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  • RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन सीएस शेट्टी ने ब्याज दरों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में ब्याज दरों में किसी प्रकार का बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए अधिक लाभदायक रहेगा। उनके अनुसार इस समय नीतिगत दरों में स्थिरता बनाए रखने से आर्थिक गतिविधियों को संतुलित समर्थन मिलेगा और विकास की रफ्तार भी बनी रहेगी। बाजार की सामान्य धारणा भी यही संकेत देती है कि आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना केंद्रीय बैंक की प्रमुख जिम्मेदारी होती है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर रखना एक व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरें उद्योग, कारोबार और उपभोक्ताओं को स्पष्ट संकेत देती हैं, जिससे निवेश और ऋण गतिविधियों को निरंतरता मिलती है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था इस समय सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और इसे स्थिर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।

    एसबीआई चेयरमैन ने निवेशकों को सलाह देते हुए कहा कि शेयर बाजार में होने वाले रोजाना उतार-चढ़ाव को लेकर अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक ताकत उसकी दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता में निहित है। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, डिजिटल क्रांति, वित्तीय समावेशन और तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि निवेशकों को अल्पकालिक बाजार गतिविधियों के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं पर ध्यान देना चाहिए।

    सीएस शेट्टी ने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याएं और तकनीकी परिवर्तन जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत एक स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में आर्थिक सुधारों और निवेश के अनुकूल वातावरण ने भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

    डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने भारत की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आज देश की सबसे बड़ी तकनीकी सफलताओं में शामिल है। हर महीने अरबों डिजिटल लेनदेन यूपीआई के माध्यम से किए जा रहे हैं, जिससे नकदी पर निर्भरता कम हुई है और भुगतान प्रणाली अधिक तेज, सुरक्षित तथा पारदर्शी बनी है। उन्होंने बताया कि एसबीआई की डिजिटल सेवाओं की सफलता उसकी मजबूत तकनीकी संरचना और ग्राहकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।

    उन्होंने वित्तीय समावेशन में जनधन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार ‘जेएएम ट्रिनिटी’ ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में अहम योगदान दिया है। इसके साथ ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) प्रणाली ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद की है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और विभिन्न योजनाओं में होने वाली संभावित अनियमितताओं में कमी आई है।

    भारत की भविष्य की विकास यात्रा पर बात करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि आने वाले वर्षों में देश को बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी। उन्होंने बताया कि बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा परिवर्तन, शहरी विकास, एमएसएमई और नवाचार जैसे क्षेत्रों में विशाल निवेश अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बनेंगे।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर भी उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उनका मानना है कि भारत एआई तकनीक के उपयोग और विस्तार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन सकता है। उन्होंने बताया कि एसबीआई पहले से कई बैंकिंग सेवाओं में एआई आधारित प्रणालियों का उपयोग कर रहा है और इसके लिए जिम्मेदार तथा सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने हेतु विशेष ढांचा भी विकसित किया गया है।

    कर्ज की मांग के संबंध में उन्होंने कहा कि छोटे और मध्यम उद्योगों सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऋण की मांग मजबूत बनी हुई है। बैंक लगातार उद्यमियों और व्यवसायों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही बैंक विलय एवं अधिग्रहण से जुड़े वित्तपोषण के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत की मजबूत आर्थिक नींव, डिजिटल प्रगति और निवेश क्षमता देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में मदद करेगी।

  • भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।

    वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है।

    महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है।

    विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।

  • डॉलर पर निर्भरता घटाने और आर्थिक सुरक्षा के लिए भारत समेत कई देश बढ़ा रहे सोने का भंडार

    डॉलर पर निर्भरता घटाने और आर्थिक सुरक्षा के लिए भारत समेत कई देश बढ़ा रहे सोने का भंडार


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है, जिससे घरेलू खपत और आयात बिल पर नियंत्रण रखा जा सके। वहीं दूसरी ओर सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लगातार अपने सोने के भंडार को बढ़ा रहे हैं, जिससे सवाल उठ रहा है कि एक तरफ आम लोगों को सोना खरीदने से क्यों रोका जा रहा है और दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर इसकी खरीद क्यों जारी है।

    आंकड़ों के अनुसार,भारतीय रिजर्व बैंक के पास वर्तमान में करीब 880 टन से अधिक सोना भंडार है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लगातार सोने की खरीद बढ़ाई है और वैश्विक गोल्ड रिजर्व रैंकिंग में भी अपनी स्थिति मजबूत की है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर पर निर्भरता कम करना और आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाना है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भी कई देश जैसे चीन, तुर्किये और पोलैंड अपने गोल्ड रिजर्व को तेजी से बढ़ा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर पर घटता भरोसा माना जा रहा है। खासकर 2022 में रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद कई देशों ने डॉलर की निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई है।

    सोने को सुरक्षित संपत्ति माना जाता है क्योंकि यह किसी एक देश की मुद्रा या नीतियों पर निर्भर नहीं होता। इसी कारण केंद्रीय बैंक इसे अपने रिजर्व में बढ़ा रहे हैं। भारत भी इसी रणनीति के तहत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित करने और आर्थिक जोखिम कम करने के लिए सोना खरीद रहा है।

    हालांकि, दूसरी तरफ भारत में सोने का आयात भारी मात्रा में डॉलर खर्च करता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना आयात करता है, जिससे देश का आयात बिल बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यही कारण है कि सरकार आम लोगों से सोने की खरीद सीमित करने की अपील कर रही है ताकि घरेलू मांग नियंत्रित रहे और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो।

    आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत ने सोने पर भारी खर्च किया है, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण खपत में गिरावट भी देखी गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में अगर सोने की कीमतें और बढ़ती हैं तो आयात और भी महंगा हो जाएगा।

    कुल मिलाकर, एक तरफ सरकार वैश्विक आर्थिक सुरक्षा और डॉलर जोखिम से बचाव के लिए सोना जमा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था और आयात बिल को नियंत्रित रखने के लिए जनता से सोने की खरीद कम करने की अपील की जा रही है।

  • 1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत

    1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत



    नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा।

    कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?
    1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था
    इन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था।

    क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?
    संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई।

    कितना सोना इस्तेमाल हुआ?
    रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

    किसने संभाली जिम्मेदारी?
    इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले।

    कैसे भेजा गया सोना?
    मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया

    इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया

    इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली

    क्या मिला फायदा?
    इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

  • RBI ने 6 माह में भारत में शिफ्ट किया 104 टन सोना…. जानें विदेशी मुद्रा भंडार का हाल

    RBI ने 6 माह में भारत में शिफ्ट किया 104 टन सोना…. जानें विदेशी मुद्रा भंडार का हाल


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India- RBI) ने पिछले छह महीनों में अपने सोने के भंडार का बड़ा हिस्सा देश के भीतर शिफ्ट किया है, जिससे गोल्ड की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है।


    6 महीने में 104 टन सोना देश में शिफ्ट

    आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच करीब 104.23 मीट्रिक टन सोना विदेश से भारत लाया गया। इसके साथ ही देश में रखा गया कुल सोना बढ़कर 290.37 मीट्रिक टन हो गया है। हालांकि, कुल गोल्ड रिजर्व में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। मार्च 2026 तक RBI के पास कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना है, जो सितंबर 2025 के 880.18 टन से थोड़ा ही ज्यादा है।

    विदेश में अभी भी कितना सोना रखा है
    आरबीआई अभी भी अपने सोने का एक बड़ा हिस्सा विदेश में सुरक्षित रखता है। करीब 197.67 मीट्रिक टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटेलमेंट्स (BIS) के पास सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा 2.80 टन सोना गोल्ड डिपॉजिट के रूप में है।


    गोल्ड की हिस्सेदारी में तेज बढ़ोतरी

    सोने की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा है।मार्च 2026 तक फॉरेक्स रिजर्व में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7% हो गई, जो छह महीने पहले 13.92% थी। यह दिखाता है कि RBI धीरे-धीरे अपने रिजर्व में गोल्ड का महत्व बढ़ा रहा है।


    विदेशी मुद्रा भंडार का हाल

    भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा संपत्ति (FCA) का बड़ा हिस्सा है। कुल विदेशी मुद्रा 552.28 अरब डॉलर है। इसमें से 465.61 अरब डॉलर सिक्योरिटीज में निवेश है। 46.83 अरब डॉलर अन्य केंद्रीय बैंकों और BIS में जमा है। 39.84 अरब डॉलर विदेशी कमर्शियल बैंकों में जमा है।

    रणनीति में क्या बदलाव दिख रहा: रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि RBI धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदल रहा है। सिक्योरिटीज और विदेशी बैंकों में जमा राशि थोड़ी घटाकर, अन्य केंद्रीय बैंकों और BIS में जमा बढ़ाई गई है।


    क्या है इसका मतलब

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम वैश्विक अनिश्चितता के बीच सुरक्षा बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सोना एक सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए RBI अपने रिजर्व को ज्यादा स्थिर बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

  • भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 703 अरब डॉलर के पार, आरबीआई के आंकड़े जारी..

    भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 703 अरब डॉलर के पार, आरबीआई के आंकड़े जारी..


    नई दिल्ली।पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक सकारात्मक खबर सामने आई है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 703.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी हाल के सप्ताह में दर्ज की गई है, जिसमें भंडार में लगभग 2.3 अरब डॉलर की वृद्धि देखी गई है। यह संकेत देता है कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद देश की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पिछले कुछ महीनों से इसमें उतार-चढ़ाव देखा जा रहा था। वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता के कारण पहले भंडार पर दबाव बना था, जिससे इसमें गिरावट भी दर्ज की गई थी। हालांकि हाल के आंकड़े बताते हैं कि स्थिति अब धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ रही है।

    कुछ समय पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अपने रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया था, लेकिन उसके बाद वैश्विक तनाव और मुद्रा बाजार में बदलाव के चलते इसमें कमी आई थी। अब फिर से इसमें सुधार देखने को मिल रहा है, जो आर्थिक स्थिरता के लिहाज से एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इस दौरान देश के सोने के भंडार में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह 122 अरब डॉलर से अधिक के स्तर पर पहुंच गया है। इसके अलावा विशेष आहरण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की स्थिति में भी हल्का सुधार देखने को मिला है। ये सभी संकेत मिलकर देश की बाहरी आर्थिक मजबूती को दर्शाते हैं।

    विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार होता है। यह आयात भुगतान, विदेशी व्यापार और मुद्रा स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। मजबूत भंडार से देश को वैश्विक झटकों का सामना करने की क्षमता मिलती है और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होता है।

    हालिया बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि वैश्विक दबाव के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति स्थिर बनी हुई है और धीरे-धीरे और मजबूत हो रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार में यह सुधार आर्थिक संतुलन की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

  • RBI का बड़ा फैसला: ₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट पर नहीं लगेगा OTP, डिजिटल पेमेंट हुआ आसान

    RBI का बड़ा फैसला: ₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट पर नहीं लगेगा OTP, डिजिटल पेमेंट हुआ आसान


    नई दिल्ली। डिजिटल पेमेंट को आसान और सुरक्षित बनाने के लिए Reserve Bank of India (RBI) ने ई-मैंडेट से जुड़े नए नियम लागू कर दिए हैं। इस नए फ्रेमवर्क के तहत अब ₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट के लिए हर बार OTP डालने की जरूरत नहीं होगी।

    क्या है नया नियम?
    RBI की ओर से जारी Digital Payment E-Mandate Framework 2026 के अनुसार, बार-बार होने वाले ट्रांजैक्शन (Recurring Payments) को आसान बनाने के लिए यह बदलाव किया गया है। नए नियम के तहत ₹15,000 तक के भुगतान बिना OTP के पूरे हो सकेंगे, जबकि इससे ज्यादा राशि के ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर OTP जरूरी होगा। हालांकि, कुछ खास कैटेगरी जैसे बीमा, म्यूचुअल फंड और क्रेडिट कार्ड बिल के लिए ₹1 लाख तक के ऑटो-पेमेंट बिना OTP के किए जा सकेंगे। यह सुविधा ग्राहकों को बार-बार OTP डालने की झंझट से राहत देगी।

    ई-मैंडेट क्या होता है?
    ई-मैंडेट एक ऐसी सुविधा है, जिसमें ग्राहक पहले से किसी पेमेंट की अनुमति दे देता है। इसके बाद तय समय पर अपने आप खाते से पैसे कट जाते हैं। यह सुविधा आमतौर पर OTT सब्सक्रिप्शन, मोबाइल बिल, EMI और इंश्योरेंस प्रीमियम जैसे भुगतान के लिए इस्तेमाल होती है।

    हर ट्रांजैक्शन से पहले मिलेगा अलर्ट
    RBI के नए नियम के मुताबिक, हर ऑटो-पेमेंट से कम से कम 24 घंटे पहले ग्राहक को नोटिफिकेशन भेजा जाएगा। इस नोटिफिकेशन में मर्चेंट का नाम, पेमेंट की राशि, तारीख और समय जैसी सभी जरूरी जानकारी दी जाएगी। ग्राहक SMS या ईमेल के जरिए यह अलर्ट प्राप्त कर सकता है।

    बदलाव या कैंसिल करने का नियम
    अगर ग्राहक ई-मैंडेट में कोई बदलाव करना चाहता है या उसे बंद करना चाहता है, तो इसके लिए OTP जरूरी होगा। ग्राहक किसी भी समय ऑटो-पेमेंट को रोक (opt-out) सकता है, लेकिन इसके लिए भी सुरक्षा प्रक्रिया का पालन करना होगा। पहला ट्रांजैक्शन हमेशा OTP के साथ ही पूरा किया जाएगा। अगर रजिस्ट्रेशन के समय ही पेमेंट किया जाता है, तो दोनों प्रक्रियाएं एक साथ पूरी हो सकती हैं। कुछ मामलों में प्री-नोटिफिकेशन जरूरी नहीं होगा, जैसे FASTag और नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) के ऑटो रिचार्ज। इन सेवाओं में ऑटो-पेमेंट पहले से तय नियमों के तहत जारी रहेगा। RBI के इस नए कदम से डिजिटल पेमेंट सिस्टम को और ज्यादा सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने की कोशिश की गई है। इससे ग्राहकों को राहत मिलेगी और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

  • वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर

    वैश्विक आपूर्ति बाधाओं से भारत में महंगाई का खतरा, दूसरे दौर के प्रभावों पर गहरी नजर


    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अनिश्चितताओं और भू राजनीतिक तनावों के बीच देश की मौद्रिक नीति को लेकर बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में केंद्रीय बैंक किसी भी प्रकार के जल्दबाजी वाले निर्णय से बच रहा है और आगे की दिशा आर्थिक आंकड़ों और जोखिमों के विस्तृत आकलन के आधार पर तय की जाएगी। उन्होंने इसे वेट एंड वॉच की स्थिति बताया और कहा कि मौजूदा समय में स्थिरता बनाए रखना प्राथमिकता है।

    अपने एक अंतरराष्ट्रीय संबोधन में उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबावों और वैश्विक घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में जारी तनाव केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका सीधा और अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत की आर्थिक संरचना पर भी पड़ सकता है क्योंकि इस क्षेत्र की भूमिका भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और विदेशी आय के प्रवाह में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    उन्होंने आंकड़ों के माध्यम से बताया कि पश्चिम एशिया भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार क्षेत्र है, जो देश के निर्यात का बड़ा हिस्सा, आयात का महत्वपूर्ण भाग और कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही उर्वरक आयात और विदेशी रेमिटेंस में भी इस क्षेत्र का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने संकेत दिया कि इस तरह की गहरी आर्थिक निर्भरता के कारण किसी भी प्रकार की आपूर्ति बाधा का प्रभाव व्यापक स्तर पर देखने को मिल सकता है।

    आरबीआई गवर्नर ने विशेष रूप से दूसरे दौर के प्रभावों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक आपूर्ति व्यवधान यदि लंबे समय तक बने रहते हैं तो उनका असर धीरे धीरे कीमतों और उत्पादन लागत पर फैल सकता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ने की संभावना रहती है। इस प्रकार की स्थिति केवल अस्थायी नहीं होती बल्कि आर्थिक संतुलन को लंबे समय तक प्रभावित कर सकती है।

    मौद्रिक नीति को लेकर उन्होंने दोहराया कि केंद्रीय बैंक वर्तमान में तटस्थ रुख बनाए हुए है और हाल के महीनों में की गई ब्याज दरों में कटौती के बाद अब स्थिति का गहन मूल्यांकन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौद्रिक नीति समिति पूरी तरह डेटा आधारित दृष्टिकोण अपनाती है और बदलते आर्थिक संकेतकों के अनुसार लगातार जोखिमों का पुनर्मूल्यांकन करती रहती है ताकि नीति निर्णय संतुलित और प्रभावी बने रहें।

    डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में उन्होंने देश में बढ़ते डिजिटल लेनदेन की सराहना की और बताया कि यूनिफाइड पेमेंट सिस्टम के माध्यम से लेनदेन में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत की डिजिटल प्रगति को दर्शाता है। उन्होंने यह भी बताया कि एक नए डिजिटल लोन सिस्टम पर काम चल रहा है जिसका उद्देश्य छोटे किसानों और छोटे व्यवसायों को त्वरित और आसान ऋण उपलब्ध कराना है।

    वित्तीय अनुशासन पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि देश का राजकोषीय घाटा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार कम हुआ है, जो आर्थिक प्रबंधन में सुधार का संकेत है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि सरकारी ऋण अनुपात में भी धीरे धीरे सुधार देखा जा रहा है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलती है।

  • आरबीआई की सख्ती से बैंक शेयरों पर दबाव, 95 अरब डॉलर घटा मार्केट कैप; आगे और गिरावट की आशंका

    आरबीआई की सख्ती से बैंक शेयरों पर दबाव, 95 अरब डॉलर घटा मार्केट कैप; आगे और गिरावट की आशंका


    मुंबई। भारतीय रिज़र्व बैंक की हालिया सख्त नीति और रुपये को संभालने के प्रयासों का असर बैंकिंग शेयरों पर दिखने लगा है। पिछले कुछ हफ्तों में भारतीय बैंकों की मार्केट वैल्यू करीब 95 अरब डॉलर घट गई है, जबकि विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह दबाव और बढ़ सकता है।

    रुपये को संभालने की कोशिश, बैंकों पर असर

    रुपये को रिकॉर्ड निचले स्तर पर जाने से रोकने के लिए केंद्रीय बैंक ने बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया।

    इस कदम से बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता प्रभावित हुई है, जिससे बैंकों की कर्ज देने की क्षमता और मुनाफे पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

    विदेशी निवेशकों की निकासी

    आंकड़ों के मुताबिक मार्च के पहले 15 दिनों में विदेशी निवेशकों ने वित्तीय कंपनियों के शेयरों से लगभग 327 अरब रुपये (करीब 3.5 अरब डॉलर) निकाल लिए। इसी दौरान बैंकिंग इंडेक्स में तेज गिरावट दर्ज की गई और यह बियर मार्केट की सीमा (20% गिरावट) के करीब पहुंच गया।

    क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

    क्रांति बथिनी का कहना है कि मौद्रिक नीति के सख्त बने रहने से बैंक स्टॉक्स पर दबाव जारी रह सकता है। हालांकि गिरावट के बाद इन शेयरों के वैल्यूएशन आकर्षक होने की बात भी उन्होंने कही।

    पूरे बाजार पर असर का खतरा

    रिपोर्ट्स के अनुसार बैंकिंग शेयर लगभग 4.5 ट्रिलियन डॉलर के भारतीय शेयर बाजार का करीब एक-तिहाई हिस्सा हैं। ऐसे में बैंक शेयरों में कमजोरी बनी रहती है तो इसका असर व्यापक बाजार पर पड़ सकता है।

    उम्मीद की किरण भी
    कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में भारत की आर्थिक वृद्धि दर मजबूत रहने से बैंकिंग सेक्टर संभल सकता है। फिलहाल बैंकिंग इंडेक्स करीब 1.5 गुना वन-ईयर फॉरवर्ड प्राइस-टू-बुक पर ट्रेड कर रहा है, जो 2020 के बाद निचले स्तरों में है। Citibank ने भी सरकारी बैंकों की तुलना में निजी बैंकों को प्राथमिकता देना शुरू किया है।

    आगे का खतरा

    रिपोर्ट्स के मुताबिक Jefferies का अनुमान है कि करेंसी ट्रेड्स पर बैंकों को करीब 50 अरब रुपये तक का नुकसान हो सकता है। वहीं Fitch Ratings के अनुसार सख्त वित्तीय हालात से बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन 20-30 बेसिस प्वाइंट तक घट सकता है।
    रजत अग्रवाल ने कहा कि हाल की तेज क्रेडिट ग्रोथ पर वैश्विक तनाव और युद्ध जैसे कारकों का असर देखने लायक होगा।
    कुल मिलाकर, आरबीआई की सख्ती, विदेशी निवेश की निकासी और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते बैंकिंग सेक्टर पर निकट भविष्य में दबाव बना रह सकता है, हालांकि लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह गिरावट अवसर भी बन सकती है।

  • RBI का 3 सरकारी बैंकों पर बड़ा एक्शन… लगाया 2.17 करोड़ से अधिक का जुर्माना

    RBI का 3 सरकारी बैंकों पर बड़ा एक्शन… लगाया 2.17 करोड़ से अधिक का जुर्माना


    नई दिल्ली।
    भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) (Reserve Bank of India – RBI) ने अलग-अलग नियमों और दिशा-निर्देशों के उल्लंघन के कारण तीन सार्वजनिक बैंकों (Three Public Sector Banks) पर कुल दो करोड़ 17 लाख 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। रिजर्व बैंक ने एक बयान में बताया कि यूनियन बैंक ऑफ इंडिया पर 95.40 लाख रुपये, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर 63.60 लाख रुपये, बैंक ऑफ इंडिया पर 58.50 लाख रुपये जुर्माना लगाया गया है। इसके अलावा फिनटेक कंपनी पाइन लैब्स पर भी तीन लाख 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है।


    यूनियन बैंक ऑफ इंडिया

    आरबीआई के मुताबिक यूनियन बैंक ऑफ इंडिया पर धोखाधड़ी की रिपोर्टिंग की समुचित व्यवस्था न करने और परिसंपत्ति वर्गीकरण तंत्र में मानवीय हस्तक्षेप करने के लिए 95.40 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। आरबीआई ने पाया कि बैंक ने धोखाधड़ी वाले लेनदेन की रिपोर्टिंग के लिए ग्राहकों को अलग-अलग चैनलों पर 24 घंटे रिपोर्टिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई।


    बैंक ऑफ इंडिया

    इसके अलावा, बैंक ऑफ इंडिया पर 58.50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है। बैंक पर प्राथमिक सेक्टर को लोन देने और जमा पर ब्याज संबंधी नियमों के उल्लंघन का आरोप है। बैंक ने प्राथमिक क्षेत्रों के 25 हजार रुपये तक के लोन देने पर भी सर्विस चार्ज, निरीक्षण शुल्क और प्रोसेसिंग चार्ज वसूले थे। इसके अलावा बैंक ने सावधि जमा खातों पर मैच्योरिटी की तारीख से पैसे ग्राहकों को देने की तारीख तक के लिए ब्याज भुगतान नहीं किया।


    सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया

    सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया पर केवाईसी और बुनियादी बचत बैंक जमा खाता संबंधी नियमों के उल्लंघन के कारण 63.60 लाख का जुर्माना लगा है। वह तय समय सीमा के भीतर केंद्रीय केवाईसी रिकॉर्ड्स रजिस्ट्री में कुछ ग्राहकों के केवाईसी रिकॉर्ड अपडेट करने में विफल रहा था। इसके अलावा बैंक को कुछ ग्राहकों के एक से अधिक बुनियादी बचत बैंक जमा खाता खोलने का भी दोषी पाया गया।


    पाइन लैब्स पर भी एक्शन

    केंद्रीय बैंक ने पाइन लैब्स को प्रीपेड भुगतान तंत्र संबंधी नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया और उस पर तीन लाख 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। आरबीआई ने बताया कि तीन सार्वजनिक बैंकों और पाइन लैब्स को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। लिखित जवाब और मौखिक सुनवाई में दिये गये जवाब असंतोषजनक पाए जाने के बाद जुर्माने की कार्रवाई की गई है।


    एचएसबीसी पर भी लगा था जुर्माना

    हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने हांगकांग एंड शंघाई बैंकिंग कॉरपोरेशन (एचएसबीसी) पर 31.8 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। बैंक पर निष्क्रिय खातों और बिना दावे वाली जमा राशि से जुड़े कुछ निर्देशों का पालन नहीं करने का आरोप है। बैंक की निगरानी संबंधी जांच उसके 31 मार्च, 2025 तक के वित्तीय हालात के आधार पर की गई थी। जांच में आरबीआई के निर्देशों के पालन में कमी मिलने के आधार पर बैंक को नोटिस जारी किया गया। आरबीआई ने कहा कि नोटिस पर बैंक के जवाब, अतिरिक्त प्रस्तुतियां और व्यक्तिगत सुनवाई के दौरान दी गई मौखिक दलीलों पर विचार करने के बाद यह पाया गया कि बैंक पर लगे आरोप सही हैं। इसी कारण उस पर आर्थिक जुर्माना लगाया गया।