपक्षी दल ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता ईपीएस ने परिसीमन के मुद्दे पर अलग रुख रखा। उन्होंने कहा कि परिसीमन में अपने आप में कुछ गलत नहीं है, लेकिन तमिलनाडु का लोकसभा में मौजूदा 7.18 प्रतिशत हिस्सा किसी भी स्थिति में कम नहीं होना चाहिए।

    इस तरह विधानसभा में परिसीमन को लेकर राज्य के प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण दोनों मुद्दे एक साथ सामने आए। मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों को बनाए रखने, राज्यों के बीच वर्तमान सीट अनुपात को सुरक्षित रखने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को जल्द लागू करने की मांग शामिल है।

    विजय ने विशेष रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव को महिला आरक्षण लागू करने की समयसीमा के रूप में सामने रखा। उनका तर्क है कि यदि महिला आरक्षण को परिसीमन के साथ जोड़कर आगे बढ़ाया गया तो इसके प्रभावी होने में देरी हो सकती है। इसलिए मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर ही इसे लागू किया जाना चाहिए।

    प्रस्ताव के जरिए तमिलनाडु सरकार ने केंद्र के सामने परिसीमन को लेकर अपनी राजनीतिक और संवैधानिक चिंताएं रखी हैं। अब इस मुद्दे पर केंद्र और अन्य राज्यों के रुख के साथ आगे की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। साथ ही महिला आरक्षण को 2029 के चुनाव से लागू करने की मांग राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधित्व और चुनावी व्यवस्था से जुड़े विमर्श को भी प्रभावित कर सकती है।

  • आज संसद में पेश होगी जस्टिस वर्मा ‘कैश कांड’ की रिपोर्ट, मानसून सत्र के सिर्फ 3 दिन बाकी

    आज संसद में पेश होगी जस्टिस वर्मा ‘कैश कांड’ की रिपोर्ट, मानसून सत्र के सिर्फ 3 दिन बाकी


    नई दिल्ली। संसद के मॉनसून सत्र के अब सिर्फ तीन दिन शेष हैं, लेकिन सदन में जारी गतिरोध खत्म होता नजर नहीं आ रहा है। राम मंदिर के कथित चढ़ावे की चोरी और 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज समेत कई मुद्दों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है। विपक्ष की ओर से गृह मंत्री अमित शाह के जवाब की मांग भी की जा रही है।

    इस बीच बुधवार को संसद में जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच कमेटी की रिपोर्ट पेश की जाएगी। दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास में मार्च 2025 में आग लगने के बाद स्टोर रूम से कथित तौर पर जली हुई नकदी मिलने के मामले में यह जांच शुरू हुई थी। घटना के बाद जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग तेज हो गई थी।

    लोकसभा और राज्यसभा में रखी जाएगी रिपोर्ट
    जस्टिस वर्मा के खिलाफ मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी गठित की गई थी। कमेटी ने जांच के दौरान दस्तावेज और मौखिक साक्ष्य जुटाए हैं। अब इसकी रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा और राज्यसभा के पटल पर रखी जाएगी। रिपोर्ट सामने आने के बाद संसद में इस मामले को लेकर चर्चा होने की संभावना है। खास तौर पर यह सवाल अहम होगा कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफा देने के बावजूद क्या उनके खिलाफ पद से हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।

    इस्तीफा दे चुके हैं जस्टिस वर्मा
    कैश बरामदगी के समय जस्टिस यशवंत वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे। विवाद सामने आने के बाद उनका तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट कर दिया गया था। उनके खिलाफ 200 से ज्यादा सांसदों ने महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की थी। जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, राष्ट्रपति ने अभी तक उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद उनके मामले को लेकर संसद में आगे की कार्रवाई पर भी चर्चा हो सकती है।

    अमित शाह आज दे सकते हैं जवाब
    छात्र आंदोलन के मुद्दे पर भी बुधवार को संसद में सरकार का पक्ष सामने आने की संभावना है। गृह मंत्री अमित शाह सदन में जवाब दे सकते हैं। सरकार का कहना है कि वह छात्रों से जुड़े मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है और गृह मंत्री जवाब देने को भी तैयार हैं। वहीं सरकार ने विपक्ष पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया है। दूसरी ओर विपक्ष लगातार जंतर-मंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को लेकर सरकार से जवाब मांग रहा है।

    FCRA बिल पर भी नजर
    संसद में आज के घटनाक्रम के अलावा अगले दिन की कार्यवाही भी महत्वपूर्ण रहने वाली है। सरकार गुरुवार को FCRA बिल पेश कर सकती है। कांग्रेस और TMC इस बिल को वापस लेने की मांग कर रही हैं। सरकार बिल पेश करने के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज सकती है। ऐसे में मॉनसून सत्र के बचे तीन दिन सरकार और विपक्ष के बीच टकराव के लिहाज से बेहद अहम माने जा रहे हैं।

  • छात्र आंदोलन पर लोकसभा में चर्चा को सरकार तैयार, किरन रिजिजू बोले गृह मंत्री अमित शाह देंगे जवाब

    छात्र आंदोलन पर लोकसभा में चर्चा को सरकार तैयार, किरन रिजिजू बोले गृह मंत्री अमित शाह देंगे जवाब

    नई दिल्ली । मानसून सत्र के दौरान छात्र आंदोलन को लेकर लोकसभा में जारी गतिरोध के बीच सरकार ने इस मुद्दे पर चर्चा के लिए अपनी सहमति जताई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा कि सरकार छात्रों से जुड़े विषय पर सदन में विस्तृत चर्चा के लिए तैयार है और गृह मंत्री अमित शाह विपक्ष के सवालों का जवाब देंगे।

    रिजिजू ने कहा कि सरकार की ओर से चर्चा से पीछे हटने का सवाल नहीं है। छात्र आंदोलन से जुड़े मुद्दे पर सदन में विस्तार से बातचीत होगी और उठाए जाने वाले सवालों का जवाब दिया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब गृह मंत्री सदन में सरकार का पक्ष रखेंगे तो विपक्षी सांसदों को उनका जवाब सुनना चाहिए।

    केंद्रीय मंत्री ने विपक्ष से सदन की कार्यवाही के दौरान व्यवधान पैदा नहीं करने की अपील की। उनका कहना था कि सरकार जवाब देने के लिए तैयार है, इसलिए चर्चा को हंगामे में बदलने के बजाय संसदीय तरीके से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार चाहती है कि मुद्दे पर पूरी चर्चा हो और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर मिले।

    वहीं विपक्ष ने छात्र आंदोलन के साथ अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी का मुद्दा भी उठाया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि यदि गृह मंत्री छात्रों के मामले में सदन में बयान देने के लिए तैयार हैं, तो राम मंदिर से जुड़े मामले पर भी उन्हें अपना पक्ष रखना चाहिए। विपक्ष ने दोनों मुद्दों पर जवाब की मांग को संसद में जारी गतिरोध से जोड़ दिया है।

    संसद के मानसून सत्र में पिछले कई दिनों से विपक्षी दल अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। सोमवार को भी सदन की कार्यवाही शुरू होते ही कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों के सांसदों ने छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई तथा राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े आरोपों को लेकर गृह मंत्री से जवाब देने की मांग की।

    हंगामे के कारण प्रश्नकाल भी प्रभावित हुआ। विपक्षी सांसदों ने सदन के भीतर अपनी मांगों को लेकर नारेबाजी की और कार्यवाही सामान्य तरीके से चलाने में बाधा आई। इससे पहले विपक्षी दल संसद परिसर में भी अलग-अलग तरीकों से प्रदर्शन करते रहे हैं। समाजवादी पार्टी के सांसद सोमवार को पानी और दूध लेकर परिसर में पहुंचे और सरकार के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया।

    कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने भी कहा है कि जब तक गृह मंत्री दोनों प्रमुख मुद्दों पर सदन में जवाब नहीं देते, तब तक गतिरोध समाप्त होने की संभावना कम है। विपक्ष लगातार मांग कर रहा है कि सरकार संसद के भीतर इन मामलों पर स्पष्ट स्थिति रखे।

    अब सरकार की ओर से छात्र आंदोलन पर चर्चा के लिए सहमति जताए जाने के बाद सदन की अगली कार्यवाही पर सभी की नजरें हैं। हालांकि विपक्ष की दूसरी मांग को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनती है या इन मुद्दों पर संसद में टकराव आगे भी जारी रहता है।

  • संजय राउत ने पीएम मोदी की संसद में अनुपस्थिति पर कसा तंज, राहुल गांधी को लेकर कही राजनीतिक धुलाई की बात

    संजय राउत ने पीएम मोदी की संसद में अनुपस्थिति पर कसा तंज, राहुल गांधी को लेकर कही राजनीतिक धुलाई की बात

    नई दिल्ली । शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने संसद के मानसून सत्र के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी को लेकर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से डरने की जरूरत नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री के 56 इंच वाले राजनीतिक संदर्भ का इस्तेमाल करते हुए उन्हें सदन के भीतर आने की चुनौती दी।

    संजय राउत ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संसद में आने से डरना नहीं चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता संसद के मुख्य दरवाजे पर खड़े हैं और प्रधानमंत्री को हिम्मत दिखाकर सदन के अंदर आना चाहिए। राउत ने अपने बयान में राहुल गांधी को अच्छा और संस्कारी व्यक्ति बताते हुए कहा कि वह प्रधानमंत्री के साथ कुछ नहीं करेंगे, बल्कि केवल थोड़ी राजनीतिक धुलाई करेंगे।

    राउत का यह बयान संसद के जारी मानसून सत्र के बीच सामने आया है। इस दौरान विपक्षी दल विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। विपक्षी गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह की संसद में मौजूदगी को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी राजनीतिक माहौल के बीच राउत ने दोनों नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर सरकार पर निशाना साधा।

    संजय राउत ने प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि उन्हें राहुल गांधी से डरने की कोई जरूरत नहीं है। उनके मुताबिक प्रधानमंत्री को सदन में आकर विपक्ष के सवालों और बहस का सामना करना चाहिए। राउत के बयान में संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच सीधे राजनीतिक संवाद की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

    राउत ने अपने बयान में अमित शाह का भी उल्लेख किया और संसद में उनकी अनुपस्थिति को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सरकार के शीर्ष नेताओं को महत्वपूर्ण संसदीय चर्चाओं के दौरान सदन में मौजूद रहना चाहिए। विपक्ष की ओर से लगातार यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि सरकार के वरिष्ठ नेताओं को संसद में उपस्थित रहकर विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में 56 इंच का उल्लेख भारतीय राजनीति में पहले से इस्तेमाल होने वाला राजनीतिक मुहावरा है। राउत ने इसी संदर्भ को अपने तंज में शामिल करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को अपनी राजनीतिक ताकत पर भरोसा है तो उन्हें संसद में आने से बचना नहीं चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री से सदन के भीतर आने और विपक्ष का सामना करने की बात कही।

    राउत की टिप्पणी के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो गई है। सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से उनके बयान को राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ बताया गया और इसे प्रचार पाने की कोशिश के तौर पर भी देखा गया। वहीं विपक्षी खेमे की ओर से संसद में सरकार की जवाबदेही और वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी का मुद्दा उठाया जा रहा है।

    इस बयान में राहुल गांधी भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे। राउत ने प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के बीच संसद में राजनीतिक बहस का संकेत देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री को राहुल गांधी से घबराने के बजाय सदन में आना चाहिए। उनका तंज मुख्य रूप से प्रधानमंत्री की संसद में अनुपस्थिति और विपक्ष के साथ सीधे मुकाबले को लेकर था।

    संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर राजनीतिक टकराव जारी है। ऐसे में संजय राउत की टिप्पणी ने दोनों पक्षों के बीच चल रही बयानबाजी को और प्रमुख बना दिया है। फिलहाल राउत ने प्रधानमंत्री की सदन में मौजूदगी को लेकर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी के संदर्भ में जो टिप्पणी की है, वह संसद के भीतर सरकार और विपक्ष के बीच जारी राजनीतिक खींचतान का हिस्सा बन गई है।

  • FCRA बिल पर संसद में संग्राम के आसार, कांग्रेस ने 10-12 अगस्त के लिए जारी किया व्हिप

    FCRA बिल पर संसद में संग्राम के आसार, कांग्रेस ने 10-12 अगस्त के लिए जारी किया व्हिप


    नई दिल्ली। संसद के मॉनसून सत्र के अंतिम सप्ताह में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ने के आसार हैं। विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA बिल को लेकर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। कांग्रेस ने शुक्रवार दोपहर लोकसभा सांसदों के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी कर 10, 11 और 12 अगस्त को सदन में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने का निर्देश दिया है। माना जा रहा है कि दूसरे विपक्षी दल भी इसी तरह के निर्देश जारी कर सकते हैं।

    10 अगस्त को बिल पेश होने की चर्चा

    संभावना जताई जा रही है कि FCRA संशोधन विधेयक 10 अगस्त को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। चूंकि यह विधेयक गृह मंत्रालय से संबंधित है, इसलिए विपक्ष की नजर गृह मंत्री अमित शाह की सदन में मौजूदगी पर भी है।

    शुक्रवार सुबह राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे के कार्यालय में हुई बैठक में कांग्रेस नेतृत्व ने सहयोगी दलों से भी सोमवार से अपने सांसदों की सदन में पर्याप्त मौजूदगी सुनिश्चित करने को कहा है।

    विपक्ष पहले से ही 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से सदन में बयान देने की मांग कर रहा है। इस मुद्दे को लेकर मॉनसून सत्र के दौरान कई बार सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई है।

    कांग्रेस के लोकसभा व्हिप मणिकम टैगोर ने कहा कि पार्टी अगले सप्ताह परिसीमन और FCRA बिल के लिए तैयार है। उन्होंने आरोप लगाया कि अमित शाह पिछले 12 दिनों से सदन में मौजूद नहीं हैं और सरकार छात्रों के विरोध प्रदर्शन से ध्यान भटकाने की कोशिश कर सकती है।

    SP और TMC भी विपक्ष के साथ

    FCRA बिल को लेकर इंडिया ब्लॉक के अन्य दल भी कांग्रेस के साथ नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि उनकी पार्टी विपक्ष के सामूहिक एजेंडे का समर्थन करेगी। उन्होंने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर सपा भी व्हिप जारी कर सकती है।

    सपा नेता ने यह आशंका भी जताई कि सरकार FCRA बिल पर चर्चा के दौरान अमित शाह की जगह गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय को सदन में भेज सकती है।

    वहीं, तृणमूल कांग्रेस के एक वरिष्ठ सांसद के मुताबिक, पार्टी ने भी अपने सभी सांसदों को सोमवार से सदन में मौजूद रहने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, सभी दलों की ओर से औपचारिक व्हिप जारी करना जरूरी नहीं है और कुछ पार्टियां अपने सांसदों को अनौपचारिक निर्देश भी देती हैं।

    FCRA बिल को लेकर क्या है विवाद?

    FCRA संशोधन विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर पहले से विवाद है। खास तौर पर ईसाई संगठनों में उस प्रावधान को लेकर चिंता जताई जा रही है, जिसके तहत FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म होने वाले संगठनों की संपत्तियों पर सरकार द्वारा नामित प्राधिकरण को पूर्वव्यापी अधिकार मिलने की आशंका है।

    कई चर्च और ईसाई संस्थानों का निर्माण विदेशी चंदे से हुआ है और वे FCRA के दायरे में आते हैं। ऐसे में इस विधेयक को भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील माना जा रहा है, खासकर केरल जैसे राज्यों में जहां पार्टी ईसाई समुदाय के बीच अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

    हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने बुधवार को संकेत दिया था कि विधेयक में कोई दंडात्मक पूर्वव्यापी प्रावधान नहीं होगा। इसके बाद गुरुवार को मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर अपनी चिंताएं रखीं और ज्ञापन सौंपा। लालदुहोमा ने बताया कि शाह ने उन्हें आश्वासन दिया है कि विधेयक 12 अगस्त को लोकसभा में लाया जाएगा और इसमें कोई रेट्रोस्पेक्टिव क्लॉज नहीं होगा।

    13 अगस्त को खत्म होना है मॉनसून सत्र

    संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त होने वाला है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि फिलहाल सत्र की अवधि बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है।

    इस बीच राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने गुरुवार को किरेन रिजिजू से विपक्ष की भावनाओं से अमित शाह को अवगत कराने और सदन में उनकी मौजूदगी की मांग पर विचार करने को कहा था। ऐसे में सत्र के अंतिम तीन दिन सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

  • BJP-कांग्रेस ने सांसदों को जारी किया व्हिप: संसद में अगले हफ्ते क्या होगा? FCRA से परिसीमन तक हलचल तेज

    BJP-कांग्रेस ने सांसदों को जारी किया व्हिप: संसद में अगले हफ्ते क्या होगा? FCRA से परिसीमन तक हलचल तेज


    नई दिल्ली।
    संसद के मानसून सत्र का आखिरी चरण शुरू होने के साथ ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस ने अपने लोकसभा और राज्यसभा सांसदों को 10, 11 और 12 अगस्त को सदन में अनिवार्य रूप से मौजूद रहने का निर्देश दिया है। वहीं NDA के सांसदों को भी सोमवार से दिल्ली में रहने को कहा गया है। दोनों खेमों की इस सक्रियता से संसद में अगले सप्ताह किसी बड़े विधायी कदम की अटकलें तेज हो गई हैं।

    चर्चा है कि सरकार FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) में संशोधन या परिसीमन से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक को सदन में ला सकती है। हालांकि, अगले सप्ताह के सरकारी कामकाज की सूची में इन दोनों प्रस्तावित विधेयकों का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। ऐसे में विपक्ष सरकार के संभावित अंतिम समय के कदम को लेकर सतर्क है।

    कांग्रेस ने तीन दिन के लिए जारी किया सख्त व्हिप

    कांग्रेस ने अपने सांसदों को 10 से 12 अगस्त तक सदन में मौजूद रहने के लिए तीन लाइन का व्हिप जारी किया है। पार्टी ने सांसदों से सुबह 11 बजे से लेकर सदन की कार्यवाही स्थगित होने तक उपस्थित रहने और पार्टी के रुख का समर्थन करने को कहा है।

    कांग्रेस के अलावा INDIA गठबंधन के सहयोगी दलों ने भी अपने सांसदों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की तैयारी शुरू कर दी है। दूसरी तरफ NDA सांसदों को सोमवार से दिल्ली में रहने का निर्देश दिए जाने की खबरों ने संसद में किसी बड़े घटनाक्रम की संभावना को और बढ़ा दिया है।

    सरकारी एजेंडे में अभी FCRA और परिसीमन का जिक्र नहीं

    संसदीय कार्य राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की ओर से अगले सप्ताह के संभावित सरकारी कामकाज की जो सूची पेश की गई है, उसमें FCRA संशोधन विधेयक या परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक का सीधा उल्लेख नहीं है।

    हालांकि, संसदीय प्रक्रिया में सप्लीमेंट्री एजेंडे के जरिए अंतिम समय में किसी विधेयक को सदन के पटल पर लाने का विकल्प सरकार के पास रहता है। यही वजह है कि विपक्ष अपने सांसदों की उपस्थिति को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।

    FCRA विधेयक आया तो क्या होगा?

    FCRA यानी फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट में संशोधन से जुड़ा विधेयक अगर संसद में आता है तो इसे पारित कराने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त होगा। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में सरकार के लिए इस तरह के विधेयक को पारित कराना अपेक्षाकृत आसान माना जा रहा है।

    यही कारण है कि विपक्ष सरकार की रणनीति पर नजर बनाए हुए है और अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने का निर्देश दिया गया है।

    परिसीमन वाला विधेयक क्यों ज्यादा अहम?

    अगर सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन से संबंधित कोई संविधान संशोधन विधेयक सदन में पेश करती है तो मामला ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। ऐसे में एक-एक सांसद की मौजूदगी और मतदान का महत्व बढ़ जाता है।

    परिसीमन का मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इसका सीधा संबंध भविष्य में लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण से है। इसे लेकर राजनीतिक दलों के बीच लंबे समय से अलग-अलग मत रहे हैं।

    2029 से पहले लागू करने की चुनौती

    राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि परिसीमन से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक इस मानसून सत्र में नहीं आता है, तो सरकार के पास इसे आगामी सत्रों में लाने का विकल्प रहेगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले इसे लागू करने के लिए पर्याप्त समय बचा हुआ है।

    फिलहाल सरकार की ओर से FCRA या परिसीमन संबंधी विधेयक को अगले सप्ताह पेश करने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। लेकिन BJP और कांग्रेस दोनों की ओर से सांसदों को दिल्ली में रहने और सदन में मौजूद रहने के निर्देशों ने संसद के अगले सप्ताह के एजेंडे को लेकर सियासी अटकलें जरूर तेज कर दी हैं।

  • NDA सांसदों की बैठक में सोशल मीडिया पर खास जोर, PM मोदी ने युवाओं से कनेक्शन बढ़ाने और डिजिटल सक्रियता की दी सलाह

    NDA सांसदों की बैठक में सोशल मीडिया पर खास जोर, PM मोदी ने युवाओं से कनेक्शन बढ़ाने और डिजिटल सक्रियता की दी सलाह

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ NDA के नए लोकसभा सांसदों की बैठक में इस बार सोशल मीडिया की सक्रियता को खास महत्व दिया गया। बैठक के दौरान सांसदों को उनके पिछले 90 दिनों की सोशल मीडिया गतिविधियों का एक पेज का रिपोर्ट कार्ड सौंपा गया। इसमें अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर सांसदों की सक्रियता, पोस्ट की संख्या, लोगों तक पहुंच और प्रतिक्रियाओं से जुड़े आंकड़े शामिल थे। सांसदों से सोशल मीडिया के जरिए युवाओं के साथ अपना संपर्क और मजबूत करने को कहा गया।

    बैठक में प्रधानमंत्री ने NDA के भीतर पुराने और नए सांसदों के बीच समानता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि गठबंधन में कोई सांसद 20 साल पुराना हो या 20 दिन पुराना, सभी के लिए बराबर सम्मान है। बैठक में हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद NDA के साथ आए कुछ सांसद भी शामिल हुए। इनमें टीएमसी से अलग होकर NCPI में शामिल हुए सांसद और शिवसेना यूबीटी से अलग होकर शिवसेना में आए सांसद भी मौजूद रहे।

    सोशल मीडिया रिपोर्ट कार्ड को बैठक की प्रमुख बातों में माना जा रहा है। इसमें सांसदों के पिछले तीन महीनों के डिजिटल प्रदर्शन का आकलन किया गया। रिपोर्ट में एक्स पर सांसद द्वारा की गई पोस्ट की संख्या, उन पोस्ट पर आए इंप्रेशन और कमेंट जैसे आंकड़े दर्ज किए गए। इसी तरह फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सांसदों की गतिविधियों और उनकी पहुंच से जुड़े आंकड़े भी रिपोर्ट में शामिल किए गए।

    सांसदों को समझाया गया कि आज के दौर में जनता, खासकर युवाओं तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया एक महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसलिए केवल संसद और क्षेत्र में सक्रिय रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी नियमित और प्रभावी संवाद जरूरी है। सांसदों को अपनी सोशल मीडिया मौजूदगी को अधिक सक्रिय और जनता से जुड़ा बनाने का सुझाव दिया गया।

    90 दिनों के डेटा को आधार बनाकर तैयार किया गया यह रिपोर्ट कार्ड सांसदों की डिजिटल सक्रियता का तुलनात्मक आकलन करने में भी मदद कर सकता है। पोस्ट की संख्या और इंप्रेशन जैसे आंकड़े यह समझने में मदद करते हैं कि सांसद सोशल मीडिया पर कितने सक्रिय हैं और उनकी सामग्री कितने लोगों तक पहुंच रही है। इसके अलावा कमेंट और अन्य प्रतिक्रियाएं जनता की ऑनलाइन भागीदारी का संकेत देती हैं।

    बैठक में सांसदों के स्वास्थ्य को लेकर भी चर्चा हुई। प्रधानमंत्री ने सांसदों से अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देने और नियमित जांच कराने की सलाह दी। खासतौर पर 40 वर्ष से अधिक उम्र के सांसदों को नियमित मेडिकल चेकअप कराने की बात कही गई। योग को लेकर भी उन्होंने सांसदों से सवाल किया और पूछा कि नियमित योग करने वाले कितने सांसद हैं।

    प्रधानमंत्री ने स्थिर सरकार के महत्व का भी उल्लेख किया। बातचीत के दौरान उन्होंने विदेशों में सरकारों के बार-बार बदलने का उदाहरण देते हुए राजनीतिक स्थिरता की जरूरत पर बात की। साथ ही सांसदों को भरोसा दिलाया कि यदि उन्हें अपने क्षेत्र से जुड़ी कोई समस्या या व्यक्तिगत स्तर पर कोई कठिनाई हो तो वे सीधे उनसे संपर्क कर सकते हैं।

    बैठक में पूर्वी भारत के विकास को लेकर भी प्रधानमंत्री ने बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि आने वाले कुछ वर्षों में कोलकाता, ओडिशा और भुवनेश्वर का ऐसा कायाकल्प होगा जिसकी अभी कल्पना करना भी मुश्किल है। इस तरह बैठक में डिजिटल सक्रियता, स्वास्थ्य, राजनीतिक स्थिरता और क्षेत्रीय विकास जैसे कई मुद्दों पर सांसदों को दिशा देने की कोशिश की गई।

  • जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में गतिरोध जारी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री से सदन में बयान देने की मांग दोहराई।

    जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में गतिरोध जारी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री से सदन में बयान देने की मांग दोहराई।

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में राजनीतिक टकराव लगातार गहराता जा रहा है। विपक्ष इस पूरे मामले पर सरकार से विस्तृत जवाब की मांग कर रहा है, जबकि सदन की कार्यवाही भी बार-बार बाधित हो रही है। इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि इस मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह को स्वयं सदन में उपस्थित होकर पूरे घटनाक्रम की जानकारी देनी चाहिए ताकि सभी सवालों का स्पष्ट उत्तर मिल सके।

    मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि विपक्ष पिछले कई दिनों से इस विषय पर चर्चा की मांग कर रहा है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई औपचारिक जवाब सामने नहीं आया है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे संवेदनशील मामलों पर संसद के भीतर खुली चर्चा होना आवश्यक है। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा के सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री को विपक्ष की भावनाओं से गृह मंत्री को अवगत कराने का निर्देश दिया है, जिससे इस विषय पर चर्चा का रास्ता निकल सके।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि विपक्ष का उद्देश्य केवल राजनीतिक विरोध करना नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि यदि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस या अन्य बल प्रयोग किया है तो यह जानना जरूरी है कि ऐसे कदम उठाने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया था। उनके अनुसार संसद इस प्रकार के मुद्दों पर जवाबदेही तय करने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है और सरकार को यहां विस्तृत स्पष्टीकरण देना चाहिए।

    खड़गे ने अपनी पार्टी की ओर से दो प्रमुख मांगों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस चाहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया दें और दूसरी ओर गृह मंत्री अमित शाह सदन में उपस्थित होकर विपक्ष के सवालों का जवाब दें। उनका कहना था कि यदि सरकार इस विषय पर स्पष्ट रुख नहीं अपनाती है तो राजनीतिक विवाद और गहराने की संभावना बनी रहेगी।

    उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष संसद की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाना चाहता है, लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचने की स्थिति में गतिरोध समाप्त होना कठिन है। उनके अनुसार लोकतंत्र में संवाद और जवाबदेही दोनों समान रूप से आवश्यक हैं तथा जनता से जुड़े मामलों पर सरकार को पारदर्शी रुख अपनाना चाहिए।

    अपने बयान के दौरान खड़गे ने झारखंड में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस छात्रों के हितों और उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठाती रहेगी। उनका कहना था कि किसी भी राज्य में यदि युवाओं और छात्रों से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं तो उन पर निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

    जंतर-मंतर की घटना को लेकर संसद में जारी गतिरोध के बीच अब सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि इस विषय पर सदन में विस्तृत चर्चा होती है तो राजनीतिक दलों के बीच जारी टकराव कम होने की संभावना बन सकती है। फिलहाल विपक्ष अपने रुख पर कायम है और सरकार से आधिकारिक जवाब की मांग लगातार दोहरा रहा है।

  • FCRA बिल को लेकर बढ़ा राजनीतिक विवाद, शशि थरूर बोले- सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बचाने के लिए विपक्ष एकजुट हो

    FCRA बिल को लेकर बढ़ा राजनीतिक विवाद, शशि थरूर बोले- सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बचाने के लिए विपक्ष एकजुट हो

     
    नई दिल्ली । प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस विधेयक का खुलकर विरोध करते हुए इसे नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के लिए गंभीर चुनौती बताया है। उन्होंने विपक्षी दलों से अपील की है कि संसद में इस विधेयक के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाई जाए और इसे वर्तमान स्वरूप में पारित होने से रोका जाए। थरूर का कहना है कि यह केवल कानूनी संशोधन का मामला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और स्वतंत्रता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

    शशि थरूर ने कहा कि वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में कार्य कर रहे अनेक संस्थानों ने देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका मानना है कि प्रस्तावित संशोधन के कारण ऐसे संगठनों पर अतिरिक्त कानूनी और प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने चिंता जताई कि यदि नियम अत्यधिक कठोर हुए तो अनेक संस्थाओं के नियमित कार्य प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों तक पहुंचने वाली सेवाओं पर भी पड़ेगा।

    कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में गैर-लाभकारी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों पर लगातार सख्ती बढ़ी है। उनके अनुसार विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों की संख्या और फंडिंग में पहले ही उल्लेखनीय गिरावट देखी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि यदि नया संशोधन लागू होता है तो अनेक संस्थाओं के संचालन पर और अधिक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने इस पूरे मुद्दे को लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक समाज की भूमिका से जोड़ते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की।

    थरूर ने विशेष रूप से केरल का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लंबे समय से कई सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थान बिना किसी भेदभाव के समाज की सेवा करते रहे हैं। उनके अनुसार इन संस्थाओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने आशंका जताई कि नए प्रावधानों से ऐसे संगठनों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है।

    उन्होंने विपक्षी सांसदों से आग्रह किया कि इस विधेयक पर संसद में व्यापक चर्चा कराई जाए और सभी दल मिलकर अपनी बात मजबूती से रखें। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी महत्वपूर्ण कानून पर सभी पक्षों की राय और विस्तृत विचार-विमर्श आवश्यक होता है। उन्होंने इसे केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय बताया।

    दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि विदेशी अंशदान से जुड़े कानूनों का उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार के अनुसार नियामक व्यवस्था को मजबूत बनाने और विदेशी फंड के उपयोग की प्रभावी निगरानी के लिए समय-समय पर कानूनी संशोधन आवश्यक होते हैं। ऐसे में अब प्रस्तावित विधेयक को लेकर संसद में होने वाली चर्चा और विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • राज्यसभा में विपक्ष की मांग पर बढ़ी सियासी तल्खी, सभापति ने रिजिजू से सरकार को संदेश देने का किया आग्रह

    राज्यसभा में विपक्ष की मांग पर बढ़ी सियासी तल्खी, सभापति ने रिजिजू से सरकार को संदेश देने का किया आग्रह


    नई दिल्ली
    । राज्यसभा में गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। सदन की कार्यवाही के दौरान नेता प्रतिपक्ष ने गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग उठाई, जिस पर सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से विपक्ष की भावना सरकार तक पहुंचाने का आग्रह किया। हालांकि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए और लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित होती रही।

    सदन की कार्यवाही के दौरान नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी आवश्यक है। इस पर सभापति ने स्पष्ट किया कि यह किसी प्रकार का निर्देश नहीं, बल्कि विपक्ष की ओर से रखा गया अनुरोध है। उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री से कहा कि विपक्ष की इस भावना और मांग को सरकार के समक्ष रखा जाना चाहिए ताकि इस पर उचित निर्णय लिया जा सके।

    इस पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि यह तय करना सरकार का अधिकार है कि किस दिन कौन-सा मंत्री सदन में उपस्थित रहेगा। उन्होंने कहा कि किसी मंत्री की उपस्थिति को लेकर निर्देश नहीं दिए जा सकते। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उस समय सदन में प्रश्नकाल चल रहा था और लगातार हो रहे व्यवधान के कारण प्रश्नकाल की कार्यवाही प्रभावित हो रही है, जिससे महत्वपूर्ण संसदीय कार्य बाधित हो रहे हैं।

    सभापति ने एक बार फिर हस्तक्षेप करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने किसी मंत्री को निर्देश देने का प्रयास नहीं किया है। उन्होंने केवल अपनी बात और विपक्ष की भावना सदन के सामने रखी है। सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री से दोहराया कि विपक्ष के अनुरोध को सरकार तक पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी के दायरे में आता है और इसी भावना से उन्होंने यह आग्रह किया है।

    सदन में इस दौरान विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संसदीय नियमों को लेकर भी बहस हुई। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उन्हें संसदीय नियमों की जानकारी है और उन्हें नियम सिखाने की आवश्यकता नहीं है। इसके जवाब में किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी सदस्य पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल राज्यसभा के नियमों का उल्लेख किया है और सदन की कार्यवाही हमेशा निर्धारित नियमों के अनुरूप ही संचालित होनी चाहिए।

    रिजिजू ने यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष वरिष्ठ और सम्मानित सदस्य हैं तथा सरकार उनके अनुभव का सम्मान करती है। हालांकि उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि किसी भी संसदीय मांग या तर्क के समर्थन में संबंधित नियमों का उल्लेख किया जाना आवश्यक होता है। इस बीच सभापति लगातार सभी सदस्यों से व्यवस्था बनाए रखने और प्रश्नकाल को सुचारु रूप से चलने देने की अपील करते रहे।

    लगातार शोर-शराबे और व्यवधान के कारण सदन की सामान्य कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। सभापति ने कई बार सदस्यों से अपनी-अपनी सीटों पर लौटने और संसदीय गरिमा बनाए रखने का अनुरोध किया, लेकिन हंगामा जारी रहा। अंततः लगातार बाधा उत्पन्न होने के कारण राज्यसभा की कार्यवाही निर्धारित समय तक के लिए स्थगित कर दी गई। पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर संसद में महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति और संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया।