

दरअसल, इसी साल फरवरी में RBI के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को देखते हुए ग्राहकों को सुरक्षा देने के लिए इस योजना की घोषणा की थी। इसके तहत धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन की स्थिति में पीड़ित ग्राहक को शर्तों के साथ मुआवजा दिया जाएगा।
एक बार ही मिलेगा मुआवजा
RBI के प्रस्ताव के मुताबिक किसी ग्राहक को जीवन में केवल एक बार ही यह क्षतिपूर्ति दी जाएगी। यह भी तभी संभव होगा जब जांच में यह पाया जाए कि धोखाधड़ी जानबूझकर नहीं हुई और ग्राहक ने अनजाने में अपना पैसा गंवाया है।
ग्राहक को भी उठाना होगा कुछ नुकसान
प्रस्ताव के अनुसार धोखाधड़ी की कुल राशि का 15 प्रतिशत हिस्सा खाताधारक को खुद वहन करना होगा। वहीं, अगर ठगी की रकम इससे ज्यादा है, तब भी मुआवजे की अधिकतम सीमा 25,000 रुपये ही रहेगी।
कब से लागू होगा नियम
यह प्रस्तावित नियम 1 जुलाई 2026 या उसके बाद किए गए इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन पर लागू होंगे। केंद्रीय बैंक ने इस मसौदे पर 6 अप्रैल 2026 तक सभी हितधारकों से सुझाव और टिप्पणियां मांगी हैं।
इस योजना का लाभ लेने के लिए पीड़ित ग्राहक को
धोखाधड़ी वाले ट्रांजैक्शन की जानकारी अपने बैंक को देनी होगी
साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल या हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज करनी होगी
यह शिकायत 5 कैलेंडर दिनों के भीतर करना अनिवार्य होगा
ग्राहक सुरक्षा नियमों में भी बदलाव
RBI ने डिजिटल बैंकिंग में ग्राहकों की सुरक्षा बढ़ाने के लिए नियमों में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव भी दिया है। ड्राफ्ट के अनुसार OTP, PIN, CVV, पासवर्ड या अन्य इलेक्ट्रॉनिक ऑथेंटिकेशन के जरिए मंजूर किए गए ट्रांजैक्शन को अधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन माना जाएगा।
इसमें ऐसे मामलों को भी शामिल किया जाएगा, जहां ठग खुद को वैध प्राप्तकर्ता बताकर या दबाव बनाकर ग्राहकों से पैसे ट्रांसफर करा लेते हैं।
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किस तरह के पीड़ित को मिलेगा मुआवजा?
साइबर फ्रॉड के पीड़ितों को 25,000 रुपये का मुआवजा उन मामलों में भी दिया जाएगा जहां ग्राहक गलती से अपना वन-टाइम पासवर्ड (ओटीपी) धोखेबाजों के साथ साझा कर देते हैं। मतलब ये कि अगर आपने गलती से स्कैमर को ओटीपी शेयर कर दिया है और आपके बैंक से पैसे कट गए हैं तो आप इस स्कीम का लाभ लेने के लिए योग्य हैं।
सिर्फ एक बार ही लाभ
रिजर्व बैंक के गवर्नर ने स्पष्ट किया था कि पीड़ित को जीवन में केवल एक बार ही मुआवजा मिलेगा। कहने का मतलब है कि अगर आपके साथ बार-बार साइबर फ्रॉड होता है तो इस योजना का फायदा नहीं मिलेगा। आरबीआई अधिकारियों के मुताबिक डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में दो-तिहाई मामले 50,000 रुपये से कम के हैं। धोखाधड़ी से प्रभावित लोगों में से ज्यादातर को इस सुविधा से लाभ होगा। कैल्कुलेशन पर गौर करें तो धोखाधड़ी की राशि में से 15 प्रतिशत का नुकसान ग्राहक को उठाना होगा और 15 प्रतिशत का नुकसान संबंधित बैंक उठाएगा। शेष 70 प्रतिशत राशि केंद्रीय रिजर्व बैंक देगा। हालांकि किसी भी स्थिति में ग्राहक को 25,000 रुपये से अधिक का हर्जाना नहीं मिलेगा। आरबीआई 70 प्रतिशत नुकसान की भरपाई के लिए अपनी सरप्लस आय का इस्तेमाल करेगा। गर्वनर के मुताबिक इसके लिए केंद्रीय बैंक के पास पर्याप्त पैसा है। हालांकि, इस योजना का फ्रेमवर्क अभी तैयार नहीं है।
साइबर फ्रॉड से कैचे बचे
साइबर फ्रॉड से बचाव के लिए जरूरी है कि OTP, पासवर्ड, PIN, CVV कभी किसी को न बताएं। अनजान लिंक / QR कोड पर क्लिक / स्कैन न करें । मजबूत और अलग-अलग पासवर्ड रखें और 2FA (टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन) जरूर चालू करें। UPI और बैंकिंग में सावधानी पेमेंट से पहले हमेशा रिसीवर का नाम चेक करें। बैंक ऐप से ही ट्रांजेक्शन करें। अनजान नंबर से बैंक कॉल आए तो काट दें और खुद बैंक के ऑफिशियल नंबर पर कॉल करें। साइबर फ्रॉड होने पर तुरंत 1930 (साइबर क्राइम हेल्पलाइन) पर कॉल करें। इसके अलावा, cybercrime.gov.in पर कंप्लेंट दर्ज करें। वहीं, बैंक को तुरंत बताएं और अकाउंट फ्रीज/ब्लॉक करवाएं। साइबर फ्रॉड के मामले में अपने नजदीकी साइबर थाना जाकर भी आपको शिकायत दर्ज करानी होती है।

13 फरवरी तक आयोजन
आरबीआई द्वारा हर वर्ष जागरूकता अभियान चलाया जाता है। इस बार वित्तीय साक्षरता सप्ताह 2026 का आयोजन 13 फरवरी तक किया जा रहा है, जिसमें केवाईसी को लेकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। लोगों को केवाईसी से जुड़ी सभी जरूरी जानकारियां दी जाएंगी। इसमें बताया जाएगा कि केवाईसी एक जरूरी नियम है, लेकिन इसे पूरा करना आसान है। इसके लिए सुरक्षित और सुविधाजनक तरीके उपलब्ध हैं। इसके साथ ही, लोगों को सेंट्रल केवाईसी (सीकेवाईसी) की सुविधा के बारे में भी जानकारी दी जाएगी, जिससे केवाईसी प्रक्रिया और आसान हो जाती है।
बैंक खाते का गलत इस्तेमाल न करें
अभियान के दौरान लोगों को फर्जी कॉल, मैसेज और लिंक से सावधान रहने के लिए भी जागरूक किया जाएगा, क्योंकि इन्हीं के चलते कई बार साइबर ठगी होती है और लोगों को आर्थिक नुकसान भी होता है। कई बार लालच में आकर लोग अपने बैंक खाते का गलत इस्तेमाल करने देते हैं, जिससे उन्हें गंभीर कानूनी और आर्थिक परेशानी हो सकती है। सप्ताह के दौरान आरबीआई, बैंकों और अन्य संस्थाओं के सहयोग से देशभर में जागरूकता कार्यक्रम और संपर्क अभियान चलाए जाएंगे। इन गतिविधियों को पूरे साल जारी रखने की योजना है, जिससे कि लोगों पर इसका स्थायी असर पड़े।
भरोसेमंद बैंकिंग व्यवस्था की नींव है KYC
आरबीआई की तरफ से कहा गया है कि केवाईसी केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह सुरक्षित और भरोसेमंद बैंकिंग व्यवस्था की नींव है। सभी संबंधित संस्थाओं से अपील की गई है कि वह इस संदेश को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाएं। मंगलवार को कार्यशाला का उद्घाटन आरबीआई के क्षेत्रीय निदेशक रोहित पी दास, आरबीआई के मुख्य महाप्रबंधक चंदन कुमार ने किया। इस मौके पर नाबार्ड और राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद रहे।

अब तक भारत में जमा बीमा के लिए समान दर प्रणाली लागू थी, जो 1962 से चला आ रही थी। इसके तहत सभी बैंक अपने जमा पर प्रति 100 रुपये पर 12 पैसे का प्रीमियम जमा बीमा एवं ऋण गारंटी निगम को देते थे। बैंक कितना सुरक्षित है या उसकी वित्तीय स्थिति कैसी है, इसका इस दर पर कोई असर नहीं पड़ता था। आरबीआई का मानना है कि यह व्यवस्था बैंकों को बेहतर जोखिम प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित नहीं करती थी, इसलिए इसमें बदलाव जरूरी था।
क्या है नया जोखिम आधारित प्रीमियम मॉडल
नए मॉडल के तहत बैंकों को उनकी वित्तीय सेहत और जोखिम प्रोफाइल के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाएगा। इसके लिए पूंजी पर्याप्तता, एनपीए, लाभप्रदता, तरलता और पर्यवेक्षण रेटिंग जैसे मानकों को आधार बनाया जाएगा। अप्रैल 2026 से बैंकों को ए, बी, सी और डी-चार जोखिम श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाएगा। कम जोखिम वाले सुरक्षित बैंक कम प्रीमियम चुकाएंगे, जबकि अधिक जोखिम वाले बैंकों को ज्यादा प्रीमियम देना होगा।
कितनी होगी प्रीमियम दर
सबसे सुरक्षित बैंकों को अब प्रति 100 रुपये जमा पर सिर्फ आठ पैसे का प्रीमियम देना पड़ सकता है, जो मौजूदा दर से करीब 33 फीसदी कम है। श्रेणी बी के बैंक 10 पैसे, श्रेणी सी के बैंक 11 पैसे और श्रेणी डी (सबसे अधिक जोखिम) के बैंक 12 पैसे प्रीमियम का भुगतान करेंगे। इसका सीधा फायदा मजबूत बैलेंस शीट वाले बैंकों को मिलेगा, जबकि कमजोर बैंकों पर दबाव बढ़ेगा।
बैंकों के जोखिम का आकलन कैसे होगा
जोखिम आकलन के लिए दो मॉडल अपनाए जाएंगे। टियर-1 मॉडल अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को छोड़कर) पर लागू होगा, जिसमें पर्यवेक्षी रेटिंग, कैमल्स मानक और जमा बीमा कोष पर संभावित नुकसान को आधार बनाया जाएगा। टियर-2 मॉडल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों और सहकारी बैंकों के लिए होगा, जिसमें मात्रात्मक संकेतकों और संभावित नुकसान पर ध्यान दिया जाएगा।
पुराने और स्थिर बैंकों को अतिरिक्त राहत
आरबीआई ने इस व्यवस्था में एक ‘विंटेज इंसेंटिव’ भी जोड़ा है। जिन बैंकों का रिकॉर्ड लंबे समय तक स्थिर रहा है और जिन पर कोई बड़ा नियामकीय प्रतिबंध या पुनर्गठन नहीं हुआ है, उन्हें अतिरिक्त छूट मिलेगी। यह छूट सालाना एक फीसदी तक हो सकती है और अधिकतम 25 फीसदी तक जा सकती है।
जो बैंक इस ढांचे से बाहर रहेंगे
लोकल एरिया बैंक और पेमेंट्स बैंक जोखिम-आधारित प्रीमियम व्यवस्था से बाहर रहेंगे और पहले की तरह ₹100 जमा पर 12 पैसे की समान दर चुकाते रहेंगे। डेटा सीमाओं के कारण इनके लिए सटीक जोखिम मॉडलिंग संभव नहीं है। कुल प्रीमियम संग्रह में इनका योगदान 1% से भी कम है।
जमाकर्ताओं के लिए क्या बदलेगा?
इस बदलाव से जमाकर्ताओं की जमा सुरक्षा पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जमा बीमा कवर की सीमा और भुगतान प्रक्रिया पहले जैसी ही रहेगी। यानी बैंक डूबने की स्थिति में जमाकर्ताओं को मिलने वाली बीमा राशि में कोई कटौती नहीं होगी। हालांकि, मजबूत बैंकों के लिए लागत घटने से आगे चलकर इसका अप्रत्यक्ष लाभ ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम क्या है
जमा बीमा और ऋण गारंटी निगम, भारतीय रिजर्व बैंक की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था है। यह भारत में बैंक जमाकर्ताओं को जमा बीमा सुरक्षा प्रदान करता है, जो वर्तमान में प्रति जमाकर्ता ₹पांच लाख तक है। जमा बीमा योजना आरबीआई द्वारा लाइसेंस प्राप्त सभी बैंकों (वाणिज्यिक और सहकारी) के लिए अनिवार्य है। 31 मार्च, 2025 तक पंजीकृत बीमित बैंकों की संख्या 1,982 थी।
– आपकी जमा पहले की तरह सुरक्षित रहेगी, जमा बीमा कवर में कोई बदलाव नहीं।
– मजबूत बैंकों में भरोसा और बढ़ेगा।
– बैंक लागत घटने से बढ़ा सकते हैं ब्याज दर, यानी बेहतर एफडी दर और लोन पर कम ब्याज दर।
– कमजोर बैंकों पर बढ़ेगा दबाव।
– बैंक चुनते समय सतर्कता बढ़ेगी।
– बैंकिंग सिस्टम ज्यादा सुरक्षित होगा।

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार का सबसे बड़ा घटक फॉरेन करेंसी एसेट्स यानी एफसीए इस वृद्धि में प्रमुख कारण रहा। 16 जनवरी को समाप्त सप्ताह में एफसीए में 9.652 बिलियन डॉलर का इजाफा हुआ, जिससे इसकी कुल वैल्यू बढ़कर 560.518 बिलियन डॉलर हो गई। एफसीए में अमेरिकी डॉलर के साथ-साथ यूरो, पाउंड और जापानी येन जैसी प्रमुख वैश्विक मुद्राएं शामिल होती हैं, जिनका मूल्यांकन डॉलर के संदर्भ में किया जाता है।सोने के भंडार में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस अवधि में गोल्ड रिजर्व की वैल्यू 4.623 बिलियन डॉलर बढ़कर 117.454 बिलियन डॉलर हो गई। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में सोने को सुरक्षित निवेश माना जाता है और इसमें बढ़ोतरी भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति को मजबूत बनाती है।
हालांकि, स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स यानी एसडीआर और आईएमएफ में भारत की रिजर्व पोजिशन में हल्की गिरावट दर्ज की गई। एसडीआर की वैल्यू 35 मिलियन डॉलर घटकर 18.704 बिलियन डॉलर रह गई, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में रिजर्व पोजिशन 73 मिलियन डॉलर घटकर 4.684 बिलियन डॉलर पर आ गई।आंकड़ों पर नजर डालें तो इससे पहले 17 अक्टूबर 2025 को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 702.25 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंचा था। वहीं, देश का अब तक का ऑल-टाइम हाई विदेशी मुद्रा भंडार 704.89 बिलियन डॉलर रहा है, जो सितंबर 2024 में दर्ज किया गया था। मौजूदा आंकड़े उस रिकॉर्ड स्तर के बेहद करीब हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी देश के लिए मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक सेहत का अहम संकेतक होता है। यह न केवल आयात भुगतान और बाहरी झटकों से निपटने में मदद करता है, बल्कि मुद्रा विनिमय दर को स्थिर रखने में भी अहम भूमिका निभाता है। जब डॉलर के मुकाबले रुपये पर दबाव बढ़ता है, तब केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर रुपये को सहारा देता है।
बढ़ता हुआ विदेशी मुद्रा भंडार इस बात का संकेत भी है कि देश में विदेशी निवेश और डॉलर की आवक मजबूत बनी हुई है। इससे भारत की वैश्विक व्यापार क्षमता बढ़ती है और अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती मिलती है। कुल मिलाकर, विदेशी मुद्रा भंडार में यह उछाल भारत की आर्थिक स्थिति के लिए बेहद सकारात्मक और भरोसेमंद संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

मंत्रालय ने बताया कि खाद्य महंगाई इस दौरान कृषि श्रमिकों के लिए -1.8 प्रतिशत और ग्रामीण श्रमिकों के लिए -1.73 प्रतिशत रही। इस नकारात्मक महंगाई का मुख्य कारण खाद्य उत्पादन में वृद्धि के साथ कीमतों में गिरावट है। हाल के महीनों में उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में आई यह कमी विशेष रूप से कमजोर वर्गों के लिए राहत का संदेश लेकर आई है। इससे उनके पास खर्च करने के लिए अधिक धन उपलब्ध होता है और जीवन स्तर में सुधार की संभावना बढ़ती है।
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के अधीन श्रम ब्यूरो ने जून 2025 से कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का आधार वर्ष 2019=100 निर्धारित किया है। इस नए आधार वर्ष में 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 787 गांवों से आंकड़े एकत्रित किए गए। पुराने 1986-87=100 सीरीज को बदलकर सीपीआई-एएल और सीपीआई-आरएल की नई सीरीज लाई गई है। नई सीरीज में सूचकांक की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए दायरा और कवरेज काफी हद तक बढ़ाया गया और इसमें कार्यप्रणालीगत सुधार भी किए गए।
इस बीच सामान्य खुदरा महंगाई दर दिसंबर 2025 में 1.33 प्रतिशत रही जो नवंबर में 0.71 प्रतिशत थी। वहीं थोक कीमतों पर आधारित महंगाई दर दिसंबर में 0.83 प्रतिशत दर्ज की गई जबकि नवंबर में यह -0.32 प्रतिशत थी। थोक महंगाई में वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्मित वस्तुओं और खनिजों की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण हुई है।
आरबीआई का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2025-26 में खुदरा महंगाई दर करीब 2 प्रतिशत रह सकती है। इसकी वजह जीएसटी में कटौती और खाद्य उत्पादों की कीमतों में गिरावट को बताया गया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कृषि और ग्रामीण श्रमिकों के लिए खाद्य महंगाई में आई यह कमी आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे उनकी खरीद क्षमता बढ़ती है और जीवन यापन में आसानी होती है। सरकार की नीतियों और उत्पादन में बढ़ोतरी के कारण आने वाले महीनों में यह रुझान जारी रहने की उम्मीद है।

नई दिल्ली।
वित्तीय अनुशासन को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। रेगुलेटरी नियमों का लगातार उल्लंघन करने पर आरबीआई ने 35 नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है। इस कार्रवाई के साथ ही केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया है कि ये कंपनियां अब किसी भी तरह का एनबीएफसी से जुड़ा कारोबार नहीं कर सकेंगी। यह फैसला आम निवेशकों और कर्ज लेने वालों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी के रूप में भी देखा जा रहा है।दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक ने यह कार्रवाई आरबीआई एक्ट, 1934 की धारा 45-IA (6) के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए की है। केंद्रीय बैंक के अनुसार ये कंपनियां लंबे समय से जरूरी शर्तों और नियामकीय मानकों का पालन नहीं कर रही थीं, जिसके चलते उन्हें एनबीएफसी के रूप में काम करने की अनुमति वापस ले ली गई।
मामले में सामने आया है कि आरबीआई द्वारा सात जनवरी 2026 को जारी सर्कुलर में बताया गया है कि इन कंपनियों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने के आदेश अलग-अलग तारीखों पर 9 दिसंबर 2025 से 31 दिसंबर 2025 के बीच जारी किए गए थे। इसका सीधा मतलब है कि इन तारीखों के बाद ये कंपनियां कानूनी रूप से किसी भी तरह का एनबीएफसी कारोबार नहीं कर सकतीं।
क्यों हुई इतनी बड़ी कार्रवाई?
आरबीआई के मुताबिक, जिन 35 एनबीएफसी के खिलाफ यह कदम उठाया गया है, उन्होंने कई अहम नियमों का उल्लंघन किया। इनमें न्यूनतम नेट ओन्ड फंड (NOF) बनाए न रखना, पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CRAR) का पालन न करना, समय पर वित्तीय रिपोर्टिंग न करना और एसेट क्लासिफिकेशन से जुड़े मानकों की अनदेखी शामिल है। कई कंपनियां लंबे समय से निष्क्रिय (डोरमेंट) स्थिति में थीं, लेकिन इसके बावजूद उनका रजिस्ट्रेशन बरकरार था, जो वित्तीय प्रणाली के लिए जोखिम पैदा कर रहा था।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह कार्रवाई आरबीआई के ‘स्केल-बेस्ड रेगुलेशन’ और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की नीति का हिस्सा है। इससे पहले भी 2023 और 2024 में कई एनबीएफसी के लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं।
ये है 35 NBFCs की पूरी सूची
सत्य प्रकाश कैपिटल इन्वेस्टमेंट लिमिटेड
AG सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड
ALB लीजिंग एंड फाइनेंस लिमिटेड
ATM क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड
कॉर्पोरेट कैपिटल सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
डेसिसिव फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड
डिवाइन इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड
लिबर्टी प्राइवेट लिमिटेड सेल्स
पर्ल्स हायर परचेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड
क्वासर इंडिया फिनकैप प्राइवेट लिमिटेड
सनलाइफ सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड
सनराइज मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड
स्वितो फाइनेंस एंड एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड
त्रिवेणी विनिमय प्राइवेट लिमिटेड
ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी मार्केटिंग लिमिटेड
यूनिट्रॉन फिनलीज लिमिटेड
वीरा सिक्योरिटीज एंड फिनलीज प्राइवेट लिमिटेड
विनी फाइनेंशियल एंड मैनेजमेंट कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड
शिवोम इन्वेस्टमेंट एंड कंसल्टेंसी लिमिटेड
अधिनाथ इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड
एग्रोहा सेविंग्स लिमिटेड
अहुसंस फाइनेंस एंड इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड
अल्टर इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड
एसोसिएटेड लीजिंग लिमिटेड
अटलांटिक लीजिंग लिमिटेड
BHL फॉरेक्स एंड फिनलीज लिमिटेड
भरतपुरिया फाइनेंस एंड इन्वेस्टमेंट लिमिटेड
दादा देव फाइनेंस एंड लीजिंग प्राइवेट लिमिटेड
ईस्ट दिल्ली लीजिंग प्राइवेट लिमिटेड
इकोनॉमिक कैपिटल सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
ESN फाइनेंस एंड कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड
FMI इन्वेस्टमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड
गणपति फिनकैप सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड
गुडवर्थ सिक्योरिटीज प्राइवेट लिमिटेड
गोपाल ओवरसीज प्राइवेट लिमिटेड
बाजार और निवेशकों पर असर
आरबीआई के इस कदम को वित्तीय बाजार में सकारात्मक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। कमजोर और नियमों का पालन न करने वाली कंपनियों के बाहर होने से एनबीएफसी सेक्टर की साख मजबूत होगी। दूसरी ओर इससे जुड़ा एक पक्ष ये भी है कि जिन निवेशकों या ग्राहकों का पैसा इन कंपनियों में फंसा है, उनके लिए यह स्थिति चिंता का विषय हो सकती है। ऐसे मामलों में निवेशकों को कानूनी रास्ता अपनाना पड़ सकता है, क्योंकि आरबीआई इन कंपनियों के लेन-देन की गारंटी नहीं देता।
आम जनता के लिए आरबीआई की अहम सलाह
आरबीआई ने इस मौके पर आम लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि किसी भी निवेश, लोन या वित्तीय लेन-देन से पहले यह जरूर जांच लें कि संबंधित कंपनी आरबीआई में पंजीकृत है या नहीं। इसके लिए आरबीआई की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध एनबीएफसी की सूची देखी जा सकती है।

इसके अलावा, विदेशी क्रिप्टो एक्सचेंज, निजी वॉलेट और विकेंद्रीकृत प्लेटफॉर्म के कारण अधिकारियों के लिए टैक्सेबल इनकम का पता लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इनमें संपत्ति का असली मालिक भी आसानी से पता नहीं चल पाता।
अंतरराष्ट्रीय पहलू और चुनौतियां
विदेशों में होने वाली वर्चुअल डिजिटल संपत्ति की गतिविधियों में अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को भी एक समस्या बताया गया। इसमें कई देशों के नियम शामिल हो सकते हैं, जिससे फंड फ्लो को जांचना, टैक्स लायबिलिटी की पुष्टि करना और वसूली करना लगभग असंभव हो जाता है। हाल के महीनों में सूचना साझा करने के प्रयास होने के बावजूद, यह प्रक्रिया अब भी कठिन बनी हुई है। इससे कर अधिकारियों को लेन-देन की श्रृंखला का सही आकलन और पुनर्निर्माण करने की क्षमता प्रभावित होती है।
भारत की स्थिति और सुरक्षा उपाय
भारत उन देशों में शामिल है जो जोरदार लॉबिंग और कुछ सरकारों के दबाव के बावजूद अब तक क्रिप्टोकरेंसी और स्टेबलकॉइन को मंजूरी देने में हिचकिचा रहे हैं। इससे पहले, कई मौकों पर आरबीआई ने अपनी चिंताएं जताई हैं, जिनमें किसी भी अंतर्निहित परिसंपत्ति की कमी होना शामिल है, जो इसे निवेशकों के लिए जोखिम भरा बनाती है। यहां तक कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां भी खासतौर पर सावधान हैं क्योंकि वर्चुअल डिजिटल संपत्तियों का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकी वित्तपोषण के लिए किया जा सकता है।
आयकर विभाग ने कहा कि चूंकि क्रिप्टो प्लेटफॉर्म विदेशों में काम करते हैं, इसलिए समन जारी करना या टीडीएस वसूलना जैसी कानूनी कार्रवाई करना कठिन हो सकता है। कई एक्सचेंज फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट के साथ भी रजिस्टर्ड नहीं हैं और कर विभाग की पहुंच से बाहर हैं। भारतीय कर अधिकारियों ने लाभार्थियों को ट्रैक करने के लिए टीडीएस जैसे सुरक्षा उपाय बनाने की कोशिश की है और क्रिप्टो तथा अन्य वर्चुअल डिजिटल संपत्तियों में कारोबार करने वाली इकाइयों के पंजीकरण को भी अनिवार्य किया है।

दूसरा अहम कारण डॉलर की वैश्विक मजबूती है। अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों और मजबूत आर्थिक संकेतों के चलते डॉलर दुनियाभर की मुद्राओं के मुकाबले मजबूत बना हुआ है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर रिटर्न बढ़ता है तो वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिका की ओर रुख करते हैं। इसका असर भारत जैसे देशों की मुद्रा पर पड़ता है।भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है। अमेरिका द्वारा भारतीय निर्यात पर कुछ उत्पादों में ऊंची टैरिफ दरें लगाए जाने से भारतीय सामानों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा घटी है। इससे निर्यात से होने वाली डॉलर की आमद सीमित हुई है और चालू खाते के घाटे की चिंता बढ़ी है।
रुपये की गिरावट का असर आम आदमी की जिंदगी पर भी पड़ता है। कमजोर रुपये के कारण कच्चा तेल गैस इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं। इससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने और महंगाई में दोबारा तेजी आने का खतरा रहता है जिसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर पड़ता है।तेल आयात भी रुपये की कमजोरी की एक बड़ी वजह है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से भारत का आयात बिल बढ़ गया है। इससे व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है जो मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की गिरावट को थामने में भारतीय रिजर्व बैंक RBIकी भूमिका बेहद अहम है। आरबीआई जरूरत पड़ने पर बाजार में डॉलर बेचकर और तरलता का प्रबंधन कर रुपये की तेज गिरावट को रोक सकता है। हालांकि केंद्रीय बैंक आमतौर पर बहुत ज्यादा हस्तक्षेप से बचता है ताकि बाजार में अस्थिरता न बढ़े।लंबी अवधि में रुपये को स्थिर रखने के लिए सिर्फ मौद्रिक हस्तक्षेप काफी नहीं होगा। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश FDIऔर दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह को बढ़ावा देना होगा। मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से डॉलर की स्थायी आमद होगी।
निर्यात बढ़ाना भी रुपये को सहारा देने का एक अहम तरीका है। आईटी फार्मा इंजीनियरिंग और सेवा क्षेत्र के निर्यात में मजबूती आने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हो सकता है। इसके साथ ही अमेरिका और अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ संतुलित और स्पष्ट व्यापार समझौते विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ा सकते हैं।महंगाई पर नियंत्रण भी रुपये की स्थिरता के लिए जरूरी है। अगर महंगाई काबू में रहती है तो आरबीआई को नीतिगत समर्थन बनाए रखने में आसानी होती है और ब्याज दरों पर दबाव कम रहता है। मध्यम से लंबी अवधि में नीतिगत सुधार निवेश अनुकूल माहौल और निर्यात को बढ़ावा देने वाली रणनीतियां रुपये की गिरावट पर ब्रेक लगा सकती हैं।