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  • अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    अमेरिका के 100% टैरिफ बिल पर केजरीवाल का हमला, मोदी सरकार पर ट्रंप के दबाव में फैसले लेने का आरोप

    नई दिल्ली । अमेरिका में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने के प्रावधान वाले विधेयक को सीनेट की मंजूरी मिलने के बाद भारत में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत की विदेश और आर्थिक नीति से जुड़े कई फैसलों पर अमेरिका और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रभाव बढ़ गया है।

    केजरीवाल ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि सरकार ने देश को अमेरिका के हाथों गिरवी रखने और ट्रंप के दबाव में काम करने की स्थिति पैदा कर दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मोदी ट्रंप की बातों को सही या गलत की परवाह किए बिना मानते हैं और अमेरिका की ओर से भारत के खिलाफ फैसले लिए जा रहे हैं।

    यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी सीनेट ने रूस के खिलाफ नए प्रतिबंधों से जुड़े एक व्यापक विधेयक को भारी बहुमत से पारित किया है। ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम के इस विधेयक को सीनेट में 86 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि 11 सांसदों ने इसके खिलाफ मतदान किया।

    विधेयक का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा बिक्री से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों को आर्थिक रूप से प्रभावित करना है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले पांच प्रमुख देशों से आने वाले सामान पर अधिकतम 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का अधिकार दिया जा सकता है।

    भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आने वाले प्रमुख देश हैं। इसके अलावा रूस से ऊर्जा आयात करने वाले अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि सीनेट से पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है। विधेयक को आगे की विधायी प्रक्रिया से गुजरना होगा और इसके प्रावधानों के लागू होने की स्थिति अलग प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

    अमेरिका की ओर से इस कदम के पीछे रूस के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े व्यापार पर दबाव बनाने की रणनीति बताई गई है। अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि रूस के तेल और गैस की खरीद से मिलने वाली आय उसकी युद्ध क्षमता को बनाए रखने में मदद करती है। ऐसे में रूस के बड़े ऊर्जा खरीदार देशों पर आर्थिक दबाव डालकर मॉस्को की आय को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

    विधेयक में रूस से जुड़े प्रतिबंधों के अलावा ईरान पर लागू प्रतिबंधों की अवधि बढ़ाने का भी प्रावधान शामिल है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई से जुड़े मौजूदा प्रावधानों को आगे बढ़ाने की बात कही गई है।

    भारत में इस घटनाक्रम के बाद विपक्ष केंद्र सरकार की विदेश नीति और अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर सवाल उठा रहा है। केजरीवाल ने भी इसी राजनीतिक बहस को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री मोदी पर ट्रंप के प्रति अत्यधिक नरम रुख अपनाने का आरोप लगाया है।

    इस पूरे घटनाक्रम ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और रूस से भारत के ऊर्जा आयात को लेकर नई चुनौती खड़ी कर दी है। अब नजर इस बात पर होगी कि अमेरिकी विधेयक आगे की प्रक्रिया में किस रूप में आगे बढ़ता है और भारत समेत प्रभावित देशों के लिए संभावित टैरिफ व्यवस्था को लेकर अमेरिका क्या कदम उठाता है।

  • अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    अमेरिकी सीनेट से रूस के तेल खरीदारों पर 100% टैरिफ का रास्ता साफ, भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता

    नई दिल्ली । अमेरिका और रूस के बीच जारी तनाव का असर अब भारत और चीन समेत उन देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में तेल और गैस खरीदते हैं। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को भारी बहुमत से मंजूरी दी है, जिसके कानून बनने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदार देशों से आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की ताकत मिल सकती है।

    सीनेट में विधेयक के पक्ष में 86 वोट पड़े, जबकि 11 सांसदों ने इसका विरोध किया। प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय से जुड़े आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना और यूक्रेन युद्ध के बीच रूस की आर्थिक क्षमता को कमजोर करना बताया गया है।

    प्रस्तावित व्यवस्था के तहत रूस से सबसे अधिक तेल और गैस खरीदने वाले पांच देशों को निशाने पर लिया जा सकता है। इनमें भारत और चीन के अलावा अजरबैजान, हंगरी और स्लोवाकिया शामिल हैं। हालांकि, सीनेट से विधेयक पारित होने का मतलब यह नहीं है कि इन देशों पर तत्काल 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो गया है।

    दरअसल, विधेयक को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की मंजूरी मिलना बाकी है। इसके बाद राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रक्रिया होगी। इन सभी चरणों के पूरा होने के बाद ही यह कानून का रूप ले सकेगा। इसलिए फिलहाल भारत पर इस प्रस्ताव के तहत कोई नया 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हुआ है।

    इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण पहलू इसकी अधिकतम टैरिफ सीमा है। पिछले वर्ष पेश किए गए शुरुआती प्रस्ताव में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस पहल को रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने आगे बढ़ाया था।

    बाद में प्रस्ताव में बदलाव किया गया और 500 प्रतिशत वाले प्रावधान को हटाकर रूस के पांच सबसे बड़े तेल और गैस खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का विकल्प रखा गया। इससे यह साफ होता है कि प्रस्तावित कानून में अधिकतम सीमा तय की गई है, लेकिन हर देश पर अनिवार्य रूप से इतनी ही दर लागू करना जरूरी नहीं होगा।

    कानून बनने की स्थिति में ट्रंप को टैरिफ की दर तय करने में महत्वपूर्ण अधिकार मिल सकते हैं। राष्ट्रीय हित, कूटनीतिक परिस्थितियों और दूसरे देशों के साथ अमेरिका के संबंधों को ध्यान में रखते हुए वह शुल्क में बदलाव या कुछ मामलों में राहत देने का निर्णय कर सकते हैं।

    भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि रूस से कच्चे तेल की खरीद पिछले कुछ वर्षों में उसकी ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। रूस से मिलने वाले तेल ने भारतीय रिफाइनिंग और ऊर्जा जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे में अमेरिकी शुल्क नीति में बड़ा बदलाव भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर भी असर डाल सकता है।

    प्रस्ताव में रूस के अलावा ईरान को लेकर भी सख्ती का प्रावधान है। ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून की अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके साथ ही रूस के वरिष्ठ अधिकारियों, कारोबारियों और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था भी प्रस्तावित है।

    अब सबकी नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर है, जिसका नया सत्र 31 अगस्त से शुरू होना है। वहां विधेयक पर चर्चा और मतदान के बाद इसकी आगे की दिशा तय होगी। फिलहाल भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि सीनेट की मंजूरी अंतिम टैरिफ फैसला नहीं है। आने वाले चरणों में अमेरिकी संसद और राष्ट्रपति के निर्णय से ही स्पष्ट होगा कि भारत पर वास्तविक शुल्क कितना पड़ सकता है और इसका द्विपक्षीय व्यापार पर कितना असर होगा।

  • भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    भारत ने Su-57 से बनाई दूरी, राफेल पर बढ़ा भरोसा, रूस के लिए बड़ा रणनीतिक झटका माना जा रहा फैसला

    नई दिल्ली । भारत की रक्षा रणनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान सुखोई Su-57 को लेकर फिलहाल भारत की ओर से कोई खरीद योजना आगे बढ़ती नजर नहीं आ रही है। इसके बजाय भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण, अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद और स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इस फैसले को रूस के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि मॉस्को लंबे समय से भारत को Su-57 लड़ाकू विमान की पेशकश करता रहा है।

    रूस ने भारत को Su-57 विमान खरीदने के लिए कई आकर्षक प्रस्ताव दिए थे। इनमें विमान निर्माण में सहयोग, तकनीक हस्तांतरण और भारतीय जरूरतों के अनुसार बदलाव की पेशकश भी शामिल थी। रूस की कोशिश थी कि भारत पांचवीं पीढ़ी के इस अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को अपने बेड़े में शामिल करे। इससे पहले ऐसी संभावनाएं जताई जा रही थीं कि भारत करीब 36 से 40 Su-57 विमानों की खरीद पर विचार कर सकता है। हालांकि, अब भारत की प्राथमिकताएं अलग दिखाई दे रही हैं।

    भारतीय रक्षा मंत्रालय की ओर से संकेत दिया गया है कि फिलहाल Su-57 को लेकर कोई सक्रिय खरीद योजना नहीं है। भारत अपने मौजूदा Su-30MKI लड़ाकू विमानों को और अधिक आधुनिक बनाने पर ध्यान दे रहा है। Su-30MKI भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा सहयोग का प्रमुख हिस्सा रहा है। इन विमानों की क्षमता बढ़ाने के लिए कई तकनीकी सुधार और अपग्रेड की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

    इसके साथ ही भारत फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की संख्या बढ़ाने की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। राफेल पहले से ही भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल है और इसकी क्षमता को देखते हुए भारत इसे एक भरोसेमंद विकल्प मान रहा है। राफेल अपनी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी के हथियारों और बहुउद्देश्यीय क्षमता के लिए जाना जाता है। इससे वायुसेना को अलग-अलग परिस्थितियों में बेहतर ऑपरेशनल क्षमता मिलती है।

    हालांकि राफेल और Su-57 अलग-अलग श्रेणी के लड़ाकू विमान हैं। राफेल को 4.5 पीढ़ी का अत्याधुनिक विमान माना जाता है, जबकि Su-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टील्थ फाइटर जेट है। Su-57 की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कम रडार पहचान क्षमता और आंतरिक हथियार भंडारण प्रणाली है। इसमें लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है, जिससे यह बड़े रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाने में सक्षम है।

    भारत की रक्षा योजना में अब स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट यानी AMCA परियोजना को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया जा रहा है। यह भारत का अपना पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य भविष्य में विदेशी तकनीक पर निर्भरता कम करना है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत लंबे समय में अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान विकास कार्यक्रम को मजबूत करना चाहता है।

    रक्षा क्षेत्र में बदलती जरूरतों और रणनीतिक प्राथमिकताओं के बीच भारत का ध्यान अब संतुलित विकल्पों पर है। एक ओर जहां राफेल जैसे आधुनिक और युद्ध में परखे गए विमानों को शामिल करने की योजना है, वहीं दूसरी ओर Su-30MKI अपग्रेड और AMCA जैसे स्वदेशी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाया जा रहा है। ऐसे में Su-57 की खरीद पर फिलहाल विराम लगना भारत की बदलती रक्षा नीति का संकेत माना जा रहा है।

  • रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?

    रूस ने चली क्रिप्टो वाली चाल, डॉलर के दबदबे को चुनौती; क्या ट्रंप की आर्थिक धमकियों का निकलेगा तोड़?


    नई दिल्ली।
    दुनिया की आर्थिक ताकत सिर्फ हथियारों और सैन्य क्षमता से तय नहीं होती, बल्कि वैश्विक कारोबार में किस मुद्रा का दबदबा है, यह भी किसी देश की ताकत को तय करता है। पिछले कई दशकों से अमेरिकी डॉलर अंतरराष्ट्रीय व्यापार और भुगतान व्यवस्था का सबसे बड़ा आधार रहा है। तेल-गैस की खरीद से लेकर देशों के बीच बड़े कारोबारी लेनदेन तक, डॉलर की भूमिका बेहद अहम रही है। इसी वजह से अमेरिका को आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए दूसरे देशों पर दबाव बनाने की ताकत भी मिलती है।

    अब रूस ने इसी व्यवस्था से अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है। रूस ने विदेशी व्यापार में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल को कानूनी दायरे में लाने का रास्ता खोल दिया है। रूस का यह कदम पश्चिमी प्रतिबंधों और डॉलर आधारित वित्तीय व्यवस्था के विकल्प तलाशने की उसकी लंबे समय से चल रही कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है।

    विदेशी व्यापार में क्रिप्टो का रास्ता खुला

    नए प्रावधानों के तहत रूसी कंपनियों को कुछ अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल की अनुमति मिल सकती है। यानी रूस और किसी दूसरे देश की कंपनी आपसी सहमति से कुछ भुगतान डॉलर के बजाय क्रिप्टो के माध्यम से कर सकती हैं।

    रूस के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उस पर कई तरह के आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। पश्चिमी बैंकिंग व्यवस्था और डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रूस लगातार वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों की तलाश करता रहा है।

    डॉलर की ताकत सिर्फ मुद्रा नहीं, पूरा सिस्टम है

    अमेरिका की आर्थिक ताकत केवल डॉलर की वैश्विक मांग से नहीं आती। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था का भी बड़ा योगदान है। यदि किसी देश की इस व्यवस्था तक पहुंच सीमित कर दी जाए तो उसके लिए विदेशों से पैसा भेजना और प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है।

    रूस पिछले कुछ वर्षों में इसी चुनौती का सामना कर रहा है। ऐसे में डिजिटल करेंसी उसके लिए एक वैकल्पिक भुगतान माध्यम बन सकती है। क्रिप्टो आधारित लेनदेन में पारंपरिक बैंकिंग चैनलों पर निर्भरता कुछ मामलों में कम हो सकती है।

    क्या इससे अमेरिका के आर्थिक दबदबे को चुनौती मिलेगी?

    अगर आने वाले समय में अधिक देश डॉलर के अलावा स्थानीय मुद्राओं, डिजिटल करेंसी या क्रिप्टो के जरिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने लगते हैं तो डॉलर की वैश्विक मांग पर असर पड़ सकता है। रूस के साथ चीन, ईरान और दूसरे देश भी वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि डॉलर का दबदबा तुरंत खत्म हो जाएगा। आज भी वैश्विक व्यापार और वित्तीय व्यवस्था में अमेरिकी मुद्रा की भूमिका बेहद मजबूत है। इसलिए क्रिप्टो या स्थानीय मुद्राओं के बढ़ते इस्तेमाल को डॉलर के लिए तत्काल खतरे के बजाय लंबी अवधि में उभरते विकल्प के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा।

    भारत के लिए क्या बदल सकता है?

    भारत भी कई देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। रूस के साथ रुपये और रूबल में व्यापार की व्यवस्था को लेकर भी प्रयास किए गए हैं।

    अगर भविष्य में डिजिटल करेंसी और वैकल्पिक भुगतान प्रणालियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा स्वीकार्य होती हैं, तो भारत के लिए भी डॉलर पर निर्भरता कम करने के कुछ नए रास्ते खुल सकते हैं। इससे कुछ लेनदेन में मुद्रा बदलने की लागत और भुगतान में लगने वाला समय कम करने की संभावना बन सकती है।

    लेकिन भारत की नीति निजी क्रिप्टोकरेंसी के बजाय अपने सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी यानी ई-रुपये पर ज्यादा केंद्रित है। भारत में क्रिप्टो को आधिकारिक मुद्रा का दर्जा नहीं मिला है और इसके इस्तेमाल पर कड़े टैक्स नियम लागू हैं।

    क्रिप्टो के साथ जोखिम भी कम नहीं

    क्रिप्टोकरेंसी को अंतरराष्ट्रीय व्यापार का बड़ा माध्यम बनाने में सबसे बड़ी चुनौतियों में इसकी कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव भी शामिल है। बिटकॉइन जैसी क्रिप्टोकरेंसी की कीमत कम समय में काफी ऊपर-नीचे हो सकती है। ऐसे में अरबों डॉलर के व्यापार के लिए इसका इस्तेमाल जोखिम भरा हो सकता है।

    इसी वजह से भविष्य में स्टेबलकॉइन या सरकार समर्थित डिजिटल करेंसी ज्यादा व्यावहारिक विकल्प बन सकती हैं। इसके लिए सिर्फ कानूनी मंजूरी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियम, भरोसा, सुरक्षा और मजबूत तकनीकी ढांचा भी जरूरी होगा।

    दुनिया को रूस का क्या संदेश?

    रूस का कदम वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते बदलाव की ओर इशारा करता है। चीन अपनी मुद्रा युआन के अंतरराष्ट्रीय इस्तेमाल को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच भी वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्राओं में कारोबार को लेकर चर्चा होती रही है।

    ऐसे में क्रिप्टोकरेंसी, डिजिटल करेंसी और नई भुगतान तकनीकें आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक राजनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं। हालांकि, सिर्फ क्रिप्टो के इस्तेमाल से अमेरिकी आर्थिक दबदबा खत्म हो जाएगा, यह दावा फिलहाल जल्दबाजी होगा। लेकिन रूस का कदम यह जरूर दिखाता है कि दुनिया एक ऐसी वित्तीय व्यवस्था की ओर बढ़ने की कोशिश कर रही है, जिसमें किसी एक देश की मुद्रा और भुगतान प्रणाली पर निर्भरता कम हो।

  • युद्ध के बीच रूस में चल रहा गजब खेल… मुआवजे के लिए सैनिकों से शादी कर रहीं महिलाएं!

    युद्ध के बीच रूस में चल रहा गजब खेल… मुआवजे के लिए सैनिकों से शादी कर रहीं महिलाएं!


    मॉस्को।
    यूक्रेन से युद्ध (Ukraine War) के बीच रूस (Russia) में एक नया घोटाला (New Scam) सामने आया है। सीएनएन की रिपोर्ट के कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां महिलाएं (Women) युद्ध पर जा रहे सैनिकों (soldiers) से जल्दबाजी में शादी (Fake Marriage) कर रही हैं और उनकी मौत के बाद मिलने वाला सरकारी मुआवजा (Compensation) हड़प जा रही है। रूस में हाल के महीनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें सैनिकों ने मोर्चे पर जाने से ठीक पहले या अस्पताल में मौत से पहले शादी की।

    इस पूरे घोटाले में सिर्फ महिलाएं व युवतियां ही नहीं, अस्पताल से लेकर सेना तक पर मिलीभगत के आरोप हैं। सबसे चर्चित मामला एक सैन्य अस्पताल में कार्यरत नर्स का है, जिस पर आरोप है कि उसने इलाज करा रहे पांच घायल सैनिकों से अलग-अलग समय पर शादी की। वह सैनिकों की मौत के बाद उनका मुआवजा लेना चाहती थी।

    पिता की मौत के बाद बेटी को पता चला-दो दिन पहले हुई थी शादी
    सेंट पीटर्सबर्ग की रहने वाली 37 वर्षीय मारिया ने सीएनएन को बताया कि जब उनके 59 वर्षीय पिता यूरी की यूक्रेन युद्ध में मौत हुई, तब मिलिट्री अधिकारियों से उन्हें पता चला कि उनके पिता ने मोर्चे पर जाने से ठीक दो दिन पहले अपने से 22 साल छोटी एक अनजान महिला से गुपचुप शादी कर ली थी। इस फर्जी शादी के कारण सरकार से मिलने वाला सारा मुआवजा (डेथ पेआउट) उस अनजान महिला को मिल गया। मारिया का आरोप है कि उनके पिता के साथ धोखा हुआ।

    सैनिक की मौत पर रूस में मिलती है 62 लाख रुपये की मदद
    रूस में युद्ध में मारे गए सैनिक के परिवार को सरकार की ओर से कम से कम 50 लाख रूबल (करीब 62 लाख भारतीय रुपये) की एकमुश्त मदद मिलती है। कई अन्य भुगतान और बीमा जोड़ दिए जाएं तो यह रकम और भी ज्यादा हो जाती है। इसी के लालच में महिलाएं अकेले, बुजुर्ग या कमजोर सैनिकों को शादी के लिए फंसाती हैं।

    युद्ध शुरू होने के बाद शादी के नियम हुए आसान
    2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने सेना में भर्ती होने वाले लोगों के लिए शादी के नियम आसान कर दिए। आमतौर पर रूस में शादी के लिए आवेदन देने के बाद कुछ समय इंतजार करना पड़ता है, लेकिन युद्ध के दौरान इस प्रक्रिया में छूट दे दी गई। नए सैनिक चाहें तो भर्ती के तुरंत बाद शादी कर सकते थे। सरकार का मानना था कि इससे सैनिकों को परिवार का सहारा मिलेगा।

  • Oil Spill: ओमान तट पर फंसे रूसी तेल टैंकर से बढ़ा रिसाव, गहराया पर्यावरणीय संकट; तट तक पहुंचा ऑयल स्पिल

    Oil Spill: ओमान तट पर फंसे रूसी तेल टैंकर से बढ़ा रिसाव, गहराया पर्यावरणीय संकट; तट तक पहुंचा ऑयल स्पिल

    नई दिल्ली । ओमान के तट के निकट बीते कई सप्ताह से फंसे हुए एक रूसी तेल टैंकर से हो रहा कच्चे तेल का रिसाव बेहद भयावह रूप लेता जा रहा है। सैटेलाइट तस्वीरों के माध्यम से इस बात की पुष्टि हुई है कि समुद्र की सतह पर फैला कच्चा तेल अब आसपास के तटीय क्षेत्रों और द्वीपों तक पहुंच चुका है। इससे क्षेत्र के दुर्लभ समुद्री वन्यजीवों और पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा संकट पैदा हो गया है।

    पर्यावरण संगठनों के अनुसार इस तेल रिसाव का फैलाव बेहद कम समय में काफी तेजी से बढ़ा है। जहां कुछ समय पहले तक रिसाव का दायरा सीमित था, वहीं अब यह बढ़कर लगभग 150 वर्ग किलोमीटर से अधिक के विशाल क्षेत्र में फैल चुका है। तेल की यह काली और खतरनाक परत ओमान के मुख्य प्रांत धोफार के समीप स्थित किब्लियाह द्वीप के तटीय हिस्सों को अपनी चपेट में ले चुकी है।

    जिस 274 मीटर लंबे सूएजमैक्स श्रेणी के टैंकर से यह रिसाव हो रहा है, उसका नाम कैरोलिन बेजेंगी बताया जा रहा है। इस जहाज पर रूस के कच्चे तेल का परिवहन करने के कारण ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और कनाडा जैसे देशों ने कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। जून महीने से ही यह टैंकर ओमान के तट के पास फंसा हुआ था, जब इसके चालक दल ने जहाज के भीतर एक विस्फोट होने की सूचना दी थी।

    यह पूरा प्रभावित इलाका अरब सागर रिजर्व के अंतर्गत आता है, जिसे एक संवेदनशील समुद्री संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। इस क्षेत्र में बेहद दुर्लभ प्रजाति की अरब सागर हंपबैक व्हेल और संकटग्रस्त पेट्रेल पक्षी निवास करते हैं। समुद्र में तेजी से फैल रहे इस गाढ़े विषैले तेल के कारण इन जीवों के अस्तित्व पर सीधा और गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।

    पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस टैंकर में लगभग 8 लाख बैरल से अधिक कच्चा तेल मौजूद था। जानकारों का कहना है कि यह दुर्घटना रूस के शैडो फ्लीट और पुराने टैंकरों के माध्यम से बिना कड़े सुरक्षा मानकों के किए जा रहे तेल परिवहन के बेहद गंभीर खतरों को उजागर करती है। समय रहते इस रिसाव को न रोका गया तो यह क्षेत्र के लिए एक स्थायी प्राकृतिक आपदा बन सकता है।

  • ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी

    ट्रंप बोले- US के खिलाफ जंग में ईरान की मदद नहीं करेंगे चीन-रूस… चेतावनी भी दी


    वाशिंगटन।
    अमेरिका और ईरान (America and Iran) के बीच संघर्ष जारी है. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (American President Donald Trump) ने कहा कि उन्हें भरोसा है कि चीन और रूस इस संघर्ष में ईरान की मदद नहीं करेंगे. हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर दोनों देश इसमें शामिल होते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

    डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि बीजिंग में हाल ही में हुई मुलाकात के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि चीन ईरान को हथियार नहीं देगा या बेचेगा, और न ही चीनी कंपनियों के जरिए ऐसा किया जाएगा. उन्होंने आगे कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Russian President Vladimir Putin) ने भी उनसे कहा था कि रूस तेहरान को हथियार नहीं बेचेगा।

    व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा, ‘मुझे लगता है कि मैं उन पर भरोसा करता हूं.’ उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि दोनों में से कोई भी देश इस टकराव में ईरान की मदद कर रहा है।

    रॉयटर्स के अनुसार, ट्रंप की यह टिप्पणी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के सांसदों को यह बताने के कुछ दिनों बाद आई है कि रूस और चीन ऐसे मामलों में शामिल थे, जो ईरान की कुछ गतिविधियों को बढ़ावा दे रहे थे. हालांकि उन्होंने इस बारे में कोई और जानकारी नहीं दी।

    बताया जा रहा है कि गल्फ में CIA के ठिकानों पर हुए ईरानी हमलों के बाद अमेरिकी खुफिया एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही हैं कि क्या रूस ने टारगेटिंग इंफॉर्मेशन या ड्रोन तकनीक के जरिए ईरान की मदद की है. हालांकि, क्रेमलिन ने इस रिपोर्ट पर कोई भी कमेंट करने से इनकार कर दिया है।

  • रूस का यूक्रेन पर बड़ा हमला…. राजधानी कीव पर दांगी बैलिस्टिक मिसाइलें

    रूस का यूक्रेन पर बड़ा हमला…. राजधानी कीव पर दांगी बैलिस्टिक मिसाइलें


    कीव।
    रूस (Russia) ने गुरुवार तड़के एक बार फिर यूक्रेन (Ukraine) की राजधानी कीव (Kyiv) को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइलों (Ballistic Missiles) से बड़ा हमला किया. यूक्रेनी अधिकारियों के मुताबिक, हमले के दौरान कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जबकि एयर डिफेंस सिस्टम (Air Defense System) लगातार मिसाइलों को रोकने में जुटे रहे. यूक्रेनी वायुसेना ने चेतावनी दी है कि राजधानी पर और मिसाइल हमले हो सकते हैं, इसलिए लोगों से सुरक्षित बंकरों में रहने की अपील की गई है।

    कीव के मेयर विताली क्लिट्स्को ने बताया कि शहर के पश्चिमी बाहरी इलाके में एक गोदाम मिसाइल हमले की चपेट में आ गया. वहीं, इंटरसेप्ट की गई मिसाइलों का मलबा ड्नीप्रो नदी के पूर्वी किनारे स्थित इलाके में गिरा. शुरुआती जानकारी के मुताबिक, कम से कम आठ बैलिस्टिक मिसाइलें कीव की ओर दागी गई थीं।

    यूक्रेन की वायुसेना ने टेलीग्राम पर जारी संदेश में कहा कि बैलिस्टिक मिसाइलों के अलावा रूस ने शाहेद ड्रोन भी कई शहरों की ओर भेजे हैं. उत्तर-पूर्वी शहर खारकीव में भी ड्रोन हमलों के बाद कई विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं. इसके अलावा विनित्सिया समेत कई अन्य क्षेत्रों में भी एयर रेड अलर्ट जारी किया गया.


    यूक्रेन के रक्षा मंत्री को पद से हटाने के बाद हमला

    यह हमला ऐसे समय हुआ है जब यूक्रेन में रक्षा मंत्री मायखाइलो फेदोरोव को पद से हटाए जाने को लेकर राजनीतिक हलचल बनी हुई है. उनके हटने के कुछ ही समय बाद रूस ने राजधानी पर नया हमला कर दिया।


    यूक्रेन पर रूस लगातार कर रहा घातक हमले

    जुलाई में रूस की तरफ से कीव पर यह सातवां बड़ा हमला बताया जा रहा है. इससे पहले 14 जुलाई की रात रूस ने मिसाइलों और ड्रोन के जरिए बड़े पैमाने पर हमला किया था, जिसमें कम से कम सात लोगों की मौत हुई थी और 78 लोग घायल हुए थे. उस हमले में राजधानी के 16 स्थानों को नुकसान पहुंचा था, जिनमें एक स्कूल और एक नागरिक औद्योगिक प्रतिष्ठान भी शामिल था।

    इससे पहले 2 जुलाई को हुए हमले में 30 से अधिक लोगों की मौत और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. वहीं, 6 जुलाई के हमले में कम से कम 26 लोगों की जान गई थी. लगातार हो रहे इन हमलों ने कीव में आम लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

  • रूस से कच्चे तेल की खरीद में भारत ने बढ़ाई रफ्तार, जून में 34 प्रतिशत उछाल के साथ ऊर्जा आयात रणनीति हुई और मजबूत

    रूस से कच्चे तेल की खरीद में भारत ने बढ़ाई रफ्तार, जून में 34 प्रतिशत उछाल के साथ ऊर्जा आयात रणनीति हुई और मजबूत

    नई दिल्ली । भारत ने जून 2026 में रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज करते हुए अपनी ऊर्जा आयात रणनीति को और मजबूत किया है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के बीच भारत ने रूस से 4.5 अरब यूरो मूल्य का कच्चा तेल आयात किया, जो मई के मुकाबले 34 प्रतिशत अधिक है। इस बढ़ोतरी के साथ भारत चीन के बाद रूस के हाइड्रोकार्बन का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध रूसी तेल भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और आयात लागत को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

    ऊर्जा और स्वच्छ वायु पर शोध करने वाली संस्था की रिपोर्ट के अनुसार जून महीने में भारत के कुल रूसी जीवाश्म ईंधन आयात का सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का रहा। कुल 5.5 अरब यूरो के रूसी हाइड्रोकार्बन आयात में 83 प्रतिशत हिस्सेदारी केवल कच्चे तेल की रही, जिसकी कीमत 4.5 अरब यूरो आंकी गई। इससे स्पष्ट है कि भारत की ऊर्जा जरूरतों में रूसी कच्चे तेल का महत्व लगातार बना हुआ है।

    रिपोर्ट के अनुसार भारत के कुल कच्चे तेल आयात में भी मासिक आधार पर 5.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस दौरान देश की कई प्रमुख रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीद में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की। इससे संकेत मिलता है कि भारतीय रिफाइनिंग कंपनियां लागत और उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए रूसी आपूर्ति का अधिक उपयोग कर रही हैं।

    देश की सबसे बड़ी रिफाइनिंग इकाइयों में इस दौरान रूसी तेल की आपूर्ति में तेज वृद्धि देखने को मिली। जामनगर रिफाइनरी में रूस से आने वाले कच्चे तेल का आयात पिछले महीने की तुलना में 150 प्रतिशत बढ़ गया। वहीं पारादीप रिफाइनरी में यह वृद्धि 126 प्रतिशत रही। कोच्चि रिफाइनरी ने भी अपनी खरीद में 83 प्रतिशत का इजाफा किया, जबकि वाडिनार रिफाइनरी में रूसी तेल की आपूर्ति 45 प्रतिशत बढ़ी। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि प्रमुख रिफाइनरियां रूसी कच्चे तेल पर पहले से अधिक भरोसा जता रही हैं।

    भारत की बढ़ी हुई मांग का असर रूस के कुल कच्चे तेल निर्यात पर भी दिखाई दिया। जून के दौरान रूस के कच्चे तेल के निर्यात की मात्रा में 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत कम रहने के कारण रूस की निर्यात आय में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो सकी। कच्चे तेल के निर्यात से होने वाली दैनिक आय घटकर 348 मिलियन यूरो रह गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अधिक मात्रा में निर्यात होने के बावजूद कम कीमतों ने राजस्व पर दबाव बनाए रखा।

    रूस के कुल जीवाश्म ईंधन निर्यात से होने वाली आय में भी हल्की गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार निर्यात की मात्रा बढ़ने के बावजूद कुल दैनिक आय एक प्रतिशत घटकर 734 मिलियन यूरो रह गई। यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और मांग के संतुलन को दर्शाती है।

    रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कच्चे तेल के अलावा भारत ने रूस से 488 मिलियन यूरो मूल्य के तेल उत्पाद और 444 मिलियन यूरो का कोयला भी आयात किया। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों देशों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में व्यापार लगातार मजबूत बना हुआ है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में यदि वैश्विक बाजार में कीमतें अनुकूल रहती हैं और आपूर्ति सामान्य बनी रहती है, तो भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और लागत प्रबंधन को ध्यान में रखते हुए रूस से कच्चे तेल की खरीद को प्राथमिकता देता रह सकता है।

  • यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    यूक्रेन की बढ़ती स्ट्राइक क्षमता से रूस पर नया दबाव, मिसाइल हमलों का दायरा बढ़ा; क्या युद्ध निर्णायक मोड़ की ओर बढ़ रहा है?

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।

    संक्षिप्त सार:
    यूक्रेन की लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल और ड्रोन क्षमता में वृद्धि से रूस के अंदर हमलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। विश्लेषणों के अनुसार अब रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल अलर्ट जारी किए जा रहे हैं, जिससे युद्ध का रणनीतिक संतुलन बदलता दिखाई दे रहा है।

    English Keywords:
    VolodymyrZelenskyy, Russia, Ukraine, MissileStrike, StrategicPressure,

    नई दिल्ली । विश्व

    रूस और यूक्रेन के बीच चार वर्षों से जारी युद्ध अब ऐसे चरण में पहुंचता दिखाई दे रहा है, जहां संघर्ष का प्रभाव केवल सीमावर्ती क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है। हालिया विश्लेषणों के अनुसार यूक्रेन ने अपनी लंबी दूरी तक हमला करने की क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जिसके चलते रूस के बड़े हिस्से में मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। इससे युद्ध का रणनीतिक स्वरूप बदलता नजर आ रहा है और रूस के भीतर भी सुरक्षा संबंधी चुनौतियां गहराने लगी हैं।

    रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन अब अपनी स्वदेशी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों और आधुनिक ड्रोन प्रणाली का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहा है। इन हथियारों की मदद से वह रूस के भीतर स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनाने की क्षमता हासिल कर चुका है। हाल के महीनों में रूस के कई ऐसे क्षेत्रों में भी मिसाइल अलर्ट जारी किए गए हैं, जो पहले इस प्रकार के खतरे से अपेक्षाकृत दूर माने जाते थे।

    बताया गया है कि पिछले कुछ समय में रूस के मध्य, दक्षिणी और वोल्गा क्षेत्र के अनेक हिस्सों में संभावित मिसाइल हमलों की चेतावनी जारी करनी पड़ी। इससे यह संकेत मिलता है कि यूक्रेन अब केवल सीमावर्ती इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस के अंदर काफी दूर स्थित लक्ष्यों तक भी अपनी पहुंच बना चुका है। इससे रूस की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।

    विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेन की इस रणनीति का प्रमुख उद्देश्य रूस की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के साथ-साथ उस पर राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बढ़ाना भी है। लंबे समय से जारी युद्ध के बीच कीव चाहता है कि रूस पर इतना दबाव बने कि वह भविष्य में वार्ता के विकल्प पर गंभीरता से विचार करने को मजबूर हो। हालांकि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इन हमलों का रूस के राजनीतिक नेतृत्व के निर्णयों पर कितना प्रभाव पड़ेगा।

    रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि रूस की बड़ी आबादी अब ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां कम से कम एक बार मिसाइल हमले का अलर्ट जारी किया जा चुका है। इससे युद्ध का असर आम नागरिकों तक भी महसूस होने लगा है। लगातार बढ़ते सुरक्षा अलर्ट और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों पर हमलों के कारण रूस को अपनी वायु रक्षा प्रणाली और सैन्य संसाधनों का व्यापक स्तर पर पुनर्विन्यास करना पड़ रहा है।

    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पहले भी दावा कर चुके हैं कि देश ने ऐसी लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल विकसित की है, जो 1,500 किलोमीटर से अधिक दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। हाल के महीनों में रूस के भीतर रक्षा उद्योग से जुड़े कई ठिकानों पर हमलों की खबरें भी सामने आई हैं, जिन्हें यूक्रेन अपनी सैन्य रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।

    हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यूक्रेन की बढ़ी हुई मारक क्षमता निश्चित रूप से रूस पर दबाव बढ़ा रही है, लेकिन केवल इन हमलों के आधार पर युद्ध की दिशा बदलने या रूस को तत्काल शांति वार्ता के लिए बाध्य मान लेना जल्दबाजी होगी। दोनों देशों के बीच संघर्ष अभी भी कई सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक कारकों से प्रभावित है। ऐसे में आने वाले समय में युद्ध की दिशा और संभावित वार्ता की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।