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  • रूस के अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स में भीषण विस्फोट से 7 लोगों की मौत, छह चीनी नागरिक शामिल, नौ अब भी लापता

    रूस के अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स में भीषण विस्फोट से 7 लोगों की मौत, छह चीनी नागरिक शामिल, नौ अब भी लापता

    नई दिल्ली । रूस के सुदूर पूर्वी अमूर क्षेत्र में मंगलवार को एक बड़े गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स में हुए भीषण विस्फोट और आग ने औद्योगिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में छह चीनी नागरिकों समेत सात लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई है, जबकि नौ अन्य चीनी कर्मचारी अब भी लापता बताए जा रहे हैं। घटना के बाद परिसर में राहत और बचाव अभियान चलाया गया तथा हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी गई है।

    यह हादसा अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स की पाइरोलिसिस यूनिट के एक सहायक तकनीकी हिस्से में हुआ। जानकारी के अनुसार जिस समय विस्फोट हुआ, उस दौरान संयंत्र में उपकरणों की अंतिम टेस्टिंग और कमीशनिंग का काम चल रहा था। अचानक हुए धमाके के बाद परिसर में आग फैल गई, जिससे वहां मौजूद कर्मचारियों में अफरा तफरी मच गई।

    प्लांट की प्रेस सर्विस के अनुसार घटना के बाद लगी आग पर काबू पा लिया गया है। कंपनी की ओर से यह भी बताया गया कि संयंत्र के मुख्य उपकरणों को नुकसान नहीं पहुंचा है। हालांकि हादसे में जान गंवाने वाले लोगों और लापता कर्मचारियों को लेकर स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। नौ चीनी कर्मचारियों के बारे में अब तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आने से उनके परिवारों और संबंधित अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है।

    अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स रूस और चीन के बीच औद्योगिक सहयोग से जुड़ी एक बड़ी परियोजना है। यह परिसर रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में विकसित किया जा रहा है और इसके निर्माण तथा विकास में रूस की सिबुर और चीन की सिनोपेक जैसी कंपनियों की भागीदारी है। ऐसे में हादसे में चीनी नागरिकों के प्रभावित होने से दोनों देशों के स्तर पर भी घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है।

    प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक विस्फोट मुख्य पाइरोलिसिस यूनिट के एक सहायक तकनीकी हिस्से में हुआ। उस समय वहां अंतिम परीक्षण और कमीशनिंग से जुड़ा काम चल रहा था। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि विस्फोट की वास्तविक वजह क्या थी। तकनीकी खराबी, उपकरणों से जुड़ी समस्या या किसी अन्य कारण की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

    रूसी जांच अधिकारियों की कार्रवाई के बाद हादसे के कारणों को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आने की उम्मीद है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि घटना के समय संयंत्र में किस तरह का तकनीकी काम चल रहा था और सुरक्षा मानकों का पालन किस स्तर तक किया गया था। साथ ही विस्फोट के बाद आग फैलने की परिस्थितियों और कर्मचारियों की मौजूदगी से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा सकती है।

    हादसे ने एक बार फिर बड़े औद्योगिक संयंत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और परीक्षण के दौरान अपनाए जाने वाले मानकों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेष रूप से ऐसे परिसर में जहां गैस और रासायनिक प्रक्रियाओं से जुड़े संवेदनशील उपकरण मौजूद हों, वहां छोटी तकनीकी गड़बड़ी भी गंभीर दुर्घटना का रूप ले सकती है। फिलहाल प्रशासन और संबंधित एजेंसियों का मुख्य ध्यान लापता कर्मचारियों की तलाश, प्रभावित लोगों की पहचान और दुर्घटना की वास्तविक वजह सामने लाने पर है।

  • जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति

    जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में नई दिशा देने के उद्देश्य से व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग से जुड़े अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक मॉस्को में हुई। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने बैठक की सह-अध्यक्षता की। इस दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग से जुड़े अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए और कई प्रमुख क्षेत्रों में व्यावहारिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

    दो दिवसीय रूस यात्रा पर पहुंचे जयशंकर ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव से मुलाकात की। बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद भारत और रूस के संबंधों में लगातार मजबूती और अनुकूलन क्षमता दिखाई दी है। दोनों देशों के बीच आपसी हित और विश्वास को रणनीतिक साझेदारी का आधार बताया गया।

    जयशंकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2021-22 में करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार 2025-26 में बढ़कर लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। व्यापार में यह वृद्धि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की क्षमता को दर्शाती है, लेकिन इसके साथ व्यापार असंतुलन भी काफी बढ़ा है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि व्यापार घाटे का अंतर करीब 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। उन्होंने इस असंतुलन को दूर करना भारत और रूस के बीच आर्थिक संबंधों की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताया। दोनों पक्षों के बीच व्यापार को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने के लिए नए अवसर तलाशने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

    बैठक में ऊर्जा, उर्वरक, परमाणु सहयोग, कनेक्टिविटी, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और मानव संसाधन की आवाजाही जैसे क्षेत्रों को विशेष महत्व दिया गया। जयशंकर ने कहा कि बदलते वैश्विक आर्थिक और तकनीकी माहौल में दोनों देशों को नए क्षेत्रों की संभावनाओं की पहचान करते हुए सहयोग का दायरा बढ़ाना होगा।

    उन्होंने भारत और रूस के बीच आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने में उद्योग जगत की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार सरकारें व्यापार और निवेश के लिए आवश्यक ढांचा तैयार कर सकती हैं, लेकिन वास्तविक निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन में कारोबारी क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका रहती है। इसलिए संस्थागत तंत्र को उद्योग की प्राथमिकताओं के साथ लगातार जोड़े रखने की आवश्यकता है।

    जयशंकर ने कहा कि अंतर-सरकारी आयोग के विभिन्न कार्य समूहों और उप-समूहों को केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि तय लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने समस्या समाधान और व्यावहारिक परिणामों को भविष्य की बैठकों की सफलता का प्रमुख आधार बताया।

    बैठक के बाद जयशंकर ने मंटुरोव को आयोग की सह-अध्यक्षता के लिए धन्यवाद दिया और चर्चा को उत्पादक बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बैठक उपयोगी रही। भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों में आर्थिक सहयोग को और व्यापक बनाने तथा नई तकनीकी और रणनीतिक जरूरतों के अनुरूप साझेदारी विकसित करने पर दोनों पक्षों का जोर रहा।

  • पुतिन ने PM मोदी की जमकर की तारीफ, भारतीय किसानों के लिए रूस देगा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक

    पुतिन ने PM मोदी की जमकर की तारीफ, भारतीय किसानों के लिए रूस देगा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक

    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत और रूस के रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की है। सोमवार को मॉस्को में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान पुतिन ने कहा कि दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में पीएम मोदी की व्यक्तिगत भूमिका अहम रही है। उन्होंने जयशंकर से प्रधानमंत्री मोदी तक अपना गर्मजोशी भरा अभिवादन पहुंचाने को भी कहा।

    मुलाकात के दौरान पुतिन ने भारत के कृषि क्षेत्र को लेकर भी अहम भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि रूस भारत को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक यानी खाद उपलब्ध कराने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है। इससे भारतीय किसानों के लिए खाद की उपलब्धता को लेकर राहत की उम्मीद बढ़ी है।

    भारत-रूस व्यापार में फिर दिख रही तेजी

    पुतिन ने कहा कि 2025 में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में कुछ गिरावट आई थी, लेकिन अब इसमें सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने व्यापारिक रिश्तों में दोबारा तेजी आने के पीछे कई वजहों का जिक्र किया और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत ध्यान को खास तौर पर रेखांकित किया।

    रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि पीएम मोदी भारत-रूस संबंधों के विकास में व्यक्तिगत रुचि लेते हैं और यही दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    मोदी से जल्द मुलाकात की उम्मीद

    पुतिन ने जयशंकर के सामने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की इच्छा भी जाहिर की। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों नेताओं की मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (SCO) से जुड़े कार्यक्रम के दौरान हो सकती है। इसके अलावा कार्यक्रम और समय-सारिणी के अनुसार साल के अंत में भी दोनों नेताओं की मुलाकात की संभावना जताई गई।

    भारतीय किसानों के लिए रूस का बड़ा भरोसा

    बैठक में उर्वरक आपूर्ति का मुद्दा भी अहम रहा। पुतिन ने कहा कि रूस भारत की कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए खाद की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है।

    भारत के लिए यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि उर्वरकों की उपलब्धता सीधे खेती की लागत और उत्पादन से जुड़ी है। खासकर बुवाई के मौसम में खाद की समय पर उपलब्धता किसानों के लिए बेहद अहम होती है।

    सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है सहयोग

    पुतिन ने भारत और रूस के बीच सहयोग को केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं बताया। दोनों देश परमाणु ऊर्जा, हाईटेक, रक्षा और रणनीतिक तकनीक समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं।

    भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत साझेदारी रही है। अब दोनों देश व्यापार और आर्थिक सहयोग को भी नए क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

    मोदी की तारीफ का क्या है मतलब?

    जयशंकर के साथ मुलाकात के दौरान पुतिन की ओर से पीएम मोदी की व्यक्तिगत भूमिका का उल्लेख ऐसे समय हुआ है, जब भारत और रूस अपने पारंपरिक रणनीतिक रिश्तों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग के नए क्षेत्रों में विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

    ऐसे में एक तरफ पुतिन का मोदी की नेतृत्वकारी भूमिका की तारीफ करना और दूसरी तरफ भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा देना, दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

  • मॉस्को और रोस्तोव को बनाया निशाना, रातभर चले यूक्रेनी ड्रोन हमलों में बुजुर्ग समेत छह लोगों की जान गई

    मॉस्को और रोस्तोव को बनाया निशाना, रातभर चले यूक्रेनी ड्रोन हमलों में बुजुर्ग समेत छह लोगों की जान गई

    नई दिल्ली ।रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में रविवार को हवाई हमलों का एक बड़ा दौर देखने को मिला। यूक्रेन की ओर से रूस के कई इलाकों में रातभर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले किए जाने की जानकारी सामने आई है। रूसी अधिकारियों के अनुसार, हवाई सुरक्षा बलों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में 822 यूक्रेनी ड्रोन को नष्ट किया। इस हमले में कम से कम छह लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है।

    रूसी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, हमले के दौरान करीब 600 ड्रोन मॉस्को की दिशा में बढ़ रहे थे। राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में हवाई सुरक्षा व्यवस्था को सक्रिय किया गया। मॉस्को क्षेत्र में एक ड्रोन या उसके मलबे के एक निजी मकान से टकराने के बाद 83 वर्षीय बुजुर्ग की मौत की जानकारी सामने आई।

    हमले का असर दक्षिण-पश्चिमी रोस्तोव क्षेत्र में भी देखा गया। क्षेत्रीय प्रशासन के अनुसार, तीन कस्बों को निशाना बनाया गया और वहां पांच लोगों की मौत हुई। हमलों से कई स्थानों पर नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में स्थिति का आकलन शुरू किया।

    मॉस्को क्षेत्र में ड्रोन हमलों के कारण कई जगह आपातकालीन सेवाओं को सक्रिय किया गया। कुछ स्थानों पर आग लगने की सूचना भी सामने आई। हमलों के दौरान राजधानी की ओर बड़ी संख्या में ड्रोन आने के कारण हवाई सुरक्षा इकाइयों पर दबाव बढ़ा। यह हमला यूक्रेन की ओर से रूस के खिलाफ किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक माना जा रहा है।

    मॉस्को क्षेत्र के एक औद्योगिक इलाके में स्थित एक बड़े गोदाम परिसर में भी आग लगने की जानकारी सामने आई। हमले के बाद आसपास के क्षेत्र में धुआं उठता दिखाई दिया। अधिकारियों ने प्रभावित स्थानों पर राहत और बचाव दल भेजे। नुकसान और हमले के पूरे प्रभाव का आकलन किया जा रहा है।

    यूक्रेन की ओर से रूस के भीतर लंबी दूरी तक ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हमले तेज किए गए हैं। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य रूसी सैन्य और औद्योगिक ढांचे पर दबाव बढ़ाना बताया जाता है। रूस लगातार ऐसे हमलों को रोकने के लिए अपनी हवाई सुरक्षा प्रणाली का इस्तेमाल कर रहा है।

    इस बड़े हमले से एक दिन पहले यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रूस के भीतर गहरे क्षेत्र में किए गए हमलों की जानकारी दी थी। उनके अनुसार, रूस के समारा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण केंद्र को निशाना बनाया गया था। यूक्रेन ने वहां अपने निर्मित फ्लेमिंगो मिसाइल के इस्तेमाल का दावा किया था। इसके अलावा एक रूसी एयरबेस को भी निशाना बनाए जाने की जानकारी दी गई थी।

    जेलेंस्की ने अपने बयान में कहा था कि रूस को युद्ध की वास्तविक कीमत महसूस करनी चाहिए। उनके अनुसार, यूक्रेन की लंबी दूरी की सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य रूस पर दबाव बढ़ाना है। इसके बाद रूस के कई हिस्सों में हुए बड़े ड्रोन हमले ने दोनों देशों के बीच संघर्ष की बढ़ती तीव्रता को सामने ला दिया है।

    इसी बीच रूस की ओर से यूक्रेन पर भी हमले जारी रहे। यूक्रेनी अधिकारियों के अनुसार, रविवार को कीव और दूसरे इलाकों में रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों से नुकसान हुआ तथा कुछ लोग घायल हुए। दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे हमलों से नागरिक क्षेत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर खतरा बढ़ रहा है।

    रूस पर हुए ताजा ड्रोन हमले ने युद्ध के उस दौर को और स्पष्ट किया है जिसमें दोनों पक्ष अपने प्रतिद्वंद्वी के क्षेत्र में दूर तक हमला करने की क्षमता बढ़ा रहे हैं। 822 ड्रोन नष्ट करने का रूसी दावा इस हमले के बड़े पैमाने को दर्शाता है, जबकि छह लोगों की मौत ने इसके मानवीय प्रभाव को भी सामने रखा है। हालांकि, युद्ध के दौरान किए गए सैन्य दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में सीमित रहती है।

  • पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ बने रूस के आर्बिट्रेटर, यूक्रेनी सरकारी बैंक के निवेश विवाद में करेंगे कानूनी पक्ष का प्रतिनिधित्व

    पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ बने रूस के आर्बिट्रेटर, यूक्रेनी सरकारी बैंक के निवेश विवाद में करेंगे कानूनी पक्ष का प्रतिनिधित्व

    नई दिल्ली । भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को रूस और यूक्रेन के सरकारी बैंक ओशचाडबैंक के बीच चल रहे निवेश विवाद में रूस की ओर से आर्बिट्रेटर नियुक्त किया गया है। यह मामला रूस-यूक्रेन निवेश संधि के तहत शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कार्यवाही से जुड़ा है और इसमें यूक्रेन के चार क्षेत्रों में बैंक की संपत्तियों तथा कारोबारी गतिविधियों को हुए कथित नुकसान की भरपाई का दावा किया गया है।

    विवाद की सुनवाई तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल करेगा। इसमें कोस्टा रिका की डियाला जिमेनेज को दोनों पक्षों की सहमति से अध्यक्ष चुना गया है। ओशचाडबैंक ने ग्रीस के स्टावरोस ब्रेकोलाकिस को अपना आर्बिट्रेटर नियुक्त किया है, जबकि रूस की ओर से पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को चुना गया है। इस नियुक्ति के साथ अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में भारत के पूर्व शीर्ष न्यायिक अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।

    ओशचाडबैंक यूक्रेन का सरकारी स्वामित्व वाला प्रमुख बैंक है। बैंक का आरोप है कि वर्ष 2022 के बाद रूस की सैन्य कार्रवाई के कारण डोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में उसकी संपत्तियों और कारोबार को नुकसान पहुंचा। बैंक इसी नुकसान के लिए रूस से मुआवजे की मांग कर रहा है। विवाद के समाधान के लिए बैंक ने जुलाई 2025 में रूस को औपचारिक विवाद नोटिस भेजा था।

    बताया गया है कि रूस की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद ओशचाडबैंक ने अप्रैल 2026 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अब दोनों पक्षों ने अपने-अपने आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिए हैं और अध्यक्ष के तौर पर डियाला जिमेनेज की नियुक्ति पर सहमति बनी है।

    पूर्व CJI चंद्रचूड़ की नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि रूस इससे पहले भी उन्हें दो अन्य निवेश विवादों में आर्बिट्रेटर बनाने का प्रस्ताव दे चुका था। हालांकि, उन प्रस्तावों को उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। इस बार उन्होंने रूस की ओर से इस मामले में आर्बिट्रेटर की भूमिका स्वीकार की है।

    यह विवाद ओशचाडबैंक और रूस के बीच पहले हुए क्रीमिया से जुड़े मामले से अलग है। क्रीमिया में बैंक की संपत्तियों से संबंधित पुराने विवाद में ओशचाडबैंक को करीब 1.1 अरब डॉलर का मुआवजा मिला था। मौजूदा मामला वर्ष 2022 के बाद डोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया में कथित नुकसान से संबंधित है।

    अंतरराष्ट्रीय निवेश मध्यस्थता में आर्बिट्रेटर की भूमिका किसी पक्ष की ओर से मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश जैसी नहीं होती, बल्कि वह संबंधित ट्रिब्यूनल का सदस्य होता है और विवाद के कानूनी तथा तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार करता है। इस मामले में भी तीनों सदस्य मिलकर संबंधित दावों, आपत्तियों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करेंगे।

    रूस और यूक्रेन के बीच जारी व्यापक संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह निवेश विवाद अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ओशचाडबैंक जिन संपत्तियों और कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचने का दावा कर रहा है, उनके आधार पर मुआवजे की मांग की गई है। अब ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए मामले में आगे की कार्यवाही करेगा।

  • रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    नई दिल्ली । रूस और भारत के बीच व्यापारिक संपर्क को मजबूत करने के लिए एक नए जमीनी परिवहन मार्ग की संभावना पर चर्चा शुरू हुई है। रूस ने भारत तक पहुंचने वाले संभावित वैकल्पिक रास्तों पर विचार करने की बात कही है। प्रस्तावित मार्ग रूस से शुरू होकर तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। हालांकि, अभी यह केवल प्रारंभिक प्रस्ताव है और किसी औपचारिक रेल परियोजना को मंजूरी नहीं मिली है।

    यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के कारण समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। भारत और रूस के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार वर्तमान में समुद्री मार्गों पर निर्भर है। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में व्यवधान आने पर वैकल्पिक जमीनी नेटवर्क दोनों देशों के बीच माल ढुलाई के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है।

    रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने भारत तक पहुंचने वाले हर संभावित मार्ग पर विचार करने की जरूरत बताई है। उन्होंने बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के मद्देनजर वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रस्ताव का उद्देश्य केवल रेल संपर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस और भारत के बीच व्यापार को अधिक सुरक्षित और विविध परिवहन नेटवर्क उपलब्ध कराने से भी जुड़ा है।

    भारत के लिए ऐसा मार्ग ऊर्जा और व्यापार दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा या शिपिंग लागत में वृद्धि की स्थिति में जमीनी परिवहन अतिरिक्त विकल्प दे सकता है। रूस से भारत आने वाले कच्चे तेल, उर्वरक और अन्य महत्वपूर्ण सामानों की आपूर्ति के लिए भी वैकल्पिक परिवहन नेटवर्क उपयोगी हो सकता है।

    दूसरी ओर, भारत से रूस को भेजे जाने वाले कृषि उत्पाद, दवाएं और मशीनरी जैसे सामानों के लिए भी जमीनी संपर्क समय और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध बढ़ने के साथ परिवहन के नए विकल्पों की जरूरत भी बढ़ी है। ऐसे में प्रस्तावित मार्ग को व्यापक यूरेशियाई व्यापार नेटवर्क के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    भारत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे के जरिए रूस और मध्य एशिया तक संपर्क बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करने की भारत की नीति भी इस प्रस्ताव से जुड़ सकती है। हालांकि, प्रस्तावित नए मार्ग में कई जटिल चुनौतियां मौजूद हैं।

    सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान से जुड़ी है। प्रस्तावित मार्ग पाकिस्तान से होकर गुजरता है, जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच जमीनी व्यापार लंबे समय से गंभीर प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। भारत के माल को पाकिस्तान से होकर गुजरने की अनुमति और ट्रांजिट अधिकार देना इस योजना के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रश्न होगा।

    अफगानिस्तान की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की स्थिति भी इस मार्ग के संचालन में बड़ी चुनौती बन सकती है। इसके अलावा अलग-अलग देशों में रेल गेज, सीमा शुल्क व्यवस्था, सीमा पार प्रक्रियाएं और नए बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।

    फिलहाल रूस का यह प्रस्ताव शुरुआती विचार के स्तर पर है। इसे वास्तविक रेल परियोजना में बदलने के लिए भारत समेत संबंधित देशों के बीच राजनीतिक सहमति, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी समन्वय और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी होगा। यदि भविष्य में इन बाधाओं का समाधान होता है, तो यह मार्ग भारत और रूस के बीच व्यापार के लिए समुद्री परिवहन के अलावा एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है।

  • अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    नई दिल्ली । अमेरिका में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के प्रावधान वाले विधेयक को सीनेट की मंजूरी मिलने के बाद भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश और आर्थिक नीति से जुड़े कई फैसलों पर अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रभाव बढ़ गया है।

    केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने देश को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने और ट्रंप के दबाव में काम करने की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप की बातों को सही या गलत की परवाह किए बिना मानते हैं और अमेरिका की ओर से भारत के खिलाफ फैसले लिए जा रहे हैं।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी सीनेट ने रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों से जुड़े एक व्यापक विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया है। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम के इस विधेयक को सीनेट में 86 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 11 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया।

    विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों को आर्थिक रूप से प्रभावित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों से आने वाले सामान पर अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है।

    भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आने वाले प्रमुख देश हैं। इसके अलावा रूस से ऊर्जा आयात करने वाले अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि सीनेट से पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। विधेयक को आगे की विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसके प्रावधानों के लागू होने की स्थिति अलग प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

    अमेरिका की ओर से इस कदम के पीछे रूस के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े व्यापार पर दबाव बनाने की रणनीति बताई गई है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूस के तेल और गैस की खरीद से मिलने वाली आय उसकी युद्ध क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है। ऐसे में रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर आर्थिक दबाव डालकर मॉस्को की आय को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

    विधेयक में रूस से जुड़े प्रतिबंधों के अलावा ईरान पर लागू प्रतिबंधों की अवधि बढ़ाने का भी प्रावधान शामिल है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

    भारत में इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष केंद्र सरकार की विदेश नीति और अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर सवाल उठा रहा है। केजरीवाल ने भी इसी राजनीतिक बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर ट्रंप के प्रति अत्यधिक नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और रूस से भारत के ऊर्जा आयात को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि अमेरिकी विधेयक आगे की प्रक्रिया में किस रूप में आगे बढ़ता है और भारत समेत प्रभावित देशों के लिए संभावित टैरिफ व्यवस्था को लेकर अमेरिका क्या कदम उठाता है।

  • अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका और रूस के बीच जारी तनाव का असर अब भारत और चीन समेत उन देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, जिसके कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है।

    सीनेट में विधेयक के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय से जुड़े आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रूस से सबसे अधिक तेल और गैस खरीदने वाले पांच देशों को निशाने पर लिया जा सकता है। इनमें भारत और चीन के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं। हालांकि, सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि इन देशों पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है।

    दरअसल, विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रक्रिया होगी। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही यह कानून का रूप ले सकेगा। इसलिए फिलहाल भारत पर इस प्रस्ताव के तहत कोई नया 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है।

    इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू इसकी अधिकतम टैरिफ सीमा है। पिछले वर्ष पेश किए गए शुरुआती प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस पहल को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था।

    बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया और 500 प्रतिशत वाले प्रावधान को हटाकर रूस के पांच सबसे बड़े तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विकल्प रखा गया। इससे यह साफ होता है कि प्रस्तावित कानून में अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन हर देश पर अनिवार्य रूप से इतनी ही दर लागू करना जरूरी नहीं होगा।

    कानून बनने की स्थिति में ट्रंप को टैरिफ की दर तय करने में महत्वपूर्ण अधिकार मिल सकते हैं। राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक परिस्थितियों और दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को ध्यान में रखते हुए वह शुल्क में बदलाव या कुछ मामलों में राहत देने का निर्णय कर सकते हैं।

    भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि रूस से कच्चे तेल की खरीद पिछले कुछ वर्षों में उसकी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। रूस से मिलने वाले तेल ने भारतीय रिफाइनिंग और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में अमेरिकी शुल्क नीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी असर डाल सकता है।

    प्रस्ताव में रूस के अलावा ईरान को लेकर भी सख्ती का प्रावधान है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, कारोबारियों और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    अब सबकी नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर है, जिसका नया सत्र 31 अगस्त से शुरू होना है। वहां विधेयक पर चर्चा और मतदान के बाद इसकी आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सीनेट की मंजूरी अंतिम टैरिफ फैसला नहीं है। आने वाले चरणों में अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के निर्णय से ही स्पष्ट होगा कि भारत पर वास्तविक शुल्क कितना पड़ सकता है और इसका द्विपक्षीय व्यापार पर कितना असर होगा।

  • भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    नई दिल्ली । भारत की रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई Su-57 को लेकर फिलहाल भारत की ओर से कोई खरीद योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। इसके बजाय भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले को रूस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मॉस्को लंबे समय से भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश करता रहा है।

    रूस ने भारत को Su-57 विमान खरीदने के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें विमान निर्माण में सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय जरूरतों के अनुसार बदलाव की पेशकश भी शामिल थी। रूस की कोशिश थी कि भारत पांचवीं पीढ़ी के इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को अपने बेड़े में शामिल करे। इससे पहले ऐसी संभावनाएं जताई जा रही थीं कि भारत करीब 36 से 40 Su-57 विमानों की खरीद पर विचार कर सकता है। हालांकि, अब भारत की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से संकेत दिया गया है कि फिलहाल Su-57 को लेकर कोई सक्रिय खरीद योजना नहीं है। भारत अपने मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को और अधिक आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहा है। Su-30MKI भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का प्रमुख हिस्सा रहा है। इन विमानों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई तकनीकी सुधार और अपग्रेड की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

    इसके साथ ही भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। राफेल पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है और इसकी क्षमता को देखते हुए भारत इसे एक भरोसेमंद विकल्प मान रहा है। राफेल अपनी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी के हथियारों और बहुउद्देश्यीय क्षमता के लिए जाना जाता है। इससे वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर ऑपरेशनल क्षमता मिलती है।

    हालांकि राफेल और Su-57 अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमान हैं। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक विमान माना जाता है, जबकि Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। Su-57 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम रडार पहचान क्षमता और आंतरिक हथियार भंडारण प्रणाली है। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

    भारत की रक्षा योजना में अब स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA परियोजना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यह भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम को मजबूत करना चाहता है।

    रक्षा क्षेत्र में बदलती जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच भारत का ध्यान अब संतुलित विकल्पों पर है। एक ओर जहां राफेल जैसे आधुनिक और युद्ध में परखे गए विमानों को शामिल करने की योजना है, वहीं दूसरी ओर Su-30MKI अपग्रेड और AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में Su-57 की खरीद पर फिलहाल विराम लगना भारत की बदलती रक्षा नीति का संकेत माना जा रहा है।

  • रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?

    रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?


    नई दिल्ली।
    दुनिया की आर्थिक ताकत सिर्फ हथियारों और सैन्य क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक कारोबार में किस मुद्रा का दबदबा है, यह भी किसी देश की ताकत को तय करता है। पिछले कई दशकों से अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार रहा है। तेल-गैस की खरीद से लेकर देशों के बीच बड़े कारोबारी लेनदेन तक, डॉलर की भूमिका बेहद अहम रही है। इसी वजह से अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बनाने की ताकत भी मिलती है।

    अब रूस ने इसी व्यवस्था से अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। रूस ने विदेशी व्यापार में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल को कानूनी दायरे में लाने का रास्ता खोल दिया है। रूस का यह कदम पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने की उसकी लंबे समय से चल रही कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।

    विदेशी व्यापार में क्रिप्टो का रास्ता खुला

    नए प्रावधानों के तहत रूसी कंपनियों को कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है। यानी रूस और किसी दूसरे देश की कंपनी आपसी सहमति से कुछ भुगतान डॉलर के बजाय क्रिप्टो के माध्यम से कर सकती हैं।

    रूस के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रूस लगातार वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की तलाश करता रहा है।

    डॉलर की ताकत सिर्फ मुद्रा नहीं, पूरा सिस्टम है

    अमेरिका की आर्थिक ताकत केवल डॉलर की वैश्विक मांग से नहीं आती। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था का भी बड़ा योगदान है। यदि किसी देश की इस व्यवस्था तक पहुंच सीमित कर दी जाए तो उसके लिए विदेशों से पैसा भेजना और प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।

    रूस पिछले कुछ वर्षों में इसी चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में डिजिटल करेंसी उसके लिए एक वैकल्पिक भुगतान माध्यम बन सकती है। क्रिप्टो आधारित लेनदेन में पारंपरिक बैंकिंग चैनलों पर निर्भरता कुछ मामलों में कम हो सकती है।

    क्या इससे अमेरिका के आर्थिक दबदबे को चुनौती मिलेगी?

    अगर आने वाले समय में अधिक देश डॉलर के अलावा स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल करेंसी या क्रिप्टो के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने लगते हैं तो डॉलर की वैश्विक मांग पर असर पड़ सकता है। रूस के साथ चीन, ईरान और दूसरे देश भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म हो जाएगा। आज भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी मुद्रा की भूमिका बेहद मजबूत है। इसलिए क्रिप्टो या स्थानीय मुद्राओं के बढ़ते इस्तेमाल को डॉलर के लिए तत्काल खतरे के बजाय लंबी अवधि में उभरते विकल्प के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

    भारत के लिए क्या बदल सकता है?

    भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार की व्यवस्था को लेकर भी प्रयास किए गए हैं।

    अगर भविष्य में डिजिटल करेंसी और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा स्वीकार्य होती हैं, तो भारत के लिए भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के कुछ नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे कुछ लेनदेन में मुद्रा बदलने की लागत और भुगतान में लगने वाला समय कम करने की संभावना बन सकती है।

    लेकिन भारत की नीति निजी क्रिप्टोकरेंसी के बजाय अपने सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये पर ज्यादा केंद्रित है। भारत में क्रिप्टो को आधिकारिक मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है और इसके इस्तेमाल पर कड़े टैक्स नियम लागू हैं।

    क्रिप्टो के साथ जोखिम भी कम नहीं

    क्रिप्टोकरेंसी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा माध्यम बनाने में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी शामिल है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी की कीमत कम समय में काफी ऊपर-नीचे हो सकती है। ऐसे में अरबों डॉलर के व्यापार के लिए इसका इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

    इसी वजह से भविष्य में स्टेबलकॉइन या सरकार समर्थित डिजिटल करेंसी ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकती हैं। इसके लिए सिर्फ कानूनी मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियम, भरोसा, सुरक्षा और मजबूत तकनीकी ढांचा भी जरूरी होगा।

    दुनिया को रूस का क्या संदेश?

    रूस का कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते बदलाव की ओर इशारा करता है। चीन अपनी मुद्रा युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच भी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को लेकर चर्चा होती रही है।

    ऐसे में क्रिप्टोकरेंसी, डिजिटल करेंसी और नई भुगतान तकनीकें आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक राजनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि, सिर्फ क्रिप्टो के इस्तेमाल से अमेरिकी आर्थिक दबदबा खत्म हो जाएगा, यह दावा फिलहाल जल्दबाजी होगा। लेकिन रूस का कदम यह जरूर दिखाता है कि दुनिया एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसमें किसी एक देश की मुद्रा और भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम हो।