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  • मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    मई में खुदरा महंगाई 3.93 प्रतिशत पर पहुंची, खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़े तो आलू और मटर ने दी राहत

    नई दिल्ली । देश में खुदरा महंगाई दर ने मई 2026 में एक बार फिर बढ़ोतरी का संकेत दिया है। सांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई दर मई में 3.93 प्रतिशत दर्ज की गई, जो अप्रैल के 3.48 प्रतिशत के मुकाबले अधिक है। यह वृद्धि ऐसे समय में सामने आई है जब खाद्य वस्तुओं की कीमतों में दबाव बढ़ रहा है और वैश्विक स्तर पर ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है।

    मई के दौरान ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महंगाई का असर अलग-अलग स्तर पर देखने को मिला। ग्रामीण क्षेत्रों में खुदरा महंगाई दर 4.25 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 3.53 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि ग्रामीण उपभोक्ताओं पर मूल्य वृद्धि का दबाव अपेक्षाकृत अधिक बना हुआ है।

    खाद्य महंगाई भी मई में बढ़ी है। अप्रैल में जहां खाद्य महंगाई दर 4.20 प्रतिशत थी, वहीं मई में यह बढ़कर 4.78 प्रतिशत तक पहुंच गई। ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य महंगाई 4.85 प्रतिशत रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 4.66 प्रतिशत दर्ज की गई। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव आम परिवारों के मासिक बजट पर पड़ता है, इसलिए इस श्रेणी के आंकड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

    हालांकि कुछ प्रमुख वस्तुओं की कीमतों में राहत भी देखने को मिली। सालाना आधार पर आलू की कीमतों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा मटर, जीरा तथा मोटर वाहन श्रेणी की कुछ वस्तुओं के दाम भी कम हुए हैं। वाहन बाजार में मोटर कार, जीप, मोटरसाइकिल और स्कूटर की कीमतों में आई गिरावट ने उपभोक्ताओं को कुछ राहत प्रदान की है।

    इसके विपरीत कई वस्तुओं की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया। चांदी के आभूषणों की कीमतों में सबसे अधिक वृद्धि देखी गई। इसके अलावा टमाटर, सोना-हीरा-प्लेटिनम आभूषण, अदरक और किशमिश जैसी वस्तुओं के दाम भी उल्लेखनीय रूप से बढ़े हैं। खाद्य और कीमती धातुओं से जुड़े उत्पादों की कीमतों में यह वृद्धि महंगाई के समग्र स्तर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में शामिल रही।

    राज्यों के स्तर पर देखें तो अधिक आबादी वाले राज्यों में तेलंगाना सबसे अधिक खुदरा महंगाई वाला राज्य रहा। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा का स्थान रहा। इन राज्यों में राष्ट्रीय औसत की तुलना में महंगाई का दबाव अधिक दर्ज किया गया, जिससे स्थानीय उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर असर पड़ सकता है।

    अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा कई बाहरी और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतें आयातित महंगाई का जोखिम बढ़ा रही हैं। यदि ऊर्जा लागत में और वृद्धि होती है तो परिवहन, उत्पादन और उपभोग से जुड़ी लागतें भी बढ़ सकती हैं।

    इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय रिजर्व बैंक ने भी आगामी वित्त वर्ष के लिए महंगाई अनुमान को ऊपर संशोधित किया है। कमजोर मानसून की आशंका, अल-नीनो का संभावित प्रभाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को प्रमुख जोखिम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बना रहा तो महंगाई दर आने वाले महीनों में आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

  • भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को मिलेगा सहारा, सन फार्मा की मेगा डील में SBI की एंट्री के संकेत

    भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को मिलेगा सहारा, सन फार्मा की मेगा डील में SBI की एंट्री के संकेत

    नई दिल्ली । भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे बड़े विदेशी अधिग्रहण सौदों में शामिल एक महत्वपूर्ण डील में देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक अहम भूमिका निभा सकता है। भारतीय स्टेट बैंक (SBI) अमेरिकी हेल्थकेयर कंपनी के अधिग्रहण के लिए सन फार्मा को करीब 1 अरब डॉलर तक की फंडिंग उपलब्ध कराने पर विचार कर रहा है। यदि बैंक के निदेशक मंडल से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तो यह भारतीय बैंकिंग क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय अधिग्रहण बाजार दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम साबित हो सकता है।

    यह प्रस्ताव ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजारों में अपनी उपस्थिति मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर अधिग्रहण और विस्तार योजनाओं पर काम कर रही हैं। फार्मास्यूटिकल क्षेत्र की अग्रणी कंपनी सन फार्मा ने अप्रैल में अमेरिका स्थित हेल्थकेयर कंपनी ऑर्गेनॉन एंड कंपनी के अधिग्रहण की घोषणा की थी। लगभग 12 अरब डॉलर मूल्य का यह सौदा भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में किए गए सबसे बड़े अधिग्रहणों में गिना जा रहा है।

    सूत्रों के अनुसार, SBI की ओर से प्रस्तावित 1 अरब डॉलर की फंडिंग फिलहाल बैंक के बोर्ड के समक्ष विचाराधीन है। अंतिम निर्णय बोर्ड की मंजूरी के बाद ही लिया जाएगा। यदि प्रस्ताव स्वीकृत होता है, तो SBI उन प्रमुख वित्तीय संस्थानों में शामिल हो जाएगा जो इस बहु-अरब डॉलर सौदे के लिए ऋण उपलब्ध करा रहे हैं।

    इस डील की विशेषता केवल इसका आकार नहीं है, बल्कि इसमें भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की बदलती भूमिका भी दिखाई देती है। लंबे समय तक भारतीय बैंकों की विदेशी अधिग्रहण सौदों में भागीदारी सीमित रही थी। इसके पीछे नियामकीय प्रतिबंध और जोखिम प्रबंधन से जुड़ी चिंताएं प्रमुख कारण थीं। परिणामस्वरूप भारतीय कंपनियां ऐसे बड़े सौदों के लिए प्रायः विदेशी बैंकों, निवेश फंडों और पूंजी बाजारों पर निर्भर रहती थीं।

    हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में नियमों में किए गए बदलावों के बाद परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं। केंद्रीय बैंक ने घरेलू बैंकों को कॉरपोरेट अधिग्रहणों के लिए वित्तपोषण की अनुमति दी है। इसके बाद भारतीय बैंक बड़े अंतरराष्ट्रीय सौदों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय कंपनियों के वैश्विक विस्तार को अतिरिक्त वित्तीय समर्थन प्रदान कर सकता है।

    प्रस्तावित फंडिंग व्यवस्था में कई बड़े अंतरराष्ट्रीय बैंक पहले से शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें वैश्विक वित्तीय क्षेत्र की प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं, जो इस अधिग्रहण के लिए ऋण संरचना तैयार कर रही हैं। ऐसे में SBI की संभावित भागीदारी न केवल इस डील की वित्तीय मजबूती बढ़ाएगी, बल्कि भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की वैश्विक उपस्थिति को भी मजबूत करेगी।

    हाल के वर्षों में भारतीय कंपनियों ने तकनीक, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्रों में कई बड़े विदेशी अधिग्रहण किए हैं। इन सौदों का उद्देश्य नए बाजारों तक पहुंच, उन्नत तकनीक हासिल करना और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत करना रहा है। अब घरेलू बैंकों की बढ़ती भागीदारी से ऐसी डील्स के लिए वित्त जुटाना और अधिक आसान हो सकता है।

    इस दिशा में SBI पहले ही अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर काम कर रहा है। बैंक ने जापान के प्रमुख वित्तीय समूह MUFG के साथ सहयोग बढ़ाने की पहल की है, जिसका उद्देश्य विलय और अधिग्रहण से जुड़े अवसरों का आकलन करना है। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय बैंक अब केवल पारंपरिक ऋणदाता की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वैश्विक कॉरपोरेट वित्तपोषण के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराना चाहते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह सौदा सफलतापूर्वक पूरा होता है, तो भविष्य में भारतीय कंपनियों के अंतरराष्ट्रीय विस्तार अभियानों में घरेलू बैंकों की भागीदारी और बढ़ सकती है। साथ ही यह भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ते आत्मविश्वास का भी संकेत माना जाएगा।

  • रेपो रेट स्थिर, अर्थव्यवस्था को मिला भरोसा; विकास की रफ्तार पर सकारात्मक असर

    रेपो रेट स्थिर, अर्थव्यवस्था को मिला भरोसा; विकास की रफ्तार पर सकारात्मक असर


    नई दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक (भारतीय रिजर्व बैंक) द्वारा नीतिगत रेपो दर को यथावत रखने के फैसले को अर्थशास्त्रियों और उद्योग जगत ने संतुलित और दूरदर्शी कदम बताया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखकर लिया गया है, जो दीर्घकालिक विकास की संभावनाओं को मजबूत करेगा।

    वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत
    विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत घरेलू मांग के कारण स्थिर बनी हुई है। पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने कहा कि मौजूदा नीति एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिससे मध्यम और दीर्घकालिक विकास के लिए अनुकूल माहौल बना रहेगा।

    मुद्रास्फीति और ब्याज दरों पर नजर
    विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि मुद्रास्फीति बढ़कर 5.9 प्रतिशत के करीब पहुंचती है, तो आने वाले समय में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है। हालांकि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है और आरबीआई का रुख स्थिरता बनाए रखने पर केंद्रित है।

    विदेशी निवेश और मुद्रा बाजार को समर्थन
    अर्थशास्त्रियों ने यह भी कहा कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश, बाहरी वाणिज्यिक उधारी और एनआरआई जमा जैसे उपायों से विदेशी मुद्रा प्रवाह को मजबूती मिल रही है। इससे रुपये की स्थिरता को भी समर्थन मिला है और बाजार में सकारात्मक संकेत देखे जा रहे हैं।

    रियल एस्टेट और बैंकिंग सेक्टर को राहत
    बैंकिंग और हाउसिंग सेक्टर के विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिर ब्याज दरों से ऋण प्रवाह बेहतर होगा और रियल एस्टेट सेक्टर को सीधा लाभ मिलेगा। इससे आवास की मांग में भी वृद्धि होने की उम्मीद है।

    कुल मिलाकर विशेषज्ञों की राय है कि RBI का यह कदम फिलहाल स्थिरता और भरोसा बनाए रखने वाला है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक चुनौतियों के बीच मजबूती देता है और भविष्य में विकास की राह को सुरक्षित बनाता है।

  • RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    RBI MPC बैठक के बीच SBI चेयरमैन का बड़ा बयान, कहा- फिलहाल ब्याज दरों में बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर

    नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बीच भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के चेयरमैन सीएस शेट्टी ने ब्याज दरों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों में ब्याज दरों में किसी प्रकार का बदलाव न होना अर्थव्यवस्था के लिए अधिक लाभदायक रहेगा। उनके अनुसार इस समय नीतिगत दरों में स्थिरता बनाए रखने से आर्थिक गतिविधियों को संतुलित समर्थन मिलेगा और विकास की रफ्तार भी बनी रहेगी। बाजार की सामान्य धारणा भी यही संकेत देती है कि आरबीआई फिलहाल रेपो रेट में किसी बड़े बदलाव से बच सकता है।

    एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना केंद्रीय बैंक की प्रमुख जिम्मेदारी होती है। ऐसे में वर्तमान परिस्थितियों में ब्याज दरों को स्थिर रखना एक व्यावहारिक कदम माना जा सकता है। उनका मानना है कि स्थिर ब्याज दरें उद्योग, कारोबार और उपभोक्ताओं को स्पष्ट संकेत देती हैं, जिससे निवेश और ऋण गतिविधियों को निरंतरता मिलती है। उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था इस समय सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और इसे स्थिर नीतिगत समर्थन की आवश्यकता है।

    एसबीआई चेयरमैन ने निवेशकों को सलाह देते हुए कहा कि शेयर बाजार में होने वाले रोजाना उतार-चढ़ाव को लेकर अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक ताकत उसकी दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता में निहित है। बैंकिंग क्षेत्र में सुधार, डिजिटल क्रांति, वित्तीय समावेशन और तेजी से विकसित हो रहा बुनियादी ढांचा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। उनका कहना है कि निवेशकों को अल्पकालिक बाजार गतिविधियों के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक संभावनाओं पर ध्यान देना चाहिए।

    सीएस शेट्टी ने वैश्विक आर्थिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया के कई हिस्सों में भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी समस्याएं और तकनीकी परिवर्तन जैसी चुनौतियां बनी हुई हैं। इसके बावजूद भारत एक स्थिर और भरोसेमंद अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में आर्थिक सुधारों और निवेश के अनुकूल वातावरण ने भारत को वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

    डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर भी उन्होंने भारत की उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) आज देश की सबसे बड़ी तकनीकी सफलताओं में शामिल है। हर महीने अरबों डिजिटल लेनदेन यूपीआई के माध्यम से किए जा रहे हैं, जिससे नकदी पर निर्भरता कम हुई है और भुगतान प्रणाली अधिक तेज, सुरक्षित तथा पारदर्शी बनी है। उन्होंने बताया कि एसबीआई की डिजिटल सेवाओं की सफलता उसकी मजबूत तकनीकी संरचना और ग्राहकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।

    उन्होंने वित्तीय समावेशन में जनधन खाते, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार ‘जेएएम ट्रिनिटी’ ने करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में अहम योगदान दिया है। इसके साथ ही डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) प्रणाली ने सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद की है। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और विभिन्न योजनाओं में होने वाली संभावित अनियमितताओं में कमी आई है।

    भारत की भविष्य की विकास यात्रा पर बात करते हुए सीएस शेट्टी ने कहा कि आने वाले वर्षों में देश को बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी। उन्होंने बताया कि बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, ऊर्जा परिवर्तन, शहरी विकास, एमएसएमई और नवाचार जैसे क्षेत्रों में विशाल निवेश अवसर मौजूद हैं। उनके अनुसार ग्रामीण विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और प्रतिस्पर्धी विनिर्माण क्षेत्र भारत की आर्थिक प्रगति के प्रमुख आधार बनेंगे।

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर भी उन्होंने सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उनका मानना है कि भारत एआई तकनीक के उपयोग और विस्तार के मामले में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक बन सकता है। उन्होंने बताया कि एसबीआई पहले से कई बैंकिंग सेवाओं में एआई आधारित प्रणालियों का उपयोग कर रहा है और इसके लिए जिम्मेदार तथा सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने हेतु विशेष ढांचा भी विकसित किया गया है।

    कर्ज की मांग के संबंध में उन्होंने कहा कि छोटे और मध्यम उद्योगों सहित विभिन्न क्षेत्रों में ऋण की मांग मजबूत बनी हुई है। बैंक लगातार उद्यमियों और व्यवसायों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही बैंक विलय एवं अधिग्रहण से जुड़े वित्तपोषण के क्षेत्र में भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत की मजबूत आर्थिक नींव, डिजिटल प्रगति और निवेश क्षमता देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिलाने में मदद करेगी।

  • भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    भू-राजनीतिक तनाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक संकेत, विकास और महंगाई को लेकर RBI आश्वस्त

    नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था को लेकर एक सकारात्मक और भरोसेमंद तस्वीर पेश की है। केंद्रीय बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया के कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि, बढ़ती महंगाई और वैश्विक तनावों के दबाव में हैं। इसके बावजूद भारत की विकास दर को स्थिर और मजबूत माना गया है, जिसका प्रमुख कारण घरेलू मांग की मजबूती और आर्थिक नीतियों में निरंतरता बताया गया है।

    रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम निर्यात निर्भरता और मजबूत घरेलू खपत के कारण वैश्विक झटकों से बेहतर तरीके से निपटने में सक्षम है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं का प्रभाव भारत पर सीमित रहने की संभावना जताई गई है। केंद्रीय बैंक ने यह भी संकेत दिया है कि आने वाले समय में आर्थिक गतिविधियां संतुलित गति से आगे बढ़ती रह सकती हैं, हालांकि बाहरी जोखिमों पर सतत निगरानी आवश्यक होगी।

    वैश्विक परिदृश्य को लेकर रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष, दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। इसके कारण ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, आपूर्ति श्रृंखला में बाधा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मंदी जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के आधार पर वैश्विक विकास दर में भी हल्की गिरावट का संकेत दिया गया है, जिससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है।

    इसके विपरीत भारत की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई गई है। रिपोर्ट में मजबूत बैंकिंग प्रणाली, कॉर्पोरेट सेक्टर की स्थिर वित्तीय स्थिति, सरकार के बढ़ते पूंजीगत व्यय और पर्याप्त खाद्यान्न भंडार को प्रमुख ताकतों के रूप में रेखांकित किया गया है। कृषि उत्पादन की स्थिरता भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इन सभी कारकों के आधार पर आरबीआई ने माना है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां और अधिक खराब नहीं होतीं तो भारत 6.9 प्रतिशत की विकास दर हासिल कर सकता है।

    महंगाई को लेकर भी रिपोर्ट में संतुलित दृष्टिकोण रखा गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगभग 4.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे में मानी जा रही है। खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता और कृषि उत्पादन की मजबूती को महंगाई नियंत्रण का प्रमुख आधार बताया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव भविष्य में जोखिम पैदा कर सकते हैं।

    कृषि क्षेत्र पर मौसम की स्थिति का प्रभाव भी रिपोर्ट में उल्लेखित किया गया है। मानसून की अनिश्चितता और संभावित अल नीनो प्रभाव से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, हालांकि इंडियन ओशन डिपोल के सकारात्मक रहने की संभावना से कुछ राहत की उम्मीद जताई गई है। इसके साथ ही श्रम सुधारों और नए लेबर कोड के लागू होने से रोजगार सृजन और उत्पादकता में सुधार की संभावना भी व्यक्त की गई है।

    विदेशी व्यापार और बैंकिंग क्षेत्र को लेकर भी रिपोर्ट में भरोसा जताया गया है। सेवा निर्यात, विदेशी रेमिटेंस और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों से भारत के बाहरी क्षेत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पर्याप्त पूंजी और मजबूत स्थिति में बताते हुए किसी भी वैश्विक वित्तीय झटके से निपटने में सक्षम माना गया है।

  • डॉलर पर निर्भरता घटाने और आर्थिक सुरक्षा के लिए भारत समेत कई देश बढ़ा रहे सोने का भंडार

    डॉलर पर निर्भरता घटाने और आर्थिक सुरक्षा के लिए भारत समेत कई देश बढ़ा रहे सोने का भंडार


    नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है, जिससे घरेलू खपत और आयात बिल पर नियंत्रण रखा जा सके। वहीं दूसरी ओर सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लगातार अपने सोने के भंडार को बढ़ा रहे हैं, जिससे सवाल उठ रहा है कि एक तरफ आम लोगों को सोना खरीदने से क्यों रोका जा रहा है और दूसरी तरफ सरकारी स्तर पर इसकी खरीद क्यों जारी है।

    आंकड़ों के अनुसार,भारतीय रिजर्व बैंक के पास वर्तमान में करीब 880 टन से अधिक सोना भंडार है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लगातार सोने की खरीद बढ़ाई है और वैश्विक गोल्ड रिजर्व रैंकिंग में भी अपनी स्थिति मजबूत की है। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर पर निर्भरता कम करना और आर्थिक स्थिरता को मजबूत बनाना है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर भी कई देश जैसे चीन, तुर्किये और पोलैंड अपने गोल्ड रिजर्व को तेजी से बढ़ा रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर पर घटता भरोसा माना जा रहा है। खासकर 2022 में रूस के विदेशी मुद्रा भंडार पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बाद कई देशों ने डॉलर की निर्भरता कम करने की रणनीति अपनाई है।

    सोने को सुरक्षित संपत्ति माना जाता है क्योंकि यह किसी एक देश की मुद्रा या नीतियों पर निर्भर नहीं होता। इसी कारण केंद्रीय बैंक इसे अपने रिजर्व में बढ़ा रहे हैं। भारत भी इसी रणनीति के तहत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को संतुलित करने और आर्थिक जोखिम कम करने के लिए सोना खरीद रहा है।

    हालांकि, दूसरी तरफ भारत में सोने का आयात भारी मात्रा में डॉलर खर्च करता है। भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना आयात करता है, जिससे देश का आयात बिल बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है। यही कारण है कि सरकार आम लोगों से सोने की खरीद सीमित करने की अपील कर रही है ताकि घरेलू मांग नियंत्रित रहे और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो।

    आंकड़ों के अनुसार, पिछले वर्ष भारत ने सोने पर भारी खर्च किया है, लेकिन ऊंची कीमतों के कारण खपत में गिरावट भी देखी गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में अगर सोने की कीमतें और बढ़ती हैं तो आयात और भी महंगा हो जाएगा।

    कुल मिलाकर, एक तरफ सरकार वैश्विक आर्थिक सुरक्षा और डॉलर जोखिम से बचाव के लिए सोना जमा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू अर्थव्यवस्था और आयात बिल को नियंत्रित रखने के लिए जनता से सोने की खरीद कम करने की अपील की जा रही है।

  • 1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत

    1991 का आर्थिक संकट: जब भारत ने सोना गिरवी रखकर बदली अपनी किस्मत



    नई दिल्ली। भारत के आर्थिक इतिहास में 1991 का साल एक निर्णायक मोड़ माना जाता है। उस समय देश गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए सोने का सहारा लेना पड़ा।

    कैसे पैदा हुआ आर्थिक संकट?
    1991 के दौरान भारत कई आर्थिक चुनौतियों से घिरा हुआ थाविदेशी मुद्रा भंडार बहुत तेजी से घट गया थादेश के पास कुछ ही दिनों के आयात के लिए पैसा बचा थाखाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गई थींनिर्यात में गिरावट और कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा था
    इन परिस्थितियों ने देश को डिफॉल्ट की कगार पर पहुंचा दिया था।

    क्यों गिरवी रखना पड़ा सोना?
    संकट इतना गहरा था कि सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को तत्काल कदम उठाना पड़ा। विदेशी कर्ज चुकाने के लिए फंड की जरूरत थीअंतरराष्ट्रीय बाजार में भरोसा बनाए रखना जरूरी थाभुगतान संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका थाऐसे में भारत ने अपने स्वर्ण भंडार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा सहायता जुटाई।

    कितना सोना इस्तेमाल हुआ?
    रिपोर्ट्स के अनुसार उस समय लगभग 47 टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान को भेजा गया।करीब 20 टन सोना स्विट्जरलैंड के बैंक के पास गिरवी रखा गया यह सोना देश की अर्थव्यवस्था को तुरंत राहत देने के लिए इस्तेमाल किया गया।

    किसने संभाली जिम्मेदारी?
    इस कठिन फैसले के पीछे देश की आर्थिक टीम शामिल थीतत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखरअर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंहवित्त मंत्री यशवंत सिन्हाRBI के वरिष्ठ अधिकार यह निर्णय बेहद गोपनीय तरीके से लिया गया था ताकि बाजार में घबराहट न फैले।

    कैसे भेजा गया सोना?
    मुंबई एयरपोर्ट से विशेष सुरक्षा में सोना विदेश भेजा गया

    इसे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय बैंकों में गिरवी रखा गया

    इसके बदले भारत को तत्काल विदेशी मुद्रा सहायता मिली

    क्या मिला फायदा?
    इस कदम के बादभारत को तत्काल आर्थिक राहत मिलीदेश डिफॉल्ट होने से बच गयाबाद में 1991 के आर्थिक सुधारों का रास्ता खुला।  यही सुधार आगे चलकर भारत की उदारीकरण नीति की नींव बने।1991 का सोना गिरवी संकट भारत के लिए एक चेतावनी था कि आर्थिक अनुशासन कितना जरूरी है।उस समय लिए गए कठिन फैसलों ने देश को दिवालिया होने से बचाया और एक नई आर्थिक दिशा दी।

  • RBI ने 6 माह में भारत में शिफ्ट किया 104 टन सोना…. जानें विदेशी मुद्रा भंडार का हाल

    RBI ने 6 माह में भारत में शिफ्ट किया 104 टन सोना…. जानें विदेशी मुद्रा भंडार का हाल


    नई दिल्ली।
    भारत (India) के विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (Reserve Bank of India- RBI) ने पिछले छह महीनों में अपने सोने के भंडार का बड़ा हिस्सा देश के भीतर शिफ्ट किया है, जिससे गोल्ड की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है।


    6 महीने में 104 टन सोना देश में शिफ्ट

    आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 से मार्च 2026 के बीच करीब 104.23 मीट्रिक टन सोना विदेश से भारत लाया गया। इसके साथ ही देश में रखा गया कुल सोना बढ़कर 290.37 मीट्रिक टन हो गया है। हालांकि, कुल गोल्ड रिजर्व में बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। मार्च 2026 तक RBI के पास कुल 880.52 मीट्रिक टन सोना है, जो सितंबर 2025 के 880.18 टन से थोड़ा ही ज्यादा है।

    विदेश में अभी भी कितना सोना रखा है
    आरबीआई अभी भी अपने सोने का एक बड़ा हिस्सा विदेश में सुरक्षित रखता है। करीब 197.67 मीट्रिक टन सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ इंटरनेशनल सेटेलमेंट्स (BIS) के पास सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा 2.80 टन सोना गोल्ड डिपॉजिट के रूप में है।


    गोल्ड की हिस्सेदारी में तेज बढ़ोतरी

    सोने की कीमतों में आई तेजी का सीधा असर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भी पड़ा है।मार्च 2026 तक फॉरेक्स रिजर्व में गोल्ड की हिस्सेदारी बढ़कर 16.7% हो गई, जो छह महीने पहले 13.92% थी। यह दिखाता है कि RBI धीरे-धीरे अपने रिजर्व में गोल्ड का महत्व बढ़ा रहा है।


    विदेशी मुद्रा भंडार का हाल

    भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार में विदेशी मुद्रा संपत्ति (FCA) का बड़ा हिस्सा है। कुल विदेशी मुद्रा 552.28 अरब डॉलर है। इसमें से 465.61 अरब डॉलर सिक्योरिटीज में निवेश है। 46.83 अरब डॉलर अन्य केंद्रीय बैंकों और BIS में जमा है। 39.84 अरब डॉलर विदेशी कमर्शियल बैंकों में जमा है।

    रणनीति में क्या बदलाव दिख रहा: रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि RBI धीरे-धीरे अपनी रणनीति बदल रहा है। सिक्योरिटीज और विदेशी बैंकों में जमा राशि थोड़ी घटाकर, अन्य केंद्रीय बैंकों और BIS में जमा बढ़ाई गई है।


    क्या है इसका मतलब

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम वैश्विक अनिश्चितता के बीच सुरक्षा बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सोना एक सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए RBI अपने रिजर्व को ज्यादा स्थिर बनाने की दिशा में काम कर रहा है।

  • भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 703 अरब डॉलर के पार, आरबीआई के आंकड़े जारी..

    भारत का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 703 अरब डॉलर के पार, आरबीआई के आंकड़े जारी..


    नई दिल्ली।पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक सकारात्मक खबर सामने आई है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 703.3 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यह बढ़ोतरी हाल के सप्ताह में दर्ज की गई है, जिसमें भंडार में लगभग 2.3 अरब डॉलर की वृद्धि देखी गई है। यह संकेत देता है कि बाहरी चुनौतियों के बावजूद देश की वित्तीय स्थिति स्थिर बनी हुई है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में यह वृद्धि ऐसे समय में हुई है जब पिछले कुछ महीनों से इसमें उतार-चढ़ाव देखा जा रहा था। वैश्विक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता के कारण पहले भंडार पर दबाव बना था, जिससे इसमें गिरावट भी दर्ज की गई थी। हालांकि हाल के आंकड़े बताते हैं कि स्थिति अब धीरे-धीरे संतुलन की ओर बढ़ रही है।

    कुछ समय पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार अपने रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया था, लेकिन उसके बाद वैश्विक तनाव और मुद्रा बाजार में बदलाव के चलते इसमें कमी आई थी। अब फिर से इसमें सुधार देखने को मिल रहा है, जो आर्थिक स्थिरता के लिहाज से एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

    इस दौरान देश के सोने के भंडार में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है और यह 122 अरब डॉलर से अधिक के स्तर पर पहुंच गया है। इसके अलावा विशेष आहरण अधिकार और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की स्थिति में भी हल्का सुधार देखने को मिला है। ये सभी संकेत मिलकर देश की बाहरी आर्थिक मजबूती को दर्शाते हैं।

    विदेशी मुद्रा भंडार किसी भी देश की आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार होता है। यह आयात भुगतान, विदेशी व्यापार और मुद्रा स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है। मजबूत भंडार से देश को वैश्विक झटकों का सामना करने की क्षमता मिलती है और निवेशकों का भरोसा भी मजबूत होता है।

    हालिया बढ़ोतरी यह संकेत देती है कि वैश्विक दबाव के बावजूद भारत की आर्थिक स्थिति स्थिर बनी हुई है और धीरे-धीरे और मजबूत हो रही है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार में यह सुधार आर्थिक संतुलन की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।

  • RBI का बड़ा फैसला: ₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट पर नहीं लगेगा OTP, डिजिटल पेमेंट हुआ आसान

    RBI का बड़ा फैसला: ₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट पर नहीं लगेगा OTP, डिजिटल पेमेंट हुआ आसान


    नई दिल्ली। डिजिटल पेमेंट को आसान और सुरक्षित बनाने के लिए Reserve Bank of India (RBI) ने ई-मैंडेट से जुड़े नए नियम लागू कर दिए हैं। इस नए फ्रेमवर्क के तहत अब ₹15,000 तक के ऑटो-पेमेंट के लिए हर बार OTP डालने की जरूरत नहीं होगी।

    क्या है नया नियम?
    RBI की ओर से जारी Digital Payment E-Mandate Framework 2026 के अनुसार, बार-बार होने वाले ट्रांजैक्शन (Recurring Payments) को आसान बनाने के लिए यह बदलाव किया गया है। नए नियम के तहत ₹15,000 तक के भुगतान बिना OTP के पूरे हो सकेंगे, जबकि इससे ज्यादा राशि के ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त सुरक्षा के तौर पर OTP जरूरी होगा। हालांकि, कुछ खास कैटेगरी जैसे बीमा, म्यूचुअल फंड और क्रेडिट कार्ड बिल के लिए ₹1 लाख तक के ऑटो-पेमेंट बिना OTP के किए जा सकेंगे। यह सुविधा ग्राहकों को बार-बार OTP डालने की झंझट से राहत देगी।

    ई-मैंडेट क्या होता है?
    ई-मैंडेट एक ऐसी सुविधा है, जिसमें ग्राहक पहले से किसी पेमेंट की अनुमति दे देता है। इसके बाद तय समय पर अपने आप खाते से पैसे कट जाते हैं। यह सुविधा आमतौर पर OTT सब्सक्रिप्शन, मोबाइल बिल, EMI और इंश्योरेंस प्रीमियम जैसे भुगतान के लिए इस्तेमाल होती है।

    हर ट्रांजैक्शन से पहले मिलेगा अलर्ट
    RBI के नए नियम के मुताबिक, हर ऑटो-पेमेंट से कम से कम 24 घंटे पहले ग्राहक को नोटिफिकेशन भेजा जाएगा। इस नोटिफिकेशन में मर्चेंट का नाम, पेमेंट की राशि, तारीख और समय जैसी सभी जरूरी जानकारी दी जाएगी। ग्राहक SMS या ईमेल के जरिए यह अलर्ट प्राप्त कर सकता है।

    बदलाव या कैंसिल करने का नियम
    अगर ग्राहक ई-मैंडेट में कोई बदलाव करना चाहता है या उसे बंद करना चाहता है, तो इसके लिए OTP जरूरी होगा। ग्राहक किसी भी समय ऑटो-पेमेंट को रोक (opt-out) सकता है, लेकिन इसके लिए भी सुरक्षा प्रक्रिया का पालन करना होगा। पहला ट्रांजैक्शन हमेशा OTP के साथ ही पूरा किया जाएगा। अगर रजिस्ट्रेशन के समय ही पेमेंट किया जाता है, तो दोनों प्रक्रियाएं एक साथ पूरी हो सकती हैं। कुछ मामलों में प्री-नोटिफिकेशन जरूरी नहीं होगा, जैसे FASTag और नेशनल कॉमन मोबिलिटी कार्ड (NCMC) के ऑटो रिचार्ज। इन सेवाओं में ऑटो-पेमेंट पहले से तय नियमों के तहत जारी रहेगा। RBI के इस नए कदम से डिजिटल पेमेंट सिस्टम को और ज्यादा सुविधाजनक और सुरक्षित बनाने की कोशिश की गई है। इससे ग्राहकों को राहत मिलेगी और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।