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  • बैंकों के पास है बंपर सरप्लस कैश…. RBI ने एक ही दिन में ले लिए ₹71971 करोड़

    बैंकों के पास है बंपर सरप्लस कैश…. RBI ने एक ही दिन में ले लिए ₹71971 करोड़


    नई दिल्ली।
    देश के बैंकों (Banks) के पास इस समय जरूरत से ज्यादा नकदी (Cash) है। इसे कंट्रोल करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) ने बैंकों से 71,971 करोड़ रुपये एक दिन के लिए अपने पास ले लिए हैं। RBI ने इसके लिए 75,000 करोड़ रुपये की नीलामी रखी थी, लेकिन बैंकों ने 71,971 करोड़ रुपये ही उपलब्ध कराए।


    आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

    इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि आपके बैंक खाते से पैसा निकल जाएगा। आपके खाते में जमा रकम पर इसका कोई सीधा असर नहीं पड़ता। RBI का कदम मुख्य रूप से बैंकों के बीच मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने से जुड़ा है। बाजार में पैसे की उपलब्धता और ब्याज दरों पर इसका असर पड़ सकता है। इसका अप्रत्यक्ष असर आगे चलकर होम लोन, कार लोन या दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है, लेकिन केवल इस एक कदम से ब्याज दरों में तुरंत बदलाव जरूरी नहीं है।


    आखिर RBI ने ऐसा क्यों किया?

    इसे ऐसे समझें। अगर बैंकों के पास जरूरत से बहुत ज्यादा पैसा पड़ा रहता है तो वे उसे दूसरे बैंकों को उधार दे सकते हैं। इससे बाजार में कैश की मात्रा बढ़ती है और बहुत कम ब्याज पर पैसा उपलब्ध हो सकता है।

    RBI अतिरिक्त नकदी को कुछ समय के लिए अपने पास लेकर बाजार में पैसों की मात्रा को संतुलित करता है। इसके लिए VRRR यानी वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो जैसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता है।


    बैंकिंग सिस्टम में अभी भी खूब पैसा

    रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक 21 सितंबर तक बैंकिंग सिस्टम में करीब 4.92 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त कैश मौजूद था। इसका मतलब यह हुआ कि बैंकों के पास उनकी तत्काल जरूरत से काफी ज्यादा पैसा था। RBI पिछले कुछ समय से इस अतिरिक्त नकदी को धीरे-धीरे कम कर रहा है। इसके लिए उसने सरकारी बॉन्ड बेचकर भी बाजार से पैसा वापस खींचा है।


    RBI बार-बार पैसा क्यों खींच रहा है?

    बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी आने के कई कारण हैं। इनमें विदेशी मुद्रा से जुड़े लेनदेन, बैंकों में विदेशी मुद्रा जमा बढ़ना और केंद्रीय बैंक की कुछ वित्तीय गतिविधियां शामिल हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का लक्ष्य है कि बाजार में न तो पैसे की बहुत ज्यादा कमी हो और न ही जरूरत से बहुत ज्यादा पैसा पड़ा रहे। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए वह जरूरत के हिसाब से कभी पैसा बाजार में डालता है और कभी अतिरिक्त पैसा वापस खींचता है।

  • टाटा संस का IPO होगा लॉन्च…. RBI ने खारिज किया एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन

    टाटा संस का IPO होगा लॉन्च…. RBI ने खारिज किया एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन


    नई दिल्ली।
    अगर सबकुछ ठीक रहा तो जल्द ही टाटा ग्रुप (Tata Group) की होल्डिंग कंपनी टाटा संस (Tata Sons ) का आईपीओ (IPO) लॉन्च होगा। दरअसल, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) (Reserve Bank of India – RBI) ने टाटा संस को प्रमुख निवेश कंपनी के रूप में एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने के आवेदन को खारिज कर दिया है। इससे टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी हो गया है। कानूनी विशेषज्ञ एचपी रानीना और कॉरपोरेट गवर्नेंस विश्लेषक श्रीराम सुब्रमणियन ने कहा कि रिजर्व बैंक के फैसले के बाद टाटा संस के सामने लागू लिस्टिंग नियमों का पालन करने का विकल्प बचता है।


    रिटेल निवेशकों को क्या फायदा?

    टाटा संस के आईपीओ आने से इसमें रिटेल निवेशक हिस्सेदारी खरीद सकेंगे। अभी आम निवेशक टाटा ग्रुप की कंपनी टाटा मोटर्स, TCS, टाटा स्टील, टाटा केमिकल्स जैसी अलग-अलग लिस्टेड टाटा कंपनियों के शेयर खरीद सकते हैं लेकिन टाटा संस में सीधे निवेश नहीं कर सकते क्योंकि यह अनलिस्टेड है। अब अगर लिस्टिंग होती है तो शेयरों की खरीद-बिक्री की जा सकेगी।


    टाटा संस की कैसे बढ़ीं मुश्किलें

    दरअसल, आरबीआई ने सितंबर 2022 में टाटा संस को ‘अपर-लेयर’ की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) के रूप में वर्गीकृत किया था और ऐसी संस्थाओं के लिए तीन साल के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना अनिवार्य किया गया था। टाटा संस के लिए मूल समयसीमा 30 सितंबर 2025 रखी गई थी। टाटा संस ने इस दायित्व से बचने के लिए 2024 में 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुकाया और एनबीएफसी रजिस्ट्रेशन वापस लेने का आवेदन किया था। आरबीआई ने आवेदन पर फैसला लंबित रखा और बाद में भी टाटा संस को अपर-लेयर एनबीएफसी की सूचियों में शामिल करता रहा।


    जून 2026 में आरबीआई ने बदले नियम

    जून 2026 से आरबीआई ने कुछ नियमों में बदलाव किए। इसके तहत 1 लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक की एसेट्स वाली कोई भी एनबीएफसी अपने-आप अपर-लेयर श्रेणी में आ जाती है। मार्च, 2026 तक टाटा संस की परिसंपत्तियां दो लाख करोड़ रुपये से अधिक बताई गई हैं। अगस्त में जारी अपर-लेयर सूची में टाटा संस 17 संस्थाओं में एकमात्र गैर-सूचीबद्ध निजी इकाई थी। इस सूची में आरईसी, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन और भारतीय रेलवे वित्त निगम जैसी सरकारी एनबीएफसी भी शामिल हैं, जिन्हें सूचीबद्धता की अनिवार्यता से छूट हासिल है।

    शेयरधारकों में मतभेद
    हालांकि, टाटा संस के आईपीओ की राह में कई दिक्कतें भी हैं। सूत्रों की मानें तो सूचीबद्धता को लेकर टाटा संस के शेयरधारकों के बीच भी मतभेद हैं। नोएल टाटा की अध्यक्षता वाले टाटा ट्रस्ट्स के पास कंपनी की 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सेदारी है और वह सूचीबद्धता का विरोध करता रहा है। दूसरी ओर, करीब 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला शापूरजी पालोनजी समूह सूचीबद्धता के पक्ष में रहा है और इससे अपनी हिस्सेदारी का मूल्य हासिल करने की बात करता रहा है।


    चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति नहीं होने का भी कारण

    यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब टाटा संस में नेतृत्व और निदेशक मंडल को लेकर मतभेद की खबरें हैं। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने अगले साल फरवरी में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद पुनर्नियुक्ति नहीं लेने का फैसला किया है। ऐसी खबरें हैं कि टाटा संस की सूचीबद्धता का मुद्दा उन कारणों में भी शामिल था जिनकी वजह से नोएल टाटा ने चेयरमैन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया था। रतन टाटा के सौतेले भाई और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा टाटा संस के निदेशक मंडल के सदस्य भी हैं।

    चर्चा है कि वह चंद्रशेखरन से यह आश्वासन चाहते थे कि टाटा संस को सूचीबद्ध होने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। वहीं, चंद्रशेखरन ने कथित तौर पर कहा था कि किसी नियामकीय या कानूनी मामले के नतीजे को पहले से तय नहीं माना जा सकता। नोएल टाटा ने समूह के कुछ अन्य कारोबार में हो रहे घाटे का मुद्दा भी उठाया था। इनमें टाटा डिजिटल और एयर इंडिया शामिल हैं, जिन्हें चंद्रशेखरन के करीब एक दशक के कार्यकाल में शुरू या अधिग्रहीत किया गया था।

  • Crude Oil Price Rise: कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5 प्रतिशत पार होने का अनुमान, एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ाने को कहा

    Crude Oil Price Rise: कच्चे तेल की तेजी से महंगाई 6.5 प्रतिशत पार होने का अनुमान, एसबीआई रिसर्च ने रेपो रेट बढ़ाने को कहा

    नई दिल्ली ।वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और अन्य कमोडिटी की कीमतों में तेजी के बीच भारत में महंगाई को लेकर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है। एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत या उससे भी ऊपर जा सकती है। ऐसे में रिपोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक से मौद्रिक नीति के स्तर पर दरों में बढ़ोतरी करने की सलाह दी है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक को अक्टूबर में रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी करनी चाहिए। इसके बाद दिसंबर में भी 25 आधार अंक की अतिरिक्त वृद्धि का सुझाव दिया गया है। इस तरह कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी की जरूरत बताई गई है। इसके पीछे मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और कमोडिटी की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई पर पड़ने वाला संभावित असर है।

    एसबीआई रिसर्च के अनुमान के मुताबिक अगस्त में महंगाई दर करीब 4.8 से 4.9 प्रतिशत के बीच रह सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी रहने पर आने वाले महीनों में स्थिति बदल सकती है। रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर और नवंबर में महंगाई दर 6.5 प्रतिशत या उससे अधिक रहने की संभावना बन सकती है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल का बेंचमार्क 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है। अगले 15 दिनों में इसके 123 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की उम्मीद भी जताई गई है। कच्चे तेल की कीमतों में इस तरह की तेजी का असर अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों में लागत के रूप में दिखाई देने लगा है।

    रिपोर्ट के मुताबिक खुदरा महंगाई बढ़ने के शुरुआती संकेत पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, बेवरेज, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में दिखाई दे रहे हैं। इन क्षेत्रों में लागत का बढ़ता बोझ अब ग्राहकों तक पहुंचने की स्थिति बन रही है। रिपोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों को ब्याज दरों में कुल 50 आधार अंक की बढ़ोतरी के लिए अनुकूल आधार माना है।

    लिक्विडिटी के मोर्चे पर रिपोर्ट में कहा गया है कि हाल में जुटाए गए फंड काफी हद तक बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग जरूरतों को पूरा करते हैं। इसके साथ ही क्रेडिट की मजबूत मांग और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ के मजबूत आंकड़ों को देखते हुए मौजूदा तेजी में धीरे-धीरे कमी आने की उम्मीद जताई गई है।

    रिपोर्ट का अनुमान है कि यदि क्रेडिट की मांग अपेक्षा के अनुरूप पूरी होती है तो वित्त वर्ष 2027 के अंत तक सिस्टम में लिक्विडिटी सामान्य स्तर पर लौट सकती है। रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2027 के बाकी समय में लिक्विडिटी धीरे-धीरे कम होने की संभावना है और मार्च 2027 तक इसका स्तर आदर्श रूप से 6 लाख करोड़ रुपये होना चाहिए।

    बॉन्ड बाजार को लेकर भी रिपोर्ट में महत्वपूर्ण अनुमान दिया गया है। कई संकेतों के आधार पर 10 साल की भारतीय बेंचमार्क यील्ड के 7.15 प्रतिशत या उससे ऊपर जाने की संभावना जताई गई है।

    वैश्विक स्तर पर भी यील्ड में तेजी का रुझान बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक कई प्रमुख यील्ड पिछले दस वर्षों के उच्चतम स्तर से ऊपर जा रहे हैं। अमेरिकी यील्ड में भी तेजी देखने को मिल रही है और 10 साल की यील्ड करीब 5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि 30 साल की यील्ड घटकर 5.40 प्रतिशत के स्तर पर आ गई है।

  • आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर

    आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर


    नई दिल्ली ।
    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 44.9 अरब डॉलर बढ़कर 785.7 अरब डॉलर हो गया है। इस तेज बढ़ोतरी के साथ भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में रूस को पीछे छोड़ दिया है और अब चीन, जापान तथा स्विट्जरलैंड के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बढ़ोतरी को मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से डॉलर आकर्षित करने के लिए शुरू की गई एफसीएनआर (बी) जमा योजना के तहत आए बड़े फंड से जोड़ा गया है।

    785.7 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत के लिए महत्वपूर्ण बढ़त है। इस दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 44.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस बढ़ोतरी ने भारत को वैश्विक स्तर पर विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले प्रमुख देशों की सूची में रूस से आगे कर दिया है।

    विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में हालांकि एक समान वृद्धि नहीं हुई। सप्ताह के दौरान सोने के भंडार में 2.59 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई और यह घटकर 113.81 अरब डॉलर रह गया। सोने की कीमतों में गिरावट को इसके पीछे प्रमुख कारण बताया गया है। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य हिस्से में मजबूती के कारण कुल भंडार में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए अधिक गुंजाइश मिलती है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध होने से केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।

    मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के कारण आरबीआई को स्पॉट और फॉरवर्ड करेंसी मार्केट में भी हस्तक्षेप करने की अधिक क्षमता मिलती है। जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर जारी करके रुपये की कीमत में तेज गिरावट को रोकने की कोशिश कर सकता है। इस तरह विदेशी मुद्रा भंडार बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में काम करता है।

    इस बीच, विदेशी मुद्रा के बड़े पैमाने पर देश में आने से बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त लिक्विडिटी जमा हुई है। आरबीआई ने इसी अतिरिक्त तरलता को कम करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ बिक्री की घोषणा की है।

    केंद्रीय बैंक यह बिक्री तीन अलग-अलग किश्तों में करेगा। पहली नीलामी 17 सितंबर को होगी, जिसमें 50,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज बेची जाएंगी। इसके बाद 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये और 28 सितंबर को शेष 25,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री की जाएगी।

    आरबीआई के अनुसार, इन नीलामियों को मल्टी-सिक्योरिटी नीलामी के माध्यम से मल्टीपल-प्राइस मेथड के तहत किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य विदेशी मुद्रा के भारी इनफ्लो से बैंकिंग सिस्टम में बनी अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करना है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में हुई 44.9 अरब डॉलर की साप्ताहिक बढ़ोतरी के बाद भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है। रूस को पीछे छोड़कर चौथे स्थान पर पहुंचना देश के विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बड़ी वृद्धि को दर्शाता है।

  • आरबीआई के कदमों से भारत का भुगतान संतुलन मजबूत, वित्त वर्ष 2027 में 75 अरब डॉलर तक अधिशेष का अनुमान

    आरबीआई के कदमों से भारत का भुगतान संतुलन मजबूत, वित्त वर्ष 2027 में 75 अरब डॉलर तक अधिशेष का अनुमान

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने और घरेलू मुद्रा पर दबाव कम करने के लिए उठाए गए कदमों का असर भारत की बाहरी आर्थिक स्थिति पर दिखाई दे सकता है। एक रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में देश का भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट 65 से 75 अरब डॉलर के अधिशेष में रह सकता है।

    रिपोर्ट के अनुसार सेवा निर्यात और विदेशों से आने वाली रेमिटेंस में मजबूती भारत के चालू खाते को सहारा देगी। इसके चलते वित्त वर्ष 2027 में चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद के करीब 1 से 1.25 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान है। इससे बाहरी क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    विदेशी मुद्रा को देश में आकर्षित करने के लिए आरबीआई ने कई योजनाएं शुरू की हैं। इन उपायों के तहत कुल 136.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा प्रवाह आने का अनुमान है। इस बढ़े हुए प्रवाह ने देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के साथ रुपये के अवमूल्यन पर दबाव कम करने में भी मदद की है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों की बढ़ोतरी महत्वपूर्ण रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में 47.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई और देश का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 729.3 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया।

    आरबीआई की ओर से जून में शुरू की गई विदेशी मुद्रा आकर्षित करने वाली योजनाओं में एफसीएनआर यानी विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमा की अहम भूमिका रही। इन जमा के जरिए करीब 127.2 अरब डॉलर जुटाए गए, जो कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह का 90 प्रतिशत से अधिक है।

    इसके अलावा विदेशी मुद्रा में विदेशी कर्ज यानी ओएफसीबी के माध्यम से करीब 5.3 अरब डॉलर और बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी के जरिए 3.9 अरब डॉलर जुटाए गए। इस तरह विदेशी मुद्रा जुटाने के अलग-अलग माध्यमों ने देश की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में योगदान दिया।

    एफसीएनआर जमा को आकर्षक बनाने के लिए कई बैंकों ने तीन से पांच वर्ष की अवधि वाली जमा पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की। इन दरों को करीब 2 से 4 प्रतिशत के स्तर से बढ़ाकर 6 से 7 प्रतिशत तक किया गया। इससे एनआरआई के लिए भारत में विदेशी मुद्रा जमा रखने की आकर्षकता बढ़ी और बैंकों को अतिरिक्त विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिली।

    आरबीआई ने बाजार में अतिरिक्त तरलता को नियंत्रित करने के लिए भी कदम उठाए हैं। इसके तहत 6 अगस्त से 2 सितंबर के बीच कुल 53.5 लाख करोड़ रुपये की वीआरआरआर यानी वैरिएबल रेट रिवर्स रेपो नीलामियों की घोषणा की गई। इसका उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली में मौजूद अतिरिक्त नकदी का प्रबंधन करना है।

    इन उपायों की पृष्ठभूमि में बाहरी क्षेत्र पर बढ़े दबाव को भी देखा जा सकता है। मध्य पूर्व में संघर्ष और उससे जुड़े घटनाक्रम के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी तथा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां बढ़ाई थीं। महंगे तेल से आयात बिल बढ़ने और डॉलर की मांग बढ़ने के कारण रुपये पर दबाव बना था।

    हालांकि रिपोर्ट का आकलन है कि मजबूत सेवा निर्यात, रेमिटेंस और विदेशी मुद्रा प्रवाह ने भारत को इन बाहरी झटकों से निपटने के लिए पहले की तुलना में बेहतर स्थिति में पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य पूर्व की स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार और बाहरी वित्तीय स्थिति में सुधार से भारतीय अर्थव्यवस्था की लचीलापन क्षमता मजबूत हुई है।

  • UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    UPI पर MDR शुल्क को लेकर नया मॉडल तैयार, छोटे कारोबारियों को राहत देकर बड़े मर्चेंट्स से शुल्क लेने की तैयारी

    नई दिल्ली ।भारत में डिजिटल भुगतान के सबसे प्रमुख माध्यमों में शामिल UPI पर लंबे समय से शुल्क व्यवस्था को लेकर चर्चा होती रही है। मौजूदा व्यवस्था में आम तौर पर UPI लेनदेन पर सीधे मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR का बोझ नहीं पड़ता। इससे ग्राहकों के लिए भुगतान आसान और बिना अतिरिक्त शुल्क के बना हुआ है, लेकिन डिजिटल भुगतान से जुड़ी कंपनियों और बुनियादी ढांचे की लागत को लेकर वित्तीय दबाव की चर्चा लगातार सामने आती रही है।

    इसी चुनौती के बीच डेबिट कार्ड से जुड़े पुराने नियामकीय मॉडल को UPI के लिए संभावित आधार के तौर पर देखा जा रहा है। इस विचार के तहत शुल्क व्यवस्था ऐसी बनाई जा सकती है, जिसमें छोटे कारोबारियों को अतिरिक्त लागत से बचाया जाए और बड़े तथा संगठित कारोबारियों से सीमित शुल्क लिया जाए।

    डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों में छोटे कारोबारियों के लिए MDR की ऊपरी सीमा कम रखी गई है। सालाना 20 लाख रुपये से कम कारोबार करने वाले छोटे मर्चेंट्स के लिए अधिकतम MDR 0.40 प्रतिशत तक सीमित रखने का प्रावधान बताया गया है। इसी तरह के सिद्धांत को UPI में अपनाने पर छोटे किराना दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे कारोबारियों को शुल्क से पूरी तरह राहत देने का विकल्प बन सकता है।

    दूसरी ओर बड़े शोरूम, मॉल, ई-कॉमर्स कंपनियों और संगठित रिटेल कारोबार को अलग श्रेणी में रखा जा सकता है। ऐसे कारोबारियों से उनकी भुगतान क्षमता और कारोबार के आकार के अनुसार मामूली MDR लेने का प्रस्ताव चर्चा में है। इसका उद्देश्य UPI के संचालन और भुगतान व्यवस्था की लागत को साझा करना हो सकता है, बिना छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त बोझ डाले।

    इस संभावित मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू आम उपभोक्ताओं को सीधे शुल्क से बचाना है। बैंक खाते से दूसरे बैंक खाते में UPI के जरिए पैसे भेजने वाले ग्राहकों के लिए भुगतान मुफ्त रखने की कोशिश की जा सकती है। यानी शुल्क व्यवस्था लागू होने की स्थिति में भी इसका सीधा असर सामान्य व्यक्ति के प्रत्येक UPI भुगतान पर डालने से बचने का विकल्प रखा जा सकता है।

    UPI के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लेनदेन की संख्या और डिजिटल भुगतान प्रणाली को संचालित करने के लिए आवश्यक तकनीकी ढांचे की लागत भी बढ़ रही है। भुगतान कंपनियों को सर्वर, सुरक्षा, तकनीकी रखरखाव और अन्य व्यवस्थाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है। ऐसे में लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार की ओर से प्रोत्साहन राशि की जरूरत पड़ती है।

    प्रस्तावित मॉडल का एक उद्देश्य इस वित्तीय दबाव को कम करना भी हो सकता है। यदि बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लिया जाता है, तो भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों के लिए अतिरिक्त राजस्व का स्रोत बन सकता है। इससे तकनीकी ढांचे और साइबर सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

    हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि डेबिट कार्ड से जुड़े नियमों को UPI पर उसी रूप में लागू करना तय नहीं है। UPI की मौजूदा संरचना, भुगतान प्रक्रिया और इसमें शामिल संस्थाओं को देखते हुए किसी भी शुल्क मॉडल के लिए अलग नियम और शर्तें तय करनी पड़ सकती हैं।

    फिलहाल चर्चा का केंद्र यही है कि डिजिटल भुगतान की लोकप्रियता और मुफ्त लेनदेन की सुविधा बरकरार रखते हुए व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यदि छोटे कारोबारियों और आम ग्राहकों को सुरक्षित रखते हुए बड़े मर्चेंट्स से सीमित शुल्क लेने का मॉडल तैयार होता है, तो UPI के विस्तार और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

  • आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    आरबीआई की विशेष स्वैप योजना से बैंकों ने जुटाए 72.85 अरब डॉलर, एफसीएनआर जमा से आया सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा प्रवाह

    नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार अधिकृत डीलर बैंकों ने केंद्रीय बैंक की विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा के तहत 21 अगस्त 2026 तक कुल 72.848 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है। इसमें सबसे बड़ा योगदान विदेशी मुद्रा गैर-निवासी बैंक यानी एफसीएनआर(बी) जमा के जरिए आया है। इस माध्यम से बैंकों ने 65.397 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई है।

    आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक विशेष स्वैप सुविधा के तहत बाह्य वाणिज्यिक उधारी यानी ईसीबी और विदेशी मुद्रा उधारी ओएफसीबी के माध्यम से भी 7.451 अरब डॉलर की अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई है। इस तरह दोनों माध्यमों से आने वाला कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह 72.848 अरब डॉलर तक पहुंच गया है।

    केंद्रीय बैंक ने 8 जून 2026 को एफसीएनआर(बी) जमा, ईसीबी और ओएफसीबी से आने वाली विदेशी मुद्रा के लिए विशेष अमेरिकी डॉलर-रुपया स्वैप सुविधा शुरू की थी। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य घरेलू वित्तीय प्रणाली में विदेशी मुद्रा की उपलब्धता बढ़ाना और रुपये पर पड़ने वाले दबाव को कम करना था।

    योजना के तहत एफसीएनआर(बी) जमा के लिए सुविधा 31 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं ईसीबी और ओएफसीबी से जुड़ी स्वैप सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहेगी। आरबीआई ने पहले एफसीएनआर(बी) योजना की अंतिम तारीख 30 सितंबर निर्धारित की थी, लेकिन बाद में इसे घटाकर 31 अगस्त कर दिया गया।

    केंद्रीय बैंक ने समयसीमा में बदलाव का कारण योजना को मिली बेहतर प्रतिक्रिया और विदेशी मुद्रा जुटाने की तेज गति को बताया था। बैंकों ने विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने के लिए एफसीएनआर(बी) खातों पर ब्याज दरों में भी बढ़ोतरी की, जिससे इस योजना के तहत डॉलर प्रवाह को गति मिली।

    एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि एफसीएनआर(बी) योजना के तहत निर्धारित विदेशी मुद्रा जुटाने का लक्ष्य काफी हद तक पहले ही हासिल हो चुका है। रिपोर्ट में यह संभावना भी जताई गई थी कि अगस्त के बाकी दिनों में 25 से 30 अरब डॉलर का अतिरिक्त प्रवाह आ सकता है। ऐसे में कुल विदेशी मुद्रा संग्रह लगभग 85 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना व्यक्त की गई थी।

    रिपोर्ट के मुताबिक स्वैप सुविधा की लागत को भी बड़ी बाधा नहीं माना गया है। अनुमान के अनुसार योजना की कुल लागत करीब 10.5 अरब डॉलर या जुटाई गई कुल राशि का लगभग 15 प्रतिशत हो सकती है। हालांकि इस लागत को देश के बड़े विदेशी मुद्रा भंडार के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

    भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में भी हाल के सप्ताहों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। 14 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में देश का विदेशी मुद्रा भंडार 9.905 अरब डॉलर बढ़कर 716.90 अरब डॉलर हो गया। इससे पिछले सप्ताह भी भंडार में 14.1 अरब डॉलर की वृद्धि हुई थी।

    एफसीएनआर(बी) योजना के जरिए आई विदेशी मुद्रा ने बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थिति को मजबूत करने के साथ रुपये को भी सहारा दिया है। इसके अलावा बढ़ते विदेशी मुद्रा भंडार से भारत की बाहरी आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक बाजारों में होने वाले उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता बेहतर होती है। आने वाले दिनों में एफसीएनआर(बी) योजना के तहत होने वाली अतिरिक्त जमा और विदेशी मुद्रा प्रवाह पर बाजार की नजर बनी रहेगी।

  • आरबीआई ने एनबीएफसी से रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर मांगी राय, जोखिम नियंत्रण और आंतरिक अनुपालन मजबूत करने पर जोर

    आरबीआई ने एनबीएफसी से रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर मांगी राय, जोखिम नियंत्रण और आंतरिक अनुपालन मजबूत करने पर जोर

    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफसी के तेजी से बढ़ते कारोबार और नए डिजिटल लेंडिंग मॉडल से जुड़े जोखिमों को लेकर निगरानी बढ़ा दी है। केंद्रीय बैंक ने प्रस्तावित रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर एनबीएफसी से राय मांगी है। इसके साथ ही कंपनियों को मजबूत अनुपालन व्यवस्था, आंतरिक ऑडिट और जोखिम प्रबंधन ढांचे पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई है।

    आरबीआई और एनबीएफसी के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच हुई बैठक में तेजी से विस्तार कर रहे लेंडिंग सेगमेंट से जुड़े जोखिमों पर चर्चा हुई। केंद्रीय बैंक ने वित्तीय संस्थानों से कहा कि नए उत्पादों और कारोबारी मॉडल से जुड़े संभावित जोखिमों की पहचान शुरुआती स्तर पर ही की जाए, ताकि किसी कमजोरी के बड़े संकट में बदलने से पहले उसे नियंत्रित किया जा सके।

    रिवॉल्विंग क्रेडिट ऐसे ऋण या क्रेडिट सुविधा से संबंधित है, जिसमें ग्राहक निर्धारित सीमा के भीतर जरूरत के अनुसार राशि का इस्तेमाल कर सकता है और भुगतान के बाद उपलब्ध क्रेडिट सीमा फिर से उपयोग कर सकता है। इस तरह के उत्पादों के विस्तार के साथ उनके जोखिम और नियामकीय अनुपालन को लेकर भी केंद्रीय बैंक का ध्यान बढ़ा है।

    आरबीआई ने एनबीएफसी के आंतरिक नियंत्रण तंत्र को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। इसके तहत कंपनियों से अपेक्षा की गई है कि वे अपने कारोबार में जोखिमों की नियमित समीक्षा करें और आंतरिक ऑडिट व्यवस्था को प्रभावी बनाएं। खासतौर पर तेजी से विकसित हो रहे तकनीक आधारित उत्पादों में जोखिम की निगरानी को महत्वपूर्ण माना गया है।

    एनबीएफसी अक्सर टेक्नोलॉजी आधारित लेंडिंग उत्पादों और नए कारोबारी मॉडल को जल्दी अपनाने वाली वित्तीय संस्थाओं में शामिल होती हैं। डिजिटल माध्यमों से ग्राहकों तक पहुंच, ऋण आवेदन, मूल्यांकन और सर्विसिंग की प्रक्रिया तेज हुई है। ऐसे में इन कंपनियों के अनुभव से मिलने वाली जानकारी भविष्य में उभरते वित्तीय क्षेत्रों के लिए नियामकीय ढांचा तैयार करने में मददगार हो सकती है।

    केंद्रीय बैंक एनबीएफसी के नियामकीय ढांचे को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप और मजबूत बनाने पर भी विचार कर रहा है। इसका उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने के साथ नए कारोबारी मॉडल से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को समय रहते नियंत्रित करना है।

    बैठक में स्व-नियामक संगठनों यानी एसआरओ की भूमिका पर भी चर्चा हुई। आरबीआई ने स्पष्ट किया कि एसआरओ को समानांतर नियामक के रूप में काम नहीं करना चाहिए। उनकी भूमिका उद्योग में नियमों के अनुपालन को बढ़ावा देने और उभरते जोखिमों की पहचान तथा समाधान में सहयोग करने की होनी चाहिए। उन्हें उद्योग की पहली सुरक्षा पंक्ति के रूप में प्रभावी भूमिका निभाने की अपेक्षा की गई है।

    ग्राहक शिकायतों के समाधान को लेकर भी एनबीएफसी को स्पष्ट सलाह दी गई है। कंपनियों से कहा गया है कि वे शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करें और ग्राहकों की शिकायतों का समाधान निर्धारित समयसीमा के भीतर प्रभावी तरीके से सुनिश्चित करें। डिजिटल लेंडिंग के बढ़ते इस्तेमाल के बीच ग्राहक सेवा और पारदर्शिता को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

    इसके साथ ही एनबीएफसी को डिजिटल लेंडिंग से संबंधित मौजूदा नियामकीय ढांचे और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण कानून का पूरी तरह पालन करने को कहा गया है। ग्राहकों को जोड़ने, ऋण का आकलन करने और सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए तकनीक पर बढ़ती निर्भरता के कारण डेटा सुरक्षा और गोपनीयता का महत्व भी बढ़ गया है।

    आरबीआई की यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब एनबीएफसी क्षेत्र में नए डिजिटल उत्पादों और कारोबारी मॉडलों का तेजी से विस्तार हो रहा है। प्रस्तावित रिवॉल्विंग क्रेडिट नियमों पर उद्योग की राय लेने के साथ केंद्रीय बैंक जोखिम आधारित निगरानी को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आने वाले समय में इन सुझावों और नियामकीय समीक्षा के आधार पर एनबीएफसी क्षेत्र के लिए अनुपालन और जोखिम प्रबंधन से जुड़े नियमों में बदलाव की दिशा स्पष्ट हो सकती है।

  • आरबीआई के नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 50 अरब डॉलर तक पूंजी आने की संभावना, रिपोर्ट में बड़ा अनुमान

    आरबीआई के नियामकीय सुधारों से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में 50 अरब डॉलर तक पूंजी आने की संभावना, रिपोर्ट में बड़ा अनुमान


    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से हाल के महीनों में किए गए तरलता समर्थन उपायों और नियामकीय सुधारों से देश के बैंकिंग क्षेत्र में बड़े पूंजी प्रवाह की संभावना जताई गई है। एक रिपोर्ट के अनुसार, इन पहलों के चलते भारतीय बैंकिंग प्रणाली में करीब 50 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त पूंजी आ सकती है। इससे बैंकों की पूंजीगत स्थिति मजबूत होने के साथ विदेशी मुद्रा तरलता में भी सुधार की उम्मीद है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, आरबीआई की एफसीएनआर बी जमा योजना के तहत भारतीय बैंक अब तक 36.7 अरब डॉलर जुटा चुके हैं। उद्योग से जुड़े अनुमानों के अनुसार, विशेष सुविधा की निर्धारित समयसीमा समाप्त होने से पहले यह राशि बढ़कर करीब 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है। इससे बैंकों को विदेशी मुद्रा संसाधनों का अतिरिक्त आधार मिलेगा और वित्तीय प्रणाली की मजबूती बढ़ सकती है।

    भारतीय बैंकिंग क्षेत्र फिलहाल व्यापक नियामकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आरबीआई ने तरलता प्रबंधन, ऋण जोखिम, पूंजी पर्याप्तता, ग्राहक संरक्षण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल से जुड़े गवर्नेंस जैसे क्षेत्रों में सुधारों को आगे बढ़ाया है। इनका उद्देश्य बैंकिंग व्यवस्था को अधिक सुरक्षित, मजबूत और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना है।

    विदेशी मुद्रा जमा को बढ़ावा देने के लिए एफसीएनआर बी स्वैप सुविधा और अनिवासी भारतीयों की जमा दरों से संबंधित अस्थायी सीमा हटाने जैसे कदम भी उठाए गए हैं। इन उपायों से विदेशी जमाकर्ताओं के लिए भारतीय बैंकों में जमा करना अधिक आकर्षक हुआ है। साथ ही हेजिंग लागत में कमी आने से बैंकों को विदेशी मुद्रा संसाधन जुटाने में मदद मिली है।

    बैंकिंग क्षेत्र में हो रहे बदलाव केवल पूंजी जुटाने तक सीमित नहीं हैं। नियामकीय ढांचे में ऋण जोखिम और पूंजी प्रबंधन को लेकर भी महत्वपूर्ण परिवर्तन किए जा रहे हैं। अपेक्षित क्रेडिट नुकसान यानी ईसीएल ढांचे और संशोधित बेसल तीन क्रेडिट रिस्क मानदंडों की दिशा में बढ़ना बैंकिंग क्षेत्र के लिए अहम बदलाव माना जा रहा है।

    इन प्रावधानों का असर बैंकों की ऋण मूल्य निर्धारण रणनीति पर पड़ सकता है। बैंकों को यह आकलन करना होगा कि किसी ऋण के लिए कितनी पूंजी रखी जाए, जोखिम के अनुरूप ब्याज दर कैसे तय की जाए और अलग-अलग पोर्टफोलियो में जोखिम का प्रबंधन किस तरह किया जाए। इससे बैंकिंग कारोबार की लागत, पूंजी आवंटन और लाभप्रदता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    तकनीकी क्षेत्र में भी नियामकीय अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। एआई गवर्नेंस से जुड़े नियमों का उद्देश्य बैंकों में नई तकनीकों के इस्तेमाल के दौरान जोखिम, पारदर्शिता और ग्राहक हितों को सुरक्षित रखना है। आने वाले समय में वे बैंक अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रह सकते हैं जो पूंजी नियोजन, जोखिम प्रबंधन और तकनीकी गवर्नेंस में तेजी से बदलाव लागू करेंगे।

    आरबीआई के कदमों का असर भारत के बाहरी क्षेत्र पर भी दिखाई देने की संभावना जताई गई है। एक अन्य अनुमान के अनुसार, देश का पूंजी खाता अधिशेष बढ़कर करीब 108 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। पिछले वर्ष यह आंकड़ा लगभग 2 अरब डॉलर रहा था।

    भुगतान संतुलन को लेकर भी सकारात्मक अनुमान सामने आया है। वित्त वर्ष 2026-27 में भारत का भुगतान संतुलन करीब 64 अरब डॉलर के अधिशेष में रहने का अनुमान है। इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2025-26 में 23.6 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।

    यदि विदेशी मुद्रा प्रवाह और बैंकिंग क्षेत्र की पूंजी स्थिति में अपेक्षित सुधार होता है, तो इससे वित्तीय प्रणाली की स्थिरता को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, नियामकीय बदलावों का वास्तविक प्रभाव बैंकों की तैयारी, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों और घरेलू ऋण मांग सहित कई कारकों पर निर्भर करेगा।

  • भारत में वित्त वर्ष 2027 में 95 अरब डॉलर तक आ सकता है पूंजी प्रवाह, मजबूत एफसीएनआर निवेश से भुगतान संतुलन होगा बेहतर

    भारत में वित्त वर्ष 2027 में 95 अरब डॉलर तक आ सकता है पूंजी प्रवाह, मजबूत एफसीएनआर निवेश से भुगतान संतुलन होगा बेहतर

    नई दिल्ली । भारत की अर्थव्यवस्था के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में बाहरी वित्तीय मोर्चे पर राहत की उम्मीद बढ़ गई है। मजबूत फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट बैंक यानी एफसीएनआर (बी) जमा प्रवाह और भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए किए गए नीतिगत उपायों के चलते देश में 90 से 95 अरब डॉलर तक पूंजी प्रवाह आने का अनुमान है। इससे भारत की बाहरी स्थिति मजबूत होने के साथ भुगतान संतुलन में भी उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

    एक आकलन के अनुसार, वित्त वर्ष 2027 में भारत का भुगतान संतुलन यानी बैलेंस ऑफ पेमेंट्स करीब 64 अरब डॉलर के अधिशेष में रह सकता है। यह अनुमान पिछले वर्षों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति को दर्शाता है। वित्त वर्ष 2026 में भारत का भुगतान संतुलन 23.6 अरब डॉलर के अधिशेष में रहा था, जबकि वित्त वर्ष 2025 में करीब 5 अरब डॉलर का घाटा दर्ज किया गया था।

    अनुमान के मुताबिक एफसीएनआर (बी) के जरिए करीब 80 अरब डॉलर का प्रवाह हो सकता है। इसके अलावा बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा में बाहरी स्रोतों से मिलने वाली पूंजी से 10 से 15 अरब डॉलर अतिरिक्त आने की संभावना है। इन दोनों माध्यमों से आने वाले धन से देश के पूंजी खाते की स्थिति में भी बड़ा सुधार होने की उम्मीद है।

    पूंजी खाते का अधिशेष वित्त वर्ष 2027 में करीब 108 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जबकि वित्त वर्ष 2026 में यह केवल लगभग 2 अरब डॉलर रहा था। यदि यह अनुमान वास्तविक प्रवाह में बदलता है तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय स्थिरता और बाहरी भुगतान क्षमता को मजबूती मिल सकती है।

    विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए जून 2026 में घोषित नीतिगत उपायों का शुरुआती असर भी दिखाई दे रहा है। एफसीएनआर (बी) जमा, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा में बाहरी उधारी के लिए रियायती स्वैप व्यवस्था शुरू किए जाने के बाद विदेशी निवेशकों और बैंकों की ओर से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

    5 जून से 31 जुलाई 2026 के बीच इन उपायों के माध्यम से कुल 40.8 अरब डॉलर की पूंजी आकर्षित होने का अनुमान है। इसमें एफसीएनआर (बी) जमा का हिस्सा 36.7 अरब डॉलर रहा, जबकि बाहरी वाणिज्यिक उधारी और विदेशी मुद्रा आधारित बाहरी उधारी से करीब 4.1 अरब डॉलर आए।

    एफसीएनआर जमा को आकर्षक बनाने में ब्याज दरों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बड़े बैंक फिलहाल एफसीएनआर जमा पर लगभग 6 से 6.5 प्रतिशत तक ब्याज दे रहे हैं, जबकि कुछ छोटे और नए बैंक करीब 7 प्रतिशत तक की दर पेश कर रहे हैं। इससे प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा रखने वाले निवेशकों के लिए भारतीय बैंकिंग प्रणाली में धन रखने की दिलचस्पी बढ़ सकती है।

    मजबूत पूंजी प्रवाह का असर घरेलू बैंकिंग प्रणाली की तरलता पर भी पड़ने की संभावना है। जुलाई में बैंकिंग प्रणाली में औसत तरलता करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये रही थी, जो अगस्त में अब तक बढ़कर लगभग 3 लाख करोड़ रुपये हो गई है। महीने के अंत में आने वाले विदेशी पूंजी प्रवाह ने भी तरलता बढ़ाने में योगदान दिया है।

    भारत के लिए यह स्थिति ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक बाजारों में आर्थिक और वित्तीय अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। मजबूत पूंजी प्रवाह से देश को विदेशी भुगतान दायित्वों को पूरा करने में मदद मिल सकती है और वैश्विक अस्थिरता के दौरान बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता बेहतर हो सकती है। हालांकि पूंजी प्रवाह का वास्तविक स्तर वैश्विक ब्याज दरों, निवेशकों की धारणा और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।