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  • युद्ध खत्म करने की नई पहल, जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र, सीधी बातचीत का दिया प्रस्ताव

    युद्ध खत्म करने की नई पहल, जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र, सीधी बातचीत का दिया प्रस्ताव

    नई दिल्ली । रूस और यूक्रेन के बीच जारी लंबे युद्ध को समाप्त करने की कोशिशों के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल सामने आई है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को खुला पत्र लिखकर आमने-सामने मुलाकात और सीधी वार्ता का प्रस्ताव दिया है। इस पहल को युद्ध समाप्ति की दिशा में एक नए प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

    अपने विस्तृत पत्र में जेलेंस्की ने कहा कि युद्ध का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई या मध्यस्थों के जरिए नहीं निकल सकता। उनका मानना है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच सीधा संवाद ही स्थायी शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि मौजूदा हालात में नेतृत्व स्तर पर बातचीत की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि दोनों नेताओं की संभावित मुलाकात किसी तटस्थ देश में आयोजित की जा सकती है। उनका तर्क है कि निष्पक्ष वातावरण में होने वाली बातचीत से विश्वास बहाली की प्रक्रिया को मजबूती मिल सकती है और लंबे समय से चले आ रहे गतिरोध को तोड़ने का अवसर मिल सकता है।

    पत्र में जेलेंस्की ने यह भी उल्लेख किया कि वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संकटों के कारण यूक्रेन युद्ध वैश्विक प्राथमिकताओं की सूची में पीछे जा सकता है। ऐसे में उन्होंने दोनों पक्षों से समय रहते शांति की दिशा में ठोस पहल करने की अपील की है। उनका कहना है कि संघर्ष जितना लंबा चलेगा, मानवीय और आर्थिक नुकसान उतना ही बढ़ता जाएगा।

    जेलेंस्की ने अपने पत्र में रूस पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का भी संकेत दिया। उन्होंने हाल के घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए कहा कि युद्ध का कोई भी पक्ष इस भ्रम में नहीं रह सकता कि केवल सैन्य ताकत के आधार पर स्थायी समाधान हासिल किया जा सकता है। उनके अनुसार संवाद और समझौता ही अंततः संघर्ष का रास्ता रोक सकते हैं।

    दूसरी ओर रूस ने इस पहल पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है। मॉस्को ने संकेत दिया है कि बातचीत के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं हैं, लेकिन किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों को अपने-अपने रुख में लचीलापन दिखाना होगा। रूस अब भी उन प्रमुख शर्तों पर कायम है जिन्हें वह अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों से जुड़ा मानता है।

    युद्ध को लेकर दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद क्षेत्रीय नियंत्रण और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर बना हुआ है। रूस जिन क्षेत्रों को अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता है, उन्हें लेकर यूक्रेन कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिखता। वहीं यूक्रेन का कहना है कि क्षेत्रीय रियायतें भविष्य में उसकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं।

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस संभावित मुलाकात को सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। कई देशों और वैश्विक नेताओं का मानना है कि यदि दोनों राष्ट्रपति आमने-सामने बैठकर बातचीत करते हैं तो इससे शांति प्रक्रिया को नई गति मिल सकती है। हालांकि पिछले वर्षों में कई दौर की वार्ताएं बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हुई हैं, इसलिए इस पहल की सफलता को लेकर अभी भी संशय बना हुआ है।

    फिलहाल दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या यह कूटनीतिक प्रयास वास्तव में दोनों नेताओं को एक ही मेज पर ला पाएगा। यदि ऐसा होता है तो यह रूस-यूक्रेन युद्ध के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है और लंबे समय से जारी संघर्ष के समाधान की दिशा में नई उम्मीद जगा सकता है।

  • रूस-यूक्रेन युद्ध: ओरेश्निक हाइपरसोनिक मिसाइल समेत बड़े हमले में 4 की मौत, कीव में भारी तबाही; जेलेंस्की बोले- रूस पागल हो चुका है



    नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच रविवार को एक बार फिर बड़ा सैन्य तनाव देखने को मिला जब रूस ने यूक्रेन पर मिसाइलों और ड्रोनों से भीषण हमला किया। इस हमले में कम से कम 4 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई दर्जन लोग घायल हुए हैं। हमलों का मुख्य निशाना राजधानी कीव और उसके आसपास के इलाके रहे।

    रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह हमला यूक्रेन की ओर से किए गए हमलों के जवाब में किया गया है। इस दौरान रूस ने ओरेश्निक हाइपरसोनिक मिसाइल का भी इस्तेमाल किया, जिसे परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम बताया जाता है। यह मिसाइल अपनी तेज गति और आधुनिक तकनीक के कारण मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है।

    यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने रूस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि हमलों में जानबूझकर नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया है। उन्होंने बताया कि पानी आपूर्ति की एक सुविधा, एक बाजार, कई घर और स्कूल इस हमले में क्षतिग्रस्त हुए हैं। जेलेंस्की ने टेलीग्राम पर कहा कि रूसी मिसाइल बिला त्सेरक्वा शहर के पास गिरी और रूस “पागल हो चुका है।”

    यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा ने दावा किया कि ओरेश्निक मिसाइल में डमी वारहेड लगाया गया था। उन्होंने कहा कि रूस द्वारा यह मिसाइल सिर्फ डर पैदा करने और शक्ति प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल की जा रही है।

    यूक्रेनी वायुसेना के मुताबिक रूस ने रातभर में लगभग 600 ड्रोन और 90 मिसाइलें दागीं, जिनमें से 604 को एयर डिफेंस सिस्टम ने मार गिराया। अधिकारियों ने इसे राजधानी पर हुए सबसे बड़े हमलों में से एक बताया है।

    इस बीच रूस ने आरोप लगाया कि यूक्रेन की ओर से उसके नियंत्रण वाले क्षेत्रों पर हमले किए गए थे, जिनके जवाब में यह कार्रवाई की गई। रूसी रक्षा मंत्रालय ने कहा कि यूक्रेन के “आतंकी हमलों” के जवाब में ओरेश्निक और अन्य बैलिस्टिक मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया।

    अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी सामने आई है। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलस ने ओरेश्निक मिसाइल के इस्तेमाल को बेहद खतरनाक परमाणु शक्ति प्रदर्शन बताया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मर्ज ने भी इस हमले की निंदा करते हुए इसे युद्ध में गंभीर बढ़ोतरी बताया है।

    यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध पहले से ही चरम पर है और दोनों देश लगातार एक-दूसरे पर हमले कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कार्रवाइयां संघर्ष को और अधिक खतरनाक दिशा में ले जा सकती हैं।

  • नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें

    नई वैश्विक राजनीति पर बहस तेज: RIC थ्योरी फिर चर्चा में, भारत की भूमिका पर टिकी नजरें



    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के करीबी विचारक माने जाने वाले Alexander Dugin के हालिया बयानों के बाद एक बार फिर “RIC (Russia–India–China)” और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चर्चा तेज हो गई है। डुगिन का दावा है कि पश्चिमी देशों का वैश्विक दबदबा घट रहा है और रूस व चीन इसके विकल्प के रूप में उभर रहे हैं, जबकि भारत की भूमिका भविष्य की वैश्विक संरचना में निर्णायक हो सकती है।

    हालांकि अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का मानना है कि यह विचार अभी एक रणनीतिक सिद्धांत और राजनीतिक बहस तक ही सीमित है, न कि कोई औपचारिक गठबंधन या तय वैश्विक व्यवस्था।

    विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले दो दशकों में वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। एक तरफ United States अब भी सैन्य, तकनीकी और वित्तीय स्तर पर सबसे प्रभावशाली शक्ति बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर China आर्थिक और तकनीकी क्षेत्र में तेजी से अपना प्रभाव बढ़ा रही है। वहीं Russia पश्चिमी देशों के साथ टकराव के बीच अपने रणनीतिक हितों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

    भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में सबसे अलग मानी जा रही है। India लगातार “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलते हुए किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल होने से बचता रहा है। भारत एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक व तकनीकी सहयोग बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ रूस के साथ ऐतिहासिक रक्षा संबंध भी बनाए हुए है।

    इसी बीच चीन-रूस-भारत को मिलाकर RIC समूह की चर्चा जरूर समय-समय पर उठती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तीनों देशों के बीच मौजूद सीमा विवाद, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग राष्ट्रीय हित इसे एक स्थायी गठबंधन बनने से रोकते हैं।

    विदेश नीति विश्लेषकों के मुताबिक, आने वाले समय में दुनिया किसी एक ध्रुव के बजाय “बहु-ध्रुवीय शक्ति संतुलन” की ओर बढ़ सकती है, लेकिन यह संतुलन किसी औपचारिक RIC ब्लॉक के रूप में नहीं बल्कि अलग-अलग वैश्विक साझेदारियों के जाल के रूप में सामने आएगा।

    कुल मिलाकर, डुगिन का यह विचार वैश्विक राजनीति में एक बहस जरूर पैदा करता है, लेकिन वास्तविक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभी भी जटिल और बदलते शक्ति संतुलन पर आधारित है, जिसमें किसी एक गुट का पूर्ण वर्चस्व या RIC जैसा एकीकृत ब्लॉक फिलहाल व्यवहारिक रूप से संभव नहीं दिखता।

  • रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    रूस का परमाणु शक्ति प्रदर्शन: 65 हजार सैनिकों संग शुरू हुआ महाअभ्यास, यूक्रेन और NATO में बढ़ी बेचैनी

    नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध के बीच रूस ने अपनी सैन्य ताकत का बड़ा प्रदर्शन करते हुए बेलारूस के साथ संयुक्त परमाणु सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया है। तीन दिन तक चलने वाले इस महाअभ्यास में रूस ने 65 हजार सैनिकों, 140 लड़ाकू विमानों, 200 मिसाइल लॉन्चरों, 73 युद्धपोतों और 13 पनडुब्बियों को उतारा है। रूसी रक्षा मंत्रालय के अनुसार इस अभ्यास में करीब 7800 प्रकार के हथियार और सैन्य उपकरण शामिल किए गए हैं। यह सैन्य अभ्यास 19 मई से शुरू होकर 21 मई तक चलेगा और इसे यूक्रेन तथा नाटो देशों के लिए एक बड़ा रणनीतिक संदेश माना जा रहा है।

    रूस ने यह अभ्यास ऐसे समय पर शुरू किया है जब यूक्रेन लगातार रूसी क्षेत्रों पर ड्रोन हमले तेज कर रहा है। यूक्रेन युद्ध को चार साल पूरे होने वाले हैं और इस दौरान कई बार रूस अपने परमाणु हथियारों और मिसाइलों का प्रदर्शन कर चुका है। इस बार रूस ने परमाणु हमला करने में सक्षम मिसाइल प्रणालियों को भी अभ्यास में शामिल किया है। रूसी रक्षा मंत्रालय ने एक वीडियो जारी किया जिसमें सैनिक मोबाइल इस्कंदर-एम मिसाइल सिस्टम को लॉन्च साइट तक ले जाते नजर आए। यह मिसाइल परमाणु और पारंपरिक दोनों प्रकार के हथियार ले जाने में सक्षम है और इसकी मारक क्षमता करीब 500 किलोमीटर बताई जाती है।

    रूसी सेना बेलारूस में तैनात टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन के इस्तेमाल का अभ्यास भी कर रही है। हाल ही में रूस ने बेलारूस में ओरेशनिक मिसाइल प्रणाली भी तैनात की है, जो परमाणु हमला करने में सक्षम मानी जाती है। बेलारूस की सीमा कई नाटो देशों से लगती है, इसलिए इस तैनाती को यूरोप के लिए गंभीर चेतावनी माना जा रहा है। रूस का कहना है कि नाटो देशों की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और यूक्रेन को मिल रहे पश्चिमी समर्थन से उसकी सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

    यह अभ्यास ऐसे समय पर हो रहा है जब रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin चीन के दौरे पर हैं। इस दौरान रूस और चीन के बीच कई महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए हैं। माना जा रहा है कि रूस वैश्विक स्तर पर यह संदेश देना चाहता है कि वह पश्चिमी दबाव के बावजूद पीछे हटने वाला नहीं है।

    रूस और अमेरिका के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते के समाप्त होने के बाद यह पहला बड़ा परमाणु अभ्यास माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे यूरोप में तनाव और बढ़ सकता है। नाटो देशों ने अभी तक इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन यूरोप में सुरक्षा एजेंसियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

    उधर यूक्रेन ने रूस और बेलारूस के इस संयुक्त अभ्यास की कड़ी आलोचना की है। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बेलारूस में परमाणु हथियारों की तैनाती और संयुक्त अभ्यास अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। यूक्रेन ने आरोप लगाया कि रूस और बेलारूस परमाणु अप्रसार संधि का उल्लंघन कर रहे हैं। यूक्रेन ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह के कदम पूरे यूरोप को अस्थिर कर सकते हैं।

    रूस और नाटो देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच इस परमाणु अभ्यास ने दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि यूक्रेन युद्ध जल्द नहीं रुका तो आने वाले समय में यूरोप में सैन्य टकराव का खतरा और गहरा सकता है।

  • ईरान-अमेरिका तनाव में भारत बन सकता है शांति का बड़ा चेहरा, रूस ने नई दिल्ली को बताया सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ

    ईरान-अमेरिका तनाव में भारत बन सकता है शांति का बड़ा चेहरा, रूस ने नई दिल्ली को बताया सबसे भरोसेमंद मध्यस्थ



    नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच रूस ने भारत की भूमिका को लेकर एक बड़ा कूटनीतिक बयान दिया है। रूसी विदेश मंत्री Sergey Lavrov ने कहा है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में India ईरान, अमेरिका और पश्चिम एशियाई देशों के बीच संवाद स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

    नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान लावरोव ने भारत की विदेश नीति की तारीफ करते हुए कहा कि भारत लंबे समय से संतुलित कूटनीति अपनाता रहा है और विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ उसके मजबूत संबंध हैं। इसी वजह से भारत को एक “भरोसेमंद मध्यस्थ” के रूप में देखा जा सकता है, जो तनाव कम करने और बातचीत को आगे बढ़ाने में मदद कर सकता है।

    रूस का कहना है कि पश्चिम एशिया में हाल के वर्षों में तनाव काफी बढ़ा है, जिसमें ईरान-अमेरिका टकराव, ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख हैं। ऐसे में किसी ऐसे देश की जरूरत है जो दोनों पक्षों के बीच विश्वास पैदा कर सके और बातचीत का रास्ता खोल सके। लावरोव के अनुसार, भारत इस भूमिका के लिए उपयुक्त है क्योंकि वह किसी एक खेमे का हिस्सा न होकर सभी प्रमुख देशों के साथ समान रूप से संबंध बनाए रखता है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि भारत का कूटनीतिक अनुभव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह बहुपक्षीय मंचों जैसे ब्रिक्स, जी20 और शंघाई सहयोग संगठन में भी सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। उन्होंने यह संकेत दिया कि भारत की यह वैश्विक स्वीकार्यता उसे मध्यस्थता की भूमिका के लिए और मजबूत बनाती है।

    रूस के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत केवल सुरक्षा या राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ता है। ऐसे में किसी स्थिर और भरोसेमंद मध्यस्थ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

    लावरोव ने यह भी कहा कि कुछ पश्चिमी देशों की नीतियां इस क्षेत्र में तनाव को कम करने के बजाय बढ़ाने का काम कर रही हैं, जबकि समाधान केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही संभव है। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान और अरब देशों के बीच दूरी बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं, जो वैश्विक स्थिरता के लिए सही नहीं है।

    भारत को लेकर रूस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री की हालिया कूटनीतिक गतिविधियों और खाड़ी देशों के साथ बढ़ते संबंधों ने भारत की भूमिका को और मजबूत किया है। ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश जैसे क्षेत्रों में भारत की बढ़ती भागीदारी ने उसे एक महत्वपूर्ण वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित किया है।

    हालांकि भारत सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभाता है तो वह पश्चिम एशिया में शांति स्थापना के प्रयासों का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

    कुल मिलाकर रूस का यह बयान भारत की बढ़ती वैश्विक कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है, जहां वह अब केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देने वाला अहम देश बनता जा रहा है।

  • ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क की गुप्त रणनीतिक चाल: बिना युद्ध बढ़ रहा सैन्य दबदबा

    ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका-डेनमार्क की गुप्त रणनीतिक चाल: बिना युद्ध बढ़ रहा सैन्य दबदबा



    नई दिल्ली। अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड को लेकर रणनीतिक बातचीत एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि अमेरिका यहां तीन नए सैन्य अड्डे बनाने की योजना पर काम कर रहा है, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह प्रक्रिया अभी केवल कूटनीतिक चर्चा के स्तर पर है और किसी भी तरह का अंतिम समझौता नहीं हुआ है।

    ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, लंबे समय से अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका कारण इसका आर्कटिक क्षेत्र में स्थित होना है, जहां से उत्तरी अटलांटिक महासागर और यूरोप-उत्तर अमेरिका के बीच के समुद्री मार्गों पर नजर रखी जा सकती है। अमेरिका पहले से ही यहां थुले एयर बेस के जरिए अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है, जो शीत युद्ध के समय से सक्रिय है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और डेनमार्क के बीच हाल के महीनों में उच्च स्तरीय बातचीत हुई है, जिसमें ग्रीनलैंड के दक्षिणी हिस्से में अतिरिक्त सैन्य ढांचे विकसित करने की संभावनाओं पर चर्चा की गई है। माना जा रहा है कि इन प्रस्तावित अड्डों का उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा, खासकर रूस और चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखना है।

    अमेरिका की रणनीति आर्कटिक क्षेत्र में अपनी निगरानी और सुरक्षा क्षमता को मजबूत करने की है। इस क्षेत्र में बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं, जिससे वैश्विक शक्तियों की रुचि बढ़ गई है। इसी वजह से अमेरिका इस इलाके को अपने रक्षा नेटवर्क का अहम हिस्सा मानता है।

    हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि डेनमार्क एक संप्रभु राष्ट्र है और ग्रीनलैंड उसकी स्वायत्त इकाई है, इसलिए किसी भी प्रकार के सैन्य विस्तार या नई तैनाती के लिए दोनों देशों की सहमति जरूरी होती है। डेनमार्क की सरकार ने भी इस बात की पुष्टि की है कि अमेरिका के साथ बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने किसी भी “सीक्रेट डील” या कब्जे जैसे दावों को स्पष्ट रूप से खारिज नहीं किया है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा मामला भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है, न कि किसी तत्काल सैन्य कब्जे की योजना। अमेरिका का लक्ष्य नाटो सहयोगियों के साथ मिलकर आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना है, ताकि भविष्य की किसी भी सुरक्षा चुनौती का सामना किया जा सके।

    फिलहाल स्थिति यह है कि बातचीत जारी है और किसी भी अंतिम निर्णय की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में “बिना गोली चले कब्जा” जैसी बातें अधिकतर राजनीतिक और मीडिया व्याख्याओं का हिस्सा मानी जा रही हैं, जबकि वास्तविकता अभी कूटनीतिक स्तर पर ही सीमित है।

  • ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात से बदलेगा वैश्विक शक्ति संतुलन? ईरान, रूस और रेयर अर्थ पर टिकी दुनिया की नजर

    ट्रंप-शी जिनपिंग मुलाकात से बदलेगा वैश्विक शक्ति संतुलन? ईरान, रूस और रेयर अर्थ पर टिकी दुनिया की नजर



    नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन यात्रा को लेकर वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से होने वाली है। यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब ईरान, रूस और रेयर अर्थ जैसे मुद्दों पर अमेरिका-चीन के बीच तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है।

    रिपोर्ट्स के अनुसार इस दौरे में ईरान से जुड़ा तेल व्यापार, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और चीन द्वारा रूस को दिए जा रहे समर्थन जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो सकती है। इसके साथ ही अमेरिका की नजर चीन के रेयर अर्थ मिनरल्स पर भी है, जो वैश्विक तकनीकी उद्योग के लिए बेहद अहम माने जाते हैं।

    विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और अमेरिका के बीच यह बातचीत केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका असर वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी पड़ेगा। खासकर ईरान संकट और यूक्रेन युद्ध जैसे मुद्दे इस बैठक को और जटिल बना रहे हैं।

    भारत के दृष्टिकोण से यह बैठक इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अमेरिका और चीन दोनों ही उसकी रणनीतिक साझेदारी और सुरक्षा नीति पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। दोनों देशों के रिश्तों में किसी भी बदलाव का असर भारत की कूटनीति और क्षेत्रीय रणनीति पर साफ दिखाई दे सकता है।

    कुल मिलाकर, ट्रंप-जिनपिंग मुलाकात सिर्फ एक कूटनीतिक बैठक नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति के कई बड़े समीकरणों को प्रभावित करने वाला अहम घटनाक्रम माना जा रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

  • रूस-यूक्रेन युद्ध: शांति वार्ता की नई पहल, पुतिन बोले-तीसरे देश में जेलेंस्की से मिलने को तैयार

    रूस-यूक्रेन युद्ध: शांति वार्ता की नई पहल, पुतिन बोले-तीसरे देश में जेलेंस्की से मिलने को तैयार



    नई दिल्ली। Russia-Ukraine War को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कूटनीतिक संकेत देते हुए रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin ने कहा है कि वह यूक्रेन के राष्ट्रपति Volodymyr Zelenskyy से किसी तीसरे देश में मुलाकात करने के लिए तैयार हैं, लेकिन यह बैठक केवल अंतिम शांति समझौते पर हस्ताक्षर के लिए होगी।

    पुतिन ने स्पष्ट किया कि इस तरह की मुलाकात तभी संभव है जब दोनों देशों के बीच विशेषज्ञ स्तर पर पूरा और ठोस शांति समझौता पहले से तैयार हो जाए। उन्होंने जोर देकर कहा कि बातचीत की बजाय यह बैठक सिर्फ औपचारिक प्रक्रिया का अंतिम चरण होनी चाहिए।

    रूसी राष्ट्रपति ने पुराने Minsk agreements का हवाला देते हुए कहा कि पिछली शांति प्रक्रियाओं की तरह लंबी और असफल चर्चाओं से बचना जरूरी है। उनका कहना है कि इस बार पहले तकनीकी और विशेषज्ञ स्तर पर सभी मुद्दों को पूरी तरह सुलझाया जाना चाहिए, ताकि बाद में नेताओं की मुलाकात सिर्फ हस्ताक्षर तक सीमित रहे।

    यह युद्ध फरवरी 2022 में शुरू हुआ था और अब अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। पुतिन के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति की दिशा में एक संभावित नई पहल के रूप में देखा जा रहा है।

  • रूस-यूक्रेन युद्ध में बड़ा मोड़: विक्ट्री डे से पहले अस्थायी सीजफायर का ऐलान, सुरक्षा को लेकर सख्त अलर्ट

    रूस-यूक्रेन युद्ध में बड़ा मोड़: विक्ट्री डे से पहले अस्थायी सीजफायर का ऐलान, सुरक्षा को लेकर सख्त अलर्ट


    नई दिल्ली। जारी संघर्ष के बीच रूस और यूक्रेन ने विक्ट्री डे से पहले अलग-अलग समय पर अस्थायी युद्धविराम (सीजफायर) की घोषणा की है। यह कदम 9 मई को मनाए जाने वाले द्वितीय विश्व युद्ध विजय दिवस से पहले तनाव कम करने की कोशिश माना जा रहा है।

    क्या है रूस का फैसला?
    रूस ने घोषणा की है कि वह विक्ट्री डे के मौके पर सीमित अवधि के लिए सैन्य कार्रवाई रोक देगा। यह फैसला द्वितीय विश्व युद्ध में नाजी जर्मनी पर जीत की 81वीं वर्षगांठ को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।हालांकि रूस की तरफ से यह भी स्पष्ट किया गया है कि अगर किसी तरह का हमला या बाधा उत्पन्न होती है तो जवाबी कार्रवाई की जाएगी।

    🇺🇦 यूक्रेन की स्थिति
    यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी युद्धविराम की सहमति का संकेत दिया है और कहा है कि उनका देश निर्धारित समय से संघर्ष रोकने को तैयार है, लेकिन किसी भी हमले का जवाब देने की पूरी क्षमता रखता है।

    सुरक्षा और तनाव बरकरार
    रिपोर्ट्स के अनुसार, विक्ट्री डे परेड को लेकर रूस में सुरक्षा बेहद कड़ी कर दी गई है। संभावित ड्रोन हमलों के खतरे को देखते हुए कई सैन्य तैयारियों में बदलाव किया गया है और कुछ भारी हथियारों की प्रदर्शनी भी सीमित कर दी गई है।

    विक्ट्री डे का महत्व
    विक्ट्री डे रूस के लिए एक बेहद अहम राष्ट्रीय दिवस है, जिसे देशभक्ति और सैन्य शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इस बार पहली बार वर्षों में परेड का स्वरूप पहले से अलग और सीमित नजर आएगा।हालांकि दोनों देशों ने अस्थायी सीजफायर की घोषणा की है, लेकिन पिछले अनुभव बताते हैं कि ऐसे युद्धविराम अक्सर टिकाऊ साबित नहीं हुए हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर इस घटनाक्रम पर टिकी हुई है।

  • अमेरिका: रूस से तेल खरीदने की छूट पर घर में घिरे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सांसद बोले- शर्मनाक कदम

    अमेरिका: रूस से तेल खरीदने की छूट पर घर में घिरे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सांसद बोले- शर्मनाक कदम

    वाशिंगटन। अमेरिका-ईरान युद्धविराम के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपने एक फैसले से घर में विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप ने रूस से पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद की अनुमति देने वाली छूट की अवधि को एक माह के लिए बढ़ा दिया है, जबकि कुछ दिन पूर्व उन्होेंने यह विशेष राहत आगे न बढ़ाने की बात कही थी। अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों ने रूस से तेल खरीदी को दोबारा छूट देना ट्रंप प्रशासन का 180 डिग्री यू-टर्न और शर्मनाक कदम बताया है। सीनेट में भी इसका विरोध हुआ।

    अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने शुक्रवार देर रात आदेश जारी कर रूसी तेल पर लगी पाबंदी से छूट की अवधि 16 मई तक बढ़ा दी।

    डेमोक्रेट नेताओं का कहना है कि एक तरफ रूस की ओर से यूक्रेन पर बड़े हमले जारी हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका उसे आर्थिक लाभ पहुंचा रहा है। डेमोक्रेटिक नेता जीन शाहीन, चक शूमर और एलिजाबेथ वॉरेन ने साझा बयान जारी कर ‘रूस जनरल लाइसेंस 134’ को फिर से लागू करने की निंदा की। यह लाइसेंस उन कंपनियों को सजा से बचाता है जो रूसी तेल खरीद रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने 15 अप्रैल को व्हाइट हाउस में कहा था कि सरकार रूस-ईरान के तेल पर पाबंदी में और ढील नहीं देगी। लेकिन सिर्फ दो दिन में सरकार ने फैसला बदल लिया।

    राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उन्होंने कई वैश्विक विवादों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाई है। इसी दावे के साथ, उन्होंने ट्रुथ सोशल पर ट्रंप वॉर रूम की एक पोस्ट में एक डिजिटल पोस्टर दिखाया, जिसमें ट्रंप को शांति के राष्ट्रपति के तौर पर बताया गया है। ट्रुथ सोशल के हैंडल ने कहा, ट्रंप पर भरोसा करें।

    घबराने वालों पर नहीं। इससे पहले ट्रंप ने दावा किया था कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान समेत आठ युद्धों को खत्म कराने पर अपनी भूमिका याद दिलाई।

    ट्रंप ने जोर देकर कहा, मेरे दखल से बड़े पैमाने पर जानमाल की क्षति रोकने में मदद मिली। एरिजोना के फीनिक्स में टर्निंग प्वाइंट यूएसए कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय विवादों पर बोलते हुए उन्होंने कहा, मैं शांतिदूत हूं। मैं ही वह व्यक्ति हूं जिसने आठ युद्धों को सुलझाया। मैंने भारत-पाकिस्तान के बीच एक ऐसे युद्ध को सुलझाया जिसमें 3-5 करोड़ लोगों की जान जा सकती थी। एजेंसी

    नई समयसीमा और भारत पर असर…
    अमेरिकी वित्त मंत्रालय के अधिकृत दस्तावेज के मुताबिक, अब 17 अप्रैल तक जहाजों पर लोड हुए रूसी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों को 16 मई तक खरीदी की मंजूरी मिल गई है। पिछली छूट 11 अप्रैल को खत्म हो गई थी। नए फैसले का लाभ भारत समेत उन तमाम देशों को मिलेगा जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर हैं।

    सरकार का तर्क है कि पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें न बढ़ें, इसलिए यह कदम उठाया गया है। हालांकि, अमेरिका में विपक्षी सांसद इस तर्क से सहमत नहीं हैं।

    दूसरे दौर की वार्ता की तैयारी में पाकिस्तान
    होर्मुज पर जारी तनाव के बावजूद मध्यस्थता कर रहे पाकिस्तान ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका और ईरान के बीच 22 अप्रैल की युद्धविराम की समयसीमा से पहले समझौता हो जाएगा। विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि लेबनान में युद्धविराम सकारात्मक संकेत है। उन्होंने कहा कि इस्राइल और हिजबुल्ला के बीच लड़ाई प्रमुख मुद्दा था। पाकिस्तान अगले सप्ताह की शुरुआत में ईरान और अमेरिका के बीच वार्ता के दूसरे दौर की मेजबानी करेगा।

    नए अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा कर रहे: ईरान
    ईरान ने कहा कि वह अमेरिका की ओर से भेजे गए नए प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा है। अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने हाल ही में तेहरान दौरे के दौरान ईरान को ये प्रस्ताव सौंपे थे। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ वार्ता अच्छी चल रही है। ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने कहा कि अमेरिकी प्रस्ताव की समीक्षा की जा रही है, लेकिन उसने यह बताने से इन्कार कर दिया कि प्रस्ताव में क्या है।