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  • आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता

    आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 का जीडीपी अनुमान 7.1 प्रतिशत पर रखा, महंगाई को लेकर बढ़ी चिंता


    नई दिल्ली ।
    भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 7.1 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि वैश्विक अनिश्चितताओं और महंगाई से जुड़े जोखिमों के बावजूद घरेलू आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। केंद्रीय बैंक ने आर्थिक वृद्धि को लेकर भरोसा जताया है, लेकिन बढ़ती महंगाई और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को लेकर सतर्क रुख अपनाया है।

    आरबीआई के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 प्रतिशत रही। दूसरी तिमाही के लिए 7.2 प्रतिशत, तीसरी तिमाही के लिए 6.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही के लिए 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी आर्थिक वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। आरबीआई के मुताबिक घरेलू मांग और निवेश गतिविधियां आर्थिक वृद्धि को समर्थन दे रही हैं।

    गवर्नर ने बताया कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में कारोबारी गतिविधियां विस्तार की स्थिति में हैं। दूसरी तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई वृद्धि क्षेत्र में बने रहे, हालांकि पिछली तिमाही की तुलना में इनकी गति कुछ धीमी हुई है। केंद्रीय बैंक का आकलन है कि घरेलू मांग, निवेश, सेवाओं की मजबूती और विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार अर्थव्यवस्था को आगे भी सहारा दे सकते हैं।

    महंगाई के मोर्चे पर आरबीआई ने खाद्य कीमतों में बढ़ते दबाव को लेकर चिंता जताई है। गवर्नर के अनुसार खाद्य मुद्रास्फीति का दबाव अब व्यापक रूप ले रहा है और चीनी तथा प्याज जैसी वस्तुओं की कीमतों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अगस्त में खाद्य और ईंधन महंगाई दोनों में बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिसमें आधार प्रभाव की भी भूमिका रही। आरबीआई महंगाई की स्थिति पर नजर रखने के लिए महंगाई अपेक्षाओं, कंपनियों के मूल्य निर्धारण व्यवहार, कोर इन्फ्लेशन और अन्य आर्थिक संकेतकों का आकलन कर रहा है।

    केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के साथ अन्य प्रमुख दरों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर को 5.25 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी दर तथा बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत किया गया है। वैश्विक स्तर पर भी महंगाई के दबाव बढ़ने की आशंका के बीच प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा मौद्रिक नीति को सख्त किए जाने का उल्लेख किया गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बने कच्चे तेल के दाम भी वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम माने जा रहे हैं।

    व्यापार के मोर्चे पर भारत का व्यापार घाटा जुलाई और अगस्त में बढ़कर 58.7 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 55.1 अरब डॉलर था। आरबीआई के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सामान और कच्चे तेल के आयात ने इसमें भूमिका निभाई। वैश्विक व्यापार वृद्धि में नरमी, ऊंची ऊर्जा कीमतें और व्यापार नीति से जुड़ी अनिश्चितताएं चालू खाते के घाटे के लिए जोखिम पैदा कर सकती हैं।

    वहीं वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 13.8 अरब डॉलर रहा, जो पिछले वर्ष की समान अवधि के 9.6 अरब डॉलर से अधिक है। महंगाई के निकट भविष्य के परिदृश्य को लेकर आरबीआई ने दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी, अल नीनो की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को आपूर्ति पक्ष के दबाव के प्रमुख कारणों में शामिल किया है। पूरे वित्त वर्ष में सीपीआई महंगाई 5.2 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जिसमें दूसरी तिमाही में 4.9 प्रतिशत, तीसरी में 6 प्रतिशत और चौथी में 5.7 प्रतिशत रहने की संभावना जताई गई है।

  • RBI ने अचानक बढ़ाया रेपो रेट, महंगे हो सकते हैं होम लोन और EMI, महंगाई के बीच क्यों लिया गया बड़ा फैसला

    RBI ने अचानक बढ़ाया रेपो रेट, महंगे हो सकते हैं होम लोन और EMI, महंगाई के बीच क्यों लिया गया बड़ा फैसला

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का ऐलान किया। इसके साथ नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गई है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि की है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई के दबाव को बढ़ा रही है।

    यह फैसला आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक के बाद लिया गया। केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति के दूसरे हिस्सों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी यानी एसडीएफ दर को बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी यानी एमएसएफ दर और बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत पर समायोजित किया गया है।

    रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेना महंगा हो जाता है। इसका असर आगे चलकर ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज पर पड़ सकता है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में वृद्धि होने पर नई और मौजूदा ईएमआई महंगी होने की संभावना रहती है।

    आरबीआई ने रेपो रेट बढ़ाने के पीछे वैश्विक अनिश्चितताओं और बढ़ते महंगाई दबाव को प्रमुख वजहों में रखा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि दुनिया में मुद्रास्फीति के दोबारा तेज होने की आशंका बनी हुई है। इसी वजह से कई प्रमुख केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों को और सख्त करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

    कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भी केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से परिवहन और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है, जिसका असर घरेलू और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है।

    देश में महंगाई के ताजा आंकड़े भी दबाव की ओर संकेत कर रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई आधारित महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई थी, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी ने कीमतों को लेकर आरबीआई की चिंताओं को बढ़ाया है। इसके अलावा अल नीनो प्रभाव और कम वर्षा के कारण रबी फसल के उत्पादन पर जोखिम भी बना हुआ है।

    रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के बीच पहले से चर्चा थी। एसबीआई रिसर्च ने बढ़ते महंगाई दबाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, बदलती तरलता स्थिति और जोखिमों के दोबारा आकलन को देखते हुए समय रहते कदम उठाने की जरूरत बताई थी।

    आरबीआई के इस फैसले का सीधा असर बैंकिंग व्यवस्था और कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। ब्याज दरों में बदलाव का असर किस तरह और कितनी तेजी से ग्राहकों तक पहुंचेगा, यह बैंकों के कर्ज और जमा दरों में किए जाने वाले अगले बदलावों पर निर्भर करेगा। फिलहाल केंद्रीय बैंक का फैसला महंगाई और वैश्विक जोखिमों के बीच मौद्रिक नीति को संतुलित रखने की दिशा में उठाया गया कदम है।

  • भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन तेजी, सेंसेक्स 685 अंक चढ़ा, निफ्टी 0.98 प्रतिशत बढ़कर 22,776 पर बंद

    भारतीय शेयर बाजार में लगातार दूसरे दिन तेजी, सेंसेक्स 685 अंक चढ़ा, निफ्टी 0.98 प्रतिशत बढ़कर 22,776 पर बंद

    नई दिल्ली । पिछले सप्ताह लगातार चार कारोबारी सत्रों में गिरावट के बाद भारतीय शेयर बाजार में अब लगातार दूसरे दिन तेजी देखने को मिली है। मंगलवार को घरेलू बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 1 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति यानी एमपीसी की बैठक के नतीजों से पहले बाजार में खरीदारी का रुख मजबूत रहा। कारोबार के अंत में बीएसई सेंसेक्स 685.34 अंक यानी 0.95 प्रतिशत की बढ़त के साथ 73,067.81 पर बंद हुआ।

    एनएसई निफ्टी 50 भी मंगलवार को 220.35 अंक यानी 0.98 प्रतिशत चढ़कर 22,776.10 के स्तर पर पहुंच गया। निफ्टी 50 में ट्रेंट, बीएसई, कोटक महिंद्रा बैंक, नेस्ले इंडिया और एचयूएल के शेयरों में सबसे अधिक तेजी रही। दूसरी ओर कोल इंडिया, टेक महिंद्रा, मैक्स हेल्थ, टीएमपीवी, अल्ट्राटेक सीमेंट, अपोलो हॉस्पिटल और आईटीसी के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। इस तरह बाजार के प्रमुख सूचकांकों में लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में मजबूती बनी रही।

    व्यापक बाजार की बात करें तो मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी अच्छी खरीदारी देखने को मिली। निफ्टी मिडकैप सूचकांक में 1.08 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 1.56 प्रतिशत चढ़ा। सेक्टरवार कारोबार में निफ्टी केमिकल, निफ्टी फार्मा, निफ्टी ऑयल एंड गैस, निफ्टी एफएमसीजी, निफ्टी प्राइवेट बैंक और निफ्टी हेल्थकेयर में 1 प्रतिशत से अधिक की तेजी रही। इसके विपरीत निफ्टी आईटी, निफ्टी रियल्टी और निफ्टी पीएसयू बैंक में सबसे ज्यादा कमजोरी देखने को मिली।

    इस सप्ताह अब तक बाजार में तेजी का असर भी दिखाई दे रहा है। सेंसेक्स इस सप्ताह 1,000 से अधिक अंक चढ़ चुका है, जबकि निफ्टी 50 ने पिछले दो कारोबारी सत्रों में 300 से अधिक अंक जोड़े हैं। आरबीआई एमपीसी की तीन दिवसीय बैठक सोमवार से शुरू हुई है और इसके नतीजे 7 अक्टूबर को आने वाले हैं। बाजार की नजर अब मौद्रिक नीति समिति के फैसले पर बनी हुई है। बैठक के परिणाम से पहले बाजार में लगातार दो सत्रों की तेजी देखने को मिली है।

    शेयर बाजार में इस तेजी के पीछे कच्चे तेल की कीमतों में नरमी को भी एक वजह माना जा रहा है। हालिया तेजी के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई है। कुछ मध्य पूर्वी देशों की ओर से कच्चे तेल की नई आपूर्ति शुरू होने के बाद कीमतों में यह नरमी देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का असर बाजार की धारणा पर भी पड़ रहा है।

    वैश्विक संकेतों से भी घरेलू बाजार को समर्थन मिला। बाजार से जुड़े एक विशेषज्ञ के अनुसार, ग्लोबल संकेतों के सहारे लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में बढ़त बनी रही। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में भी सुधार दर्ज किया गया। मंगलवार को अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड में 0.50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई। घरेलू बाजार में आरबीआई एमपीसी के नतीजों से पहले खरीदारी और वैश्विक संकेतों के बीच प्रमुख सूचकांकों ने दिन का कारोबार बढ़त के साथ समाप्त किया।

  • एआई कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट से भारत में बढ़ सकता है पूंजी प्रवाह, आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक जोखिमों पर जताई चिंता

    एआई कंपनियों के वैल्यूएशन में गिरावट से भारत में बढ़ सकता है पूंजी प्रवाह, आरबीआई गवर्नर ने वैश्विक जोखिमों पर जताई चिंता

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी कंपनियों के वैल्यूएशन में कमी आने से वैश्विक निवेश चक्र में धीमापन होने के बावजूद भारत में पूंजी प्रवाह बढ़ सकता है। उन्होंने शनिवार को राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2026 में यह बात कही। उनके अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में एआई निवेश में तेजी वैश्विक वित्तीय बाजार के लिए प्रमुख प्रेरक कारकों में रही है। हालांकि, एआई से जुड़े निवेश या कमाई में कमी आने पर इस क्षेत्र से जुड़ी वित्तीय परिसंपत्तियों की कीमतों में बड़ा बदलाव हो सकता है।

    मल्होत्रा ने कहा कि एआई क्षेत्र में ऐसी गिरावट वैश्विक बाजारों के लिए जोखिम पैदा कर सकती है, लेकिन इसका भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अगर विकसित देशों में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार होता है, तो इससे भारत की ओर पूंजी प्रवाह पर सकारात्मक असर पड़ सकता है। उनके मुताबिक, हाल के महीनों में भारतीय इक्विटी बाजार में भी ऊंचे वैल्यूएशन से सुधार हुआ है और इसे बाजार की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।

    आरबीआई गवर्नर ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली के सामने मौजूद कई अन्य जोखिमों का भी उल्लेख किया। इनमें वैश्विक स्तर पर बढ़ा हुआ कर्ज, नॉन-बैंक फाइनेंशियल सेक्टर में लीवरेज, प्राइवेट क्रेडिट एक्सपोजर में वृद्धि और साइबर सुरक्षा से जुड़े खतरे शामिल हैं। उन्होंने हालांकि स्पष्ट किया कि इन कमजोरियों का होना तत्काल किसी वित्तीय संकट की शुरुआत का संकेत नहीं है। उनके अनुसार, इन जोखिमों को लेकर सतर्क रहना जरूरी है, भले ही फिलहाल संकट के तत्काल संकेत दिखाई नहीं दे रहे हों।

    मल्होत्रा ने कहा कि भारत मजबूत व्यापक आर्थिक आधार और बैंकों तथा नॉन-बैंक फाइनेंशियल संस्थानों की मजबूत बैलेंस शीट के सहारे चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल का सामना कर रहा है। उन्होंने यह भी माना कि कमोडिटी की कीमतों, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और पूंजी प्रवाह में बदलाव के कारण भारत बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। इसके बावजूद उन्होंने घरेलू वित्तीय प्रणाली की मजबूती को रेखांकित किया और कहा कि वित्तीय क्षेत्र में मजबूती बनी हुई है।

    आरबीआई गवर्नर के बयान में एआई निवेश से जुड़े वैश्विक घटनाक्रम और भारत में संभावित पूंजी प्रवाह के बीच संबंध पर जोर दिया गया। उनके मुताबिक, विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एआई से जुड़े वैल्यूएशन में सुधार भारत के लिए पूंजी आकर्षित करने का अवसर बन सकता है। दूसरी ओर, वैश्विक कर्ज, वित्तीय संस्थानों में बढ़ता लीवरेज, निजी ऋण का बढ़ता एक्सपोजर और साइबर सुरक्षा जैसे जोखिमों पर नजर रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत की घरेलू वित्तीय प्रणाली मजबूत बनी हुई है, लेकिन वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के कारण सतर्कता आवश्यक है।

  • आरबीआई नीति, तिमाही नतीजे और पश्चिम एशिया तनाव से अगले सप्ताह शेयर बाजार की दिशा पर निवेशकों की नजर रहेगी

    आरबीआई नीति, तिमाही नतीजे और पश्चिम एशिया तनाव से अगले सप्ताह शेयर बाजार की दिशा पर निवेशकों की नजर रहेगी

    नई दिल्ली । छोटे कारोबारी सप्ताह में भारतीय शेयर बाजार पर वैश्विक दबाव हावी रहा और प्रमुख सूचकांक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तरों से नीचे फिसल गए। अब अगले सप्ताह बाजार की दिशा पर आरबीआई की मौद्रिक नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही के कॉरपोरेट नतीजे और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का प्रभाव देखने को मिल सकता है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने के संकेत मिलने पर भारतीय बाजार में राहतभरी तेजी देखने को मिल सकती है। इसके विपरीत आरबीआई की नीति, महंगाई को लेकर उसका रुख और आर्थिक वृद्धि के अनुमान घरेलू ब्याज दरों तथा वित्तीय बाजारों के लिए महत्वपूर्ण संकेत देंगे।

    पिछले सप्ताह बाजार में कमजोरी की शुरुआत पहले कारोबारी दिन से ही हो गई थी। सोमवार को सेंसेक्स में 1.52 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और अगले दो कारोबारी सत्रों में भी कमजोरी बनी रही। गुरुवार को सेंसेक्स 0.79 प्रतिशत और गिर गया। साप्ताहिक आधार पर सेंसेक्स 1,670.84 अंक टूटकर 71,909.70 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 3 प्रतिशत से अधिक गिरकर 22,421.95 पर आ गया। विश्लेषकों के अनुसार, बाजार में यह गिरावट जारी करेक्शन के दौर को दर्शाती है।

    तकनीकी संकेतकों के स्तर पर भी बाजार में कमजोरी बनी हुई है। निफ्टी लगातार आठवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ है। इसका साप्ताहिक आरएसआई करीब 31.06 पर है, जो 50 के तटस्थ स्तर से काफी नीचे है और कमजोर मोमेंटम का संकेत देता है। हालांकि आरएसआई अब ओवरसोल्ड जोन के करीब पहुंच रहा है, जिससे निचले स्तरों पर बीच-बीच में तकनीकी रिकवरी की संभावना बन सकती है। तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, 22,800 और 23,000 के स्तर निफ्टी के लिए निकट अवधि में प्रमुख प्रतिरोध रहेंगे। इन स्तरों के ऊपर टिकाऊ बढ़त मिलने पर बिकवाली का दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर 22,350 और 22,180 के स्तर प्रमुख सपोर्ट माने जा रहे हैं।

    बाजार की धारणा पर फिलहाल वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव अधिक है। अमेरिका में बॉन्ड यील्ड्स में बढ़ोतरी, महंगाई को लेकर चिंता और ऊंची ऊर्जा कीमतों ने निवेशकों को सतर्क रखा है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स बढ़ने से उभरते बाजारों में निवेश का आकर्षण भी प्रभावित हो रहा है। हालांकि घरेलू अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेतक अपेक्षाकृत मजबूत बने हुए हैं। अगस्त में भारत की औद्योगिक उत्पादन वृद्धि बढ़कर 8 प्रतिशत हो गई, जबकि जुलाई में संशोधित आंकड़ा 7.4 प्रतिशत था। विनिर्माण क्षेत्र में 9 प्रतिशत तथा बिजली और गैस आपूर्ति में 12.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

    ऊर्जा बाजार का रुख भी अगले सप्ताह महत्वपूर्ण रहेगा। हाल के दिनों में ब्रेंट क्रूड अपने ऊंचे स्तरों से नीचे आया है, क्योंकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य से कच्चे तेल की आपूर्ति युद्ध-पूर्व स्तरों के करीब पहुंचने लगी है। इससे ऊर्जा कीमतों को कुछ राहत मिली है। इसके साथ ही अमेरिका से आने वाले महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़ों पर भी निवेशकों की नजर रहेगी। नॉन-फार्म पेरोल्स और आईएसएम मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई जैसे आंकड़े वैश्विक बाजारों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं और इसका असर भारतीय बाजार पर भी पड़ सकता है। कुल मिलाकर आरबीआई नीति समीक्षा, दूसरी तिमाही के नतीजे, पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की कीमतें और अमेरिकी आर्थिक आंकड़े अगले सप्ताह बाजार के प्रमुख ट्रिगर रहेंगे।

  • आरबीआई ने एनबीएफसी की टिकाऊ वृद्धि के लिए सुशासन, लिक्विडिटी, जोखिम प्रबंधन, ग्राहक भरोसे और साइबर सुरक्षा पर जोर दिया

    आरबीआई ने एनबीएफसी की टिकाऊ वृद्धि के लिए सुशासन, लिक्विडिटी, जोखिम प्रबंधन, ग्राहक भरोसे और साइबर सुरक्षा पर जोर दिया

    नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू ने कहा है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां अब केवल वैकल्पिक ऋणदाता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विशेषीकृत वित्तीय साझेदार के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर रही हैं। ऐसे में एनबीएफसी क्षेत्र की दीर्घकालिक और टिकाऊ वृद्धि के लिए संस्थानों को पांच प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

    सितंबर बुलेटिन में दिए गए उनके विचारों के अनुसार, देश में एनबीएफसी क्षेत्र लगातार विस्तार कर रहा है। वर्तमान में एनबीएफसी ऋण सकल नॉमिनल जीडीपी के 16.7 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जबकि एक साल पहले यह 15.9 प्रतिशत था। इसी तरह अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के कुल ऋण में एनबीएफसी क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई है, जो पहले 26 प्रतिशत थी।

    मुर्मू ने सबसे पहले सुशासन को मजबूत संस्थान की बुनियाद बताया। उनके अनुसार, निदेशक मंडल और शीर्ष प्रबंधन को संगठन के स्तर पर अनुपालन और नैतिक मूल्यों की मजबूत संस्कृति विकसित करनी चाहिए। एनबीएफसी का आकार बढ़ने के साथ उसके प्रशासनिक और संस्थागत ढांचे को भी उसी अनुरूप मजबूत करने की जरूरत है।

    दूसरे महत्वपूर्ण क्षेत्र के तौर पर उन्होंने लिक्विडिटी प्रबंधन को रेखांकित किया। उनके अनुसार, बाजार की धारणा में बदलाव और सीमित फंडिंग स्रोतों के कारण एनबीएफसी तथा हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों पर दबाव बन सकता है। इसलिए कंपनियों को अपने फंडिंग स्रोतों में विविधता लाने की जरूरत है। उन्होंने गहरे और तरल कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार को इस दिशा में मददगार बताया।

    मुर्मू ने सिक्योरिटाइजेशन को भी केवल लिक्विडिटी जुटाने के साधन के तौर पर नहीं देखने की बात कही। इसे जोखिम हस्तांतरण और पूंजी मुक्त करने के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया। इसके लिए पारदर्शिता और उचित नियामकीय मानकों का पालन जरूरी बताया गया।

    तीसरे क्षेत्र में संपत्ति गुणवत्ता और जोखिम प्रबंधन शामिल हैं। ऋण वृद्धि की रफ्तार बढ़ने के साथ खराब ऋण और परिसंपत्ति गुणवत्ता से जुड़े जोखिम भी बढ़ सकते हैं। ऐसे में नियमित स्ट्रेस टेस्टिंग, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप प्रावधान व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई।

    इस दिशा में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों के इस्तेमाल को भी बढ़ाने पर जोर दिया गया। इन तकनीकों की मदद से उधारकर्ताओं में वित्तीय तनाव के शुरुआती संकेतों की पहचान की जा सकती है। साथ ही ऋण मंजूरी के मानकों से समझौता नहीं करने की बात कही गई।

    चौथे क्षेत्र के रूप में ग्राहक विश्वास को महत्वपूर्ण संपत्ति बताया गया। वित्तीय नवाचार की गति उपभोक्ता संरक्षण से आगे नहीं निकलनी चाहिए, विशेषकर कमजोर और संवेदनशील ग्राहकों के मामले में। आचरण-आधारित विनियमन, प्रभावी शिकायत निवारण और जिम्मेदार ऋण वितरण को प्राथमिकता देने की बात कही गई।

    पांचवें क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन और साइबर सुरक्षा को रखा गया। सप्लाई चेन फाइनेंस में ब्लॉकचेन और धोखाधड़ी की पहचान में एआई के इस्तेमाल को बढ़ाने की जरूरत बताई गई। हालांकि तकनीकी विस्तार के साथ साइबर जोखिम भी बढ़ते हैं। इसलिए ग्राहक डेटा की सुरक्षा और संस्थानों पर भरोसा बनाए रखने के लिए साइबर सुरक्षा में निवेश को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया। तकनीकी नवाचार का उद्देश्य केवल दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि निष्पक्षता और सुरक्षा सुनिश्चित करना भी होना चाहिए।

  • बैंक हड़ताल से पहले रविवार को खुलेंगी बैंक शाखाएं, ग्राहकों की सुविधा के लिए सरकार ने लिया अहम फैसला

    बैंक हड़ताल से पहले रविवार को खुलेंगी बैंक शाखाएं, ग्राहकों की सुविधा के लिए सरकार ने लिया अहम फैसला

    नई दिल्ली । बैंक कर्मचारियों की प्रस्तावित तीन दिवसीय देशव्यापी हड़ताल से पहले आम लोगों को बैंकिंग सेवाओं में परेशानी से बचाने के लिए रविवार को बैंक खुले रखने का फैसला किया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार को सामान्य रूप से काम करेंगे। इसका उद्देश्य लगातार कई दिनों तक बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होने की स्थिति को कम करना है।

    बैंक कर्मचारियों की हड़ताल 28 से 30 सितंबर तक प्रस्तावित है। इससे पहले 26 और 27 सितंबर को सप्ताहांत की छुट्टियां हैं। ऐसे में शनिवार और रविवार की छुट्टी के बाद लगातार तीन दिन हड़ताल होने पर बैंकिंग गतिविधियां कई दिनों तक प्रभावित हो सकती थीं। रविवार को बैंक खोलने का फैसला इसी संभावित व्यवधान को कम करने के लिए किया गया है।

    भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम से जुड़ी शाखाओं और करेंसी चेस्ट को रविवार को पूरी तरह चालू रखने की अनुमति दी है। इसके साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को रविवार को सामान्य कामकाज सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

    प्रस्तावित हड़ताल बैंक यूनियनों की कुछ मांगों को लेकर है। यूनियनों की प्रमुख मांगों में पांच दिन की बैंकिंग व्यवस्था लागू करना और परफॉर्मेंस लिंक्ड इंसेंटिव यानी पीएलआई योजना को वापस लेना शामिल है। मौजूदा व्यवस्था में बैंक कर्मचारियों को महीने में दो शनिवार की छुट्टी मिलती है। यूनियनें बाकी दो शनिवार को भी अवकाश घोषित किए जाने की मांग कर रही हैं।

    पीएलआई योजना को लेकर सरकार ने पहले ही एक कदम उठाया है। कर्मचारियों और यूनियनों की ओर से उठाई गई चिंताओं पर चर्चा के बाद सरकार ने इस योजना को फिलहाल स्थगित रखने का फैसला किया है। सरकार का कहना है कि इससे यूनियनों की दो प्रमुख मांगों में से एक पर कार्रवाई हो चुकी है।

    सरकार ने कहा है कि बैंक ग्राहकों का कल्याण और उनकी सुविधा प्राथमिकता में है। इसी को ध्यान में रखते हुए आवश्यक बैंकिंग सेवाओं को लगातार जारी रखने के लिए कदम उठाए गए हैं। सरकार और बैंक प्रबंधन ने यूनियनों से प्रस्तावित हड़ताल को वापस लेने की अपील भी की है।

    सरकार का कहना है कि यूनियनों की अधिकांश चिंताओं का काफी हद तक समाधान किया जा चुका है, जबकि शेष मांग पर अभी विचार किया जा रहा है। बैंकिंग क्षेत्र के कर्मचारियों से बातचीत के जरिए मुद्दों का समाधान करने और बैंकिंग सेवाओं को निर्बाध बनाए रखने की अपील की गई है।

    रविवार को बैंक खुले रहने से ग्राहकों को हड़ताल से पहले बैंकिंग से जुड़े जरूरी काम निपटाने का अवसर मिलेगा। नकदी से जुड़े काम, शाखा स्तर की सेवाओं और अन्य जरूरी बैंकिंग गतिविधियों के लिए रविवार को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक सामान्य रूप से उपलब्ध रहेंगे। इसके अलावा एटीएम से जुड़ी व्यवस्थाओं और करेंसी चेस्ट को भी चालू रखने की अनुमति दी गई है।

    प्रस्तावित हड़ताल के दौरान बैंकिंग सेवाओं पर कितना असर पड़ेगा, यह कर्मचारियों की भागीदारी और संबंधित संस्थानों की व्यवस्था पर निर्भर करेगा। फिलहाल सरकार की ओर से रविवार को बैंक खुले रखने का निर्णय ग्राहकों के लिए लगातार छुट्टियों और हड़ताल से पैदा होने वाले संभावित व्यवधान को कम करने के उद्देश्य से लिया गया है।

  • रुपये में मजबूती की गुंजाइश, चालू खाता घाटा घटने और एफटीए से निर्यात बढ़ने की उम्मीद

    रुपये में मजबूती की गुंजाइश, चालू खाता घाटा घटने और एफटीए से निर्यात बढ़ने की उम्मीद

    नई दिल्ली ।भारतीय रुपये में मौजूदा स्तर से स्थिरता आने के साथ आगे मजबूती की भी पर्याप्त गुंजाइश है। भारतीय रिजर्व बैंक की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि आने वाले वर्षों में चालू खाते का घाटा कम होने की उम्मीद है। इसके साथ वस्तुओं के निर्यात में बढ़ती सफलता और हाल के मुक्त व्यापार समझौतों से मिलने वाले अवसर रुपये की स्थिति को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

    31 मार्च 2025 से 16 सितंबर 2026 के बीच रुपया प्वाइंट-टू-प्वाइंट आधार पर कुल 13.1 प्रतिशत कमजोर हुआ है। ऐसे में मौजूदा स्तर से भारतीय मुद्रा के स्थिर होने और मजबूत होने की संभावना पर ध्यान दिया जा रहा है। पूनम गुप्ता ने कहा कि जब पूंजी प्रवाह से जुड़े उपाय पहली बार घोषित किए गए थे, तब बाजार विश्लेषकों ने भी रुपये के स्थिर होने और मजबूती की उम्मीद जताई थी।

    मुंबई में आयोजित एक सम्मेलन में पूनम गुप्ता ने कहा कि आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवस्थित परिस्थितियां सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय बैंक के पास कई दशकों के चालू खाते के घाटे या भुगतान संतुलन में दर्ज शुद्ध घाटे को पूरा करने की क्षमता है।

    भारत पारंपरिक रूप से चालू खाते में मामूली घाटा और पूंजी खाते में बड़ा अधिशेष दर्ज करता रहा है। इसी वजह से देश का कुल भुगतान संतुलन सामान्य तौर पर सकारात्मक रहा है। समय के साथ सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के मुकाबले चालू खाते का घाटा कम हुआ है, जिससे बाहरी क्षेत्र की स्थिति को मजबूती मिली है।

    पूनम गुप्ता के मुताबिक, भारत का चालू खाता घाटा उन स्तरों से काफी नीचे रहा है, जिन्हें आमतौर पर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए उचित माना जाता है। देश के शुद्ध सेवा निर्यात और विदेशों से आने वाला धन यानी प्रेषण भारतीय अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण संरचनात्मक ताकत बने हुए हैं। इन दोनों के मजबूत होने से वस्तुओं के व्यापार घाटे की भरपाई करने में मदद मिलती है और चालू खाता घाटे को जीडीपी के एक प्रतिशत से नीचे बनाए रखने में सहायता मिलती है।

    हालांकि, हाल में तेल और सोने की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव के कारण चालू खाते का घाटा अस्थायी रूप से बढ़ा है। इसके अलावा पिछले दो वर्षों के दौरान पूंजी खाते का अधिशेष भी चालू खाते के घाटे की तुलना में कम रहा। इसके परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 5 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर का नकारात्मक भुगतान संतुलन दर्ज हुआ।

    उन्होंने कहा कि भविष्य में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के बढ़ते इस्तेमाल और देश में तेल भंडार खोजने के प्रयासों से आयातित तेल पर भारत की निर्भरता कम होने की उम्मीद है। इससे जीडीपी के मुकाबले तेल की मांग में लंबे समय से जारी गिरावट की प्रवृत्ति और मजबूत हो सकती है।

    पूनम गुप्ता ने यह भी कहा कि यदि संघर्ष समाप्त होने के बाद तेल की कीमतों में स्थिरता आती है, तो बाहरी क्षेत्र को अतिरिक्त राहत मिल सकती है। इसके साथ हाल के मुक्त व्यापार समझौतों के सकारात्मक प्रभाव सामने आने और अनुकूल विनिमय दर की स्थिति बने रहने से आने वाले वर्षों में रुपये को मजबूती मिलने की संभावना बढ़ सकती है।

  • इंटरनेट बंद होने पर भी पेमेंट की तैयारी, RBI की HaRBInger पहल में e₹ के लिए खोजा जा रहा नया रास्ता

    इंटरनेट बंद होने पर भी पेमेंट की तैयारी, RBI की HaRBInger पहल में e₹ के लिए खोजा जा रहा नया रास्ता

    नई दिल्ली ।डिजिटल भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल के बीच इंटरनेट कनेक्टिविटी पर निर्भरता कम करने की दिशा में नई तकनीकों पर काम किया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक की HaRBInger Innovation Challenge पहल में ऑफलाइन डिजिटल भुगतान से जुड़े समाधान को भी शामिल किया गया है। इसके तहत डिजिटल रुपये यानी e₹ का इस्तेमाल इंटरनेट के बिना करने की संभावनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है।

    फिलहाल ज्यादातर डिजिटल भुगतान के लिए मोबाइल इंटरनेट और नेटवर्क कनेक्टिविटी की जरूरत होती है। ऐसे में कमजोर नेटवर्क वाले इलाकों, यात्रा के दौरान या इंटरनेट सेवा बाधित होने की स्थिति में डिजिटल भुगतान करना मुश्किल हो सकता है। ऑफलाइन भुगतान से जुड़ी तकनीक इसी समस्या का समाधान तलाशने की दिशा में एक प्रयास है।

    HaRBInger के तहत ऑफलाइन डिजिटल भुगतान के लिए Bluetooth और NFC जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की संभावनाएं देखी जा रही हैं। इन तकनीकों के जरिए आसपास मौजूद दो डिवाइस के बीच सीधे कनेक्शन स्थापित करके भुगतान से जुड़ी प्रक्रिया पूरी करने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।

    NFC यानी Near Field Communication ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए पास रखे दो संगत डिवाइस के बीच डेटा का आदान-प्रदान किया जा सकता है। वहीं Bluetooth के माध्यम से भी आसपास मौजूद डिवाइस को कनेक्ट किया जा सकता है। ऑफलाइन भुगतान के संभावित मॉडल में इन तकनीकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

    इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य डिजिटल भुगतान के लिए हर बार मोबाइल इंटरनेट पर निर्भरता को कम करना है। खास तौर पर ऐसे स्थानों पर इसका इस्तेमाल उपयोगी हो सकता है, जहां नेटवर्क कमजोर रहता है या इंटरनेट कनेक्टिविटी लगातार उपलब्ध नहीं होती।

    e₹ यानी डिजिटल रुपया केंद्रीय बैंक की ओर से जारी डिजिटल मुद्रा है। HaRBInger Innovation Challenge में Offline CBDC यानी ऑफलाइन e₹ को एक प्रमुख तकनीकी चुनौती के तौर पर शामिल किया गया है। यदि इससे जुड़े समाधान सफल होते हैं, तो इंटरनेट कनेक्टिविटी के बिना डिजिटल रुपये के इस्तेमाल की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

    कमजोर नेटवर्क वाले ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में इस तरह की तकनीक उपयोगी हो सकती है। इसके अलावा यात्रा के दौरान नेटवर्क नहीं मिलने या किसी क्षेत्र में अस्थायी रूप से इंटरनेट सेवा बाधित होने जैसी परिस्थितियों में भी ऑफलाइन डिजिटल भुगतान का विकल्प महत्वपूर्ण हो सकता है।

    हालांकि, अभी यह समझना जरूरी है कि ऑफलाइन e₹ भुगतान पर तकनीकी समाधान तलाशे जाने का अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति वर्तमान समय में तुरंत बिना इंटरनेट डिजिटल रुपये से भुगतान कर सकता है। यह पहल मुख्य रूप से ऐसी तकनीक विकसित करने और संभावित समाधान तलाशने से जुड़ी है।

    HaRBInger RBI का ग्लोबल हैकेथॉन है, जिसका उद्देश्य फिनटेक और डिजिटल भुगतान से जुड़ी नई तकनीकों तथा समाधान को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से अलग-अलग तकनीकी चुनौतियों के समाधान के लिए नए विचारों और नवाचारों को सामने लाने का प्रयास किया जाता है।

    वर्ष 2025 में शुरू की गई इस पहल में Tokenised KYC, Offline CBDC यानी e₹ और Enhancing Trust जैसी तीन प्रमुख चुनौतियों पर नवाचार के लिए ध्यान केंद्रित किया गया था। ऑफलाइन e₹ से जुड़ी तकनीक पर काम इसी व्यापक प्रयास का हिस्सा है।

    अगर भविष्य में सुरक्षित और प्रभावी ऑफलाइन भुगतान प्रणाली विकसित होती है, तो डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल उन परिस्थितियों में भी संभव हो सकता है, जहां सामान्य इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध नहीं रहती। हालांकि, इसके वास्तविक उपयोग, उपलब्धता और तकनीकी सीमाएं समाधान के सफल विकास तथा लागू होने के बाद ही स्पष्ट होंगी।

  • RBI का बड़ा फैसला…. 1 अक्‍टूबर से बदल जाएंगे FD के नियम, जानें ग्राहकों पर क्या होगा असर?

    RBI का बड़ा फैसला…. 1 अक्‍टूबर से बदल जाएंगे FD के नियम, जानें ग्राहकों पर क्या होगा असर?


    नई दिल्ली।
    हर महीने के शुरुआत की तरह अक्टूबर का महीना भी देश में कई बड़े बदलाव (Rule Change From 1st October) लेकर आ रहा है। ये चेंज बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposit) से जुड़े हुए हैं. दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India) एफडी के नियमों को बदलने (FD Rule Change) जा रहा है, जिसकी जगह पर नए फिक्‍स्‍ड डिपॉजिट के नियम लागू होंगे. इनमें FD Interest Rates समेत कई अन्य अपडेट भी शामिल किए जा रहे हैं. फिक्स्ड डिपॉजिट के नए नियम 1 अक्टूबर, 2026 से प्रभावी होंगे।


    3 करोड़ से ज्यादा FD पर ब्याज

    FD New Rules, जो 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने जा रहे हैं, ये सबसे ज्यादा बल्क डिपॉजिट से जुड़े हुए हैं. यहां जान लीजिए कि थोक जमा या Bulk FD Deposit का मतलब होता है कि 3 करोड़ रुपये या उससे ज्‍यादा की FD. आरबीआई की ओर से तय किए गए बदलावों के मुताबिक, बैंकों को एलसीआर ढांचे के तहत जमा या असुरक्षित थोक जमा पर लागू डिफरेंशियल रन-ऑफ रेट्स को ध्यान में रखते हुए थोक जमा पर डिफरेंशियल इंटरेस्‍ट रेट्स देने की स्वतंत्रता होगी।


    हर दिन ब्याज पर अपडेट

    भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ओर से बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट से जुड़े ब्याज नियमों में जो बदलाव लागू किया जा रहा है, उसका उद्देश्‍य बैंकों को ब्‍याज दरें तय करने में ज्‍यादा लचीलापन देना है. अब अक्टूबर महीने की पहली तारीख से से बैंकों को अपनी वेबसाइट पर जमा राशि, जिसमें थोक जमा भी शामिल हैं, पर दी जा रहीं ब्याज दरें दिखानी होंगी. थोक जमा पर देय ब्याज दरें हर कार्य दिवस को सुबह 10:00 बजे बैंक की वेबसाइट पर अपडेट की जाएंगी, जिसमें 10 मिनट का अतिरिक्त समय दिया जाएगा, और यह घोषणा अधिकतम 10:10 बजे तक की जानी अनिवार्य है।


    सभी शाखाओं में एक जैसी दरें

    RBI की ओर से बैंकों को ये निर्देश भी दिया गया है कि वे एक ही तारीख को स्‍वीकार की गई फिक्स्ड डिपॉजिट रकम पर एक समान ब्‍याज दर प्रदान करें. केंद्रीय बैंक के मुताबिक, किसी भी ब्रांच में एक ही तारीख को स्‍वीकार की गई समान अमाउंट की जमा राशियों पर दिए जाने वाले ब्‍याज के मामले में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।


    निवेशकों पर क्या होगा चेंज का असर?

    अब सबसे बड़ा सवाल ये कि आखिर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से 1 अक्टूबर 2026 से लागू किए जाने वाले इन एफडी निवेश से जुड़े बदलावों का आम निवेशकों पर क्या और कितना असर होगा? तो बता दें कि ये बदले हुए नियम बड़ी जमा राशि (3 करोड़ रुपये और उससे अधिक) से संबंधित हैं, इसलिए सावधि जमा निवेशकों पर इसका प्रभाव सीमित रहने की संभावना है. हालांकि, ये दिशा-निर्देश बैंकों में अधिक पारदर्शिता और एकरूपता लाएंगे।


    ‘Zero Risk’, जोरदार रिटर्न

    गौरतलब है कि सुरक्षित निवेश और जोरदार रिटर्न की बात होती है, तो बीते कुछ समय में एफडी स्कीम्स खासी पॉपुलर हुई हैं. खासतौर पर सीनियर सिटीजंस के लिए, क्योंकि एफडी में निवेश पर आम ग्राहकों की तुलना में बैंक इन निवेशकों को ज्यादा ब्याज ऑफर करते हैं, जो 8 से 9 फीसदी तक पहुंच जाता है. इसके अलावा तमाम बैंक अलग-अलग टैन्योर के लिए चलाई जा रहीं स्पेशल एफडी स्कीम पर एक्स्ट्रा ब्याज से साथ अन्य सुविधाएं भी ऑफर कर रहे हैं।