Tag: Politics

  • शशि थरूर का बदला रुख, कांग्रेस का खुला समर्थन, मनरेगा पर राहुल गांधी के संदेश को किया साझा

    शशि थरूर का बदला रुख, कांग्रेस का खुला समर्थन, मनरेगा पर राहुल गांधी के संदेश को किया साझा


    नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने हाल के दिनों में अपने राजनीतिक रुख में बदलाव दिखाया है और पार्टी नेतृत्व के साथ अपने संबंधों में सुधार के संकेत दिए हैं। बीते कुछ समय से थरूर और कांग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद की अटकलें आम रही हैं। विशेष रूप से ऑपरेशन सिंदूर के बाद थरूर ने कई मौकों पर मोदी सरकार की तारीफ की थी जिससे राजनीतिक गलियारों में उनकी नाराजगी और पार्टी से दूरी की चर्चाएं शुरू हो गई थीं।
    हालांकि अब शशि थरूर ने अपने रुख में बदलाव किया है। उन्होंने पार्टी का खुलकर समर्थन करना शुरू कर दिया है और हाल ही में राहुल गांधी द्वारा मनरेगा योजना पर पोस्ट साझा किया है। थरूर ने इसे री-शेयर करते हुए लिखा कि मनरेगा देश की सबसे सफल विकास योजनाओं में शामिल रही है और ग्रामीण गरीबों के लिए यह एक अहम सामाजिक सुरक्षा कवच का काम करती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस योजना को खत्म करना पीछे की ओर उठाया गया कदम होगा जिसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। मनरेगा योजना को लेकर सियासी घमासान भी तेज हो गया है।
    मोदी सरकार ने मनरेगा की जगह VB-GRAM G बिल संसद में लाकर पारित किया जिसे विपक्षी दल ग्रामीण हितों के खिलाफ मान रहे हैं। राहुल गांधी ने अपने पोस्ट में कहा कि यह नया कानून मनरेगा की अधिकार और मांग पर आधारित गारंटी व्यवस्था को समाप्त करता है और इसे केंद्र से संचालित राशन-आधारित योजना में बदल देता है। शशि थरूर ने राहुल गांधी के इस संदेश को साझा कर इसे समर्थन दिया।राहुल गांधी ने पोस्ट में मनरेगा के ग्रामीण मजदूरों और महिलाओं पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस योजना ने ग्रामीणों को अपने काम का सही मूल्य दिलाने में मदद की मजदूरी में सुधार किया पलायन को कम किया और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण किया। उन्होंने चेतावनी दी कि VB-GRAM G इन उपलब्धियों को कमजोर करता है और कोविड काल में मनरेगा की उपयोगिता का उदाहरण देते हुए कहा कि इसने लाखों लोगों को भूख और कर्ज से बचाया।
    थरूर का रुख पहले मोदी सरकार की सराहना करने वाला था लेकिन अब वे पार्टी के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं। हाल ही में केरल निकाय चुनावों के दौरान उन्होंने भाजपा की तारीफ की थी लेकिन उसके बाद कई मौकों पर कांग्रेस का समर्थन किया। लोकसभा में भारत के रुपांतरण के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन शांति विधेयक 2025 पर चर्चा में उन्होंने इसके खामियों को उजागर किया और कहा कि यह रेडियोधर्मी पदार्थों और परमाणु अपशिष्ट से जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज करता है। इसके अलावा थरूर ने केरल अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव IFFK में 19 फिल्मों के प्रदर्शन के लिए केंद्र सरकार द्वारा मंजूरी न देने की आलोचना की। उन्होंने इसे सिनेमाई अशिक्षा और नौकरशाही की अत्यधिक सतर्कता करार दिया। थरूर ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से अनुमति देने का अनुरोध भी किया। साथ ही उन्होंने फिल्म अभिनेता देव आनंद की फिल्म हरे रामा हरे
  • बंगाल चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान कहा 'कांग्रेस की हमें नहीं जरूरत इंडिया गठबंधन पर भी दिया बयान'

    बंगाल चुनाव से पहले अभिषेक बनर्जी का बड़ा बयान कहा 'कांग्रेस की हमें नहीं जरूरत इंडिया गठबंधन पर भी दिया बयान'


    नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस TMC के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल में चुनाव जीतने के लिए उनकी पार्टी को कांग्रेस की जरूरत नहीं है। हालांकि अभिषेक ने यह भी साफ किया कि तृणमूल कांग्रेस अब भी इंडिया गठबंधन का हिस्सा है।

    अभिषेक बनर्जी ने बुधवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कहा कांग्रेस के पास बंगाल में ऐसा कुछ नहीं है जिसकी हमें जरूरत हो या जो वह हमें दे सके। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सिर्फ दो सीटों पर जीत हासिल की जबकि तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें गठबंधन का प्रस्ताव दिया था जिसे कांग्रेस ने ठुकरा दिया। अभिषेक ने कहा इसका परिणाम सबके सामने है उनकी सीट अब घटकर एक रह गई है।

    अभिषेक ने यह भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस के साथ गठबंधन पर कोई भी निर्णय ममता बनर्जी ही लेंगी। उन्होंने कहा जब पार्टी कोई फैसला लेगी तो आपको पता चल जाएगा। फिलहाल कांग्रेस से कोई गठबंधन नहीं है।
    इसके साथ ही अभिषेक बनर्जी ने केंद्र सरकार पर भी हमला किया और मनरेगा का नाम बदलने के मुद्दे पर कहा कि इसका नाम बदलने से कोई फायदा नहीं होगा। उन्होंने सरकार से पश्चिम बंगाल को बकाया राशि का भुगतान करने की मांग की। केंद्र सरकार को पश्चिम बंगाल का बकाया भुगतान करना चाहिए। मनरेगा का नाम बदलने से कोई फायदा नहीं होगा उन्होंने कहा।

    अभिषेक ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह बंगाल के खिलाफ काम कर रही है और गांधीजी के नाम को हटाना बंगाल विरोधी कदम है। उन्होंने कहा गांधीजी को ‘महात्मा’ की उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने दी थी इसलिए बंगाल से गांधीजी का नाम हटाना गलत है।इस बयान ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को निशाने पर लिया है और यह आगामी विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक रणनीतियों का इशारा है। अब यह देखना होगा कि ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस क्या कदम उठाती है और कांग्रेस के साथ गठबंधन का कोई नया मोड़ आता है या नहीं।

  • मणिपुर में फिर बढ़ा तनाव गोलीबारी के बाद सुरक्षा बलों को किया गया अलर्ट; सरकार बनाने की कयावद जारी

    मणिपुर में फिर बढ़ा तनाव गोलीबारी के बाद सुरक्षा बलों को किया गया अलर्ट; सरकार बनाने की कयावद जारी


    नई दिल्ली । मणिपुर में मंगलवार रात हुई गोलीबारी के बाद एक बार फिर राज्य में तनाव का माहौल बन गया है। बिष्णुपुर जिले के बाहरी इलाकों में खासकर चूड़ाचांदपुर जिले की सीमा से लगे तोरबंग और फौगाकचाओ इखाई इलाकों के पास कई बार गोलीबारी हुई जिससे स्थानीय लोगों में दहशत फैल गई है। अधिकारियों के मुताबिक गोलीबारी के कारणों और इसके मकसद का पता लगाने की कोशिश की जा रही है।

    घटना के बाद सुरक्षा बलों को घटनास्थल पर भेजा गया और एहतियात के तौर पर अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में ताजा गोलीबारी ने पहले से भड़क चुके जातीय संघर्ष को और उग्र बना दिया है। मणिपुर में 3 मई 2023 से जारी हिंसा के बाद यह पहली बार नहीं है जब गोलीबारी की घटना सामने आई है।

    इस बीच राज्य में सरकार गठन की कवायद भी जारी है। बीजेपी नेतृत्व ने मणिपुर में स्थिरता लाने के लिए राज्य के बीजेपी विधायकों के साथ कई दौर की बातचीत की है। इनमें कुकी और मैतेई समुदाय के बीजेपी विधायक भी शामिल हैं। मणिपुर विधानसभा के स्पीकर सत्यब्रत और पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह समेत 34 विधायक हाल ही में पार्टी नेतृत्व से मिलने के लिए एक साथ बैठे थे। यह मुलाकातें हिंसा के बाद पहली बार हुई थीं जब दोनों समुदायों के विधायक एक साथ बातचीत में शामिल हुए थे।

    राज्य में जातीय हिंसा के कारण स्थिति गंभीर बनी हुई है और सरकार गठन को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। बीजेपी नेतृत्व का उद्देश्य मणिपुर में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करते हुए राज्य में एक मजबूत और समावेशी सरकार का गठन करना है।बीजेपी के नेताओं का कहना है कि विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास बहाली और समझौते के आधार पर ही राज्य में शांति की स्थिति बहाल की जा सकती है। हालांकि मणिपुर में संघर्ष की जड़ें गहरी हैं और हालात की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा कई बार सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाई जा चुकी है। मणिपुर में बढ़ती हिंसा और राजनीतिक अस्थिरता के बीच राज्य के लिए आगामी समय में स्थिरता लाना एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

  • हिजाब हटाने को लेकर विवाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से माफी की मांग इमारत-ए-शरिया के सचिव भड़के

    हिजाब हटाने को लेकर विवाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से माफी की मांग इमारत-ए-शरिया के सचिव भड़के


    पटना । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला आयुष चिकित्सक के चेहरे से हिजाब हटाने का विवाद तूल पकड़ता जा रहा है। इस घटना पर अब इमारत-ए-शरिया के सचिव मौलाना मुफ्ती मोहम्मद सईदउर रहमान कासमी ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री को ऐसा नहीं करना चाहिए था और इस कदम की सख्त निंदा करते हुए उन्होंने नीतीश कुमार से माफी की मांग की है।

    घटना उस समय की है जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक कार्यक्रम में नवनियुक्त आयुष चिकित्सकों को नियुक्ति पत्र दे रहे थे। कार्यक्रम के दौरान जब नुसरत परवीन नामक महिला चिकित्सक की बारी आई तो वह हिजाब पहने हुए थीं। मुख्यमंत्री ने यह देखकर कहा यह क्या है और फिर महिला के चेहरे से हिजाब हटा दिया। इससे महिला असहज हो गई और एक अधिकारी ने जल्दी से उन्हें एक और कर दिया। इस घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया जिस पर इमारत-ए-शरिया के सचिव ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

    मौलाना रहमान कासमी ने कहा कि पर्दा महिलाओं और समाज की इज्जत है और हिजाब को हटाना महिला का अपमान है। मुख्यमंत्री को ऐसा नहीं करना चाहिए था क्योंकि यह महिलाओं की इज्जत और गरिमा की तौहीन है। उन्होंने यह भी कहा कि नीतीश कुमार को माफी मांगनी चाहिए क्योंकि उन्होंने महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाई है।

    मुख्यमंत्री कार्यालय ने हालांकि इस घटना पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन यह मामला अब राजनीति में भी गहरे विवाद का कारण बन गया है। विपक्षी दलों खासकर राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने इस वीडियो को साझा करते हुए इसे मुख्यमंत्री की मानसिक स्थिति पर सवाल उठाया है। राजद ने एक्स पर पोस्ट किया नीतीश जी का क्या हो गया है अब उनकी मानसिक स्थिति पूरी तरह से अस्थिर हो गई है।

    मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार सरकार ने हाल ही में 685 आयुर्वेद 393 होम्योपैथी और 205 यूनानी पद्धति के चिकित्सकों को नियुक्त किया था जिनमें से कुछ को मंच से नियुक्ति पत्र सौंपे गए थे। हालांकि यह घटना और इसके बाद की प्रतिक्रिया राज्य की राजनीति में नई बहस का कारण बन गई है। विपक्षी नेताओं ने इसे नीतीश कुमार के विचारधारा परिवर्तन के रूप में भी देखा है और इसपर तीखे हमले किए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद आने वाले समय में बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है।

  • पूर्व डीजीपी आर श्रीलेखा बनीं तिरुवनंतपुरम के पहले बीजेपी मेयर उम्मीदवार वाम मोर्चे को दी हार

    पूर्व डीजीपी आर श्रीलेखा बनीं तिरुवनंतपुरम के पहले बीजेपी मेयर उम्मीदवार वाम मोर्चे को दी हार


    नई दिल्ली । केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी और पूर्व डीजीपी आर श्रीलेखा ने तिरुवनंतपुरम में हुए निकाय चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। उन्होंने संस्थामंगलम डिवीजन में बड़ी जीत हासिल की है जिससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी उन्हें तिरुवनंतपुरम नगर निगम का मेयर बना सकती है। यह चुनाव केरल की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है खासकर तब जब बीजेपी ने एलडीएफ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा को हराकर नगर निगम में सत्ता हासिल की है। एलडीएफ को 40 साल बाद इस नगर निगम से बाहर किया गया है।

    लेखा का राजनीतिक सफर

    आर श्रीलेखा ने 2024 में बीजेपी जॉइन की थी और इसके बाद उन्होंने नगर निगम चुनाव में वॉर्ड सदस्य के रूप में चुनावी मैदान में उतरने का निर्णय लिया। श्रीलेखा की जीत ने यह साबित कर दिया कि जनता ने उनकी मेहनत और प्रयासों को सराहा है। वह पार्टी के फैसले को सम्मान देने का बयान देती हैं और कहती हैं कि वह तिरुवनंतपुरम में बीजेपी की पहली महिला मेयर बनने को लेकर खुश हैं अगर पार्टी उन्हें यह जिम्मेदारी देती है।

    एलडीएफ और कांग्रेस की आलोचनाओं के बावजूद जीत

    श्रीलेखा ने इस दौरान यह भी कहा कि जब उनकी उम्मीदवारी की घोषणा हुई थी तब एलडीएफ और कांग्रेस ने उनकी कड़ी आलोचना की थी। दोनों पार्टियों ने उनके खिलाफ कई आरोप लगाए थे लेकिन श्रीलेखा ने जनता के समर्थन को धन्यवाद दिया और कहा कि उन्होंने पार्टी विरोधियों को उचित जवाब दिया है।

    तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव के परिणाम

    शनिवार को हुए चुनाव परिणामों के बाद यह साफ हो गया कि बीजेपी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरने में सफलता प्राप्त की है। बीजेपी ने 101 सदस्यीय नगर निगम में 50 वॉर्डों में जीत हासिल की है जबकि एलडीएफ को सिर्फ 29 सीटें मिली हैं। कांग्रेस की अगुआई वाली यूडीएफ को 19 सीटें मिलीं। यह परिणाम बीजेपी की ताकत और पार्टी के लिए केरल में एक नई शुरुआत का प्रतीक है।

    आर श्रीलेखा का आईपीएस करियर

    आर श्रीलेखा ने जनवरी 1987 में केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी के तौर पर सेवा शुरू की थी। उन्होंने अपने करियर में कई अहम पदों पर कार्य किया जिनमें सीबीआई केरल क्राइम ब्रांच विजिलेंस फायर फोर्स और मोटर व्हीकल डिपार्टमेंट शामिल हैं। 2017 में वह केरल की डीजीपी बनीं और इसके बाद उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए जाना गया। उनके सीबीआई कार्यकाल के दौरान उन्हें “रेड श्रीलेखा” का उपनाम भी मिला था क्योंकि वह बिना किसी डर के छापे मारती थीं और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कदम उठाती थीं।

    राजनीति में कदम

    रिटायरमेंट के बाद आर श्रीलेखा ने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। वह अक्सर सार्वजनिक मामलों में अपनी राय रखती रहीं जैसे कि अभिनेता दिलीप पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों और कांग्रेस नेता राहुल मामकूटाथिल पर केस में देरी को लेकर सवाल उठाना। अक्टूबर 2024 में उन्होंने औपचारिक रूप से बीजेपी जॉइन की और अब चर्चा है कि पार्टी उन्हें तिरुवनंतपुरम नगर निगम का मेयर बना सकती है।

    आर श्रीलेखा की तिरुवनंतपुरम में मिली जीत न केवल उनके राजनीतिक करियर की सफलता का प्रतीक है बल्कि यह केरल की राजनीति में भी एक नए युग की शुरुआत का संकेत देती है। अगर उन्हें बीजेपी का मेयर बनाया जाता है तो यह केरल में पार्टी के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी खासकर तब जब राज्य में वाम मोर्चे के कई दशकों से कायम रहे प्रभुत्व को चुनौती मिल रही है।

  • मध्य प्रदेश में पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण विवाद कर्मचारियों और भर्तियों पर गहरा असर

    मध्य प्रदेश में पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण विवाद कर्मचारियों और भर्तियों पर गहरा असर



    भोपाल ।
    मध्य प्रदेश में पदोन्नति और ओबीसी आरक्षण जैसे मुद्दे लंबे समय से विवादों में घिरे हुए हैं। इन मुद्दों को लेकर न केवल सरकारी कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो गया हैबल्कि राज्य में सरकारी नौकरी और भर्ती प्रक्रियाएं भी प्रभावित हो रही हैं। विशेष रूप सेराज्य सरकार की ओर से समय-समय पर किए गए प्रयासों के बावजूद इन मुद्दों का समाधान नहीं हो सका है। यह स्थिति राज्य के कर्मचारियों के लिए बेहद कठिन और निराशाजनक बन गई है।

    पदोन्नति का मुद्दा

    मध्य प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों के लिए पदोन्नति एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों मेंपदोन्नति से संबंधित मामलों ने अदालतों का रुख किया है और इन विवादों के कारण राज्य सरकार को कई बार अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा है। नए पदोन्नति नियमों को लागू किया गया थालेकिन ओबीसी आरक्षण के मामले में कानूनी अड़चनें सामने आ गईंजिससे यह मामला फिर से अदालतों में चला गया। इसके परिणामस्वरूपराज्य के 80 हजार से अधिक सरकारी कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो गए। इस स्थिति ने कर्मचारियों के बीच असंतोष और निराशा को बढ़ावा दिया है।

    ओबीसी आरक्षण का मुद्दा

    ओबीसी आरक्षण भी एक बड़ा विवादित मुद्दा बन चुका है। मध्य प्रदेश में ओबीसी समुदाय के लिए 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। यह कदम 2019 के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक लाभ के लिए उठाया गया था। हालांकिइस फैसले के बाद भी ओबीसी को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका हैक्योंकि मामला कोर्ट में विचाराधीन है। कोर्ट में लंबित होने के कारण राज्य में कई पदों पर भर्ती प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इससे न केवल ओबीसी समुदायबल्कि सामान्य वर्ग और अनुसूचित जाति/जनजाति वर्ग के कर्मचारियों के लिए भी असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

    भर्तियों पर प्रभाव

    पदोन्नति और आरक्षण के विवादों के चलते सरकारी भर्तियों पर भी गहरा असर पड़ा है। कई पदों पर भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ी हुई है और उम्मीदवारों को इसका नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप राज्य में सरकारी सेवा में रिक्तियों की संख्या में वृद्धि हो गई हैलेकिन भर्ती प्रक्रिया की अड़चनों के कारण इन रिक्तियों को भरा नहीं जा सका है।

    राजनीतिक और प्रशासनिक पहल

    मध्य प्रदेश की कमल नाथ सरकार ने 2019 में ओबीसी के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने का कदम उठाया थालेकिन कोर्ट में मामला लंबित होने के कारण इसका कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ा। राज्य सरकार ने यह दावा किया था कि यह कदम ओबीसी समुदाय के लिए विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैलेकिन कोर्ट के फैसले से पहले यह योजना लागू नहीं हो पाई। इसके अलावापदोन्नति के नए नियमों को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर निरंतर प्रयास किए गएलेकिन कानूनी अड़चनों के कारण यह मामला अब भी उलझा हुआ है।

    भविष्य की दिशा

    पदोन्नति और आरक्षण जैसे मुद्दों का समाधान करना राज्य सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है। राज्य सरकार को इन मुद्दों पर उच्च न्यायालय में लंबित मामलों को जल्द सुलझाने के लिए रणनीति बनानी होगी। साथ हीकर्मचारियों और बेरोजगार युवाओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुलझाने के लिए कदम उठा रही है।राज्य सरकार को इन मुद्दों का हल निकालने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्तिकानूनी विशेषज्ञता और प्रशासनिक दक्षता का संयोजन करना होगा।

    अगर ये विवाद जल्द नहीं सुलझेतो कर्मचारियों में असंतोष और बेरोजगार युवाओं में निराशा का माहौल बन सकता हैजो राज्य की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है आखिरकारयह स्थिति मध्य प्रदेश के विकास की गति को प्रभावित कर रही है और राज्य सरकार को इन जटिल मुद्दों का समाधान शीघ्रता से करना होगाताकि राज्य में एक स्थिर और समृद्ध प्रशासनिक माहौल बन सके।

  • राजनीति का सुखद पल… शरद पवार के घर डिनर में राहुल, अजित, अडानी समेत कई केंद्रीय मंत्री भी हुए शामिल

    राजनीति का सुखद पल… शरद पवार के घर डिनर में राहुल, अजित, अडानी समेत कई केंद्रीय मंत्री भी हुए शामिल


    नई दिल्ली।
    राजधानी दिल्ली (Capital Delhi) में राजनीतिक गलियारों की शाम बुधवार बेहद ख़ास रही. एनसीपी–एसपी प्रमुख शरद पवार (NCP-SP chief Sharad Pawar) के आवास पर दलगत सीमाओं से परे कई नेता डिनर के लिए जुटे. इस डिनर में देश के उद्योगपति भी नज़र आए. यह मुलाकात उनके 85वें जन्मदिन (85th Birthday) से ठीक एक दिन पहले हुई और माहौल पूरी तरह निजी रहा.

    शरद पवार एक दिग्गज नेता हैं, जो लंबे समय से सियासत करते आ रहे हैं और उनके डिनर आयोजन में मौजूद नेताओं की लिस्ट ने इसे और ख़ास बना दिया. इस डिनर आयोजन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हुए. सबसे ज्यादा ध्यान इस आयोजन में उद्योगपति गौतम अडानी की मौजूदगी ने खींचा, क्योंकि राजनीति और व्यापार के ऐसे मेलजोल के मौके कम देखने को मिलते हैं.

    इसके अलावा तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी भी शामिल हुए. प्रदेश में नई सरकार बनने के बाद यह पहला मौका होगा जब मुख्यमंत्री रेड्डी किसी बड़े राजनीतिक आयोजन में दिखे। एक और दिलचस्प दृश्य देखने मिला कि शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार भी इस डिनर में शामिल दिखाई दिए. अजित पवार के इस आयोजन में शामिल होना दर्शाता है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद दोनों के व्यक्तिगत रिश्ते राजनीति की सीमाओं से परे चलते हैं।

    शरद पवार ने छह दशक से अधिक समय तक राजनीति में सक्रिय रहकर लगभग हर दल के नेताओं से मजबूत संबंध बनाए हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री, रक्षा मंत्री और कृषि मंत्री जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए उन्होंने न केवल एडमिनिस्ट्रेटिव क्षमता दिखाई, बल्कि अपनी राजनीतिक समझ के कारण सम्मान भी हासिल किया।

  • शशि थरूर ने ठुकराया वीर सावरकर अवॉर्ड, आयोजकों का दावा: कांग्रेस के डर से पीछे हटे सांसद

    शशि थरूर ने ठुकराया वीर सावरकर अवॉर्ड, आयोजकों का दावा: कांग्रेस के डर से पीछे हटे सांसद


    नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। इस बार वजह है वीर सावरकर अवॉर्ड। हाल ही में पुरस्कार आयोजकों ने इस वर्ष के विजेताओं की सूची में थरूर का नाम शामिल किया, लेकिन सांसद ने यह अवॉर्ड स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।

    थरूर का पक्ष

    शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि उन्हें मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से ही पता चला कि उन्हें अवॉर्ड के लिए चुना गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें इसके बारे में कोई पूर्व जानकारी नहीं थी और न ही उन्होंने इसे स्वीकार किया था। थरूर ने इसे आयोजकों की गैर-जिम्मेदाराना कार्रवाई बताया।

    उन्होंने कहा, “पुरस्कार की प्रकृति, इसे देने वाले संगठन या अन्य विवरणों की जानकारी न होने के कारण, मेरे शामिल होने या पुरस्कार स्वीकार करने का सवाल ही नहीं उठता।”

    आयोजकों का पलटवार

    वहीं, पुरस्कार आयोजक हाई रेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (HRDS) इंडिया ने थरूर के आरोपों को खारिज कर दिया। HRDS के सचिव अजी कृष्णन ने कहा कि थरूर को काफी पहले ही सूचित किया गया था। उन्होंने दावा किया कि संगठन और जूरी के चेयरमैन ने थरूर से उनके आवास पर मुलाकात कर उन्हें समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था।

    कृष्णन ने कहा कि थरूर ने उस समय अन्य अवॉर्ड विजेताओं की सूची भी मांगी और उन्हें वह सूची दे दी गई। उन्होंने सीधे आरोप लगाया कि शायद थरूर कांग्रेस की प्रतिक्रिया के डर से अवॉर्ड लेने से पीछे हटे।

    राजनीतिक बहस

    सावरकर पर अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाने वाले थरूर का यह कदम अब राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया है। कांग्रेस पार्टी, जो ऐतिहासिक रूप से सावरकर की विचारधारा की आलोचक रही है, के एक सांसद का पुरस्कार ठुकराना पार्टी लाइन के अनुरूप है।

    हालांकि आयोजकों के दावे ने विवाद को नया आयाम दिया है। अब यह मामला केवल पुरस्कार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस और मीडिया में बड़े पैमाने पर चर्चा का केंद्र बन गया है।

  • हुमायूं कबीर का दावा: 2026 में बनूंगा किंगमेकर, मेरी पार्टी के बिना कोई सरकार नहीं बनेगी

    हुमायूं कबीर का दावा: 2026 में बनूंगा किंगमेकर, मेरी पार्टी के बिना कोई सरकार नहीं बनेगी


    कोलकाता । तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मंगलवार को कहा कि पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों के बाद वह ‘किंगमेकर’ के रूप में उभरेंगे। उन्होंने कहा कि उनके प्रस्तावित नए राजनीतिक दल के समर्थन के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती। कबीर ने दावा किया कि 2026 में न तो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और न ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छू पाएगी। कबीर ने कहा कि उनका अनुमान है कि 294 सदस्यीय विधानसभा में कोई भी पार्टी 148 सीटों का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी।

    उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘चुनाव के बाद मैं किंगमेकर बनूंगा। मेरे समर्थन के बिना कोई भी सरकार नहीं बना सकता।’ उन्होंने संकेत दिया कि उनकी नई पार्टी की औपचारिक घोषणा 22 दिसंबर को की जाएगी। कबीर ने कहा, ‘मैंने कहा है कि मैं 135 सीटों पर चुनाव लड़ूंगा। आप देखेंगे कि मैं जो पार्टी बनाऊंगा, वह इतनी सीटें जीतेगी कि जो भी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेगा, उसे मेरी पार्टी के विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होगी।’

    यह पूछे जाने पर कि क्या उनके संगठन का नाम ‘नेशनल कंजर्वेटिव पार्टी’ होगा, कबीर ने कहा, ‘मैं बाद में सब कुछ बताऊंगा। आपको 22 दिसंबर के बाद पता चल जाएगा।’ तृणमूल कांग्रेस ने पिछले सप्ताह हुमायूं कबीर को निलंबित कर दिया था।

    हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने उनके दावे का मजाक उड़ाया और कहा कि वह ‘दिवास्वप्न देख रहे हैं।’ तृणमूल कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अरूप चक्रवर्ती ने कहा, ‘हुमायूं कबीर दिवास्वप्न देख रहे हैं। सरकार बनाने की बात करने से पहले उन्हें अपनी जमानत बचाने की कोशिश करनी चाहिए। ऐसे निराधार दावे उनकी राजनीतिक हताशा को ही उजागर करते हैं।’

    करीब तीन करोड़ रुपये का चंदा मिला
    मुर्शिदाबाद में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद-शैली की मस्जिद के लिए मिले चंदे की राशि लगभग तीन करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। विधायक के सहयोगियों ने मंगलवार को यह दावा किया। कबीर के अनुसार, स्थल पर 12 दान पेटियां रखी गई थीं। अब तक इन पेटियों से 57 लाख रुपये की गिनती हुई है, जबकि क्यूआर कोड भुगतान के माध्यम से 2.47 करोड़ रुपये प्राप्त हुए हैं।

  • वंदे मातरम् पर संसद में गरमाई बहस अमित शाह ने विपक्ष पर किए तीखे आरोप

    वंदे मातरम् पर संसद में गरमाई बहस अमित शाह ने विपक्ष पर किए तीखे आरोप

     
    नई दिल्ली । संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान वंदे मातरम् पर जारी बहस ने मंगलवार को एक नया मोड़ लिया जब गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। इस मुद्दे पर पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी प्रतिक्रिया दी थी और अब अमित शाह ने विपक्ष पर तीखे आरोप लगाए। वंदे मातरम् पर संसद में चल रही यह बहस 9 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकसभा में इसकी शुरुआत के बाद और भी तेज हो गई है।

    अमित शाह का बयान

    अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम् पर चर्चा की आवश्यकता तब भी थी जब यह रचना रची गई थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह चर्चा आजादी के आंदोलन के दौरान भी जरूरी थी और आज भी यह जरूरी है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जब भारत 2047 में एक विकसित राष्ट्र बनेगा तब भी वंदे मातरम् पर चर्चा जारी रहेगी। शाह ने वंदे मातरम् के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बात करते हुए कहा कि यह रचना विदेशी आक्रमणों और सांस्कृतिक चुनौतियों के प्रतिकार के रूप में सामने आई थी।

    गृह मंत्री अमित शाह ने आगे कहा कि वंदे मातरम् को लेकर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के समय इसका एक बड़ा महत्व था। यह न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन चुका था बल्कि यह भारतीय संस्कृति और स्वाभिमान का भी प्रतीक था। उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि आज वंदे मातरम् को लेकर विवाद उठाना और इसके महत्व को कम करने की कोशिश करना भारतीयता और भारतीय संस्कृति को कमजोर करने जैसा है।

    नेहरू और इंदिरा गांधी पर बयान

    अमित शाह ने इस मुद्दे पर एक और ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा नेहरू ने वंदे मातरम् के टुकड़े किए थे और इंदिरा गांधी ने इसके विरोध में खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने हमेशा इस पर विवाद उठाया जबकि वंदे मातरम् ने भारतीय जनमानस को एकजुट किया और यह हर भारतीय का राष्ट्रीय गीत बन गया।

    शाह ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वंदे मातरम् के खिलाफ राजनीति करना भारतीय संस्कृति और भारतीयता के खिलाफ है। उनका यह भी कहना था कि अगर कांग्रेस के नेताओं के विचार इस गीत के खिलाफ थे तो यह पार्टी की सोच का संकेत है कि वह भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद को प्राथमिकता नहीं देती।

    विपक्ष पर अमित शाह के आरोप

    अमित शाह ने विपक्ष पर तीखा हमला करते हुए कहा कि जो लोग वंदे मातरम् के खिलाफ बोलते हैं वे दरअसल भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद का अपमान कर रहे हैं। उनका कहना था कि यह गीत हर भारतीय के दिल में गूंजता है और यह केवल एक गीत नहीं बल्कि भारत की स्वतंत्रता एकता और अखंडता का प्रतीक है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस गीत का विरोध कर राजनीति कर रहे हैं और अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं।

    राजनीतिक हलचल और संसद में गहमागहमी

    वंदे मातरम् पर संसद में चली यह बहस अब एक बड़े राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। यह मामला केवल एक गीत का नहीं बल्कि भारतीयता संस्कृति और राष्ट्रवाद से जुड़ा हुआ है। अमित शाह के बयान ने विपक्ष को चुप्प रहने की चुनौती दी है वहीं विपक्ष ने इस पर अपनी प्रतिक्रियाएं भी दी हैं। विपक्ष के नेताओं का कहना है कि वंदे मातरम् को लेकर किसी भी तरह की राजनीति नहीं की जानी चाहिए। उनका मानना है कि यह गीत सभी भारतीयों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है और इसे किसी विशेष पार्टी या विचारधारा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

    वंदे मातरम् पर यह बहस अब केवल एक गीत तक सीमित नहीं रही बल्कि यह भारतीय संस्कृति राष्ट्रीय एकता और राजनीति से जुड़ा हुआ मुद्दा बन गया है। जहां एक ओर अमित शाह और उनकी पार्टी इस मुद्दे को भारतीयता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं वहीं विपक्ष इसे राजनीति से जोड़ते हुए इसे विवादित बना रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर भी चर्चा का विषय बना रहेगा और इस पर अधिक राजनीतिक बयानबाजी की संभावना है।