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  • रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाएगा अमेरिका…, भारत की दो टूक

    रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाएगा अमेरिका…, भारत की दो टूक


    नई दिल्ली।
    अमेरिका (America) ने रूस (Russia) से ज्यादा तेल खरीद (Buy Oil) रहे देशों पर 100 फीसदी टैरिफ (Tariff) लगाने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सीनेट से बिल को मंजूरी मिलने के बाद अब इसे हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव (House of Representatives) में भी लाया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक अमेरिकी कांग्रेस के निचले सदन में इस बिल पर गुरुवार को वोटिंग होगी। अगर यह बिल पास हो जाता है तो भारत पर 100 फीसदी टैरिफ लग सकता है। हालांकि इसके बावजूद भारत (India) ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका चाहे जो कर ले, भारत रूस से तेल खरीदता रहेगा और दबाव के आगे नहीं झुकेगा।

    भारत ने मंगलवार को एक बयान में कहा है कि अमेरिका भले ही टैरिफ लगा ले, भारत दबाव में नहीं आएगा और रूस से तेल की खरीद जारी रखेगा। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों से जुड़े फैसले अपने 140 करोड़ नागरिकों के हितों को ध्यान में रखकर करता है। वह आगे भी इस पर कायम रहेगा।


    लिंडसे ग्राहम बिल सीनेट से हुआ था पास

    अमेरिका में इस बिल को लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान बिल का नाम दिया गया है। अमेरिकी सीनेट में 86-11 के भारी बहुमत से इसे पास करा लिया गया था। इसका सीधा सीधा मकसद भारत और चीन जैसे देशों पर टैरिफ थोपना है। इसमें रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले पांच देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। भारत सरकार से जुड़े सूत्रों ने कहा कि वे स्थिति पर नजर रखे हुए हैं, लेकिन यह साफ है कि भारत सरकार इस बारे में अपनी नीति में कोई बदलाव नहीं करेगी और रूस से तेल की खरीद जारी रखेगी।


    भारत का नाम लिखने की मांग

    इससे पहले यह खबर सामने आई थी कि हाल ही में कुछ अमेरिकी सांसदों ने इस बिल में कुछ बदलावों की सिफारिश की है। सांसदों ने मांग की है कि इस बिल में प्रतिबंध लगाने वाले देशों में सीधे भारत का नाम लिख दिया जाए। इससे पहले बिल में पहले सिर्फ ‘रूस से तेल खरीदने वाले देशों’ का जिक्र था। इसमें किसी देश का नाम नहीं था। हालांकि अब इसमें भारत का नाम अलग से जोड़ने की मांग की गई है।

    इसके अलावा सांसदों का कहना है कि बिल में रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले 10 देशों का नाम साफ-साफ लिखा जाए और उन पर 100 फीसदी टैरिफ ठोका जाए। इन देशों में भारत, चीन, तुर्की, अजरबैजान, हंगरी, स्लोवाक गणराज्य, यूएई, सिंगापुर, कजाखिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं।


    अमेरिका ने पहले लगाया है जुर्माना

    अमेरिका इस मुद्दे को लेकर भारत को कई बार निशाना बना चुका है। अमेरिका ने आरोप लगाए है कि भारत रूस से तेल खरीद कर यूक्रेन युद्ध में उसकी आर्थिक मदद कर रहा है। अमेरिका ने इसका हवाला देते हुए पिछले साल भारत पर 50 फीसदी टैरिफ भी लगा दिया था। हालांकि भारत ने तब भी स्पष्ट किया था कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को सुनिश्चित करने के लिए हर जरूरी कदम उठाएगा।

  • आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर

    आरबीआई की एफसीएनआर जमा योजना से आया बड़ा फंड, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड बढ़त के साथ चौथे स्थान पर


    नई दिल्ली ।
    भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में 44.9 अरब डॉलर बढ़कर 785.7 अरब डॉलर हो गया है। इस तेज बढ़ोतरी के साथ भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में रूस को पीछे छोड़ दिया है और अब चीन, जापान तथा स्विट्जरलैंड के बाद दुनिया में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बढ़ोतरी को मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से डॉलर आकर्षित करने के लिए शुरू की गई एफसीएनआर (बी) जमा योजना के तहत आए बड़े फंड से जोड़ा गया है।

    785.7 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार भारत के लिए महत्वपूर्ण बढ़त है। इस दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में कुल 44.9 अरब डॉलर की वृद्धि हुई। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस बढ़ोतरी ने भारत को वैश्विक स्तर पर विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाले प्रमुख देशों की सूची में रूस से आगे कर दिया है।

    विदेशी मुद्रा भंडार के अलग-अलग घटकों में हालांकि एक समान वृद्धि नहीं हुई। सप्ताह के दौरान सोने के भंडार में 2.59 अरब डॉलर की कमी दर्ज की गई और यह घटकर 113.81 अरब डॉलर रह गया। सोने की कीमतों में गिरावट को इसके पीछे प्रमुख कारण बताया गया है। इसके बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार के अन्य हिस्से में मजबूती के कारण कुल भंडार में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई।

    विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत होना देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए अधिक गुंजाइश मिलती है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा उपलब्ध होने से केंद्रीय बैंक जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है।

    मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार के कारण आरबीआई को स्पॉट और फॉरवर्ड करेंसी मार्केट में भी हस्तक्षेप करने की अधिक क्षमता मिलती है। जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक अतिरिक्त डॉलर जारी करके रुपये की कीमत में तेज गिरावट को रोकने की कोशिश कर सकता है। इस तरह विदेशी मुद्रा भंडार बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार के रूप में काम करता है।

    इस बीच, विदेशी मुद्रा के बड़े पैमाने पर देश में आने से बैंकिंग प्रणाली में अतिरिक्त लिक्विडिटी जमा हुई है। आरबीआई ने इसी अतिरिक्त तरलता को कम करने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ बिक्री की घोषणा की है।

    केंद्रीय बैंक यह बिक्री तीन अलग-अलग किश्तों में करेगा। पहली नीलामी 17 सितंबर को होगी, जिसमें 50,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज बेची जाएंगी। इसके बाद 21 सितंबर को 25,000 करोड़ रुपये और 28 सितंबर को शेष 25,000 करोड़ रुपये की सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री की जाएगी।

    आरबीआई के अनुसार, इन नीलामियों को मल्टी-सिक्योरिटी नीलामी के माध्यम से मल्टीपल-प्राइस मेथड के तहत किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य विदेशी मुद्रा के भारी इनफ्लो से बैंकिंग सिस्टम में बनी अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करना है।

    विदेशी मुद्रा भंडार में हुई 44.9 अरब डॉलर की साप्ताहिक बढ़ोतरी के बाद भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है। रूस को पीछे छोड़कर चौथे स्थान पर पहुंचना देश के विदेशी मुद्रा भंडार में हुई इस बड़ी वृद्धि को दर्शाता है।

  • डॉलर पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी…. भारत-चीन-रूस ने बनाया नया पेमेंट प्लान!

    डॉलर पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी…. भारत-चीन-रूस ने बनाया नया पेमेंट प्लान!


    नई दिल्ली।
    भारत (India) इस सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) की मेजबानी कर रहा है। नई दिल्ली में शनिवार से शुरू हो रहे इस सम्मेलन में 11 देशों के शीर्ष नेता जुटेंगे। इस बीच अब ब्रिक्स देशों (BRICS Nations) की डॉलर (Dollar) पर निर्भरता खत्म करने की तैयारी वाली योजना पर एक बार फिर बहस शुरू हो गई है। दरअसल भारत, चीन और रूस की अगुवाई वाला ब्रिक्स कई सालों से डॉलर का विकल्प तलाशने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में यह समूह अमेरिका से हमेशा खटकता रहा है। अब आगामी शिखर सम्मेलन से पहले भारत ने क्रॉस बॉर्डर भुगतान को आसान बनाने के लिए एक अहम प्रस्ताव तैयार कर लिया है। इससे अमेरिका की बौखलाहट और बढ़ सकती है।

    दरअसल BRICS बीते कुछ समय से एक ऐसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम पर काम कर रहा है जिससे भारत, चीन और रूस जैसे देशों की डिजिटल करेंसियों को इंटीग्रेट किया जा सके। अब ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ब्रिक्स के सदस्य देशों के बीच केंद्रीय बैंकों द्वारा जारी डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की वकालत करेगा।

    हालांकि भारत किसी ऐसे यूनिफाइड पेमेंट नेटवर्क का समर्थन नहीं कर रहा है जिसे अमेरिकी डॉलर या SWIFT के विकल्प के रूप में देखा जाए। इसकी वजह यह है कि भारत नहीं चाहता कि ब्रिक्स समूह को अमेरिका या पश्चिमी देशों के खिलाफ खड़े ब्लॉक के रूप में देखा जाए। यही कारण है कि भारत एक साझा ‘ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम’ बनाने के बजाय द्विपक्षीय डिजिटल करेंसी कनेक्टिविटी पर जोर दे रहा है।

    डिजिटल और स्थानीय करेंसी पर जोर
    रिपोर्ट के मुताबिक भारत का प्रस्ताव है कि ब्रिक्स देश अपनी-अपनी सेंट्रल बैंक की डिजिटल करेंसी को आपस में जोड़ें। इससे मध्यस्थ बैंकों पर निर्भरता कम होगी और लेनदेन की लागत में भारी गिरावट आएगी। आसान भाषा ने कहें तो भारत किसी तीसरे देश की करेंसी यानी डॉलर का उपयोग करने के बजाय सदस्य देशों की अपनी करेंसी में व्यापार करने की बात पर जोर दे रहा है।


    क्या है भारत का प्लान?

    जानकारी के मुताबिक इस सिस्टम में भारत के ई-रुपया, चीन की डिजिटल युआन और रूस की डिजिटल रूबल जैसी सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी को एक साझा तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा। इसमें हर देश अपनी करेंसी पर पूरा कंट्रोल बनाए रखेगा। बदलाव सिर्फ इतना होगा कि इन करेंसी के जरिए आपसी लेनदेन आसान हो जाएगा। इस सिस्टम के जरिए ब्रिक्स देश आपस में होने वाले व्यापार का भुगतान सीधे अपनी डिजिटल करेंसी में कर सकेंगे। इसके लिए ना तो डॉलर की जरूरत होगी और न ही स्विफ्ट जैसे डॉलर आधारित सिस्टम से होकर भुगतान करना पड़ेगा।

    भारत इस पूरे मॉडल को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि करेंसी को मिलाने की बजाय सिस्टम को आपस में जोड़ना बेहतर रास्ता है। इसका आधार भारत का खुद का डिजिटल पेमेंट सिस्टम यूपीआई है। UPI ने देश के अंदर डिजिटल पेमेंट को काफी आसान बनाया है और इसी मॉडल को अन्य देशों के साथ भी जोड़ा जा सकता है।


    काम कैसे करेगा ब्रिक्स का पेमेंट सिस्टम?

    ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सेटलमेंट साइकिल पर काम करेगा। इसका मतलब है कि हर लेनदेन का भुगतान तुरंत नहीं किया जाएगा। एक तय अवधि में आयात और निर्यात का हिसाब जोड़ा जाएगा और आखिर में सिर्फ अंतर की रकम का भुगतान होगा। उदाहरण के लिए, अगर भारत एक महीने में चीन से 500 अरब रुपये का सामान खरीदता है और चीन भारत से 450 अरब रुपये का सामान लेता है, तो भारत को सिर्फ 50 अरब रुपये का ही भुगतान करना होगा। इससे ट्रांजेक्शन कॉस्ट भी कम होंगी।

  • रूसी तेल खरीद पर जयशंकर का स्पष्ट रुख, बोले युद्ध ऊर्जा कारोबार से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से खत्म होगा

    रूसी तेल खरीद पर जयशंकर का स्पष्ट रुख, बोले युद्ध ऊर्जा कारोबार से नहीं बल्कि संवाद और कूटनीति से खत्म होगा

    नई दिल्ली ।विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस से तेल खरीद के मुद्दे पर भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा है कि यूक्रेन युद्ध का समाधान किसी देश के तेल खरीदने या नहीं खरीदने से नहीं निकलेगा। उन्होंने कहा कि करीब पांचवें वर्ष में पहुंच चुका यह संघर्ष संवाद, कूटनीति और गंभीर बातचीत के जरिए ही समाप्त हो सकता है।

    कीव में गुरुवार को जयशंकर ने कहा कि भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा एक महत्वपूर्ण विषय है। करीब 1.4 अरब आबादी वाले देश के लिए पर्याप्त और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि यूक्रेन का अपना दृष्टिकोण है और भारत उसका सम्मान करता है, लेकिन युद्ध खत्म करने का रास्ता केवल तेल खरीदने या रोकने से नहीं निकल सकता।

    अमेरिका की ओर से रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित प्रतिबंध या अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने के सवाल पर भी विदेश मंत्री ने भारत की स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि संघर्ष को समाप्त करने के लिए उन उपायों पर ध्यान देना जरूरी है, जो सीधे शांति और बातचीत की दिशा में आगे बढ़ते हों।

    जयशंकर ने कहा कि रूस से तेल, खनिज, धातु, एल्यूमिना या उर्वरक खरीदना अथवा नहीं खरीदना युद्ध का समाधान नहीं है। उनके मुताबिक वास्तविक समाधान बातचीत के जरिए ही संभव है और भारत दोनों पक्षों के बीच संवाद को प्रोत्साहित करने की अपनी नीति पर कायम है।

    रूस और यूक्रेन के बीच 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद से भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से सवाल उठाए जाते रहे हैं। भारत ने लगातार कहा है कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों के लिए ऊर्जा की उपलब्धता और उचित कीमत सुनिश्चित करना है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव के बीच रूसी तेल भारत के लिए एक व्यावहारिक ऊर्जा विकल्प भी बना है।

    जयशंकर इन दिनों तीन दिवसीय यूक्रेन और पोलैंड यात्रा पर हैं। कीव में उन्होंने यूक्रेन के राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की और विदेश मंत्री आंद्री सिबिहा से मुलाकात की। यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान करना है।

    उन्होंने भारत की उस नीति को भी दोहराया कि यह युद्ध का युग नहीं है और किसी संघर्ष का स्थायी समाधान युद्ध के मैदान में नहीं खोजा जा सकता। भारत दोनों पक्षों के साथ संपर्क बनाए हुए है। जयशंकर ने हाल में मॉस्को में हुई उच्चस्तरीय बातचीत के बाद अब कीव में भी सीधे संवाद किया है।

    विदेश मंत्री ने हाल में कीव पर हुए हमले का उल्लेख करते हुए वहां हुई भारतीय नागरिक की मौत पर भी शोक जताया। उन्होंने कहा कि संघर्ष में जान गंवाने वाले सभी लोगों के परिवारों के प्रति भारत की संवेदनाएं हैं। इस घटना ने यूक्रेन में मौजूद भारतीय नागरिकों और वहां काम करने वाले लोगों की सुरक्षा के मुद्दे को भी महत्वपूर्ण बना दिया है।

    जयशंकर ने यूक्रेनी विदेश मंत्री के साथ बातचीत में काला सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हो रहे हमलों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि भारतीय नाविक विभिन्न देशों के जहाजों पर काम करते हैं और ऐसे हमलों से उनकी सुरक्षा प्रभावित होती है।

    भारत ने काला सागर में नागरिक और व्यावसायिक जहाजों पर किसी भी पक्ष की ओर से किए जाने वाले हमलों को अस्वीकार्य बताया है। समुद्री मार्ग बाधित होने से ईंधन, उर्वरक और खाद्य सामग्री की आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। भारत का जोर इसलिए युद्धविराम, संवाद और कूटनीतिक समाधान के साथ नागरिकों तथा वैश्विक व्यापार मार्गों की सुरक्षा पर भी बना हुआ है।

  • रूस के अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स में भीषण विस्फोट से 7 लोगों की मौत, छह चीनी नागरिक शामिल, नौ अब भी लापता

    रूस के अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स में भीषण विस्फोट से 7 लोगों की मौत, छह चीनी नागरिक शामिल, नौ अब भी लापता

    नई दिल्ली । रूस के सुदूर पूर्वी अमूर क्षेत्र में मंगलवार को एक बड़े गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स में हुए भीषण विस्फोट और आग ने औद्योगिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में छह चीनी नागरिकों समेत सात लोगों की मौत होने की जानकारी सामने आई है, जबकि नौ अन्य चीनी कर्मचारी अब भी लापता बताए जा रहे हैं। घटना के बाद परिसर में राहत और बचाव अभियान चलाया गया तथा हादसे के कारणों की जांच शुरू कर दी गई है।

    यह हादसा अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स की पाइरोलिसिस यूनिट के एक सहायक तकनीकी हिस्से में हुआ। जानकारी के अनुसार जिस समय विस्फोट हुआ, उस दौरान संयंत्र में उपकरणों की अंतिम टेस्टिंग और कमीशनिंग का काम चल रहा था। अचानक हुए धमाके के बाद परिसर में आग फैल गई, जिससे वहां मौजूद कर्मचारियों में अफरा तफरी मच गई।

    प्लांट की प्रेस सर्विस के अनुसार घटना के बाद लगी आग पर काबू पा लिया गया है। कंपनी की ओर से यह भी बताया गया कि संयंत्र के मुख्य उपकरणों को नुकसान नहीं पहुंचा है। हालांकि हादसे में जान गंवाने वाले लोगों और लापता कर्मचारियों को लेकर स्थिति बेहद गंभीर बनी हुई है। नौ चीनी कर्मचारियों के बारे में अब तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आने से उनके परिवारों और संबंधित अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है।

    अमूर गैस केमिकल कॉम्प्लेक्स रूस और चीन के बीच औद्योगिक सहयोग से जुड़ी एक बड़ी परियोजना है। यह परिसर रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में विकसित किया जा रहा है और इसके निर्माण तथा विकास में रूस की सिबुर और चीन की सिनोपेक जैसी कंपनियों की भागीदारी है। ऐसे में हादसे में चीनी नागरिकों के प्रभावित होने से दोनों देशों के स्तर पर भी घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है।

    प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक विस्फोट मुख्य पाइरोलिसिस यूनिट के एक सहायक तकनीकी हिस्से में हुआ। उस समय वहां अंतिम परीक्षण और कमीशनिंग से जुड़ा काम चल रहा था। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि विस्फोट की वास्तविक वजह क्या थी। तकनीकी खराबी, उपकरणों से जुड़ी समस्या या किसी अन्य कारण की पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगी।

    रूसी जांच अधिकारियों की कार्रवाई के बाद हादसे के कारणों को लेकर अधिक स्पष्ट जानकारी सामने आने की उम्मीद है। जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि घटना के समय संयंत्र में किस तरह का तकनीकी काम चल रहा था और सुरक्षा मानकों का पालन किस स्तर तक किया गया था। साथ ही विस्फोट के बाद आग फैलने की परिस्थितियों और कर्मचारियों की मौजूदगी से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा सकती है।

    हादसे ने एक बार फिर बड़े औद्योगिक संयंत्रों में सुरक्षा व्यवस्था और परीक्षण के दौरान अपनाए जाने वाले मानकों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेष रूप से ऐसे परिसर में जहां गैस और रासायनिक प्रक्रियाओं से जुड़े संवेदनशील उपकरण मौजूद हों, वहां छोटी तकनीकी गड़बड़ी भी गंभीर दुर्घटना का रूप ले सकती है। फिलहाल प्रशासन और संबंधित एजेंसियों का मुख्य ध्यान लापता कर्मचारियों की तलाश, प्रभावित लोगों की पहचान और दुर्घटना की वास्तविक वजह सामने लाने पर है।

  • जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति

    जयशंकर और मंटुरोव की बैठक में भारत रूस व्यापार, ऊर्जा, परमाणु, तकनीक और कनेक्टिविटी सहयोग बढ़ाने पर बनी सहमति


    नई दिल्ली ।
    भारत और रूस के बीच रणनीतिक साझेदारी को आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में नई दिशा देने के उद्देश्य से व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग से जुड़े अंतर-सरकारी आयोग की 27वीं बैठक मॉस्को में हुई। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और रूस के प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव ने बैठक की सह-अध्यक्षता की। इस दौरान दोनों देशों के बीच सहयोग से जुड़े अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए और कई प्रमुख क्षेत्रों में व्यावहारिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई।

    दो दिवसीय रूस यात्रा पर पहुंचे जयशंकर ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और प्रथम उप प्रधानमंत्री डेनिस मंटुरोव से मुलाकात की। बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि मौजूदा जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के बावजूद भारत और रूस के संबंधों में लगातार मजबूती और अनुकूलन क्षमता दिखाई दी है। दोनों देशों के बीच आपसी हित और विश्वास को रणनीतिक साझेदारी का आधार बताया गया।

    जयशंकर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में भारत और रूस के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2021-22 में करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर का व्यापार 2025-26 में बढ़कर लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया। व्यापार में यह वृद्धि दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की क्षमता को दर्शाती है, लेकिन इसके साथ व्यापार असंतुलन भी काफी बढ़ा है।

    विदेश मंत्री ने बताया कि व्यापार घाटे का अंतर करीब 6.6 अरब डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। उन्होंने इस असंतुलन को दूर करना भारत और रूस के बीच आर्थिक संबंधों की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल बताया। दोनों पक्षों के बीच व्यापार को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने के लिए नए अवसर तलाशने की जरूरत पर भी जोर दिया गया।

    बैठक में ऊर्जा, उर्वरक, परमाणु सहयोग, कनेक्टिविटी, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और मानव संसाधन की आवाजाही जैसे क्षेत्रों को विशेष महत्व दिया गया। जयशंकर ने कहा कि बदलते वैश्विक आर्थिक और तकनीकी माहौल में दोनों देशों को नए क्षेत्रों की संभावनाओं की पहचान करते हुए सहयोग का दायरा बढ़ाना होगा।

    उन्होंने भारत और रूस के बीच आर्थिक सहयोग को आगे बढ़ाने में उद्योग जगत की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार सरकारें व्यापार और निवेश के लिए आवश्यक ढांचा तैयार कर सकती हैं, लेकिन वास्तविक निवेश, नवाचार और रोजगार सृजन में कारोबारी क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका रहती है। इसलिए संस्थागत तंत्र को उद्योग की प्राथमिकताओं के साथ लगातार जोड़े रखने की आवश्यकता है।

    जयशंकर ने कहा कि अंतर-सरकारी आयोग के विभिन्न कार्य समूहों और उप-समूहों को केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि तय लक्ष्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने समस्या समाधान और व्यावहारिक परिणामों को भविष्य की बैठकों की सफलता का प्रमुख आधार बताया।

    बैठक के बाद जयशंकर ने मंटुरोव को आयोग की सह-अध्यक्षता के लिए धन्यवाद दिया और चर्चा को उत्पादक बताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बैठक उपयोगी रही। भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों में आर्थिक सहयोग को और व्यापक बनाने तथा नई तकनीकी और रणनीतिक जरूरतों के अनुरूप साझेदारी विकसित करने पर दोनों पक्षों का जोर रहा।

  • पुतिन ने PM मोदी की जमकर की तारीफ, भारतीय किसानों के लिए रूस देगा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक

    पुतिन ने PM मोदी की जमकर की तारीफ, भारतीय किसानों के लिए रूस देगा पर्याप्त मात्रा में उर्वरक

    नई दिल्ली। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत और रूस के रिश्तों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की है। सोमवार को मॉस्को में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात के दौरान पुतिन ने कहा कि दोनों देशों के संबंधों को मजबूत बनाने में पीएम मोदी की व्यक्तिगत भूमिका अहम रही है। उन्होंने जयशंकर से प्रधानमंत्री मोदी तक अपना गर्मजोशी भरा अभिवादन पहुंचाने को भी कहा।

    मुलाकात के दौरान पुतिन ने भारत के कृषि क्षेत्र को लेकर भी अहम भरोसा दिया। उन्होंने कहा कि रूस भारत को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक यानी खाद उपलब्ध कराने के लिए जरूरी कदम उठा रहा है। इससे भारतीय किसानों के लिए खाद की उपलब्धता को लेकर राहत की उम्मीद बढ़ी है।

    भारत-रूस व्यापार में फिर दिख रही तेजी

    पुतिन ने कहा कि 2025 में भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार में कुछ गिरावट आई थी, लेकिन अब इसमें सुधार के संकेत दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने व्यापारिक रिश्तों में दोबारा तेजी आने के पीछे कई वजहों का जिक्र किया और प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत ध्यान को खास तौर पर रेखांकित किया।

    रूसी राष्ट्रपति ने कहा कि पीएम मोदी भारत-रूस संबंधों के विकास में व्यक्तिगत रुचि लेते हैं और यही दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    मोदी से जल्द मुलाकात की उम्मीद

    पुतिन ने जयशंकर के सामने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की इच्छा भी जाहिर की। उन्होंने संकेत दिया कि दोनों नेताओं की मुलाकात शंघाई सहयोग संगठन (SCO) से जुड़े कार्यक्रम के दौरान हो सकती है। इसके अलावा कार्यक्रम और समय-सारिणी के अनुसार साल के अंत में भी दोनों नेताओं की मुलाकात की संभावना जताई गई।

    भारतीय किसानों के लिए रूस का बड़ा भरोसा

    बैठक में उर्वरक आपूर्ति का मुद्दा भी अहम रहा। पुतिन ने कहा कि रूस भारत की कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए खाद की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर रहा है।

    भारत के लिए यह आश्वासन महत्वपूर्ण है, क्योंकि उर्वरकों की उपलब्धता सीधे खेती की लागत और उत्पादन से जुड़ी है। खासकर बुवाई के मौसम में खाद की समय पर उपलब्धता किसानों के लिए बेहद अहम होती है।

    सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है सहयोग

    पुतिन ने भारत और रूस के बीच सहयोग को केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं बताया। दोनों देश परमाणु ऊर्जा, हाईटेक, रक्षा और रणनीतिक तकनीक समेत कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं।

    भारत और रूस के बीच लंबे समय से रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में मजबूत साझेदारी रही है। अब दोनों देश व्यापार और आर्थिक सहयोग को भी नए क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।

    मोदी की तारीफ का क्या है मतलब?

    जयशंकर के साथ मुलाकात के दौरान पुतिन की ओर से पीएम मोदी की व्यक्तिगत भूमिका का उल्लेख ऐसे समय हुआ है, जब भारत और रूस अपने पारंपरिक रणनीतिक रिश्तों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग के नए क्षेत्रों में विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

    ऐसे में एक तरफ पुतिन का मोदी की नेतृत्वकारी भूमिका की तारीफ करना और दूसरी तरफ भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा देना, दोनों देशों के बीच सहयोग को आगे बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

  • मॉस्को और रोस्तोव को बनाया निशाना, रातभर चले यूक्रेनी ड्रोन हमलों में बुजुर्ग समेत छह लोगों की जान गई

    मॉस्को और रोस्तोव को बनाया निशाना, रातभर चले यूक्रेनी ड्रोन हमलों में बुजुर्ग समेत छह लोगों की जान गई

    नई दिल्ली ।रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में रविवार को हवाई हमलों का एक बड़ा दौर देखने को मिला। यूक्रेन की ओर से रूस के कई इलाकों में रातभर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमले किए जाने की जानकारी सामने आई है। रूसी अधिकारियों के अनुसार, हवाई सुरक्षा बलों ने देश के अलग-अलग हिस्सों में 822 यूक्रेनी ड्रोन को नष्ट किया। इस हमले में कम से कम छह लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है।

    रूसी रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, हमले के दौरान करीब 600 ड्रोन मॉस्को की दिशा में बढ़ रहे थे। राजधानी और उसके आसपास के इलाकों में हवाई सुरक्षा व्यवस्था को सक्रिय किया गया। मॉस्को क्षेत्र में एक ड्रोन या उसके मलबे के एक निजी मकान से टकराने के बाद 83 वर्षीय बुजुर्ग की मौत की जानकारी सामने आई।

    हमले का असर दक्षिण-पश्चिमी रोस्तोव क्षेत्र में भी देखा गया। क्षेत्रीय प्रशासन के अनुसार, तीन कस्बों को निशाना बनाया गया और वहां पांच लोगों की मौत हुई। हमलों से कई स्थानों पर नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है। स्थानीय प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में स्थिति का आकलन शुरू किया।

    मॉस्को क्षेत्र में ड्रोन हमलों के कारण कई जगह आपातकालीन सेवाओं को सक्रिय किया गया। कुछ स्थानों पर आग लगने की सूचना भी सामने आई। हमलों के दौरान राजधानी की ओर बड़ी संख्या में ड्रोन आने के कारण हवाई सुरक्षा इकाइयों पर दबाव बढ़ा। यह हमला यूक्रेन की ओर से रूस के खिलाफ किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक माना जा रहा है।

    मॉस्को क्षेत्र के एक औद्योगिक इलाके में स्थित एक बड़े गोदाम परिसर में भी आग लगने की जानकारी सामने आई। हमले के बाद आसपास के क्षेत्र में धुआं उठता दिखाई दिया। अधिकारियों ने प्रभावित स्थानों पर राहत और बचाव दल भेजे। नुकसान और हमले के पूरे प्रभाव का आकलन किया जा रहा है।

    यूक्रेन की ओर से रूस के भीतर लंबी दूरी तक ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हमले तेज किए गए हैं। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य रूसी सैन्य और औद्योगिक ढांचे पर दबाव बढ़ाना बताया जाता है। रूस लगातार ऐसे हमलों को रोकने के लिए अपनी हवाई सुरक्षा प्रणाली का इस्तेमाल कर रहा है।

    इस बड़े हमले से एक दिन पहले यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने रूस के भीतर गहरे क्षेत्र में किए गए हमलों की जानकारी दी थी। उनके अनुसार, रूस के समारा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण केंद्र को निशाना बनाया गया था। यूक्रेन ने वहां अपने निर्मित फ्लेमिंगो मिसाइल के इस्तेमाल का दावा किया था। इसके अलावा एक रूसी एयरबेस को भी निशाना बनाए जाने की जानकारी दी गई थी।

    जेलेंस्की ने अपने बयान में कहा था कि रूस को युद्ध की वास्तविक कीमत महसूस करनी चाहिए। उनके अनुसार, यूक्रेन की लंबी दूरी की सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य रूस पर दबाव बढ़ाना है। इसके बाद रूस के कई हिस्सों में हुए बड़े ड्रोन हमले ने दोनों देशों के बीच संघर्ष की बढ़ती तीव्रता को सामने ला दिया है।

    इसी बीच रूस की ओर से यूक्रेन पर भी हमले जारी रहे। यूक्रेनी अधिकारियों के अनुसार, रविवार को कीव और दूसरे इलाकों में रूसी मिसाइल और ड्रोन हमलों से नुकसान हुआ तथा कुछ लोग घायल हुए। दोनों देशों के बीच लगातार हो रहे हमलों से नागरिक क्षेत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर खतरा बढ़ रहा है।

    रूस पर हुए ताजा ड्रोन हमले ने युद्ध के उस दौर को और स्पष्ट किया है जिसमें दोनों पक्ष अपने प्रतिद्वंद्वी के क्षेत्र में दूर तक हमला करने की क्षमता बढ़ा रहे हैं। 822 ड्रोन नष्ट करने का रूसी दावा इस हमले के बड़े पैमाने को दर्शाता है, जबकि छह लोगों की मौत ने इसके मानवीय प्रभाव को भी सामने रखा है। हालांकि, युद्ध के दौरान किए गए सैन्य दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग मामलों में सीमित रहती है।

  • पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ बने रूस के आर्बिट्रेटर, यूक्रेनी सरकारी बैंक के निवेश विवाद में करेंगे कानूनी पक्ष का प्रतिनिधित्व

    पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ बने रूस के आर्बिट्रेटर, यूक्रेनी सरकारी बैंक के निवेश विवाद में करेंगे कानूनी पक्ष का प्रतिनिधित्व

    नई दिल्ली । भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को रूस और यूक्रेन के सरकारी बैंक ओशचाडबैंक के बीच चल रहे निवेश विवाद में रूस की ओर से आर्बिट्रेटर नियुक्त किया गया है। यह मामला रूस-यूक्रेन निवेश संधि के तहत शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता कार्यवाही से जुड़ा है और इसमें यूक्रेन के चार क्षेत्रों में बैंक की संपत्तियों तथा कारोबारी गतिविधियों को हुए कथित नुकसान की भरपाई का दावा किया गया है।

    विवाद की सुनवाई तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल करेगा। इसमें कोस्टा रिका की डियाला जिमेनेज को दोनों पक्षों की सहमति से अध्यक्ष चुना गया है। ओशचाडबैंक ने ग्रीस के स्टावरोस ब्रेकोलाकिस को अपना आर्बिट्रेटर नियुक्त किया है, जबकि रूस की ओर से पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को चुना गया है। इस नियुक्ति के साथ अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में भारत के पूर्व शीर्ष न्यायिक अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।

    ओशचाडबैंक यूक्रेन का सरकारी स्वामित्व वाला प्रमुख बैंक है। बैंक का आरोप है कि वर्ष 2022 के बाद रूस की सैन्य कार्रवाई के कारण डोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में उसकी संपत्तियों और कारोबार को नुकसान पहुंचा। बैंक इसी नुकसान के लिए रूस से मुआवजे की मांग कर रहा है। विवाद के समाधान के लिए बैंक ने जुलाई 2025 में रूस को औपचारिक विवाद नोटिस भेजा था।

    बताया गया है कि रूस की ओर से संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के बाद ओशचाडबैंक ने अप्रैल 2026 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद मामले की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल के गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। अब दोनों पक्षों ने अपने-अपने आर्बिट्रेटर नियुक्त कर दिए हैं और अध्यक्ष के तौर पर डियाला जिमेनेज की नियुक्ति पर सहमति बनी है।

    पूर्व CJI चंद्रचूड़ की नियुक्ति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि रूस इससे पहले भी उन्हें दो अन्य निवेश विवादों में आर्बिट्रेटर बनाने का प्रस्ताव दे चुका था। हालांकि, उन प्रस्तावों को उन्होंने स्वीकार नहीं किया था। इस बार उन्होंने रूस की ओर से इस मामले में आर्बिट्रेटर की भूमिका स्वीकार की है।

    यह विवाद ओशचाडबैंक और रूस के बीच पहले हुए क्रीमिया से जुड़े मामले से अलग है। क्रीमिया में बैंक की संपत्तियों से संबंधित पुराने विवाद में ओशचाडबैंक को करीब 1.1 अरब डॉलर का मुआवजा मिला था। मौजूदा मामला वर्ष 2022 के बाद डोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया में कथित नुकसान से संबंधित है।

    अंतरराष्ट्रीय निवेश मध्यस्थता में आर्बिट्रेटर की भूमिका किसी पक्ष की ओर से मामले की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश जैसी नहीं होती, बल्कि वह संबंधित ट्रिब्यूनल का सदस्य होता है और विवाद के कानूनी तथा तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार करता है। इस मामले में भी तीनों सदस्य मिलकर संबंधित दावों, आपत्तियों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करेंगे।

    रूस और यूक्रेन के बीच जारी व्यापक संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह निवेश विवाद अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ओशचाडबैंक जिन संपत्तियों और कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचने का दावा कर रहा है, उनके आधार पर मुआवजे की मांग की गई है। अब ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों की दलीलों और साक्ष्यों पर विचार करते हुए मामले में आगे की कार्यवाही करेगा।

  • रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    रूस ने भारत तक रेल कनेक्शन की संभावना जताई, पाकिस्तान और ईरान के रास्ते व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की तैयारी पर चर्चा

    नई दिल्ली । रूस और भारत के बीच व्यापारिक संपर्क को मजबूत करने के लिए एक नए जमीनी परिवहन मार्ग की संभावना पर चर्चा शुरू हुई है। रूस ने भारत तक पहुंचने वाले संभावित वैकल्पिक रास्तों पर विचार करने की बात कही है। प्रस्तावित मार्ग रूस से शुरू होकर तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते हिंद महासागर तक पहुंच सकता है। हालांकि, अभी यह केवल प्रारंभिक प्रस्ताव है और किसी औपचारिक रेल परियोजना को मंजूरी नहीं मिली है।

    यह पहल ऐसे समय सामने आई है जब पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के कारण समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। भारत और रूस के बीच बड़े पैमाने पर व्यापार वर्तमान में समुद्री मार्गों पर निर्भर है। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में व्यवधान आने पर वैकल्पिक जमीनी नेटवर्क दोनों देशों के बीच माल ढुलाई के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकता है।

    रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने भारत तक पहुंचने वाले हर संभावित मार्ग पर विचार करने की जरूरत बताई है। उन्होंने बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिमों के मद्देनजर वैकल्पिक संपर्क मार्ग विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रस्ताव का उद्देश्य केवल रेल संपर्क तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस और भारत के बीच व्यापार को अधिक सुरक्षित और विविध परिवहन नेटवर्क उपलब्ध कराने से भी जुड़ा है।

    भारत के लिए ऐसा मार्ग ऊर्जा और व्यापार दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। समुद्री मार्गों में किसी तरह की बाधा या शिपिंग लागत में वृद्धि की स्थिति में जमीनी परिवहन अतिरिक्त विकल्प दे सकता है। रूस से भारत आने वाले कच्चे तेल, उर्वरक और अन्य महत्वपूर्ण सामानों की आपूर्ति के लिए भी वैकल्पिक परिवहन नेटवर्क उपयोगी हो सकता है।

    दूसरी ओर, भारत से रूस को भेजे जाने वाले कृषि उत्पाद, दवाएं और मशीनरी जैसे सामानों के लिए भी जमीनी संपर्क समय और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध बढ़ने के साथ परिवहन के नए विकल्पों की जरूरत भी बढ़ी है। ऐसे में प्रस्तावित मार्ग को व्यापक यूरेशियाई व्यापार नेटवर्क के संदर्भ में देखा जा रहा है।

    भारत पहले से ही अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे के जरिए रूस और मध्य एशिया तक संपर्क बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करने की भारत की नीति भी इस प्रस्ताव से जुड़ सकती है। हालांकि, प्रस्तावित नए मार्ग में कई जटिल चुनौतियां मौजूद हैं।

    सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान से जुड़ी है। प्रस्तावित मार्ग पाकिस्तान से होकर गुजरता है, जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच जमीनी व्यापार लंबे समय से गंभीर प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। भारत के माल को पाकिस्तान से होकर गुजरने की अनुमति और ट्रांजिट अधिकार देना इस योजना के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रश्न होगा।

    अफगानिस्तान की सुरक्षा और बुनियादी ढांचे की स्थिति भी इस मार्ग के संचालन में बड़ी चुनौती बन सकती है। इसके अलावा अलग-अलग देशों में रेल गेज, सीमा शुल्क व्यवस्था, सीमा पार प्रक्रियाएं और नए बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए बड़े निवेश की आवश्यकता होगी।

    फिलहाल रूस का यह प्रस्ताव शुरुआती विचार के स्तर पर है। इसे वास्तविक रेल परियोजना में बदलने के लिए भारत समेत संबंधित देशों के बीच राजनीतिक सहमति, सुरक्षा व्यवस्था, तकनीकी समन्वय और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी होगा। यदि भविष्य में इन बाधाओं का समाधान होता है, तो यह मार्ग भारत और रूस के बीच व्यापार के लिए समुद्री परिवहन के अलावा एक अतिरिक्त विकल्प बन सकता है।