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  • जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में गतिरोध जारी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री से सदन में बयान देने की मांग दोहराई।

    जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में गतिरोध जारी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री से सदन में बयान देने की मांग दोहराई।

    नई दिल्ली । जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद में राजनीतिक टकराव लगातार गहराता जा रहा है। विपक्ष इस पूरे मामले पर सरकार से विस्तृत जवाब की मांग कर रहा है, जबकि सदन की कार्यवाही भी बार-बार बाधित हो रही है। इसी बीच कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि इस मुद्दे पर गृह मंत्री अमित शाह को स्वयं सदन में उपस्थित होकर पूरे घटनाक्रम की जानकारी देनी चाहिए ताकि सभी सवालों का स्पष्ट उत्तर मिल सके।

    मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि विपक्ष पिछले कई दिनों से इस विषय पर चर्चा की मांग कर रहा है, लेकिन अब तक सरकार की ओर से कोई औपचारिक जवाब सामने नहीं आया है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे संवेदनशील मामलों पर संसद के भीतर खुली चर्चा होना आवश्यक है। उन्होंने दावा किया कि राज्यसभा के सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री को विपक्ष की भावनाओं से गृह मंत्री को अवगत कराने का निर्देश दिया है, जिससे इस विषय पर चर्चा का रास्ता निकल सके।

    कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि विपक्ष का उद्देश्य केवल राजनीतिक विरोध करना नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जानकारी प्राप्त करना है। उन्होंने कहा कि यदि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज, आंसू गैस या अन्य बल प्रयोग किया है तो यह जानना जरूरी है कि ऐसे कदम उठाने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया था। उनके अनुसार संसद इस प्रकार के मुद्दों पर जवाबदेही तय करने का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है और सरकार को यहां विस्तृत स्पष्टीकरण देना चाहिए।

    खड़गे ने अपनी पार्टी की ओर से दो प्रमुख मांगों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस चाहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया दें और दूसरी ओर गृह मंत्री अमित शाह सदन में उपस्थित होकर विपक्ष के सवालों का जवाब दें। उनका कहना था कि यदि सरकार इस विषय पर स्पष्ट रुख नहीं अपनाती है तो राजनीतिक विवाद और गहराने की संभावना बनी रहेगी।

    उन्होंने यह भी कहा कि विपक्ष संसद की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाना चाहता है, लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा से बचने की स्थिति में गतिरोध समाप्त होना कठिन है। उनके अनुसार लोकतंत्र में संवाद और जवाबदेही दोनों समान रूप से आवश्यक हैं तथा जनता से जुड़े मामलों पर सरकार को पारदर्शी रुख अपनाना चाहिए।

    अपने बयान के दौरान खड़गे ने झारखंड में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस छात्रों के हितों और उनके अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार आवाज उठाती रहेगी। उनका कहना था कि किसी भी राज्य में यदि युवाओं और छात्रों से जुड़े प्रश्न सामने आते हैं तो उन पर निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

    जंतर-मंतर की घटना को लेकर संसद में जारी गतिरोध के बीच अब सभी की निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। यदि इस विषय पर सदन में विस्तृत चर्चा होती है तो राजनीतिक दलों के बीच जारी टकराव कम होने की संभावना बन सकती है। फिलहाल विपक्ष अपने रुख पर कायम है और सरकार से आधिकारिक जवाब की मांग लगातार दोहरा रहा है।

  • FCRA बिल को लेकर बढ़ा राजनीतिक विवाद, शशि थरूर बोले- सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बचाने के लिए विपक्ष एकजुट हो

    FCRA बिल को लेकर बढ़ा राजनीतिक विवाद, शशि थरूर बोले- सामाजिक संस्थाओं की स्वतंत्रता बचाने के लिए विपक्ष एकजुट हो

     
    नई दिल्ली । प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस विधेयक का खुलकर विरोध करते हुए इसे नागरिक समाज, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के लिए गंभीर चुनौती बताया है। उन्होंने विपक्षी दलों से अपील की है कि संसद में इस विधेयक के खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठाई जाए और इसे वर्तमान स्वरूप में पारित होने से रोका जाए। थरूर का कहना है कि यह केवल कानूनी संशोधन का मामला नहीं बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली और स्वतंत्रता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।

    शशि थरूर ने कहा कि वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में कार्य कर रहे अनेक संस्थानों ने देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनका मानना है कि प्रस्तावित संशोधन के कारण ऐसे संगठनों पर अतिरिक्त कानूनी और प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है। उन्होंने चिंता जताई कि यदि नियम अत्यधिक कठोर हुए तो अनेक संस्थाओं के नियमित कार्य प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों तक पहुंचने वाली सेवाओं पर भी पड़ेगा।

    कांग्रेस सांसद ने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में गैर-लाभकारी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों पर लगातार सख्ती बढ़ी है। उनके अनुसार विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों की संख्या और फंडिंग में पहले ही उल्लेखनीय गिरावट देखी जा चुकी है। उन्होंने कहा कि यदि नया संशोधन लागू होता है तो अनेक संस्थाओं के संचालन पर और अधिक प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने इस पूरे मुद्दे को लोकतांत्रिक व्यवस्था और नागरिक समाज की भूमिका से जोड़ते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की।

    थरूर ने विशेष रूप से केरल का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां लंबे समय से कई सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संस्थान बिना किसी भेदभाव के समाज की सेवा करते रहे हैं। उनके अनुसार इन संस्थाओं ने शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उन्होंने आशंका जताई कि नए प्रावधानों से ऐसे संगठनों की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे समाज के विभिन्न वर्गों पर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना है।

    उन्होंने विपक्षी सांसदों से आग्रह किया कि इस विधेयक पर संसद में व्यापक चर्चा कराई जाए और सभी दल मिलकर अपनी बात मजबूती से रखें। उनका कहना है कि लोकतंत्र में किसी भी महत्वपूर्ण कानून पर सभी पक्षों की राय और विस्तृत विचार-विमर्श आवश्यक होता है। उन्होंने इसे केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता और सार्वजनिक हित से जुड़ा विषय बताया।

    दूसरी ओर, सरकार का कहना है कि विदेशी अंशदान से जुड़े कानूनों का उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सरकार के अनुसार नियामक व्यवस्था को मजबूत बनाने और विदेशी फंड के उपयोग की प्रभावी निगरानी के लिए समय-समय पर कानूनी संशोधन आवश्यक होते हैं। ऐसे में अब प्रस्तावित विधेयक को लेकर संसद में होने वाली चर्चा और विभिन्न राजनीतिक दलों की रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • राज्यसभा में विपक्ष की मांग पर बढ़ी सियासी तल्खी, सभापति ने रिजिजू से सरकार को संदेश देने का किया आग्रह

    राज्यसभा में विपक्ष की मांग पर बढ़ी सियासी तल्खी, सभापति ने रिजिजू से सरकार को संदेश देने का किया आग्रह


    नई दिल्ली
    । राज्यसभा में गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। सदन की कार्यवाही के दौरान नेता प्रतिपक्ष ने गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग उठाई, जिस पर सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू से विपक्ष की भावना सरकार तक पहुंचाने का आग्रह किया। हालांकि इस मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए और लगातार हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही प्रभावित होती रही।

    सदन की कार्यवाही के दौरान नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी आवश्यक है। इस पर सभापति ने स्पष्ट किया कि यह किसी प्रकार का निर्देश नहीं, बल्कि विपक्ष की ओर से रखा गया अनुरोध है। उन्होंने संसदीय कार्य मंत्री से कहा कि विपक्ष की इस भावना और मांग को सरकार के समक्ष रखा जाना चाहिए ताकि इस पर उचित निर्णय लिया जा सके।

    इस पर संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि यह तय करना सरकार का अधिकार है कि किस दिन कौन-सा मंत्री सदन में उपस्थित रहेगा। उन्होंने कहा कि किसी मंत्री की उपस्थिति को लेकर निर्देश नहीं दिए जा सकते। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उस समय सदन में प्रश्नकाल चल रहा था और लगातार हो रहे व्यवधान के कारण प्रश्नकाल की कार्यवाही प्रभावित हो रही है, जिससे महत्वपूर्ण संसदीय कार्य बाधित हो रहे हैं।

    सभापति ने एक बार फिर हस्तक्षेप करते हुए कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने किसी मंत्री को निर्देश देने का प्रयास नहीं किया है। उन्होंने केवल अपनी बात और विपक्ष की भावना सदन के सामने रखी है। सभापति ने संसदीय कार्य मंत्री से दोहराया कि विपक्ष के अनुरोध को सरकार तक पहुंचाना उनकी जिम्मेदारी के दायरे में आता है और इसी भावना से उन्होंने यह आग्रह किया है।

    सदन में इस दौरान विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संसदीय नियमों को लेकर भी बहस हुई। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि उन्हें संसदीय नियमों की जानकारी है और उन्हें नियम सिखाने की आवश्यकता नहीं है। इसके जवाब में किरेन रिजिजू ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी सदस्य पर व्यक्तिगत टिप्पणी करना नहीं था। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल राज्यसभा के नियमों का उल्लेख किया है और सदन की कार्यवाही हमेशा निर्धारित नियमों के अनुरूप ही संचालित होनी चाहिए।

    रिजिजू ने यह भी कहा कि नेता प्रतिपक्ष वरिष्ठ और सम्मानित सदस्य हैं तथा सरकार उनके अनुभव का सम्मान करती है। हालांकि उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि किसी भी संसदीय मांग या तर्क के समर्थन में संबंधित नियमों का उल्लेख किया जाना आवश्यक होता है। इस बीच सभापति लगातार सभी सदस्यों से व्यवस्था बनाए रखने और प्रश्नकाल को सुचारु रूप से चलने देने की अपील करते रहे।

    लगातार शोर-शराबे और व्यवधान के कारण सदन की सामान्य कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकी। सभापति ने कई बार सदस्यों से अपनी-अपनी सीटों पर लौटने और संसदीय गरिमा बनाए रखने का अनुरोध किया, लेकिन हंगामा जारी रहा। अंततः लगातार बाधा उत्पन्न होने के कारण राज्यसभा की कार्यवाही निर्धारित समय तक के लिए स्थगित कर दी गई। पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर संसद में महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति और संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया।

  • राम मंदिर ट्रस्ट से पुलिस कार्रवाई तक कई मुद्दों पर सरकार घिरी, संसद में चर्चा की मांग को लेकर विपक्ष का प्रदर्शन

    राम मंदिर ट्रस्ट से पुलिस कार्रवाई तक कई मुद्दों पर सरकार घिरी, संसद में चर्चा की मांग को लेकर विपक्ष का प्रदर्शन

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के दौरान बुधवार को भी राजनीतिक माहौल गर्म रहा। लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के बीच विपक्षी दलों ने कई मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार को घेरा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सदन में उपस्थित होकर जवाब देने की मांग की। विपक्ष का कहना है कि जिन विषयों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन पर संसद में खुली और विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए ताकि सभी पक्षों के सामने स्थिति स्पष्ट हो सके।

    राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि विपक्ष किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। उनका आरोप था कि सरकार चर्चा से बच रही है, जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद ही वह सर्वोच्च मंच है जहां सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को सदन में आकर अपना पक्ष रखना चाहिए ताकि उठाए गए मुद्दों पर सार्थक बहस हो सके।

    विपक्ष की ओर से राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कुछ मामलों को भी उठाया गया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि उनका विरोध किसी धार्मिक आस्था या भगवान राम के प्रति नहीं है, बल्कि मंदिर निर्माण के लिए मिले दान और उससे जुड़े विभिन्न मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग है। उनका कहना था कि यदि किसी भी प्रकार के सवाल उठते हैं तो उनका उत्तर सार्वजनिक रूप से दिया जाना चाहिए, जिससे किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे।

    संसद परिसर में कांग्रेस सांसदों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। पार्टी नेताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने और सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग दोहराई। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जनता और विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का स्पष्ट उत्तर दे। उन्होंने कथित पुलिस कार्रवाई और बल प्रयोग से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय करने तथा निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

    कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा कि विपक्ष का विरोध पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक दायरे में है। उन्होंने कहा कि जिन घटनाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सके। विपक्षी दलों का कहना है कि संसद में चर्चा के माध्यम से ही लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास और अधिक मजबूत किया जा सकता है।

    वहीं सरकार की ओर से विपक्ष के आरोपों पर अलग-अलग स्तर पर जवाब दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। मानसून सत्र के दौरान विभिन्न राजनीतिक और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार तीखी नोकझोंक देखने को मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में भी इन विषयों को लेकर संसद में बहस और विरोध का सिलसिला जारी रह सकता है। ऐसे में दोनों पक्षों की रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • पीएम मोदी का वीडियो हटने पर मेटा पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को तीन दिन में बिना शर्त माफी का अल्टीमेटम

    पीएम मोदी का वीडियो हटने पर मेटा पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को तीन दिन में बिना शर्त माफी का अल्टीमेटम

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हटाए जाने के मामले ने अब राजनीतिक और संसदीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। इस घटनाक्रम को लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने कंपनी से तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने और इस घटना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। समिति का कहना है कि यदि निर्धारित समय में संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो कंपनी के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    समिति के अनुसार सोशल मीडिया मंचों की जिम्मेदारी है कि वे सार्वजनिक महत्व की सामग्री के संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखें। प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद से जुड़े आधिकारिक या सार्वजनिक महत्व के वीडियो के अस्थायी रूप से हटने की घटना को गंभीरता से लिया गया है। इसी कारण कंपनी से पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का भी विवरण मांगा गया है।

    बताया गया है कि संसदीय समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि यह तकनीकी त्रुटि थी तो उसके कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं यदि किसी मानवीय निर्णय के कारण वीडियो हटाया गया था तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। समिति का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री के प्रबंधन में स्पष्ट मानकों और जवाबदेही का पालन आवश्यक है, ताकि उपयोगकर्ताओं का विश्वास बना रहे।

    हाल के वर्षों में सोशल मीडिया कंपनियों और भारतीय संस्थानों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, सामग्री मॉडरेशन और सूचना प्रबंधन को लेकर कई बार चर्चा होती रही है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि भारत में काम करने वाले सभी डिजिटल मंचों को देश के कानूनों और नियामकीय व्यवस्थाओं का पूरी तरह पालन करना चाहिए। इसी संदर्भ में यह मामला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी भी सार्वजनिक महत्व की सामग्री को हटाने या सीमित करने से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं और पारदर्शिता का पालन आवश्यक है। इससे गलतफहमियों की संभावना कम होती है और प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता भी बनी रहती है। डिजिटल मंचों की बढ़ती भूमिका को देखते हुए जवाबदेही और तकनीकी दक्षता दोनों को समान महत्व दिया जा रहा है।

    अब सभी की नजर मेटा की अगली प्रतिक्रिया पर है। यदि कंपनी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना पक्ष रखती है और आवश्यक स्पष्टीकरण देती है तो मामले की दिशा अलग हो सकती है। वहीं यदि समिति को जवाब संतोषजनक नहीं लगता या निर्धारित समय में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो संसदीय स्तर पर आगे की कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी, पारदर्शिता और नियामकीय अनुपालन को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

  • फ्री नहीं रहने वाला डिजिटल पेमेंट…. UPI से लेनदेन पर लगेगा शुल्क! संसद में आया बिल

    फ्री नहीं रहने वाला डिजिटल पेमेंट…. UPI से लेनदेन पर लगेगा शुल्क! संसद में आया बिल


    नई दिल्ली।
    मोदी सरकार (Modi Government) ने अपनी लोकप्रिय यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface-UPI) सिस्टम पर व्यापारियों से शुल्क वसूलने की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है। मंगलवार को संसद (Parliament) में भुगतान कानूनों में प्रस्तावित बदलाव पेश किए गए, जिससे यह संभावना और बढ़ गई है। हालांकि यह शुल्क व्यापारियों पर लगेगा, ग्राहकों पर नहीं, फिर भी यह बदलाव डिजिटल पेमेंट (Digital Payment) को प्रभावित कर सकता है।

    जानकारी के मुताबिक नीति निर्माता दो बड़े विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। पहला विकल्प है कि एक निश्चित राशि से अधिक के लेनदेन पर MDR लगाया जाए। दूसरा विकल्प है कि व्यापारी के वार्षिक कारोबार के आधार पर शुल्क तय किया जाए। सूत्रों के अनुसार, एक प्रस्ताव के तहत केवल बड़े व्यापारियों से शुल्क लिया जाएगा, जबकि उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के लिए UPI भुगतान मुफ्त रहेगा।


    कितना लग सकता है चार्ज

    सरकारी सूत्र के अनुसार, एक प्रस्ताव में 1.5 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार वाले व्यापारियों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.3% से 0.5% MDR लगाने की बात कही गई है। जेफरीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन व्यापारियों की कुल लेनदेन संख्या का केवल 4% हैं, लेकिन कुल लेनदेन मूल्य का लगभग 67% इन्हीं से आता है।


    संशोधन विधेयक पेश

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम में संशोधन विधेयक पेश किया। उद्योग और नियामक सूत्रों के अनुसार, इस संशोधन से डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का कानूनी आधार बनेगा।

    हालांकि, अभी यह तय नहीं हुआ है कि शुल्क कितना होगा और यह किन लेनदेन पर लागू होगा। सरकारी सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर यह जानकारी दी। वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक और राष्ट्रीय भुगतान निगम ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।


    UPI का बाजार में दबदबा

    UPI दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम पेमेंट नेटवर्कों में से एक है। जुलाई में इसके जरिए 23.6 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य 29.9 लाख करोड़ रुपये वॉलमार्ट की फोनपे और गूगल की गूगल पे इस सिस्टम पर हावी हैं।


    फ्री UPI पर क्यों लगने जा रहा लगाम

    रॉयटर्स के मुताबिक उद्योग के अधिकारियों का लंबे समय से कहना है कि डिजिटल पेमेंट में ग्रोथ को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि UPI ट्रांजैक्शन पर पेमेंट कंपनियों को कोई शुल्क नहीं मिलता। इससे उनकी निवेश करने की क्षमता सीमित हो जाती है।


    MDR क्या होता है?

    MDR वह शुल्क है, जो व्यापारी बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को डिजिटल ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने के लिए देते हैं। भारत में क्रेडिट कार्ड पर आमतौर पर लगभग 1.5% MDR लगता है, जबकि डेबिट कार्ड पर 0.9% तक का शुल्क होता है, लेकिन UPI लेनदेन पर अभी व्यापारियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

  • बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल, कानून में बदलाव की कही बात

    बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल, कानून में बदलाव की कही बात

    नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली, कर व्यवस्था और कानूनी जवाबदेही को लेकर केंद्र में बहस छेड़ दी है। संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों पर कई गंभीर सवाल उठाए और कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मिलने वाले ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए।

    निशिकांत दुबे ने दावा किया कि प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत में बड़ा कारोबार करते हैं, लेकिन उनके अनुसार कर भुगतान उस अनुपात में नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कंपनियों की आय और टैक्स भुगतान के बीच बड़ा अंतर है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारत में अपने कारोबार और गतिविधियों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि कुछ मामलों में आपत्तिजनक और अवैध सामग्री को समय पर हटाने में प्लेटफॉर्म प्रभावी कार्रवाई नहीं करते। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ संगठनों और अभियानों को डिजिटल माध्यम पर असामान्य रूप से अधिक पहुंच मिलती है, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

    भाजपा सांसद ने हाल के कुछ सामाजिक और राजनीतिक अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि कम समय में कुछ संगठनों की व्यूअरशिप और डिजिटल पहुंच में तेज वृद्धि देखी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्म को स्पष्ट करना चाहिए कि कंटेंट की पहुंच और प्रसार किन आधारों पर निर्धारित होता है। उनके अनुसार इस विषय में अधिक पारदर्शिता आवश्यक है।

    निशिकांत दुबे ने वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन के उपयोग का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके प्लेटफॉर्म पर कितने उपयोगकर्ता वीपीएन का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार की जानकारी से डिजिटल गतिविधियों की बेहतर निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अवसरों पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक व्यक्तियों से जुड़े कंटेंट को प्लेटफॉर्म से हटाया गया, जिससे अभिव्यक्ति और निष्पक्षता को लेकर प्रश्न खड़े हुए। उनके अनुसार यदि किसी प्रकार की सामग्री हटाई जाती है तो उसके लिए स्पष्ट और समान मानदंड होने चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के पक्षपात की आशंका न रहे।

    अपने वक्तव्य में निशिकांत दुबे ने तेलंगाना सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ की गई कानूनी कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि प्लेटफॉर्म अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं करते हैं तो सरकारों को कानूनी विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत उपलब्ध ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान की समीक्षा की आवश्यकता भी जताई।

    सेफ हार्बर वह कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा किए गए थर्ड पार्टी कंटेंट के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा मिलती है, बशर्ते वे निर्धारित नियमों और कानूनी निर्देशों का पालन करें। फिलहाल सांसद के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, डिजिटल नियमन और सेफ हार्बर व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

  • राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में तीखी नोकझोंक, खरगे और किरेन रिजिजू आमने-सामने, विपक्ष का जोरदार हंगामा

    राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में तीखी नोकझोंक, खरगे और किरेन रिजिजू आमने-सामने, विपक्ष का जोरदार हंगामा

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को राम मंदिर चढ़ावा से जुड़े आरोपों को लेकर राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार से जवाब की मांग करते हुए सदन में जोरदार हंगामा किया, जबकि सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया। लगातार शोर-शराबे के कारण राज्यसभा की कार्यवाही निर्धारित समय से पहले कई बार स्थगित करनी पड़ी।

    राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चर्चा के दौरान कहा कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन में केंद्र सरकार की भूमिका रही है और मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि चढ़ावे से जुड़े आरोपों के मामले में संबंधित एजेंसियों की ओर से क्या कार्रवाई की गई है। उन्होंने सरकार से इस विषय पर सदन में स्पष्ट जवाब देने की मांग की।

    खरगे के वक्तव्य का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अतीत में राम मंदिर आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों का विरोध किया था। रिजिजू ने आरोप लगाया कि अब वही दल इस मुद्दे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि सरकार किसी भी विषय पर तथ्यों के आधार पर जवाब देने के लिए तैयार है।

    सदन में लगातार हंगामे के कारण कार्यवाही पहले कुछ समय के लिए स्थगित की गई और दोबारा शुरू होने के बाद भी व्यवधान जारी रहने पर फिर स्थगन करना पड़ा। विपक्षी दलों का कहना था कि राम मंदिर चढ़ावे से जुड़े आरोपों पर विस्तृत चर्चा कराई जाए और सरकार अपना पक्ष स्पष्ट करे। वहीं सत्तापक्ष ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने और राजनीतिक माहौल बनाने का आरोप लगाया।

    संसद भवन परिसर में भी इस मुद्दे को लेकर विपक्षी सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में कई विपक्षी नेता शामिल हुए और उन्होंने सरकार से कथित आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने तथा सदन में जवाब देने की मांग दोहराई। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने विभिन्न नारे लगाकर अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाया। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि संसद में महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं और विपक्ष को चर्चा के लिए सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

    मॉनसून सत्र के दौरान विभिन्न राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार तथा विपक्ष के बीच लगातार टकराव देखने को मिल रहा है। ऐसे में राम मंदिर चढ़ावा विवाद भी संसद के प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो गया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर दोनों पक्षों के बीच बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल सदन के सुचारु संचालन और लंबित विधायी कार्यों को लेकर भी राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है।

  • लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग

    लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग

    नई दिल्ली । संसद के जारी मॉनसून सत्र के दौरान सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के मध्य तल्खी लगातार बढ़ती जा रही है। मंगलवार को भी संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामे और नारेबाजी की पूरी संभावना बनी हुई है। विपक्षी दल विभिन्न ज्वलंत जनमुद्दों पर सरकार को घेरने की अपनी रणनीति पर पूरी मजबूती के साथ कायम हैं। उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि जब तक इन अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत और नियमबद्ध विचार-विमर्श की अनुमति प्रदान नहीं की जाती तथा संबंधित मंत्रालयों की ओर से आधिकारिक जवाब प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक विधायी कामकाज का सुचारू रूप से संचालन हो पाना बेहद कठिन रहेगा। इसके कारण संसदीय कार्यप्रणाली पर अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं।

    विपक्षी गठबंधन ने अपनी रणनीतिक रूपरेखा को और अधिक धार देते हुए हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलित छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई तथा अयोध्या में राम मंदिर दान प्रक्रिया से जुड़े विवादों को प्राथमिक मुद्दे के रूप में उभारा है। विरोध प्रदर्शन में शामिल प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग है कि देश के केंद्रीय गृह मंत्री स्वयं सदन के पटल पर उपस्थित होकर इस समूचे घटनाक्रम पर सरकार का स्पष्ट पक्ष रखें। इसके अतिरिक्त, मंदिर में अर्पित चढ़ावे तथा वित्तीय लेनदेन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर भी बिना किसी विलंब के स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा कराने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि जनसंशय दूर हो सके।

    संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की सदन में निरंतर अनुपस्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की इस सर्वोच्च संस्था में जनता से सीधे जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री का प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहना अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दलों का कहना है कि सरकार को विपक्ष के तर्कसंगत प्रश्नों का उत्तर देने से बचने के बजाय सकारात्मक रुख अपनाते हुए खुले संवाद की पहल करनी चाहिए, जिससे जारी गतिरोध को समाप्त किया जा सके।

    दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ दल का मानना है कि निरंतर व्यवधान और विरोध के कारण देश से जुड़े कई अति आवश्यक विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि, इस भारी राजनीतिक खींचातान के मध्य भी लोकसभा में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ोतरी से संबंधित महत्वपूर्ण कानून को पारित करा लिया गया। इसके साथ ही देश की बैंकिंग प्रणाली में आधुनिक डिजिटल तकनीक एवं क्लाउड आधारित रिकॉर्ड को कानूनी मान्यता प्रदान करने वाले एक नए बैंकिंग संशोधन विधेयक को भी पटल पर प्रस्तुत किया गया। सत्तापक्ष का दावा है कि विपक्ष जनकल्याणकारी कानूनों पर बहस करने के बजाय केवल व्यवधान पैदा कर रहा है।

    संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी रणनीति की तीखी आलोचना करते हुए दोहराया है कि सरकार नियमानुसार सभी जनहितकारी विषयों पर सार्थक और स्वस्थ बहस के लिए पूरी तरह तत्पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल वास्तव में गंभीर चर्चा से भाग रहे हैं और केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने के उद्देश्य से नारेबाजी का सहारा ले रहे हैं। उनका तर्क था कि संसद को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का केंद्र बनाने के स्थान पर जनहित में विधेयकों को विचार-विमर्श के पश्चात पारित कराने में रचनात्मक योगदान दिया जाना चाहिए।

    इसी बीच, संसद भवन परिसर स्थित मकर द्वार के निकट विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों ने एकजुट होकर जोरदार प्रदर्शन किया और तख्तियां दिखाकर नारेबाजी की। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक विश्लेषक और आम नागरिक भी इस निरंतर जारी संसदीय गतिरोध पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठकों में भी दोनों पक्षों के बीच न्यूनतम सहमति न बन पाने के कारण यह स्पष्ट है कि मॉनसून सत्र के आगामी दिनों में भी सामान्य कामकाज बहाल होना काफी मुश्किल दिखाई दे रहा है।

  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    नई दिल्ली । अयोध्या राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर संसद परिसर में विपक्षी दलों ने अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया। विपक्षी सांसदों ने नाटक के माध्यम से कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा। इस दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव साधु के वेश में दिखाई दिए, जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसद प्रदर्शन में शामिल हुए।

    प्रदर्शन के दौरान संसद परिसर में एक प्रतीकात्मक दान पेटी रखी गई थी। विपक्षी नेताओं ने नाटक के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की। इस दौरान राहुल गांधी सहित अन्य सांसद दान पेटी में चढ़ावा डालते हुए नजर आए। वहीं, प्रदर्शन के एक हिस्से में पप्पू यादव साधु के रूप में दान पेटी लेकर जाते हुए दिखाई दिए, जिसके बाद अन्य सांसदों ने उन्हें रोकने और विरोध जताने का अभिनय किया।

    विपक्षी सांसदों ने इस प्रदर्शन के जरिए सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की। नेताओं का कहना था कि वे विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे हैं और संसद के भीतर तथा बाहर जनता से जुड़े मामलों को उठाते रहेंगे। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी भी की।

    प्रदर्शन में राम मंदिर चढ़ावा विवाद के साथ-साथ अन्य मुद्दों को भी जोड़ा गया। विपक्षी सांसदों ने पेपर लीक जैसे मामलों का भी जिक्र करते हुए सरकार से जवाब मांगने की बात कही। प्रदर्शन के दौरान लगाए गए नारों में चढ़ावा चोरी और पेपर चोरी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा अध्यक्ष ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि संसद और उसके परिसर की गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने सदस्यों को सलाह दी कि संसद परिसर में ऐसे तरीके अपनाने से बचना चाहिए, जिससे सदन की मर्यादा प्रभावित हो।

    लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों से संसदीय परंपराओं और नियमों का पालन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद लोकतांत्रिक बहस और चर्चा का स्थान है, इसलिए विरोध दर्ज कराने के दौरान भी गरिमा और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।

    घटना के बाद संसद की कार्यवाही कुछ समय के लिए स्थगित भी हुई। हालांकि विपक्षी नेताओं ने अपने प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए कहा कि वह जनता से जुड़े मुद्दों को उठाते रहेंगे।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार, संसद सत्र के दौरान विपक्ष अक्सर अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाता है। इस बार राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर किए गए प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।

    वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से संसदीय गरिमा और विरोध के तरीकों को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद की बहस और राजनीतिक बयानबाजी में चर्चा का विषय बना रह सकता है।