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  • रूस के साइबेरिया की लैब में बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब टूटी! शोधकर्ता की मौत, करीब 200 लोग क्वारंटाइन

    रूस के साइबेरिया की लैब में बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब टूटी! शोधकर्ता की मौत, करीब 200 लोग क्वारंटाइन


    नई दिल्ली। रूस के साइबेरिया में एक एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट की 28 वर्षीय महिला कर्मचारी की गंभीर निमोनिया से मौत के बाद करीब 200 लोगों को मेडिकल निगरानी में रखा गया है। रिपोर्टों में दावा है कि महिला ने अस्पताल में बताया था कि काम के दौरान जीवित बैक्टीरिया वाली टेस्ट ट्यूब टूट गई थी, हालांकि रूसी अधिकारियों ने अभी यह पुष्टि नहीं की है कि मौत प्लेग संक्रमण से हुई।

    मामला इरकुत्स्क के शेलेखोव स्थित इरकुत्स्क एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट से जुड़ा है। मृतका की पहचान रिपोर्टों में दार्या शिपिलोवा के तौर पर हुई है। उन्हें 29 सितंबर को गंभीर निमोनिया के लक्षणों के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन दो दिन बाद उनकी मौत हो गई।

    टेस्ट ट्यूब टूटने की बात सामने आई

    स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, शिपिलोवा ने चिकित्सकों को बताया था कि एक टेस्ट ट्यूब दुर्घटनावश टूट गई थी, जिसमें जीवित बैक्टीरिया मौजूद थे। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि यह घटना 25 सितंबर के आसपास हुई थी। हालांकि, इस घटनाक्रम की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

    रिपोर्टों के मुताबिक, वह मंगोलिया की सीमा के पास बुर्यातिया में काम से जुड़ी यात्रा पर भी गई थीं। वहीं उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें शेलेखोव अस्पताल लाया गया था। इसलिए उनके संक्रमण के संभावित स्रोत को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

    करीब 200 लोग मेडिकल निगरानी में

    शोधकर्ता की मौत के बाद उनके संपर्क में आए लोगों की पहचान शुरू की गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 200 लोगों को मेडिकल निगरानी या आइसोलेशन में रखा गया है। इनमें शेलेखोव अस्पताल से जुड़े लोग भी शामिल हैं। कुछ अस्पतालों में एहतियाती क्वारंटीन उपाय लागू किए गए हैं।

    इरकुत्स्क के गवर्नर इगोर कोबजेव ने कहा कि पहचाने गए सभी संपर्कों को मेडिकल निगरानी में रखा गया है। उनके मुताबिक, अब तक संपर्क में आए लोगों में बीमारी के लक्षण नहीं मिले हैं और उनके टेस्ट भी निगेटिव आए हैं। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान नहीं देने और आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने की अपील की है।

    शेलेखोव के पास स्थित एक एल्युमिनियम प्लांट ने भी कर्मचारियों के लिए मास्क पहनने जैसे एहतियाती कदम उठाए हैं। प्लांट प्रबंधन ने क्षेत्र में फैल रही अफवाहों और अपुष्ट खबरों से बचने की अपील की है।

    बुर्यातिया के प्रमुख ने कहा- मौत प्लेग से हो सकती है

    बुर्यातिया के प्रमुख अलेक्सेई सिदेनोव ने महिला की मौत को प्लेग से जोड़ा, लेकिन साथ ही स्पष्ट किया कि बुर्यातिया में प्लेग का कोई प्रकोप नहीं है। वहीं रूस की स्वास्थ्य निगरानी एजेंसी रोस्पोट्रेबनादजोर ने क्षेत्र में प्लेग के प्रकोप की पुष्टि नहीं की है।

    रूस के पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी गेन्नादी ओनिश्चेंको ने भी कहा कि संक्रमण के प्लेग होने की संभावना कम है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर प्लेग की पुष्टि होती भी है, तो ठंडे मौसम में इसके फैलने की संभावना कम हो सकती है।

    रूस की शीर्ष स्वास्थ्य अधिकारी साइबेरिया पहुंचीं

    मामले की गंभीरता को देखते हुए रूस की चीफ स्टेट सैनिटरी डॉक्टर अन्ना पोपोवा मॉस्को से साइबेरिया पहुंचीं। गवर्नर कोबजेव के मुताबिक, उन्होंने क्षेत्रीय आपात बैठक में हिस्सा लिया। यह बैठक एक बेहद खतरनाक संक्रामक बीमारी के संदिग्ध मामले की सूचना के बाद बुलाई गई थी।

    रूसी अधिकारियों ने फिलहाल क्षेत्र की सैनिटरी और महामारी संबंधी स्थिति को स्थिर बताया है। वहीं, शेलेखोव प्रशासन ने लोगों से अंतिम निष्कर्ष निकलने तक आधिकारिक जानकारी पर भरोसा करने को कहा है।

    टेस्ट ट्यूब टूटने के दावे पर भी सवाल

    मामला इसलिए ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि संबंधित संस्थान खतरनाक संक्रामक रोगों के अध्ययन और निगरानी से जुड़ा है। कुछ विशेषज्ञों ने टेस्ट ट्यूब टूटने की घटना के दावे पर सवाल उठाए हैं। रूसी महामारी विशेषज्ञ मिखाइल फावोरोव ने इसे असामान्य बताया और कहा कि इस तरह की प्रयोगशालाओं में खतरनाक बैक्टीरिया के साथ काम करते समय कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाए जाते हैं।

    इसी वजह से सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्टों में घटना को लेकर कई तरह के दावे सामने आए हैं। कुछ गुमनाम टेलीग्राम चैनलों ने इसे कोविड-19 की उत्पत्ति से जुड़े शुरुआती विवादों से भी जोड़ने की कोशिश की है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इन्हें फिलहाल अटकलों के तौर पर ही देखा जा रहा है।

    अमेरिका भी रख रहा नजर

    अमेरिकी प्रशासन भी रूस में सामने आए इस मामले पर नजर रख रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी विदेश विभाग स्थिति से अवगत है और CDC समेत संबंधित एजेंसियों के साथ घटनाक्रम की निगरानी कर रहा है। हालांकि, अमेरिका की ओर से भी अभी यह पुष्टि नहीं की गई है कि रूस में प्लेग का प्रकोप हुआ है।

    फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि 28 वर्षीय शोधकर्ता की मौत का वास्तविक कारण क्या था और क्या उसका संबंध प्रयोगशाला में कथित तौर पर टूटी टेस्ट ट्यूब से था। रूसी स्वास्थ्य एजेंसियों की जांच और संपर्क में आए लोगों की निगरानी के बाद ही स्थिति की वास्तविक तस्वीर साफ हो सकेगी।

  • Russia: साइबेरिया की लैब में प्लैग से महिला रिसर्चर की मौत से मचा हड़कंप, 200 लोगों को किया आइसोलेट

    Russia: साइबेरिया की लैब में प्लैग से महिला रिसर्चर की मौत से मचा हड़कंप, 200 लोगों को किया आइसोलेट


    मॉस्को।
    रूस (Russia) के साइबेरिया (Siberia) स्थित इरकुत्स्क क्षेत्र (Irkutsk region) में लैब (Lab) में काम करने वाली एक महिला शोधकर्ता (Female Researcher) की प्लेग से मौत हो गई है। घटना के बाद प्रशासन ने एहतियात के तौर पर लगभग 200 लोगों को मेडिकल निगरानी और आइसोलेशन में रखा है। ‘द मॉस्को टाइम्स’ और रूसी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, बुरियाटिया गणराज्य के प्रमुख एलेक्सी त्सिदेनोव ने महिला की मौत का कारण प्लेग होने की पुष्टि की है। मीडिया रिपोर्टों में आशंका जताई जा रही है कि महिला न्यूमोनिक प्लेग से पीड़ित थी, जो प्लेग का सबसे घातक रूप माना जाता है।


    कौन थी मरने वाली महिला

    मृतक महिला की पहचान डारिया(27साल) के रूप में हुई है। वह इरकुत्स्क एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट में कार्यरत थी। 29 सितंबर को उसे गंभीर निमोनिया के लक्षणों के साथ इरकुत्स्क के पास शेलेखोव के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उसे वेंटिलेटर पर रखा गया। एक अक्तूबर को उसकी मौत हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक, उसने मेडिकल स्टाफ को बताया था कि सैंपल इकट्ठा करते समय गलती से उससे जिंदा बैक्टीरिया वाली एक टेस्ट ट्यूब टूट गई थी। यह जानकारी टेलीग्राम चैनल पर दी गई है, अधिकारियों ने इसकी पुष्टि नहीं की है।


    इमरजेंसी बैठक बुलाई गई

    एक अन्य दावे के मुताबिक यह भी दावा किया जा रहा है कि महिला बुरियाटिया के आधिकारिक दौरे से लौटी थी। यहां मंगोलिया सीमा के पास प्लेग का प्रकोप रिपोर्ट किया गया था। इरकुत्स्क के प्रांतीय अधिकारियों ने शुरुआत में इसे केवल अत्यंत खतरनाक संक्रमण करार दिया था। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए महिला के संपर्क में आए डॉक्टरों, अस्पताल के कर्मचारियों और अन्य लोगों सहित करीब 200 लोगों को एहतियातन निगरानी में रखा गया है। आपात बैठक के बाद इरकुत्स्क क्षेत्र के गवर्नर इगोर लोबजेव ने कहा कि संपर्क में आए लोगों में फिलहाल बीमारी के लक्षण नहीं हैं और उनकी शुरुआती लैब रिपोर्ट नेगेटिव आई है। फिलहाल सभी लोगों को निगरानी में रखा गया है।

    रेन टीवी ने सूत्रों के हवाले से बताया कि महिला के संपर्क में आए लोगों को दो अस्पतालों में भर्ती कराया गया और 12 लोगों को निगरानी के लिए एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट भेजा गया। इनमें से कुछ लोगों में बीमारी के लक्षण दिख रहे हैं, लेकिन अभी तक संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, प्लेग ‘येर्सिनिया पेस्टिस नामक जीवाणु से होता है, जो आमतौर पर छोटे स्तनधारियों और उनके पिस्सुओं में पाया जाता है।’येर्सिनिया पेस्टिस’ से संक्रमित लोगों में अक्सर एक से सात दिनों के बाद लक्षण दिखाई देते हैं।

  • UNSC में भारत की स्थायी सीट के समर्थन में रूस, जर्मनी-जापान की दावेदारी का विरोध

    UNSC में भारत की स्थायी सीट के समर्थन में रूस, जर्मनी-जापान की दावेदारी का विरोध


    नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग को रूस का खुला समर्थन मिला है। 81वें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत के साथ ब्राजील की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का भी समर्थन किया। वहीं उन्होंने सुरक्षा परिषद में पश्चिमी देशों के लिए नई स्थायी सीटें बढ़ाने का विरोध किया और कहा कि सुधार का फोकस एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भागीदारी बढ़ाने पर होना चाहिए।

    लावरोव ने जर्मनी-जापान की दावेदारी पर जताई आपत्ति

    UN महासभा में अपने संबोधन के दौरान लावरोव ने कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के नाम पर पश्चिमी देशों को अतिरिक्त स्थायी सीटें नहीं दी जानी चाहिए। उन्होंने खास तौर पर जर्मनी और जापान की दावेदारी का विरोध किया।

    रूस का कहना है कि मौजूदा UNSC संरचना में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को उनकी मौजूदा वैश्विक भूमिका के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसी आधार पर मॉस्को भारत और ब्राजील को स्थायी सदस्य बनाने का समर्थन कर रहा है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के दौरान अफ्रीकी महाद्वीप के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। रूस पहले भी सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधिक बनाने की बात कहता रहा है। सितंबर 2026 में भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक के संयुक्त बयान में भी रूस ने सुधार के बाद विस्तारित UNSC में भारत की स्थायी सदस्यता के लिए अपना समर्थन दोहराया था।

    भारत को कई देशों का समर्थन

    UN महासभा के मौजूदा सत्र के दौरान भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी के समर्थन में कई देशों ने अपनी बात रखी है।

    मॉरीशस के विदेश मंत्री धनंजय रामफुल ने G4 और L69 के रुख का समर्थन करते हुए भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी दोहराई। वहीं पुर्तगाल ने भी सुरक्षा परिषद में बदलाव की जरूरत बताई है। पुर्तगाल के प्रधानमंत्री लुइस मोंटेनेग्रो ने ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली UNSC की पैरवी की, जिसमें अफ्रीका, ब्राजील और भारत को स्थायी प्रतिनिधित्व देने का समर्थन शामिल है।

    इसके अलावा 22 सितंबर को भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान यानी G4 के विदेश मंत्रियों ने भी UNSC सुधार पर बैठक की और सुरक्षा परिषद में सुधार को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के मद्देनजर जरूरी बताया।

    जापान और अफ्रीकी देशों की भी अलग मांग

    मार्शल आइलैंड्स की राष्ट्रपति हिल्डा हाइने ने कहा कि उनका देश जापान और उसके G4 साझेदारों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने के समर्थन पर लंबे समय से कायम है।

    वहीं जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने भी UNSC में बदलाव की मांग की। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद की संरचना मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए। इसके लिए उन्होंने स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों तरह की सीटों की संख्या बढ़ाने की पैरवी की।

    अफ्रीकी देशों की ओर से भी सुरक्षा परिषद में ज्यादा प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठती रही है। सिएरा लियोन के राष्ट्रपति जूलियस माडा बायो ने कहा कि UNSC अभी भी 1945 की दुनिया की तस्वीर पेश करता है। उन्होंने अफ्रीका की 1.6 अरब से ज्यादा आबादी का हवाला देते हुए कहा कि महाद्वीप के पास परिषद में कोई स्थायी सीट नहीं है।

    G4 में भारत के साथ कौन-कौन?

    भारत UNSC में स्थायी सदस्यता के लिए ब्राजील, जर्मनी और जापान के साथ G4 समूह का हिस्सा है। चारों देश सुरक्षा परिषद में स्थायी और गैर-स्थायी, दोनों श्रेणियों में विस्तार की मांग करते हैं। G4 देशों ने सितंबर 2026 में भी सुरक्षा परिषद सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की जरूरत दोहराई है।

    भारत की ओर से भी सुरक्षा परिषद की मौजूदा संरचना में बदलाव की मांग लगातार की जाती रही है। भारत का तर्क है कि 80 साल से ज्यादा पुरानी व्यवस्था आज की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं और वैश्विक शक्ति संतुलन को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।

    कैसे काम करती है UNSC?

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं। इन सभी के पास वीटो का अधिकार है।

    बाकी 10 सदस्य गैर-स्थायी होते हैं, जिन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है। स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए UN चार्टर में संशोधन करना होगा।

    इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत के साथ-साथ सदस्य देशों की ओर से अनुसमर्थन जरूरी है। इसमें मौजूदा पांचों स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी शामिल है।

    यही वजह है कि UNSC में स्थायी सदस्यता का विस्तार केवल किसी एक देश के समर्थन से संभव नहीं है। इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति और UN चार्टर में औपचारिक बदलाव की जरूरत होगी।

  • रूस ने यूक्रेन पर फिर किया बड़ा हमला… एक साथ दागे कई ड्रोन और मिलाइलें

    रूस ने यूक्रेन पर फिर किया बड़ा हमला… एक साथ दागे कई ड्रोन और मिलाइलें


    नई दिल्ली।
    रूस (Russia) ने यूक्रेन (Ukraine) के कई शहरों पर एक साथ कई तरह की मिसाइलों और ड्रोनों से हमला (Missiles and Drones Attack) किया. इस हमले में ओनिक्स-एम, जिरकॉन और इस्कंदर-एम जैसी मिसाइलों का इस्तेमाल बताया गया है. साथ ही सैकड़ों ड्रोन भी दागे गए. हमला 10 क्षेत्रों में हुआ जिसमें कीव, द्निप्रो और क्रिवी रीह शामिल हैं।

    यूक्रेनी बलों ने ज्यादातर खतरों को रोक लिया लेकिन कुछ हमले लक्ष्य तक पहुंच गए. इससे आग लगी, कारखाने क्षतिग्रस्त हुए और चेर्निहिव में 1 लाख लोगों को बिजली कटौती का सामना करना पड़ा. द्निप्रो में तीन या चार लोगों की मौत हुई और कई घायल हुए।

    रूस ने इस हमले को मास्को के पास यूक्रेनी हमलों का जवाब बताया. दोनों पक्ष ऊर्जा और औद्योगिक ठिकानों पर हमले बढ़ा रहे हैं. यह घटना लंबे संघर्ष के बीच तनाव को और बढ़ाने वाली साबित हुई है. हमले में विभिन्न प्रकार की मिसाइलों का मिश्रण इस्तेमाल हुआ. ओनिक्स-एम सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइल है लेकिन जमीन के ठिकानों पर भी लगाई जा सकती है.

    जिरकॉन हाइपरसोनिक मिसाइल है जो तेज गति से लक्ष्य पर हमला करती है. इस्कंदर-एम बैलिस्टिक मिसाइल है जो सटीक निशाना लगाने में सक्षम है. इनके अलावा कुछ क्रूज मिसाइलें भी दागी गईं. ड्रोन की संख्या सैकड़ों में बताई गई है जो विभिन्न दिशाओं से आए।

    यूक्रेनी वायु रक्षा ने इनमें से अधिकांश को मार गिराया. कुल 186 खतरों को रोकने का दावा किया गया. बावजूद इसके कुछ मिसाइल और ड्रोन लक्ष्य तक पहुंच गए. कीव और अन्य शहरों में विस्फोट की आवाजें सुनाई दीं. औद्योगिक क्षेत्रों और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाया गया जिससे बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई।


    नुकसान और नागरिक प्रभाव

    द्निप्रो में सबसे ज्यादा नुकसान की खबरें आईं. वहां मौतें हुईं और कई लोग घायल हुए. चेर्निहिव में बिजली कटौती से एक लाख लोग प्रभावित हुए. आग बुझाने और मलबा हटाने का काम जारी रहा. कारखानों को नुकसान पहुंचने से स्थानीय अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है. नागरिक इलाकों में भी हमले की खबरों ने लोगों में भय पैदा किया।

    यूक्रेनी अधिकारियों ने नागरिक ठिकानों पर हमले की निंदा की. रूस ने सैन्य और ऊर्जा लक्ष्यों को निशाना बनाने का दावा किया. दोनों पक्षों के बयान अलग-अलग हैं लेकिन जमीनी हकीकत में नुकसान साफ दिख रहा है. यह हमला यूक्रेन द्वारा मास्को के आसपास किए गए हमलों के जवाब में बताया जा रहा है।

    दोनों देश एक-दूसरे के ऊर्जा और औद्योगिक ढांचे को निशाना बना रहे हैं. ड्रोन और मिसाइल हमलों की संख्या बढ़ने से वायु रक्षा प्रणाली पर दबाव बढ़ गया है. सर्दियों के करीब आने के साथ ऊर्जा सुविधाओं पर हमले नागरिकों के लिए और मुश्किलें पैदा कर सकते हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस हमले की निंदा हुई है. संघर्ष के लंबे होते जाने से दोनों पक्ष नई रणनीति अपना रहे हैं. हाइपरसोनिक और सुपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल युद्ध की प्रकृति को बदल रहा है. बचाव और पुनर्निर्माण का काम चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।

    यूक्रेन अपनी वायु रक्षा को मजबूत करने की कोशिश में लगा है. रूस लगातार हमलों से दबाव बनाए रखना चाहता है. आम नागरिकों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की बहाली सबसे बड़ी जरूरत है. यह हमला दिखाता है कि संघर्ष अभी भी तीव्र चरण में है और शांति की संभावनाएं फिलहाल कमजोर दिख रही हैं. दोनों पक्षों को संयम बरतने और राजनयिक समाधान तलाशने की सलाह दी जा रही है लेकिन मैदान में तनाव जारी है।

  • रूस के संसदीय चुनाव में पुतिन की पार्टी की बड़ी जीत, यूनाइटेड रशिया ने 450 में से 355 सीटों पर दर्ज किया कब्जा

    रूस के संसदीय चुनाव में पुतिन की पार्टी की बड़ी जीत, यूनाइटेड रशिया ने 450 में से 355 सीटों पर दर्ज किया कब्जा

    नई दिल्ली । रूस में 2026 के संसदीय चुनाव के शुरुआती नतीजों में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के समर्थन वाली यूनाइटेड रशिया पार्टी ने बड़ी बढ़त हासिल की है। 450 सदस्यीय स्टेट ड्यूमा में पार्टी ने 355 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस परिणाम के साथ यूनाइटेड रशिया ने संसद में अपना मजबूत बहुमत बरकरार रखा है।

    यह चुनाव फरवरी 2022 में यूक्रेन के साथ शुरू हुए संघर्ष के बाद पहला संसदीय चुनाव था। ऐसे समय में हुए इस चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर रही। चुनाव के दौरान यूक्रेन में लड़ रहे रूसी सैनिकों के समर्थन का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया। यूनाइटेड रशिया ने पिछले चुनाव की तुलना में इस बार अधिक सीटें हासिल की हैं।

    रूस की 450 सदस्यीय संसद में 225 सीटों के लिए पार्टी-लिस्ट प्रणाली के तहत मतदान होता है, जबकि बाकी 225 सीटों पर सीधे उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है। उपलब्ध नतीजों के अनुसार यूनाइटेड रशिया के उम्मीदवार सिंगल-मेंबर सीटों में से 208 पर आगे रहे। पार्टी को पार्टी-लिस्ट मतदान में भी 58 प्रतिशत के आसपास वोट मिले हैं।

    2021 में हुए पिछले संसदीय चुनाव में यूनाइटेड रशिया ने स्टेट ड्यूमा की 450 में से 324 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार 355 सीटों का आंकड़ा पिछले चुनाव के मुकाबले काफी अधिक है। इससे संसद में पार्टी की स्थिति और मजबूत हुई है।

    चुनाव में मतदान प्रतिशत भी चर्चा में रहा। रूस में कुल मतदान करीब 57 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया। मॉस्को में भी मतदान को लेकर लोगों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही। चुनाव के दौरान कई क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई थी।

    इस बार युद्ध-विरोधी याब्लोको पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी-लिस्ट चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। हालांकि उसके कुछ नेताओं को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का अवसर मिला। इसके अलावा कई सरकार विरोधी नेताओं और उम्मीदवारों के चुनाव में हिस्सा लेने पर भी रोक रही।

    रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन यूनाइटेड रशिया पार्टी के औपचारिक सदस्य नहीं हैं। हालांकि वह वर्ष 2008 से 2012 तक पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। उस समय भी पार्टी का अध्यक्ष बनने के लिए औपचारिक सदस्यता जरूरी नहीं थी। वर्ष 2012 में पुतिन ने पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ दिया था। इसके बाद दिमित्री मेदवेदेव ने पार्टी की कमान संभाली।

    चुनाव के अंतिम चरण में रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष का असर भी दिखाई दिया। मतदान के आखिरी दिन मॉस्को और आसपास के इलाकों में बड़े पैमाने पर ड्रोन हमलों की जानकारी सामने आई। मॉस्को को निशाना बनाकर सैकड़ों ड्रोन भेजे जाने का दावा किया गया, जबकि राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में ड्रोन की कुल संख्या 1,600 से अधिक बताई गई।

    युद्ध के बीच हुए इस संसदीय चुनाव के नतीजों में यूनाइटेड रशिया की 355 सीटों की जीत ने रूस की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में पार्टी की मजबूत स्थिति को फिर सामने ला दिया है।

  • Russia: पुतिन की पार्टी फिर बहुमत की ओर…! ससदीय चुनाव में मिले 57.54% से अधिक वोट

    Russia: पुतिन की पार्टी फिर बहुमत की ओर…! ससदीय चुनाव में मिले 57.54% से अधिक वोट


    मास्को।
    रूस (Russia) में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (President Vladimir Putin) की पार्टी को एक बार फिर से स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार हैं। पुतिन लंबे समय से रूस की सत्ता पर काबिज हैं। इस वर्ष कराए गए चुनाव में भी पार्टी के समर्थकों ने बंपर वोटिंग (Massive Voter turnout) की है। केंद्रीय चुनाव आयोग (Central Election Commission) की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक पुतिन की पार्टी- यूनाइटेड रूस (Putin’s Party – United Russia) को 57 प्रतिशत से अधिक वोट मिले हैं। अंतिम आंकड़े आने पर वोट प्रतिशत में बदलाव संभव है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नीतियों का विरोध लगभग नदारद रहा। क्रेमलिन का वर्चस्व मजबूत होने की उम्मीद है। मतदान में धांधली और इलेक्ट्रॉनिक मतदान में समस्याओं की रिपोर्ट्स भी सामने आईं।


    चुनाव नतीजों में क्या खास, किस दल का कैसा प्रदर्शन?

    रूस के केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने रविवार देर रात (रूसी समय) जारी एक बयान में कहा, चुनाव के शुरुआती परिणाम आ गए हैं। सत्तारूढ़ दल- यूनाइटेड रूस को 57.54% से अधिक वोट मिले हैं। इन प्रारंभिक नतीजों के आधार पर माना जा रहा है कि पुतिन की सत्ता पर पकड़ और मजबूत होगी। खास बात ये भी है कि यूक्रेन के साथ वर्ष 2022 में शुरू हुए सैन्य टकराव के बाद पहली बार आम चुनाव कराए गए हैं।

    रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग ने बताया कि मतदान शुक्रवार को 11 करोड़ 10 लाख पात्र मतदाताओं के लिए शुरू हुआ था। इसमें यूक्रेन के उन चार क्षेत्रों के निवासी भी शामिल थे, जिन्हें मॉस्को ने युद्ध के बाद अवैध रूप से अपने साथ मिलाया था, पर अभी भी उन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं है। क्रीमिया के निवासी भी मतदान में शामिल थे, जिसे रूस ने 2014 में अवैध रूप से अपने साथ मिलाया था। कीव और यूरोपीय संघ ने रूसी-नियंत्रित क्षेत्रों में हुए मतदान को अवैध बताया। उन्होंने विदेशी सरकारों से परिणामों को मान्यता न देने का आग्रह किया। रूस और यूक्रेन के रूसी-नियंत्रित क्षेत्रों में मतदान समाप्त होने के बाद भी, पश्चिमी समय क्षेत्रों में दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों में मतदान जारी रहा। क्रेमलिन इस संसदीय चुनाव को युद्ध के लिए जन समर्थन दिखाने और अपनी कार्रवाई को वैध बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है।


    क्रेमलिन की मुख्य पार्टी को भारी बहुमत

    प्रारंभिक परिणामों से पता चला है कि चार अन्य पार्टियां जो लगभग हमेशा क्रेमलिन के पक्ष में मतदान करती हैं, संसद के निचले सदन- स्टेट ड्यूमा में उनकी वापसी तय है। केंद्रीय चुनाव आयोग के अनुसार लगभग 58% मतदान केंद्रों की गिनती हो चुकी है। पार्टी सूचियों के आधार पर आवंटित 225 सांसदों में से यूनाइटेड रूस को लगभग 58% वोट मिले हैं।

    225 अन्य सांसदों का चुनाव एकल-सीट चुनावों में होगा, यूनाइटेड रूस उनमें भी अधिकांश सीटें जीतने की स्थिति में है। इस चुनाव में अधिकांश विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया, और यह चुनाव सोवियत काल के बाद से रूस में सबसे कठोर राजनीतिक दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उल्लंघन के माहौल में हुआ।

    क्रेमलिन ने असंतोष को दबाकर राजनीतिक जोखिमों से बचने की कोशिश की है। एक बड़े राज्य मीडिया अभियान और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति में चुनाव पर कड़ा नियंत्रण क्रेमलिन को रूसी राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखने में मदद करेगा। यह बढ़ती आर्थिक लागतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बीच हो रहा है। मतदाताओं ने दो अलग-अलग मतपत्र डाले, जिससे डूमा की आधी सीटें भरी गईं। बाकी सीटों पर एकल-सीट निर्वाचन क्षेत्रों में व्यक्तिगत उम्मीदवारों को चुना गया। मुख्य क्रेमलिन पार्टी, यूनाइटेड रूस, से निचले सदन, स्टेट डूमा पर अपना भारी नियंत्रण बनाए रखने की उम्मीद है। ‘सिस्टेमिक विपक्ष’ की छोटी पार्टियां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखेंगी।


    क्या क्रेमलिन का नियंत्रण मजबूत होगा?

    क्रेमलिन इस संसदीय चुनाव को युद्ध के लिए जन समर्थन दिखाने का माध्यम मानता है, जो 2022 में यूक्रेन पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण के बाद पहला चुनाव है। यह अपनी कार्रवाई को वैध बनाने का भी प्रयास कर रहा है। उसने किसी भी असंतोष को दबाकर राजनीतिक जोखिमों से बचने की कोशिश की है। एक बड़े राज्य मीडिया अभियान और वास्तविक विपक्ष की अनुपस्थिति में चुनाव पर कड़ा नियंत्रण है। यह क्रेमलिन को रूसी राजनीति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने में मदद करेगा। यह बढ़ती आर्थिक लागतों और यूक्रेनी ड्रोन हमलों के बीच हो रहा है। मतदाता डूमा की 450 सीटों के लिए दो अलग-अलग मतपत्र डालते हैं; आधे सीटों के लिए राजनीतिक दल चुने जाते हैं, जबकि बाकी के लिए व्यक्तिगत उम्मीदवार। मुख्य क्रेमलिन पार्टी, यूनाइटेड रूस, से निचले सदन, स्टेट डूमा पर अपना भारी नियंत्रण बनाए रखने की उम्मीद है। ‘सिस्टेमिक विपक्ष’ की छोटी पार्टियां भी अपनी उपस्थिति बनाए रखेंगी।


    मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक मतदान में क्या समस्याएं आईं?

    रूस के केंद्रीय चुनाव आयोग की प्रमुख एला पामफिलोवा ने रविवार को बताया कि मॉस्को में इलेक्ट्रॉनिक मतदान प्रणाली को साइबर हमलों का निशाना बनाया गया। उन्होंने इसके लिए ‘सिस्टेमिक पार्टियों’ में से एक को दोषी ठहराया, पर किसी का नाम नहीं लिया। एक स्वतंत्र रूसी समाचार आउटलेट- सोता विजन, ने रविवार को मॉस्को के मतदान केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण प्रणाली में तकनीकी खराबी की सूचना दी। आउटलेट ने टेलीग्राम पर बताया कि लोगों को कागजी मतपत्र नहीं दिए गए, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक टर्मिनल से मतदान करने को कहा गया। दिवंगत रूसी विपक्षी नेता एलेक्सी नवालनी के करीबी सहयोगी लियोनिद वोल्कोव ने सुझाव दिया कि कागजी मतपत्र प्रणाली का खराब होना जानबूझकर किया गया हो सकता है। इसका उद्देश्य मतदाताओं को इलेक्ट्रॉनिक मतदान की ओर धकेलना था। उन्होंने रविवार को एक्स पर ‘कागजी मतपत्र की मांग करें!’ लिखा। कई मतदाताओं ने इलेक्ट्रॉनिक मतदान से इनकार कर दिया, जिससे मतदान केंद्रों के बाहर कतारें लग गईं। यबलोको पार्टी के नेता निकोलाई राइबाकोव ने सेंट पीटर्सबर्ग में एक मतपत्र डाला, जिस पर ‘स्वतंत्रता के लिए,’ ‘शांति के लिए,’ और ‘यबलोको’ लिखा देखा गया।


    विदेशों में रूसी विपक्ष ने कैसे विरोध किया?

    एलेक्सी नवालनी की विधवा यूलिया नवालनाया सहित रूस के निर्वासित विपक्ष ने युद्ध-विरोधी रूसियों से रविवार दोपहर मतदान करने का आह्वान किया। आर्मेनिया में रहने वाले हजारों रूसियों ने मतदान में भाग लिया। वे राजधानी येरेवन में रूसी दूतावास के बाहर कतार में खड़े थे। उनमें से कुछ ‘शांतिपूर्ण रूस के लिए दोपहर’ नामक युद्ध-विरोधी प्रदर्शन में शामिल हुए। उन्होंने युद्ध-विरोधी और पुतिन-विरोधी पोस्टर पकड़े हुए थे। पत्रकार मार्क पोडबेरेज़िन ने कहा कि येरेवन में चुनाव आयोग के सदस्यों ने ऐसी टिप्पणियां कीं जो ‘खुले तौर पर डराने-धमकाने’ वाली थीं। उन्होंने सुना था कि ‘आपको देर-सबेर रूस लौटना होगा, इसे ध्यान में रखें।’ लिडिया क्लिमेंको ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि उनके वोट का कोई वास्तविक प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सबसे उपयोगी काम ‘अन्य लोगों को देखना था जो युद्ध के खिलाफ हैं, एक साझा उद्देश्य में एक साथ होना।’ जर्मनी में, मतदाताओं ने बर्लिन में रूसी दूतावास में अपने मतपत्र डाले। असंतुष्ट और ओपन रूस समूह के पूर्व प्रमुख आंद्रेई पिवोवारोव ने इमारत के बाहर एकत्रित विरोध प्रदर्शन को संबोधित किया।

  • ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    ट्रंप ने रूस-ईरान प्रतिबंध कानून पर किए हस्ताक्षर, भारत और चीन जैसे ऊर्जा खरीदार देशों पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

    नई दिल्ली ।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और ईरान से जुड़े एचआर 5334 विधेयक पर 18 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया। इस कानून में रूस पर प्रतिबंधों, टैरिफ और अन्य पाबंदियों को लागू करने तथा उनका दायरा बढ़ाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे जारी रखने की व्यवस्था भी की गई है।

    ट्रंप के इस फैसले पर भारत में कांग्रेस की ओर से प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि किसी धौंस जमाने वाले का मुकाबला करने का एक ही तरीका है और वह है मजबूती से उसका प्रतिरोध करना।

    नए कानून में रूस के ऊर्जा क्षेत्र को लेकर भी कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। इसमें रूस के ऊर्जा कारोबार और उससे जुड़े प्रमुख खरीदार देशों पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था है। रूस के साथ बड़े स्तर पर ऊर्जा व्यापार करने वाले देशों में भारत और चीन भी शामिल हैं।

    कानून के तहत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। इससे रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों के लिए अमेरिकी प्रतिबंध नीति का प्रभाव बढ़ सकता है। हालांकि कानून पर हस्ताक्षर होने के साथ भारत पर तत्काल कोई नया टैरिफ लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है।

    विधेयक में रूस के नेतृत्व, ऊर्जा क्षेत्र और रक्षा कारोबार से जुड़े नेटवर्क पर कार्रवाई के प्रावधान भी शामिल हैं। रूस के साथ रक्षा क्षेत्र में सहयोग करने वाले देशों और संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य रूस के आर्थिक और रणनीतिक नेटवर्क पर प्रतिबंधों का प्रभाव मजबूत करना है।

    कानून में रूस के ऊर्जा निर्यात से जुड़े नेटवर्क पर भी ध्यान दिया गया है। इसके जरिए प्रतिबंधों को दरकिनार करने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई का रास्ता तैयार किया गया है। रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ और अन्य प्रतिबंधों का इस्तेमाल किए जाने की व्यवस्था की गई है।

    ईरान को लेकर भी कानून में महत्वपूर्ण प्रावधान हैं। इसमें ईरान पर पहले से लागू प्रतिबंधों को आगे बढ़ाने की व्यवस्था की गई है। इस तरह रूस के साथ ईरान को लेकर भी अमेरिकी प्रतिबंध व्यवस्था को कानूनी आधार मिला है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इस विधेयक को 16 सितंबर 2026 को मंजूरी दी थी। इसके बाद विधेयक को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए भेजा गया। 18 सितंबर को ट्रंप ने इस पर हस्ताक्षर कर इसे कानून का रूप दे दिया।

    भारत के लिए यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस के साथ उसका ऊर्जा कारोबार लंबे समय से जारी है। रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। ऐसे में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर संभावित अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा भारत के आर्थिक और ऊर्जा हितों से जुड़ता है।

    जयराम रमेश की प्रतिक्रिया के बाद यह मुद्दा भारत की राजनीतिक बहस में भी सामने आया है। नए कानून के तहत भारत पर तत्काल कोई नया शुल्क लागू किए जाने की घोषणा नहीं हुई है। हालांकि आगे अमेरिकी प्रशासन इस कानून के प्रावधानों का किस तरह इस्तेमाल करता है, इससे भारत समेत रूस के साथ ऊर्जा कारोबार करने वाले देशों पर संभावित प्रभाव स्पष्ट होगा।

  • रूस पर 100% टैरिफ की तैयारी, फिर भी यूरेनियम खरीद का रास्ता खुला रखेगा अमेरिका

    रूस पर 100% टैरिफ की तैयारी, फिर भी यूरेनियम खरीद का रास्ता खुला रखेगा अमेरिका

    वाशिंगटन। रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा अमेरिका अपने परमाणु ईंधन हितों को लेकर रूस के साथ कुछ लेनदेन का रास्ता खुला रख रहा है। प्रस्तावित प्रावधानों के तहत भारत और चीन जैसे रूस से बड़े पैमाने पर ऊर्जा खरीदने वाले देश अमेरिकी टैरिफ के दायरे में आ सकते हैं। वहीं रूस से जुड़े कुछ नागरिक परमाणु सहयोग और यूरेनियम आयात को प्रतिबंधों से बाहर रखने का प्रावधान किया गया है।

    यह स्थिति अमेरिका की रूस नीति में ऊर्जा और परमाणु क्षेत्र को लेकर अलग-अलग रुख को सामने लाती है। एक ओर रूस की तेल-गैस आय से जुड़े देशों पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की तैयारी है, तो दूसरी ओर अमेरिकी परमाणु ईंधन की जरूरतों को देखते हुए कुछ रूसी परमाणु आपूर्ति के लिए अपवाद रखा गया है।

    100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने बुधवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाला अधिनियम 2026’ पारित किया। इसके तहत राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिलेगा।

    यह विधेयक रूस और ईरान के खिलाफ व्यापक प्रतिबंध पैकेज का हिस्सा है। इसका उद्देश्य रूस से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ाना है। हालांकि, इसी कानून में परमाणु क्षेत्र से जुड़ी कुछ गतिविधियों के लिए अपवाद भी शामिल किए गए हैं।

    रूस से यूरेनियम पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं

    कानून के सेक्शन 111 में राष्ट्रपति को रूस से यूरेनियम आयात को नियंत्रित करने वाले मौजूदा अमेरिकी कानून की आवश्यकताओं को लागू करने का निर्देश दिया गया है। इसमें विशेष रूप से रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटॉम और उसकी सहायक या उत्तराधिकारी इकाइयों से आने वाले यूरेनियम का उल्लेख है।

    हालांकि, कानून के सेक्शन 114 में कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधों से बाहर रखा गया है। इसका मतलब है कि रूस से जुड़े सभी परमाणु ईंधन लेनदेन पर एक साथ और पूरी तरह रोक लगाने का प्रावधान नहीं है।

    सेक्शन 114 में दो अहम अपवाद

    कानून के सेक्शन 114 में दो प्रमुख अपवाद बताए गए हैं। पहला, अमेरिका और रूस के बीच नागरिक परमाणु सहयोग समझौतों के तहत होने वाली गतिविधियों पर संबंधित प्रतिबंध लागू नहीं होंगे। ये समझौते अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किए जाते हैं।

    दूसरा अपवाद कुछ कम-संवर्धित यूरेनियम (LEU) के आयात से जुड़ा है। ऐसे यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के तौर पर किया जाता है और कुछ आयात मौजूदा अमेरिकी कानून के दायरे में आते हैं। इसके अलावा कुछ मेडिकल आइसोटोप के आयात को भी छूट दी गई है, यदि उनके लिए पहले से अनुमति या छूट जारी की गई हो।

    परमाणु ईंधन में रूस पर अमेरिका की निर्भरता

    रूस से जुड़े परमाणु ईंधन के लिए अपवाद का एक प्रमुख कारण अमेरिका की अपनी ऊर्जा जरूरतें हैं। रूस लंबे समय से यूरेनियम संवर्धन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। अमेरिका ने व्यापक आर्थिक क्षेत्रों में रूस पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश की है, लेकिन परमाणु ईंधन के क्षेत्र में बदलाव अपेक्षाकृत जटिल रहा है।

    उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक अमेरिकी नागरिक परमाणु संयंत्रों ने 2025 में कुल 12.71 मिलियन सेपरेटिव वर्क यूनिट्स (SWU) की एनरिचमेंट सर्विसेज हासिल कीं। इनमें रूस की हिस्सेदारी 3.284 मिलियन SWU रही, जो कुल का करीब 26 फीसदी है।

    अमेरिका के साथ फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स भी आपूर्तिकर्ता

    अमेरिका में घरेलू स्तर पर होने वाली यूरेनियम एनरिचमेंट की हिस्सेदारी करीब 23 फीसदी रही। इसके अलावा फ्रांस, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स भी अमेरिकी परमाणु उद्योग को एनरिचमेंट सर्विसेज उपलब्ध कराते हैं।

    इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि परमाणु ईंधन आपूर्ति श्रृंखला में अमेरिका के लिए रूस की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है। ऐसे में रूस पर व्यापक आर्थिक दबाव बढ़ाने के बावजूद अमेरिकी कानून में परमाणु क्षेत्र से जुड़ी कुछ गतिविधियों के लिए अपवाद रखे जाने को उसकी घरेलू परमाणु ईंधन जरूरतों के संदर्भ में देखा जा रहा है।

  • रूस से तेल खरीद पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान, भारत ने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी

    रूस से तेल खरीद पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ का प्रावधान, भारत ने राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी

    नई दिल्ली । अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत सरकार ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और करीब 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की खरीद जारी रखी जाएगी। सरकार के मुताबिक ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर लिए जाएंगे।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262 के मुकाबले 159 वोट से पारित किया। इससे पहले यह विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका था। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो गया है। इसके लिए आगे राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय और कानून में दिए गए प्रावधानों के तहत कार्रवाई जरूरी होगी।

    भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस खरीदता रहेगा। सरकार का जोर ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने पर है। इस रुख का उद्देश्य घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती ऊर्जा उपलब्धता बनाए रखना है।

    भारत सरकार ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराया है और कहा है कि प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    विधेयक में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान शामिल हैं। इसका एक प्रमुख हिस्सा उन देशों को निशाना बनाने से जुड़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए विधेयक के प्रावधानों को लेकर दोनों देशों पर विशेष ध्यान है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी है। राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही विधेयक कानून का रूप लेगा। इसके बाद इसमें दिए गए टैरिफ संबंधी अधिकारों के इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में छूट या अन्य प्रावधानों की भी गुंजाइश रखी गई है।

    भारत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। संभावित प्रभावों से निपटने के लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखेगी। फिलहाल भारत का मुख्य जोर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अलग-अलग स्रोतों से खरीद के विकल्प बनाए रखने पर है।

  • अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच भारत का रुख स्पष्ट, ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं, जरूरत के मुताबिक तेल-गैस खरीद जारी

    अमेरिकी टैरिफ दबाव के बीच भारत का रुख स्पष्ट, ऊर्जा सुरक्षा से समझौता नहीं, जरूरत के मुताबिक तेल-गैस खरीद जारी

    नई दिल्ली ।अमेरिकी संसद में रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाले विधेयक के पारित होने के बाद भारत ने अपनी ऊर्जा नीति को लेकर स्पष्ट रुख सामने रखा है। भारत सरकार ने कहा है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और करीब 1.4 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तेल और गैस की खरीद जारी रखी जाएगी। सरकार के मुताबिक ऊर्जा खरीद से जुड़े फैसले बदलती बाजार परिस्थितियों और उपलब्ध विकल्पों के आधार पर लिए जाएंगे।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर को लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262 के मुकाबले 159 वोट से पारित किया। इससे पहले यह विधेयक अमेरिकी सीनेट से भी पारित हो चुका था। अब इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। विधेयक राष्ट्रपति को रूस से तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो गया है। इसके लिए आगे राष्ट्रपति स्तर पर निर्णय और कानून में दिए गए प्रावधानों के तहत कार्रवाई जरूरी होगी।

    भारत ने कहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए अलग-अलग स्रोतों से तेल और गैस खरीदता रहेगा। सरकार का जोर ऊर्जा आपूर्ति में विविधता बनाए रखने और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार फैसले लेने पर है। इस रुख का उद्देश्य घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती ऊर्जा उपलब्धता बनाए रखना है।

    भारत सरकार ने यह भी कहा कि हाल के महीनों में इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तर पर बातचीत हुई है। भारत ने अपनी चिंताओं से अमेरिका को अवगत कराया है और कहा है कि प्रतिबंधों तथा संभावित टैरिफ का असर केवल द्विपक्षीय व्यापार संबंधों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

    विधेयक में रूस के ऊर्जा क्षेत्र के अलावा उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों पर भी प्रतिबंधात्मक प्रावधान शामिल हैं। इसका एक प्रमुख हिस्सा उन देशों को निशाना बनाने से जुड़ा है जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। भारत और चीन ऐसे प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं, इसलिए विधेयक के प्रावधानों को लेकर दोनों देशों पर विशेष ध्यान है।

    अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में विधेयक पारित होने के बाद अब अगला महत्वपूर्ण चरण राष्ट्रपति की मंजूरी है। राष्ट्रपति की ओर से हस्ताक्षर किए जाने के बाद ही विधेयक कानून का रूप लेगा। इसके बाद इसमें दिए गए टैरिफ संबंधी अधिकारों के इस्तेमाल का रास्ता खुलेगा। कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में छूट या अन्य प्रावधानों की भी गुंजाइश रखी गई है।

    भारत ने अपने रुख में यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाएगा। संभावित प्रभावों से निपटने के लिए सरकार व्यापार और उद्योग जगत के साथ मिलकर स्थिति पर नजर रखेगी। फिलहाल भारत का मुख्य जोर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने और अलग-अलग स्रोतों से खरीद के विकल्प बनाए रखने पर है।