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  • राम मंदिर ट्रस्ट से पुलिस कार्रवाई तक कई मुद्दों पर सरकार घिरी, संसद में चर्चा की मांग को लेकर विपक्ष का प्रदर्शन

    राम मंदिर ट्रस्ट से पुलिस कार्रवाई तक कई मुद्दों पर सरकार घिरी, संसद में चर्चा की मांग को लेकर विपक्ष का प्रदर्शन

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के दौरान बुधवार को भी राजनीतिक माहौल गर्म रहा। लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के बीच विपक्षी दलों ने कई मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार को घेरा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से सदन में उपस्थित होकर जवाब देने की मांग की। विपक्ष का कहना है कि जिन विषयों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन पर संसद में खुली और विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए ताकि सभी पक्षों के सामने स्थिति स्पष्ट हो सके।

    राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि विपक्ष किसी भी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार है। उनका आरोप था कि सरकार चर्चा से बच रही है, जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद ही वह सर्वोच्च मंच है जहां सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को सदन में आकर अपना पक्ष रखना चाहिए ताकि उठाए गए मुद्दों पर सार्थक बहस हो सके।

    विपक्ष की ओर से राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कुछ मामलों को भी उठाया गया। कांग्रेस नेताओं ने कहा कि उनका विरोध किसी धार्मिक आस्था या भगवान राम के प्रति नहीं है, बल्कि मंदिर निर्माण के लिए मिले दान और उससे जुड़े विभिन्न मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग है। उनका कहना था कि यदि किसी भी प्रकार के सवाल उठते हैं तो उनका उत्तर सार्वजनिक रूप से दिया जाना चाहिए, जिससे किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति न रहे।

    संसद परिसर में कांग्रेस सांसदों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। पार्टी नेताओं ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत अपनी बात रखने और सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग दोहराई। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जनता और विपक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का स्पष्ट उत्तर दे। उन्होंने कथित पुलिस कार्रवाई और बल प्रयोग से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय करने तथा निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

    कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद ने कहा कि विपक्ष का विरोध पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक दायरे में है। उन्होंने कहा कि जिन घटनाओं को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए ताकि तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट हो सके। विपक्षी दलों का कहना है कि संसद में चर्चा के माध्यम से ही लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास और अधिक मजबूत किया जा सकता है।

    वहीं सरकार की ओर से विपक्ष के आरोपों पर अलग-अलग स्तर पर जवाब दिए जाने की संभावना जताई जा रही है। मानसून सत्र के दौरान विभिन्न राजनीतिक और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार तीखी नोकझोंक देखने को मिल रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में भी इन विषयों को लेकर संसद में बहस और विरोध का सिलसिला जारी रह सकता है। ऐसे में दोनों पक्षों की रणनीति पर सभी की नजर बनी हुई है।

  • पीएम मोदी का वीडियो हटने पर मेटा पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को तीन दिन में बिना शर्त माफी का अल्टीमेटम

    पीएम मोदी का वीडियो हटने पर मेटा पर संसदीय समिति सख्त, मार्क जुकरबर्ग को तीन दिन में बिना शर्त माफी का अल्टीमेटम

    नई दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो फेसबुक से कुछ समय के लिए हटाए जाने के मामले ने अब राजनीतिक और संसदीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। इस घटनाक्रम को लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय से संबंधित संसदीय समिति ने मेटा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। समिति ने कंपनी से तीन दिन के भीतर बिना शर्त माफी मांगने और इस घटना के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। समिति का कहना है कि यदि निर्धारित समय में संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया तो कंपनी के खिलाफ आगे की कार्रवाई पर विचार किया जा सकता है।

    समिति के अनुसार सोशल मीडिया मंचों की जिम्मेदारी है कि वे सार्वजनिक महत्व की सामग्री के संचालन में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखें। प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद से जुड़े आधिकारिक या सार्वजनिक महत्व के वीडियो के अस्थायी रूप से हटने की घटना को गंभीरता से लिया गया है। इसी कारण कंपनी से पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जानकारी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का भी विवरण मांगा गया है।

    बताया गया है कि संसदीय समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि यह तकनीकी त्रुटि थी तो उसके कारणों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं यदि किसी मानवीय निर्णय के कारण वीडियो हटाया गया था तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ उचित कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। समिति का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री के प्रबंधन में स्पष्ट मानकों और जवाबदेही का पालन आवश्यक है, ताकि उपयोगकर्ताओं का विश्वास बना रहे।

    हाल के वर्षों में सोशल मीडिया कंपनियों और भारतीय संस्थानों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, सामग्री मॉडरेशन और सूचना प्रबंधन को लेकर कई बार चर्चा होती रही है। सरकार लगातार यह कहती रही है कि भारत में काम करने वाले सभी डिजिटल मंचों को देश के कानूनों और नियामकीय व्यवस्थाओं का पूरी तरह पालन करना चाहिए। इसी संदर्भ में यह मामला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी भी सार्वजनिक महत्व की सामग्री को हटाने या सीमित करने से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं और पारदर्शिता का पालन आवश्यक है। इससे गलतफहमियों की संभावना कम होती है और प्लेटफॉर्म की विश्वसनीयता भी बनी रहती है। डिजिटल मंचों की बढ़ती भूमिका को देखते हुए जवाबदेही और तकनीकी दक्षता दोनों को समान महत्व दिया जा रहा है।

    अब सभी की नजर मेटा की अगली प्रतिक्रिया पर है। यदि कंपनी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना पक्ष रखती है और आवश्यक स्पष्टीकरण देती है तो मामले की दिशा अलग हो सकती है। वहीं यदि समिति को जवाब संतोषजनक नहीं लगता या निर्धारित समय में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो संसदीय स्तर पर आगे की कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी, पारदर्शिता और नियामकीय अनुपालन को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

  • फ्री नहीं रहने वाला डिजिटल पेमेंट…. UPI से लेनदेन पर लगेगा शुल्क! संसद में आया बिल

    फ्री नहीं रहने वाला डिजिटल पेमेंट…. UPI से लेनदेन पर लगेगा शुल्क! संसद में आया बिल


    नई दिल्ली।
    मोदी सरकार (Modi Government) ने अपनी लोकप्रिय यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (Unified Payments Interface-UPI) सिस्टम पर व्यापारियों से शुल्क वसूलने की दिशा में एक और कदम बढ़ा दिया है। मंगलवार को संसद (Parliament) में भुगतान कानूनों में प्रस्तावित बदलाव पेश किए गए, जिससे यह संभावना और बढ़ गई है। हालांकि यह शुल्क व्यापारियों पर लगेगा, ग्राहकों पर नहीं, फिर भी यह बदलाव डिजिटल पेमेंट (Digital Payment) को प्रभावित कर सकता है।

    जानकारी के मुताबिक नीति निर्माता दो बड़े विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। पहला विकल्प है कि एक निश्चित राशि से अधिक के लेनदेन पर MDR लगाया जाए। दूसरा विकल्प है कि व्यापारी के वार्षिक कारोबार के आधार पर शुल्क तय किया जाए। सूत्रों के अनुसार, एक प्रस्ताव के तहत केवल बड़े व्यापारियों से शुल्क लिया जाएगा, जबकि उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के लिए UPI भुगतान मुफ्त रहेगा।


    कितना लग सकता है चार्ज

    सरकारी सूत्र के अनुसार, एक प्रस्ताव में 1.5 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार वाले व्यापारियों के लिए 2,000 रुपये से अधिक के ट्रांजैक्शन पर 0.3% से 0.5% MDR लगाने की बात कही गई है। जेफरीज की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के लेनदेन व्यापारियों की कुल लेनदेन संख्या का केवल 4% हैं, लेकिन कुल लेनदेन मूल्य का लगभग 67% इन्हीं से आता है।


    संशोधन विधेयक पेश

    वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम में संशोधन विधेयक पेश किया। उद्योग और नियामक सूत्रों के अनुसार, इस संशोधन से डिजिटल पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का कानूनी आधार बनेगा।

    हालांकि, अभी यह तय नहीं हुआ है कि शुल्क कितना होगा और यह किन लेनदेन पर लागू होगा। सरकारी सूत्रों ने नाम न छापने की शर्त पर यह जानकारी दी। वित्त मंत्रालय, रिजर्व बैंक और राष्ट्रीय भुगतान निगम ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।


    UPI का बाजार में दबदबा

    UPI दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम पेमेंट नेटवर्कों में से एक है। जुलाई में इसके जरिए 23.6 अरब लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य 29.9 लाख करोड़ रुपये वॉलमार्ट की फोनपे और गूगल की गूगल पे इस सिस्टम पर हावी हैं।


    फ्री UPI पर क्यों लगने जा रहा लगाम

    रॉयटर्स के मुताबिक उद्योग के अधिकारियों का लंबे समय से कहना है कि डिजिटल पेमेंट में ग्रोथ को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, क्योंकि UPI ट्रांजैक्शन पर पेमेंट कंपनियों को कोई शुल्क नहीं मिलता। इससे उनकी निवेश करने की क्षमता सीमित हो जाती है।


    MDR क्या होता है?

    MDR वह शुल्क है, जो व्यापारी बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को डिजिटल ट्रांजैक्शन प्रोसेस करने के लिए देते हैं। भारत में क्रेडिट कार्ड पर आमतौर पर लगभग 1.5% MDR लगता है, जबकि डेबिट कार्ड पर 0.9% तक का शुल्क होता है, लेकिन UPI लेनदेन पर अभी व्यापारियों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता।

  • बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल, कानून में बदलाव की कही बात

    बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर उठाए सवाल, कानून में बदलाव की कही बात

    नई दिल्ली । भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली, कर व्यवस्था और कानूनी जवाबदेही को लेकर केंद्र में बहस छेड़ दी है। संसद परिसर में मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों पर कई गंभीर सवाल उठाए और कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत मिलने वाले ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए।

    निशिकांत दुबे ने दावा किया कि प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत में बड़ा कारोबार करते हैं, लेकिन उनके अनुसार कर भुगतान उस अनुपात में नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कंपनियों की आय और टैक्स भुगतान के बीच बड़ा अंतर है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को भारत में अपने कारोबार और गतिविधियों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

    उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि कुछ मामलों में आपत्तिजनक और अवैध सामग्री को समय पर हटाने में प्लेटफॉर्म प्रभावी कार्रवाई नहीं करते। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ संगठनों और अभियानों को डिजिटल माध्यम पर असामान्य रूप से अधिक पहुंच मिलती है, जिससे पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

    भाजपा सांसद ने हाल के कुछ सामाजिक और राजनीतिक अभियानों का उल्लेख करते हुए कहा कि कम समय में कुछ संगठनों की व्यूअरशिप और डिजिटल पहुंच में तेज वृद्धि देखी गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह के मामलों में संबंधित प्लेटफॉर्म को स्पष्ट करना चाहिए कि कंटेंट की पहुंच और प्रसार किन आधारों पर निर्धारित होता है। उनके अनुसार इस विषय में अधिक पारदर्शिता आवश्यक है।

    निशिकांत दुबे ने वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क यानी वीपीएन के उपयोग का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके प्लेटफॉर्म पर कितने उपयोगकर्ता वीपीएन का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस प्रकार की जानकारी से डिजिटल गतिविधियों की बेहतर निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकती है।

    उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ अवसरों पर महत्वपूर्ण सार्वजनिक व्यक्तियों से जुड़े कंटेंट को प्लेटफॉर्म से हटाया गया, जिससे अभिव्यक्ति और निष्पक्षता को लेकर प्रश्न खड़े हुए। उनके अनुसार यदि किसी प्रकार की सामग्री हटाई जाती है तो उसके लिए स्पष्ट और समान मानदंड होने चाहिए ताकि किसी भी प्रकार के पक्षपात की आशंका न रहे।

    अपने वक्तव्य में निशिकांत दुबे ने तेलंगाना सरकार द्वारा सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ की गई कानूनी कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यदि प्लेटफॉर्म अपनी जिम्मेदारियों का पालन नहीं करते हैं तो सरकारों को कानूनी विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है। साथ ही उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत उपलब्ध ‘सेफ हार्बर’ प्रावधान की समीक्षा की आवश्यकता भी जताई।

    सेफ हार्बर वह कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को उपयोगकर्ताओं द्वारा साझा किए गए थर्ड पार्टी कंटेंट के लिए सीमित कानूनी सुरक्षा मिलती है, बशर्ते वे निर्धारित नियमों और कानूनी निर्देशों का पालन करें। फिलहाल सांसद के इन बयानों के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, डिजिटल नियमन और सेफ हार्बर व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

  • राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में तीखी नोकझोंक, खरगे और किरेन रिजिजू आमने-सामने, विपक्ष का जोरदार हंगामा

    राम मंदिर चढ़ावा विवाद पर संसद में तीखी नोकझोंक, खरगे और किरेन रिजिजू आमने-सामने, विपक्ष का जोरदार हंगामा

    नई दिल्ली । संसद के मानसून सत्र के दौरान मंगलवार को राम मंदिर चढ़ावा से जुड़े आरोपों को लेकर राज्यसभा में सरकार और विपक्ष के बीच तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार से जवाब की मांग करते हुए सदन में जोरदार हंगामा किया, जबकि सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया। लगातार शोर-शराबे के कारण राज्यसभा की कार्यवाही निर्धारित समय से पहले कई बार स्थगित करनी पड़ी।

    राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चर्चा के दौरान कहा कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन में केंद्र सरकार की भूमिका रही है और मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि चढ़ावे से जुड़े आरोपों के मामले में संबंधित एजेंसियों की ओर से क्या कार्रवाई की गई है। उन्होंने सरकार से इस विषय पर सदन में स्पष्ट जवाब देने की मांग की।

    खरगे के वक्तव्य का जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने अतीत में राम मंदिर आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों का विरोध किया था। रिजिजू ने आरोप लगाया कि अब वही दल इस मुद्दे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि सरकार किसी भी विषय पर तथ्यों के आधार पर जवाब देने के लिए तैयार है।

    सदन में लगातार हंगामे के कारण कार्यवाही पहले कुछ समय के लिए स्थगित की गई और दोबारा शुरू होने के बाद भी व्यवधान जारी रहने पर फिर स्थगन करना पड़ा। विपक्षी दलों का कहना था कि राम मंदिर चढ़ावे से जुड़े आरोपों पर विस्तृत चर्चा कराई जाए और सरकार अपना पक्ष स्पष्ट करे। वहीं सत्तापक्ष ने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने और राजनीतिक माहौल बनाने का आरोप लगाया।

    संसद भवन परिसर में भी इस मुद्दे को लेकर विपक्षी सांसदों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में कई विपक्षी नेता शामिल हुए और उन्होंने सरकार से कथित आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने तथा सदन में जवाब देने की मांग दोहराई। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने विभिन्न नारे लगाकर अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाया। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि संसद में महत्वपूर्ण विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं और विपक्ष को चर्चा के लिए सकारात्मक रुख अपनाना चाहिए।

    मॉनसून सत्र के दौरान विभिन्न राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार तथा विपक्ष के बीच लगातार टकराव देखने को मिल रहा है। ऐसे में राम मंदिर चढ़ावा विवाद भी संसद के प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो गया है। आने वाले दिनों में इस विषय पर दोनों पक्षों के बीच बहस और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। फिलहाल सदन के सुचारु संचालन और लंबित विधायी कार्यों को लेकर भी राजनीतिक गतिरोध बना हुआ है।

  • लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग

    लोकसभा में बढ़ा सियासी घमासान, शीर्ष नेतृत्व से जवाबदेही और ज्वलंत मुद्दों पर नियमबद्ध बहस की लगातार मांग

    नई दिल्ली । संसद के जारी मॉनसून सत्र के दौरान सत्तापक्ष और विपक्षी दलों के मध्य तल्खी लगातार बढ़ती जा रही है। मंगलवार को भी संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामे और नारेबाजी की पूरी संभावना बनी हुई है। विपक्षी दल विभिन्न ज्वलंत जनमुद्दों पर सरकार को घेरने की अपनी रणनीति पर पूरी मजबूती के साथ कायम हैं। उनका स्पष्ट रूप से कहना है कि जब तक इन अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत और नियमबद्ध विचार-विमर्श की अनुमति प्रदान नहीं की जाती तथा संबंधित मंत्रालयों की ओर से आधिकारिक जवाब प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक विधायी कामकाज का सुचारू रूप से संचालन हो पाना बेहद कठिन रहेगा। इसके कारण संसदीय कार्यप्रणाली पर अनिश्चितता के बादल गहरा गए हैं।

    विपक्षी गठबंधन ने अपनी रणनीतिक रूपरेखा को और अधिक धार देते हुए हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलित छात्रों पर हुई कथित पुलिस कार्रवाई तथा अयोध्या में राम मंदिर दान प्रक्रिया से जुड़े विवादों को प्राथमिक मुद्दे के रूप में उभारा है। विरोध प्रदर्शन में शामिल प्रतिनिधियों की प्रमुख मांग है कि देश के केंद्रीय गृह मंत्री स्वयं सदन के पटल पर उपस्थित होकर इस समूचे घटनाक्रम पर सरकार का स्पष्ट पक्ष रखें। इसके अतिरिक्त, मंदिर में अर्पित चढ़ावे तथा वित्तीय लेनदेन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर भी बिना किसी विलंब के स्वतंत्र और पारदर्शी चर्चा कराने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि जनसंशय दूर हो सके।

    संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व की सदन में निरंतर अनुपस्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की इस सर्वोच्च संस्था में जनता से सीधे जुड़े इतने महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री तथा गृह मंत्री का प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित रहना अत्यंत आवश्यक है। कांग्रेस समेत अन्य सहयोगी दलों का कहना है कि सरकार को विपक्ष के तर्कसंगत प्रश्नों का उत्तर देने से बचने के बजाय सकारात्मक रुख अपनाते हुए खुले संवाद की पहल करनी चाहिए, जिससे जारी गतिरोध को समाप्त किया जा सके।

    दूसरी तरफ, सत्तारूढ़ दल का मानना है कि निरंतर व्यवधान और विरोध के कारण देश से जुड़े कई अति आवश्यक विधायी कार्य प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि, इस भारी राजनीतिक खींचातान के मध्य भी लोकसभा में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में बढ़ोतरी से संबंधित महत्वपूर्ण कानून को पारित करा लिया गया। इसके साथ ही देश की बैंकिंग प्रणाली में आधुनिक डिजिटल तकनीक एवं क्लाउड आधारित रिकॉर्ड को कानूनी मान्यता प्रदान करने वाले एक नए बैंकिंग संशोधन विधेयक को भी पटल पर प्रस्तुत किया गया। सत्तापक्ष का दावा है कि विपक्ष जनकल्याणकारी कानूनों पर बहस करने के बजाय केवल व्यवधान पैदा कर रहा है।

    संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी रणनीति की तीखी आलोचना करते हुए दोहराया है कि सरकार नियमानुसार सभी जनहितकारी विषयों पर सार्थक और स्वस्थ बहस के लिए पूरी तरह तत्पर है। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्षी दल वास्तव में गंभीर चर्चा से भाग रहे हैं और केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने के उद्देश्य से नारेबाजी का सहारा ले रहे हैं। उनका तर्क था कि संसद को राजनीतिक पैंतरेबाज़ी का केंद्र बनाने के स्थान पर जनहित में विधेयकों को विचार-विमर्श के पश्चात पारित कराने में रचनात्मक योगदान दिया जाना चाहिए।

    इसी बीच, संसद भवन परिसर स्थित मकर द्वार के निकट विभिन्न विपक्षी दलों के सांसदों ने एकजुट होकर जोरदार प्रदर्शन किया और तख्तियां दिखाकर नारेबाजी की। मध्य प्रदेश समेत देशभर के राजनीतिक विश्लेषक और आम नागरिक भी इस निरंतर जारी संसदीय गतिरोध पर अपनी नजर बनाए हुए हैं। बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठकों में भी दोनों पक्षों के बीच न्यूनतम सहमति न बन पाने के कारण यह स्पष्ट है कि मॉनसून सत्र के आगामी दिनों में भी सामान्य कामकाज बहाल होना काफी मुश्किल दिखाई दे रहा है।

  • राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    राम मंदिर चढ़ावा चोरी मुद्दे पर संसद परिसर में विपक्ष का अनोखा प्रदर्शन, साधु के वेश में दिखे पप्पू यादव और राहुल गांधी ने दिया चढ़ावा

    नई दिल्ली । अयोध्या राम मंदिर से जुड़े चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर संसद परिसर में विपक्षी दलों ने अनोखे अंदाज में विरोध प्रदर्शन किया। विपक्षी सांसदों ने नाटक के माध्यम से कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा। इस दौरान पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव साधु के वेश में दिखाई दिए, जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत कई विपक्षी सांसद प्रदर्शन में शामिल हुए।

    प्रदर्शन के दौरान संसद परिसर में एक प्रतीकात्मक दान पेटी रखी गई थी। विपक्षी नेताओं ने नाटक के जरिए अपनी बात रखने की कोशिश की। इस दौरान राहुल गांधी सहित अन्य सांसद दान पेटी में चढ़ावा डालते हुए नजर आए। वहीं, प्रदर्शन के एक हिस्से में पप्पू यादव साधु के रूप में दान पेटी लेकर जाते हुए दिखाई दिए, जिसके बाद अन्य सांसदों ने उन्हें रोकने और विरोध जताने का अभिनय किया।

    विपक्षी सांसदों ने इस प्रदर्शन के जरिए सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की। नेताओं का कहना था कि वे विभिन्न मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे हैं और संसद के भीतर तथा बाहर जनता से जुड़े मामलों को उठाते रहेंगे। प्रदर्शन के दौरान विपक्षी सांसदों ने सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारेबाजी भी की।

    प्रदर्शन में राम मंदिर चढ़ावा विवाद के साथ-साथ अन्य मुद्दों को भी जोड़ा गया। विपक्षी सांसदों ने पेपर लीक जैसे मामलों का भी जिक्र करते हुए सरकार से जवाब मांगने की बात कही। प्रदर्शन के दौरान लगाए गए नारों में चढ़ावा चोरी और पेपर चोरी जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।

    इस पूरे घटनाक्रम पर लोकसभा अध्यक्ष ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि संसद और उसके परिसर की गरिमा बनाए रखना सभी सांसदों की जिम्मेदारी है। उन्होंने सदस्यों को सलाह दी कि संसद परिसर में ऐसे तरीके अपनाने से बचना चाहिए, जिससे सदन की मर्यादा प्रभावित हो।

    लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों से संसदीय परंपराओं और नियमों का पालन करने की अपील की। उन्होंने कहा कि संसद लोकतांत्रिक बहस और चर्चा का स्थान है, इसलिए विरोध दर्ज कराने के दौरान भी गरिमा और अनुशासन बनाए रखना जरूरी है।

    घटना के बाद संसद की कार्यवाही कुछ समय के लिए स्थगित भी हुई। हालांकि विपक्षी नेताओं ने अपने प्रदर्शन को लोकतांत्रिक अधिकार बताते हुए कहा कि वह जनता से जुड़े मुद्दों को उठाते रहेंगे।

    राजनीतिक जानकारों के अनुसार, संसद सत्र के दौरान विपक्ष अक्सर अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाता है। इस बार राम मंदिर चढ़ावा विवाद को लेकर किए गए प्रतीकात्मक प्रदर्शन ने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है।

    वहीं, सत्ता पक्ष की ओर से संसदीय गरिमा और विरोध के तरीकों को लेकर सवाल उठाए जा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद की बहस और राजनीतिक बयानबाजी में चर्चा का विषय बना रह सकता है।

  • पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की तैयारी, 10 साल जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान पर सियासत तेज

    पेपर लीक रोकने के लिए सख्त कानून की तैयारी, 10 साल जेल और 50 लाख जुर्माने के प्रावधान पर सियासत तेज

    नई दिल्ली । देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। एंटी-पेपर लीक संशोधन विधेयक, 2026 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल गई है। राज्यसभा में लंबी चर्चा के बाद विधेयक पारित किया गया। अब इसे राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा और स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून के रूप में लागू हो जाएगा।

    नए कानून में परीक्षा से जुड़े पेपर लीक और अन्य गंभीर अनियमितताओं पर सख्ती बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। इसके तहत दोषी पाए जाने वाले लोगों को 10 साल तक की सजा और 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है। सरकार का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल करना और पेपर लीक जैसी घटनाओं पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करना है।

    विधेयक पारित होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो संदेश जारी कर इसे परीक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि सरकार छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने और परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री ने पेपर लीक जैसी गतिविधियों में शामिल लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का संदेश दिया।

    हालांकि, प्रधानमंत्री के बयान के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार और प्रधानमंत्री पर टिप्पणी करते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने परीक्षा व्यवस्था और कानून की प्रभावशीलता को लेकर सवाल उठाए।

    राज्यसभा में इस विधेयक पर करीब सात घंटे तक चर्चा हुई। चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठाए। कुछ दलों ने संशोधन प्रस्ताव भी पेश किए, जिन्हें सदन में मंजूरी नहीं मिली।

    केंद्रीय कार्मिक मामलों के मंत्री जितेंद्र सिंह ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि सरकार पेपर लीक जैसी घटनाओं को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने कहा कि यह कानून परीक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है।

    राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) को लेकर उठाए गए सवालों पर सरकार ने कहा कि देश में पेपर लीक के ज्यादातर मामले राज्य स्तरीय भर्ती और परीक्षा एजेंसियों से जुड़े रहे हैं। सरकार के अनुसार, परीक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए तकनीक के इस्तेमाल, सुरक्षा मानकों और निगरानी तंत्र को मजबूत किया जा रहा है।

    इस संशोधन विधेयक के जरिए वर्ष 2024 में बनाए गए कानून को और प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है। इसमें पेपर लीक, परीक्षा में धोखाधड़ी और संगठित तरीके से गड़बड़ी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान शामिल है। साथ ही मामलों की तेजी से जांच और सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था बनाने पर भी जोर दिया गया है।

    पेपर लीक की घटनाएं लंबे समय से छात्रों और अभ्यर्थियों के बीच चिंता का कारण रही हैं। कई बार परीक्षाओं के रद्द होने और परिणामों में देरी से लाखों छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ा है। ऐसे में सरकार का दावा है कि नया कानून परीक्षा प्रणाली में भरोसा बढ़ाने और भविष्य में होने वाली गड़बड़ियों को रोकने में मदद करेगा।

    अब सभी की नजर राष्ट्रपति की मंजूरी पर है। इसके बाद यह कानून लागू होने के साथ ही परीक्षा संबंधी अपराधों पर कार्रवाई के लिए नया कानूनी ढांचा प्रभावी हो जाएगा।

  • E20 पेट्रोल पर सरकार का बड़ा दावा, वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद ही देशभर में लागू किया गया ईंधन

    E20 पेट्रोल पर सरकार का बड़ा दावा, वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद ही देशभर में लागू किया गया ईंधन

     नई दिल्ली:  देशभर में एथेनॉल मिश्रित ई20 पेट्रोल को लेकर उठ रहे सवालों के बीच केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि इस ईंधन को बिना पर्याप्त वैज्ञानिक परीक्षण के लागू नहीं किया गया। सरकार ने कहा कि ई20 पेट्रोल को चरणबद्ध तरीके से लागू करने से पहले व्यापक लैब परीक्षण, वास्तविक परिस्थितियों में फील्ड ट्रायल और ऑटोमोबाइल उद्योग समेत सभी संबंधित पक्षों से विस्तृत परामर्श किया गया था। इन सभी परीक्षणों में यह पाया गया कि निर्धारित मानकों के तहत ई20 पेट्रोल नए और पुराने दोनों प्रकार के वाहनों के लिए सुरक्षित है और इससे इंजन या अन्य पुर्जों पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पड़ता।

    लोकसभा में एक लिखित प्रश्न के उत्तर में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने बताया कि एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल कार्यक्रम को नीति आयोग, ऑटोमोबाइल कंपनियों, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM), इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम (IIP) और अन्य तकनीकी संस्थानों के सहयोग से तैयार किया गया। सरकार ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में वैज्ञानिक अध्ययन और विशेषज्ञों की सलाह को प्राथमिकता दी गई।

    सरकार के मुताबिक ई20 ईंधन लागू करने से पहले ARAI, SIAM, इंडियन ऑयल, IIP और प्रमुख वाहन निर्माताओं ने इंजन की मजबूती, ड्राइविंग प्रदर्शन, स्टार्टिंग क्षमता, ईंधन दक्षता, जंग-रोधी क्षमता, उत्सर्जन और विभिन्न ऑटो पार्ट्स की अनुकूलता जैसे सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तृत परीक्षण किए। प्रयोगशाला के साथ-साथ वास्तविक सड़कों पर भी लंबे समय तक वाहनों का परीक्षण किया गया। इन सभी अध्ययनों में यह निष्कर्ष सामने आया कि ई20 पेट्रोल का उपयोग सुरक्षित है और इससे वाहन के प्रदर्शन में कोई उल्लेखनीय गिरावट नहीं आती।

    सरकार ने विशेष रूप से पुराने वाहनों को लेकर फैली आशंकाओं को भी खारिज किया। संसद में बताया गया कि परीक्षणों के दौरान पुराने वाहनों में भी इंजन, ईंधन प्रणाली या अन्य पुर्जों में किसी प्रकार की असामान्य घिसावट या जंग नहीं पाई गई। सरकार ने कहा कि देश में पिछले साढ़े तीन वर्षों से ई15 से अधिक मिश्रण वाला पेट्रोल और लगभग ढाई वर्षों से ई19 से ई20 मिश्रित पेट्रोल का बड़े स्तर पर इस्तेमाल हो रहा है। इस दौरान करोड़ों वाहन इन ईंधनों पर चले हैं, लेकिन एथेनॉल मिश्रण के कारण इंजन खराब होने या बड़े पैमाने पर तकनीकी समस्या का कोई सत्यापित मामला सामने नहीं आया।

    सरकार के अनुसार भारत में प्रतिदिन लगभग आठ करोड़ वाहन पेट्रोल पंपों पर ईंधन भरवाते हैं, जिनमें करीब 80 प्रतिशत पेट्रोल वाहन हैं। बीते वर्षों में 20 करोड़ से अधिक दोपहिया वाहन और तीन करोड़ से ज्यादा पेट्रोल कारें एथेनॉल मिश्रित ईंधन का उपयोग कर चुकी हैं। वाहन निर्माताओं के सर्विस रिकॉर्ड में भी ई20 के कारण इंजन या अन्य पार्ट्स में किसी असामान्य नुकसान की पुष्टि नहीं हुई है।

    सरकार ने यह भी बताया कि सभी प्रमुख वाहन निर्माता अभी भी ई20 ईंधन का उपयोग करने वाले वाहनों पर वारंटी दे रहे हैं। एक प्रमुख कार निर्माता ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 2.84 करोड़ वाहनों की सर्विसिंग की, जिनमें लगभग 1.5 करोड़ ऐसे वाहन भी शामिल थे जो मूल रूप से ई20 के लिए प्रमाणित नहीं थे। इसके बावजूद कंपनी को एथेनॉल मिश्रण के कारण जंग, पुर्जों की आयु कम होने या किसी बड़े तकनीकी नुकसान की शिकायत नहीं मिली। इसी तरह प्रमुख दोपहिया वाहन निर्माताओं और अन्य कंपनियों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि लंबे समय तक ई20 के उपयोग के बावजूद किसी गंभीर तकनीकी समस्या का प्रमाण नहीं मिला।

    सरकार का कहना है कि ई20 पेट्रोल का एक बड़ा फायदा पर्यावरण संरक्षण भी है। एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर अधिक होने के कारण आधुनिक इंजन बेहतर प्रदर्शन करते हैं और कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है। साथ ही इसकी ऊष्मा अवशोषण क्षमता अधिक होने से ईंधन का दहन अधिक प्रभावी होता है, जिससे इंजन की कार्यक्षमता में सुधार देखा गया है। सरकार ने दोहराया कि ई20 ईंधन को लागू करने की पूरी प्रक्रिया वैज्ञानिक तथ्यों, उद्योग की सहमति और व्यापक परीक्षणों पर आधारित रही है।

  • 8वें वेतन आयोग पर संसद में पहली बार फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट पर चर्चा, सरकार ने दिया बड़ा जवाब

    8वें वेतन आयोग पर संसद में पहली बार फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट पर चर्चा, सरकार ने दिया बड़ा जवाब

    नई दिल्ली। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे आठवें वेतन आयोग को लेकर चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं। वेतन वृद्धि, फिटमेंट फैक्टर और फैमिली यूनिट जैसे मुद्दों पर कर्मचारी संगठनों की ओर से लगातार मांगें उठाई जा रही हैं। इसी बीच संसद में पहली बार इन दोनों अहम विषयों पर विस्तार से सवाल-जवाब हुए, जिससे लाखों कर्मचारियों और पेंशनर्स की निगाहें आयोग की आगामी प्रक्रिया पर टिक गई हैं।

    संसद में हुई चर्चा के दौरान सरकार से पूछा गया कि आठवें वेतन आयोग में फिटमेंट फैक्टर तय करते समय किन मानकों को आधार बनाया जाएगा और क्या फैमिली यूनिट की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव पर विचार किया जा रहा है। सरकार ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि इन सभी विषयों पर अंतिम निर्णय आयोग की सिफारिशों के आधार पर ही लिया जाएगा। आयोग को स्वतंत्र रूप से अपनी रिपोर्ट तैयार करने और सरकार को सुझाव देने का अधिकार दिया गया है।

    फिटमेंट फैक्टर वह महत्वपूर्ण गुणांक होता है जिसके आधार पर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के मूल वेतन और पेंशन में संशोधन किया जाता है। नए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर पुराने मूल वेतन को निर्धारित फिटमेंट फैक्टर से गुणा कर नया वेतन तय किया जाता है। यही कारण है कि कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी मांग फिटमेंट फैक्टर को अधिक रखने की है ताकि वेतन में उल्लेखनीय वृद्धि हो सके।

    वर्तमान में विभिन्न कर्मचारी संगठनों की ओर से फिटमेंट फैक्टर को 3.68 तक रखने की मांग की जा रही है। वहीं कुछ अन्य संगठन इसे 3 से 3.5 के बीच निर्धारित करने की पैरवी कर रहे हैं। उनका तर्क है कि बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की लागत और कर्मचारियों की आर्थिक जरूरतों को देखते हुए बेहतर फिटमेंट फैक्टर तय किया जाना चाहिए। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है।

    फैमिली यूनिट को लेकर भी कर्मचारी और पेंशनर संगठनों ने अपनी मांग दोहराई है। उनकी मांग है कि वर्तमान व्यवस्था में परिवार की परिभाषा का विस्तार किया जाए और परिवार के सदस्यों की संख्या तीन से बढ़ाकर पांच की जाए, जिसमें माता-पिता को भी शामिल किया जाए। संसद में इस मुद्दे को भी उठाया गया और सरकार से इस संबंध में नीति स्पष्ट करने का आग्रह किया गया। हालांकि सरकार ने कहा कि इस विषय पर भी आयोग अपनी सिफारिशों के आधार पर विचार करेगा।

    सरकार ने यह भी बताया कि आठवें वेतन आयोग की बैठकें लगातार जारी हैं और आयोग विभिन्न राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारियों और पेंशनर्स के प्रतिनिधियों से सुझाव प्राप्त कर रहा है। आगामी बैठक 7 अगस्त को दिल्ली में आयोजित होगी। इसके बाद सितंबर महीने में चेन्नई और पुडुचेरी में भी बैठकें प्रस्तावित हैं। आयोग ने संबंधित संगठनों से आग्रह किया है कि वे केवल अपने निर्धारित क्षेत्र की बैठकों में ही भाग लें, क्योंकि आयोग स्वयं विभिन्न राज्यों का दौरा कर सुझाव एकत्र कर रहा है।

    फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि फिटमेंट फैक्टर कितना तय होगा और वेतन में वास्तविक बढ़ोतरी कितनी होगी। सरकार ने साफ किया है कि आयोग की अंतिम रिपोर्ट मिलने के बाद ही इस पर निर्णय लिया जाएगा। ऐसे में फिलहाल सभी की नजरें आयोग की आगामी बैठकों और अंतिम सिफारिशों पर बनी हुई हैं।