Tag: Russia

  • यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

    संक्षिप्त सार:
    यूक्रेन की लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल और ड्रोन क्षमता में वृद्धि से रूस के अंदर हमलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। विश्लेषणों के अनुसार अब रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल अलर्ट जारी किए जा रहे हैं, जिससे युद्ध का रणनीतिक संतुलन बदलता दिखाई दे रहा है।

    English Keywords:
    VolodymyrZelenskyy, Russia, Ukraine, MissileStrike, StrategicPressure,

    नई दिल्ली । विश्व

    रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

  • रूस में ईंधन संकट गहराया, रिफाइनरियों पर हमलों के बाद पेट्रोल-डीजल सप्लाई प्रभावित, पुतिन ने मानी चुनौतियां

    रूस में ईंधन संकट गहराया, रिफाइनरियों पर हमलों के बाद पेट्रोल-डीजल सप्लाई प्रभावित, पुतिन ने मानी चुनौतियां

    नई दिल्ली: रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का प्रभाव अब युद्धक्षेत्र से निकलकर आम नागरिकों के दैनिक जीवन तक पहुंचने लगा है। रूस के कई हिस्सों में पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति प्रभावित होने की खबरें सामने आ रही हैं। ईंधन संकट को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि देश वर्तमान में कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस की तेल रिफाइनरियों और ऊर्जा अवसंरचना पर लगातार हमले होने की रिपोर्टें सामने आ रही हैं।

    रूस विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है। देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र पर निर्भर करता है। हालांकि हाल के महीनों में ऊर्जा सुविधाओं पर बढ़ते हमलों ने उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ा दिया है। कई क्षेत्रों से पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारों और ईंधन की सीमित उपलब्धता की जानकारी मिल रही है, जिससे आम नागरिकों और व्यापारिक गतिविधियों पर असर पड़ रहा है।

    रूसी नेतृत्व का कहना है कि सरकार हालात को नियंत्रित करने और आवश्यक आपूर्ति बनाए रखने के लिए लगातार कदम उठा रही है। अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि कृषि क्षेत्र और आवश्यक सेवाओं के लिए ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। फसल सीजन को देखते हुए ग्रामीण क्षेत्रों में डीजल की मांग बढ़ी हुई है, इसलिए सरकार इस क्षेत्र को प्राथमिकता देने की रणनीति पर काम कर रही है।

    ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि तेल रिफाइनरियों पर हमलों से केवल उत्पादन ही प्रभावित नहीं होता, बल्कि वितरण व्यवस्था भी बाधित होती है। कच्चे तेल को सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इसे रिफाइनरियों में प्रसंस्कृत कर पेट्रोल, डीजल और अन्य उत्पादों में बदला जाता है। यदि रिफाइनिंग क्षमता प्रभावित होती है तो घरेलू बाजार में तैयार ईंधन की उपलब्धता कम हो सकती है, भले ही देश के पास पर्याप्त मात्रा में कच्चा तेल मौजूद हो।

    रूस सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी संकेत दिए हैं कि घरेलू जरूरतों को प्राथमिकता देने के लिए ऊर्जा निर्यात नीति की समीक्षा की जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर कुछ ईंधन उत्पादों के निर्यात पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखना और कीमतों को नियंत्रित करना है।

    युद्ध के दौरान ऊर्जा अवसंरचना को निशाना बनाए जाने से रूस की आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। तेल और गैस निर्यात से होने वाली आय रूस के लिए महत्वपूर्ण राजस्व स्रोत मानी जाती है। यदि उत्पादन और निर्यात दोनों प्रभावित होते हैं, तो इसका असर सरकारी राजस्व और व्यापक आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ सकता है। यही कारण है कि ऊर्जा सुरक्षा वर्तमान समय में रूस की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हो गई है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में रूस को घरेलू आपूर्ति, निर्यात प्रतिबद्धताओं और ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना होगा। युद्ध के लंबे खिंचने और ऊर्जा परिसंपत्तियों पर बढ़ते दबाव के कारण स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। फिलहाल सरकार आपूर्ति सामान्य बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रही है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र की मौजूदा परिस्थितियां रूस के लिए एक बड़ी परीक्षा के रूप में देखी जा रही हैं।

  • रूस के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का संदेश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री बोले- भरोसा और आपसी समझ ही भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत

    रूस के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का संदेश, विदेश सचिव विक्रम मिस्री बोले- भरोसा और आपसी समझ ही भारत-रूस संबंधों की सबसे बड़ी ताकत


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी को नई ऊर्जा देते हुए विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने रूसी फेडरेशन के राष्ट्रीय दिवस समारोह में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस अवसर पर उन्होंने रूस को राष्ट्रीय दिवस की शुभकामनाएं देते हुए दोनों देशों के बीच विकसित हुए मजबूत और भरोसेमंद संबंधों को वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार बताया।

    समारोह को संबोधित करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत और रूस के संबंध केवल कूटनीतिक औपचारिकताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसी साझेदारी है जिसने समय की हर परीक्षा में अपनी मजबूती साबित की है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच स्थापित विश्वास और परस्पर सम्मान ने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को निरंतर विस्तार देने में अहम भूमिका निभाई है।

    उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत-रूस विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी और अधिक सुदृढ़ हुई है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच नियमित संवाद तथा उच्च स्तरीय यात्राओं ने संबंधों को नई दिशा प्रदान की है। उन्होंने कहा कि एक-दूसरे की प्राथमिकताओं, हितों और संवेदनशीलताओं को समझने की क्षमता ही इस संबंध की सबसे बड़ी विशेषता है।

    विदेश सचिव ने वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती चुनौतियों और तनावों के बीच भारत और रूस के संबंध संतुलन और सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश केवल अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में भी सकारात्मक योगदान दे रहे हैं।

    उन्होंने पिछले वर्ष आयोजित भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह द्विपक्षीय संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। इस दौरान कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण समझौतों और सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए गए। शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, समुद्री सहयोग, आर्कटिक क्षेत्र, कौशल विकास और अकादमिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई गति मिली है।

    आर्थिक संबंधों पर चर्चा करते हुए विदेश सचिव ने कहा कि भारत और रूस के बीच व्यापारिक सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है। लगातार दो वित्तीय वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार 60 अरब डॉलर से अधिक रहा है, जो दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की बढ़ती गहराई को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के नेताओं ने वर्ष 2030 तक व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है और इस दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि रक्षा सहयोग भारत-रूस संबंधों का महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है। इसके अलावा नागरिक परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच सहयोग निरंतर आगे बढ़ रहा है। नई तकनीकों, नवाचार और औद्योगिक विकास के क्षेत्रों में भी सहयोग की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है।

    विक्रम मिस्री ने कौशल आधारित मानव संसाधन सहयोग को भविष्य की बड़ी संभावनाओं वाला क्षेत्र बताया। उन्होंने कहा कि भारत का विशाल पेशेवर और प्रशिक्षित कार्यबल रूस की बढ़ती कौशल आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इसके साथ ही दोनों देश नए कनेक्टिविटी और परिवहन नेटवर्क विकसित करने की दिशा में भी कार्य कर रहे हैं, जिससे व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को और गति मिलेगी।

    उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पारंपरिक सहयोग के क्षेत्रों को और मजबूत करने तथा नए अवसरों की तलाश के माध्यम से भारत और रूस की साझेदारी आने वाले वर्षों में और अधिक व्यापक तथा प्रभावशाली बनेगी।

  • 50 कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में EU…. युद्ध में रूस की आर्थिक मदद का आरोप

    50 कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में EU…. युद्ध में रूस की आर्थिक मदद का आरोप


    ब्रूसेल्स।
    यूरोपीय यूनियन (European Union- EU) ने यूक्रेन (Ukraine) पर हमले को लेकर रूस (Russia) के खिलाफ अपने प्रतिबंधों का दायरा और बढ़ाने की तैयारी कर ली है। इसके तहत यूरोपीय संघ ने रूस की ‘वॉर इकोनॉमी’ को कमजोर करने के लिए अपना 21वां प्रतिबंध पैकेज प्रस्तावित किया है। इस नए पैकेज की जद में भारत (India) स्थित कुछ कंपनियां भी आ सकती हैं। रूसी अर्थव्यवस्था की कथित तौर पर मदद करने के आरोप में यूरोपीय यूनियन करीब 50 कंपनियों पर नए एक्सपोर्ट कंट्रोल यानी निर्यात प्रतिबंध लगाने जा रहा है।

    यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कलास (Vice President Kaja Kalas) ने इन नए प्रतिबंधों का ऐलान करते हुए कहा कि ब्रुसेल्स पिछले दो सालों में अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रहा है। उन्होंने बताया कि इस कदम का मुख्य मकसद रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था की नींव को ढहाना है। बता दें कि काजा कलास हाल ही में पाकिस्तान का दौरा कर यूरोप लौटी हैं।

    किन देशों की कंपनियों पर लटकी तलवार?
    नए प्रतिबंध पैकेज का मुख्य फोकस रूस के सैन्य-औद्योगिक ढांचे को सीमित करना और युद्ध के लिए हो रही उसकी फाइनेंसिंग को रोकना है। एक्सपोर्ट प्रतिबंधों वाली 50 कंपनियों की सूची में भारत के अलावा चीन, तुर्किये, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की कंपनियां शामिल हैं। इसके अलावा ड्रोन निर्माण से जुड़ी 30 से ज्यादा नई संस्थाओं/कंपनियों को भी इस सूची में जोड़ा गया है।

    बैंकों और क्रिप्टोकरेंसी पर बड़ा ऐक्शन
    नए प्रस्तावों में उन देशों के बैंकों, हथियार बनाने वाली कंपनियों, तेल व्यापारियों, रिफाइनरियों और क्रिप्टोकरेंसी ऑपरेटरों को भी सीधे तौर पर निशाना बनाया गया है, जिन पर रूस को मौजूदा प्रतिबंधों से बचने में मदद करने का आरोप है। करीब 90 बैंकों की संपत्ति फ्रीज की जा सकती है। इसके अलावा रूस और अन्य जगहों के 30 से अधिक बैंकों के ट्रांजैक्शन पर कड़ी निगरानी और नियंत्रण लागू किए जाएंगे। इस पैकेज के तहत 11 क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म्स के लेनदेन पर भी बैन लगाने की तैयारी है।

    रूस की कमाई और ट्रांसपोर्ट को भी टारगेट किया गया
    रूस को आर्थिक मोर्चे पर घेरने के लिए यूरोपीय संघ ने उसके एनर्जी रेवेन्यू (ऊर्जा राजस्व) पर भी चोट की है। तेल (Oil) और लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) से जुड़ी गतिविधियों पर पहले से ज्यादा सख्त पाबंदियां लगाई जाएंगी। रूस के ‘शैडो फ्लीट’ से जुड़े 30 अतिरिक्त जहाजों पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव दिया गया है। इसके साथ ही 2 रूसी बंदरगाहों और 4 हवाई अड्डों पर भी ट्रांजैक्शन बैन का प्रस्ताव है।

    यूरोपीय आयोग की ओर से पेश किए गए इस 21वें प्रतिबंध पैकेज को अभी लागू नहीं किया गया है। इन सभी प्रस्तावों पर कोई भी अंतिम फैसला या मंजूरी देने से पहले इन्हें यूरोपीय संघ (EU) के सदस्य देशों के सामने विचार-विमर्श के लिए रखा जाएगा।

    पाकिस्तान का दौरा कर लौटीं काजा कलास
    यूरोपीय संघ (EU) की शीर्ष कूटनीतिज्ञ काजा कलास अपनी हालिया पाकिस्तान यात्रा पूरी कर वापस यूरोप लौट आई हैं। उनकी इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक यात्रा के दौरान यूरोपीय संघ और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय संबंधों, व्यापार (विशेषकर GSP+ व्यापार दर्जे), मानवाधिकारों की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई। यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब यूरोप, दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय स्थिरता- विशेष रूप से अफगानिस्तान के हालात और जलवायु परिवर्तन जैसी वैश्विक चुनौतियों को लेकर अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान के लिए भी यूरोपीय संघ एक प्रमुख निर्यात बाजार है, ऐसे में कलास की यह यात्रा दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक और आर्थिक संवाद को बेहतर बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

    भारत-ईयू का ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट
    बता दें कि भारत की कंपनियों पर यह ऐक्शन ऐसे समय में लेने की तैयारी है जब भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच जनवरी 2026 में हुआ ऐतिहासिक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़ा कदम साबित हो सकता है, जिसे यूरोपीय आयोग द्वारा ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ का नाम दिया गया है। इस समझौते के तहत भारत से कपड़ा, समुद्री उत्पाद, फार्मा और ज्वेलरी जैसे 90% से अधिक उत्पादों को यूरोपीय बाजार में टैक्स-फ्री (जीरो-ड्यूटी) एंट्री मिलेगी। वहीं दूसरी ओर, यूरोप से आने वाली लग्जरी कारों पर भी टैरिफ 110% से घटाकर मात्र 10% (एक तय कोटे के तहत) कर दिया गया है। इसके साथ ही, एक बड़ा ताजा अपडेट यह भी है कि ईयू ने अपने नए और सख्त क्वालिटी नियमों के बावजूद सितंबर 2026 के बाद भी भारत से मछली (एक्वाकल्चर), अंडे और शहद के आयात को जारी रखने की आधिकारिक मंजूरी दे दी है। इस हालिया फैसले से भारत के करीब 1.59 अरब डॉलर के समुद्री निर्यात सेक्टर को बड़ी राहत मिली है। बदलती वैश्विक सियासत और अमेरिका-चीन पर सप्लाई चैन की निर्भरता कम करने के लिहाज से यह ऐतिहासिक डील भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक मास्टरस्ट्रोक मानी जा रही है।

  • अवैध इमिग्रेशन और नशे की तस्करी रोकने के लिए साथ काम करेंगे रूस-पाकिस्तान, दोनों के बीच हुई बड़ी डील

    अवैध इमिग्रेशन और नशे की तस्करी रोकने के लिए साथ काम करेंगे रूस-पाकिस्तान, दोनों के बीच हुई बड़ी डील


    बिश्केक।
    किर्गिस्तान (Kyrgyzstan) की राजधानी बिश्केक (Bishkek) में शंघाई सहयोग संगठन (Shanghai Cooperation Organization- SCO) के गृह और सार्वजनिक सुरक्षा मंत्रियों की अहम बैठक के दौरान पाकिस्तान और रूस (Pakistan and Russia) के बीच एक बड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के मुताबिक, दोनों देशों ने अवैध इमिग्रेशन और नशीले पदार्थों की तस्करी पर लगाम लगाने के लिए एक साथ मिलकर काम करने का फैसला किया है।

    पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी इस विशेष बैठक में हिस्सा लेने के लिए बिश्केक में मौजूद थे। इस दौरे पर उन्होंने रूस के अलावा कई अन्य सदस्य देशों के नेताओं से भी मुलाकात की, जिसमें अफगानिस्तान से पनप रहे ‘आतंकवाद’ का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया।


    रूस के साथ समझौते की अहम बातें

    पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के अनुसार, गृह मंत्री मोहसिन नकवी और उनके रूसी समकक्ष व्लादिमीर कोलोकोल्त्सेव के बीच जिन समझौतों पर मुहर लगी है, वे इस प्रकार हैं-
    – अवैध नागरिकों का डिपोर्टेशन: पाकिस्तान के गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, दोनों देश एक-दूसरे के यहां अवैध रूप से रह रहे नागरिकों की पहचान करने और उनकी वतन वापसी सुनिश्चित करने में एक-दूसरे की मदद करेंगे।
    – घुसपैठ पर लगाम: अवैध इमिग्रेशन को रोकने के लिए दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाया जाएगा ताकि गैर-कानूनी तरीके से होने वाली आवाजाही को रोका जा सके।
    – ड्रग्स तस्करी पर एक्शन: नशीले पदार्थों की हेराफेरी को जड़ से खत्म करने के लिए भी दोनों पक्षों के बीच एक अलग और महत्वपूर्ण समझौता हुआ है। इसके तहत ड्रग सिंडिकेट्स के खिलाफ साझा कार्रवाई की जाएगी।

    SCO के मंच का फायदा उठाते हुए पाकिस्तानी गृह मंत्री ने उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान और कजाकिस्तान के प्रतिनिधियों के साथ भी अलग-अलग बैठकें कीं।
    – उज्बेकिस्तान: उज्बेक गृह मंत्री अजीज ताशपुलातो के साथ लॉ एन्फोर्समेंट एजेंसियों (कानून लागू करने वाली संस्थाओं) के बीच सहयोग और जॉइंट ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू करने पर चर्चा हुई। इसके लिए दोनों देशों के गृह मंत्रालयों के बीच एक ‘वर्किंग ग्रुप’ बनाने का भी फैसला लिया गया।
    – किर्गिस्तान: किर्गिस्तान के गृह मंत्री उलान नियाजबेकोव के साथ आपसी हितों वाले क्षेत्रों में सहयोग के विस्तार पर सहमति बनी। नकवी ने किर्गिस्तान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का गैर-स्थायी सदस्य चुने जाने पर बधाई दी और SCO बैठक के शानदार इंतजामों के लिए उनका शुक्रिया अदा किया।
    – कजाकिस्तान: कजाख समकक्ष यर्झान सादेनोव के साथ अवैध इमिग्रेशन को रोकने के लिए द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने और आपसी रिश्तों को मजबूत करने के लिए एक वर्किंग ग्रुप बनाने पर रजामंदी हुई।


    अफगानिस्तान में रूस का ‘डबल गेम

    दूसरी तरफ रूस और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती नजदीकियों ने क्षेत्रीय कूटनीति में बड़ी हलचल पैदा कर दी है। कूटनीतिक मामलों की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘द डिप्लोमैट’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, रूस अब अफगानिस्तान को लेकर एक बेहद सधी हुई दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। मॉस्को और तालिबान के बीच तेजी से गहरे होते संबंध इस बात का साफ इशारा हैं कि अफगानिस्तान की विदेश नीति में बड़े बदलाव आ रहे हैं और इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान को उठाना पड़ रहा है।


    रूस की दोहरी रणनीति क्या है?

    रिपोर्ट के मुताबिक, रूस अफगानिस्तान के मामले में एक साथ दो अलग-अलग मोर्चों पर काम कर रहा है। आतंकवाद पर सार्वजनिक रुख: रूस एक तरफ सार्वजनिक मंचों पर अफगानिस्तान से पनपने वाले आतंकवाद के मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया के देशों में अपनी व्यापक सुरक्षा भूमिका और सैन्य दखल को सही ठहराना है।

    तालिबान के साथ सुरक्षा गठजोड़: वहीं दूसरी तरफ, रूस पर्दे के पीछे तालिबान के साथ अपने सुरक्षा संबंधों का लगातार विस्तार कर रहा है। मॉस्को का लक्ष्य तालिबान के साथ इस रणनीतिक गठजोड़ के जरिए मध्य एशिया में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए एक ठोस जमीनी हथियार तैयार करना है।


    पाकिस्तान के लिए सिकुड़ती जा रही है जमीन

    रूस और तालिबान के बीच इस नए समीकरण ने पाकिस्तान के रणनीतिक दांव-पेंच को बुरी तरह उलझा दिया है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि पाकिस्तान के लिए अब अफगानिस्तान में पैंतरेबाजी की गुंजाइश लगातार खत्म होती जा रही है।

    रूस के साथ नए समझौते और संबंध स्थापित होने के बाद, अफगानिस्तान (काबुल) अब इस स्थिति का इस्तेमाल पाकिस्तान के खिलाफ एक ‘लेवरेज’ या कूटनीतिक हथियार के तौर पर कर रहा है। पहले जो पाकिस्तान अफगानिस्तान के मामलों में एक ‘रिंगमास्टर’ की भूमिका में खुद को देखता था, अब रूस की सीधी एंट्री और तालिबान की स्वतंत्र विदेश नीति के कारण उसका प्रभाव तेजी से घट रहा है।

  • युद्ध खत्म करने की नई पहल, जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र, सीधी बातचीत का दिया प्रस्ताव

    युद्ध खत्म करने की नई पहल, जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र, सीधी बातचीत का दिया प्रस्ताव

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच जारी लंबे युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल सामने आई है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को खुला पत्र लिखकर आमने-सामने मुलाकात और सीधी वार्ता का प्रस्ताव दिया है। इस पहल को युद्ध समाप्ति की दिशा में एक नए प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

    अपने विस्तृत पत्र में जेलेंस्की ने कहा कि युद्ध का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई या मध्यस्थों के जरिए नहीं निकल सकता। उनका मानना है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच सीधा संवाद ही स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा हालात में नेतृत्व स्तर पर बातचीत की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात किसी तटस्थ देश में आयोजित की जा सकती है। उनका तर्क है कि निष्पक्ष वातावरण में होने वाली बातचीत से विश्वास बहाली की प्रक्रिया को मजबूती मिल सकती है और लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को तोड़ने का अवसर मिल सकता है।

    पत्र में जेलेंस्की ने यह भी उल्लेख किया कि वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकटों के कारण यूक्रेन युद्ध वैश्विक प्राथमिकताओं की सूची में पीछे जा सकता है। ऐसे में उन्होंने दोनों पक्षों से समय रहते शांति की दिशा में ठोस पहल करने की अपील की है। उनका कहना है कि संघर्ष जितना लंबा चलेगा, मानवीय और आर्थिक नुकसान उतना ही बढ़ता जाएगा।

    जेलेंस्की ने अपने पत्र में रूस पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का भी संकेत दिया। उन्होंने हाल के घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि युद्ध का कोई भी पक्ष इस भ्रम में नहीं रह सकता कि केवल सैन्य ताकत के आधार पर स्थायी समाधान हासिल किया जा सकता है। उनके अनुसार संवाद और समझौता ही अंततः संघर्ष का रास्ता रोक सकते हैं।

    दूसरी ओर रूस ने इस पहल पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है। मॉस्को ने संकेत दिया है कि बातचीत के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हैं, लेकिन किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों को अपने-अपने रुख में लचीलापन दिखाना होगा। रूस अब भी उन प्रमुख शर्तों पर कायम है जिन्हें वह अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा मानता है।

    युद्ध को लेकर दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद क्षेत्रीय नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बना हुआ है। रूस जिन क्षेत्रों को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता है, उन्हें लेकर यूक्रेन कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिखता। वहीं यूक्रेन का कहना है कि क्षेत्रीय रियायतें भविष्य में उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संभावित मुलाकात को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। कई देशों और वैश्विक नेताओं का मानना है कि यदि दोनों राष्ट्रपति आमने-सामने बैठकर बातचीत करते हैं तो इससे शांति प्रक्रिया को नई गति मिल सकती है। हालांकि पिछले वर्षों में कई दौर की वार्ताएं बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हुई हैं, इसलिए इस पहल की सफलता को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है।

    फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कूटनीतिक प्रयास वास्तव में दोनों नेताओं को एक ही मेज पर ला पाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह रूस-यूक्रेन युद्ध के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है और लंबे समय से जारी संघर्ष के समाधान की दिशा में नई उम्मीद जगा सकता है।

  • रूस-यूक्रेन युद्ध: ओरेश्निक हाइपरसोनिक मिसाइल समेत बड़े हमले में 4 की मौत, कीव में भारी तबाही; जेलेंस्की बोले- रूस पागल हो चुका है



    नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रविवार को एक बार फिर बड़ा सैन्य तनाव देखने को मिला जब रूस ने यूक्रेन पर मिसाइलों और ड्रोनों से भीषण हमला किया। इस हमले में कम से कम 4 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई दर्जन लोग घायल हुए हैं। हमलों का मुख्य निशाना राजधानी कीव और उसके आसपास के इलाके रहे।

    रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह हमला यूक्रेन की ओर से किए गए हमलों के जवाब में किया गया है। इस दौरान रूस ने ओरेश्निक हाइपरसोनिक मिसाइल का भी इस्तेमाल किया, जिसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बताया जाता है। यह मिसाइल अपनी तेज गति और आधुनिक तकनीक के कारण मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि हमलों में जानबूझकर नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया है। उन्होंने बताया कि पानी आपूर्ति की एक सुविधा, एक बाजार, कई घर और स्कूल इस हमले में क्षतिग्रस्त हुए हैं। जेलेंस्की ने टेलीग्राम पर कहा कि रूसी मिसाइल बिला त्सेरक्वा शहर के पास गिरी और रूस “पागल हो चुका है।”

    यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा ने दावा किया कि ओरेश्निक मिसाइल में डमी वारहेड लगाया गया था। उन्होंने कहा कि रूस द्वारा यह मिसाइल सिर्फ डर पैदा करने और शक्ति प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल की जा रही है।

    यूक्रेनी वायुसेना के मुताबिक रूस ने रातभर में लगभग 600 ड्रोन और 90 मिसाइलें दागीं, जिनमें से 604 को एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया। अधिकारियों ने इसे राजधानी पर हुए सबसे बड़े हमलों में से एक बताया है।

    इस बीच रूस ने आरोप लगाया कि यूक्रेन की ओर से उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों पर हमले किए गए थे, जिनके जवाब में यह कार्रवाई की गई। रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यूक्रेन के “आतंकी हमलों” के जवाब में ओरेश्निक और अन्य बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।

    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी सामने आई है। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलस ने ओरेश्निक मिसाइल के इस्तेमाल को बेहद खतरनाक परमाणु शक्ति प्रदर्शन बताया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मर्ज ने भी इस हमले की निंदा करते हुए इसे युद्ध में गंभीर बढ़ोतरी बताया है।

    यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध पहले से ही चरम पर है और दोनों देश लगातार एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयां संघर्ष को और अधिक खतरनाक दिशा में ले जा सकती हैं।

  • नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें

    नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें



    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी विचारक माने जाने वाले Alexander Dugin के हालिया बयानों के बाद एक बार फिर “RIC (Russia–India–China)” और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हो गई है। डुगिन का दावा है कि पश्चिमी देशों का वैश्विक दबदबा घट रहा है और रूस व चीन इसके विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जबकि भारत की भूमिका भविष्य की वैश्विक संरचना में निर्णायक हो सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि यह विचार अभी एक रणनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक बहस तक ही सीमित है, न कि कोई औपचारिक गठबंधन या तय वैश्विक व्यवस्था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले दो दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक तरफ United States अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर China आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही है। वहीं Russia पश्चिमी देशों के साथ टकराव के बीच अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अलग मानी जा रही है। India लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक व तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ ऐतिहासिक रक्षा संबंध भी बनाए हुए है।

    इसी बीच चीन-रूस-भारत को मिलाकर RIC समूह की चर्चा जरूर समय-समय पर उठती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तीनों देशों के बीच मौजूद सीमा विवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग राष्ट्रीय हित इसे एक स्थायी गठबंधन बनने से रोकते हैं।

    विदेश नीति विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया किसी एक ध्रुव के बजाय “बहु-ध्रुवीय शक्ति संतुलन” की ओर बढ़ सकती है, लेकिन यह संतुलन किसी औपचारिक RIC ब्लॉक के रूप में नहीं बल्कि अलग-अलग वैश्विक साझेदारियों के जाल के रूप में सामने आएगा।

    कुल मिलाकर, डुगिन का यह विचार वैश्विक राजनीति में एक बहस जरूर पैदा करता है, लेकिन वास्तविक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभी भी जटिल और बदलते शक्ति संतुलन पर आधारित है, जिसमें किसी एक गुट का पूर्ण वर्चस्व या RIC जैसा एकीकृत ब्लॉक फिलहाल व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।

  • रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस ने अपनी सैन्य ताकत का बड़ा प्रदर्शन करते हुए बेलारूस के साथ संयुक्त परमाणु सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। तीन दिन तक चलने वाले इस महाअभ्यास में रूस ने 65 हजार सैनिकों, 140 लड़ाकू विमानों, 200 मिसाइल लॉन्चरों, 73 युद्धपोतों और 13 पनडुब्बियों को उतारा है। रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार इस अभ्यास में करीब 7800 प्रकार के हथियार और सैन्य उपकरण शामिल किए गए हैं। यह सैन्य अभ्यास 19 मई से शुरू होकर 21 मई तक चलेगा और इसे यूक्रेन तथा नाटो देशों के लिए एक बड़ा रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।

    रूस ने यह अभ्यास ऐसे समय पर शुरू किया है जब यूक्रेन लगातार रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन हमले तेज कर रहा है। यूक्रेन युद्ध को चार साल पूरे होने वाले हैं और इस दौरान कई बार रूस अपने परमाणु हथियारों और मिसाइलों का प्रदर्शन कर चुका है। इस बार रूस ने परमाणु हमला करने में सक्षम मिसाइल प्रणालियों को भी अभ्यास में शामिल किया है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने एक वीडियो जारी किया जिसमें सैनिक मोबाइल इस्कंदर-एम मिसाइल सिस्टम को लॉन्च साइट तक ले जाते नजर आए। यह मिसाइल परमाणु और पारंपरिक दोनों प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम है और इसकी मारक क्षमता करीब 500 किलोमीटर बताई जाती है।

    रूसी सेना बेलारूस में तैनात टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन के इस्तेमाल का अभ्यास भी कर रही है। हाल ही में रूस ने बेलारूस में ओरेशनिक मिसाइल प्रणाली भी तैनात की है, जो परमाणु हमला करने में सक्षम मानी जाती है। बेलारूस की सीमा कई नाटो देशों से लगती है, इसलिए इस तैनाती को यूरोप के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है। रूस का कहना है कि नाटो देशों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और यूक्रेन को मिल रहे पश्चिमी समर्थन से उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

    यह अभ्यास ऐसे समय पर हो रहा है जब रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin चीन के दौरे पर हैं। इस दौरान रूस और चीन के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। माना जा रहा है कि रूस वैश्विक स्तर पर यह संदेश देना चाहता है कि वह पश्चिमी दबाव के बावजूद पीछे हटने वाला नहीं है।

    रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते के समाप्त होने के बाद यह पहला बड़ा परमाणु अभ्यास माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यूरोप में तनाव और बढ़ सकता है। नाटो देशों ने अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन यूरोप में सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    उधर यूक्रेन ने रूस और बेलारूस के इस संयुक्त अभ्यास की कड़ी आलोचना की है। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बेलारूस में परमाणु हथियारों की तैनाती और संयुक्त अभ्यास अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। यूक्रेन ने आरोप लगाया कि रूस और बेलारूस परमाणु अप्रसार संधि का उल्लंघन कर रहे हैं। यूक्रेन ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के कदम पूरे यूरोप को अस्थिर कर सकते हैं।

    रूस और नाटो देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस परमाणु अभ्यास ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि यूक्रेन युद्ध जल्द नहीं रुका तो आने वाले समय में यूरोप में सैन्य टकराव का खतरा और गहरा सकता है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव में भारत बन सकता है शांति का बड़ा चेहरा, रूस ने नई दिल्ली को बताया सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ

    ईरान-अमेरिका तनाव में भारत बन सकता है शांति का बड़ा चेहरा, रूस ने नई दिल्ली को बताया सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ



    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच रूस ने भारत की भूमिका को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक बयान दिया है। रूसी विदेश मंत्री Sergey Lavrov ने कहा है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में India ईरान, अमेरिका और पश्चिम एशियाई देशों के बीच संवाद स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान लावरोव ने भारत की विदेश नीति की तारीफ करते हुए कहा कि भारत लंबे समय से संतुलित कूटनीति अपनाता रहा है और विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ उसके मजबूत संबंध हैं। इसी वजह से भारत को एक “भरोसेमंद मध्यस्थ” के रूप में देखा जा सकता है, जो तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

    रूस का कहना है कि पश्चिम एशिया में हाल के वर्षों में तनाव काफी बढ़ा है, जिसमें ईरान-अमेरिका टकराव, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख हैं। ऐसे में किसी ऐसे देश की जरूरत है जो दोनों पक्षों के बीच विश्वास पैदा कर सके और बातचीत का रास्ता खोल सके। लावरोव के अनुसार, भारत इस भूमिका के लिए उपयुक्त है क्योंकि वह किसी एक खेमे का हिस्सा न होकर सभी प्रमुख देशों के साथ समान रूप से संबंध बनाए रखता है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि भारत का कूटनीतिक अनुभव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बहुपक्षीय मंचों जैसे ब्रिक्स, जी20 और शंघाई सहयोग संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने यह संकेत दिया कि भारत की यह वैश्विक स्वीकार्यता उसे मध्यस्थता की भूमिका के लिए और मजबूत बनाती है।

    रूस के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत केवल सुरक्षा या राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ता है। ऐसे में किसी स्थिर और भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि कुछ पश्चिमी देशों की नीतियां इस क्षेत्र में तनाव को कम करने के बजाय बढ़ाने का काम कर रही हैं, जबकि समाधान केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान और अरब देशों के बीच दूरी बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं, जो वैश्विक स्थिरता के लिए सही नहीं है।

    भारत को लेकर रूस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री की हालिया कूटनीतिक गतिविधियों और खाड़ी देशों के साथ बढ़ते संबंधों ने भारत की भूमिका को और मजबूत किया है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भारत की बढ़ती भागीदारी ने उसे एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।

    हालांकि भारत सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाता है तो वह पश्चिम एशिया में शांति स्थापना के प्रयासों का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

    कुल मिलाकर रूस का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है, जहां वह अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देने वाला अहम देश बनता जा रहा है।